पूर्वी गंग राजवंश
पूर्वी गंग राजवंश ओडिशा तथा उत्तरी आंध्र प्रदेश के इतिहास का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण राजवंश था। इसे पूर्व गंग, पूर्वी गंग तथा प्राच्य गंग आदि नामों से भी जाना जाता है। कर्नाटक में शासन करने वाले पश्चिमी गंग राजवंश से अलग पहचान के लिए इसे पूर्वी गंग राजवंश कहा जाता है। इसकी प्रारंभिक राजनीतिक उपस्थिति लगभग पाँचवीं–छठी शताब्दी ईस्वी में कलिंग क्षेत्र में दिखाई देती है, जबकि ग्यारहवीं से पंद्रहवीं शताब्दी के मध्य इस वंश ने एक शक्तिशाली क्षेत्रीय सत्ता का रूप धारण किया।
पूर्वी गंगों की सत्ता का मुख्य आधार कलिंग था। विभिन्न कालों में उनका प्रभाव वर्तमान ओडिशा, उत्तरी आंध्र प्रदेश तथा आसपास के कुछ क्षेत्रों तक विस्तृत रहा। यद्यपि उनके राजनीतिक प्रभाव की सीमा समय के साथ बदलती रही, फिर भी लंबे समय तक उन्होंने पूर्वी भारत के राजनीतिक इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका महत्त्व केवल राजनीतिक विस्तार तक सीमित नहीं था। उन्होंने मंदिर स्थापत्य, मूर्तिकला, धार्मिक संस्थाओं, प्रशासन, व्यापार और ओडिशा की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के विकास में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। पूर्वी गंगों के इतिहास को सामान्यतः दो व्यापक चरणों में देखा जाता है : प्रारंभिक पूर्वी गंग काल तथा साम्राज्यवादी पूर्वी गंग काल। प्रारंभिक काल में उनकी शक्ति मुख्यतः दक्षिणी कलिंग तक सीमित थी, जबकि ग्यारहवीं शताब्दी के बाद उन्होंने कलिंग और उत्कल के बड़े हिस्से पर अपना प्रभाव स्थापित किया।
पूर्वी गंग राजवंश की उत्पत्ति
पूर्वी गंग राजवंश की उत्पत्ति के संबंध में इतिहासकारों में पूर्ण मतैक्य नहीं है। इस विषय में जानकारी मुख्यतः ताम्रपत्रों, शिलालेखों, वंशावलियों तथा धार्मिक परंपराओं से प्राप्त होती है। बाद के गंग अभिलेखों में राजवंश को चंद्रवंश से जोड़ा गया है। ऐसी वंशावलियों में विष्णु, ब्रह्मा, अत्रि और चंद्र के माध्यम से राजवंश की दिव्य उत्पत्ति बताई गई है। इनका उद्देश्य केवल वंशक्रम बताना नहीं था, बल्कि शासकों की राजनीतिक और धार्मिक वैधता स्थापित करना भी था। एक अन्य परंपरा के अनुसार पूर्वी गंगों के पूर्वज दक्षिण भारत के गंगवाड़ी क्षेत्र से कलिंग आए थे। इसी आधार पर उन्हें कर्नाटक के पश्चिमी गंग राजवंश से जोड़ने का प्रयास किया गया है। प्रारंभिक अभिलेखों में दक्षिण भारतीय प्रभाव, तेलुगु-कन्नड़ लिपि का प्रयोग तथा कुछ धार्मिक एवं सांस्कृतिक समानताएँ इस मत को बल देती हैं। किंतु पूर्वी गंगों को पश्चिमी गंगों की सीधी शाखा मानने के लिए पर्याप्त निर्णायक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए दक्षिण भारतीय संबंध को ऐतिहासिक संभावना और परंपरा के रूप में देखना अधिक उचित है।
पूर्वी गंगों की अपनी परंपरा में कामार्णव प्रथम को राजवंश के प्रारंभिक संस्थापक के रूप में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। बाद के अभिलेखों में वर्णित परंपरा के अनुसार कामार्णव प्रथम अपने भाइयों के साथ पूर्व की ओर आए और महेंद्रगिरि पहुँचे। वहाँ उन्होंने शिव के गोकर्णेश्वर रूप की उपासना की तथा इसके बाद कलिंग में अपनी राजनीतिक सत्ता स्थापित की। यह परंपरा राजवंश की राजनीतिक उत्पत्ति को धार्मिक वैधता से जोड़ती है। यद्यपि इस कथा के सभी विवरणों को समकालीन ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्वीकार करना उचित नहीं होगा। उपलब्ध अभिलेखीय प्रमाणों से इतना स्पष्ट है कि पाँचवीं–छठी शताब्दी तक कलिंग में गंग राजनीतिक शक्ति का अस्तित्व स्थापित हो चुका था।

प्रारंभिक पूर्वी गंगों का राजनीतिक विकास
पूर्वी गंगों के प्रारंभिक इतिहास के अध्ययन में ताम्रपत्रों और शिलालेखों का विशेष महत्त्व है। इंद्रवर्मन प्रथम प्रारंभिक ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित गंग शासकों में प्रमुख थे। उनके जिरजिंगी ताम्रपत्र से उनके शासन और राजनीतिक स्थिति की जानकारी मिलती है। उन्होंने ‘त्रिकलिंगाधिपति’ की उपाधि धारण की, जिससे कलिंग के व्यापक क्षेत्र पर उनके राजनीतिक दावे का संकेत मिलता है।
इस समय दक्षिण कलिंग में अनेक स्थानीय राजनीतिक शक्तियाँ सक्रिय थीं। विष्णुकुंडिनों का भी इस क्षेत्र में प्रभाव बढ़ रहा था। इंद्रवर्मन प्रथम का विष्णुकुंडिन शासक इंद्रभट्टारक के साथ संघर्ष हुआ। गंग अभिलेखों में इस संघर्ष को ‘चतुर्दंत समर’ के रूप में वर्णित किया गया है। इसके बाद गंगों ने दक्षिण कलिंग में अपनी स्थिति मजबूत की।
इंद्रवर्मन के बाद हस्तिवर्मन सहित कई शासकों का उल्लेख मिलता है। हस्तिवर्मन ने उत्तरी कलिंग में भी अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया और ‘सकल-कलिंगाधिपति’ जैसी उपाधि धारण की। बाद के अभिलेखों में इंद्रवर्मन द्वितीय, इंद्रवर्मन तृतीय, दानार्णव, इंद्रवर्मन चतुर्थ और देवेंद्रवर्मन आदि शासकों के नाम मिलते हैं। इन प्रारंभिक शासकों की क्रमावली और शासनकाल के संबंध में इतिहासकारों में कुछ मतभेद हैं। इसका कारण सीमित अभिलेखीय सामग्री तथा अलग-अलग अभिलेखों में प्राप्त वंशावलियों का पूर्णतः समान न होना है।
इस चरण में पूर्वी गंगों को विष्णुकुंडिनों, पूर्वी चालुक्यों तथा कलिंग की अन्य क्षेत्रीय शक्तियों से संघर्ष करना पड़ा। कभी उनकी सत्ता स्वतंत्र रही तो कभी वे अधिक शक्तिशाली पड़ोसी राजवंशों के प्रभाव में आए। इसके बावजूद गंग राजनीतिक परंपरा समाप्त नहीं हुई और आगे चलकर इसी आधार पर उनका पुनरुत्थान हुआ।
पाँचवीं से दसवीं शताब्दी तक पूर्वी गंग शक्ति
प्रारंभिक पूर्वी गंगों का मुख्य शक्ति-केंद्र दक्षिण कलिंग था। धीरे-धीरे उन्होंने कलिंग के अन्य भागों में अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया। इस दौरान विभिन्न स्थानीय शासकों और सामंतों के साथ युद्ध तथा राजनीतिक समझौते दोनों हुए।
नौवीं और दसवीं शताब्दी में पूर्वी गंग शक्ति अपेक्षाकृत कमजोर रही। कलिंग में पूर्वी चालुक्यों सहित अनेक शक्तियाँ सक्रिय थीं और गंग सत्ता विभिन्न शाखाओं में विभाजित हो गई थी। इस राजनीतिक स्थिति के कारण उनकी केंद्रीय शक्ति कमजोर हुई, लेकिन राजवंश का अस्तित्व बना रहा। लगभग दसवीं शताब्दी के अंत और ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में गंग शक्ति के पुनरुत्थान की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। इस पुनरुत्थान में वज्रहस्त जैसे शासकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने गंगों की विभिन्न शाखाओं को संगठित करने और कलिंग में उनकी राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने का प्रयास किया।
वज्रहस्त पंचम और गंग शक्ति का पुनरुत्थान
वज्रहस्त पंचम के शासनकाल में पूर्वी गंग शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। उन्होंने कलिंग में अपनी स्थिति मजबूत की और उत्तरी तथा दक्षिणी क्षेत्रों पर प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया। उनके समय गंग शक्ति फिर से एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने लगी। इस काल में शैव धार्मिक परंपरा को संरक्षण मिला और मुखलिंगम जैसे धार्मिक केंद्रों का विकास हुआ। गंग शक्ति के इस पुनरुत्थान ने आगे चलकर साम्राज्यवादी पूर्वी गंग सत्ता के निर्माण की आधारभूमि तैयार की।
देवेंद्रवर्मन राजराज प्रथम
वज्रहस्त पंचम के बाद देवेंद्रवर्मन राजराज प्रथम ने गंग सत्ता को आगे बढ़ाया। उनके शासनकाल में पूर्वी गंगों को सोमवंशियों, चोलों तथा पूर्वी चालुक्यों जैसी शक्तियों से संघर्ष करना पड़ा। राजनीतिक संघर्षों के साथ वैवाहिक कूटनीति का भी प्रयोग किया गया। राजराज प्रथम का संबंध चोल राजकुमारी राजसुंदरी से स्थापित हुआ। इस वैवाहिक संबंध से उत्पन्न अनंतवर्मन चोडगंगदेव आगे चलकर पूर्वी गंग राजवंश के सबसे शक्तिशाली शासकों में शामिल हुए।
अनंतवर्मन चोडगंगदेव
अनंतवर्मन चोडगंगदेव पूर्वी गंग राजवंश के इतिहास में निर्णायक स्थान रखते हैं। लगभग ग्यारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में सत्ता प्राप्त करने के बाद उन्होंने लंबे संघर्षों के माध्यम से कलिंग और उत्कल के विभिन्न क्षेत्रों में गंग प्रभुत्व को मजबूत किया।
चोडगंगदेव को चोलों, पूर्वी चालुक्यों तथा अन्य क्षेत्रीय शक्तियों से संघर्ष करना पड़ा। चोल शासक कुलोत्तुंग प्रथम के साथ उनका संघर्ष विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण था। प्रारंभिक कठिनाइयों के बावजूद चोडगंगदेव ने अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत की और पूर्वी तट पर गंग शक्ति का विस्तार किया। उनके शासनकाल में गंग राज्य का प्रभाव उत्तर में गंगा नदी के मुहाने से लेकर दक्षिण में गोदावरी क्षेत्र तक विभिन्न रूपों में दिखाई देता है। हालांकि मध्यकालीन राजनीतिक प्रभाव को आधुनिक राज्यों की निश्चित सीमाओं की तरह नहीं समझना चाहिए। किसी क्षेत्र में प्रत्यक्ष प्रशासन, सामंती अधीनता और सैन्य प्रभाव की सीमा अलग-अलग हो सकती थी।
चोडगंगदेव का शासन धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। पुरी के जगन्नाथ मंदिर के वर्तमान विशाल मंदिर परिसर के निर्माण की प्रारंभिक प्रक्रिया उनके शासनकाल से संबंधित मानी जाती है। मंदिर का निर्माण और विस्तार एक ही शासक के समय में पूरा नहीं हुआ, बल्कि बाद के गंग शासकों ने भी इसमें महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
चोडगंगदेव के बाद के शासक
चोडगंगदेव के बाद गंग सत्ता को बनाए रखने का प्रयास किया गया। कामार्णवदेव के समय पश्चिमी ओडिशा के संबलपुर-बोलांगीर क्षेत्र में अधिकार को लेकर कलचुरियों के साथ संघर्ष हुआ। इसके बाद राजराजदेव द्वितीय तथा अन्य शासकों ने गंग सत्ता को बनाए रखा। इस काल में गंग राज्य को आंतरिक राजनीतिक चुनौतियों के साथ-साथ बाहरी शक्तियों का भी सामना करना पड़ा। बंगाल की ओर से होने वाले मुस्लिम अभियानों का दबाव धीरे-धीरे बढ़ रहा था। इन परिस्थितियों ने आगे चलकर गंग प्रशासन और सैन्य व्यवस्था को अधिक संगठित करने की आवश्यकता पैदा की।
अनंगभीमदेव तृतीय
अनंगभीमदेव तृतीय (लगभग 1211–1238 ई.) पूर्वी गंग राजवंश के प्रमुख शासकों में थे। उनके शासनकाल में राज्य की प्रशासनिक और सैन्य व्यवस्था को अधिक संगठित किया गया। उन्होंने पश्चिमी क्षेत्रों में कलचुरियों से संघर्ष किया और बंगाल की ओर से होने वाले मुस्लिम सैन्य अभियानों का प्रतिरोध किया। उनके शासनकाल में ओडिशा की राजनीतिक स्वतंत्रता मजबूत रही।
अनंगभीमदेव तृतीय का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान जगन्नाथ परंपरा को राजकीय सत्ता से जोड़ना था। उन्होंने अपनी राजसत्ता को भगवान जगन्नाथ की धार्मिक सत्ता के अधीन माना। इससे पुरी का जगन्नाथ मंदिर केवल धार्मिक केंद्र नहीं रहा, बल्कि राज्य की राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण आधार बन गया। मंदिरों को भूमि-अनुदान दिए जाते थे और उनके साथ पुरोहितों, विद्वानों, शिल्पियों, कलाकारों तथा विभिन्न सेवा-समुदायों की संस्थागत व्यवस्था विकसित हुई। इस प्रकार मंदिर धार्मिक संस्थान के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक जीवन के भी प्रमुख केंद्र बन गए।
नरसिंहदेव प्रथम और पूर्वी गंग शक्ति का उत्कर्ष
नरसिंहदेव प्रथम (1238–1264 ई.) पूर्वी गंग वंश के सबसे शक्तिशाली शासकों में से एक थे। उनके शासनकाल में गंग सैन्य शक्ति और राजनीतिक प्रभाव अपने उत्कर्ष पर पहुँचे। उन्होंने बंगाल की मुस्लिम सत्ता के विरुद्ध सक्रिय सैन्य नीति अपनाई और उत्तरी सीमा पर गंग प्रभुत्व मजबूत किया। उनके सैन्य अभियानों ने पूर्वी गंग राज्य की राजनीतिक प्रतिष्ठा को बढ़ाया। नरसिंहदेव प्रथम की सबसे प्रसिद्ध उपलब्धि कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण है। 13वीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर कलिंग स्थापत्य और मूर्तिकला की परिपक्व अवस्था का उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर को सूर्यदेव के विशाल रथ के रूप में परिकल्पित किया गया है। इसके रथचक्र, अश्व, देवी-देवताओं, नर्तकियों, संगीतकारों, पशु-पक्षियों तथा विभिन्न लौकिक दृश्यों की सूक्ष्म नक्काशी मध्यकालीन भारतीय शिल्पकला की उच्च उपलब्धि को दर्शाती है।
पूर्वी गंगों का प्रशासन
पूर्वी गंगों की शासन-व्यवस्था राजतंत्र पर आधारित थी। राजा सर्वोच्च शासक होने के साथ-साथ सेना का प्रधान भी था। प्रशासन में मंत्रियों, उच्च अधिकारियों, सामंतों और सैन्य अधिकारियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।
प्रांतीय प्रशासन
विशाल राज्य को विभिन्न प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया गया था। महामंडल, मंडल और विषय जैसी इकाइयों का उल्लेख मिलता है। इनके प्रशासन में महामंडलिक और विषयपति जैसे अधिकारी कार्य करते थे। यह व्यवस्था केंद्रीय सत्ता और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वय स्थापित करने का माध्यम थी।
स्थानीय प्रशासन
ग्राम प्रशासन में स्थानीय अधिकारियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। ग्रामिक जैसे अधिकारी स्थानीय प्रशासन से जुड़े थे। अभिलेखों में लेखा-जोखा, कानून-व्यवस्था तथा सुरक्षा से संबंधित विभिन्न अधिकारियों का भी उल्लेख मिलता है।
सैन्य व्यवस्था
पूर्वी गंग शक्ति का एक प्रमुख आधार उसकी सैन्य व्यवस्था थी। राजा सेना का सर्वोच्च सेनापति होता था। अभिलेखों में महासेनापति, सेनापति, दलपति और नायक जैसे पदों का उल्लेख मिलता है। पूर्वी गंग शासकों को बंगाल, दक्षिण भारत और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों से लगातार संघर्ष करना पड़ा। अनंतवर्मन चोडगंगदेव और नरसिंहदेव प्रथम के सैन्य अभियानों ने राज्य के विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। तटीय क्षेत्रों और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा भी राज्य के लिए महत्त्वपूर्ण थी। दुर्गों और किलेबंद नगरों का निर्माण किया गया। रायबनिया दुर्ग को गंगकालीन सैन्य स्थापत्य के महत्त्वपूर्ण उदाहरणों में माना जाता है।
पूर्वी गंगों की अर्थव्यवस्था
पूर्वी गंग अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि, भूमि-राजस्व, व्यापार और वाणिज्य पर आधारित थी। बंगाल की खाड़ी से लगे तटीय क्षेत्रों के कारण समुद्री व्यापार को विशेष महत्त्व प्राप्त था।
कृषि
कृषि राज्य की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार थी। उपजाऊ भूमि, सिंचाई और भूमि-विस्तार ने कृषि उत्पादन को बढ़ावा दिया। भूमि से प्राप्त कर राजकोष की नियमित आय का प्रमुख स्रोत था। ब्राह्मणों, मंदिरों और धार्मिक संस्थानों को भूमि-अनुदान देने की परंपरा भी प्रचलित थी। इससे धार्मिक संस्थाएँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन गईं।
व्यापार और वाणिज्य
कलिंग की समुद्रतटीय स्थिति ने उसे दक्षिण भारत, बंगाल तथा समुद्रपार के क्षेत्रों से जोड़ दिया। आंतरिक और समुद्री व्यापार से राज्य को राजस्व प्राप्त होता था। व्यापारिक शुल्क भी राजकोष की आय का महत्त्वपूर्ण स्रोत था।
राजस्व व्यवस्था
राज्य की आय में भूमि कर, व्यापारिक शुल्क तथा विभिन्न स्थानीय कर शामिल थे। अभिलेखों में कर, हिरण्य और शुल्क जैसे राजस्व संबंधी उल्लेख मिलते हैं। प्राप्त राजस्व का उपयोग प्रशासन, सेना, धार्मिक संस्थाओं तथा सार्वजनिक निर्माण कार्यों में किया जाता था।
पूर्वी गंगों की मुद्रा
पूर्वी गंग शासकों द्वारा स्वर्ण मुद्राओं के प्रचलन के प्रमाण मिलते हैं। इनमें फणम प्रमुख था और इन्हें सामान्यतः गंग फणम कहा जाता है। इन सिक्कों पर धार्मिक तथा राजकीय प्रतीकों का अंकन मिलता है। विभिन्न शासकों के समय इनके आकार, प्रतीक और लेख में परिवर्तन दिखाई देता है। इसलिए सभी गंग फणमों को एक ही प्रकार का सिक्का मानना उचित नहीं होगा। पूर्वी गंग सिक्कों की एक विशेषता उनमें दिखाई देने वाली संख्या-लेखन प्रणाली है। कुछ सिक्कों पर अंक ऐसे रूप में मिलते हैं जिनसे तत्कालीन संख्या-लेखन और स्थान-मूल्य की विकसित परंपरा का अध्ययन किया जा सकता है।
अंका वर्ष प्रणाली
पूर्वी गंग प्रशासन की विशिष्ट विशेषताओं में ‘अंका’ वर्ष-गणना प्रणाली का विशेष महत्त्व है। यह सामान्य शासन-वर्ष की सीधी गणना से अलग राजकीय कालगणना पद्धति थी। इस प्रणाली में प्रत्येक बीते वर्ष को सामान्य क्रम में नहीं गिना जाता था, बल्कि निर्धारित नियमों के अनुसार राजकीय वर्ष की गणना होती थी। इसलिए किसी अभिलेख में उल्लिखित अंका वर्ष को शासक के वास्तविक शासन-वर्षों की संख्या के समान नहीं माना जाना चाहिए। यह परंपरा बाद के ओडिशाई राजवंशों में भी जारी रही और गजपति काल में भी इसका प्रयोग दिखाई देता है।
समाज और संस्कृति
पूर्वी गंगकालीन समाज धार्मिक विविधता, सामाजिक पदानुक्रम और सांस्कृतिक गतिविधियों से समृद्ध था। मंदिर, धार्मिक संस्थाएँ, विद्वान, कलाकार और शिल्पी सामाजिक जीवन के महत्त्वपूर्ण अंग थे। वर्ण और जाति आधारित सामाजिक संरचना विद्यमान थी। ब्राह्मणों को भूमि-अनुदान दिए जाते थे और वे धार्मिक अनुष्ठानों, शिक्षा तथा प्रशासन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। विभिन्न स्थानीय समुदायों और जनजातीय समूहों का भी क्षेत्रीय समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान था। मंदिर धार्मिक केंद्र होने के साथ-साथ शिक्षा, कला, आर्थिक गतिविधियों और सामाजिक जीवन के केंद्र भी थे।
धर्म और धार्मिक परंपराएँ
पूर्वी गंग शासकों की धार्मिक नीति में समय के साथ परिवर्तन दिखाई देता है। प्रारंभिक चरण में शैव धर्म का प्रभाव प्रमुख था, जबकि बाद के काल में वैष्णव धर्म और जगन्नाथ उपासना को विशेष राजकीय संरक्षण मिला। इसके साथ शाक्त परंपरा भी क्षेत्रीय धार्मिक जीवन का हिस्सा रही।
शैव धर्म
प्रारंभिक पूर्वी गंग शासकों ने शिव की उपासना को विशेष संरक्षण दिया। मुखलिंगम के मंदिर-समूह तथा चतेश्वर और मेघेश्वर जैसे शिव मंदिर इस परंपरा के विकास को दर्शाते हैं। महेंद्रगिरि के गोकर्णेश्वर की उपासना भी गंग धार्मिक परंपरा से जुड़ी थी।
वैष्णव धर्म और जगन्नाथ परंपरा
बाद के काल में वैष्णव परंपरा का प्रभाव बढ़ा। अनंतवर्मन चोडगंगदेव और उनके उत्तराधिकारियों के समय पुरी की जगन्नाथ उपासना को विशेष राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ। अनंगभीमदेव तृतीय ने जगन्नाथ को राज्य का सर्वोच्च अधिष्ठाता मानकर राजसत्ता को धार्मिक वैधता का विशिष्ट आधार प्रदान किया। इससे जगन्नाथ परंपरा ओडिशा की राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्त्वपूर्ण तत्व बन गई।
भाषा, साहित्य और अभिलेख
पूर्वी गंग शासन के प्रारंभिक चरण में तेलुगु-कन्नड़ लिपि और तेलुगु भाषा का प्रशासनिक प्रयोग दिखाई देता है। बाद में स्थानीय भाषायी परंपराओं के विकास के साथ ओड़िया भाषा का महत्त्व बढ़ा। संस्कृत राजदरबार, धार्मिक कार्यों और अभिलेखों की प्रमुख भाषाओं में थी। ताम्रपत्रों और शिलालेखों में राजाओं की वंशावली, भूमि-अनुदान, प्रशासनिक व्यवस्था, धार्मिक संस्थाओं तथा राजनीतिक उपलब्धियों की जानकारी मिलती है। जिरजिंगी, कोर्णी और पुरी से प्राप्त अभिलेख पूर्वी गंग इतिहास के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।
पूर्वी गंगकालीन कला और वास्तुकला
पूर्वी गंगों के शासनकाल में कलिंग मंदिर स्थापत्य ने उल्लेखनीय विकास प्राप्त किया। मंदिर वास्तुकला में मुख्यतः देउल या विमान, जगमोहन, नाटमंडप और भोगमंडप जैसे भागों का विकसित स्वरूप दिखाई देता है। देउल में गर्भगृह तथा उसके ऊपर उठने वाला मुख्य स्थापत्य भाग होता था, जबकि जगमोहन सभा और उपासना से संबंधित था। बड़े मंदिर परिसरों में नाटमंडप और भोगमंडप भी जोड़े गए। मंदिरों की बाहरी दीवारों पर देवी-देवताओं, पौराणिक प्रसंगों, नर्तकों, संगीतकारों, पशु-पक्षियों और विभिन्न मानव आकृतियों की सूक्ष्म नक्काशी की गई। इन मूर्तियों में धार्मिक विषयों के साथ तत्कालीन सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की झलक भी दिखाई देती है।
पुरी का जगन्नाथ मंदिर
पुरी का जगन्नाथ मंदिर पूर्वी गंगकालीन धार्मिक और स्थापत्य परंपरा का सबसे महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। इसके वर्तमान विशाल मंदिर परिसर के विकास में अनंतवर्मन चोडगंगदेव तथा उनके उत्तराधिकारियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। मंदिर केवल धार्मिक केंद्र नहीं था, बल्कि प्रशासन, अर्थव्यवस्था, शिल्प, सेवा-व्यवस्था और सांस्कृतिक जीवन का भी महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गया।
कोणार्क सूर्य मंदिर
नरसिंहदेव प्रथम के शासनकाल में निर्मित कोणार्क सूर्य मंदिर पूर्वी गंग स्थापत्य की सर्वोच्च उपलब्धियों में से एक है। इसे सूर्यदेव के विशाल रथ के रूप में परिकल्पित किया गया। मंदिर के विशाल रथचक्र, घोड़े, देवी-देवताओं, नर्तकियों, संगीतकारों और विविध लौकिक दृश्यों की मूर्तियाँ कलिंग शिल्पकला की उत्कृष्टता को दर्शाती हैं।
अन्य स्थापत्य केंद्र
मुखलिंगम और अन्य गंगकालीन मंदिर कलिंग स्थापत्य के विकास को समझने में महत्त्वपूर्ण हैं। किंतु भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर पूर्वी गंगों द्वारा निर्मित नहीं था। इसका मुख्य निर्माण सोमवंशी काल में हुआ था। यद्यपि बाद के शासकों ने इसके संरक्षण और विकास में योगदान दिया, इसलिए इसे सीधे पूर्वी गंगों की स्थापत्य उपलब्धि कहना उचित नहीं होगा।
पूर्वी गंग राजवंश के प्रमुख शासक
पूर्वी गंगों की प्रारंभिक शासक-क्रमावली अभिलेखीय मतभेदों के कारण पूरी तरह निश्चित नहीं है। फिर भी प्रमुख शासकों को मोटे तौर पर निम्न क्रम में समझा जा सकता है—
- कामार्णव प्रथम : राजवंशीय परंपरा में प्रारंभिक संस्थापक के रूप में महत्त्वपूर्ण।
- इंद्रवर्मन प्रथम : प्रारंभिक ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित प्रमुख शासक।
- हस्तिवर्मन : कलिंग में गंग प्रभाव के विस्तार से संबंधित।
- अन्य प्रारंभिक इंद्रवर्मन और देवेंद्रवर्मन आदि शासक।
- वज्रहस्त पंचम : गंग शक्ति के पुनरुत्थान में महत्त्वपूर्ण।
- देवेंद्रवर्मन राजराज प्रथम : गंग शक्ति को आगे बढ़ाने वाले शासक।
- अनंतवर्मन चोडगंगदेव : साम्राज्यवादी गंग शक्ति के प्रमुख निर्माता।
- अनंगभीमदेव तृतीय : प्रशासनिक पुनर्गठन और जगन्नाथ परंपरा के राजकीय विकास में महत्त्वपूर्ण।
- नरसिंहदेव प्रथम : सैन्य शक्ति तथा कोणार्क सूर्य मंदिर के कारण प्रसिद्ध।
- भानुदेव प्रथम और उत्तरवर्ती गंग शासक।
- नरसिंहदेव द्वितीय
- भानुदेव द्वितीय
- नरसिंहदेव तृतीय
- भानुदेव तृतीय
- नरसिंहदेव चतुर्थ
- भानुदेव चतुर्थ : अंतिम गंग शासक।
पूर्वी गंग राजवंश का पतन
नरसिंहदेव प्रथम के शासनकाल में पूर्वी गंग शक्ति अपने राजनीतिक और सैन्य उत्कर्ष पर थी, लेकिन उनके बाद केंद्रीय सत्ता को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उत्तराधिकार संबंधी समस्याएँ, सामंतों का बढ़ता प्रभाव, प्रशासनिक दबाव और बाहरी शक्तियों का सैन्य दबाव धीरे-धीरे गंग सत्ता को कमजोर करने लगे। बंगाल तथा दिल्ली सल्तनत की ओर से ओडिशा पर राजनीतिक और सैन्य दबाव बढ़ता गया।
तेरहवीं और चौदहवीं शताब्दी में ओडिशा को विभिन्न मुस्लिम सैन्य अभियानों का सामना करना पड़ा। गयासुद्दीन तुगलक का 1324 ईस्वी का ओडिशा अभियान भी गंग सत्ता के लिए एक महत्त्वपूर्ण चुनौती था। बाद में दिल्ली सल्तनत की ओर से होने वाले अभियानों और कर वसूलने के प्रयासों ने भी राज्य पर दबाव बनाए रखा।
किंतु गंग राजवंश के पतन को केवल बाहरी आक्रमणों का परिणाम नहीं माना जा सकता। आंतरिक राजनीतिक संघर्ष, उत्तराधिकार संबंधी समस्याएँ, सामंतों की बढ़ती शक्ति और बदलते क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन भी इसके महत्त्वपूर्ण कारण थे। दक्षिण में विजयनगर जैसी शक्तियों के उदय ने भी क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित किया और गंग राज्य के दक्षिणी क्षेत्रों पर दबाव बढ़ा।
अंतिम गंग शासक और गजपति सत्ता का उदय
चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक पूर्वी गंग राजवंश अपनी पूर्व शक्ति का बड़ा हिस्सा खो चुका था। नरसिंहदेव चतुर्थ के बाद भानुदेव चतुर्थ ने शासन किया, लेकिन उनके समय केंद्रीय सत्ता और कमजोर हो गई। राजकीय प्रशासन में मंत्रियों और सामंतों का प्रभाव बढ़ता गया। इसी परिस्थिति में कपिलेंद्र, जो भानुदेव चतुर्थ के शासनकाल में एक प्रभावशाली मंत्री थे, ने लगभग 1434–35 ईस्वी में सत्ता पर अधिकार कर लिया। कपिलेंद्र ने सूर्यवंशी गजपति राजवंश की स्थापना की। इसके साथ ओडिशा में पूर्वी गंगों की राजनीतिक सत्ता का अंत हुआ और इतिहास में गजपति युग का आरंभ हुआ।
पूर्वी गंग राजवंश की ऐतिहासिक विरासत
पूर्वी गंग राजवंश की सबसे स्थायी विरासत ओडिशा की राजनीतिक, धार्मिक, स्थापत्य और सांस्कृतिक पहचान के निर्माण में दिखाई देती है। इस वंश ने विभिन्न चरणों में कलिंग और उत्कल के विस्तृत क्षेत्रों को एक प्रभावशाली राजनीतिक संरचना के अंतर्गत संगठित किया। अनंतवर्मन चोडगंगदेव ने गंग शक्ति को साम्राज्यवादी स्वरूप प्रदान किया, अनंगभीमदेव तृतीय ने जगन्नाथ परंपरा को राजकीय सत्ता से जोड़ा और नरसिंहदेव प्रथम के समय सैन्य शक्ति तथा स्थापत्य कला का उल्लेखनीय उत्कर्ष हुआ। पुरी का जगन्नाथ मंदिर और कोणार्क का सूर्य मंदिर इस युग की सबसे प्रसिद्ध सांस्कृतिक उपलब्धियाँ हैं। इनके अतिरिक्त कलिंग मंदिर स्थापत्य, मूर्तिकला, भूमि-अनुदान व्यवस्था, मंदिर-आधारित अर्थव्यवस्था, समुद्री व्यापार और जगन्नाथ परंपरा का विकास पूर्वी गंगों की दीर्घकालीन विरासत के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। पूर्वी गंग राजवंश ने शैव, वैष्णव और शाक्त धार्मिक परंपराओं के सह-अस्तित्व को संरक्षण दिया तथा मंदिरों को धार्मिक संस्थानों के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित होने में सहायता की।
इस प्रकार पूर्वी गंग राजवंश केवल एक राजनीतिक सत्ता नहीं था, बल्कि उसने कलिंग के राजनीतिक इतिहास, ओडिशा की क्षेत्रीय पहचान, जगन्नाथ संस्कृति, मंदिर स्थापत्य, मूर्तिकला, प्रशासन, व्यापार और धार्मिक परंपराओं को कई शताब्दियों तक प्रभावित किया। पाँचवीं–छठी शताब्दी में दिखाई देने वाली प्रारंभिक गंग राजनीतिक उपस्थिति से लेकर 15वीं शताब्दी में गजपति सत्ता के उदय तक पूर्वी गंगों की परंपरा ने ओडिशा के इतिहास को गहराई से प्रभावित किया।


