अलेक्जेंडर द्वितीय (Alexander II)

अलेक्जेंडर द्वितीय (Alexander II)

अलेक्जेंडर द्वितीय (1855–1881 ई.) : रूस में महान सुधारों का युग

1855 ई. में निकोलस प्रथम की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र अलेक्जेंडर द्वितीय रूस का जार बना। उसका शासनकाल (1855–1881 ई.) रूसी इतिहास में ‘महान सुधारों का युग’ के नाम से प्रसिद्ध है। विशेषतः 1861 ई. में कृषि-दास प्रथा के उन्मूलन के कारण उसे ‘मुक्तिदाता जार’ कहा जाता है। यद्यपि उसने रूस के सामाजिक, प्रशासनिक, न्यायिक और आर्थिक क्षेत्रों में व्यापक सुधार किए, फिर भी उसका व्यक्तित्व पूर्णतः उदारवादी नहीं था। उसमें उदारवाद और प्रतिक्रियावाद दोनों का समन्वय था। उसकी कोई स्पष्ट राजनीतिक विचारधारा नहीं थी और वह परिस्थितियों के अनुसार अपनी नीतियों में परिवर्तन करता था। इसलिए उसके सुधार व्यापक होने के बावजूद अनेक दृष्टियों से सीमित और विरोधाभासी सिद्ध हुए।

राजनीतिक दृष्टिकोण

अलेक्जेंडर द्वितीय अपने पिता निकोलस प्रथम की अर्द्ध-तानाशाही तथा नौकरशाही-प्रधान शासन व्यवस्था का उत्तराधिकारी था। युवावस्था से ही वह कठिन उत्तरदायित्वों से बचने वाला तथा अपेक्षाकृत सरल कार्यों को प्राथमिकता देने वाला व्यक्ति माना जाता था। वह न तो पूर्णतः उदारवादी था और न ही पूर्णतः प्रतिक्रियावादी। अलेक्जेंडर प्रथम की भाँति उसमें आदर्शवाद और निकोलस प्रथम की भाँति निरंकुश प्रवृत्ति का मिश्रण था। इसी कारण उसके शासनकाल में सुधार और नियंत्रण दोनों साथ-साथ चलते रहे। वह रूस का आधुनिकीकरण तो चाहता था, किंतु निरंकुश राजसत्ता को समाप्त करने के पक्ष में नहीं था।

क्रीमिया युद्ध और सुधारों की आवश्यकता

अलेक्जेंडर द्वितीय के शासनारंभ के समय रूस क्रीमिया युद्ध (1853–1856 ई.) की पराजय से उबर रहा था। यह पराजय केवल सैन्य असफलता नहीं थी, बल्कि रूसी शासन-व्यवस्था की समग्र विफलता का प्रमाण थी। युद्ध ने रूस की सेना, प्रशासन, परिवहन, उद्योग तथा आर्थिक संरचना की कमजोरियों को उजागर कर दिया। निकोलस प्रथम जिस नौकरशाही और सैन्य व्यवस्था पर गर्व करता था, वही युद्ध में अक्षम सिद्ध हुई।

रूस की जनता लंबे समय से सामाजिक असमानता, कृषि-दास प्रथा तथा भ्रष्ट प्रशासन से असंतुष्ट थी। क्रीमिया युद्ध के बाद यह असंतोष और तीव्र हो गया। अलेक्जेंडर द्वितीय ने समझ लिया कि यदि समयानुकूल सुधार नहीं किए गए, तो रूस यूरोप की अन्य शक्तियों से बहुत पीछे रह जाएगा। इसलिए उसने अपने शासन की शुरुआत उदार कदमों से की। दिसंबरवादी विद्रोह के जीवित निर्वासितों को क्षमा प्रदान की गई तथा प्रशासनिक कठोरता में कुछ कमी लाई गई।

शिक्षा एवं प्रेस संबंधी सुधार

अलेक्जेंडर द्वितीय ने शिक्षा और बौद्धिक विकास को प्रोत्साहित करने के लिए महत्त्वपूर्ण कदम उठाए। 1855 से 1861 ई. के बीच विश्वविद्यालयों पर लगाए गए अधिकांश प्रतिबंध समाप्त कर दिए गए। रूसी विद्वानों को विदेशों में अध्ययन और शोध की अनुमति दी गई। दर्शनशास्त्र तथा संवैधानिक विधि जैसे विषयों के प्राध्यापकों की पुनर्नियुक्ति की गई तथा विश्वविद्यालयों को पहले की अपेक्षा अधिक स्वायत्तता प्रदान की गई।

महिला शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई। 1869 से 1871 ई. के बीच मास्को सहित कई नगरों में महिलाओं के लिए अर्द्ध-सरकारी शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की गई तथा माध्यमिक शिक्षा का विस्तार किया गया।

प्रेस की स्वतंत्रता के क्षेत्र में भी सुधार किए गए। दिसंबर 1855 ई.  में कुख्यात बुतुर्लिन समिति समाप्त कर दी गई। समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं के प्रकाशन पर लगे अनेक प्रतिबंध हटा दिए गए। 1845–1854 ई. के बीच जहाँ केवल 19 पत्रिकाएँ और 6 समाचार-पत्र प्रकाशित होते थे, वहीं 1855–1864 ई. के बीच उनकी संख्या बढ़कर क्रमशः 156 और 66 हो गई। इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विस्तार हुआ। यद्यपि 1865 ई. के प्रेस कानून ने सेंसरशिप को पूरी तरह समाप्त नहीं किया, फिर भी यह पूर्ववर्ती व्यवस्था की अपेक्षा अधिक उदार था।

आर्थिक एवं औद्योगिक सुधार

अलेक्जेंडर द्वितीय ने आर्थिक विकास को भी सुधारों का आधार बनाया। उसने उद्योगों, व्यापार तथा निजी उद्यम को प्रोत्साहित किया। आधुनिक रेलवे नेटवर्क के निर्माण पर विशेष बल दिया गया, जिससे रूस के विभिन्न भागों के बीच संपर्क बढ़ा तथा आंतरिक व्यापार को गति मिली। रेलवे के विस्तार ने उद्योगों के विकास, बाजारों के एकीकरण और प्रशासनिक दक्षता में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसी काल में बैंकिंग और वित्तीय संस्थाओं के विकास की दिशा में भी प्रारंभिक प्रयास किए गए।

कृषि-दासों की मुक्ति
कृषि-दास प्रथा की स्थिति

अलेक्जेंडर द्वितीय का सबसे ऐतिहासिक और दूरगामी सुधार कृषि-दास प्रथा का उन्मूलन था। उस समय रूस की लगभग नौ-दसवाँ कृषि भूमि शाही परिवार तथा लगभग 1,40,000 कुलीन भू-स्वामियों के अधिकार में थी। लगभग 4 करोड़ 50 लाख कृषि-दास इन्हीं की भूमि पर कार्य करते थे।

कृषि-दासों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्राप्त नहीं थी। वे भूमि से बँधे रहते थे, उन्हें खरीदा-बेचा जा सकता था तथा भू-स्वामी उन्हें कठोर दंड भी दे सकता था। 1828 से 1854 ई. के बीच कृषकों के औसतन प्रतिवर्ष अनेक विद्रोह हुए, जिससे स्पष्ट था कि यह व्यवस्था अब टिकाऊ नहीं रही थी।

1861 ई. की मुक्ति राजाज्ञा

अलेक्जेंडर द्वितीय ने सबसे पहले 1858 ई. में शाही भूमि पर कार्यरत लगभग 23 लाख कृषि-दासों को मुक्त किया। इसके बाद कुलीन वर्ग के विरोध को समझौते द्वारा शांत करते हुए 3 मार्च 1861 ई. को ऐतिहासिक ‘मुक्ति राजाज्ञा’ जारी की। 1861 ई. की मुक्ति राजाज्ञा के अंतर्गत रूस के कृषि-दासों (सर्फ़ों) को व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रदान की गई तथा भू-स्वामियों का उन पर कानूनी अधिकार समाप्त कर दिया गया। उन्हें उस भूमि के एक भाग पर स्वामित्व का अधिकार दिया गया, जिस पर वे खेती करते थे। इसके लिए सरकार ने भू-स्वामियों से भूमि खरीदकर कृषकों को उपलब्ध कराई। भूमि का मूल्य कृषकों को लगभग 40 वर्षों तक आसान किस्तों में चुकाना था, जिन्हें ‘मोचन भुगतान’ कहा गया। भूमि का स्वामित्व प्रायः व्यक्तिगत रूप से न देकर ‘मीर’ अथवा ग्राम-समुदाय को दिया गया, जो भूमि का वितरण करता था तथा कृषकों से ऋण की किस्तों की वसूली का दायित्व भी निभाता था।

कृषि-दासों की मुक्ति के परिणाम

यद्यपि यह सुधार ऐतिहासिक था, फिर भी इसके प्रारंभिक परिणाम मिश्रित रहे। अधिकांश कृषकों को पर्याप्त भूमि नहीं मिली तथा उन्हें भारी ऋणमोचन राशि का भुगतान करना पड़ा। कई स्थानों पर मीर भी कृषकों के प्रति कठोर सिद्ध हुआ। फलतः अनेक कृषकों को लगा कि वे भू-स्वामियों की दासता से मुक्त होकर राज्य के ऋणी बन गए हैं।

इसके बावजूद इस सुधार का दीर्घकालीन प्रभाव अत्यंत व्यापक था। सामंती व्यवस्था की नींव कमजोर हुई, कुलीन वर्ग का सामाजिक प्रभुत्व घटा तथा कृषकों की कानूनी स्थिति में सुधार हुआ। इससे श्रमिकों का एक स्वतंत्र वर्ग विकसित हुआ, जिसने आगे चलकर औद्योगीकरण और नगरीकरण को गति प्रदान की।

स्थानीय स्वशासन (जेम्स्त्वो सुधार)

1864 ई. में अलेक्जेंडर द्वितीय ने स्थानीय प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से जेम्स्त्वो नामक स्थानीय स्वशासन संस्थाओं की स्थापना की।

इन परिषदों के सदस्य विभिन्न सामाजिक वर्गों के निर्वाचित प्रतिनिधि होते थे। उनका प्रमुख कार्य स्थानीय प्रशासन का संचालन, सड़क एवं पुलों का निर्माण और रख-रखाव, प्राथमिक शिक्षा का विस्तार, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता की व्यवस्था तथा कृषि और स्थानीय आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना था।

यद्यपि इन संस्थाओं की शक्तियाँ सीमित थीं और प्रांतीय राज्यपालों को उन पर नियंत्रण का अधिकार प्राप्त था, फिर भी उन्होंने रूस में स्थानीय स्वशासन, प्रशासनिक दक्षता और जनभागीदारी की भावना को विकसित किया।

न्यायिक सुधार

1864 ई. के न्यायिक सुधार जार अलेक्जेण्डर द्वितीय की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में गिने जाते हैं। इनसे पूर्व रूस की न्याय-व्यवस्था भ्रष्ट, पक्षपातपूर्ण तथा गुप्त कार्यवाहियों पर आधारित थी। सुधारों के अंतर्गत न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक किया गया, न्यायालयों की कार्यवाही सार्वजनिक कर दी गई तथा कानून के समक्ष सभी नागरिकों की समानता के सिद्धांत को स्वीकार किया गया। इसके साथ ही जूरी प्रणाली लागू की गई, प्रशिक्षित अधिवक्ताओं की व्यवस्था विकसित की गई और छोटे मामलों के निपटारे के लिए निर्वाचित शांति न्यायाधीश नियुक्त किए गए। इन सुधारों के परिणामस्वरूप रूस की न्याय-व्यवस्था अधिक आधुनिक, पारदर्शी, स्वतंत्र और अपेक्षाकृत निष्पक्ष बनी

सैन्य सुधार

क्रीमिया युद्ध की पराजय के बाद सेना में सुधार अनिवार्य हो गया था। युद्ध मंत्री दिमित्री मिल्यूतिन के नेतृत्व में सेना का पुनर्गठन किया गया। आधुनिक हथियारों का प्रयोग बढ़ाया गया, सैनिक प्रशिक्षण में सुधार किया गया तथा 1874 ई. में ‘अनिवार्य सैन्य सेवा’ लागू की गई। इससे सेना अधिक आधुनिक, अनुशासित और प्रभावी बनी।

प्रशासनिक एवं वित्तीय सुधार

अलेक्जेंडर द्वितीय ने प्रशासनिक सुधारों के अंतर्गत नौकरशाही को अधिक उत्तरदायी बनाने का प्रयास किया। स्थानीय प्रशासन को कुछ अधिकार दिए गए तथा वित्तीय व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाई गई। कर व्यवस्था में सुधार किए गए और सरकारी आय-व्यय पर अधिक नियंत्रण स्थापित किया गया। इन सुधारों का उद्देश्य प्रशासन को अधिक कुशल और आधुनिक बनाना था।

पोलैंड में विद्रोह (1863–64 ई.)

अलेक्जेंडर द्वितीय के शासन के प्रारंभिक वर्षों में रूस में व्यापक सुधार लागू किए गए, किंतु लगभग एक दशक बाद उसके सुधारवादी उत्साह में स्पष्ट कमी आने लगी। वस्तुतः वह स्वभाव से पूर्णतः उदारवादी या लोकतांत्रिक शासक नहीं था। उसके अधिकांश सुधार किसी वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण नहीं, बल्कि क्रीमिया युद्ध के बाद उत्पन्न व्यावहारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किए गए थे। जब उसे लगा कि तत्कालीन संकट टल गया है, तब उसने सुधारों की गति धीमी कर दी। इस परिवर्तन का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण 1863 ई. का पोलैंड विद्रोह था।

शासन के आरंभ में अलेक्जेंडर द्वितीय ने पोलैंड के प्रति अपेक्षाकृत उदार नीति अपनाई थी। उसने निकोलस प्रथम की कठोर दमनकारी नीतियों में कुछ शिथिलता लाई, किंतु पोलिश राष्ट्रवादियों ने इसे रूसी शासन की कमजोरी समझा। इटली के राष्ट्रीय एकीकरण की सफलता तथा रूस में कृषि-दासों की मुक्ति से प्रेरित होकर पोलिश नेताओं ने स्वतंत्रता की माँग को और अधिक तीव्र कर दिया। वे केवल स्वतंत्र पोलैंड की स्थापना ही नहीं चाहते थे, बल्कि 1772 ई. के प्रथम विभाजन से पूर्व के सभी पोलिश प्रदेशों को पुनः एकीकृत करने की माँग भी करने लगे।

जब रूसी सरकार ने इन गतिविधियों पर नियंत्रण लगाने का प्रयास किया, तब 1863 ई. में सशस्त्र विद्रोह आरंभ हो गया। पोल विद्रोहियों के पास नियमित सेना नहीं थी, इसलिए उन्होंने छोटे-छोटे दलों में संगठित होकर जंगलों से छापामार युद्ध की रणनीति अपनाई। उन्होंने फ्रांस से सहायता की भी अपेक्षा की। इंग्लैंड और फ्रांस ने रूस की कठोर नीति की आलोचना की, किंतु प्रशा के चांसलर ओटो फ़ॉन बिस्मार्क ने अपने राजनीतिक हितों के कारण रूस का समर्थन किया। परिणामस्वरूप पोलैंड को कोई प्रभावी विदेशी सहायता नहीं मिली और 1864 ई. तक विद्रोह का निर्ममता से दमन कर दिया गया।

विद्रोह के बाद अलेक्जेंडर द्वितीय ने पोलैंड के प्रति कठोर ‘रूसीकरण’ की नीति अपनाई। पोलैंड की स्वायत्तता समाप्त कर दी गई, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पोलिश भाषा के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया तथा प्रशासन से पोल अधिकारियों को हटाकर उनकी जगह रूसी अधिकारियों की नियुक्ति की गई। रोमन कैथोलिक चर्च के विशेषाधिकार सीमित कर दिए गए और पोलिश कुलीन वर्ग का कठोर दमन किया गया। दूसरी ओर, कृषकों के साथ अपेक्षाकृत सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करके कुलीनों के प्रभाव को कमजोर करने का प्रयास किया गया।

पोलैंड के विद्रोह ने अलेक्जेंडर द्वितीय की सुधारवादी नीति को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। उसने उदारवादी रुख त्यागकर पुनः प्रतिक्रियावादी नीति अपनाई। प्रेस पर पुनः कठोर नियंत्रण स्थापित किया गया, गुप्त पुलिस को सशक्त बनाया गया, शिक्षा पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा दिया गया तथा विश्वविद्यालयों और पाठ्यक्रमों पर कड़ी निगरानी रखी गई। इस प्रकार 1863–64 ई. का पोलैंड विद्रोह रूस में उदार सुधारों की गति को रोकने वाला एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ।

विदेश नीति

अलेक्जेंडर द्वितीय ने अपने पिता निकोलस प्रथम की आक्रामक एवं हस्तक्षेपवादी विदेश नीति से भिन्न मार्ग अपनाया। क्रीमिया युद्ध (1853–1856 ई.) में रूस की पराजय ने यह स्पष्ट कर दिया था कि निरंतर युद्ध और यूरोपीय मामलों में हस्तक्षेप की नीति रूस के हित में नहीं है। इसलिए उसने अपने शासन के प्रारंभिक वर्षों में यूरोप की जटिल राजनीतिक समस्याओं से यथासंभव दूर रहने का प्रयास किया और देश के आंतरिक सुधारों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया। यद्यपि उसने फ्रांस से दूरी बना ली, क्योंकि नेपोलियन तृतीय ने 1863 ई. के पोलैंड विद्रोह के समय पोल राष्ट्रवादियों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की थी। इसके विपरीत उसने प्रशा के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए। प्रशा के प्रधानमंत्री ओटो फ़ॉन बिस्मार्क ने भी रूस के साथ घनिष्ठ सहयोग की नीति अपनाई। यह रूस-प्रशा मैत्री दोनों देशों के लिए लाभदायक सिद्ध हुई। रूस ने ऑस्ट्रिया के विरुद्ध प्रशा का अप्रत्यक्ष समर्थन किया, जबकि प्रशा ने रूस को क्रीमिया युद्ध के बाद खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त करने में सहायता दी। 1870 ई. में प्रशा के समर्थन से रूस ने पेरिस की संधि (1856 ई.) के उन प्रावधानों को अस्वीकार कर दिया, जिनके अंतर्गत काला सागर में उसकी नौसैनिक शक्ति पर प्रतिबंध लगाया गया था। इस प्रकार क्रीमिया युद्ध की पराजय से उत्पन्न राष्ट्रीय अपमान काफी हद तक समाप्त हो गया।

बाल्कन नीति और तुर्की के साथ युद्ध

अलेक्जेंडर द्वितीय की विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य बाल्कन क्षेत्र में रूस के पारंपरिक प्रभाव को पुनः स्थापित करना था। रूस स्वयं को बाल्कन के स्लाव तथा रूढ़िवादी ईसाई समुदायों का संरक्षक मानता था। जब ओटोमन साम्राज्य के अधीन बाल्कन में विद्रोह आरंभ हुए और तुर्की द्वारा उनका कठोर दमन किया गया, तब रूस ने स्वयं को हस्तक्षेप के लिए नैतिक एवं राजनीतिक रूप से उचित समझा। 1877 ई. में उसने तुर्की के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस युद्ध में रूस को उल्लेखनीय सफलता मिली और 1878 ई. की सैन स्टेफानो संधि के माध्यम से उसे पर्याप्त राजनीतिक एवं सामरिक लाभ प्राप्त हुए। इस संधि से बुल्गारिया का एक विशाल राज्य स्थापित हुआ, जिस पर रूस का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया।

किंतु रूस की इस सफलता से इंग्लैंड और ऑस्ट्रिया अत्यंत चिंतित हो गए। यूरोप में शक्ति-संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से जर्मनी के चांसलर बिस्मार्क ने बर्लिन कांग्रेस (1878 ई.) का आयोजन किया। यद्यपि रूस को आशा थी कि बिस्मार्क उसका समर्थन करेगा, परंतु उसने स्वयं को “ईमानदार मध्यस्थ” घोषित करते हुए ऑस्ट्रिया और अन्य यूरोपीय शक्तियों के हितों को प्राथमिकता दी। परिणामस्वरूप सैन स्टेफानो संधि में रूस को प्राप्त अनेक लाभ सीमित कर दिए गए। इस घटना से रूस और जर्मनी के संबंधों में शीतलता आ गई तथा बाल्कन क्षेत्र में रूस की महत्त्वाकांक्षाओं को आंशिक झटका लगा।

एशिया में रूस का विस्तार

यूरोप में सीमित सफलता मिलने के बाद अलेक्जेंडर द्वितीय ने एशिया में साम्राज्य-विस्तार की नीति को अधिक सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया। मध्य एशिया में रूस ने क्रमिक सैन्य अभियानों के माध्यम से ताशकंद, समरकंद, खिवा और कोकंद जैसे क्षेत्रों पर अपना प्रभाव स्थापित किया तथा अपना अधिकार क्षेत्र मर्व तक विस्तारित कर लिया। इसके परिणामस्वरूप रूसी सीमाएँ फारस (ईरान) और अफगानिस्तान के निकट पहुँच गईं। मध्य एशिया में रूस की इस तीव्र प्रगति से ब्रिटेन अत्यंत चिंतित हो गया, क्योंकि उसे आशंका थी कि रूस भारत की सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकता है। यही प्रतिस्पर्धा आगे चलकर मध्य एशिया में रूस और ब्रिटेन के बीच प्रसिद्ध ‘ग्रेट गेम’ का कारण बनी।

पूर्वी एशिया में भी रूस ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। चीन के साथ 1858 ई. की ऐगुन संधि तथा 1860 ई. के पेकिंग समझौते के परिणामस्वरूप रूस ने अमूर नदी के उत्तर का विशाल क्षेत्र तथा उस्सूरी प्रदेश प्राप्त किया। इसी प्रक्रिया में व्लादिवोस्तोक बंदरगाह रूस के अधिकार में आया, जो आगे चलकर प्रशांत महासागर पर रूस का प्रमुख नौसैनिक एवं व्यापारिक केंद्र बना। बाद में यही नगर ट्रांस-साइबेरियन रेलवे का अंतिम स्टेशन भी बना। दक्षिण में रूस ने काकेशस पर्वतीय क्षेत्र पर भी अपना नियंत्रण सुदृढ़ कर लिया। इस प्रकार अलेक्जेंडर द्वितीय के शासनकाल में एशिया में रूस का साम्राज्य अभूतपूर्व रूप से विस्तृत हुआ।

क्रांतिकारी आंदोलनों का विकास

अलेक्जेंडर द्वितीय के सुधारों ने प्रारंभ में रूस के शिक्षित वर्ग में नई आशाएँ उत्पन्न कीं। शिक्षा, प्रेस और न्याय व्यवस्था में हुए परिवर्तनों से बुद्धिजीवियों को लगा कि रूस धीरे-धीरे उदार एवं आधुनिक राज्य की दिशा में अग्रसर होगा। किंतु 1863 ई. के पोलैंड विद्रोह के बाद जार ने पुनः प्रतिक्रियावादी नीति अपनाई। प्रेस पर नियंत्रण बढ़ाया गया, शिक्षा पर निगरानी स्थापित की गई और राजनीतिक गतिविधियों पर कठोर प्रतिबंध लगा दिए गए। इससे शिक्षित वर्ग में गहरा असंतोष उत्पन्न हुआ।

रूस में लोकतांत्रिक संस्थाओं का अभाव था और राजनीतिक विरोध के लिए कोई वैधानिक मंच उपलब्ध नहीं था। परिणामस्वरूप असंतुष्ट बुद्धिजीवी, विद्यार्थी और युवा वर्ग भूमिगत संगठनों में संगठित होने लगे। जो कार्य लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक दल करते थे, वही कार्य रूस में गुप्त क्रांतिकारी समितियाँ करने लगीं। सरकार की कठोर गुप्तचर व्यवस्था और दमनकारी नीतियों ने इन संगठनों को और अधिक उग्र बना दिया। धीरे-धीरे शांतिपूर्ण सुधारों की आशा समाप्त होने लगी और अनेक क्रांतिकारियों ने आतंकवादी उपायों तथा राजनीतिक हत्याओं को परिवर्तन का साधन मान लिया। इसके प्रत्युत्तर में सरकार ने भी गिरफ्तारियों, साइबेरिया निर्वासन और मृत्युदंड जैसे कठोर दमनकारी उपाय अपनाए। इस प्रकार रूस का राजनीतिक वातावरण निरंतर तनावपूर्ण और हिंसात्मक बनता गया।

नास्तिवाद (निहिलिज़्म) का विकास

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में रूस के क्रांतिकारी आंदोलनों में नास्तिवाद (निहिलिज़्म) सबसे प्रभावशाली विचारधाराओं में से एक था। ‘नास्तिवाद’ का शाब्दिक अर्थ है—पुरानी व्यवस्था का पूर्ण निषेध या उन्मूलन। इसके अनुयायी मुख्यतः विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी, बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक, चिकित्सक तथा शिक्षित युवा वर्ग के सदस्य थे। उनका विश्वास था कि रूस की सभी पुरानी संस्थाएँ—निरंकुश राजसत्ता, चर्च, सामंती व्यवस्था और रूढ़ सामाजिक परंपराएँ—प्रगति में बाधक हैं और उन्हें समाप्त कर देना चाहिए।

नास्तिवादी पाश्चात्य यूरोप के वैज्ञानिक एवं समाजवादी विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे। वे प्रत्येक संस्था और परंपरा को तर्क एवं वैज्ञानिक दृष्टि से परखते थे तथा जो व्यवस्था उन्हें अव्यावहारिक या अन्यायपूर्ण प्रतीत होती थी, उसका विरोध करते थे। प्रसिद्ध रूसी साहित्यकार इवान तुर्गनेव ने नास्तिवादी को ऐसे व्यक्ति के रूप में चित्रित किया है, ‘जो किसी भी सत्ता के समक्ष नहीं झुकता और किसी भी अप्रमाणित सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता।‘ प्रारंभ में यह आंदोलन बौद्धिक एवं शैक्षिक था। इसका प्रसिद्ध नारा था—‘जनता के बीच जाओ’। इसके अनुयायी गाँवों और नगरों में जाकर किसानों तथा श्रमिकों को सामाजिक और राजनीतिक चेतना देने का प्रयास करते थे।

किंतु जब सरकार ने इन गतिविधियों का कठोर दमन किया, तब आंदोलन का स्वरूप बदलने लगा। अनेक नास्तिवादी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि निरंकुश शासन को केवल हिंसात्मक उपायों से ही समाप्त किया जा सकता है। परिणामस्वरूप गुप्त संगठन बने, षड्यंत्र रचे गए और उच्च सरकारी अधिकारियों की हत्या के प्रयास आरंभ हुए। आगे चलकर यही उग्र प्रवृत्तियाँ ‘नरोदनाया वोल्या’ जैसे आतंकवादी संगठनों के उदय का आधार बनीं।

जार पर आक्रमण और मृत्यु

सरकारी दमन और क्रांतिकारी हिंसा के इस संघर्ष ने रूस को अस्थिर बना दिया। अप्रैल 1879 ई. में सोलोवीयोव नामक एक शिक्षक ने अलेक्जेंडर द्वितीय पर पाँच गोलियाँ चलाईं, किंतु वह बच गया। उसी वर्ष दिसंबर में जार की विशेष रेलगाड़ी को विस्फोट से उड़ाने का प्रयास किया गया, परंतु संयोगवश वह दूसरी रेलगाड़ी से यात्रा कर रहा था। फरवरी 1880 ई. में सेंट पीटर्सबर्ग स्थित शीत महल में डायनामाइट विस्फोट किया गया, फिर भी जार सुरक्षित बच निकला।

इन घटनाओं के बाद अलेक्जेंडर द्वितीय ने काउंट लोरिस-मेलिकोव को व्यापक अधिकार देकर प्रशासनिक सुधारों की नई योजना तैयार करने का दायित्व सौंपा। अनेक राजनीतिक बंदियों को मुक्त किया गया तथा सीमित राजनीतिक भागीदारी की दिशा में भी विचार किया गया। उद्देश्य था कि जनता को शासन में कुछ स्थान देकर क्रांतिकारी असंतोष को कम किया जाए।

अंततः 13 मार्च 1881 ई. को अलेक्जेंडर द्वितीय ने नए सुधारों की दिशा में महत्त्वपूर्ण राजाज्ञा पर हस्ताक्षर किए। किंतु उसी दिन सेंट पीटर्सबर्ग में नरोदनाया वोल्या के क्रांतिकारियों द्वारा किए गए बम विस्फोट में उसकी मृत्यु हो गई। विडंबना यह थी कि जिस शासक ने रूस में सबसे व्यापक सुधारों का आरंभ किया और ‘मुक्तिदाता जार’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ, उसी का जीवन राजनीतिक आतंकवाद का शिकार बनकर समाप्त हुआ। उसकी मृत्यु के साथ रूस में उदार सुधारों का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय समाप्त हुआ और उसके उत्तराधिकारी अलेक्जेंडर तृतीय ने पुनः कठोर निरंकुश एवं प्रतिक्रियावादी शासन की नीति अपनाई।

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