अंतरराष्ट्रीय संबंध (International Relations)

अंतरराष्ट्रीय संबंध (International Relations)

अंतरराष्ट्रीय संबंध (1890-1914 ई.)

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जर्मनी की विदेश नीति

1 मार्च 1888 ई. को 91 वर्ष की आयु में सम्राट विलियम प्रथम की मृत्यु हो गई। इसके बाद उसका पुत्र फ्रेडरिक तृतीय जर्मनी का सम्राट बना। वह उदारवादी विचारों वाला शासक था और जर्मनी की जनता को आशा थी कि अब जर्मनी में प्रजातंत्र का युग आरंभ होगा। किंतु उनकी आशाओं पर शीघ्र ही तुषारापात हो गया, क्योंकि केवल निन्यानवे दिन शासन करने के बाद ही फ्रेडरिक तृतीय की मृत्यु हो गई।

फ्रेडरिक तृतीय की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र विलियम द्वितीय जर्मनी के सिंहासन पर बैठा। वह स्वतंत्र विचारों वाला और अत्यंत महत्त्वाकांक्षी सम्राट था। विलियम बुद्धिमान था, किंतु उसका स्वभाव अस्थिर था और किसी अन्य व्यक्ति के नियंत्रण में रहना उसके लिए असह्य था। उसे लगता था कि ब्रिटिश साम्राज्य की तुलना में जर्मनी को अपेक्षित प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं है। इसी कारण कुछ ही समय बाद उसके प्रसिद्ध चांसलर बिस्मार्क से मतभेद उत्पन्न हो गए। परिस्थितियों से विवश होकर 1890 ई. में बिस्मार्क को अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा। इसके बाद सम्राट के चांसलर उसके आज्ञाकारी कर्मचारी मात्र बन गए। वह अपनी इच्छा के अनुसार प्रधानमंत्री नियुक्त करता था, जो उसके आदेशों का पालन करते थे।

1890 ई. के बाद जर्मनी में कैप्रिवी (1890–1894 ई.), होहेनलोहे (1894–1900 ई.), फॉन बूलो (1900–1909 ई.) और बेथमान हॉलवेग (1909–1917 ई.) प्रधानमंत्री हुए, किंतु इनमें से कोई भी ऐसा नहीं था, जो सम्राट पर पर्याप्त प्रभाव डाल सके। बिस्मार्क के पतन के बाद विलियम द्वितीय ने शासन की समस्त सत्ता अपने हाथों में ले ली। उसके मंत्री उसके आज्ञाकारी सेवक बन गए और वह स्वयं शासन का वास्तविक संचालक बन गया। साम्राज्य की नीति स्वयं सम्राट की नीति बन गई और जर्मनी का भाग्य पूर्णतया उसी के हाथों में आ गया।

जर्मनी का उत्थान सेना के बल पर हुआ था और उसकी शक्ति का मुख्य आधार सेना ही थी। विलियम द्वितीय सैन्य शक्ति के महत्त्व को भली-भाँति समझता था और उसका अधिकतम विस्तार करना चाहता था। यह इसी बात से स्पष्ट होता है कि राज्यारोहण के बाद उसने अपना पहला भाषण सेना के समक्ष दिया, जिसमें उसने सेना के गौरव को बनाए रखने का दृढ़ संकल्प व्यक्त किया। उसने लोकसभा के रूढ़िवादी (कंज़र्वेटिव) दलों के समर्थन से सेना का व्यापक विस्तार किया।

1893 ई. में शांतिकाल के लिए सेना की संख्या 4,52,000 निर्धारित की गई, जिसे 1902 ई. में बढ़ाकर 4,52,500 कर दिया गया। इसी वर्ष अनिवार्य सैनिक सेवा की अवधि तीन वर्ष से घटाकर दो वर्ष कर दी गई और 1910 ई. तक सेना की संख्या में दस हजार सैनिकों की वृद्धि की गई। इस व्यवस्था के परिणामस्वरूप जर्मनी की सैन्य शक्ति अत्यंत प्रबल हो गई। युद्ध की स्थिति में वह लगभग सत्रह लाख सैनिकों को मैदान में उतार सकता था।

कैसर विलियम द्वितीय की नई नीति

1890 ई. में बिस्मार्क के पदत्याग के बाद जर्मनी की विदेश नीति का संचालन स्वयं सम्राट विलियम (कैसर) के हाथों में आ गया, जिसके परिणामस्वरूप जर्मनी की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में व्यापक परिवर्तन हुआ। विलियम ने यूरोप में सुरक्षा और शक्ति-संतुलन पर आधारित बिस्मार्क की नीति का परित्याग कर ‘वेल्टपोलिटिक’ (विश्व-नीति) अपनाई। इसका उद्देश्य जर्मनी की बढ़ती औद्योगिक शक्ति के अनुरूप विश्व राजनीति में उसका प्रभाव स्थापित करना था। कैसर के अनुसार जर्मनी केवल एक सीमित राष्ट्र नहीं था, बल्कि ऐसा देश था, जिसका व्यापक विस्तार होना चाहिए। उसकी महत्त्वाकांक्षा थी कि जर्मनी विश्व की प्रमुख शक्ति बन जाए। वह चाहता था कि जर्मनी संसार का नेतृत्व करे और जर्मन सम्राट की इच्छा के बिना अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन न हो। जहाँ बिस्मार्क जर्मनी की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए उपनिवेशों को एक जोखिमपूर्ण विलासिता मानता था, वहीं कैसर उन्हें जर्मनी के भविष्य के लिए आवश्यक समझता था। जहाँ बिस्मार्क दो मोर्चों पर युद्ध के जोखिम से बचने के लिए गठबंधनों की नीति अपनाता था, वहीं कैसर तथा उसके प्रमुख विदेश-नीति अधिकारी बैरन वॉन होल्स्टीन का मत था कि जर्मनी को फ्रांस, ब्रिटेन और रूस के बीच औपनिवेशिक विवादों का लाभ उठाना चाहिए। जहाँ बिस्मार्क ने समाजवादियों को गैर-कानूनी घोषित कर दिया था और पुरानी व्यवस्था की रक्षा के प्रति चिंतित था, वहीं कैसर ने समाजवाद-विरोधी कानूनों को समाप्त होने दिया। उसका विश्वास था कि समृद्धि, सामाजिक सुधारों और राष्ट्रीय गौरव के माध्यम से श्रमिक वर्ग का समर्थन प्राप्त किया जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय संबंध (International Relations)
कैसर विलियम द्वितीय

विश्व राजनीति में सक्रिय भाग लेने का अर्थ था कि जर्मनी का भी एक विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित हो। कैसर को इस बात का दुःख था कि बिस्मार्क ने जर्मनी के औपनिवेशिक विस्तार के लिए विशेष प्रयास नहीं किए थे। जर्मनी की जनसंख्या निरंतर बढ़ रही थी और इस बढ़ती हुई आबादी के लिए नए क्षेत्रों की आवश्यकता थी। साथ ही, जर्मनी के उद्योग-धंधों और औद्योगिक क्रांति के तीव्र विकास के कारण नए बाजारों की आवश्यकता उत्पन्न हो गई थी। इसलिए जर्मनी के लिए उपनिवेश प्राप्त करना महत्त्वपूर्ण बन गया।

उपनिवेश-विस्तार के साथ-साथ कैसर ने नौसेना के विकास पर भी विशेष ध्यान दिया। उसकी इच्छा थी कि जर्मनी एक प्रथम श्रेणी की सामुद्रिक शक्ति बने, ताकि समुद्र में भी कोई अन्य राज्य उसका मुकाबला न कर सके। उसका विचार था कि यदि जर्मनी ने समुद्रों पर अपना प्रभाव स्थापित नहीं किया, तो ब्रिटेन उसे निरंतर चुनौती देता रहेगा। अतः ब्रिटेन का सामना करने और अपने हितों की रक्षा के लिए एक शक्तिशाली नौसेना का निर्माण आवश्यक था।

इस प्रकार कैसर विलियम की विदेश नीति के तीन प्रमुख आधार थे—विश्व राजनीति, उपनिवेश विस्तार और शक्तिशाली नौसेना। इस नीति को अपनाकर कैसर विलियम ने बिस्मार्क द्वारा स्थापित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को समाप्त कर दिया। अब जर्मनी की नीति यूरोप में यथास्थिति बनाए रखने और शक्ति-संतुलन की नहीं रह गई थी।

कैसर का कथन था—‘इस संसार में हमारी और हमारी सेना के अतिरिक्त शक्ति-संतुलन का कोई दूसरा सिद्धांत नहीं है।’ इस प्रकार के विचार किसी दूरदर्शी कूटनीतिज्ञ के नहीं हो सकते थे। इसका स्पष्ट अर्थ था कि जर्मनी विश्व में अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता था। ऐसी स्थिति में बिस्मार्क द्वारा निर्मित कूटनीतिक व्यवस्था का समाप्त होना स्वाभाविक था। तीन वर्षों के भीतर रूस जर्मनी से दूर हो गया और फ्रांस के साथ मैत्री संबंध स्थापित करने लगा। छह वर्षों के भीतर ब्रिटेन भी जर्मनी से असंतुष्ट हो गया और 1907 ई. में रूस, फ्रांस तथा ब्रिटेन ने मिलकर जर्मनी के विरुद्ध एक नया त्रिगुट बना लिया। इटली भी धीरे-धीरे जर्मनी से दूर होने लगा।

जर्मनी की नई नीति के परिणाम
रूस और फ्रांस की संधि (1893 ई.)

नई नीति के परिणाम शीघ्र ही सामने आए, जो जर्मनी के लिए हानिकारक सिद्ध हुए। रूस और फ्रांस के बीच 1893 ई. की संधि कैसर की नई विदेश नीति का पहला प्रमुख परिणाम थी। बिस्मार्क रूस और जर्मनी की मित्रता का प्रबल समर्थक था। वह नहीं चाहता था कि सेंट पीटर्सबर्ग और बर्लिन के बीच किसी प्रकार का मतभेद उत्पन्न हो। इसी उद्देश्य से उसने अनेक कठिनाइयों के बावजूद 1887 ई. में रूस के साथ ‘पुनराश्वासन संधि’ की थी। इस संधि का 1890 ई. में नवीनीकरण किया जाना आवश्यक था। यदि बिस्मार्क की नीति का पालन किया जाता, तो यह संधि निश्चित रूप से नवीनीकृत हो जाती। किंतु कैसर ने 1890 ई. में रूस के साथ बिस्मार्क द्वारा की गई पुनराश्वासन संधि का नवीनीकरण नहीं होने दिया। उसके विचार में यह संधि अत्यंत जटिल थी और इससे ऑस्ट्रिया के हितों को खतरा उत्पन्न हो सकता था। अतः 1890 ई. में पुनराश्वासन संधि स्वतः समाप्त हो गई।

अब रूस यूरोपीय राजनीति में अकेला पड़ गया और उसने गणतांत्रिक फ्रांस के प्रति अपने पुराने मतभेद भुलाकर 1894 ई. में उसके साथ एक सैन्य संधि कर लिया। कैसर का विचार था कि बाल्कन प्रश्न को लेकर रूस और ऑस्ट्रिया के बीच संघर्ष अवश्य होगा और ऐसी स्थिति में उसे पहले से निर्णय करना होगा कि वह किसका समर्थन करेगा—रूस का या ऑस्ट्रिया का। कैसर की दृष्टि में रूस की अपेक्षा ऑस्ट्रिया की मित्रता अधिक महत्त्वपूर्ण थी। इसलिए उसने रूस की मित्रता को त्याग दिया, जिसके परिणामस्वरूप जर्मनी की कूटनीतिक स्थिति धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई।

बिस्मार्क की परराष्ट्र नीति के फलस्वरूप फ्रांस कुछ दिनों के लिए यूरोपीय राजनीति में बिल्कुल अकेला पड़ गया था। 1871 ई. के बाद से फ्रांस की ऐसी दशा हो गई थी कि यूरोप में उसका कोई सहायक नज़र नहीं आ रहा था। फ्रांस को जर्मनी से राष्ट्रीय अपमान का प्रतिशोध लेना था और एल्सस-लोरेन के प्रान्त को पुनः प्राप्त करना था, पर जर्मनी उस समय यूरोप का सर्वशक्तिशाली राज्य था। मध्य यूरोप के सभी शक्तिशाली राष्ट्र उसके मित्र थे। ऐसी स्थिति में अकेले रहकर फ्रांस किस प्रकार अपनी आकांक्षा की पूर्ति कर सकता था? अतः फ्रांस एक ऐसे मित्र की तलाश में था जो समय पड़ने पर जर्मनी के विरुद्ध उसकी सहायता करे।

रूस में कुछ ऐसे पदाधिकारी थे, जो चाहते थे कि रूस और जर्मनी के बीच अच्छे संबंध बने रहें। खासकर रूसी परराष्ट्र मंत्री गियर्स इसे आवश्यक समझता था। इसलिए उसने पुनराश्वासन संधि को 1889 ई. में दुहराने का प्रयत्न किया था। किंतु कैसर विलियम ने इस संधि को दुहराया नहीं और 1890 ई. में यह संधि समाप्त हो गई। अब रूस भी यूरोपीय राजनीति में अकेला पड़ गया। ऐसी स्थिति में वह भी एक ऐसे मित्र की तलाश में था, जो समय पड़ने पर उसकी सहायता कर सके।

बहुत दिनों से रूस की आकांक्षा थी कि पूर्वी यूरोप को अपने साम्राज्य में शामिल कर ले। पूर्वी यूरोप के अधिकांश लोग स्लाव नस्ल के थे और ग्रीक चर्च में विश्वास करने वाले ईसाई थे। रूस का जार अपने को संसार के सभी स्लाव नस्ल के लोगों तथा ग्रीक चर्च के ईसाइयों का नेता मानता था। उसकी बड़ी इच्छा थी कि वह अपने नेतृत्व में इन सभी लोगों को एक सूत्र में बाँधे। यूरोप के इस हिस्से का अधिकतर भाग तुर्की साम्राज्य के अंतर्गत पड़ता था। रूस की आकांक्षा तभी पूरी हो सकती थी, जब तुर्की साम्राज्य का विनाश हो जाता। किंतु ब्रिटेन और आस्ट्रिया रूस की इस आकांक्षा के बहुत बड़े विरोधी थे। ब्रिटेन के हितों की रक्षा इसी बात में थी कि तुर्की साम्राज्य किसी प्रकार कायम रहे। आस्ट्रिया स्वयं अपना विस्तार बाल्कन प्रायद्वीप में करना चाहता था। इसलिए आस्ट्रिया और रूस के हित परस्पर टकराते थे और जर्मनी आस्ट्रिया का मित्र था। ऐसी स्थिति में रूसी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए कोई दूसरा रास्ता ढूँढ़ना आवश्यक था।

तुर्की साम्राज्य की रक्षा में केवल ब्रिटेन को ही दिलचस्पी नहीं थी, बल्कि इधर हाल में जर्मनी भी इसमें दिलचस्पी लेने लगा था। जर्मनी अपने साम्राज्य-विस्तार के लिए तुर्की को अपना मित्र बनाना चाहता था। इससे रूस और भी सशंकित हो उठा। इसके अतिरिक्त, उपनिवेश कायम करने के उपक्रम में जर्मनी को कुछ सामुद्रिक अड्डों की आवश्यकता थी। जुलाई 1890 में ब्रिटेन और जर्मनी के बीच हैलिगोलैंड की संधि हुई। इस संधि के अनुसार जर्मनी को कुछ सामुद्रिक अड्डे प्राप्त हुए। रूस की शंका और भी बढ़ने लगी। उसे यह भी संदेह हुआ कि ब्रिटेन और जर्मनी धीरे-धीरे एक-दूसरे के निकट आ रहे हैं और दोनों मिलकर तुर्की में उसका विरोध करेंगे। रूस और जर्मनी के बीच तनाव का यह एक बहुत बड़ा कारण था।

1887 ई. में त्रिगुट संधि के दुहराए जाने से रूस और जर्मनी के संबंध और भी बिगड़ने लगे। इस संधि की शर्तें गुप्त रखी गई थीं। इस कारण जार को यह भय हो रहा था कि कहीं इस संधि में रूस के विरुद्ध कोई धारा न हो। संधि के दुहराए जाने के कुछ ही दिनों के बाद इटली के प्रधानमंत्री ने कुछ ऐसे वक्तव्य दिए, जिससे जार का संदेह और भी पुष्ट हो गया। इस तरह रूस और जर्मनी के आपसी संबंध दिन-प्रतिदिन बिगड़ रहे थे। किंतु यदि एक ओर इन दोनों देशों के संबंध बिगड़ रहे थे, तो दूसरी ओर रूस और फ्रांस में मेल-मिलाप का वातावरण भी तैयार हो रहा था। ठीक इसी समय एक आर्थिक संकट उपस्थित हुआ। साम्राज्य-विस्तार की विविध योजनाओं में रूसी सरकार बहुत खर्च कर रही थी और इसकी पूर्ति राष्ट्रीय आय से नहीं हो सकती थी, इसलिए रूस को ऋण की बहुत आवश्यकता थी। इस आर्थिक संकट के समय जर्मनी ने रूस की कोई सहायता नहीं की। किंतु फ्रांस ने ऋण देकर रूस को आर्थिक संकट से उबारने में बड़े उत्साह के साथ भाग लिया। रूस और फ्रांस की संधि में इस बात से बड़ी सहायता मिली।

1891 ई. में फ्रांस के एक जहाजी बेड़े ने रूस की यात्रा की। रूस में इस फ्रांसीसी बेड़े का धूमधाम के साथ स्वागत किया गया। रूस के जार ने स्वयं अपने महल से निकलकर इस बेड़े का स्वागत किया था। अभी तक रूस में फ्रांसीसी राष्ट्रीय गीत के गाए जाने की मनाही थी, किंतु इस अवसर पर जार ने सिर झुकाकर बड़े सम्मान के साथ इस गीत का श्रवण किया। फ्रांस में इस प्रकार के स्वागत का समाचार पढ़कर अत्यधिक प्रसन्नता व्यक्त की गई। फ्रांसीसियों ने समझा कि अब रूस और फ्रांस के बीच एक संधि अवश्य हो जाएगी। रूस और फ्रांस के संबंध निरंतर प्रगाढ़ होते गए। फ्रांसीसी नेता इस अवसर का लाभ उठाना चाहते थे और रूस के साथ एक संधि कर लेना चाहते थे। अतः इसकी शर्तें भी खूब सोच-समझकर तैयार की गईं। दोनों देशों में संधि होने का वातावरण तैयार हो चुका था।

अक्टूबर 1893 ई. में एक रूसी जहाजी बेड़े ने भी फ्रांस की यात्रा की। जिस समय इस बेड़े के अधिकारी पेरिस पहुँचे, उस समय उनके स्वागत के लिए पेरिस के नागरिकों में होड़-सी लग गई। मित्रता के इसी वातावरण में अंततः 1894 ई. में इन दोनों राज्यों के बीच परस्पर संधि हो गई। इसके अनुसार यह निश्चय किया गया कि यदि अकेला जर्मनी अथवा जर्मनी और इटली मिलकर फ्रांस पर आक्रमण करें, तो रूस फ्रांस की सहायता करेगा। इसी प्रकार यदि जर्मनी और आस्ट्रिया रूस पर आक्रमण करें, तो फ्रांस रूस की सहायता करेगा। संधि की सभी शर्तें गुप्त रखी गईं।

यूरोप के आधुनिक इतिहास में इस संधि का अत्यंत महत्त्व है। यूरोप की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बिस्मार्क ने जर्मनी को जिस स्थिति में पहुँचा दिया था, उसका अब अंत हो चुका था। विश्व राजनीति में दोनों देश अकेले पड़ गए थे—फ्रांस बिस्मार्क के कारण और रूस कैसर के कारण। किंतु इस संधि से फ्रांस और रूस की अंतरराष्ट्रीय स्थिति बहुत मजबूत हो गई। शर्तों के अनुसार यह एक विशुद्ध रक्षात्मक संधि थी। इसका उद्देश्य किसी देश पर आक्रमण करना नहीं था। फिर भी इसका महत्त्व अत्यधिक था। फ्रांस को फसोदा अथवा मोरक्को में रूस की सैनिक सहायता की आवश्यकता नहीं थी; उसकी मुख्य आकांक्षा एल्सस-लोरेन के प्रांतों को पुनः प्राप्त करने की थी। इसी प्रकार रूस को भी यूरोप के बाहर फ्रांसीसी सैनिक सहायता की अपेक्षा नहीं थी; वह तो बाल्कन प्रायद्वीप में अपनी स्थिति को सुदृढ़ करना चाहता था। इसका परिणाम यह हुआ कि फ्रांस में जर्मनी के विरुद्ध भावना और भी तीव्र हो गई। फ्रांको-जर्मन युद्ध अब अवश्यम्भावी-सा प्रतीत होने लगा। उधर इस संधि की स्थापना के बाद रूस ने बाल्कन प्रायद्वीप की राजनीति में नए उत्साह के साथ प्रवेश किया। यूरोप की राजनीति अब डावाँडोल हो गई। जर्मनी के त्रिगुट को संतुलित करने के लिए अब रूस और फ्रांस का एक शक्तिशाली द्विगुट तैयार हो चुका था।

चीन-जापान युद्ध और साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा

1894–95 ई. का चीन-जापान युद्ध विश्व राजनीति में जापान के एक नवीन साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में उदय का प्रतीक सिद्ध हुआ। 1853 ई. में अमेरिकी नौसेना के कमोडोर मैथ्यू सी. पेरी द्वारा जापान को अपने बंदरगाह विदेशी व्यापार के लिए खोलने के लिए विवश किए जाने के बाद जापानी नेतृत्व ने यह निश्चय कर लिया कि उनका देश चीन की भाँति पश्चिमी शक्तियों का असहाय शिकार नहीं बनेगा। 1868 ई. की मेइजी पुनर्स्थापना के पश्चात् जापान में एक सुदृढ़ केंद्रीकृत शासन की स्थापना हुई और व्यापक राजनीतिक, आर्थिक तथा सैन्य सुधार प्रारंभ किए गए। परिणामस्वरूप जापान तीव्र गति से औद्योगीकरण करने वाला पहला गैर-पाश्चात्य राष्ट्र बन गया। 1890 के दशक तक उसकी आधुनिक सेना और नौसेना इतनी सशक्त हो चुकी थीं कि वह यूरोपीय शक्तियों के समकक्ष एक उभरती हुई साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हो गया।

चीन-जापान युद्ध में जापान की निर्णायक विजय हुई। शिमोनोसेकी की संधि (1895 ई.) के अनुसार चीन ने कोरिया की स्वतंत्रता को स्वीकार किया, जिसके परिणामस्वरूप वहाँ जापान का प्रभाव स्थापित हो गया। इसके अतिरिक्त जापान को ताइवान (फॉर्मोसा), पेस्काडोरेस (पेंघू) द्वीपसमूह तथा लियाओतुंग प्रायद्वीप प्राप्त हुआ। किंतु रूस, फ्रांस और जर्मनी के संयुक्त हस्तक्षेप के कारण जापान को लियाओतुंग प्रायद्वीप चीन को वापस करना पड़ा। यद्यपि जापान को यह क्षेत्र छोड़ना पड़ा, फिर भी इस युद्ध ने चीन की कमजोरी को विश्व के सामने उजागर कर दिया और वहाँ प्रभाव-क्षेत्रों तथा विशेष अधिकार प्राप्त करने की साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हो गई।

इस प्रतिस्पर्धा में रूस ने मंचूरिया में अपना प्रभाव बढ़ाया, फ्रांस ने दक्षिणी चीन में विशेष अधिकार प्राप्त किए तथा जर्मनी ने शानदोंग प्रायद्वीप के जियाओझोउ खाड़ी क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया। इसी क्रम में 1898 ई. के स्पेन-अमेरिका युद्ध के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका ने फ़िलीपींस द्वीपसमूह पर अधिकार कर लिया और प्रशांत क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में उभरा। इस साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा का सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभाव चीन पर पड़ा, जिसकी संप्रभुता निरंतर कमजोर होती गई। साथ ही, ब्रिटेन को भी आर्थिक दृष्टि से हानि उठानी पड़ी, क्योंकि चीन के व्यापार पर उसका जो लगभग एकाधिकार था, वह अन्य महाशक्तियों के हस्तक्षेप के कारण धीरे-धीरे समाप्त होने लगा। इस प्रकार चीन-जापान युद्ध ने पूर्वी एशिया में शक्ति-संतुलन को बदल दिया और साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा के एक नए युग का आरंभ किया।

अंतरराष्ट्रीय संबंध (International Relations)
अंतरराष्ट्रीय संबंध
ब्रिटेन की विदेश नीति
शानदार पृथकता की नीति

1815 ई. में नेपोलियन के पतन के बाद ग्रेट ब्रिटेन ने यूरोपीय महाद्वीप की शक्ति-राजनीति से स्वयं को अलग रखने की नीति अपनाई। उसका उद्देश्य यूरोप में शक्ति-संतुलन बनाए रखना तथा किसी भी व्यापक युद्ध से दूर रहना था। यदि यूरोप में किसी प्रकार का संघर्ष उत्पन्न होता, तो ब्रिटेन सामान्यतः मध्यस्थ की भूमिका निभाकर शांति स्थापित करने का प्रयास करता था। इस नीति को ‘शानदार पृथकता’ कहा जाता है। इसके अंतर्गत ब्रिटेन ने स्थायी सैन्य गठबंधनों से दूरी बनाए रखी और सभी प्रमुख राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने का प्रयास किया। उस समय ब्रिटेन की समुद्री शक्ति, विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य तथा आर्थिक प्रभुत्व को देखते हुए यह नीति उसके राष्ट्रीय हितों के अनुकूल थी।

नीति में परिवर्तन

1871 से 1890 ई. तक यूरोप की राजनीति पर जर्मनी के चांसलर ओटो फ़ॉन बिस्मार्क का प्रभुत्व रहा। फ्रांस-प्रशा युद्ध (1870–71 ई.) में विजय प्राप्त करने के बाद उसने फ्रांस से एल्सस और लोरेन छीन लिए तथा फ्रांस को यूरोप में कूटनीतिक रूप से अलग-थलग रखने को अपनी विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य बनाया। इसी उद्देश्य से उसने 1873 ई. में जर्मनी, रूस और ऑस्ट्रिया-हंगरी के बीच ‘त्रिराष्ट्र संघ’ की स्थापना की। किंतु बाल्कन प्रश्न तथा बर्लिन कांग्रेस (1878 ई.) के बाद रूस और ऑस्ट्रिया-हंगरी के मतभेद बढ़ने से यह संघ कमजोर पड़ गया।

1878–79 ई. में रूस और जर्मनी के संबंध बिगड़ने पर जर्मनी ने ऑस्ट्रिया-हंगरी के साथ ‘द्विगुट संधि’ की। 1882 ई. में इटली के इसमें सम्मिलित होने से ‘त्रिगुट संधि’ का गठन हुआ। दूसरी ओर, 1894 ई. में फ्रांस और रूस के बीच गठबंधन स्थापित हो गया। परिणामस्वरूप यूरोप दो प्रतिद्वंद्वी गुटों में विभाजित होने लगा। इस परिस्थिति में ब्रिटेन स्वयं को अपेक्षाकृत अकेला अनुभव करने लगा और उसे यह महसूस हुआ कि भविष्य में अपने राष्ट्रीय एवं साम्राज्यिक हितों की रक्षा के लिए केवल ‘शानदार पृथकता’ की नीति पर्याप्त नहीं होगी।

ब्रिटेन की बढ़ती चिंताएँ

उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में ब्रिटेन को अनेक नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। दक्षिण अफ्रीका का बोअर युद्ध (1899–1902 ई.) अपेक्षा से अधिक लंबा, कठिन और महँगा सिद्ध हुआ। यद्यपि अंततः ब्रिटेन विजयी रहा, फिर भी उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को आघात पहुँचा और उसकी अजेयता की छवि कमजोर हुई।

इसी काल में संयुक्त राज्य अमेरिका ने हवाई द्वीपों पर अधिकार स्थापित कर लिया तथा जर्मनी ने अमेरिका के साथ समोआ द्वीपों का विभाजन किया। साथ ही जर्मनी ने उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य में आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव बढ़ाते हुए रेलमार्ग निर्माण की महत्त्वपूर्ण रियायतें प्राप्त कर लीं। इन घटनाओं ने ब्रिटेन को यह संकेत दिया कि विश्व राजनीति में नए प्रतिद्वंद्वी उभर रहे हैं।

सबसे गंभीर चुनौती जर्मनी की नौसैनिक नीति से उत्पन्न हुई। कैसर विलियम द्वितीय अमेरिकी नौसैनिक विचारक अल्फ्रेड थायर महान की पुस्तक ‘द इन्फ्लुएन्स ऑफ सी पावर अपॉन हिस्ट्री’ से अत्यधिक प्रभावित था। उसका विश्वास था कि विश्व-नीति को सफल बनाने के लिए एक विशाल महासागरीय नौसेना आवश्यक है। परिणामस्वरूप जर्मनी ने तीव्र गति से नौसेना का विस्तार प्रारंभ किया। साथ ही फ्रांस, रूस, जापान और संयुक्त राज्य अमेरिका भी अपनी नौसैनिक शक्ति बढ़ा रहे थे। इससे समुद्रों पर ब्रिटेन का निर्विवाद प्रभुत्व पहली बार गंभीर चुनौती के सामने आ गया।

बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक ब्रिटेन को स्पष्ट हो गया कि बढ़ती औद्योगिक, नौसैनिक और औपनिवेशिक प्रतिस्पर्धा के बीच अकेले अपने साम्राज्य की रक्षा करना कठिन होता जा रहा है। इसलिए उसने अपनी ‘शानदार पृथकता’ की नीति पर पुनर्विचार प्रारंभ किया।

जर्मनी से समझौते का असफल प्रयास

प्रारंभ में ब्रिटेन का झुकाव जर्मनी की ओर था। अफ्रीका में फ्रांस से उसके औपनिवेशिक विवाद थे तथा मध्य एशिया में रूस की बढ़ती शक्ति भारत की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय थी। इसलिए ब्रिटेन चाहता था कि जर्मनी के सहयोग से फ्रांस और रूस के प्रभाव को संतुलित किया जाए।

1898 ई. के फशोदा संकट के बाद भी ब्रिटेन इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि वह अनिश्चित काल तक अकेले अपने साम्राज्य की रक्षा नहीं कर सकता। औपनिवेशिक सचिव जोसेफ चेम्बरलेन ने जर्मनी के साथ व्यापक सहयोग स्थापित करने का प्रयास किया। जर्मनी ने वार्ता में रुचि दिखाई, किंतु 1898 से 1901 ई. के बीच हुए तीनों प्रयास असफल रहे।

इस असफलता का मुख्य कारण दोनों देशों के परस्पर विरोधी उद्देश्य थे। ब्रिटेन यूरोप में शक्ति-संतुलन बनाए रखना चाहता था, जबकि जर्मनी चाहता था कि ब्रिटेन उसकी विश्व-विस्तारवादी नीति का समर्थन करे अथवा कम-से-कम तटस्थ रहे। चांसलर बर्नहार्ड फ़ॉन बूलो तथा बैरन वॉन होल्स्टीन ‘मुक्त हाथ’ की नीति के समर्थक थे। उन्होंने ब्रिटेन से सहयोग के बदले त्रिगुट संधि में पूर्ण सैन्य साझेदार बनने की अपेक्षा की, जिसे ब्रिटेन ने स्वीकार नहीं किया। परिणामस्वरूप आंग्ल-जर्मन समझौते की संभावना समाप्त हो गई।

आंग्ल-जर्मन वार्ताओं की विफलता ने दोनों शक्तियों को एक खतरनाक प्रतिस्पर्धा की ओर धकेल दिया। जर्मन नौसेना कभी भी ब्रिटिश नौसेना की बराबरी नहीं कर सकती थी और उसके विस्तार से केवल ब्रिटेन की शत्रुता ही बढ़नी थी। किंतु जर्मन नौसेना के प्रमुख एडमिरल अल्फ्रेड फ़ॉन टिरपिट्ज़ का मत था कि ब्रिटेन की बराबरी करना आवश्यक नहीं है। उनके अनुसार जर्मनी को केवल ऐसी ‘जोखिम नौसेना’ की आवश्यकता थी, जो इतनी शक्तिशाली हो कि ब्रिटेन उसके साथ युद्ध करने का जोखिम न उठाए। उनका विश्वास था कि ब्रिटेन जर्मनी को अलग-थलग करने का साहस नहीं करेगा, क्योंकि ऐसा करने पर वह फ्रांस और रूस के विरुद्ध अपने संभावित सहयोगी को खो देगा। इस प्रकार जर्मनी बिना किसी युद्ध या औपचारिक गठबंधन के ही ब्रिटेन से राजनीतिक रियायतें प्राप्त कर सकता था। किंतु जर्मन नीति-निर्माता यह समझने में असफल रहे कि ब्रिटेन भविष्य में अपने अन्य प्रतिद्वंद्वियों के साथ भी समझौता कर सकता है।

आंग्ल-फ्रांसीसी समझौता

उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में जहाँ एक ओर ब्रिटेन और जर्मनी के संबंध निरंतर तनावपूर्ण होते जा रहे थे, वहीं दूसरी ओर ब्रिटेन और फ्रांस के बीच पारस्परिक निकटता विकसित होने लगी। यद्यपि दोनों देश लंबे समय से औपनिवेशिक प्रतिद्वंद्वी रहे थे और 1898 ई. के फशोदा संकट के कारण उनके बीच युद्ध की संभावना भी उत्पन्न हो गई थी, फिर भी बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने दोनों को सहयोग की आवश्यकता का अनुभव कराया। जर्मनी की बढ़ती सैन्य एवं नौसैनिक शक्ति तथा साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं ने ब्रिटेन को अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार करने के लिए विवश कर दिया, जबकि फ्रांस भी यूरोप में अपनी सुरक्षा तथा औपनिवेशिक हितों की रक्षा के लिए एक विश्वसनीय सहयोगी की तलाश में था।

इस दिशा में पहला महत्त्वपूर्ण कदम 1898 ई. में उठाया गया, जब थियोफिल देल्कासे फ्रांस का विदेश मंत्री बना। वह ब्रिटेन के साथ मैत्री स्थापित करने का दृढ़ समर्थक था। उसका विश्वास था कि यदि फ्रांस को अपने औपनिवेशिक साम्राज्य की रक्षा करनी है तथा भविष्य में एल्सस-लोरेन को पुनः प्राप्त करने की संभावना बनाए रखनी है, तो ब्रिटेन के साथ सहयोग स्थापित करना आवश्यक होगा। इसी उद्देश्य से उसने दोनों देशों के बीच विद्यमान छोटे-छोटे औपनिवेशिक विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयास किया तथा फशोदा से फ्रांसीसी सेना को वापस बुलाकर तनाव कम किया। इसके अतिरिक्त व्यापारिक प्रतिनिधिमंडलों, संसदीय सदस्यों तथा अन्य सार्वजनिक व्यक्तियों के पारस्परिक संपर्कों ने भी दोनों देशों के बीच विश्वास और सद्भाव को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसी बीच ब्रिटेन की सामरिक स्थिति भी बदल रही थी। 1901 ई. में महारानी विक्टोरिया की मृत्यु के बाद सप्तम एडवर्ड ब्रिटेन के सम्राट बने। वे व्यक्तिगत रूप से फ्रांस के प्रति सहानुभूतिपूर्ण थे और दोनों देशों के संबंधों को सुधारने के पक्षधर थे। 1902 ई. में लॉर्ड लैंसडाउन ब्रिटेन के विदेश मंत्री बने, जबकि लंदन में फ्रांस के राजदूत पॉल कैम्बों भी आंग्ल-फ्रांसीसी समझौते के प्रबल समर्थक थे। इस प्रकार दोनों देशों के नेतृत्व में ऐसे व्यक्तियों का प्रभाव बढ़ा, जो पारस्परिक सहयोग को समय की आवश्यकता मानते थे।

उधर ब्रिटेन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। जर्मनी की तीव्र औद्योगिक प्रगति के कारण उसकी कंपनियाँ विश्व के अनेक बाजारों में ब्रिटिश व्यापार को चुनौती देने लगी थीं। यद्यपि ब्रिटेन और जर्मनी एक-दूसरे के महत्त्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार बने हुए थे, फिर भी आर्थिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही थी। इससे भी अधिक चिंता का विषय जर्मनी का तीव्र नौसैनिक विस्तार था। कैसर विलियम द्वितीय और एडमिरल अल्फ्रेड फ़ॉन टिरपिट्ज़ की नौसैनिक नीति ने ब्रिटेन की समुद्री सर्वोच्चता को चुनौती देना प्रारंभ कर दिया था। इसके साथ ही फ्रांस, रूस और जापान की नौसेनाओं का विस्तार भी ब्रिटेन की सामरिक चिंताओं का कारण बन रहा था। भूमध्यसागर में फ्रांस, इटली और रूस की संभावित संयुक्त नौसैनिक उपस्थिति से भारत तथा सुदूर पूर्व की ओर जाने वाले ब्रिटिश समुद्री मार्गों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती थी। दूसरी ओर, पनामा नहर के निर्माण की प्रगति ने यह संकेत दिया कि भविष्य में संयुक्त राज्य अमेरिका दो महासागरों में अपनी नौसैनिक शक्ति का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग कर सकेगा।

इन बदलती परिस्थितियों में ब्रिटेन के विदेश मंत्री लॉर्ड लैंसडाउन ने संभावित शत्रुओं की संख्या कम करने तथा विश्व के प्रमुख क्षेत्रों में अपने सामरिक हितों को सुरक्षित करने की नीति अपनाई। इस नीति के अंतर्गत उन्होंने सर्वप्रथम 1901 ई. की हे-पॉन्सेफोट संधि के माध्यम से संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों को सुदृढ़ किया। इसके बाद 1902 ई. की आंग्ल-जापानी संधि ने पूर्वी एशिया में ब्रिटेन की स्थिति को सुरक्षित बना दिया। इस संधि के फलस्वरूप ब्रिटेन को एशिया में अपने हितों की रक्षा के लिए अकेले भारी नौसैनिक शक्ति रखने की आवश्यकता नहीं रही और वह यूरोप तथा भारत की सुरक्षा पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सका।

इन अनुकूल परिस्थितियों में दोनों देशों के राजनीतिक संबंध और अधिक घनिष्ठ होने लगे। 1903 ई. में सम्राट सप्तम एडवर्ड ने फ्रांस की राजकीय यात्रा की, जहाँ उनका अत्यंत भव्य स्वागत किया गया। अपने भाषणों में उन्होंने दोनों देशों के बीच स्थायी मित्रता और सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। इसके कुछ ही समय बाद फ्रांस के राष्ट्रपति एमिल लुबे ने ब्रिटेन की यात्रा की। इस यात्रा ने दोनों देशों के बीच विश्वास को और अधिक सुदृढ़ किया तथा यह स्पष्ट कर दिया कि दोनों सरकारें अतीत की कटुताओं को भुलाकर भविष्य में सहयोग की नई दिशा अपनाना चाहती हैं।

राष्ट्रपति लुबे की यात्रा के दौरान फ्रांस के विदेश मंत्री देल्कासे और ब्रिटेन के विदेश मंत्री लॉर्ड लैंसडाउन के बीच विस्तृत वार्ताएँ हुईं। दोनों पक्षों ने मिस्र, मोरक्को तथा अन्य औपनिवेशिक विवादों का शांतिपूर्ण समाधान खोजने और भविष्य में पारस्परिक सहयोग बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। अंततः 8 अप्रैल 1904 ई. को दोनों देशों के मध्य आंग्ल-फ्रांसीसी समझौता संपन्न हुआ। यद्यपि यह कोई औपचारिक सैन्य संधि नहीं थी, फिर भी इसने दोनों देशों के बीच दीर्घकालीन शत्रुता का अंत कर दिया और यूरोप की शक्ति-राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात किया। यही समझौता आगे चलकर 1907 ई. की आंग्ल-रूसी संधि के साथ मिलकर त्रिराष्ट्र मैत्री के गठन का आधार बना, जिसने प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व यूरोप के शक्ति-संतुलन को निर्णायक रूप से प्रभावित किया।

समझौता और उसका महत्त्व

इस समझौते के अनुसार सर्वप्रथम मिस्र का मामला तय हुआ। मिस्र और सूडान को लेकर ब्रिटेन और फ्रांस बहुत दिनों से झगड़ते आ रहे थे। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में इन प्रश्नों को लेकर दोनों राज्यों में रणभेरी का निनाद सुनाई देने लगा था। इस समझौते के अनुसार फ्रांस ने यह स्वीकार किया कि मिस्र और सूडान पर ब्रिटेन का प्रभुत्व रहेगा और वह इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। ब्रिटेन को अधिकार होगा कि वह इस क्षेत्र में अपनी शक्ति और प्रभाव का विस्तार करे। इसके बदले में ब्रिटेन ने इस बात को मान लिया कि मोरक्को में फ्रांस का विशेष स्वार्थ है। अतः ब्रिटेन को इस बात से कोई एतराज़ नहीं होगा कि फ्रांस मोरक्को में अपने प्रभुत्व की वृद्धि करे। इसके अतिरिक्त, दोनों देशों के बीच कुछ अन्य छोटे-छोटे औपनिवेशिक मतभेद भी तय कर लिए गए। न्यूफाउंडलैंड, सेनिगाम्बिया, स्याम, मेडागास्कर इत्यादि को लेकर इन दोनों देशों के बीच बहुत दिनों से झंझट चला आ रहा था। इस समझौते ने इन सभी झंझटों का अंतिम रूप से निराकरण कर दिया। मोरक्को से संबंधित इस संधि की शर्तों को गुप्त रखा गया। जब स्पेन को इस संधि का पता चला, तो उसके शासक बिगड़ खड़े हुए। मोरक्को में स्पेन का भी स्वार्थ था और बिना उसकी किसी राय के ब्रिटेन तथा फ्रांस के बीच मोरक्को पर संधि हो गई थी। स्पेन ने इसका विरोध किया। देल्कासे ने स्पेन को आश्वासन दिया कि अगर कभी मोरक्को का बँटवारा हुआ, तो उसमें स्पेन को भी हिस्सा मिलेगा। इस बात की पुष्टि अक्टूबर 1904 ई. में एक संधि द्वारा कर दी गई। स्पेन अब चुप हो गया।

आंग्ल-फ्रांसीसी समझौता ब्रिटेन और फ्रांस दोनों देशों की राजनीति में एक क्रांति था। दोनों देशों में बड़े उत्साह के साथ इसका स्वागत हुआ। संपूर्ण उन्नीसवीं शताब्दी में दोनों एक-दूसरे के घोर विरोधी थे। अब वे परस्पर मित्रता के सूत्र में बँध गए। इस पर सबको खुशी थी। केवल लॉर्ड रोज़बेरी ही एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें इस समझौते पर आशंका थी। उनका कहना था : ‘मेरा दुखमय और दृढ़ विश्वास है कि यह समझौता शांति कायम रखने के बदले समस्याओं को और भी जटिल बना देगा।’ लॉर्ड रोज़बेरी की भविष्यवाणी ठीक निकली।

मोरक्को-कांड

आंग्ल-फ्रांसीसी समझौते की सबसे प्रमुख धारा मोरक्को से संबंधित थी। मोरक्को उत्तरी अफ्रीका का एक छोटा-सा देश है। उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में यह एक सुल्तान के अधीन स्वतंत्र देश था। मोरक्को पर प्रायः सभी देशों की आँखें गड़ी हुई थीं। उसका शासन बहुत कमजोर था और उसके राज्य में बराबर बलवा-विद्रोह होते रहते थे। सुल्तान इतना शक्तिहीन था कि वह इन विद्रोहों से विदेशियों की रक्षा नहीं कर सकता था। मोरक्को में यूरोपीय बाशिंदों के जान-माल सुरक्षित नहीं थे। वे बराबर खतरे की स्थिति में रहते थे। अतः 1880 ई. में मैड्रिड में यूरोपीय राष्ट्रों के साथ मोरक्को के सुल्तान की एक संधि हुई। इस संधि के अनुसार मोरक्को के सुल्तान ने वादा किया कि वह विदेशियों की हिफाजत का अच्छा प्रबंध करेगा तथा संधि के हस्ताक्षरकर्ता देशों को समान रूप से अपने देश में व्यापारिक सुविधाएँ देगा। मैड्रिड संधि का यह मतलब था कि मोरक्को में संसार के तेरह राष्ट्रों की, जिन्होंने इस संधि पर हस्ताक्षर किए थे, दिलचस्पी है। इन तेरह राष्ट्रों में फ्रांस और स्पेन का मोरक्को में विशेष स्वार्थ था।

आंग्ल-फ्रांसीसी समझौते के अनुसार ब्रिटेन ने मोरक्को में फ्रांस को सहायता देने का वादा किया था। जब स्पेन को यह बात मालूम हुई तो उसके शासक बिगड़ खड़े हुए। इस पर देल्कासे ने स्पेन को आश्वासन देकर शांत कर दिया। अब जर्मनी की बारी थी। जर्मनी 1880 ई. की मैड्रिड संधि का एक हस्ताक्षरकर्ता था। आंग्ल-फ्रांसीसी समझौते के द्वारा मोरक्को के भविष्य का फैसला कर दिया गया, किंतु इसमें जर्मनी से राय तक नहीं ली गई। मोरक्को में जर्मनी का भी स्वार्थ था, इसलिए  जर्मनी के शासक इससे काफी असंतुष्ट थे। उनका कहना था कि आज मोरक्को में जर्मनी की अवहेलना की गई है, तो कल दूसरी अंतरराष्ट्रीय समस्या में उसकी अवहेलना की जाएगी। जर्मनी की दृष्टि में यह एक नए रोग का खतरनाक लक्षण था। उधर आंग्ल-फ्रांसीसी समझौते के बाद ब्रिटेन के विरोध से निश्चिंत होकर फ्रांस मोरक्को को अपने पूर्ण अधिकार में लाने का काम शुरू कर चुका था। जर्मनी के शासकों के सामने अब यही प्रश्न था कि ऐसी स्थिति में उन्हें क्या करना चाहिए?

अंतरराष्ट्रीय संबंध (International Relations)
अंतरराष्ट्रीय संबंध
मोरक्को प्रश्न पर जर्मनी की प्रतिक्रिया

प्रारंभ में जर्मनी के चांसलर बर्नहार्ड फ़ॉन बूलो ने आंग्ल-फ्रांसीसी समझौते (1904) के प्रति सार्वजनिक रूप से उदासीनता का प्रदर्शन किया। बर्लिन में ऐसा वातावरण बनाया गया मानो जर्मनी को इस समझौते से कोई विशेष चिंता न हो। वास्तव में फ़ॉन बूलो का विश्वास था कि फ्रांस अंततः मोरक्को से संबंधित अपनी नीति के विषय में जर्मनी को विश्वास में लेने के लिए विवश होगा। किंतु एक वर्ष बीत जाने पर भी फ्रांस ने आधिकारिक रूप से जर्मनी को कोई सूचना नहीं दी। इस बीच फ्रांस ने प्रशासनिक सुधारों के नाम पर मोरक्को के आंतरिक मामलों में अपना प्रभाव निरंतर बढ़ाना प्रारंभ कर दिया। फ्रांसीसी पूँजीपतियों ने वहाँ सड़कों, बंदरगाहों, तार-व्यवस्था तथा अन्य आधारभूत सुविधाओं का विकास आरंभ किया, फ्रांसीसी बैंकों की शाखाएँ स्थापित की गईं और मोरक्को की पुलिस तथा सेना को फ्रांसीसी अधिकारियों द्वारा प्रशिक्षण दिया जाने लगा। इन गतिविधियों से स्पष्ट संकेत मिलने लगे कि फ्रांस शीघ्र ही मोरक्को को उसी प्रकार अपने प्रभाव क्षेत्र में सम्मिलित कर लेगा, जैसे उसने पहले ट्यूनीशिया पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया था। इस स्थिति ने जर्मनी को अत्यंत चिंतित कर दिया और उसे लगा कि यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं की गई, तो मोरक्को में उसके राजनीतिक और आर्थिक हित समाप्त हो जाएंगे।

इसी परिस्थिति में जर्मनी ने मोरक्को प्रश्न को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाकर फ्रांस पर दबाव डालने का निश्चय किया। चांसलर फ़ॉन बूलो का विचार था कि इस नीति से जर्मनी को दोहरा लाभ मिल सकता है। यदि परिस्थितियाँ अनुकूल रहीं, तो आंग्ल-फ्रांसीसी समझौते में दरार डाली जा सकती थी; और यदि ऐसा संभव न हो, तो कम-से-कम फ्रांस को पीछे हटने के लिए बाध्य कर मोरक्को में जर्मनी के समान अधिकारों को सुरक्षित किया जा सकता था। इसी उद्देश्य से फ़ॉन बूलो की सलाह पर कैसर विलियम द्वितीय ने 31 मार्च 1905 ई. को टेंजियर की यात्रा की और वहाँ मोरक्को के सुल्तान की स्वतंत्रता तथा प्रभुसत्ता के समर्थन की घोषणा की। अपने भाषण में उसने कहा कि वह एक ऐसे स्वतंत्र मोरक्को का पक्षधर है, जहाँ सभी राष्ट्रों को समान अवसर प्राप्त हों और कोई भी शक्ति वहाँ एकाधिकार अथवा आधिपत्य स्थापित न कर सके। इस घोषणा का वास्तविक उद्देश्य फ्रांस की बढ़ती राजनीतिक पकड़ को चुनौती देना तथा मोरक्को के प्रश्न को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाना था।

टेंजियर यात्रा के बाद कैसर विलियम द्वितीय ने अनेक अवसरों पर ऐसे भाषण दिए, जिनसे जर्मनी की दृढ़ नीति का संकेत मिलता था। 27 अप्रैल 1905 ई. को कार्ल्सरूहे में उसने कहा कि उसे विश्वास है कि शांति भंग नहीं होगी, किंतु यदि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हस्तक्षेप आवश्यक हुआ, तो जर्मन राष्ट्र पूर्ण एकता और दृढ़ संकल्प के साथ अपने अधिकारों की रक्षा करेगा। इतिहासकार जी. पी. गूच के अनुसार ‘टेंजियर की चेतावनी उस नाटक के प्रथम अंक के समान थी, जिसका दूसरा अंक अल्जेसीरास सम्मेलन था।’ वास्तव में टेंजियर की घोषणा ने मोरक्को प्रश्न को एक स्थानीय विवाद से अंतरराष्ट्रीय संकट में परिवर्तित कर दिया। साथ ही, इस घटना ने ब्रिटेन और फ्रांस के बीच हुए सीमित सहयोग को और अधिक सुदृढ़ कर दिया, जिससे दोनों देशों के संबंध पहले की अपेक्षा अधिक घनिष्ठ हो गए।

जर्मनी ने मोरक्को प्रश्न के समाधान के लिए एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुलाने की माँग की, किंतु फ्रांस के विदेश मंत्री थियोफिल देल्कासे ने इसका कड़ा विरोध किया। उनका मत था कि जर्मनी की यह माँग केवल फ्रांस को कूटनीतिक रूप से अपमानित करने का प्रयास है और इसके सामने झुकना उचित नहीं होगा। दूसरी ओर, जर्मनी अपनी माँग पर दृढ़ बना रहा। फ्रांस के मंत्रिमंडल में इस प्रश्न पर मतभेद उत्पन्न हो गए। प्रधानमंत्री मॉरिस रूविये का विचार था कि मोरक्को के प्रश्न पर जर्मनी से युद्ध का जोखिम उठाना उचित नहीं होगा। इसलिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। परिणामस्वरूप देल्कासे को जून 1905 ई. में अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा। उधर संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति थियोडोर रूज़वेल्ट ने भी सम्मेलन बुलाने के विचार का समर्थन किया। अंततः जर्मनी की पहल पर जनवरी 1906 ई. में स्पेन के अल्जेसीरास नगर में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय लिया गया, जिसने प्रथम मोरक्को संकट को यूरोपीय कूटनीति का प्रमुख विषय बना दिया।

अल्जेसीरास सम्मेलन (1906 ई.)

मोरक्को विवाद के समाधान के लिए 16 जनवरी से 7 अप्रैल 1906 ई. तक स्पेन के अल्जेसीरास नगर में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें यूरोप की प्रमुख शक्तियों तथा संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कुल तेरह देशों ने भाग लिया। सम्मेलन का उद्देश्य मोरक्को की स्वतंत्रता बनाए रखते हुए वहाँ विभिन्न शक्तियों के राजनीतिक एवं आर्थिक हितों के बीच संतुलन स्थापित करना था। सम्मेलन के समक्ष दो प्रमुख प्रश्न थे—पहला, मोरक्को की पुलिस व्यवस्था का नियंत्रण और दूसरा, राज्य बैंक की स्थापना। इन दोनों प्रश्नों पर लंबी और कठिन वार्ताओं के बाद समझौता हुआ। यह निर्णय लिया गया कि मोरक्को के प्रमुख बंदरगाहों की पुलिस का संगठन और प्रशिक्षण फ्रांस तथा स्पेन के अधीन होगा, किंतु उसके निरीक्षण के लिए स्विट्जरलैंड के एक अधिकारी को पुलिस महानिरीक्षक नियुक्त किया जाएगा, ताकि व्यवस्था निष्पक्ष बनी रहे। इसके अतिरिक्त, स्टेट बैंक ऑफ मोरक्को की स्थापना का निर्णय लिया गया, जिसमें विभिन्न शक्तियों को पूँजी निवेश का समान अवसर प्रदान किया गया।

अंतरराष्ट्रीय संबंध (International Relations)
अंतरराष्ट्रीय संबंध (International Relations)

सम्मेलन में ऑस्ट्रिया-हंगरी को छोड़कर किसी भी प्रमुख शक्ति ने जर्मनी का पूर्ण समर्थन नहीं किया। इसके विपरीत ब्रिटेन, रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका तथा इटली ने अधिकांश महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर फ्रांस का समर्थन किया। विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह था कि यद्यपि इटली औपचारिक रूप से त्रिगुट संधि का सदस्य था, फिर भी उसने मोरक्को के प्रश्न पर फ्रांस के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाया। परिणामस्वरूप जर्मनी कूटनीतिक दृष्टि से लगभग अलग-थलग पड़ गया।

अल्जेसीरास सम्मेलन के परिणाम

सम्मेलन की समाप्ति पर फ्रांस और जर्मनी दोनों ने अपनी-अपनी सफलता का दावा किया, किंतु वस्तुतः सबसे अधिक लाभ फ्रांस को प्राप्त हुआ। सम्मेलन ने मोरक्को की औपचारिक स्वतंत्रता को बनाए रखा, परंतु पुलिस व्यवस्था तथा प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से फ्रांस का प्रभाव पहले की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ हो गया। इस प्रकार फ्रांस को मोरक्को में अपने प्रभाव का विस्तार शांतिपूर्ण ढंग से जारी रखने का अवसर मिल गया। साथ ही, उसे ब्रिटेन और रूस का खुला कूटनीतिक समर्थन भी प्राप्त हुआ।

दूसरी ओर, जर्मनी अपनी मूल माँग—मोरक्को प्रश्न को अंतरराष्ट्रीय विषय के रूप में स्वीकार कराने में तो सफल रहा, किंतु वह फ्रांस के प्रभाव को सीमित करने अथवा आंग्ल-फ्रांसीसी समझौते को कमजोर करने में असफल रहा। इसलिए उसकी सफलता केवल औपचारिक रही, जबकि वास्तविक राजनीतिक लाभ फ्रांस के पक्ष में गया। जर्मनी के हस्तक्षेप का सबसे बड़ा परिणाम यह हुआ कि उसके विरोधी राष्ट्र पहले की अपेक्षा अधिक संगठित हो गए।

चांसलर बर्नहार्ड फ़ॉन बूलो ने सम्मेलन के बाद यह प्रचार करने का प्रयास किया कि जर्मनी विजयी रहा है, क्योंकि फ्रांस तत्काल मोरक्को का विलय नहीं कर सका। किंतु वस्तुतः यह जर्मनी की कूटनीतिक पराजय थी। अल्जेसीरास सम्मेलन का सबसे बड़ा ऐतिहासिक महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि यह 1904 ई. के आंग्ल-फ्रांसीसी समझौते की पहली वास्तविक परीक्षा थी। जर्मनी का उद्देश्य दोनों देशों के बीच दरार उत्पन्न करना था, किंतु परिणाम इसके विपरीत निकला। ब्रिटेन और फ्रांस के संबंध पहले की अपेक्षा और अधिक घनिष्ठ हो गए तथा दोनों देशों ने भविष्य में पारस्परिक सहयोग को और सुदृढ़ करने का निश्चय किया।

तत्कालीन ब्रिटिश विदेश मंत्री सर एडवर्ड ग्रे का मत था कि यदि ब्रिटेन अपने सहयोगी फ्रांस का समर्थन न करता, तो फ्रांस का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपमान होता। जर्मनी की आक्रामक नीति ने ब्रिटेन को यह विश्वास दिला दिया कि फ्रांस के साथ सहयोग बनाए रखना उसकी अपनी सुरक्षा के लिए भी आवश्यक है। यही कारण था कि ब्रिटेन ने फ्रांस के साथ गुप्त सैन्य स्टाफ वार्ताएँ आरंभ कर दीं और साथ ही रूस के साथ अपने पारंपरिक मतभेद समाप्त करने की दिशा में भी सक्रिय प्रयास किए। इस प्रकार अल्जेसीरास सम्मेलन ने 1907 ई. की आंग्ल-रूसी संधि तथा आगे चलकर त्रिराष्ट्र मैत्री के गठन का मार्ग प्रशस्त किया।

नौसैनिक प्रतिस्पर्धा

अल्जेसीरास सम्मेलन के बाद जर्मनी और ब्रिटेन के बीच नौसैनिक प्रतिस्पर्धा और अधिक तीव्र हो गई। 1906 ई. में ब्रिटिश नौसेना के प्रथम समुद्री लॉर्ड सर जॉन फिशर के नेतृत्व में एच.एम.एस. ड्रेडनॉट नामक अत्याधुनिक युद्धपोत का निर्माण किया गया। अपनी गति, मारक क्षमता, कवच और आधुनिक तकनीक के कारण इस युद्धपोत ने तत्कालीन सभी युद्धपोतों को अप्रचलित बना दिया तथा विश्व में नौसैनिक प्रतिस्पर्धा के एक नए युग का आरंभ हुआ।

जर्मनी ने भी इसका उत्तर अपने नौसैनिक विस्तार द्वारा दिया। उसने नए युद्धपोतों का निर्माण प्रारंभ किया तथा उनके संचालन के लिए कील नहर का विस्तार कराया। ब्रिटेन, जिसकी अर्थव्यवस्था समुद्री व्यापार पर अत्यधिक निर्भर थी और जो अपने कच्चे माल का लगभग सात-आठवाँ भाग तथा खाद्यान्न का आधे से अधिक भाग समुद्री मार्गों से प्राप्त करता था, जर्मनी की इस नीति को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती मानने लगा।

जनवरी 1907 ई. में ब्रिटिश विदेश कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी सर आइरे क्रो ने अपने प्रसिद्ध ज्ञापन में लिखा कि जर्मनी की वेल्टपोलिटिक या तो विश्व-प्रभुत्व स्थापित करने का सुविचारित प्रयास है अथवा ऐसी अव्यावहारिक नीति, जिसके वास्तविक परिणामों का अनुमान उसके निर्माता स्वयं भी नहीं लगा पा रहे हैं। इसी प्रकार पेरिस में ब्रिटेन के राजदूत सर फ्रांसिस बर्टी ने टिप्पणी की कि जर्मनी का वास्तविक उद्देश्य ब्रिटेन की समुद्री सर्वोच्चता को समाप्त कर उसके स्थान पर स्वयं स्थापित होना है।

इटली की नीति

उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में इटली की विदेश नीति में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आने लगे थे। भूमध्यसागर में उसकी साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं को अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही थी। 1896 ई. में अबीसीनिया (इथियोपिया) पर अधिकार स्थापित करने का उसका प्रयास विफल हो गया। दूसरी ओर, जर्मनी और ऑस्ट्रिया-हंगरी के साथ उसके गठबंधन से भी उसे अपेक्षित लाभ प्राप्त नहीं हुआ।

इसके अतिरिक्त, इटली की एक प्रमुख राष्ट्रीय आकांक्षा ‘इटालिया इरेडेंटा’ अर्थात् ट्रेंटिनो, ट्रिएस्टे तथा अन्य इतालवी भाषी प्रदेशों की प्राप्ति थी, जो ऑस्ट्रिया-हंगरी के अधिकार में थे। इस कारण इटली और ऑस्ट्रिया-हंगरी के हितों में स्वाभाविक टकराव बना रहा।

इन्हीं परिस्थितियों में 1900 ई. में इटली ने फ्रांस के साथ एक गुप्त समझौता किया। इसके अनुसार फ्रांस ने लीबिया (त्रिपोलिटानिया और सिरेनाइका) में इटली के हितों का समर्थन करने का आश्वासन दिया, जबकि इटली ने मोरक्को में फ्रांस के विशेष हितों को स्वीकार कर लिया। इस समझौते ने स्पष्ट कर दिया कि त्रिगुट संधि के भीतर भी पूर्ण एकता नहीं रह गई थी।

आंग्ल-रूसी समझौता (1907 ई.)

31 अगस्त 1907 ई. को ब्रिटेन और रूस के बीच संपन्न आंग्ल-रूसी समझौता बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ की सबसे महत्त्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाओं में से एक था। लगभग एक शताब्दी तक मध्य एशिया में दोनों देशों के बीच प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा, जिसे ‘ग्रेट गेम’ कहा जाता है, चलती रही थी। किंतु बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने दोनों देशों को अपने मतभेद समाप्त करने के लिए प्रेरित किया।

रूस-जापान युद्ध (1904–05 ई.) में पराजय के बाद रूस की एशियाई स्थिति कमजोर हो गई थी, जबकि जर्मनी की बढ़ती शक्ति और आक्रामक विदेश नीति ने ब्रिटेन को भी अपनी ‘शानदार पृथकता’ की नीति छोड़कर नए सहयोगियों की खोज करने के लिए प्रेरित किया। फलतः 31 अगस्त 1907 ई. को दोनों देशों के बीच समझौता संपन्न हुआ।

इस समझौते के अंतर्गत ईरान (फारस) को तीन प्रभाव क्षेत्रों में विभाजित किया गया—उत्तरी भाग रूस के प्रभाव क्षेत्र में, दक्षिण-पूर्वी भाग ब्रिटेन के प्रभाव क्षेत्र में तथा मध्य भाग को तटस्थ क्षेत्र घोषित किया गया। अफगानिस्तान को ब्रिटेन के प्रभाव क्षेत्र के रूप में स्वीकार किया गया और रूस ने यह माना कि उससे संबंधित राजनीतिक संबंध ब्रिटिश सरकार के माध्यम से ही संचालित होंगे। तिब्बत के संबंध में दोनों देशों ने उसकी प्रादेशिक स्थिति में परिवर्तन न करने, उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने तथा तिब्बत पर चीन के अधिराज्य को स्वीकार करने पर सहमति व्यक्त की। इस समझौते ने ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के बीच सहयोग को पूर्ण रूप प्रदान किया तथा त्रिराष्ट्र मैत्री के गठन की पृष्ठभूमि तैयार की। यही व्यवस्था प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व यूरोप के शक्ति-संतुलन का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार बनी।

आंग्ल-रूसी संधि (1907 ई.) का महत्त्व
त्रिराष्ट्र मैत्री का गठन

1907 ई. की आंग्ल-रूसी संधि आधुनिक यूरोपीय कूटनीति की सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक थी। इस संधि ने न केवल ब्रिटेन और रूस के मध्य लगभग एक शताब्दी से चले आ रहे मध्य एशिया संबंधी विवादों का अंत किया, बल्कि यूरोप के शक्ति-संतुलन को भी निर्णायक रूप से परिवर्तित कर दिया। 1904 ई. के आंग्ल-फ्रांसीसी समझौते तथा 1907 ई. की आंग्ल-रूसी संधि के परिणामस्वरूप ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के मध्य त्रिराष्ट्र मैत्री का गठन हुआ। यद्यपि यह कोई औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं था, फिर भी इसने जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और इटली के त्रिगुट के समक्ष एक प्रभावी शक्ति-संतुलन स्थापित कर दिया। परिणामस्वरूप 1907 ई. के बाद यूरोप की राजनीति स्पष्ट रूप से दो प्रतिद्वंद्वी गुटों में विभाजित हो गई।

त्रिराष्ट्र मैत्री का उद्देश्य किसी राष्ट्र पर आक्रमण करना नहीं था। यह मुख्यतः कूटनीतिक सहयोग, परस्पर विश्वास तथा यूरोप में शक्ति-संतुलन बनाए रखने की व्यवस्था थी। तीनों देशों के हित समान नहीं थे, किंतु उनकी सुरक्षा संबंधी आवश्यकताएँ उन्हें एक-दूसरे के निकट ले आईं।

फ्रांस के लिए यह व्यवस्था जर्मनी के विरुद्ध सुरक्षा का आश्वासन थी। 1871 ई. के फ्रांस-प्रशा युद्ध में एल्सस और लोरेन के खो जाने के बाद फ्रांस अपनी सुरक्षा सुदृढ़ करना चाहता था तथा भविष्य में इन प्रदेशों को पुनः प्राप्त करने की आशा बनाए रखना चाहता था। रूस के लिए यह संधि मध्य एशिया के विवादों से मुक्त होकर यूरोप और विशेषतः बाल्कन क्षेत्र में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने का अवसर थी। साथ ही, रूस-जापान युद्ध (1904–05 ई.) में पराजय के बाद उसे अपनी सैन्य, आर्थिक और औद्योगिक शक्ति के पुनर्गठन के लिए समय भी प्राप्त हुआ। ब्रिटेन के लिए यह व्यवस्था उसके विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य की सुरक्षा, भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर रूसी खतरे को समाप्त करने तथा जर्मनी की बढ़ती नौसैनिक शक्ति का संतुलन स्थापित करने का प्रभावी साधन थी।

ब्रिटेन की दृष्टि से संधि का महत्त्व

ब्रिटेन में इस संधि का सामान्यतः स्वागत किया गया, किंतु इसकी आलोचना भी हुई। संसद के अनेक सदस्यों का मत था कि ब्रिटेन ने रूस को अपेक्षाकृत अधिक रियायतें प्रदान कर दी हैं तथा ईरान और अफगानिस्तान से संबंधित व्यवस्थाएँ ब्रिटिश हितों की दृष्टि से पूरी तरह संतोषजनक नहीं थीं। कुछ आलोचकों का यह भी कहना था कि रूस ने फारस की खाड़ी में ब्रिटेन की सर्वोच्च स्थिति को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं किया तथा अफगानिस्तान संबंधी प्रावधान तब तक व्यावहारिक नहीं हो सकते थे, जब तक अफगान अमीर की स्वीकृति प्राप्त न हो।

इन आलोचनाओं के बावजूद अधिकांश समकालीन राजनीतिज्ञों और इतिहासकारों का मत था कि राजनीतिक दृष्टि से यह संधि अत्यंत सफल सिद्ध हुई। इसने ब्रिटेन की दीर्घकालीन ‘शानदार पृथकता’ की नीति का अंत किया तथा उसे यूरोप की शक्ति-राजनीति में पुनः सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर प्रदान किया। साथ ही, भारत की सुरक्षा संबंधी ब्रिटिश चिंताएँ भी काफी हद तक कम हो गईं।

आंग्ल-रूसी संधि का फ्रांस और रूस में अत्यंत उत्साहपूर्वक स्वागत किया गया। रूस अब मध्य एशिया के विवादों से मुक्त होकर यूरोप तथा विशेष रूप से बाल्कन क्षेत्र की राजनीति पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकता था। इससे उसे अपनी सैन्य और आर्थिक शक्ति के पुनर्गठन के लिए भी अनुकूल परिस्थितियाँ प्राप्त हुईं।

फ्रांस के लिए यह संधि अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी, क्योंकि अब वह कूटनीतिक दृष्टि से अकेला नहीं रहा। ब्रिटेन और रूस दोनों के सहयोग से उसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ हो गई। इससे फ्रांस में एल्सस-लोरेन की पुनर्प्राप्ति की आशा तथा जर्मनी के विरुद्ध प्रतिशोध की भावना और अधिक प्रबल हो गई। इस प्रकार त्रिराष्ट्र मैत्री ने फ्रांस की सुरक्षा और कूटनीतिक प्रतिष्ठा दोनों को मजबूत किया।

जर्मनी की प्रतिक्रिया

त्रिराष्ट्र मैत्री का सबसे अधिक प्रभाव जर्मनी पर पड़ा। जर्मन नेतृत्व ने इस नई व्यवस्था को अपने विरुद्ध बनाई गई ‘घेरेबंदी की नीति’ के रूप में देखा। उसका विश्वास था कि ब्रिटेन, फ्रांस और रूस मिलकर जर्मनी को चारों ओर से घेरकर उसकी राजनीतिक, आर्थिक तथा सामरिक शक्ति को सीमित करना चाहते हैं। यद्यपि 1904 और 1907 ई. के समझौते मुख्यतः रक्षात्मक तथा विवाद-निवारण संबंधी थे, फिर भी जर्मनी ने उन्हें अपने विरुद्ध उभरते हुए शक्ति-संतुलन के रूप में देखा। इस धारणा ने जर्मनी में असुरक्षा की भावना को जन्म दिया और उसकी विदेश नीति को अधिक आक्रामक बना दिया।

विडंबना यह थी कि जर्मनी जिस कूटनीतिक घेरेबंदी को समाप्त करना चाहता था, उसकी अपनी नीतियाँ ही त्रिराष्ट्र मैत्री को और अधिक मजबूत करती चली गईं। कैसर विलियम द्वितीय की वेल्टपोलिटिक, तीव्र नौसैनिक विस्तार तथा विश्व-शक्ति बनने की महत्त्वाकांक्षा ने ब्रिटेन, फ्रांस और रूस को परस्पर अधिक निकट ला दिया।

जर्मनी की नौसैनिक प्रतिस्पर्धा ने विशेष रूप से ब्रिटेन को चिंतित कर दिया। उधर मोरक्को संकटों (1905 और 1911 ई.) में जर्मनी की आक्रामक नीति ने फ्रांस और ब्रिटेन के संबंधों को और अधिक सुदृढ़ कर दिया। फलतः जर्मनी स्वयं को कूटनीतिक रूप से अपेक्षाकृत अलग-थलग अनुभव करने लगा। अनेक जर्मन नेताओं के मन में यह धारणा विकसित हुई कि यदि कूटनीति द्वारा परिस्थितियों को बदला नहीं जा सकता, तो अंततः युद्ध ही समस्या का समाधान होगा। इस मानसिकता ने यूरोप में सैन्यवाद और युद्धोन्मुख वातावरण को प्रोत्साहित किया।

बाल्कन संकट और ‘ब्लैंक चेक’ की नीति

1907 ई. के बाद यूरोपीय कूटनीति का केंद्र पुनः बाल्कन प्रायद्वीप बन गया। उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य के पतन के साथ इस क्षेत्र में शक्ति-संघर्ष तीव्र हो गया। रूस स्वयं को बाल्कन के स्लाव लोगों का संरक्षक मानता था, जबकि ऑस्ट्रिया-हंगरी इस क्षेत्र में अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता था। इन परस्पर विरोधी हितों ने बाल्कन को यूरोप का सबसे विस्फोटक क्षेत्र बना दिया।

ऐसी स्थिति में जर्मनी ने अपने प्रमुख सहयोगी ऑस्ट्रिया-हंगरी को बिना शर्त समर्थन देने की नीति अपनाई। इतिहास में यह नीति ‘ब्लैंक चेक’ के नाम से प्रसिद्ध है। यद्यपि इसका प्रत्यक्ष और औपचारिक स्वरूप जुलाई 1914 ई. के संकट में दिखाई दिया, किंतु ऑस्ट्रिया के प्रति जर्मनी का अटूट समर्थन इससे पहले ही उसकी विदेश नीति का आधार बन चुका था। इस नीति ने ऑस्ट्रिया-हंगरी को बाल्कन में अधिक आक्रामक रुख अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया।

विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि

1908–09 ई. का बोस्निया संकट, 1912–13 ई. के बाल्कन युद्ध, जर्मनी और ब्रिटेन के बीच नौसैनिक प्रतिस्पर्धा, उग्र राष्ट्रवाद तथा साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा ने यूरोप के राजनीतिक वातावरण को अत्यंत तनावपूर्ण बना दिया। प्रत्येक महाशक्ति अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने में लगी हुई थी। अनिवार्य सैनिक सेवा, शस्त्र निर्माण तथा नौसैनिक विस्तार के कारण शस्त्रीकरण की दौड़ अभूतपूर्व स्तर पर पहुँच गई।

इसके साथ ही, फ्रांस में एल्सस-लोरेन की पुनर्प्राप्ति की भावना, रूस की पैन-स्लाव नीति, जर्मनी की विश्व-शक्ति बनने की महत्त्वाकांक्षा तथा ब्रिटेन की समुद्री सर्वोच्चता बनाए रखने की नीति परस्पर टकराने लगीं। मोरक्को संकट, बोस्निया संकट और बाल्कन संकट जैसी घटनाओं ने इन विरोधाभासों को और अधिक तीव्र कर दिया। समाचार-पत्रों और राष्ट्रवादी संगठनों ने भी जनमत को उग्र बनाकर राष्ट्रों के बीच अविश्वास और शत्रुता को बढ़ावा दिया। परिणामस्वरूप किसी भी क्षेत्रीय विवाद के विश्वव्यापी युद्ध में परिवर्तित होने की संभावना निरंतर बढ़ती गई।

इस प्रकार 1907 ई. की आंग्ल-रूसी संधि यूरोपीय कूटनीति का एक निर्णायक मोड़ थी। इसने ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के मध्य सहयोग को सुदृढ़ किया तथा यूरोप में शक्ति-संतुलन की नई व्यवस्था स्थापित की। साथ ही, इसने महाद्वीप को दो प्रतिद्वंद्वी गुटों—त्रिगुट और त्रिराष्ट्र मैत्री में विभाजित कर दिया। यद्यपि इन व्यवस्थाओं का घोषित उद्देश्य रक्षात्मक था, फिर भी पारस्परिक अविश्वास, सैन्यवाद, साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा और बाल्कन संकटों ने इन्हें टकराव की दिशा में धकेल दिया।

वस्तुतः प्रथम विश्वयुद्ध का कारण केवल त्रिराष्ट्र मैत्री का गठन नहीं था, बल्कि जर्मनी की आक्रामक विदेश नीति, कैसर विलियम द्वितीय की महत्त्वाकांक्षी वेल्टपोलिटिक, बढ़ती शस्त्र प्रतिस्पर्धा, उग्र राष्ट्रवाद तथा बाल्कन क्षेत्र के जटिल राजनीतिक संकटों ने मिलकर ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं, जिनमें जुलाई 1914 ई. का सारायेवो संकट विश्वव्यापी युद्ध में परिवर्तित हो गया।

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