प्राचीन भारतीय इतिहास के पुरातात्त्विक स्रोत
प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में पुरातात्त्विक स्रोतों का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। साहित्यिक स्रोत जहाँ अनेक बार धार्मिक, पौराणिक अथवा राजाश्रित दृष्टिकोण से प्रभावित होते हैं, वहीं पुरातात्त्विक स्रोत अपेक्षाकृत अधिक प्रामाणिक, वस्तुनिष्ठ और विश्वसनीय माने जाते हैं। ये स्रोत तत्कालीन समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, धर्म, प्रशासन, कला तथा तकनीकी विकास का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। प्राचीन काल में निर्मित भवनों, दुर्गों, मंदिरों, गुफाओं, स्तूपों, मूर्तियों, अभिलेखों, मुद्राओं, सिक्कों, मृद्भांडों तथा उत्खननों से प्राप्त अवशेषों के आधार पर प्राचीन भारत के इतिहास का पुनर्निर्माण किया जा सकता है।
पुरातत्त्व से आशय उन भौतिक अवशेषों के वैज्ञानिक अध्ययन से है, जो प्राचीन मानव जीवन तथा उसकी सभ्यता और संस्कृति का परिचय कराते हैं। उत्खनन से प्राप्त नगरों, बस्तियों, धार्मिक स्थलों, उपकरणों तथा दैनिक उपयोग की वस्तुओं के माध्यम से तत्कालीन जीवन के विभिन्न पक्षों की जानकारी प्राप्त होती है। अनेक बार प्राकृतिक आपदाओं अथवा अन्य कारणों से संपूर्ण नगर धरती के भीतर दब गए, जिनके वैज्ञानिक उत्खनन से इतिहास के नए अध्याय उद्घाटित हुए।
भारतीय पुरातत्त्व के इतिहास में 1921–22 ई. एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध हुआ। इसी काल में हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो के उत्खनन से एक विकसित नगरीय सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए, जिसे आज सिंधु अथवा सैंधव सभ्यता के नाम से जाना जाता है। इन उत्खननों से सुव्यवस्थित नगर योजना, पक्की ईंटों से निर्मित भवन, जल-निकासी व्यवस्था, विशाल अन्नागार, स्नानागार, मुद्राएँ, आभूषण, मृद्भांड तथा अनेक कलात्मक वस्तुएँ प्राप्त हुईं। इन खोजों ने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय उपमहाद्वीप में ईसा पूर्व तृतीय सहस्राब्दी में ही अत्यंत विकसित नगरीय सभ्यता विद्यमान थी। इस प्रकार पुरातात्त्विक खोजों ने भारतीय इतिहास की प्राचीनता और समृद्धि को प्रमाणित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पुरातात्त्विक सामग्री का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसके अंतर्गत अभिलेख, शिलालेख, ताम्रपत्र, सिक्के, मुद्राएँ, स्मारक, भवन, गुफाएँ, स्तूप, मंदिर, मूर्तियाँ, चित्रकला, मृद्भांड, धातु उपकरण तथा उत्खननों से प्राप्त अन्य अवशेष सम्मिलित हैं। इन स्रोतों के माध्यम से विभिन्न राजवंशों, राजनीतिक घटनाओं, धार्मिक आंदोलनों, आर्थिक गतिविधियों, सामाजिक व्यवस्था तथा सांस्कृतिक विकास के संबंध में प्रमाणिक जानकारी प्राप्त होती है। यही कारण है कि इतिहासकार साहित्यिक स्रोतों की अपेक्षा पुरातात्त्विक स्रोतों को अधिक विश्वसनीय मानते हैं।
अभिलेख एवं शिलालेख
पुरातात्त्विक स्रोतों में अभिलेखों का स्थान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। अभिलेख किसी शासक, संस्था अथवा व्यक्ति द्वारा पत्थर, स्तंभ, ताम्रपत्र, धातु, मिट्टी, मूर्ति अथवा अन्य स्थायी माध्यमों पर उत्कीर्ण कराए गए लेख होते हैं। इनमें तत्कालीन प्रशासन, धार्मिक नीतियों, भूमि-अनुदानों, युद्धों, विजयों तथा सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का उल्लेख मिलता है। जिन अभिलेखों पर तिथि अंकित नहीं होती, उनका काल निर्धारण अक्षरों की बनावट, लिपि और भाषा के आधार पर किया जाता है। इस प्रकार अभिलेख प्राचीन भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अभिलेखों के अध्ययन को पुरालेखशास्त्र (एपिग्राफी) कहा जाता है। भारत में इस विषय के वैज्ञानिक अध्ययन का प्रारंभ उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ। 1837 ई. में जेम्स प्रिन्सेप ने ब्राह्मी तथा खरोष्ठी लिपियों का सफलतापूर्वक पठन किया। यह भारतीय इतिहास के अध्ययन में एक क्रांतिकारी उपलब्धि सिद्ध हुई। प्रिंसेप ने अनेक अभिलेखों और सिक्कों पर अंकित ‘देवानंप्रिय प्रियदर्शी’ उपाधि का संबंध सम्राट अशोक से स्थापित किया। बाद में बौद्ध ग्रंथों तथा अन्य स्रोतों के आधार पर यह प्रमाणित हुआ कि यह उपाधि मौर्य सम्राट अशोक की थी। इस खोज के फलस्वरूप मौर्यकालीन इतिहास तथा प्राचीन भारत के राजनीतिक इतिहास के अध्ययन को नई दिशा प्राप्त हुई।
इसके उपरांत भारतीय तथा यूरोपीय विद्वानों ने विभिन्न भाषाओं और लिपियों में उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर अनेक प्राचीन राजवंशों की वंशावलियों तथा राजनीतिक इतिहास का पुनर्निर्माण किया। 1877 ई. में अलेक्ज़ेंडर कनिंघम के संपादन में कॉर्पस इन्स्क्रिप्शनम इंडिकारम का प्रथम खंड प्रकाशित हुआ, जिसमें मौर्य, उत्तर-मौर्य तथा गुप्तकालीन अभिलेखों का व्यवस्थित संकलन किया गया। भारतीय विद्वानों ने भी अभिलेखों के संग्रह और संपादन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया, जिसके कारण भारतीय इतिहास के अनेक अज्ञात पक्ष प्रकाश में आए।
अब तक विभिन्न कालों से संबंधित हजारों अभिलेख प्राप्त हो चुके हैं। यद्यपि सैंधव सभ्यता की मुद्राओं और मुहरों पर अंकित लिपि भारत की सर्वप्राचीन लिपि मानी जाती है, किंतु उसका अभी तक सफलतापूर्वक पठन नहीं हो सका है। इसलिए ऐतिहासिक दृष्टि से पढ़े जा सकने वाले प्रारंभिक अभिलेखों में पिपरहवा से प्राप्त पिपरहवा धातु-मंजूषा अभिलेख, महास्थान का महास्थान अभिलेख, सोहगौरा का सोहगौरा ताम्रपत्र तथा बैराट क्षेत्र से प्राप्त प्रारंभिक अभिलेख विशेष महत्त्व रखते हैं। महास्थान अभिलेख तथा सोहगौरा ताम्रपत्र तत्कालीन खाद्यान्न भंडारण एवं अकाल-निवारण संबंधी प्रशासनिक व्यवस्था की जानकारी प्रदान करते हैं, जबकि पिपरहवा अभिलेख भगवान बुद्ध के अस्थि-अवशेषों से संबंधित महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत करता है।
मौर्यकाल से अभिलेखों की परंपरा अधिक संगठित और व्यापक रूप में दिखाई देती है। विशेषतः सम्राट अशोक ने अपने शासन की नीतियों, धम्म, प्रशासनिक व्यवस्था तथा लोककल्याण संबंधी विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए साम्राज्य के विभिन्न भागों में शिलाओं, स्तंभों और गुफाओं पर अभिलेख उत्कीर्ण कराए। इन अभिलेखों ने न केवल मौर्य साम्राज्य के इतिहास को स्पष्ट किया, बल्कि संपूर्ण प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन को भी एक ठोस और प्रमाणिक आधार प्रदान किया।
प्राचीन भारतीय इतिहास में सम्राट अशोक के अभिलेखों का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान है। अशोक प्रथम भारतीय शासक था जिसने अपने शासन के सिद्धांतों, प्रशासनिक नीतियों तथा धम्म के प्रचार के लिए व्यवस्थित रूप से अभिलेखों का प्रयोग किया। उसके अभिलेखों से मौर्य साम्राज्य की शासन व्यवस्था, धार्मिक नीति, लोककल्याणकारी कार्यक्रमों, न्याय-व्यवस्था तथा समकालीन सामाजिक जीवन की प्रामाणिक जानकारी प्राप्त होती है। सामान्यतः माना जाता है कि अभिलेख अंकित कराने की प्रेरणा अशोक को ईरानी सम्राट डेरियस प्रथम की अभिलेखीय परंपरा से मिली थी, किंतु उसने इस परंपरा को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित किया।
अशोक के अभिलेखों को मुख्यतः तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है—शिलालेख, स्तंभलेख तथा गुहालेख। शिलालेखों में प्रमुख स्थान चतुर्दश शिलालेखों का है, जो साम्राज्य के विभिन्न भागों में उत्कीर्ण कराए गए थे। ये शिलालेख शाहबाज़गढ़ी, मानसेहरा, कालसी, गिरनार, धौली तथा जौगढ़ सहित अनेक स्थानों से प्राप्त हुए हैं। इनके अतिरिक्त रूपनाथ, सासाराम, बैराट, मास्की, ब्रह्मगिरि, सिद्धपुर तथा जटिंग-रामेश्वर से प्राप्त लघु शिलालेख भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। लघु शिलालेखों में अशोक ने बौद्ध संघ के प्रति अपनी श्रद्धा, नैतिक जीवन तथा धम्म के पालन पर विशेष बल दिया है।
अशोक के स्तंभलेख भी ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। इनमें धर्म, नैतिक आचरण, प्रजा के कल्याण तथा प्रशासनिक उत्तरदायित्व का विस्तृत उल्लेख मिलता है। पंचम स्तंभलेख में अनेक पशु-पक्षियों की हत्या पर प्रतिबंध तथा अहिंसा के सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया है। षष्ठम स्तंभलेख में अशोक ने स्वयं को सदैव प्रजा के कल्याण के लिए समर्पित शासक बताया है। वह घोषित करता है कि चाहे वह भोजन कर रहा हो, राजमहल में हो, उद्यान में हो अथवा यात्रा पर, उसके अधिकारी हर समय प्रजा की समस्याओं से उसे अवगत कराएँ। इससे स्पष्ट होता है कि अशोक जनकल्याण और उत्तरदायी शासन का समर्थक था।
अशोक के अधिकांश अभिलेख ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा में उत्कीर्ण हैं। उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में प्राप्त अभिलेख खरोष्ठी लिपि में तथा अफ़ग़ानिस्तान क्षेत्र से प्राप्त कुछ अभिलेख यूनानी (ग्रीक) और आरमेइक भाषाओं में भी लिखे गए हैं। खरोष्ठी लिपि दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी, जबकि ब्राह्मी लिपि बाएँ से दाएँ लिखी जाती थी। भारत की अधिकांश आधुनिक लिपियों का विकास ब्राह्मी से हुआ माना जाता है।
मौर्यकालीन गुहालेख
मौर्यकालीन गुहालेख भी प्राचीन भारतीय इतिहास के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। अब तक मौर्यकाल की सात प्रमुख गुफाएँ प्राप्त हुई हैं, जिनमें चार बिहार की बराबर गुफाएँ तथा तीन नागार्जुनी गुफाएँ पहाड़ियों में स्थित हैं। बराबर गुफाओं में अशोक के तथा नागार्जुनी गुफाओं में उसके उत्तराधिकारी सम्राट दशरथ के अभिलेख उत्कीर्ण हैं। इन गुफाओं को आजीवक संप्रदाय के साधुओं के निवास हेतु दान दिया गया था। इन अभिलेखों से मौर्य शासकों की धार्मिक सहिष्णुता तथा विभिन्न संप्रदायों के प्रति उदार नीति का परिचय मिलता है।
उत्तर-मौर्यकालीन अभिलेख एवं प्रशस्तियाँ
अशोक के पश्चात् अभिलेखों का स्वरूप अधिक विविध हो गया। इन्हें सामान्यतः दो वर्गों—राजकीय अभिलेख और निजी अभिलेख—में विभाजित किया जाता है। राजकीय अभिलेखों में प्रशस्तियाँ, विजय-लेख तथा भूमि-अनुदान संबंधी ताम्रपत्र प्रमुख हैं। प्रशस्तियाँ सामान्यतः राजकवियों द्वारा शासकों की उपलब्धियों, विजयों तथा गुणों के वर्णन के उद्देश्य से लिखी जाती थीं, किंतु इनमें निहित ऐतिहासिक तथ्य इतिहास-लेखन की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
इस प्रकार की प्रशस्तियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रयाग प्रशस्ति है, जिसकी रचना समुद्रगुप्त के राजकवि हरिषेण ने की थी। यह प्रयागराज स्थित अशोक स्तंभ पर उत्कीर्ण है। इससे समुद्रगुप्त की दिग्विजय, दक्षिणापथ अभियान, सीमांत राज्यों तथा उसकी राजनीतिक नीति की विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। गुप्तकालीन इतिहास के पुनर्निर्माण में इस प्रशस्ति का विशेष योगदान है।
इसी प्रकार हाथीगुम्फा अभिलेख कलिंग नरेश खारवेल के शासन का प्रमुख स्रोत है। यह प्राकृत भाषा में उत्कीर्ण प्राचीनतम प्रशस्तियों में से एक है तथा इससे कलिंग के राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास की जानकारी मिलती है। रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख संस्कृत भाषा का प्रारंभिक विस्तृत अभिलेख माना जाता है। इससे शक क्षत्रप रुद्रदामन प्रथम की उपलब्धियों तथा सुदर्शन झील के पुनर्निर्माण का विवरण प्राप्त होता है।
अन्य महत्त्वपूर्ण अभिलेखों में गौतमी बलश्री का नासिक अभिलेख, स्कंदगुप्त के भितरी तथा जूनागढ़ अभिलेख, मालवा नरेश यशोधर्मन का मंदसौर अभिलेख, चालुक्य नरेश पुलकेशिन् द्वितीय का ऐहोल अभिलेख तथा बंगाल के सेनवंशी शासक विजयसेन का देवपाड़ा अभिलेख उल्लेखनीय हैं। इन अभिलेखों से विभिन्न राजवंशों की वंशावली, विजयों, प्रशासन, धार्मिक नीतियों तथा सांस्कृतिक उपलब्धियों का विस्तृत ज्ञान प्राप्त होता है।
प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में अभिलेख सर्वाधिक विश्वसनीय स्रोत हैं। इनके आधार पर राजवंशों का कालक्रम, शासकों की वंशावली, प्रशासनिक व्यवस्था, राजस्व प्रणाली, धार्मिक नीति, सामाजिक संरचना, आर्थिक जीवन तथा सांस्कृतिक विकास का प्रामाणिक पुनर्निर्माण संभव हुआ है। अनेक ऐसी ऐतिहासिक घटनाएँ, जिनका उल्लेख साहित्यिक ग्रंथों में नहीं मिलता, अभिलेखों के माध्यम से प्रकाश में आई हैं। इसी प्रकार ताम्रपत्रों से भूमि-अनुदान, ग्राम प्रशासन तथा स्थानीय शासन की जानकारी प्राप्त होती है।
ताम्रलेख एवं निजी अभिलेख
प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में ताम्रलेखों का विशेष महत्त्व है। अधिकांश ताम्रलेख भूमि-अनुदान, प्रशासनिक आदेश तथा राजकीय घोषणाओं से संबंधित हैं। इन पर दान में दिए गए ग्राम अथवा भूमि की सीमाओं, दान के उद्देश्य, प्राप्तकर्ता, दान के अवसर तथा तत्कालीन शासक की उपलब्धियों का विस्तृत उल्लेख मिलता है। इन अभिलेखों के आधार पर प्रशासनिक व्यवस्था, भूमि-अनुदान प्रणाली, राजस्व व्यवस्था तथा सामाजिक-आर्थिक संरचना का पुनर्निर्माण किया जाता है।
भारत का प्राचीनतम ताम्रलेख सामान्यतः सोहगौरा से प्राप्त सोहगौरा ताम्रपत्र माना जाता है, जिसकी खोज 1893 ई. में हुई थी। यह अभिलेख प्राक्-मौर्य अथवा आरंभिक मौर्यकाल का माना जाता है तथा अकाल की स्थिति में खाद्यान्न भंडारण और वितरण की प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रकाश डालता है। इसके अतिरिक्त गुजरात के संजेली क्षेत्र से हूण शासक तोरमाण का ताम्रलेख प्राप्त हुआ है। सम्राट हर्षवर्धन के बांसखेड़ा तथा मधुबन ताम्रपत्र उसके प्रशासन, दान-व्यवस्था तथा राजकीय नीतियों की जानकारी प्रदान करते हैं।
भूमि-अनुदान संबंधी ताम्रपत्र विशेष रूप से गुप्तोत्तर एवं पूर्वमध्यकाल में बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं। इनमें दान की गई भूमि की सीमाओं, अधिकारों, करों से छूट तथा दानग्राही के विशेषाधिकारों का विस्तृत विवरण मिलता है। इन अभिलेखों से यह स्पष्ट होता है कि छठी से बारहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य भूमि-अनुदान की परंपरा अत्यधिक विकसित हो गई थी। इसी आधार पर अनेक इतिहासकार इस काल में सामंतवादी प्रवृत्तियों के विकास का उल्लेख करते हैं। प्रारंभिक भूमि-अनुदानों का उल्लेख नानाघाट के नानाघाट अभिलेख में मिलता है, जहाँ ब्राह्मणों एवं धार्मिक संस्थाओं को दान दिए जाने का उल्लेख प्राप्त होता है।
राजकीय अभिलेखों के अतिरिक्त निजी अभिलेख भी इतिहास के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। ये प्रायः मंदिरों, मूर्तियों, स्तंभों तथा धार्मिक स्मारकों पर उत्कीर्ण मिलते हैं। इनसे मंदिर-निर्माण, मूर्ति-प्रतिष्ठा, धार्मिक दान तथा स्थानीय सामाजिक जीवन की जानकारी प्राप्त होती है। साथ ही इन पर अंकित तिथियों के आधार पर संबंधित स्थापत्य एवं मूर्तिकला का काल-निर्धारण भी संभव हो पाता है।
निजी अभिलेखों में हेलियोडोरस का गरुड़ स्तंभ लेख अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह यवन राजदूत हेलियोडोरस द्वारा स्थापित कराया गया था और प्राकृत भाषा तथा ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण है। यह भागवत अथवा वैष्णव धर्म का प्राचीनतम अभिलेखीय प्रमाण माना जाता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि विदेशी मूल के लोग भी भारतीय धार्मिक परंपराओं से प्रभावित हो रहे थे। इसी प्रकार मध्य प्रदेश के एरण से प्राप्त वाराह प्रतिमा पर उत्कीर्ण हूण शासक तोरमाण का अभिलेख उत्तर भारत में हूण सत्ता तथा समकालीन धार्मिक परिस्थितियों की जानकारी प्रदान करता है। ऐसे अभिलेख तत्कालीन मूर्तिकला, स्थापत्य-कला तथा धार्मिक जीवन के अध्ययन में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होते हैं।
प्राचीन भारतीय अभिलेख मुख्यतः प्राकृत, पालि तथा संस्कृत भाषाओं में प्राप्त हुए हैं। मौर्यकाल तथा गुप्त-पूर्व काल के अधिकांश अभिलेख प्राकृत भाषा में हैं और उनमें बौद्ध तथा जैन धर्म का व्यापक उल्लेख मिलता है। गुप्तकाल से संस्कृत भाषा का प्रभाव बढ़ने लगा और अधिकांश प्रशस्तियाँ तथा राजकीय अभिलेख संस्कृत में रचित होने लगे। इससे तत्कालीन ब्राह्मण धर्म, राजकीय संरक्षण तथा संस्कृत साहित्य के उत्कर्ष का भी ज्ञान होता है।
अभिलेखों का महत्त्व
अभिलेख प्राचीन भारत के राजनीतिक इतिहास के सबसे प्रामाणिक स्रोत माने जाते हैं। इनके आधार पर विभिन्न राजवंशों की वंशावलियाँ, शासन-काल, विजयों, प्रशासनिक नीतियों तथा साम्राज्य-विस्तार का स्पष्ट ज्ञान प्राप्त होता है। उदाहरणार्थ, रुद्रदामन के जूनागढ़ शिलालेख से शक क्षत्रप रुद्रदामन प्रथम के साथ उसके पूर्वजों की वंशावली तथा सुदर्शन झील के पुनर्निर्माण की जानकारी मिलती है। इसी अभिलेख में मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त तथा अशोक का भी उल्लेख प्राप्त होता है। समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति से उसके विजय अभियानों, दक्षिणापथ नीति तथा अधीनस्थ राज्यों का विस्तृत विवरण मिलता है। मौर्य एवं गुप्तकालीन अभिलेखों से यह भी ज्ञात होता है कि विशाल साम्राज्यों को विभिन्न प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया गया था तथा प्रांतीय प्रशासन सुव्यवस्थित ढंग से संचालित होता था। इस प्रकार अभिलेख प्राचीन भारतीय राजनीतिक एवं प्रशासनिक इतिहास के पुनर्निर्माण का सबसे विश्वसनीय आधार प्रस्तुत करते हैं।
अभिलेख केवल राजनीतिक इतिहास के स्रोत ही नहीं हैं, बल्कि तत्कालीन समाज और अर्थव्यवस्था के अध्ययन के भी अत्यंत विश्वसनीय आधार हैं। इनमें सामाजिक संरचना, जाति-व्यवस्था, व्यवसाय, मनोरंजन, कृषि, व्यापार तथा विभिन्न आर्थिक संस्थाओं के संबंध में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। सम्राट अशोक के अभिलेखों में समाज के सभी वर्गों के प्रति सद्व्यवहार, नैतिक आचरण तथा धार्मिक सहिष्णुता पर बल दिया गया है। गुप्तकालीन अभिलेखों में कायस्थ, चांडाल तथा अन्य सामाजिक वर्गों का उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त आखेट (मृगया), संगीत, द्यूतक्रीड़ा तथा अन्य मनोरंजन के साधनों का भी उल्लेख प्राप्त होता है।
अभिलेखों से कृषि, पशुपालन, उद्योग और व्यापार की उन्नत स्थिति का भी ज्ञान होता है। अनेक ताम्रपत्रों में भूमि-अनुदान, कृषि योग्य भूमि, सिंचाई व्यवस्था तथा करों का उल्लेख मिलता है। नालंदा ताम्रपत्रों से तत्कालीन समृद्ध आर्थिक जीवन तथा भोजन की उत्कृष्ट व्यवस्था का परिचय प्राप्त होता है। व्यापारिक निगमों (निगम) तथा श्रेणियों (गिल्ड) का उल्लेख भी अनेक अभिलेखों में मिलता है, जिससे ज्ञात होता है कि उस समय व्यापारिक संगठन अत्यंत विकसित थे और वे आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ बैंकिंग संबंधी कार्य भी करते थे।
मंदसौर के अभिलेख में कुमारगुप्त के शासनकाल के दौरान पट्टवाय (रेशम बुनकर) श्रेणी द्वारा सूर्य मंदिर के निर्माण और उसके जीर्णोद्धार का उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि व्यापारिक श्रेणियाँ केवल आर्थिक संस्थाएँ ही नहीं थीं, बल्कि धार्मिक एवं सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय भागीदारी निभाती थीं। मंदसौर के रेशमी वस्त्रों की प्रसिद्धि का उल्लेख यह प्रमाणित करता है कि भारतीय वस्त्र उद्योग उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित था।
अभिलेखों से विभिन्न कालों की धार्मिक स्थिति तथा सांस्कृतिक विकास का भी विस्तृत ज्ञान प्राप्त होता है। अशोक के अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि कलिंग युद्ध के पश्चात वह बौद्ध धर्म से गहरे रूप में प्रभावित हुआ तथा उसने धम्म के माध्यम से नैतिक जीवन, अहिंसा, करुणा और धार्मिक सहिष्णुता का प्रचार किया। अपने द्वादश शिलालेख में उसने सभी धर्मों के प्रति सम्मान रखने तथा एक-दूसरे के धर्म को सुनने और समझने की प्रेरणा दी। इससे तत्कालीन धार्मिक सहिष्णुता और सांप्रदायिक सद्भाव की नीति का परिचय मिलता है।
उदयगिरि गुफाओं के हाथीगुम्फा अभिलेख से कलिंग में जैन धर्म के संरक्षण तथा खारवेल की धार्मिक नीति का ज्ञान होता है। गुप्तकालीन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि गुप्त सम्राट मुख्यतः वैष्णव धर्म के अनुयायी थे, किंतु उन्होंने अन्य धार्मिक परंपराओं को भी संरक्षण प्रदान किया। विभिन्न अभिलेखों में सूर्य, शिव, शक्ति, गणेश तथा अन्य देवताओं की उपासना का उल्लेख मिलता है, जिससे तत्कालीन धार्मिक जीवन की बहुलतावादी प्रकृति स्पष्ट होती है।
अभिलेखों से यह भी ज्ञात होता है कि विदेशी मूल के शासकों—विशेषतः शकों और कुषाणों ने भारतीय संस्कृति, धर्म और भाषा को अपनाया। उन्होंने भारतीय उपाधियाँ धारण कीं, संस्कृत और प्राकृत का प्रयोग किया तथा भारतीय धार्मिक परंपराओं का संरक्षण किया। इस प्रकार अभिलेख भारतीय संस्कृति की समन्वयकारी प्रवृत्ति के महत्त्वपूर्ण साक्ष्य हैं।
अभिलेख संस्कृत और प्राकृत साहित्य के विकास के भी महत्त्वपूर्ण प्रमाण हैं। इनसे तत्कालीन गद्य, पद्य तथा चंपू शैली के विकास का परिचय मिलता है। शक क्षत्रप रुद्रदामन प्रथम का जूनागढ़ अभिलेख संस्कृत गद्य का प्रारंभिक एवं उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। इसकी भाषा, शैली, अलंकार और साहित्यिक अभिव्यक्ति अत्यंत परिष्कृत है।
समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति, जिसे उसके राजकवि हरिषेण ने रचा था, गद्य और पद्य के मिश्रण से निर्मित चंपू शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसी प्रकार मंदसौर का पट्टवाय श्रेणी अभिलेख, यशोधर्मन के अभिलेख तथा पुलकेशिन् द्वितीय का ऐहोल अभिलेख संस्कृत काव्य-शैली के श्रेष्ठ नमूने माने जाते हैं। इन अभिलेखों के माध्यम से हरिषेण, वत्सभट्टि तथा रविकीर्ति जैसे अनेक विद्वान कवियों का परिचय प्राप्त होता है, जिनका उल्लेख अन्य साहित्यिक स्रोतों में बहुत कम मिलता है।
कुछ अभिलेख तत्कालीन व्यापारिक जीवन और शिल्पकला के रोचक प्रमाण भी प्रस्तुत करते हैं। मंदसौर अभिलेख में वहाँ के रेशमी वस्त्रों की उत्कृष्टता का अत्यंत साहित्यिक शैली में वर्णन किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि अभिलेख केवल राजकीय घोषणाएँ ही नहीं थे, बल्कि उनमें साहित्यिक सौंदर्य, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति तथा सामाजिक जीवन के विविध पक्ष भी समाहित थे।
इस प्रकार अभिलेख प्राचीन भारतीय इतिहास के सर्वाधिक विश्वसनीय एवं प्रामाणिक स्रोत हैं। इनके आधार पर विभिन्न राजवंशों की वंशावली, राजनीतिक घटनाओं, प्रशासनिक व्यवस्था, आर्थिक जीवन, धार्मिक प्रवृत्तियों, सामाजिक संरचना तथा साहित्यिक विकास का वैज्ञानिक पुनर्निर्माण संभव हुआ है। अनेक ऐसे ऐतिहासिक तथ्य, जिनका उल्लेख साहित्यिक ग्रंथों में नहीं मिलता, अभिलेखों के माध्यम से ही ज्ञात हुए हैं। इसलिए भारतीय इतिहास-लेखन में अभिलेखों का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है और वे प्राचीन भारत की सभ्यता, संस्कृति तथा शासन-व्यवस्था के अध्ययन का सबसे सुदृढ़ आधार माने जाते हैं।
विदेशों से प्राप्त अभिलेख
विदेशों से प्राप्त अनेक अभिलेख भी प्राचीन भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एशिया माइनर के बोगजकोई से ईसा पूर्व चौदहवीं शताब्दी का एक संधि-पत्र प्राप्त हुआ है, जिसमें वैदिक देवताओं—इंद्र, मित्र, वरुण तथा नासत्य का उल्लेख मिलता है। इससे वैदिक आर्यों और पश्चिमी एशिया के मध्य सांस्कृतिक संबंधों का संकेत मिलता है। इसी प्रकार मिस्र के टेल-एल-अमरना से प्राप्त मिट्टी की तख्तियों में ऐसे शासकों के नाम मिलते हैं, जिनकी समानता भारत और ईरान के आर्य नामों से की जाती है। ईरान के पर्सेपोलिस तथा बेहिस्तून अभिलेखों से ज्ञात होता है कि आकेमेनिड शासक दारा प्रथम ने सिंधु क्षेत्र पर अधिकार स्थापित किया था। बेहिस्तून अभिलेख में ‘हिंदुश’ शब्द का उल्लेख भारतीय उपमहाद्वीप के लिए प्रयुक्त प्रारम्भिक विदेशी अभिलेखीय साक्ष्यों में से एक माना जाता है।
यद्यपि अभिलेख अत्यंत प्रामाणिक स्रोत हैं, फिर भी उनकी कुछ सीमाएँ हैं। समय के प्रभाव से अनेक अभिलेख क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, जिससे उनका पठन कठिन हो जाता है। कई बार शब्दों एवं वाक्यों का वास्तविक अर्थ निर्धारित करना भी चुनौतीपूर्ण होता है। राजकीय प्रशस्तियों में शासकों की उपलब्धियों का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन भी मिलता है। इसके बावजूद अभिलेखों में पाठ-भेद और प्रक्षेप की संभावना अत्यल्प होती है, इसलिए वे प्राचीन भारतीय इतिहास के सबसे विश्वसनीय एवं प्रमाणिक स्रोतों में गिने जाते हैं।
मुद्राएँ
प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में मुद्राओं (सिक्कों) का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे तत्कालीन राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक तथा कलात्मक जीवन के विश्वसनीय स्रोत हैं। प्राचीन शासक अपनी विजयों, विशेष उपलब्धियों, धार्मिक आस्था अथवा राजकीय अधिकार के प्रतीक के रूप में विभिन्न धातुओं के सिक्के जारी करते थे। इन सिक्कों पर अंकित शासकों के नाम, उपाधियाँ, चित्र, देव-प्रतिमाएँ, प्रतीक, लिपियाँ तथा लेख इतिहास के पुनर्निर्माण में अमूल्य योगदान देते हैं। विभिन्न कालों और क्षेत्रों से प्राप्त सिक्कों के अध्ययन से राजवंशों के कालक्रम, व्यापारिक गतिविधियों, धार्मिक प्रवृत्तियों तथा कला के विकास का प्रामाणिक ज्ञान प्राप्त होता है।
भारत के प्राचीनतम सिक्के आहत मुद्राएँ (पंच-मार्क्ड कॉइन्स) कहलाते हैं। इन पर पर्वत, वृक्ष, सूर्य, चंद्र, पक्षी, पशु, मानव, पुष्प तथा विभिन्न ज्यामितीय चिह्न अंकित होते थे। इन सिक्कों पर किसी शासक का नाम अथवा चित्र नहीं होता था, बल्कि अनेक प्रतीकों को पंच-चिह्न के रूप में अंकित किया जाता था। आहत मुद्राओं की पहली खोज उन्नीसवीं शताब्दी में तमिलनाडु के कोयंबटूर क्षेत्र से हुई थी। ये प्रायः चाँदी की तथा आयताकार अथवा अनियमित आकार की होती थीं। इनका सर्वाधिक बड़ा भंडार आंध्र प्रदेश के अमरावती से प्राप्त हुआ है, जहाँ हजारों आहत सिक्के मिले हैं। विद्वानों का मत है कि इनका प्रचलन केवल राजसत्ता तक सीमित नहीं था, बल्कि व्यापारिक समुदायों और स्थानीय संस्थाओं द्वारा भी इनका उपयोग किया जाता था।
उत्तर-मौर्य काल से विभिन्न धातुओं—ताँबा, काँसा, सीसा, पोटीन, चाँदी तथा सोना के सिक्कों का व्यापक प्रचलन हुआ। भारतीय मुद्राशास्त्र में हिंद-यूनानी शासकों का विशेष योगदान माना जाता है। उन्होंने सर्वप्रथम अपने सिक्कों पर शासक की प्रतिमा, नाम तथा उपाधि अंकित कराई। उनके सिक्कों पर लेख और तिथि भी अंकित मिलती है, जिससे राजनीतिक इतिहास के पुनर्निर्माण में विशेष सहायता मिलती है। हिंद-यूनानी शासक डेमेट्रियस द्वितीय को द्विभाषी एवं द्विलिपिक सिक्कों के प्रचलन का श्रेय दिया जाता है। बाद में शक, कुषाण तथा अनेक भारतीय शासकों ने भी इसी परंपरा का अनुसरण किया।
भारत में स्वर्ण मुद्राओं का व्यापक प्रचलन प्रथम शताब्दी ईस्वी में कुषाण शासक विम कडफिसेस के समय से प्रारंभ हुआ। इन स्वर्ण मुद्राओं का आकार एवं भार रोमन और पार्थियन सिक्कों से प्रभावित था। कुषाणों की स्वर्ण मुद्राएँ उच्च शुद्धता के लिए प्रसिद्ध थीं, जबकि स्वर्ण मुद्राओं का सर्वाधिक निर्गमन गुप्तकाल में हुआ। इन सिक्कों से तत्कालीन आर्थिक समृद्धि तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार का भी प्रमाण मिलता है। कुषाण सम्राट कनिष्क की मुद्राओं पर भारतीय, ईरानी तथा यूनानी देवताओं के चित्र अंकित हैं, जो उसकी धार्मिक उदारता और बहुसांस्कृतिक दृष्टिकोण को व्यक्त करते हैं।
भारतीय सिक्कों से अनेक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य ज्ञात होते हैं। सातवाहन शासक यज्ञश्री सातकर्णि की कुछ मुद्राओं पर जलपोत का चित्र अंकित है, जो समुद्री व्यापार और नौसैनिक गतिविधियों का संकेत देता है। समुद्रगुप्त की वीणा-वादक प्रकार की स्वर्ण मुद्राएँ उसकी कलाप्रियता तथा संगीत-रुचि का परिचय देती हैं, जबकि चन्द्रगुप्त द्वितीय की सिंह-वध तथा व्याघ्र-वध प्रकार की मुद्राएँ उसकी सैन्य शक्ति और विजयों की प्रतीक हैं। व्यापारिक निगमों तथा श्रेणियों द्वारा भी मुद्राएँ जारी की जाती थीं, जिनसे उनके आर्थिक संगठन और व्यापारिक गतिविधियों का ज्ञान प्राप्त होता है।
दक्षिण भारत के अरिकामेडु, कोडुमनाल, करूर तथा अन्य पुरास्थलों से बड़ी संख्या में रोमन स्वर्ण एवं रजत सिक्के प्राप्त हुए हैं। ये सिक्के इस तथ्य के सशक्त प्रमाण हैं कि भारत का रोमन साम्राज्य के साथ व्यापक समुद्री व्यापार था। इसी प्रकार पंजाब और हरियाणा क्षेत्र में यौधेय गणराज्य द्वारा जारी ताँबे के हजारों सिक्के प्राप्त हुए हैं, जिनसे गणराज्यों की राजनीतिक स्वायत्तता तथा व्यापारिक सक्रियता का पता चलता है। सातवाहनों ने भारत में सर्वप्रथम बड़े पैमाने पर सीसे के सिक्कों का प्रचलन किया, जो दक्कन क्षेत्र की विशिष्ट मुद्रा-परंपरा का परिचायक है।
छठी शताब्दी ईस्वी के बाद स्वर्ण मुद्राओं की संख्या में उल्लेखनीय कमी दिखाई देती है। अनेक इतिहासकार इसे रोमन साम्राज्य के पतन तथा दूरवर्ती अंतरराष्ट्रीय व्यापार में आई गिरावट से जोड़ते हैं। फलतः विदेशी व्यापार से समृद्ध होने वाले राज्यों और व्यापारिक केंद्रों की आर्थिक स्थिति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इस प्रकार मुद्राएँ प्राचीन भारतीय इतिहास के राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक अध्ययन की अत्यंत विश्वसनीय और महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।
सील एवं मुहरें
प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में सील और मुहरों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्राचीन काल में प्रशासनिक, व्यापारिक, धार्मिक तथा व्यक्तिगत उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मिट्टी, ताम्र, कांस्य, पत्थर तथा अन्य धातुओं की मुहरें बनाई जाती थीं। भारत की सर्वप्राचीन मुहरें सिंधु-सरस्वती (हड़प्पा) सभ्यता के विभिन्न स्थलों से प्राप्त हुई हैं। इन पर पशु-पक्षियों, मानवाकृतियों, धार्मिक प्रतीकों तथा अपठित सिंधु लिपि के चिह्न अंकित हैं। यद्यपि सिंधु लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है, फिर भी इन मुहरों से तत्कालीन सामाजिक जीवन, धार्मिक विश्वास, व्यापारिक संगठन तथा कलात्मक कौशल की महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
उत्तरवर्ती कालों में मिट्टी एवं धातु की बड़ी संख्या में मुहरें प्राप्त हुई हैं। इन पर राजाओं, सामंतों, प्रशासनिक अधिकारियों, निगमों, श्रेणियों, गणों तथा व्यापारिक संस्थाओं के नाम और राजकीय चिह्न अंकित मिलते हैं। अनेक राजकीय मुहरों पर शासकों की वंशावली, उपाधियाँ तथा राजकीय प्रतीक भी उत्कीर्ण हैं, जिनके आधार पर इतिहासकार विभिन्न राजवंशों के राजनीतिक इतिहास और प्रशासनिक व्यवस्था का पुनर्निर्माण करते हैं।
गुप्तकाल की मुहरें विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं। इनमें गोविन्दगुप्त की वैशाली मुहर, पुरुगुप्त की भितरी सील, वैन्यगुप्त की नालंदा मुहर, कुमारगुप्त तृतीय की राजमुद्रा तथा सम्राट हर्षवर्धन की नालंदा और सोनीपत (सोनपत) से प्राप्त मुहरें उल्लेखनीय हैं। इसी प्रकार भीटा से प्राप्त ‘महासेनापति-महादंडनायक-कुमारामात्याधिकरणस्य’ अंकित मिट्टी की मुहर तत्कालीन प्रशासनिक व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करती है। वर्तमान में ऐसी अनेक ऐतिहासिक मुहरें विभिन्न संग्रहालयों में सुरक्षित संरक्षित हैं।
स्मारक एवं कलात्मक अवशेष
इतिहास-निर्माण में स्मारकों, स्थापत्य अवशेषों, मूर्तियों तथा चित्रकला का भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान है। प्राचीन भवनों, मंदिरों, स्तूपों, गुफाओं, राजप्रासादों तथा उत्खननों से प्राप्त अवशेषों के आधार पर तत्कालीन समाज, अर्थव्यवस्था, धर्म, कला तथा स्थापत्य परंपराओं का ज्ञान होता है। हड़प्पा सभ्यता के नगरों, पाटलिपुत्र से प्राप्त मौर्यकालीन राजप्रासाद के अवशेष, कौशाम्बी के राजप्रासाद एवं घोषिताराम विहार, अतरंजीखेड़ा से प्राप्त लौह-उपयोग के साक्ष्य तथा अरिकामेडु से प्राप्त रोमन सिक्के एवं पात्र भारत के सांस्कृतिक और व्यापारिक इतिहास के महत्त्वपूर्ण प्रमाण हैं।
भारतीय मंदिर स्थापत्य की तीन प्रमुख शैलियाँ विकसित हुईं—उत्तर भारत की नागर शैली, दक्षिण भारत की द्रविड़ शैली तथा दक्कन क्षेत्र की बेसर (वेसर) शैली, जिसमें नागर और द्रविड़ दोनों की विशेषताओं का समन्वय दिखाई देता है। भारत के बाहर दक्षिण-पूर्व एशिया में स्थित जावा का बोरोबुदुर स्तूप, कंबोडिया का अंगकोरवाट मंदिर तथा बाली, मलाया और बोर्नियो के प्राचीन स्मारक भारतीय संस्कृति के व्यापक प्रसार तथा सांस्कृतिक प्रभाव के महत्त्वपूर्ण साक्ष्य हैं।
मूर्तिकला और चित्रकला
प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में मूर्तिकला और चित्रकला का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यद्यपि भारत में मौर्यकाल से ही यक्ष-यक्षी तथा अन्य मूर्तियों का निर्माण प्रारम्भ हो चुका था, तथापि बुद्ध एवं अन्य देवप्रतिमाओं की विकसित मूर्तिकला का व्यापक उत्कर्ष कुषाणकाल में दिखाई देता है। मौर्य, शुंग, कुषाण, गुप्त तथा उत्तर-गुप्त काल में मूर्तिकला का निरंतर विकास हुआ, जिसमें जनसामान्य की धार्मिक आस्थाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान था। कुषाणकालीन मूर्तियों पर विशेषतः गांधार कला के माध्यम से यूनानी-रोमन प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है, जबकि गुप्तकालीन मूर्तियाँ भारतीय आदर्शों, आध्यात्मिकता, संतुलित अनुपात और स्वाभाविक सौंदर्य की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति प्रस्तुत करती हैं। भरहुत, बोधगया, साँची तथा अमरावती से प्राप्त मूर्तियाँ तत्कालीन धार्मिक जीवन, सामाजिक परंपराओं, वेशभूषा तथा लोकजीवन का सजीव चित्र प्रस्तुत करती हैं।
चित्रकला भी प्राचीन भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। महाराष्ट्र स्थित अजंता की गुफाओं के भित्ति-चित्र भारतीय चित्रकला की सर्वोच्च उपलब्धियों में गिने जाते हैं। इन चित्रों में मानवीय भावनाओं, धार्मिक आस्थाओं तथा तत्कालीन समाज का अत्यंत सजीव चित्रण किया गया है। ‘माता एवं शिशु’ तथा ‘मरणासन्न राजकुमारी’ जैसे प्रसिद्ध चित्र कलाकारों की संवेदनशीलता और कलात्मक कौशल के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इसके अतिरिक्त एलोरा तथा मध्य प्रदेश की बाघ गुफाओं के चित्र भी भारतीय भित्ति-चित्रकला की समृद्ध परंपरा के महत्त्वपूर्ण प्रमाण हैं।
उत्खनित सामग्री
प्राचीन इतिहास के पुनर्निर्माण में उत्खननों से प्राप्त सामग्री का विशेष महत्त्व है। पुरातात्त्विक उत्खननों से प्राप्त बस्तियों, आवासों, पत्थर एवं हड्डी के औजारों, मृद्भांडों, धातु उपकरणों तथा भवनों के अवशेषों के आधार पर प्रागैतिहासिक एवं आद्य-ऐतिहासिक मानव जीवन का अध्ययन किया जाता है। पाकिस्तान की सोहन घाटी से प्राप्त पुरापाषाणकालीन पत्थर के औजार भारतीय उपमहाद्वीप में आदिम मानव की प्राचीन उपस्थिति का महत्त्वपूर्ण प्रमाण हैं। नवपाषाण काल में मानव ने कृषि, पशुपालन तथा मृद्भांड निर्माण की कला विकसित की। राजस्थान के सांभर क्षेत्र सहित अनेक स्थलों से कृषि के प्रारंभिक प्रमाण प्राप्त हुए हैं। उत्खननों से प्राप्त विभिन्न प्रकार के मृद्भांडों के आधार पर पुरातत्त्वविद् संस्कृतियों के विकासक्रम तथा उनके पारस्परिक संबंधों का निर्धारण करते हैं।
मोहनजोदड़ो तथा अन्य सैंधव स्थलों से प्राप्त सैकड़ों मुहरें तत्कालीन धार्मिक मान्यताओं, व्यापारिक गतिविधियों तथा प्रशासनिक व्यवस्था पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालती हैं। वर्तमान में पुरातत्त्वविद् वैदिक साहित्य, रामायण तथा महाभारत में उल्लिखित स्थलों के वैज्ञानिक उत्खनन द्वारा प्राचीन भारत की भौतिक संस्कृति का पुनर्निर्माण कर रहे हैं।
इस प्रकार पुरातात्त्विक स्रोत, विशेषकर अभिलेख, शिलालेख, ताम्रपत्र, स्मारक, गुफाएँ तथा उत्खननों से प्राप्त अवशेष प्राचीन भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण के सबसे प्रामाणिक आधार हैं। इनके माध्यम से इतिहासकारों ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति के विकासक्रम, विभिन्न राजवंशों की राजनीतिक गतिविधियों तथा सामाजिक-आर्थिक जीवन का वस्तुनिष्ठ स्वरूप प्रस्तुत किया है। इसलिए प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में पुरातात्त्विक स्रोतों का महत्त्व सर्वोपरि माना जाता है।




