भारत में मध्यपाषाण काल (Mesolithic Period in India)

भारत में मध्य पाषाण काल (Mesolithic Period in India)
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भारत में मध्यपाषाण काल

मुख्य लेख : भारत में पाषाण काल

भारत में मध्यपाषाण काल (मेसोलिथिक एज) पुरापाषाण और नवपाषाण काल के बीच का एक महत्त्वपूर्ण संक्रमणकालीन चरण था। इसकी समय-सीमा पूरे भारत में समान नहीं थी; सामान्यतः भारतीय संदर्भ में इसे लगभग 12,000/10,000 ईसा पूर्व से 6,000/4,000 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में मध्यपाषाणकालीन परंपराएँ इससे अधिक समय तक जारी रहीं। ‘मध्यपाषाण’ शब्द यूनानी भाषा के ‘मेसोस’ (मध्य) और ‘लिथोस’ (पत्थर) से बना है। इस काल में अंतिम हिमयुग के बाद जलवायु में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए और तापमान अपेक्षाकृत बढ़ा, जिसके परिणामस्वरूप वनस्पति तथा पशु-जगत में भी परिवर्तन आया।  मानव ने बदलते पर्यावरण के अनुरूप अपनी जीवन-शैली और तकनीक में परिवर्तन किया। वह अभी भी मुख्यतः शिकारी-संग्राहक था, किंतु शिकार के साथ मछली पकड़ने, छोटे पशुओं का शिकार तथा विभिन्न वनस्पतियों और खाद्य पदार्थों के संग्रह का महत्त्व बढ़ गया। कुछ क्षेत्रों में पशुओं के पालतूकरण और प्रारंभिक पशुपालन के संकेत भी प्राप्त हुए हैं।

मध्यपाषाण काल की सबसे प्रमुख विशेषता सूक्ष्म पाषाण उपकरण या माइक्रोलिथ थे। ये आकार में छोटे, हल्के और धारदार उपकरण थे, जिन्हें चर्ट, जैस्पर, चाल्सेडनी, क्वार्ट्ज, क्वार्टजाइट तथा अन्य उपयुक्त पत्थरों से बनाया जाता था। इनमें ब्लेड, खुरचनी, तक्षणी, बेधनी, त्रिकोण, अर्धचंद्राकार उपकरण और समलंब आदि प्रमुख थे। कई माइक्रोलिथों को लकड़ी, हड्डी या सींग के हत्थों में जड़कर संयुक्त उपकरण बनाए जाते थे, जिससे शिकार और अन्य दैनिक कार्य अधिक प्रभावी हो गए। इस काल में मानव ने आग का उपयोग पहले से ही सीख रखा था और भोजन पकाने तथा मांस भूनने के लिए उसका प्रयोग करता था। कुछ स्थलों से मृद्भांडों के सीमित प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं, जो जीवन-शैली में हो रहे परिवर्तन को दर्शाते हैं। हालांकि, व्यवस्थित कृषि का व्यापक विकास मध्यपाषाण काल की सामान्य विशेषता नहीं था; कृषि और स्थायी कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था का स्पष्ट विकास मुख्यतः नवपाषाण काल में हुआ।

मध्यपाषाण कालीन संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ

मध्यपाषाण काल में मानव की अर्थव्यवस्था मुख्यतः शिकार, मछली पकड़ने और खाद्य-संग्रह पर आधारित थी। पुरापाषाण काल की तुलना में बड़े पशुओं के शिकार का महत्त्व कुछ क्षेत्रों में कम हुआ और छोटे पशुओं, पक्षियों तथा मछलियों के शिकार की भूमिका बढ़ी। जलस्रोतों के निकट मानव बस्तियों की संख्या में वृद्धि हुई, क्योंकि वहाँ जल, वनस्पति और पशु-सम्पदा आसानी से उपलब्ध थी। मानव समूह अभी पूरी तरह स्थायी नहीं हुए थे, किंतु कुछ स्थानों पर अपेक्षाकृत लंबे समय तक रहने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। मध्यपाषाण काल के उत्तरार्द्ध में कुछ क्षेत्रों में पशुपालन तथा कृषि की प्रारंभिक प्रवृत्तियाँ दिखाई देने लगीं, जो आगे चलकर नवपाषाण काल की उत्पादक अर्थव्यवस्था का आधार सिद्ध हुईं।

Ancient tools and human activities depicted.
मध्यपाषाणकालीन उपकरण एवं विस्तार

इस काल में माइक्रोलिथिक तकनीक का उल्लेखनीय विकास हुआ। माइक्रोलिथ सामान्यतः छोटे आकार के पाषाण उपकरण थे, जिनमें ज्यामितीय तथा अज्यामितीय दोनों प्रकार मिलते हैं। ज्यामितीय उपकरणों में त्रिकोण, अर्धचंद्राकार (ल्यूनेट) और समलंब प्रमुख थे, जबकि ब्लेड, खुरचनी और बेधनी जैसे उपकरण अज्यामितीय श्रेणी में रखे जाते हैं। इन उपकरणों को लकड़ी या हड्डी के हत्थों में लगाकर तीर, भाले, चाकू और अन्य संयुक्त उपकरण बनाए जाते थे। इस तकनीकी परिवर्तन ने कम मात्रा में उपलब्ध पत्थर से अधिक उपयोगी उपकरण तैयार करना संभव बनाया और बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप मानव की अनुकूलन क्षमता को बढ़ाया।

भारत में मध्यपाषाण संस्कृति की खोज

भारत में मध्यपाषाणकालीन संस्कृति के अध्ययन का प्रारंभ 19वीं शताब्दी में हुआ। सी. एल. कार्लायल ने 1867 ई. के आसपास विंध्य क्षेत्र में सर्वेक्षण के दौरान सूक्ष्म पाषाण उपकरणों की पहचान की। इन उपकरणों के अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि पुरापाषाण और नवपाषाण के बीच भारत में एक विशिष्ट सांस्कृतिक चरण मौजूद था। बाद में विभिन्न क्षेत्रों में किए गए पुरातात्त्विक उत्खननों से मध्यपाषाणकालीन जीवन के संबंध में अधिक व्यापक प्रमाण प्राप्त हुए। रेडियोकार्बन तिथियों के आधार पर अलग-अलग स्थलों की काल-सीमा निर्धारित की गई है, इसलिए पूरे भारत के लिए एक ही निश्चित तिथि निर्धारित करना उचित नहीं है।

मध्यपाषाण काल में जलवायु परिवर्तन के कारण मानव के सामने नए पर्यावरणीय अवसर और चुनौतियाँ उत्पन्न हुईं। बड़े हिमयुगीन पशुओं की तुलना में छोटे और अधिक विविध पशु तथा वनस्पतियाँ उपलब्ध होने लगीं। मानव ने इन संसाधनों के अनुरूप अपनी शिकार-पद्धतियों और उपकरणों में परिवर्तन किया। इसी कारण छोटे और हल्के माइक्रोलिथों का व्यापक विकास हुआ। इस काल में कुत्ते के पालतूकरण के प्रारंभिक प्रमाण भी कुछ स्थलों से प्राप्त हुए हैं। यद्यपि पशुपालन और कृषि का विकास सभी क्षेत्रों में एक साथ नहीं हुआ और इसे नवपाषाण काल की तरह व्यापक आर्थिक आधार नहीं माना जा सकता है।

मध्यपाषाण काल के प्रमुख पाषाण उपकरण

मध्यपाषाण काल की पहचान मुख्यतः सूक्ष्म पाषाण उपकरणों से होती है। इनकी लंबाई सामान्यतः कुछ सेंटीमीटर या उससे कम होती थी और इन्हें अपेक्षाकृत अधिक दक्ष तकनीकों से बनाया जाता था। ब्लेड, ब्लेडलेट, कोर, खुरचनी, तक्षणी, बेधनी, त्रिकोण, अर्धचंद्राकार और समलंब इसके प्रमुख उपकरण थे। इन उपकरणों को लकड़ी, हड्डी या सींग के हत्थों में जड़कर संयुक्त औजार बनाए जाते थे। विशेष रूप से अर्धचंद्राकार और त्रिकोणीय उपकरणों का उपयोग तीरों तथा अन्य शिकार-साधनों में किया जाता रहा होगा। इस तकनीक से मानव कम आकार के पत्थर के टुकड़ों से अधिक प्रभावी उपकरण बना सका।

मध्यपाषाण काल का विस्तार

यद्यपि सूक्ष्म पाषाण उपकरणों की शुरुआत कुछ क्षेत्रों में उच्च पुरापाषाण काल के अंतिम चरण में दिखाई देती है, उनका व्यापक और व्यवस्थित विकास मध्यपाषाण काल में हुआ। माइक्रोलिथिक तकनीक केवल भारत तक सीमित नहीं थी, बल्कि विश्व के अनेक क्षेत्रों में इस काल के शिकारी-संग्राहक समुदायों द्वारा छोटे पाषाण उपकरणों का प्रयोग किया गया। यह तकनीकी विकास मानव की बदलती जीवन-शैली और पर्यावरण के प्रति उसके अनुकूलन का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।

राजस्थान और पश्चिमी भारत

राजस्थान में बागोर और तिलवाड़ा मध्यपाषाण काल के प्रमुख पुरास्थल हैं। कोठारी नदी के तट पर स्थित बागोर भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण और विस्तृत मध्यपाषाणकालीन स्थलों में से एक है। यहाँ से माइक्रोलिथों के साथ पशुपालन, निवास और आर्थिक गतिविधियों से संबंधित प्रमाण मिले हैं। बागोर के उत्खनन से मध्यपाषाणकालीन मानव के जीवन में धीरे-धीरे हो रहे आर्थिक परिवर्तनों को समझने में विशेष सहायता मिली है।

गुजरात का लंघनाज भी एक महत्त्वपूर्ण मध्यपाषाणकालीन स्थल है। यहाँ से माइक्रोलिथों के साथ मानव तथा पशु-अवशेष प्राप्त हुए हैं। उत्तर और मध्य गुजरात के अन्य स्थलों से भी माइक्रोलिथिक उपकरण मिले हैं। इन स्थलों से प्राप्त उपकरणों में ब्लेड, अर्धचंद्राकार, त्रिकोण तथा अन्य ज्यामितीय रूप प्रमुख हैं।

उत्तर भारत और मध्य भारत

उत्तर प्रदेश में सराय नाहर राय, महदहा, दमदमा और चोपनी मांडो मध्यपाषाण काल के महत्त्वपूर्ण स्थल हैं। गंगा-घाटी के इन स्थलों से मानव निवास, भोजन-संग्रह, शिकार, मछली पकड़ने तथा अन्त्येष्टि संस्कारों के महत्त्वपूर्ण प्रमाण प्राप्त हुए हैं। सराय नाहर राय, महदहा और दमदमा से मानव अस्थिपंजर मिले हैं, जिनसे मध्यपाषाणकालीन मानव के शारीरिक जीवन तथा दफन परंपराओं के अध्ययन में सहायता मिलती है। चोपनी मांडो से निवास तथा मृद्भांड के प्रारंभिक प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं।

मध्य प्रदेश में भीमबेटका और आदमगढ़ प्रमुख मध्यपाषाणकालीन केंद्र हैं। भीमबेटका अपने प्रागैतिहासिक शैलाश्रयों और शैलचित्रों के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। आदमगढ़ से भी शैलचित्रों तथा मानव की शिकार-संबंधी गतिविधियों के प्रमाण मिले हैं। विंध्य क्षेत्र के मोरहना पहाड़, बाघैखोर और लेखहिया जैसे स्थलों से भी माइक्रोलिथिक उपकरण तथा अन्य सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए हैं।

पूर्वी भारत

पूर्वी भारत में मध्यपाषाणकालीन सूक्ष्म पाषाण उपकरण मुख्यतः ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छोटानागपुर क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं। पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले में दामोदर नदी के निकट वीरभानपुर एक महत्त्वपूर्ण स्थल है। ओडिशा के मयूरभंज, क्योंझर, कुचई और सुंदरगढ़ क्षेत्रों से भी माइक्रोलिथिक उपकरण प्राप्त हुए हैं। इन क्षेत्रों में क्वार्ट्ज, चर्ट, चाल्सेडनी और अन्य स्थानीय पत्थरों से बने उपकरण पाए गए हैं। मेघालय की गारो पहाड़ियों से भी सूक्ष्म पाषाण उपकरणों के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।

दक्षिण भारत

दक्षिण भारत में मध्यपाषाणकालीन माइक्रोलिथिक परंपरा के प्रमाण विभिन्न क्षेत्रों से मिले हैं। आंध्र प्रदेश के कुर्नूल और रानीगुंटा तथा कर्नाटक और तमिलनाडु के कुछ क्षेत्रों से माइक्रोलिथिक उपकरण प्राप्त हुए हैं। दक्षिण भारत के कई स्थलों पर पुरापाषाण, मध्यपाषाण और नवपाषाण परंपराओं के बीच सांस्कृतिक निरंतरता भी दिखाई देती है। इसलिए किसी स्थल को केवल एक काल से जोड़ते समय उसके पुरातात्त्विक स्तर, उपकरण-परंपरा और प्राप्त अन्य अवशेषों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

मध्यपाषाण कालीन अर्थव्यवस्था और जीवन

मध्यपाषाणकालीन मानव की अर्थव्यवस्था मुख्यतः आखेट और खाद्य-संग्रह पर आधारित थी। वह जंगली पशुओं का शिकार करता, मछलियाँ पकड़ता तथा फल, कंद-मूल, बीज और अन्य वनस्पतिजन्य खाद्य पदार्थ एकत्र करता था। कुछ स्थलों से पशुओं के पालतूकरण के प्रमाण मिले हैं, जिनसे पता चलता है कि मध्यपाषाण काल के अंतिम चरण में कुछ समुदायों ने शिकारी-संग्राहक जीवन के साथ पशुपालन को भी अपनाना शुरू कर दिया था। राजस्थान, गुजरात और गंगा-घाटी के कुछ स्थलों से प्राप्त प्रमाण इस परिवर्तन की ओर संकेत करते हैं। फिर भी कृषि और पशुपालन को इस काल की सर्वव्यापी अर्थव्यवस्था मानना उचित नहीं है।

इस काल में मानव के निवास-स्थलों में भी परिवर्तन दिखाई देता है। शैलाश्रयों और खुले स्थलों के साथ-साथ जलस्रोतों के निकट अस्थायी अथवा अर्ध-स्थायी निवास के प्रमाण मिलते हैं। चोपनी मांडो और महदहा जैसे स्थलों से निवास तथा चूल्हों से संबंधित प्रमाण प्राप्त हुए हैं। इनसे पता चलता है कि मानव भोजन को पकाता था और आग का नियमित उपयोग करता था। कुछ स्थलों से मृद्भांड भी मिले हैं, किंतु मृद्भांडों का व्यापक प्रयोग भारतीय उपमहाद्वीप में बाद के नवपाषाण और ताम्रपाषाण चरणों में अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

Prehistoric humans engaging in daily activities.
मध्य पाषाणकालीन संस्कृति

मध्यपाषाण काल में अन्त्येष्टि संस्कार

मध्यपाषाण काल की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता मृतकों को व्यवस्थित रूप से दफनाने की परंपरा है। उत्तर प्रदेश के सराय नाहर राय, महदहा और दमदमा से मानव अस्थिपंजरों के साथ दफन संस्कारों के प्रमाण मिले हैं। कुछ कब्रों में मृतकों को विशेष स्थिति में रखा गया था। इन साक्ष्यों से मध्यपाषाणकालीन मानव की सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के बारे में जानकारी मिलती है। कुछ स्थलों पर मानव के साथ पशु-अवशेषों की उपस्थिति भी मिली है, जो मनुष्य और पशुओं के संबंधों की ओर संकेत करती है।

मध्यपाषाण काल की शैलचित्रकला

मध्यपाषाण काल में शैलचित्रकला का उल्लेखनीय विकास हुआ। शैलाश्रयों और चट्टानों पर बनाए गए चित्रों में शिकार, पशु, मानव समूह, नृत्य, मछली पकड़ने और अन्य दैनिक गतिविधियों का चित्रण मिलता है। मध्य भारत का भीमबेटका इस परंपरा का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। इसके अतिरिक्त मध्य प्रदेश के आदमगढ़ तथा उत्तर प्रदेश के मोरहना पहाड़ जैसे क्षेत्रों से भी शैलचित्र प्राप्त हुए हैं। चित्रों में लाल, सफेद, पीले और अन्य प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया गया। इन चित्रों से मध्यपाषाणकालीन मानव की आर्थिक गतिविधियों, शिकार-पद्धति, सामाजिक जीवन और कलात्मक अभिव्यक्ति के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

शैलचित्रों में सामूहिक शिकार के दृश्य विशेष महत्त्व रखते हैं। इनमें धनुष-बाण या अन्य शिकार-साधनों से पशुओं का पीछा करते मानव समूहों को दिखाया गया है। ऐसे चित्र सामूहिक गतिविधियों और सहयोग की भावना का संकेत देते हैं। पशुओं के चित्रों की संख्या भी उल्लेखनीय है, जिससे स्पष्ट होता है कि पशु मध्यपाषाणकालीन मानव के आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते थे।

मध्यपाषाण काल का ऐतिहासिक महत्त्व

मध्यपाषाण काल भारतीय प्रागैतिहासिक इतिहास में पुरापाषाण से नवपाषाण की ओर संक्रमण का महत्त्वपूर्ण चरण था। इस काल में माइक्रोलिथिक तकनीक का व्यापक विकास, बदलते पर्यावरण के अनुरूप जीवन-शैली में परिवर्तन, शिकार और खाद्य-संग्रह की विविधता, मछली पकड़ने का बढ़ता महत्त्व, पशुओं के प्रारंभिक पालतूकरण, अपेक्षाकृत स्थायी निवास, अन्त्येष्टि संस्कार और शैलचित्रकला जैसी प्रवृत्तियाँ विकसित हुईं। यद्यपि कृषि और पशुपालन का व्यापक तथा व्यवस्थित विकास बाद के नवपाषाण काल में हुआ, मध्यपाषाण काल ने मानव को उस परिवर्तन के लिए आवश्यक तकनीकी और सामाजिक आधार प्रदान किया। इस दृष्टि से मध्यपाषाण काल भारतीय सभ्यता के विकास की उस कड़ी का प्रतिनिधित्व करता है, जिसने शिकारी-संग्राहक जीवन से अधिक स्थायी और उत्पादक जीवन-व्यवस्था की दिशा में मानव के संक्रमण को संभव बनाया।

भारत में मध्यपाषाण काल से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. मध्यपाषाण काल क्या है?

मध्यपाषाण काल पुरापाषाण और नवपाषाण काल के बीच का संक्रमणकालीन चरण है। इस काल की प्रमुख पहचान सूक्ष्म पाषाण उपकरणों, शिकारी-संग्राहक अर्थव्यवस्था, शैलचित्रकला तथा कुछ क्षेत्रों में प्रारंभिक पशुपालन और अधिक स्थायी निवास से होती है।

2. भारत में मध्यपाषाण काल कब था?

भारत में मध्यपाषाण काल की कोई एक सर्वमान्य समय-सीमा नहीं है। सामान्यतः इसे लगभग 12,000/10,000 ईसा पूर्व से 6,000/4,000 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है, किंतु अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी अवधि अलग रही।

3. मध्यपाषाण काल की सबसे प्रमुख विशेषता क्या थी?

इस काल की सबसे प्रमुख विशेषता सूक्ष्म पाषाण उपकरण या माइक्रोलिथ थे। ये छोटे, हल्के और धारदार उपकरण थे, जिनका उपयोग शिकार तथा अन्य दैनिक कार्यों में किया जाता था।

4. मध्यपाषाण काल के प्रमुख उपकरण कौन-कौन से थे?

प्रमुख उपकरणों में ब्लेड, खुरचनी, तक्षणी, बेधनी, त्रिकोण, अर्धचंद्राकार उपकरण और समलंब शामिल थे। इन्हें कई बार लकड़ी या हड्डी के हत्थों में जड़कर संयुक्त उपकरण बनाया जाता था।

5. मध्यपाषाणकालीन मानव की अर्थव्यवस्था कैसी थी?

उसकी अर्थव्यवस्था मुख्यतः शिकार, मछली पकड़ने और खाद्य-संग्रह पर आधारित थी। कुछ क्षेत्रों में पशुपालन तथा प्रारंभिक कृषि की प्रवृत्तियाँ भी दिखाई देती हैं।

6. भारत के प्रमुख मध्यपाषाणकालीन स्थल कौन-कौन से हैं?

प्रमुख स्थलों में बागोर और तिलवाड़ा (राजस्थान), लंघनाज (गुजरात), सराय नाहर राय, महदहा, दमदमा और चोपनी मांडो (उत्तर प्रदेश), भीमबेटका और आदमगढ़ (मध्य प्रदेश) तथा वीरभानपुर (पश्चिम बंगाल) शामिल हैं।

7. बागोर क्यों प्रसिद्ध है?

बागोर (राजस्थान) भारत के प्रमुख मध्यपाषाणकालीन स्थलों में से एक है। यहाँ से माइक्रोलिथ, मानव निवास तथा पशुपालन से संबंधित महत्त्वपूर्ण प्रमाण प्राप्त हुए हैं।

8. लंघनाज का क्या महत्त्व है?

लंघनाज (गुजरात) से सूक्ष्म पाषाण उपकरणों के साथ मानव और पशु-अवशेष प्राप्त हुए हैं। यह गुजरात की मध्यपाषाणकालीन संस्कृति के अध्ययन का प्रमुख स्थल है।

9. भीमबेटका क्यों प्रसिद्ध है?

भीमबेटका (मध्य प्रदेश) अपने प्रागैतिहासिक शैलाश्रयों और शैलचित्रों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के चित्रों में शिकार, पशुओं और मानव की विभिन्न गतिविधियों का चित्रण मिलता है।

10. क्या मध्यपाषाण काल में पशुपालन शुरू हो गया था?

कुछ स्थलों से पशुओं के प्रारंभिक पालतूकरण और पशुपालन के प्रमाण मिलते हैं, किंतु पशुपालन इस काल में पूरे भारत की प्रमुख आर्थिक गतिविधि नहीं था। इसका व्यापक विकास नवपाषाण काल में हुआ।

11. मध्यपाषाण काल में कृषि का क्या स्थान था?

मध्यपाषाण काल की मुख्य अर्थव्यवस्था शिकार और खाद्य-संग्रह पर आधारित थी। कुछ क्षेत्रों में प्रारंभिक कृषि की संभावनाओं के संकेत मिलते हैं, किंतु व्यवस्थित कृषि-आधारित जीवन का स्पष्ट विकास नवपाषाण काल में हुआ।

12. मध्यपाषाण काल का ऐतिहासिक महत्त्व क्या है?

मध्यपाषाण काल मानव जीवन में तकनीकी, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन का महत्त्वपूर्ण चरण था। माइक्रोलिथिक तकनीक, शैलचित्रकला, अन्त्येष्टि संस्कार, अधिक स्थायी निवास तथा प्रारंभिक पशुपालन जैसी प्रवृत्तियों ने आगे चलकर नवपाषाणकालीन कृषि और स्थायी ग्राम-जीवन के विकास की पृष्ठभूमि तैयार की।
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