कश्मीर का द्वितीय लोहर वंश (Second Lohara Dynasty, c 1101-1172 AD)

कश्मीर का द्वितीय लोहर वंश (Second Lohara Dynasty, c 1101-1172 AD)

कश्मीर का द्वितीय लोहर वंश (लगभग 1101-1172 ई.)

द्वितीय लोहर वंश ने 1003 ई. से लगभग 1172 ई. के बीच भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भाग में कश्मीर और आसपास के क्षेत्रों पर शासन किया।

उच्छल (1101–1111 ई.)

उच्छल लोहर वंश की एक शाखा से संबंधित मल्ल का ज्येष्ठ पुत्र तथा सुस्सल का बड़ा भाई था। उसने 1101 ई. में अपने चचेरे भाई हर्ष को पराजित कर कश्मीर के सिंहासन पर अधिकार कर लिया और 1111 ई. तक कश्मीर पर शासन किया।

हर्ष के शासनकाल में 1099 में जब राज्य सूखे के संकट से जूझ रहा था, उसकी अत्याचारी नीतियों, मंदिरों की लूट, भारी कराधान तथा अनेक संबंधियों और सामंतों के दमन के कारण व्यापक असंतोष फैल गया। वीरता और वफादारी दिखाने के बावजूद हर्ष दोनों भाइयों- उच्छल और सुस्सल को राज्य के लिए खतरा और अपने पुत्र भोज का प्रतिद्वंद्वी मानता था। अतः उन्हें 1100 में राजधानी श्रीनगर छोड़कर भागना पड़ा। किंतु इस निर्वासन से डामरों के बीच उच्छल की लोकप्रियता बढ़ गई उच्छल ने हर्ष के विरोधी सामंतों को अपने पक्ष में संगठित कर 1101 ई. में विद्रोह किया। प्रारंभिक असफलता के बाद उच्छल अपने भाई सुस्सल और सेना के साथ लाहौर होते हुए घाटी में दाखिल हुआ

इस समय हर्ष की स्थिति भी कमजोर हो चुकी थी और उसके कई प्रमुख मंत्री तथा समर्थक भी उसका साथ छोड़ चुके थे। डामरों के सहयोग से उच्छल ने राजधानी को जला दिया। हिरण्यपुर में ब्राह्मणों ने उच्छल का राज्याभिषेक किया, जिससे उसके शासन को वैधता मिली। पराजित हर्ष ने एक भिक्षु के घर में शरण ली, किंतु प्रतिशोधी डामरों ने उसकी हत्या कर दी। इस प्रकार हर्ष के अंत और उच्छल के राज्यारोहण से लोहर वंश के प्रथम चरण का समापन तथा दूसरे चरण की शुरुआत हुई।

उच्छल को हर्ष से राजगद्दी छीनने में सफलता तो मिल गई, किंतु उसे डामर सरदारों तथा अपने महत्त्वाकांक्षी भाई सुस्सल से निरंतर खतरा बना रहा। उसने कश्मीर तथा लोहर राज्यों को राज्य पुनः अलग कर दिया और किसी भी संभावित चुनौती से बचने के लिए लोहर का शासन सुस्सल को सौंप दिया।

उच्छल एक सक्षम, कर्तव्यनिष्ठ और प्रजापालक शासक था। उसने सामान्य जनता को संतुष्ट करने के लिए अनेक भ्रष्ट एवं अत्याचारी कायस्थ अधिकारियों को दंडित किया और सुस्सल सहित अपने अनेक विरोधियों को पराजित किया, किंतु उसका शासन काफी हद तक विरासत में मिली परिस्थितियों का शिकार था; विशेष रूप से डामरों की बढ़ती शक्ति, जिसके कारण हर्ष के पतन हुआ था

उच्छल ने राज्य में व्यवस्था स्थापित करने और डामरों की बढ़ती शक्ति को नियंत्रित करने के लिए शक्तिशाली सामंत गर्गचंद्र के साथ गठबंधन किया और योजनाबद्ध ढंग से उनका दमन किया। उसने डामरों के बीच ईर्ष्या और आपसी संदेह को भड़काकर जनकचन्द्र जैसे प्रभावशाली नेताओं की हत्या करवा दी या निर्वासित कर दिया। अपनी स्थिति को सुदृढ़ कर उसने डामरों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की और उन्हें निरस्त्र करके समर्पण करने के लिए बाध्य किया।

यद्यपि उच्छल एक ईमानदार शासक माना जाता है, फिर भी वह अपने हरसंभव प्रयास के बावजूद राज्य की राजनीतिक तथा आर्थिक समस्याओं का पूर्ण समाधान नहीं कर सका। इस समय राजनीतिक हत्याएँ, षड्यंत्र और अस्थायी समझौते सामान्य घटनाएँ थीं अंततः एक षड्यंत्र के परिणामस्वरूप रद्द और उसके सहयोगी चूड्ड ने 8 दिसंबर 1111 ई. को बनिहाल में उच्छल की हत्या कर दी।

रद्द और  सल्हण (1111-1112 ई.)

उच्छल की मृत्यु (1111 ई.) के बाद लगभग एक वर्ष तक राजनीतिक अराजकता फैली रही। उच्छल के हत्यारे रद्द ने ‘शंकरराज’ की उपाधि धारण कर सत्ता पर अधिकार कर लिया और अपने शासन को वैध सिद्ध करने के लिए स्वयं को प्राचीन यशस्कर वंश से संबंधित होने का आधारहीन दावा किया, किंतु वह मात्र एक दिन ही शासन कर सका। उच्छल के निष्ठावान सामंत गर्गचंद्र ने रद्द का वध कर उच्छल की हत्या का प्रतिशोध लिया और उसके सौतेले भाई तथा पूर्व सेनापति सल्हण को कठपुतली शासक के रूप में सिंहासन पर बैठाया।

सल्हण के लगभग चार महीनों के शासनावधि में वास्तविक सत्ता गर्गचन्द्र के हाथों में रही और इस बीच विरोधियों का कठोर दमन किया गया। कल्हण ने इस काल को ‘एक लंबा बुरा स्वप्न’ बताया गया है, जो भय और आतंक से भरा हुआ था।

शक्तिशाली डामरों ने केंद्रीय सत्ता की कमजोरी का लाभ उठाकर स्वतंत्र रूप से कर वसूले और स्थानीय संघर्षों को बढ़ावा दिया, जिससे राज्य की आर्थिक स्थिति और अधिक कमजोर हो गई। सल्हण की अपने संबंधियों, विशेषकर गर्गचंद्र पर अत्यधिक निर्भरता तथा भाई-भतीजावाद की नीति के कारण स्थायी राजनीतिक समर्थन नहीं मिल सका। अंततः उसे पदच्युत् कर बंदी बना लिया गया।

सुस्सल (1112–1120 ई. तथा 1121–1128 ई.)

उच्छल की हत्या के समय उसका भाई सुस्सल लोहर (लोहारा) में था। उसने सर्दियों के दौरान पर्वतीय मार्गों को पार कर श्रीनगर पहुँचने का प्रयास किया, किंतु प्रतिकूल मौसम के कारण वह सफल नहीं हो सका। लगभग चार माह बाद उसने पुनः प्रयास किया और कश्मीर पहुँच गया। वहाँ गर्गचंद्र के सहयोग से उसने सौतेले भाई सल्हण (सल्हन) से कश्मीर का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया।

सुस्सल का स्वभाव अनेक दृष्टियों से अपने भाई उच्छल के समान था। वह ‘व्यक्तिगत रूप से बहादुर लेकिन उतावला, क्रूर और अविवेकी’ था। उसके शासनकाल में भी षड्यंत्र, दरबारी संघर्ष और डामरों के विद्रोह होते रहे, जिन्हें वह पूरी तरह दबाने में कभी सफल नहीं हो सका।

अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए सुस्सल ने राजा बनानेवाले गर्गचंद्र के साथ गठबंधन किया और वैवाहिक संबंध स्थापित किए। इस राजनीतिक समझौते के अंतर्गत उसने स्वयं गर्गचंद्र की एक पुत्री से विवाह किया, जबकि अपने पुत्र जयसिंह का विवाह गर्गचंद्र की दूसरी पुत्री से कराया।

सुस्सल ने निरंतर विद्रोहों, सामंती संघर्षों और उत्तराधिकार-संबंधी विवादों के बीच 1118 ई. में गर्गचंद्र तथा उसके परिवार के कुछ सदस्यों मृत्युदंड दिया। सुस्सल की क्रूर तथा दमनकारी नीतियों के कारण उसके विरोधियों की संख्या काफी बढ़ गई। गर्गचंद्र के न होने से विद्रोहियों को राजा को चुनौती देने का अवसर मिल गया। हर्ष के पौत्र भिक्षाचर के नेतृत्व में विद्रोहियों ने 1120 ई. में सुस्सल को लोहर भागने के लिए विवश कर दिया और 1121 ई. में भिक्षाचर का श्रीनगर में राज्याभिषेक किया। किंतु वह भी एक अयोग्य शासक सिद्ध हुआ और राज्य में अराजकता, गुटबाज़ी तथा अव्यवस्था फैल गई।

लगभग छह महीने बाद सुस्सल ने सामरिक गठबंधनों और सैन्य शक्ति के बल पर भिक्षाचर को हटाकर पुनः सिंहासन पर अधिकार कर लिया। सुस्सल की पुनर्स्थापना से भी राज्य में स्थिरता नहीं आ सकी। इसके विपरीत, सामंती सरदारों (डामरों) के विद्रोह निरंतर बढ़ते गए।

इसके बाद सुस्सल ने विरोधियों के प्रति कठोर दमनकारी नीति अपनाई और अपने परिवार के उपद्रवी सदस्यों को भी कैद कर लिया। फिर भी वह डामरों के बीच फैली अराजकता को नियंत्रित करने में सफल नहीं हो सका और कई बार विद्रोहियों ने उसकी राजधानी को घेर लिया। वास्तव में, सुस्सल के शासनकाल में विद्रोह, षड्यंत्र और प्रतिशोध का जो चक्र चला, उसका मुख्य कारण कमजोर केंद्रीय प्रशासन तथा योग्यता के स्थान पर पारिवारिक और सैन्य संबंधों को प्राथमिकता देना था।

डामरों के दबाव और व्यापक अशांति के बीच सुस्सल ने अपने ज्येष्ठ पुत्र जयसिंह को उत्तराधिकारी घोषित किया और 1123 ई. के आसपास उसके पक्ष में सिंहासन त्यागने की घोषणा की। किंतु जयसिंह औपचारिक रूप से राजा बना रहा, जबकि सुस्सल ने शासक के रूप से शासन करना जारी रखा।

अराजकता के दौरान सुस्सल ने भिक्षाचर की हत्या का षड्यंत्र रचा, परंतु उत्पल नामक षड्यंत्रकारी द्वारा भेद खुल जाने से योजना विफल हो गई और अंततः 1128 ई. में सुस्सल की ही हत्या कर दी गई।

जयसिंह (1128-1155 ई.)

अपने पिता सुस्सल की हत्या के बाद जयसिंह (जयसिम्ह) श्रीनगर पहुँचकर कश्मीर के सिंहासन पर बैठा। जयसिंह कल्हण की राजतरंगिणी का अंतिम प्रमुख शासक है। उसी के शासनकाल में (लगभग 1148–1150 ई.) कल्हण ने अपनी अमर कृति की रचना पूरी की। समकालीन होने के कारण कल्हण ने जयसिंह के शासन का विस्तृत और प्रामाणिक विवरण दिया है।

जयसिंह को एक ऐसा राज्य विरासत में मिला, जो दीर्घकालीन गृहयुद्धों, सामंती विद्रोहों और राजनीतिक अस्थिरता से कमजोर हो चुका था। राज्य के अनेक भागों पर शक्तिशाली डामर सरदारों का प्रभाव था, जो कृषि संसाधनों और स्थानीय सैन्य बलों पर नियंत्रण रखते थे। इन सामंतों ने राजसत्ता को चुनौती देने के लिए कई दावेदारों और विद्रोही नेताओं का समर्थन किया, जिससे केंद्रीय शासन की शक्ति काफी कमज़ोर हो गई थी।

जयसिंह कोई बहुत सुदृढ़ व्यक्तित्व वाला नहीं था, फिर भी उसने सैन्य शक्ति, कूटनीतिक समझौतों तथा कभी-कभी गुप्त षड्यंत्रों के माध्यम से राज्य में शांति स्थापित करने का प्रयास किया। शुरुआती दो वर्षों में भिक्षाचर ने सिंहासन वापस पाने की कई कोशिशें की। अंततः1131 ई. में वह जयसिंह के सैनिकों द्वारा पकड़ लिया गया और उसकी हत्या कर दी गई। इसी समय सल्हण के भाई लोथन ने, जो सल्हण के साथ वर्षों से लोहर के दुर्ग में बंदी था, बंदीगृह से भाग कर लोहर पर कब्जा कर लिया, किंतु जयसिंह के भाई मल्लार्जुन ने शीघ्र ही उसे पराजित कर लोहर पर अधिकार कर लिया। यद्यपि मल्लार्जुन ने जयसिंह की अधीनता स्वीकार कर ली, किंतु जयसिंह तब तक संतुष्ट नहीं हुआ जब तक उसने लोहर पर अपना प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित नहीं कर लिया। इसके बाद 1144 ई. में लोथन को भी बंदी बना लिया गया और गद्दी के अन्य दावेदार मल्लार्जुन तथा  सल्हण के पुत्र भोज ने भी आत्मसमर्पण कर दिया।

1145 ई. के बाद जयसिंह को कुछ समय के लिए राज्य में शांति स्थापित करने में सफलता मिली। उसने डामरों में फूट डालकर और विद्रोही दामरों के विरुद्ध अभियान चलाकर अनेक क्षेत्रों पर पुनः राजकीय नियंत्रण स्थापित किया। अगले वर्षों में उसके प्रयासों से राज्य के कई सीमावर्ती और विद्रोहग्रस्त क्षेत्र पुनः राजसत्ता के अधीन आए। इससे कृषि उत्पादन, कर-संग्रह और प्रशासनिक व्यवस्था में कुछ हद तक सुधार हुआ तथा राजकोष की स्थिति भी अपेक्षाकृत सुदृढ़ हुई।

जयसिंह ने अपने समकालीन अन्य भारतीय राज्यों के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए। उसके सांधिविग्रहिक तथा राजस्थानीय अधिकारी अलंकार द्वारा आयोजित एक सभा में कन्नौज के गाहड़वाल नरेश गोविंदचंद्र के प्रतिनिधि सुहल तथा कोंकण के शिलाहार नरेश अपरादित्य के प्रतिनिधि तेजकंठ ने भाग लिया। इसका उल्लेख अलंकार के भाई मंख ने अपने संस्कृत महाकाव्य श्रीकंठचरित में किया है।

प्रशासनिक क्षेत्र में जयसिंह ने प्रांतों की देखरेख के लिए अपने विश्वस्त संबंधियों और अधिकारियों को नियुक्त किया। इससे अल्पकालिक स्थिरता तो प्राप्त हुई, किंतु सामंती स्वायत्तता की समस्या समाप्त नहीं हो सकी।

जयसिंह का शासन सांस्कृतिक और बौद्धिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण था। उसने अनेक प्राचीन मंदिरों और मठों का पुनर्निर्माण करवाया और धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को संरक्षण दिया। उसकी सफलता के कारण कुछ इतिहासकार उसे ‘कश्मीर का अंतिम महान् हिंदू शासक’ मानते हैं।

कल्हण की राजतरंगिणी का वर्णन लगभग 1148–1150 ई. तक ही सीमित है। इसके पश्चात् जोनराज ने अपनी कृति जोनराज-राजतरंगिणी के माध्यम से कश्मीर के इतिहास को आगे बढ़ाया। उसके अनुसार जयसिंह ने कल्हण की रचना पूर्ण होने के पश्चात् भी लगभग पाँच वर्षों तक शासन किया।

जयसिंह ने उत्तराधिकार को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से अपने जीवनकाल में ही अपने सबसे बड़े और अल्पव्यस्क पुत्र गुल्हन (गुल्हण) को लोहर का शासक नियुक्त किया, ताकि भविष्य में उत्तराधिकार में कोई गड़बड़ी न हो सके।

जयसिंह ने लगभग 1128 से 1155 ई. तक शासन किया।

जयसिंह के उत्तराधिकारी और लोहर वंश का पतन

1155 ई. में जयसिंह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र परमानुक (लगभग 1155-1164 ई.) शासक बना। प्रारंभ में शासन में निरंतरता दिखाई दी, किंतु  शीघ्र ही डामर सरदारों की शक्ति पुनः बढ़ने लगी। इन सामंतों ने केंद्रीय सत्ता की दुर्बलता का लाभ उठाकर अपनी जागीरों का विस्तार किया और अनेक क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से शासन करने लगे, जिसके  परिणामस्वरूप राजस्व-संग्रह तथा प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर पड़ गया।

परमानुक के बाद उसके पुत्र वंतिदेव (लगभग 1165–1172 ई.) ने शासन किया, जिसको प्रायः लोहर वंश का आखिरी शासक माना जाता है।

वंतिदेव का शासन लोहर वंश की घटती शक्ति का प्रतीक था। इस समय तक डामर सरदार इतने शक्तिशाली हो चुके थे कि अनेक स्थानों पर शाही आदेशों की उपेक्षा की जाने लगी। राजा को शासन चलाने के लिए सामंतों से समझौते करने पड़ते थे।

इस काल में राजकीय संपत्तियों, अन्न-भंडारों और मंदिरों की आय पर स्थानीय सरदारों का नियंत्रण बढ़ गया। लगातार सामंती संघर्षों और प्रशासनिक दुर्बलता के कारण राज्य की एकता कमजोर होती गई। राजकोष की आय घटती गई और केंद्रीय सत्ता का प्रभाव सीमित क्षेत्रों तक सिमट गया।

1171 ई. तक लोहर वंश की प्रत्यक्ष सत्ता लगभग समाप्त हो चुकी थी। इसके बाद स्थानीय शक्तियों और सामंती समूहों का प्रभाव बढ़ गया तथा राज्य अनेक प्रभाव-क्षेत्रों में विभाजित हो गया। इस प्रकार लोहर शासन का पतन किसी बाहरी आक्रमण का परिणाम नहीं, बल्कि दीर्घकालीन सामंती विखंडन, कमजोर उत्तराधिकार व्यवस्था और केंद्रीय सत्ता की निरंतर गिरावट का परिणाम था।

वुप्पादेव वंश (1172- 1339 ई.)

वंतिदेव के पश्चात 1172 ई. में वुप्पादेव (1172-1181 ई.) नामक एक नए शासक का उदय हुआ। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार वह परंपरागत उत्तराधिकार के बजाय जनता या प्रभावशाली वर्गों के समर्थन से सत्ता में आया था। उसके शासनारोहण के साथ वुप्पादेव वंश की स्थापना हुई।

1181 ई. में वुप्पादेव के निधन के बाद उसका भाई जस्सक (1181-1199) सिंहासन पर आसीन हुआ। तत्पश्चात 1199 ई. में जस्सक का पुत्र जगदेव (1199-1112) जगदेव ने गद्दी संभाली। उसने जयसिंह का अनुकरण करने का प्रयास किया, किंतु उसका शासनकाल उथल-पुथल से भरा रहा और एक समय तो उसे उसके ही अधिकारियों ने राज्य से बाहर निकाल दिया था। लगभग 1212 में विष देकर उसकी हत्या कर दी गई और उसके उत्तराधिकारियों को भी कोई सफलता नहीं मिली

जगदेव का पुत्र राजदेव 1235 ई. तक जीवित रहा, किंतु उसकी शक्ति कुलीन वर्ग द्वारा सीमित कर दी गई थी; उसके पोते संग्रामदेव ने 1235 से 1252 ई. तक शासन किया, परंतु उसे भी जगदेव की तरह राज्य से बाहर निकाल दिया गया और फिर वापसी के तुरंत बाद उसकी हत्या कर दी गई।

राजदेव का एक अन्य पुत्र रामदेव 1252 ई. में राजा बनाया गया। निःसंतान होने के कारण उसने एक ब्राह्मण पुत्र लक्ष्मणदेव को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। यद्यपि रामदेव का शासनकाल अपेक्षाकृत शांत रहा, किंतु लक्ष्मणदेव के शासनकाल (1273-1286 ई.) में स्थिति एक बार फिर बिगड़ गई। उपद्रवी कुलीनों और तुर्कों के क्षेत्रीय अतिक्रमण से उसका शासनकाल संकटग्रस्त रहा। 1286 ई. में जब लक्ष्मणदेव के पुत्र सिंहदेव (1286-1301 ई.) सिंहासन पर बैठे, तब तक राज्य-क्षेत्र बहुत सीमित हो चुका था। सिंहदेव ने 1301 ई. तक शासन किया, किंतु उसकी हत्या ऐसे व्यक्ति ने कर दी जिसकी पत्नी के साथ उसके अवैध संबंध थे। 

लोहर राजवंश का अंतिम प्रमुख शासक सिंहदेव का भाई सूहदेव (1301–1320 ई.) था। वह एक शक्तिशाली, किंतु अलोकप्रिय शासक माना जाता है। उसने जनता पर भारी कर लगाया और ब्राह्मणों से भी करों की वसूली की। सूहदेव के काल में कश्मीर को आंतरिक राजनीतिक संकटों के साथ-साथ बाहरी संकटों का भी सामना करना पड़ा।

1319-20 ई. में मंगोल सरदार दुलचा (ज़ुल्जू) ने कश्मीर पर आक्रमण किया, जिससे राज्य की स्थिति संकटग्रस्त हो गई। सुहदेव राज्य की रक्षा करने में असफल रहा और उसे कश्मीर छोड़कर भागना पड़ा, जिससे केंद्रीय सत्ता लगभग समाप्त हो गई। इसी समय शाह मीर, जो स्वात क्षेत्र से कश्मीर आया था, धीरे-धीरे कश्मीरी सामंतों और प्रभावशाली वर्गों से संबंध स्थापित कर राज्य की राजनीति में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया था।

सुहदेव के पतन के बाद लद्दाखी मूल के राजकुमार रिंचन ने सत्ता संघर्ष में हस्तक्षेप किया। उसने सूहदेव के सेनापति रामचंद्र की हत्या कर उसकी पुत्री कोटा रानी से विवाह कर 1320 ई. में कश्मीर के सिंहासन पर अधिकार कर लिया और लगभग 1323 ई. तक शासन किया। सिंहासन ग्रहण करने के कुछ समय बाद रिंचन ने सूफी बुलबुल शाह के प्रभाव में इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया और सुल्तान सदरुद्दीन की उपाधि धारण की। इस प्रकार वह कश्मीर का प्रथम मुस्लिम शासक बना।

रिंचन की मृत्यु के बाद सुहदेव के भाई उदयनदेव (1323-1338 ई.) ने शासन सँभाला और कोटा रानी से विवाह किया। किंतु उसका शासन भी राजनीतिक चुनौतियों तथा दरबारी गुटबंदी से घिरा रहा। 1338 ई. में उदयनदेव की मृत्यु के बाद कोटा रानी (1338-1339 ई.) ने कश्मीर पर शासन सँभाला। शाह मीर की बढ़ती शक्ति को रोकने के लिए जब ​​कोटा रानी ने भट्ट भिक्षण को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया, तो शाहमीर ने विद्रोह कर दिया। जोनराज के विवरण के अनुसार उसने भट्ट भिक्षण को अपने निवास पर बुलाकर षड्यंत्रपूर्वक उसकी हत्या करवा दी और अंततः 1339 ई. में सुल्तान शम्सुद्दीन शाह मीर के रूप में शासन प्रारंभ किया। इसके साथ ही कश्मीर में हिंदू राजवंशीय शासन का अंत हो गया और शाहमीर वंश की स्थापना हुई।

इस प्रकार लगभग तीन शताब्दियों तक कश्मीर की राजनीति को प्रभावित करने वाले लोहर वंश के अंतिम अवशेषों का अंत हो गया और कश्मीर के इतिहास में मुस्लिम शासन के एक नए युग का आरंभ हुआ।

लोहर राजवंश के पतन के कारण

लोहर राजवंश के पतन की प्रक्रिया ग्यारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी थीं। राजा कलश (1063–1089 ई.) के शासनकाल में प्रशासनिक और आर्थिक समस्याएँ गहराने लगीं। राजकीय व्यय, दरबारी विलासिता तथा सैन्य अभियानों की पूर्ति के लिए करों में वृद्धि की गई। साथ ही, शक्तिशाली डामर सामंतों को व्यापक भूमि-अनुदान और स्थानीय अधिकार प्रदान किए गए, जिससे उनकी स्वायत्तता और प्रभाव में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

डामर सामंतों के शक्तिशाली होने के साथ ही केंद्रीय शासन का नियंत्रण कमजोर पड़ने लगा। अनेक सामंतों ने कर-संग्रह को व्यक्तिगत लाभ का साधन बना लिया और किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना शुरू किया, जिससे ग्रामीण समुदाय में असंतोष बढ़ा तथा राज्य की राजस्व व्यवस्था प्रभावित हुई। परिणामस्वरूप राजसत्ता और सामंतों के बीच शक्ति-संतुलन बिगड़ने लगा।

कलश के उत्तराधिकारी हर्ष के शासनकाल में ये समस्याएँ और अधिक गंभीर हो गईं। आर्थिक संकट तथा सैन्य-व्यय की पूर्ति के लिए उसने मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं की संपत्ति का उपयोग किया तथा अनेक मंदिरों को लूटा। राजतरंगिणी में कल्हण ने इन कार्यों की तीव्र आलोचना की है और इन्हें राजधर्म के विरुद्ध बताया है। इससे ब्राह्मणों, सामंतों तथा सामान्य जनता का एक बड़ा वर्ग हर्ष के विरुद्ध हो गया।

इसी काल में प्रशासन में भाई-भतीजावाद, पक्षपात और भ्रष्टाचार भी बहुत बढ़ गया था। योग्य अधिकारियों के स्थान पर दरबारी प्रियजनों और संबंधियों को अधिक महत्त्व दिया जाता था। अनेक मंत्री और सामंत अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए उत्तराधिकार संबंधी विवादों में हस्तक्षेप करते थे, जिससे प्रशासनिक दक्षता और राजनीतिक स्थिरता दोनों प्रभावित हुईं तथा शासन व्यवस्था कमजोर पड़ गई।

इस राजवंश के उत्तरार्ध में उत्तराधिकार संबंधी संघर्षों, षड्यंत्रों और विद्रोहों का सिलसिला निरंतर चलता रहा। डामर सरदार विभिन्न राजकुमारों और दावेदारों का समर्थन करके सत्ता-संघर्षों को प्रोत्साहन देते रहे। इसके परिणामस्वरूप अनेक शासकों का शासनकाल अल्पकालिक सिद्ध हुआ और प्रशासनिक निरंतरता बाधित होती गई। धीरे-धीरे केंद्रीय सत्ता सामंती शक्तियों के सामने निर्बल हो गई।

इतिहासकारों के अनुसार लोहर राज्य का पतन बाह्य आक्रमणों का परिणाम नहीं था। इसके पीछे आंतरिक विघटन, सामंती स्वायत्तता, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, उत्तराधिकार संबंधी संघर्ष और कमजोर नेतृत्व जैसे कारण अधिक महत्त्वपूर्ण थे। इन परिस्थितियों ने राज्य की राजनीतिक तथा आर्थिक नींव को धीरे-धीरे खोखला कर दिया, जिससे अंततः राजवंश के पतन का मार्ग प्रशस्त हो गया।

लोहर कालीन प्रशासन और संस्कृति

प्रशासनिक संरचना और अर्थव्यवस्था

लोहर राजवंश का शासन एक वंशानुगत राजतंत्र पर आधारित था, जिसकी राजधानी श्रीनगर थी। राजा राज्य का सर्वोच्च शासक माना जाता था तथा उसके अधीन प्रांतीय अधिकारी, राजस्व संग्राहक, न्यायिक अधिकारी और सैन्य अधिकारी कार्य करते थे। शासन संचालन में मंत्रिपरिषद की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। यद्यपि सिद्धांततः समस्त अधिकार राजा के हाथों में निहित थे, परंतु समय के साथ केंद्रीय सत्ता के कमजोर होने पर शक्तिशाली डामर सामंतों का प्रभाव बढ़ता गया।

डामर मूलतः स्थानीय भू-स्वामी और सामंती सरदार थे, जिनका ग्रामीण क्षेत्रों, किलों और कृषि भूमि पर नियंत्रण था। धीरे-धीरे वे अर्ध-स्वायत्त शक्तियों के रूप में विकसित हो गए और अनेक अवसरों पर उन्होंने राजसत्ता को चुनौती दी। वे स्थानीय प्रशासन, कर-संग्रह तथा सैन्य संसाधनों पर प्रभाव रखते थे, जिससे राज्य में सामंती विकेंद्रीकरण की प्रवृत्ति मजबूत हुई।

ब्राह्मणों, मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं को भूमि-अनुदान प्रदान करना राजकीय नीति का महत्त्वपूर्ण अंग था। इन अनुदानों के माध्यम से राजाओं को धार्मिक वैधता और सामाजिक समर्थन प्राप्त होता था। किंतु इससे राजकीय भूमि का एक बड़ा भाग प्रत्यक्ष कराधान से बाहर हो जाता था, जिसके कारण केंद्रीय राजस्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता था।

लोहर काल की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित थी। कश्मीर घाटी की उपजाऊ भूमि में विशेष रूप से धान की खेती की जाती थी। कृषि उत्पादन सिंचाई नहरों, जलाशयों और तटबंधों पर निर्भर था, जिनका विकास पूर्ववर्ती राजवंशों ने किया था। राजनीतिक अस्थिरता और प्रशासनिक शिथिलता के कारण इन व्यवस्थाओं का रखरखाव प्रभावित हुआ, जिससे कई क्षेत्रों में कृषि उत्पादन में गिरावट आई।

कृषि के अतिरिक्त, बागवानी, पशुपालन तथा ऊन, केसर और अन्य उत्पादों का सीमित व्यापार भी आय के महत्त्वपूर्ण स्रोत थे। कश्मीर के व्यापारिक संबंध उत्तर भारत तथा मध्य एशिया से जुड़े हुए थे। किंतु सामंती संघर्षों, असुरक्षित मार्गों और अत्यधिक करों के कारण व्यापारिक गतिविधियाँ बाधित होती रहीं।

राज्य की आय का मुख्य स्रोत भूमि-राजस्व था। किसानों से उपज अथवा मुद्रा के रूप में कर वसूला जाता था। कमजोर केंद्रीय नियंत्रण के कारण अनेक क्षेत्रों में सामंत मनमाने कर लगाते थे और किसानों से बेगार भी कराते थे। इसके परिणामस्वरूप कृषक वर्ग पर आर्थिक बोझ बढ़ता गया। प्रशासनिक भ्रष्टाचार, धन के दुरुपयोग तथा पक्षपातपूर्ण नियुक्तियों ने भी राजकोषीय व्यवस्था को कमजोर किया और आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न की।

सामाजिक परिस्थितियाँ और सामंतवाद

लोहर काल का समाज स्पष्ट रूप से पदानुक्रमित था। ब्राह्मण वर्ग धार्मिक, शैक्षिक और बौद्धिक क्षेत्र में प्रमुख स्थान रखता था तथा राजाओं के सलाहकार के रूप में भी कार्य करता था। क्षत्रिय शासक वर्ग राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करता था। इनके अतिरिक्त, डामर सामंत एक प्रभावशाली वर्ग थे, जिन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक आर्थिक और राजनीतिक शक्ति अर्जित कर ली थी।

कृषक वर्ग समाज का सबसे बड़ा और सबसे अधिक श्रम करने वाला वर्ग था। अधिकांश किसान सामंतों की भूमि पर कार्य करते थे तथा उन्हें कर, श्रम और अन्य दायित्वों का निर्वाह करना पड़ता था। अत्यधिक कराधान और बेगार के कारण उनकी स्थिति दयनीय थी। यद्यपि व्यापक किसान विद्रोहों का उल्लेख नहीं मिलता, फिर भी ग्रामीण असंतोष निरंतर विद्यमान था।

डामरों की बढ़ती शक्ति ने सामाजिक और राजनीतिक असमानताओं को और गहरा किया। वे विशाल भू-संपत्तियों और निजी सैन्य बलों के स्वामी बन गए, जबकि किसानों और निम्न वर्गों पर उनका नियंत्रण बढ़ता गया। परिणामस्वरूप सामंती व्यवस्था अधिक सुदृढ़ होती गई और केंद्रीय सत्ता अपेक्षाकृत कमजोर होती गई।

राजपरिवार की महिलाओं ने भी कुछ अवसरों पर महत्त्वपूर्ण राजनीतिक भूमिका निभाई। विशेष रूप से राजा अनंत की रानी सूर्यमती ने शासन-व्यवस्था को स्थिर बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उसने प्रशासनिक मामलों में सक्रिय हस्तक्षेप किया, धार्मिक संस्थाओं को संरक्षण दिया तथा राजनीतिक संकटों के समय राज्य को सँभालने का प्रयास किया। इससे स्पष्ट होता है कि यद्यपि समाज पितृसत्तात्मक था, फिर भी कुछ परिस्थितियों में राजपरिवार की महिलाओं को प्रभावशाली भूमिका निभाने का अवसर प्राप्त होता था।

सैन्य व्यवस्था और विदेश संबंध

लोहर राजवंश का अधिकांश इतिहास आंतरिक संघर्षों और सामंती विद्रोहों से प्रभावित रहा है। डामर सरदार बार-बार केंद्रीय सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करते थे और कर-संग्रह तथा प्रशासनिक नियंत्रण को चुनौती देते थे। इन विद्रोहों का उद्देश्य सामान्यतः राजनीतिक सिद्धांतों की स्थापना नहीं, बल्कि स्थानीय शक्ति और आर्थिक लाभ प्राप्त करना होता था।

द्वितीय लोहर काल में उत्तराधिकार संबंधी संघर्ष विशेष रूप से तीव्र थे। राजा उच्छल की हत्या, रद्दा का अल्पकालिक शासन, सल्हण और सुस्सल के बीच सत्ता-संघर्ष तथा बाद के गृहयुद्ध इस अस्थिरता के प्रमुख उदाहरण हैं। इन घटनाओं ने राजसत्ता की कमजोरी और सामंतों की बढ़ती शक्ति को उजागर किया।

सुस्सल तथा जयसिंह के शासनकाल में भी अनेक डामर विद्रोह हुए। इन विद्रोहों को दबाने के लिए सैन्य अभियानों का सहारा लिया गया, किंतु वे पूरी तरह समाप्त नहीं हो सके। लगातार संघर्षों के कारण राज्य की आर्थिक और सैन्य शक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

लोहर शासकों को समय-समय पर पश्चिमोत्तर दिशा से आने वाले तुर्क आक्रमणकारियों और सीमांत हमलावरों का सामना करना पड़ा। यद्यपि कश्मीर की भौगोलिक स्थिति—विशेषकर पीर पंजाल पर्वतमाला, दुर्गम घाटियाँ और संकरे दर्रे प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करती थी, फिर भी सीमावर्ती क्षेत्रों पर छिटपुट आक्रमण होते रहे।

कश्मीर की सुरक्षा में लोहारकोट दुर्ग जैसे किलों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। पूर्व में ये दुर्ग बाहरी आक्रमणों को रोकने में सफल रहे थे और लोहर काल में भी सीमांत रक्षा के प्रमुख केंद्र बने रहे।

जयसिंह के शासनकाल में सीमाओं की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया। सीमावर्ती किलों को सुदृढ़ किया गया तथा व्यापारिक मार्गों की रक्षा के लिए सैन्य चौकियाँ स्थापित की गईं। इसके बावजूद, निरंतर सामंती संघर्षों के कारण राज्य अपने सभी संसाधनों को सीमा सुरक्षा में नहीं लगा सका।

कश्मीर के पास झीलों और नदियों में कार्यरत एक सीमित नौसैनिक व्यवस्था भी थी, जिसका उपयोग मुख्यतः आंतरिक सुरक्षा और विद्रोहों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता था। यह व्यवस्था बाहरी आक्रमणों का सामना करने की अपेक्षा राज्य के भीतर नियंत्रण बनाए रखने में अधिक उपयोगी सिद्ध हुई।

सांस्कृतिक और धार्मिक विकास

लोहर राजवंश के शासनकाल में कश्मीर में शैव धर्म का प्रभाव बना रहा और राजाओं ने सामान्यतः शैव मठों, मंदिरों तथा धार्मिक संस्थानों को संरक्षण प्रदान किया। भूमि-अनुदानों, ग्रामों की आय तथा अन्य दानों के माध्यम से शैव आचार्यों और धार्मिक प्रतिष्ठानों का पालन-पोषण किया जाता था। इससे कश्मीर शैववाद की दार्शनिक और तांत्रिक परंपराओं की निरंतरता बनी रही।

राजवंश के संस्थापक संग्रामराज के शासनकाल में बाहरी आक्रमणों के विरुद्ध राज्य की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया। यद्यपि उनका संरक्षण प्रत्यक्ष रूप से धार्मिक नहीं था, फिर भी उनकी नीतियों ने शैव और अन्य धार्मिक संस्थाओं को सुरक्षित वातावरण प्रदान किया। बाद के शासकों ने भी मंदिरों और मठों को भूमि-अनुदान देकर धार्मिक गतिविधियों को प्रोत्साहित किया।

कश्मीर में शैव मठ केवल धार्मिक केंद्र ही नहीं थे, बल्कि शिक्षा, दर्शन और सांस्कृतिक गतिविधियों के भी प्रमुख केंद्र थे। इन संस्थानों में शैव दर्शन, तांत्रिक साधना तथा संस्कृत साहित्य का अध्ययन और संरक्षण किया जाता था। राजकीय संरक्षण के कारण अनेक शैव विद्वानों और आचार्यों को अपने विचारों के प्रसार का अवसर मिला।

किंतु राजा हर्ष का शासन इस परंपरा से भिन्न था। अपने शासन के अंतिम वर्षों में आर्थिक संकट और सैन्य आवश्यकताओं के कारण उसने अनेक मंदिरों की संपत्ति जब्त की तथा कई मंदिरों को लूटने का आदेश दिया। राजतरंगिणी में वर्णित है कि हर्ष की इन नीतियों ने ब्राह्मणों, सामंतों और धार्मिक वर्गों में व्यापक असंतोष उत्पन्न किया। अंततः यही असंतोष उसके पतन और मृत्यु का एक प्रमुख कारण बना।

हर्ष के बाद के शासकों, विशेषकर जयसिंह, ने मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं को पुनः संरक्षण प्रदान किया तथा उनकी आर्थिक व्यवस्था को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया। इस प्रकार शैव धर्म पुनः राजकीय संरक्षण प्राप्त कर सका और सामाजिक स्थिरता का एक महत्त्वपूर्ण आधार बना रहा।

मंदिर उस समय केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं थे, बल्कि वे आर्थिक और सामाजिक संस्थाएँ भी थे। उनके पास कर-मुक्त भूमि, कृषि आय और स्थानीय संसाधन होते थे, जिनके माध्यम से धार्मिक तथा सामाजिक गतिविधियों का संचालन किया जाता था।

कलात्मक और साहित्यिक उपलब्धियाँ

लोहर काल कश्मीर की कला और साहित्य के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण युग माना जाता है। इस काल में कांस्य प्रतिमा-निर्माण, पत्थर की मूर्तिकला, चित्रकला तथा संस्कृत साहित्य का उल्लेखनीय विकास हुआ।

काँस्य कला विशेष रूप से विकसित थी। विष्णु, लक्ष्मी, शिव तथा अन्य देवताओं की सुंदर काँस्य प्रतिमाएँ इस काल की उत्कृष्ट शिल्पकला का प्रमाण हैं। इन प्रतिमाओं में लंबी एवं संतुलित आकृतियाँ, सूक्ष्म अलंकरण तथा स्थानीय कश्मीरी और गांधार कला-परंपराओं का समन्वय दिखाई देता है। धातु-ढलाई की ‘लॉस्ट-वैक्स’ (मोम-ढलाई) तकनीक का प्रयोग उच्च स्तर की तकनीकी दक्षता का प्रमाण है।

चित्रकला के क्षेत्र में सचित्र पांडुलिपियों का निर्माण महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। बौद्ध और हिंदू ग्रंथों की हस्तलिखित प्रतियों में सुंदर चित्रांकन किया जाता था। इन चित्रों में धार्मिक कथाएँ, देवप्रतिमाएँ तथा सजावटी रूपांकन अंकित होते थे। रंगों के संतुलित प्रयोग और सूक्ष्म रेखांकन से उस समय के कलाकारों की दक्षता का परिचय मिलता है।

लोहर काल की सबसे महान् साहित्यिक उपलब्धि राजतरंगिणी है, जिसकी रचना इतिहासकार कल्हण ने लगभग 1148–1150 ई. के बीच की थी। संस्कृत भाषा में रचित यह ग्रंथ आठ तरंगों (खंडों) में विभाजित है और कश्मीर के राजाओं का क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत करता है।

राजतरंगिणी की विशेषता यह है कि इसमें केवल राजाओं की प्रशंसा नहीं की गई, बल्कि ऐतिहासिक घटनाओं का तुलनात्मक और आलोचनात्मक दृष्टिकोण से वर्णन किया गया है। कल्हण ने उपलब्ध अभिलेखों, परंपराओं, वंशावलियों और पूर्ववर्ती ग्रंथों का उपयोग करके कश्मीर का इतिहास लिखने का प्रयास किया। इसी कारण इसे भारतीय इतिहास-लेखन की महान कृतियों में गिना जाता है।

कला और साहित्य के संरक्षण के बावजूद लोहर काल के उत्तरार्ध में राजनीतिक अस्थिरता और सामंती संघर्षों का प्रभाव सांस्कृतिक गतिविधियों पर भी पड़ा। आर्थिक संसाधनों की कमी और निरंतर विद्रोहों के कारण कला के क्षेत्र में नवाचार अपेक्षाकृत सीमित रहे। फिर भी, इस काल की काँस्य प्रतिमाएँ, सचित्र पांडुलिपियाँ और राजतरंगिणी जैसी कृतियाँ कश्मीर की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा की अमूल्य थाती हैं।

इस प्रकार लोहर (लोहर)  राजवंश का पतन राजनीतिक विखंडन और सामंती संघर्षों के कारण हुआ, किंतु उसकी सांस्कृतिक, धार्मिक और बौद्धिक विरासत अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस काल में कश्मीर शैव दर्शन, संस्कृत साहित्य, मंदिर संस्कृति और कला का उल्लेखनीय विकास हुआ। विशेष रूप से राजतरंगिणी जैसी महान् ऐतिहासिक कृति तथा शैव दर्शन की समृद्ध परंपरा लोहर युग की अमूल्य देन हैं। कांस्य प्रतिमाएँ, मंदिर स्थापत्य, धार्मिक साहित्य और दार्शनिक ग्रंथ इस युग की सांस्कृतिक उपलब्धियों के प्रमाण हैं।

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