अशोक का प्रशासन
मुख्य लेख : अशोक महान
प्रस्तावना
सम्राट अशोक का प्रशासन मौर्य वंश की पूर्ववर्ती प्रशासनिक व्यवस्था अर्थात् उनके पितामह चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा स्थापित तथा चाणक्य के अर्थशास्त्र में वर्णित शासन-प्रणाली पर ही आधारित था। किंतु कलिंग युद्ध (लगभग 261 ई.पू.) के पश्चात हुए हृदय-परिवर्तन के बाद अशोक के प्रशासन में एक अधिक मानवीय, कल्याणकारी और नैतिक दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा।
शासन का सर्वोच्च अधिकारी स्वयं सम्राट था, और उसकी सहायता के लिए एक सुव्यवस्थित मंत्रिपरिषद् कार्य करती थी। इस विशाल साम्राज्य को प्रशासनिक सुविधा हेतु विभिन्न प्रांतों में विभाजित किया गया था, जिनका प्रशासन प्रायः राजकुमारों अथवा ‘आर्यपुत्रों’ द्वारा किया जाता था। प्रांतों के नीचे जिले (विषय) और गाँव प्रशासन की सबसे छोटी इकाइयाँ थीं। अशोक ने नैतिक मूल्यों तथा अपने ‘धम्म’ के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए एक बिल्कुल नवीन पदाधिकारी-वर्ग धम्म-महामात्रों की भी नियुक्ति की।
अशोक अपनी संपूर्ण प्रजा को अपनी संतान के समान मानता था और उनके सर्वांगीण कल्याण को अपने शासन का प्रमुख उद्देश्य समझता था। जनहित के लिए सड़कों के किनारे छायादार वृक्ष लगवाए गए, स्थान-स्थान पर कुएँ खुदवाए गए, यात्रियों के लिए विश्रामगृह तथा मनुष्यों एवं पशुओं दोनों के लिए अलग-अलग चिकित्सालय बनवाए गए। न्याय-व्यवस्था में भी अत्यंत मानवीय दृष्टिकोण अपनाया गया—राजुकों को स्वतंत्र न्यायिक अधिकार प्रदान किए गए, और मृत्युदंड पाए हुए बंदियों को अंतिम अवसर के रूप में तीन दिन की मोहलत देने जैसी अभूतपूर्व व्यवस्था भी लागू की गई। इस प्रकार अशोक का प्रशासन एक ओर मजबूत केंद्रीय शासन-तंत्र पर आधारित था, तो दूसरी ओर जनकल्याण, नैतिकता, न्याय और मानवीय मूल्यों की भावना से भी गहराई तक ओतप्रोत था।
अशोक के इस प्रशासनिक ढाँचे की जानकारी मुख्यतः उसके 14 प्रमुख शिलालेखों, 7 स्तंभ-लेखों तथा अनेक लघु शिलालेखों एवं लघु स्तंभ-लेखों से प्राप्त होती है, जो भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और नेपाल तक फैले हुए हैं। ये अभिलेख मुख्यतः ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों में उत्कीर्ण हैं, जबकि उत्तर-पश्चिमी सीमा-क्षेत्र (जैसे कंधार द्विभाषी लेख) में यूनानी (ग्रीक) तथा आरमेइक लिपियों का भी प्रयोग हुआ है, जो अशोक के साम्राज्य की भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता तथा उसकी बहुभाषी प्रशासनिक संवेदनशीलता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। उल्लेखनीय है कि ब्राह्मी लिपि का सफल पुरालेखीय वाचन (डिसाइफरमेंट) 1837 ई. में अंग्रेज़ विद्वान जेम्स प्रिंसेप ने किया था, जिसके बाद ही अशोक के प्रशासन और धम्म-नीति का वास्तविक स्वरूप आधुनिक इतिहासकारों के समक्ष स्पष्ट हो सका।

अशोक के शासन-संगठन का मूल स्वरूप
अशोक के शासन-संगठन का मूल प्रारूप लगभग वही था, जो उसके पितामह चंद्रगुप्त मौर्य के समय में प्रचलित था। किंतु ‘धम्मप्रिय’ अशोक ने कलिंग-विजय के पश्चात अपने संपूर्ण शासन को अधिक मानवीय बनाने के उद्देश्य से प्रशासन में अनेक महत्वपूर्ण सुधार किए। वह अपने ‘धम्म’ के व्यापक प्रचार-माध्यम से अपनी प्रजा के नैतिक तथा भौतिक दोनों प्रकार के उत्थान को साकार करना चाहता था।
उसके अभिलेखों में अनेक प्रशासनिक अधिकारियों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है, जैसे- धम्म-महामात्र, राजुक, प्रादेशिक, युक्त आदि। इनमें से अधिकांश राज्याधिकारी वस्तुतः चंद्रगुप्त मौर्य के समय से ही चले आ रहे थे। अशोक ने अपनी धार्मिक नीति तथा प्रजा-कल्याण की गहन भावना से प्रेरित होकर इन अधिकारियों के कर्तव्यों एवं दायित्वों में उल्लेखनीय विस्तार किया।
अशोक द्वारा किया गया पहला बड़ा प्रशासनिक सुधार यह था कि प्रादेशिक, राजुक से लेकर युक्त तक के सभी वरिष्ठ अधिकारी प्रति पाँचवें वर्ष (जबकि विशेष रूप से महत्वपूर्ण प्रांतों उज्जयिनी तथा तक्षशिला में प्रति तीसरे वर्ष) राज्य के विभिन्न भागों में निरीक्षण-दौरे पर जाया करते थे। ये अधिकारी अपने सामान्य प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ इन दौरों के दौरान धम्म का प्रचार भी करते थे, जिससे प्रशासन और नैतिक शिक्षा का यह अनूठा समन्वय अशोक के शासन की एक विशिष्ट पहचान बन गया।
अशोक का केंद्रीय प्रशासन
अशोक एक अत्यंत विस्तृत साम्राज्य का एकछत्र शासक था। उसके धम्म-लेखों से यह स्पष्ट होता है कि संपूर्ण शासन-तंत्र की धुरी स्वयं शासक ही था। उसने ‘देवानांप्रिय’ (देवताओं का प्रिय) की उपाधि धारण की थी, जो उसकी धार्मिक-नैतिक शासन-दृष्टि को भी प्रतिबिंबित करती है।
अपने छठे शिलालेख में अशोक स्वयं घोषणा करता है- ‘सर्वलोकहित मेरा कर्तव्य है, ऐसा मेरा मत है; सर्वलोकहित से बढ़कर दूसरा कोई कार्य नहीं है। मैं जो भी पराक्रम करता हूँ, वह इसीलिए कि भूतों (प्राणियों) के ऋण से मुक्त हो जाऊँ। मैं उन्हें इस लोक में सुखी बनाऊँ और वे परलोक में स्वर्ग प्राप्त कर सकें।’ इस प्रकार एक शासक के रूप में अशोक प्राचीन भारतीय राजतंत्र में एक आदर्श लोकसेवक तथा प्रजापालक का प्रतिमान प्रस्तुत करता है।
परिषद् (मंत्रिपरिषद्)
अशोक के अभिलेखों में ‘परिषा’ अथवा परिषद् का स्पष्ट उल्लेख मिलता है, जिसका तादात्म्य कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्णित ‘परिषद्’ संस्था से किया जा सकता है। तीसरे तथा छठे शिलालेख से परिषद् के कार्यों पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। तीसरे शिलालेख से पता चलता है कि परिषद् के समस्त आदेश विधिवत् लिखित रूप में दर्ज किए जाते थे, जिन्हें स्थानीय अधिकारी आगे जनता तक पहुँचाते थे। छठे शिलालेख से यह भी ज्ञात होता है कि सम्राट के मौलिक आदेशों तथा विभागीय अध्यक्षों द्वारा विशेष विषयों पर लिए गए निर्णयों पर परिषद् गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श करती थी। अशोक स्वयं निर्देश देता है कि यदि परिषद् में किसी भी प्रकार का मतभेद अथवा विवाद उत्पन्न हो, तो इसकी सूचना तत्काल शासक तक पहुँचाई जाए।
इस प्रकार परिषद् मौर्य प्रशासन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं शक्तिशाली संस्था थी। बौद्ध ग्रंथ दिव्यावदान की एक कथा से यह भी पता चलता है कि कभी-कभी स्वयं सम्राट को भी परिषद् के विरोध का सामना करना पड़ता था—इसी परिषद्-विरोध के कारण ही एक अवसर पर अशोक को बौद्ध संघ को दिया जाने वाला एक अनुदान रोकना पड़ा था। यह घटना इस बात का महत्वपूर्ण प्रमाण है कि मौर्य सम्राट, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, पूर्णतः निरंकुश नहीं था और उसे संस्थागत जाँच-परख (चेक्स एंड बैलेंसेज़) का भी सामना करना पड़ता था।
अशोक का प्रांतीय प्रशासन
प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से अशोक का विशाल साम्राज्य अनेक प्रांतों में विभक्त था। उसके अभिलेखों में स्पष्ट रूप से पाँच प्रमुख प्रांतों के नाम उल्लिखित मिलते हैं—
- उत्तरापथ : राजधानी तक्षशिला
- अवंतिरट्ठ (अवंति) : राजधानी उज्जयिनी
- कलिंग : राजधानी तोसाली
- दक्षिणापथ : राजधानी सुवर्णगिरि
- प्राच्य अथवा पूर्वी प्रदेश : जिसका शासन सीधे केंद्रीय राजधानी पाटलिपुत्र से संपादित होता था
यह भी संभव है कि इन पाँचों के अतिरिक्त साम्राज्य में कुछ और छोटे प्रांत भी रहे होंगे, जिनका उल्लेख किसी कारणवश उपलब्ध अभिलेखों में नहीं मिल पाया है।
कुमार और आर्यपुत्रों की नियुक्ति
राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण प्रांतों में राजपरिवार से संबंधित व्यक्तियों को ही राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया जाता था, जिन्हें ‘कुमार’ अथवा ‘आर्यपुत्र’ कहा जाता था। तक्षशिला, सुवर्णगिरि, कलिंग तथा उज्जयिनी जैसे महत्वपूर्ण प्रांतों में इसी प्रकार के राजकुमारों की नियुक्ति की गई थी। बौद्ध ग्रंथ दिव्यावदान से यह भी पता चलता है कि स्वयं अशोक का पुत्र कुणाल तक्षशिला का राज्यपाल नियुक्त हुआ था।
इसके विपरीत, अपेक्षाकृत कम राजनीतिक महत्व वाले प्रांतों में राजवंश से बाहर के योग्य व्यक्तियों को भी राज्यपाल नियुक्त किया जाता था। रुद्रदामन् प्रथम के प्रसिद्ध गिरनार अभिलेख से पता चलता है कि यवन (यूनानी) जातीय तुषास्प काठियावाड़ (सौराष्ट्र) प्रांत में अशोक का राज्यपाल नियुक्त था। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रांतीय प्रशासन में योग्यता के आधार पर स्थानीय अथवा गैर-भारतीय व्यक्तियों को भी उचित प्राथमिकता दी जाती थी, जो अशोक की उदार एवं व्यावहारिक राजनीतिमत्ता का सुस्पष्ट परिचायक है।
प्रांतीय शासन में राज्यपाल की सहायता के लिए वहाँ भी एक स्थानीय मंत्रिपरिषद् कार्यरत रहती थी, जो प्रांतीय शासकों की संभावित निरंकुशता पर एक प्रभावी नियंत्रण के रूप में कार्य करती थी।
जिला-प्रशासन और स्थानीय अधिकारी
प्रांतों को आगे और छोटी इकाइयों- विषयों (जिलों) में विभाजित किया गया था। महत्वपूर्ण बात यह है कि जिले के प्रशासकों की नियुक्ति सीधे सम्राट द्वारा न होकर संबंधित प्रांत के प्रांतपति (राज्यपाल) द्वारा की जाती थी, जो प्रशासनिक विकेंद्रीकरण की एक व्यावहारिक व्यवस्था को दर्शाता है।
कोशांबी तथा सारनाथ के महामात्यों को अशोक कभी-कभी सीधे संबोधित भी करता था। इसके विपरीत सिद्धपुर लघुशिलालेख में अशोक द्वारा महामात्यों को सीधे संबोधित न करके दक्षिणी प्रांत के ‘कुमार’ के माध्यम से ही आदेश प्रेषित किया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि महामात्यों की नियुक्ति एवं निर्देशन का अधिकार परिस्थिति-विशेष में कुमारों को भी प्राप्त था, जो केंद्रीय एवं प्रांतीय प्रशासन के बीच समन्वय का परिचायक है।
अशोक के प्रशासनिक सुधार
बौद्ध धर्म ग्रहण करने के पश्चात अशोक ने धर्म-प्रचार के कार्य में अत्यंत लगन और उत्साह के साथ भाग लिया, किंतु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वह अपने राजकीय दायित्वों के प्रति उदासीन हो गया था। वस्तुतः उसकी धर्म-परायणता ने ही उसमें प्रजा के ऐहिक (इहलौकिक) तथा पारलौकिक—दोनों प्रकार के कल्याण के लिए एक गहन लगन उत्पन्न कर दी। उसने राजा और प्रजा के बीच एक पैतृक (पिता-पुत्र जैसे) संबंध को विकसित करने पर विशेष बल दिया।
अपने कलिंग लेख (पृथक कलिंग शिलालेख) में अशोक अपनी इस भावना को अत्यंत मार्मिक शब्दों में व्यक्त करता है- ‘सारी प्रजा मेरी संतान है। जिस प्रकार मैं अपनी संतान के ऐहिक और पारलौकिक कल्याण की कामना करता हूँ, उसी प्रकार अपनी संपूर्ण प्रजा के भी ऐहिक-पारलौकिक कल्याण तथा सुख की कामना करता हूँ। जिस प्रकार एक माँ अपने शिशु को किसी कुशल धाय को सौंपकर यह सोचकर निश्चिंत हो जाती है कि वह धाय संतान का समुचित पालन-पोषण करने में पूर्णतः सक्षम है, उसी प्रकार मैंने भी अपनी प्रजा के सुख और कल्याण के लिए ही राजुकों की नियुक्ति की है।’ इस प्रकार अशोक अपनी संपूर्ण प्रजा को पुत्रवत् स्वीकार करता था तथा उनके कल्याण के प्रति सदैव सजग एवं सक्रिय बना रहता था।
अशोक एक ऐसा आदर्श शासक था, जो जनकल्याण एवं लोकहित की भावना से पूर्णतः ओतप्रोत था और प्रजा के कार्य संपन्न करने के लिए सदैव तत्पर रहता था। अपने छठे शिलालेख में वह घोषणा करता है- ‘हर क्षण और हर स्थान पर-चाहे मैं भोजन कर रहा हूँ, अंतःपुर में हूँ अथवा उद्यान में विचरण कर रहा हूँ, मेरे प्रतिवेदक मुझे प्रजा के कार्यों के संबंध में तुरंत सूचित करें।’ उसी शिलालेख में वह आगे कहता है- ‘मैं जितना भी कार्य करता हूँ, मुझे कभी संतोष नहीं होता, क्योंकि प्रजा के हित के लिए निरंतर कार्य करना ही मैं अपना प्रमुख कर्तव्य समझता हूँ।’
इस प्रकार अशोक ने राजा के उत्थान-व्रत तथा प्रजाहित के आदर्श पर अत्यधिक बल दिया। इससे भी आगे बढ़कर, अशोक ने राजा के कर्तव्य का एक बिल्कुल नया एवं क्रांतिकारी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया—राजा प्रजा का ऋणी है, और प्रजा के प्रति अपने कर्तव्यों का पूर्ण निर्वहन करके ही वह इस ऋण को चुकाता है। अशोक के आठवें शिलालेख तथा मास्की के लघुशिलालेख से यह भी अनुमान लगाया जाता है कि अशोक साम्राज्य के विभिन्न भागों में स्वयं भी व्यक्तिगत रूप से निरीक्षण-यात्राएँ (धर्मयात्राएँ) करता था, ताकि उसे प्रत्यक्ष रूप से जनता के वास्तविक सुख-दुख का ज्ञान प्राप्त हो सके।
दंड-समता एवं व्यवहार-समता
अशोक की प्रशासनिक नीति की सबसे महत्वपूर्ण एवं क्रांतिकारी विशेषता थी- न्याय-प्रशासन के क्षेत्र में दंड-समता एवं व्यवहार-समता की स्थापना। उसने अपनी धम्म-नीति के अनुरूप न्याय-प्रशासन में इन दोनों सिद्धांतों को स्थापित करने का ऐतिहासिक एवं क्रांतिकारी कार्य किया।
अपने अभिषेक के छब्बीसवें वर्ष में उसने राजुकों को यह विशेष स्वतंत्रता प्रदान की कि वे बिना किसी बाह्य हस्तक्षेप के, पूर्ण आत्मविश्वास के साथ प्रजा का हित-साधन कर सकें। चौथे स्तंभलेख में अशोक स्वयं स्पष्ट शब्दों में कहता है- ‘मैंने राजुकों को न्यायिक अनुसंधान तथा दंड-निर्धारण के मामलों में पूर्णतः स्वतंत्र कर दिया है, जिससे वे निर्भय होकर आत्मविश्वास के साथ न्याय-कार्य संपन्न कर सकें।’ इस प्रकार अशोक ने दंड-समता और व्यवहार-समता के व्यावहारिक क्रियान्वयन हेतु राजुकों को न्याय-प्रशासन का सर्वेसर्वा बना दिया।
संभव है कि इस क्रांतिकारी सुधार से तत्कालीन विशेषाधिकार-संपन्न वर्ग में कुछ आंतरिक असंतोष भी उत्पन्न हुआ होगा, क्योंकि इससे पूर्व एक ही प्रकार के अपराध के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वर्णों के लिए भिन्न-भिन्न दंड-विधान का प्रावधान परंपरागत रूप से प्रचलित था, और अशोक की समता-नीति इस पुरातन वर्ण-आधारित असमानता को सीधे चुनौती देती थी।
अशोक अत्यंत व्यावहारिक शासक था। उसने मृत्युदंड को पूर्णतः समाप्त तो नहीं किया, किंतु यह सुनिश्चित करने की भरपूर व्यवस्था अवश्य की कि किसी भी निरपराध व्यक्ति को दंड न मिले। धौली शिलालेख में वह स्पष्ट रूप से कहता है कि यह लेख इसी उद्देश्य से उत्कीर्ण करवाया गया है कि नगर-व्यवहारिक (नगर-न्यायाधीश) सदैव इस बात का सतर्कतापूर्वक प्रयत्न करें कि नागरिकों को अकारण बंधन अथवा दंड न मिले। चतुर्थ शिलालेख में वह आगे कहता है कि जिन अपराधियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई हो, उन्हें अंतिम रूप से दंड दिए जाने से पूर्व तीन दिन का समय अवश्य दिया जाए, ताकि इस बीच उनके संबंधी उनके जीवनदान के लिए राजुकों से प्रार्थना कर सकें अथवा (यदि यह संभव न हो सके तो) वे दान-व्रत तथा प्रार्थना आदि धार्मिक कृत्यों के माध्यम से परलोक की तैयारी कर सकें। इसके अतिरिक्त यदि समुचित एवं युक्तिसंगत कारण उपस्थित हों, तो धम्म-महामात्रों को यह भी अधिकार था कि वे न्यायाधिकारियों से संपर्क कर दंड की मात्रा को कम करवाने का प्रयत्न करें।
इस प्रकार, आधुनिक भारतीय दंड संहिता के सिद्धांतों से पूर्व-सादृश्य रखते हुए अशोक यह चाहता था कि एक भी निरपराध व्यक्ति को अनुचित दंड न मिले, और यदि किसी को अनिवार्यतः मृत्युदंड मिल भी गया हो, तो वह व्रत-उपवास आदि के माध्यम से अपने परलोक-सुधार का अवसर अवश्य प्राप्त कर सके।
अशोक के प्रशासनिक अधिकारी वर्ग
धम्म-महामात्र
अशोक ने अपने राज्याभिषेक के तेरहवें वर्ष के पश्चात एक सर्वथा नवीन प्रकार के उच्च पदाधिकारी-वर्ग की नियुक्ति की, जिन्हें ‘धम्म-महामात्र’ कहा गया। यद्यपि इनका प्रमुख कार्य जनता में धर्म (धम्म) का व्यापक प्रसार करना, विभिन्न धार्मिक संप्रदायों के बीच पारस्परिक सामंजस्य स्थापित करना तथा दानशीलता को प्रोत्साहित करना था, तथापि प्रशासनिक दृष्टिकोण से इनके कार्य कहीं अधिक व्यापक थे, जिन्हें कारावास का दंड मिला हो, उनके परिवारों को समुचित आर्थिक सहायता प्रदान करना, अपराधियों के संबंधियों से संपर्क स्थापित कर उन्हें सांत्वना देना, तथा यह सुनिश्चित करना कि नगर-न्यायाधीश सम्राट के आदेशों का समुचित एवं निष्पक्ष पालन करें। इस प्रकार अशोक ने न्याय और दंड की प्रक्रिया में गहन मानवीयता लाने का सफल प्रयास किया। उसने न्याय को दया के साथ मिश्रित कर उसे कहीं अधिक मृदु एवं संवेदनशील बना दिया।
अशोक के अभिलेखों में प्रशासन के अनेक अन्य महत्वपूर्ण पदाधिकारियों का भी नामोल्लेख मिलता है, जैसे—युक्त, राजुक, प्रादेशिक, धम्म-महामात्र, स्त्रयाध्यक्ष-महामात्र, ब्रजभूमिक-महामात्र, अंत-महामात्र, नगर-व्यवहारिक आदि। इनमें से युक्त, राजुक तथा प्रादेशिक का विशेष उल्लेख अशोक के तृतीय शिलालेख में मिलता है।
युक्त
‘युक्त’ नामक अधिकारी निर्विवाद रूप से अर्थशास्त्र में वर्णित ‘युक्त’ अधिकारी ही प्रतीत होता है। इनका मुख्य कार्यक्षेत्र राजकीय संपत्ति का समुचित प्रबंधन, लगान की नियमित वसूली तथा राजस्व-वृद्धि से संबंधित था। तृतीय शिलालेख में इन्हें राजकीय व्यय एवं संचय के संपूर्ण लेखा-जोखा से संबद्ध बताया गया है तथा इन्हें अमात्यों की परिषद् के प्रत्यक्ष अधीन कार्यरत बताया गया है। ये अधिकारी राजुक और प्रादेशिक के साथ मिलकर संयुक्त निरीक्षण-दौरों पर भी जाया करते थे।
राजुक
ब्यूलर के अनुसार जातक ग्रंथों में उल्लिखित ‘रज्जुक’ तथा ‘रज्जुग्राहक’ नामक अधिकारी ही अशोक के अभिलेखों में ‘राजुक’ नाम से उल्लिखित हैं, जो मूलतः भूमि की पैमाइश करने वाले अधिकारी थे। अपने चौथे स्तंभलेख में अशोक कहता है- ‘जिस प्रकार माता-पिता योग्य धात्री (धाय) के हाथों में अपने बच्चे को सौंपकर पूर्णतः आश्वस्त हो जाते हैं, उसी प्रकार मैंने ग्रामीण जनता के सुख के लिए राजुकों की नियुक्ति की है।’
राजुक मूलतः पहले केवल राजस्व-विभाग का ही कार्य संपादित करते थे, किंतु अशोक ने उन्हें अतिरिक्त रूप से महत्वपूर्ण न्यायिक अधिकार भी प्रदान कर दिए। इस प्रकार राजुक की स्थिति आधुनिक युग के जिलाधीश (डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट) के समकक्ष हो गई, जिसे राजस्व तथा न्याय- दोनों प्रकार के कार्यों का दायित्व वहन करना पड़ता था। यूनानी भूगोलवेत्ता स्ट्रैबो के अनुसार मौर्य प्रशासन में मजिस्ट्रेटों का एक ऐसा विशेष वर्ग विद्यमान था, जो भूमि की पैमाइश करता था, नदियों की समुचित देखरेख करता था, शिकारियों की गतिविधियों पर निगरानी रखता था तथा अपराध की गंभीरता के अनुसार लोगों को उचित दंड भी देता था। अशोक स्वयं स्पष्ट शब्दों में कहता है- ‘मैंने राजुक नामक अधिकारी की नियुक्ति लाखों मनुष्यों के ऊपर की है। इनका मुख्य कार्य जनहित तथा निर्भय व निश्चिंत होकर निष्पक्ष न्याय संपादित करना है।’ संभवतः कर-निर्धारण, करों में उचित छूट प्रदान करना, जल संबंधी विवादों का निपटारा, कृषकों तथा पशुपालकों के बीच चारागाह-संबंधी विवादों का समाधान, तथा ग्रामीण शिल्पियों के आपसी विवादों का निर्णय भी इन्हीं राजुकों को करना पड़ता था।
प्रादेशिक
‘प्रादेशिक’ अधिकारी अर्थशास्त्र में वर्णित ‘प्रदेष्ट्री’ ही प्रतीत होता है। इसका कार्य मुख्यतः कर-संग्रह करना, मुकदमों की सुनवाई करना, तथा विभिन्न विभागों के अध्यक्षों के कार्यों की सतत निगरानी करना था। अपने तीसरे शिलालेख में अशोक ने युक्त और राजुक के साथ-साथ प्रादेशिकों को भी पंचवर्षीय निरीक्षण-दौरे पर जाने का स्पष्ट आदेश दिया है, जो अपने प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ धर्म-प्रचार का कार्य भी संपन्न करते थे।
अन्य विशिष्ट महामात्र-वर्ग (बारहवाँ शिलालेख)
अशोक के बारहवें शिलालेख में तीन अतिरिक्त महत्वपूर्ण पदाधिकारियों का उल्लेख मिलता है-
स्त्रयाध्यक्ष-महामात्र
कुछ विद्वानों के अनुसार यह पद अर्थशास्त्र में उल्लिखित ‘गणिकाध्यक्ष’ के समकक्ष माना जाता है, किंतु प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर के अनुसार इनका मुख्य कार्यक्षेत्र स्त्रियों से संबंधित विषयों तक ही सीमित था, और इनका अधिकांश कार्यकाल राजकीय अंतःपुर में ही व्यतीत होता था।
ब्रजभूमिक-महामात्र
यह गोचर-भूमि (ब्रज) में निवास करने वाले गोपों (पशुपालकों) की देखरेख करने वाला अधिकारी था। अर्थशास्त्र में गाय, भैंस, बकरी, भेड़, घोड़े तथा ऊँट जैसे पशुओं के समूह को सामूहिक रूप से ‘ब्रज’ कहा गया है। संभवतः ब्रजभूमिक-महामात्र इन्हीं पशुओं के संरक्षण तथा उनकी संख्यात्मक वृद्धि की सतत निगरानी करने वाला अधिकारी था।
अंत-महामात्र और नगर-व्यवहारिक
अशोक के अभिलेखों में ‘अंत-महामात्र’ तथा ‘नगर-व्यवहारिक’ (नगरवियोहालक) नामक पदाधिकारियों का भी विशेष उल्लेख मिलता है। इतिहासकार रायचौधरी अंत-महामात्र की पहचान अर्थशास्त्र के ‘अंतःपाल’ तथा स्कंदगुप्तकालीन ‘गोप्त’ पद से करते हैं। इनका मुख्य कार्य सीमांत प्रांतों में धर्म का प्रचार-प्रसार करना था। रोमिला थापर के अनुसार अंत-महामात्र विशेष रूप से सीमांत जातियों तथा अर्द्ध-सभ्य जनजातियों के मध्य कार्य करते थे, और उन दूरस्थ समुदायों तक सम्राट की नीतियों को सफलतापूर्वक पहुँचाने के लिए उत्तरदायी होते थे।
नगर-व्यवहारिक वस्तुतः नगर का न्यायाधीश होता था, जिसकी पहचान अर्थशास्त्र में उल्लिखित ‘पौर-व्यवहारक’ से की जाती है। अशोक के अभिलेखों में उसे ‘महामात्र’ कहा गया है, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि इस पद की गरिमा कुमार के पद के समकक्ष रही होगी। रोमिला थापर के अनुसार नगर-व्यवहारिक न्यायिक अधिकारी थे, जो ‘नागरक’ नामक वरिष्ठ अधिकारी के अधीन कार्य करते थे, और विशेष परिस्थितियों में नागरक इनके न्यायिक कार्यों में हस्तक्षेप भी कर सकता था।
आयुक्त, पुरुष, प्रतिवेदक और अन्य अधिकारी
अशोक के द्वितीय कलिंग लेख में ‘आयुक्त’ नामक एक अन्य महत्वपूर्ण अधिकारी का उल्लेख मिलता है, जिसकी नियुक्ति स्वयं अशोक ने अपनी नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु की थी। इतिहासकार राधाकुमुद मुकर्जी के अनुसार यह एक प्रांतीय अधिकारी था, जो कुमारों की प्रत्यक्ष देखरेख में कार्य करता था।
प्रथम स्तंभलेख में ‘पुरुष’ नामक एक अन्य अधिकारी का भी उल्लेख मिलता है। अपने चतुर्थ शिलालेख में अशोक कहता है कि राजुक इन ‘पुरुषों’ के आदेशों का भी समुचित पालन करेंगे। प्रसिद्ध इतिहासकार नीलकंठ शास्त्री का मत है कि ‘पुरुष’ राजुक तथा सम्राट के मध्य एक महत्वपूर्ण संपर्क-अधिकारी के रूप में कार्य करते थे, जबकि रोमिला थापर इन्हें एक प्रकार का जन-संपर्क अधिकारी मानती हैं।
अशोक के अभिलेखों में ‘प्रतिवेदक’ नामक एक अन्य महत्वपूर्ण अधिकारी का भी उल्लेख मिलता है। ये प्रतिवेदक वस्तुतः गुप्तचर प्रतीत होते हैं, जिनकी समानता अर्थशास्त्र में वर्णित ‘गूढ़ पुरुष’ से की जा सकती है। ये प्रतिवेदक प्रजा से संबंधित समस्त सूचनाओं के साथ-साथ मंत्रिपरिषद् में उठे हुए किसी भी विवाद की सूचना भी तत्काल शासक तक पहुँचाते थे।
तेरहवें शिलालेख में ‘दूत’ नामक एक अन्य अधिकारी का भी उल्लेख हुआ है, जो सुदूर पड़ोसी राज्यों तथा दूरस्थ प्रांतों में धर्म-प्रचार का कार्य संपन्न करते थे। इन समस्त अधिकारियों के साथ-साथ अशोक के येर्रागुडी लेख में ‘कारणक’ शब्द का भी उल्लेख मिलता है, जो संभवतः तत्कालीन न्यायाधिकारी, अध्यापक अथवा लिपिक (क्लर्क) के लिए प्रयुक्त होता था—परवर्ती काल में प्रचलित ‘कायस्थ’ शब्द भी इसी ‘कारणक’ पद का ही संवादी (समकक्ष) प्रतीत होता है। इसके अतिरिक्त ‘लिपिकर’ नामक अधिकारी शिलाखंडों तथा स्तंभों पर अशोक के धम्म-लेखों को उत्कीर्ण करवाने का विशिष्ट तकनीकी कार्य संपन्न करते थे।
जनकल्याण के लिए किए गए कार्य
अशोक ने मानव-कल्याण के साथ-साथ पशु-कल्याण के लिए भी अत्यंत उल्लेखनीय कार्य किए। अपने सातवें स्तंभ-लेख से यह पता चलता है कि उसने मनुष्यों तथा पशुओं दोनों को छाया प्रदान करने के उद्देश्य से सड़कों के किनारे बड़ी संख्या में बरगद के वृक्ष लगवाए तथा आम्रवाटिकाएँ (आम के बाग) भी रोपित करवाईं। यात्रियों की सुविधा के लिए आधे-आधे कोस (लगभग डेढ़ किलोमीटर) की दूरी पर कुएँ खुदवाए गए और विश्रामगृह बनवाए गए। मनुष्यों तथा पशुओं दोनों के लिए स्थान-स्थान पर अनेक प्याऊ (जल-पान की व्यवस्था) भी स्थापित की गईं।
इसके अतिरिक्त, अशोक ने अपने संपूर्ण साम्राज्य में मनुष्यों तथा पशुओं की चिकित्सा हेतु अलग-अलग चिकित्सालय खुलवाए, जो प्राचीन विश्व में पशु-चिकित्सा (वेटरनरी केयर) के प्रति राजकीय स्तर पर दिखाई गई संवेदनशीलता का एक अत्यंत दुर्लभ एवं उल्लेखनीय उदाहरण है। जहाँ कहीं भी मनुष्यों तथा पशुओं के लिए आवश्यक स्थानीय औषधियाँ उपलब्ध नहीं थीं, वहाँ के लिए विशेष रूप से बाहर से दवाइयाँ मँगवाई गईं। यह विवरण दूसरे शिलालेख में भी मिलता है, जहाँ अशोक पड़ोसी राज्यों (जैसे चोल, पांड्य, सत्तियपुत्त, केरलपुत्र तथा श्रीलंका के ताम्रपर्णी) में भी मानव तथा पशु-चिकित्सा की व्यवस्था करवाने का उल्लेख करता है, जो उसकी जनकल्याणकारी नीति की अंतरराष्ट्रीय व्यापकता को दर्शाता है।
इस प्रकार अशोक की गहन धर्मपरायणता ने उसे अनेकानेक कल्याणकारी कार्यों के लिए सतत प्रेरित किया, जिससे उसका शासन एक ओर अत्यंत केंद्रीकृत होते हुए भी, दूसरी ओर संपूर्ण रूप से मानवीय एवं करुणामय बना रहा।
अशोक के प्रशासन का ऐतिहासिक महत्व
अशोक का प्रशासन प्राचीन विश्व-इतिहास में एक अद्वितीय प्रयोग माना जाता है, जहाँ एक अत्यंत शक्तिशाली, केंद्रीकृत तथा सैन्य दृष्टि से सुदृढ़ साम्राज्य ने स्वेच्छा से करुणा, अहिंसा तथा नैतिकता को अपनी राजकीय नीति का केंद्रीय आधार बनाया। सारनाथ में स्थापित प्रसिद्ध सिंह-स्तंभ (लायन कैपिटल), जिस पर चार सिंह पीठ से पीठ सटाए विराजमान हैं, आज स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय प्रतीक (राजचिह्न) है, और इसके नीचे उत्कीर्ण ‘सत्यमेव जयते’ भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य है। यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि अशोक की प्रशासनिक तथा नैतिक विरासत आज भी आधुनिक भारतीय राष्ट्र-राज्य की पहचान का अभिन्न अंग बनी हुई है। यूनेस्को द्वारा भी अशोक के अनेक अभिलेख विश्व धरोहर स्थलों की श्रेणी में सम्मिलित किए गए हैं, जो इनके सार्वभौमिक ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करता है।
अशोक के प्रशासन से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs
1. अशोक की प्रशासनिक व्यवस्था कैसी थी?
2. अशोक ने प्रशासन में किन प्रमुख अधिकारियों की नियुक्ति की थी?
3. अशोक के प्रशासन में धम्म-महामात्रों का क्या महत्व था?
4. अशोक प्रजा के प्रति अपनी जिम्मेदारी को किस रूप में देखते थे?
5. अशोक के प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
6. अशोक ने न्याय-व्यवस्था में कौन-से क्रांतिकारी सुधार किए?
7. अशोक के अभिलेख किन-किन लिपियों में मिलते हैं?
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