ब्रिटिश सत्ता का विस्तार (Expansion of British Power, 1772–1857)

ब्रिटिश सत्ता का विस्तार (Expansion of British Power, 1772–1857)

ब्रिटिश सत्ता का भारत में विस्तार 18वीं सदी के मध्य से 19वीं सदी के मध्य तक एक सुनियोजित, आक्रामक और कूटनीतिक प्रक्रिया थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने शुरू में व्यापारिक उद्देश्यों के लिए भारत में प्रवेश किया, लेकिन धीरे-धीरे सैन्य शक्ति, कूटनीति, सहायक संधि प्रथा और राज्य विलय के सिद्धांत जैसे उपायों के माध्यम से पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। इस प्रक्रिया में वारेन हेस्टिंग्स (1772-1785), कॉर्नवालिस (1786-1793), वेलेजली (1798-1805), हेस्टिंग्स (1813-1823) और डलहौजी (1848-1856) जैसे गवर्नर-जनरलों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटिश सत्ता का विस्तार न केवल क्षेत्रीय था, बल्कि आर्थिक और प्रशासनिक नियंत्रण भी स्थापित किया गया, जिसने भारत को ब्रिटेन का आर्थिक उपनिवेश बना दिया। इस प्रक्रिया ने भारतीय शासकों की स्वतंत्रता छीन ली और जनता में गरीबी, असंतोष और दमन को बढ़ावा दिया, जिसने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि तैयार की

ब्रिटिश सत्ता का प्रारंभिक सुदृढ़ीकरण (1772 तक)

Table of Contents

प्लासी और बक्सर की जीत

1757 ई. में प्लासी की लड़ाई और 1764 ई. में बक्सर की लड़ाई ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा में एक प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित किया। प्लासी की जीत ने कंपनी को बंगाल की दीवानी (राजस्व संग्रह का अधिकार) प्रदान की, जिससे उसकी आर्थिक और राजनीतिक शक्ति में वृद्धि हुई। बक्सर की जीत ने कंपनी को मुगल सम्राट और अवध के नवाब पर अपनी प्रभुता स्थापित करने का अवसर दिया।

विस्तारवादी नीतियाँ

कंपनी के इंग्लैंड में बैठे निदेशक और भारत में इसके अधिकारी बंगाल को अपनी शक्ति का केंद्र बनाना चाहते थे। उनकी नीतियाँ भारतीय शासकों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप और धन-लालच पर आधारित थीं। इस लालच ने कंपनी को विभिन्न क्षेत्रों में युद्धों में उलझने के लिए प्रेरित किया।

फूट डालो और राज करो

कंपनी ने भारतीय शासकों के बीच मतभेदों का लाभ उठाकर अपनी स्थिति को मजबूत किया। इस नीति ने मराठों, मैसूर और अन्य शक्तियों को एकजुट होने से रोका और ब्रिटिश सत्ता के विस्तार की नींव रखी। इस नींव को वारेन हेस्टिंग्स ने अपने कार्यकाल में और सुदृढ़ किया।

वारेन हेस्टिंग्स का कार्यकाल (1772-1785)

प्रारंभिक चुनौतियाँ और कूटनीति
नियुक्ति और परिस्थितियाँ

1772 ई. में वारेन हेस्टिंग्स भारत के पहले गवर्नर-जनरल बने। उनके कार्यकाल में कंपनी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिनमें मराठों, मैसूर और हैदराबाद के शक्तिशाली गठजोड़ के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर फ्रांस की प्रतिस्पर्धा और 1776 ई. में शुरू हुआ अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम शामिल था। इन वैश्विक और स्थानीय चुनौतियों ने अंग्रेजों की स्थिति को जटिल बना दिया था।

हेस्टिंग्स का नेतृत्व

हेस्टिंग्स ने जोशीले और अनुभवी नेतृत्व के साथ इन चुनौतियों का सामना किया। उनकी कूटनीति और दृढ़ता ने कंपनी को मराठों, मैसूर और फ्रांसीसियों के संयुक्त विरोध से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने भारतीय शासकों के बीच फूट डालने की नीति को प्रभावी ढंग से लागू किया।

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782)

उस समय मराठा साम्राज्य में आंतरिक संघर्ष चल रहा था। बालक पेशवा माधवराव द्वितीय और उनके समर्थक नाना फड़नवीस एक पक्ष में थे, जबकि रघुनाथ राव, जो पेशवा पद का दावेदार था, दूसरे पक्ष में था। बंबई के ब्रिटिश अधिकारियों ने रघुनाथ राव का समर्थन करने का निर्णय लिया, यह सोचकर कि इससे उन्हें बंगाल और मद्रास की तरह क्षेत्रीय और आर्थिक लाभ प्राप्त होगा।

युद्ध का प्रारंभ

इस हस्तक्षेप ने 1775 ई. में प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध को जन्म दिया। मराठा सरदार नाना फड़नवीस के नेतृत्व में एकजुट हो गए, जिससे ब्रिटिश सेना को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यह युद्ध 1782 ई. तक चला और ब्रिटिश शक्ति के लिए एक कठिन अवधि थी।

सालबाई की संधि (1782)

युद्ध में कोई पक्ष निर्णायक रूप से विजयी नहीं हुआ। 1782 ई. में सालबाई की संधि के तहत यथास्थिति बनाए रखने का निर्णय लिया गया। इस संधि ने अंग्रेजों को मराठों के साथ 20 वर्षों तक शांति बनाए रखने का अवसर प्रदान किया, जिसका उपयोग उन्होंने बंगाल प्रेसीडेंसी को मजबूत करने में किया।

इस युद्ध ने अंग्रेजों को मराठों की शक्ति का सामना करने से बचाया। मराठों ने संधि के तहत हैदर अली से अपनी खोई जमीन वापस लेने में अंग्रेजों की सहायता करने का वादा किया, जिससे ब्रिटिश कूटनीति को और बल मिला। इस बीच मराठा सरदार आपसी झगड़ों में अपनी शक्ति बर्बाद करते रहे।

मैसूर के साथ संघर्ष
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1766-1769)

1766 ई. में अंग्रेजों ने हैदराबाद के निजाम के साथ मिलकर मैसूर के हैदर अली पर हमला किया। हालांकि, हैदर अली ने अपनी सैन्य कुशलता से अंग्रेजों को पराजित किया और मद्रास काउंसिल को अपनी शर्तों पर शांति संधि के लिए मजबूर कर दिया।

द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-1784)

1780 ई. में हैदर अली ने पुनः अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध शुरू किया। उसने कर्नाटक में अंग्रेजी सेनाओं को बार-बार हराया और लगभग पूरे कर्नाटक पर कब्जा कर लिया। इस संकट में हेस्टिंग्स ने अपनी कूटनीति का उपयोग किया। उन्होंने निजाम को गुंटूर का जिला देकर ब्रिटिश-विरोधी गठजोड़ से अलग कर लिया और 1781-82 ई. में मराठों के साथ शांति समझौता कर लिया, जिससे उनकी सेना का एक बड़ा हिस्सा मैसूर युद्ध के लिए मुक्त हो गया।

पोर्टोनोवो का युद्ध (1781)

जुलाई 1781 ई. में सर आयर कूट की कमान में ब्रिटिश सेना ने पोर्टोनोवो के युद्ध में हैदर अली को हराकर मद्रास की रक्षा की। दिसंबर 1782 ई. में हैदर अली की मृत्यु के बाद उनके पुत्र टीपू सुल्तान ने युद्ध जारी रखा।

मंगलौर की संधि (1784)

चूँकि कोई भी पक्ष दूसरे को पूरी तरह हरा पाने की स्थिति में नहीं था, मार्च 1784 ई. में मंगलौर की संधि हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने जीते हुए क्षेत्र एक-दूसरे को लौटा दिए।

यह युद्ध दर्शाता है कि अंग्रेज अभी मराठों या मैसूर को पूरी तरह पराजित करने में सक्षम नहीं थे, लेकिन उनकी कूटनीति और सैन्य शक्ति ने उन्हें भारत में अपनी स्थिति बनाए रखने की क्षमता प्रदान की।

हेस्टिंग्स की कूटनीति का प्रभाव

हेस्टिंग्स की “फूट डालो और राज करो” की नीति ने मराठों, मैसूर और फ्रांसीसियों के संयुक्त विरोध को विफल किया। उनकी कुशल कूटनीति और दृढ़ता ने कंपनी की स्थिति को सुदृढ़ किया और ब्रिटिश सत्ता के विस्तार के लिए मजबूत आधार तैयार किया।

कॉर्नवालिस का कार्यकाल (1786-1793)

तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1789-1792)

मंगलौर की संधि (1784) ने अंग्रेजों और टीपू सुल्तान के बीच तनाव को केवल स्थगित किया था, समाप्त नहीं किया। टीपू सुल्तान अंग्रेजों को दक्षिण भारत से खदेड़ना चाहता था, जबकि ईस्ट इंडिया कंपनी उसे अपने सबसे बड़े शत्रु के रूप में देखती थी। टीपू की स्वतंत्रता की इच्छा और अंग्रेजों की विस्तारवादी नीतियों ने दोनों के बीच टकराव को अनिवार्य बना दिया।

युद्ध का प्रारंभ

1789 ई. में तनाव फिर से भड़क उठा और तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध शुरू हुआ। अंग्रेजों ने मराठों और हैदराबाद के निजाम के साथ गठजोड़ किया, जिसने टीपू की स्थिति को कमजोर किया।

श्रीरंगपट्टनम की संधि (1792)

युद्ध में टीपू की हार हुई। 1792 ई. में श्रीरंगपट्टनम की संधि के तहत टीपू को अपनी आधी रियासत और 330 लाख रुपये हर्जाना देना पड़ा। इस संधि ने मैसूर की शक्ति को कमजोर किया और दक्षिण भारत में ब्रिटिश सत्ता को मजबूत किया।

इस युद्ध ने अंग्रेजों को दक्षिण भारत में अपनी स्थिति को और सुदृढ़ करने का अवसर प्रदान किया। टीपू की शक्ति कमजोर होने से अंग्रेजों को अन्य क्षेत्रों में विस्तार के लिए मार्ग प्रशस्त हुआ।

प्रशासनिक सुधार

स्थायी बंदोबस्त: कॉर्नवालिस ने बंगाल में स्थायी बंदोबस्त लागू किया, जिसके तहत जमींदारों से स्थायी रूप से राजस्व निर्धारित किया गया। इस सुधार ने कंपनी के आर्थिक आधार को मजबूत किया और ब्रिटिश सत्ता के विस्तार के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए।

प्रशासनिक सुधार

कॉर्नवालिस ने प्रशासन को सुव्यवस्थित करने के लिए कई कदम उठाए, जैसे भ्रष्टाचार को कम करना और ब्रिटिश अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ाना। इन सुधारों ने कंपनी के शासन को और प्रभावी बनाया।

लॉर्ड वेलेजली का कार्यकाल (1798-1805)

सहायक संधि प्रथा

लॉर्ड वेलेजली ने 1798 ई. में भारत में गवर्नर-जनरल का पद संभाला, जब ब्रिटेन वैश्विक स्तर पर फ्रांस के साथ युद्ध में उलझा था। वेलेजली ने सहायक संधि प्रथा को एक औपचारिक नीति के रूप में विकसित किया, जिसके तहत भारतीय शासकों को:

ब्रिटिश सेना अपने राज्य में रखनी पड़ती थी और इसके रखरखाव के लिए अनुदान देना पड़ता था। यह अनुदान कभी-कभी नकद के बजाय राज्य के किसी हिस्से के रूप में लिया जाता था। अपने दरबार में एक ब्रिटिश रेजीडेंट नियुक्त करना पड़ता था, जो शासक के प्रशासन में हस्तक्षेप करता था। बिना ब्रिटिश अनुमति के किसी अन्य यूरोपीय शक्ति या भारतीय शासक से संबंध स्थापित नहीं कर सकते थे। बदले में, अंग्रेज उनकी बाहरी और आंतरिक सुरक्षा का वादा करते थे, लेकिन यह वादा अक्सर केवल औपचारिक होता था।

सहायक संधि ने भारतीय शासकों की स्वतंत्रता को लगभग समाप्त कर दिया। वे आत्मरक्षा, कूटनीतिक संबंध और विदेशी विशेषज्ञों को नियुक्त करने की अपनी क्षमता खो बैठे। ब्रिटिश रेजीडेंट के हस्तक्षेप ने उनकी प्रभुता को और कमजोर किया।

सहायक सेना का खर्च शासकों की क्षमता से अधिक था, जिससे उनकी अर्थव्यवस्था बिगड़ गई। उनकी अपनी सेनाएँ भंग कर दी गईं, जिससे लाखों सैनिक और अधिकारी बेरोजगार हो गए, और जनता में गरीबी और बदहाली बढ़ी। शासकों ने जनता के हितों की अनदेखी शुरू कर दी, क्योंकि उनकी सुरक्षा अब अंग्रेजों पर निर्भर थी।

सहायक संधि ने अंग्रेजों को भारतीय राज्यों के खर्च पर एक बड़ी सेना रखने, उनके विदेशी और आंतरिक मामलों पर नियंत्रण स्थापित करने, और जब चाहे राज्य को हड़पने का अवसर प्रदान किया। एक ब्रिटिश लेखक ने इसे “सहयोगियों को बकरों की तरह मोटा करने और फिर जिबह करने” की नीति कहा।

हैदराबाद और अवध
हैदराबाद (1798, 1800)

हैदराबाद के निजाम ने 1798 और 1800 ई. में सहायक संधियाँ स्वीकार कीं। सहायक सेना के खर्च के बदले में उन्होंने अपने राज्य का एक हिस्सा अंग्रेजों को दे दिया।

अवध (1801)

अवध के नवाब को सहायक संधि के लिए मजबूर किया गया। इसके तहत उन्हें रुहेलखंड और गंगा-यमुना दोआब सहित लगभग आधा राज्य अंग्रेजों को देना पड़ा। उनकी अपनी सेना भंग कर दी गई, और अंग्रेजों को उनके राज्य में कहीं भी सेना तैनात करने का अधिकार मिला।

मैसूर और टीपू सुल्तान
टीपू का प्रतिरोध

टीपू सुल्तान ने सहायक संधि स्वीकार करने से इनकार कर दिया। 1792 ई. में श्रीरंगपट्टनम की संधि में अपनी आधी रियासत गँवाने के बाद भी उन्होंने अपनी सेना को मजबूत किया और फ्रांस, अफगानिस्तान, अरब और तुर्की के साथ ब्रिटिश-विरोधी गठजोड़ बनाने की कोशिश की।

श्रीरंगपट्टनम युद्ध (1799)

1799 ई. में अंग्रेजों ने टीपू पर हमला किया। एक संक्षिप्त लेकिन भयानक युद्ध के बाद फ्रांसीसी सहायता पहुँचने से पहले ही टीपू को पराजित कर मार डाला गया। टीपू ने अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की और अंत तक आत्मसमर्पण से इनकार किया।

मैसूर का विभाजन

टीपू के राज्य का आधा हिस्सा अंग्रेजों और उनके सहयोगी निजाम के बीच बाँट लिया गया। शेष हिस्सा पुराने राजवंश को लौटा दिया गया, जिसे एक विशेष सहायक संधि के तहत पूर्ण रूप से कंपनी पर आश्रित बनाया गया। इस संधि के तहत गवर्नर-जनरल को आवश्यकता पड़ने पर राज्य का शासन स्वयं संभालने का अधिकार था।

कर्नाटक, तंजौर और सूरत
कर्नाटक (1801)

वेलेजली ने कर्नाटक के नवाब को पेंशन देकर उनका राज्य हड़प लिया और इसे मैसूर से छीने गए मालाबार क्षेत्र सहित मद्रास प्रेसीडेंसी में मिला लिया। यह प्रेसीडेंसी 1947 तक कायम रही।

तंजौर और सूरत

तंजौर और सूरत के शासकों को पेंशन देकर उनके क्षेत्र अधिग्रहित कर लिए गए। इन क्षेत्रों को भी ब्रिटिश प्रशासन के अंतर्गत शामिल किया गया।

द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-1805)

इस समय मराठा साम्राज्य पाँच प्रमुख सरदारों—पेशवा (पूना), गायकवाड़ (बड़ौदा), सिंधिया (ग्वालियर), होल्कर (इंदौर) और भोसले (नागपुर) का एक महासंघ था। ये सरदार आपसी झगड़ों में उलझे थे और ब्रिटिश खतरे की अनदेखी कर रहे थे।

बसई की संधि (1802)

1802 ई. में होल्कर ने पेशवा बाजीराव द्वितीय और सिंधिया की संयुक्त सेना को हराया। डरकर बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेजों की शरण ली और 31 दिसंबर 1802 को बसई की संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसने उन्हें ब्रिटिश अधीनता स्वीकार करने के लिए मजबूर किया।

युद्ध का प्रारंभ

मराठा सरदारों की एकजुटता की कमी का लाभ उठाकर वेलेजली ने युद्ध शुरू किया। दक्षिण में आर्थर वेलेजली ने सितंबर 1803 में असाय और नवंबर में अरगाँव में सिंधिया और भोसले की संयुक्त सेना को हराया। उत्तर में लॉर्ड लेक ने नवंबर 1803 में लसवाड़ी में सिंधिया की सेना को पराजित किया और अलीगढ़, दिल्ली और आगरा पर कब्जा कर लिया। दिल्ली में मुगल सम्राट को पेंशन देकर ब्रिटिश संरक्षण में रखा गया।

मराठा सरदारों की हार

सिंधिया और भोसले को सहायक संधियाँ स्वीकार करनी पड़ीं। उन्होंने अपने राज्यों के कुछ हिस्से अंग्रेजों को दे दिए, ब्रिटिश रेजीडेंट को अपने दरबार में रखा और बिना ब्रिटिश अनुमति के यूरोपीयों को सेवा में न रखने का वचन दिया। उड़ीसा का समुद्र तट और गंगा-यमुना दोआब अब पूर्ण रूप से ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया।

होल्कर का प्रतिरोध

यशवंतराव होल्कर ने अंत तक अंग्रेजों का विरोध किया। लॉर्ड लेक ने उनके किलों को तोड़ने की असफल कोशिश की और होल्कर ने भरतपुर के राजा के साथ मिलकर ब्रिटिश सेना को नुकसान पहुँचाया। हालाँकि, 1806 ई. में राजघाट की संधि के तहत होल्कर के साथ शांति स्थापित हुई, और उनके राज्य का एक बड़ा हिस्सा लौटा दिया गया।

इस युद्ध ने मराठा शक्ति को कमजोर किया और ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत की सबसे बड़ी शक्ति बनाया। पेशवा ब्रिटिश कठपुतली बन गया और कंपनी का क्षेत्रीय और राजनीतिक प्रभाव बढ़ गया।

वेलेजली की नीति का मूल्यांकन

वेलेजली की आक्रामक नीतियों ने कंपनी को भारत की सबसे बड़ी शक्ति बनाया। सहायक संधि, युद्ध और क्षेत्रों के अधिग्रहण के माध्यम से अंग्रेजों ने हैदराबाद, अवध, मैसूर, कर्नाटक, तंजौर, सूरत और मराठा क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित किया।

युद्धों की लागत ने कंपनी का कर्ज बढ़ा दिया, जो 1797 में 170 लाख पाउंड से 1806 में 310 लाख पाउंड हो गया। शेयरधारकों की चिंताओं और नेपोलियन के बढ़ते खतरे के कारण वेलेजली को वापस बुलाया गया।

वेलेजली की नीतियों ने ब्रिटिश सत्ता के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया, जिसने बाद के गवर्नर-जनरलों को और विस्तार करने का अवसर प्रदान किया। 1805 में एक ब्रिटिश अधिकारी हेनरी रोबरवला ने लिखा कि प्रत्येक अंग्रेज भारत में विजेता की तरह व्यवहार करता है और स्थानीय लोगों को श्रेष्ठता की भावना के साथ देखता है।

लॉर्ड हेस्टिंग्स का कार्यकाल (1813-1823)

तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-1818)

द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध ने मराठा सरदारों की शक्ति को कमजोर किया था, लेकिन उनका साहस अभी बाकी था। ब्रिटिश रेजीडेंट्स के कठोर नियंत्रण से तंग आकर मराठा सरदारों ने अपनी स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने का प्रयास किया। पेशवा बाजीराव द्वितीय ने नवंबर 1817 में पूना में ब्रिटिश रेजीडेंट पर हमला किया। अप्पा साहब भोसले ने नागपुर की रेजीडेंसी पर हमला किया, और माधवराव होल्कर ने युद्ध की तैयारी शुरू की।

ब्रिटिश जवाबी कार्रवाई

गवर्नर-जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए तत्काल और कठोर कार्रवाई की। उन्होंने सिंधिया को ब्रिटिश अधीनता स्वीकार करने के लिए मजबूर किया। पेशवा, भोसले और होल्कर की सेनाओं को पराजित किया गया।

पेशवा बाजीराव द्वितीय को गद्दी से हटाकर कानपुर के पास बिठूर में पेंशन दी गई। उनका राज्य हड़पकर बंबई प्रेसीडेंसी में मिला लिया गया। होल्कर और भोसले ने सहायक संधियाँ स्वीकार कीं, जिससे उनकी स्वतंत्रता समाप्त हो गई। मराठा गौरव को बनाए रखने के लिए सतारा में एक छोटा राज्य बनाया गया, जो छत्रपति शिवाजी के वंशज को दिया गया, लेकिन यह पूर्ण रूप से ब्रिटिश नियंत्रण में था।

राजपूताना की अधीनत

 मराठों के पतन के बाद राजपूताना के राज्य, जो पहले सिंधिया और होल्कर के अधीन थे, अपनी स्वतंत्रता का दावा करने में असमर्थ रहे। उन्होंने तत्काल ब्रिटिश अधीनता स्वीकार कर ली, जिससे उनकी स्वायत्तता समाप्त हो गई।

1818 ई. तक पंजाब और सिंध को छोड़कर पूरा भारतीय उपमहाद्वीप ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया। कुछ क्षेत्रों पर कंपनी का प्रत्यक्ष शासन था, जबकि अन्य पर सहायक संधियों के माध्यम से अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित किया गया। भारतीय शासकों की सेनाएँ भंग कर दी गईं, और उनके आंतरिक मामलों में ब्रिटिश रेजीडेंट्स का हस्तक्षेप बढ़ गया।

सिंध और पंजाब की विजय (1839-1849)
सिंध की विजय (1843)

1830 के दशक में यूरोप और एशिया में ब्रिटेन और रूस के बीच शत्रुता बढ़ रही थी। अंग्रेजों को डर था कि रूस अफगानिस्तान या फारस के रास्ते भारत पर हमला कर सकता है। इस भय के साथ-साथ सिंध नदी के व्यापारिक उपयोग की संभावनाएँ भी ब्रिटिश लालच का कारण थीं।

1832 ई. में एक संधि के द्वारा सिंध की सड़कों और नदियों को ब्रिटिश व्यापार के लिए खोल दिया गया। 1839 ई. में सिंध के अमीरों (सरदारों) से सहायक संधि पर हस्ताक्षर कराए गए।

अधिग्रहण

1843 ई. में सर चार्ल्स नेपियर ने एक संक्षिप्त सैन्य अभियान के बाद सिंध पर कब्जा कर लिया। नेपियर ने इसे “लाभदायक बदमाशी” कहा और इसके लिए उन्हें 7 लाख रुपये का पुरस्कार मिला। इस अधिग्रहण को अंग्रेजों ने अपने वादों को तोड़कर किया, जिसमें उन्होंने पहले कहा था कि सिंध के राज्यों को कोई नुकसान नहीं होगा।

सिंध की विजय ने ब्रिटिश साम्राज्य को उत्तर-पश्चिम भारत में एक रणनीतिक आधार प्रदान किया और रूस के खिलाफ उनकी स्थिति को मजबूत किया।

पंजाब की विजय (1845-1849)

महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु (1839) के बाद पंजाब में राजनीतिक अस्थिरता फैल गई। स्वार्थी और भ्रष्ट नेताओं का बोलबाला हो गया, और सत्ता सिख सेना के हाथों में आ गई, जो अनुशासनहीन लेकिन देशभक्त थी। अंग्रेजों ने 1809 ई. में रणजीत सिंह के साथ मित्रता की संधि की थी, लेकिन उनकी युद्धोन्मादी नीतियों और साजिशों ने सिख सेना को भड़का दिया।

प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध (1845-1846)

1845 में सिख सेना को यह विश्वास हो गया कि अंग्रेज पंजाब पर कब्जा करने की योजना बना रहे हैं, क्योंकि उन्होंने फिरोजपुर में नावें, बैरकें, और अतिरिक्त सैन्य टुकड़ियाँ तैनात की थीं। दिसंबर 1845 में सिख सेना ने जवाबी कार्रवाई शुरू की, जिससे युद्ध छिड़ गया। सिख सेना ने बहादुरी से लड़ाई लड़ी, लेकिन उनके नेताओं, जैसे राजा लाल सिंह और मिस्सर तेज सिंह, की गद्दारी के कारण हार गई।

लाहौर की संधि (1846)

8 मार्च 1846 को लाहौर की संधि के तहत अंग्रेजों ने जालंधर दोआब हड़प लिया, 50 लाख रुपये नकद लिए, और जम्मू-कश्मीर को राजा गुलाब सिंह डोगरा को सौंप दिया। पंजाब की सेना को 20,000 पैदल और 12,000 घुड़सवार तक सीमित कर दिया गया। लाहौर में एक भारी ब्रिटिश सेना तैनात की गई, और 16 दिसंबर 1846 को एक और समझौते ने ब्रिटिश रेजीडेंट को पंजाब के सभी मामलों में पूर्ण अधिकार दे दिया। पंजाब वास्तव में एक अधीन राज्य बन गया।

द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध (1848-1849)

1848 में पंजाब में स्वतंत्रता-प्रेमी नेताओं, जैसे मुल्तान के मूलराज और छतर सिंह अटारीवाला, ने विद्रोह शुरू किया। लॉर्ड डलहौजी ने इस अवसर का लाभ उठाकर 1849 में पंजाब को पूर्ण रूप से हड़प लिया।

पंजाब की विजय ने भारत के अंतिम स्वतंत्र राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। यह ब्रिटिश सत्ता के विस्तार का एक महत्वपूर्ण चरण था।

डलहौजी की अधिग्रहण नीति (1848-1856)

राज्य विलय का सिद्धांत (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स)

लॉर्ड डलहौजी 1848 ई. में गवर्नर-जनरल बनकर भारत आए। उनकी नीति का उद्देश्य अधिक से अधिक क्षेत्रों पर प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन स्थापित करना और भारत को ब्रिटेन के लिए एक निर्यात बाजार बनाना था। डलहौजी का मानना था कि भारतीय शासक अक्षम हैं और उनके शासन के कारण ब्रिटेन का निर्यात प्रभावित हो रहा है।

सिद्धांत का स्वरूप

डलहौजी ने राज्य विलय का सिद्धांत (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स) लागू किया, जिसके तहत यदि कोई सहायक राज्य का शासक बिना स्वाभाविक उत्तराधिकारी के मर जाता था, तो उसका राज्य दत्तक पुत्र को न देकर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया जाता था। यह सिद्धांत भारतीय परंपरा के खिलाफ था, जिसमें दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी मान्यता दी जाती थी।

अधिग्रहण

इस सिद्धांत के तहत सतारा (1848), नागपुर (1854), और झाँसी (1854) जैसे राज्यों को हड़प लिया गया। इन राज्यों के शासकों के दत्तक उत्तराधिकारियों को मान्यता देने से इनकार किया गया।

अन्य अधिग्रहण
पेंशन और उपाधियों का अंत

डलहौजी ने कई पूर्व शासकों की पेंशन और उपाधियाँ छीन लीं। कर्नाटक, तंजौर और सूरत के नवाबों/राजाओं की उपाधियाँ समाप्त कर दी गईं। भूतपूर्व पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब को भी पेंशन देने से इनकार किया गया।

बरार का अधिग्रहण (1853)

डलहौजी ने हैदराबाद के निजाम से बरार को हड़प लिया, जो कपास उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण था। यह अधिग्रहण ब्रिटेन की कच्चे कपास की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए किया गया।

अवध का अधिग्रहण (1856)

अवध के नवाब वाजिद अली शाह पर कुप्रशासन का आरोप लगाकर डलहौजी ने 1856 में अवध को हड़प लिया। यह अधिग्रहण कई कारणों से जटिल था:

अवध के नवाब बक्सर की लड़ाई (1764) से ही अंग्रेजों के वफादार सहयोगी रहे थे। उनके कई स्वाभाविक उत्तराधिकारी थे, इसलिए राज्य विलय का सिद्धांत लागू नहीं हो सकता था।

डलहौजी ने कुप्रशासन और जनता की दशा सुधारने के बहाने अवध को हड़प लिया। वास्तव में, अवध की बेपनाह दौलत और मैनचेस्टर के माल के लिए उसका बड़ा बाजार ब्रिटिश लालच का मुख्य कारण था।

अवध के पतन के लिए अंग्रेज स्वयं जिम्मेदार थे, क्योंकि 1801 से वे सहायक संधि के माध्यम से अवध पर नियंत्रण रखते थे और परोक्ष रूप से शासन कर रहे थे।

ब्रिटिश सर्वोच्चता

डलहौजी की नीतियों ने ब्रिटिश साम्राज्य को भारत में सर्वोच्च शक्ति बनाया। अधिकांश भारतीय राज्य या तो प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन के अधीन आ गए या सहायक संधियों के माध्यम से पूर्ण रूप से नियंत्रित हो गए।

असंतोष का उदय

राज्य विलय और पेंशन समाप्ति की नीतियों ने भारतीय शासकों, सैनिकों और जनता में गहरा असंतोष पैदा किया। इन नीतियों को भारतीय परंपराओं और हितों के खिलाफ माना गया, जिसने 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार की।

आर्थिक शोषण

डलहौजी की नीतियों ने भारत को ब्रिटेन के लिए कच्चे माल का स्रोत और निर्मित माल का बाजार बना दिया। बरार और अवध जैसे क्षेत्रों का अधिग्रहण ब्रिटिश औद्योगिक हितों को पूरा करने के लिए किया गया।

ब्रिटिश शासन का सुदृढ़ीकरण (1818-1857)

नियंत्रण की व्यवस्था

1818 से 1857 तक अंग्रेजों ने अपने शासन को सुदृढ़ करने पर ध्यान केंद्रित किया। सहायक राज्यों को ब्रिटिश रेजीडेंट्स के माध्यम से नियंत्रित किया गया और उनकी स्वायत्तता केवल नाममात्र की रह गई। इन राज्यों की सेनाएँ भंग कर दी गईं और उनके आंतरिक मामलों में ब्रिटिश हस्तक्षेप बढ़ गया।

सहायक संधियों का प्रभाव

सहायक संधियों ने भारतीय राज्यों को आर्थिक और सैन्य रूप से कमजोर कर दिया। शासकों को भारी अनुदान देना पड़ता था, जिससे उनकी अर्थव्यवस्था चरमरा गई। उनकी सेनाएँ भंग होने से लाखों लोग बेरोजगार हो गए और जनता में गरीबी और असंतोष बढ़ा।

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष शासन

 कुछ क्षेत्रों, जैसे बंगाल, मद्रास, और बंबई प्रेसीडेंसी पर कंपनी का प्रत्यक्ष शासन था। अन्य क्षेत्रों, जैसे हैदराबाद, अवध (1856 तक) और मराठा रियासतें पर सहायक संधियों के माध्यम से अप्रत्यक्ष नियंत्रण था। लेकिन यह नियंत्रण भी ब्रिटिश सुविधा के लिए था, न कि जनता के हित के लिए।

प्रशासनिक सुधार

 इस अवधि में अंग्रेजों ने प्रशासनिक सुधारों को लागू किया, जैसे स्थायी बंदोबस्त और न्यायिक सुधार, जो उनके शासन को और मजबूत करने के लिए थे। इन सुधारों ने ब्रिटिश आर्थिक हितों को प्राथमिकता दी, जबकि भारतीय जनता को लाभ कम ही मिला।

ब्रिटिश विस्तार की रणनीति और प्रभाव

रणनीति: ब्रिटिश सत्ता के विस्तार की सफलता उनकी “फूट डालो और राज करो” की नीति, सैन्य शक्ति और कूटनीति पर आधारित थी। सहायक संधि और राज्य विलय जैसे उपायों ने भारतीय शासकों को कमजोर किया और उनकी स्वतंत्रता छीन ली। अंग्रेजों ने भारतीय शासकों के बीच एकता को रोकने के लिए उनके आपसी मतभेदों का लाभ उठाया और उन्हें एक-एक करके अधीन किया।

आर्थिक शोषण : इस विस्तार ने भारत को ब्रिटेन के लिए एक आर्थिक उपनिवेश बना दिया। भारत से कच्चे माल, जैसे कपास का निर्यात और ब्रिटेन से निर्मित माल, जैसे कपड़ा का आयात ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को लाभ पहुँचाता था। भारतीय अर्थव्यवस्था को कमजोर करने वाली नीतियों, जैसे भारी कर और सेनाओं का विघटन ने जनता में गरीबी और असंतोष को बढ़ाया।

सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव : ब्रिटिश नीतियों ने भारतीय शासकों और जनता के बीच असंतोष को जन्म दिया। सहायक संधियों और राज्य विलय ने शासकों की प्रभुता को समाप्त किया, जबकि जनता को आर्थिक संकट और बेरोजगारी का सामना करना पड़ा। यह असंतोष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रमुख कारण बना।

ब्रिटिश सर्वोच्चता: 1772 से 1857 तक, वारेन हेस्टिंग्स से लेकर डलहौजी तक ब्रिटिश सत्ता का विस्तार एक सुनियोजित प्रक्रिया थी। 1818 तक पंजाब और सिंध को छोड़कर पूरा भारत ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया। 1857 तक इन क्षेत्रों को भी हड़प लिया गया, जिससे ब्रिटिश साम्राज्य भारत में सर्वोच्च शक्ति बन गया।

ब्रिटिश सत्ता का विस्तार एक जटिल और बहुआयामी प्रक्रिया थी, जिसमें सैन्य विजय, कूटनीति और प्रशासनिक नीतियों का उपयोग किया गया। वारेन हेस्टिंग्स ने अपनी कूटनीति से ब्रिटिश सत्ता की नींव मजबूत की, कॉर्नवालिस ने मैसूर को कमजोर कर दक्षिण भारत में विस्तार किया, वेलेजली ने सहायक संधि और युद्धों के माध्यम से आक्रामक विस्तार किया, हेस्टिंग्स ने मराठा शक्ति का अंत किया और डलहौजी ने राज्य विलय के सिद्धांत के माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्य को चरम पर पहुँचाया। इस विस्तार ने भारतीय समाज में गहरा असंतोष पैदा किया, जिसके परिणामस्वरूप 1857 का विद्रोह हुआ। यह विद्रोह ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीयों के पहले संगठित प्रतिरोध का प्रतीक बना।

error: Content is protected !!
Scroll to Top