लॉर्ड ऑकलैंड (1836–1842 ई.)
लॉर्ड ऑकलैंड (जॉर्ज ईडन, ऑकलैंड के अर्ल) को 1836 ई. में भारत का गवर्नर-जनरल नियुक्त किया गया था। उसे भारत और रूस के बीच स्थित बफर राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने के निर्देश के साथ भारत भेजा गया था, ताकि रूसी आक्रमण की स्थिति में भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। किंतु ऑकलैंड की नीतियों, विशेषकर अफगानिस्तान के संबंध में उसकी हस्तक्षेपवादी नीति, ने अंततः ब्रिटिश सरकार को एक विनाशकारी युद्ध में उलझा दिया। 1838–39 में अफगानिस्तान के विरुद्ध अपनाई गई उसकी नीति प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध का कारण बनी, जो अंग्रेजों के लिए अत्यंत अपमानजनक और विनाशकारी सिद्ध हुआ। अफगानिस्तान में मिली इस भीषण असफलता के कारण ऑकलैंड को भारत के असफल गवर्नर-जनरलों में गिना जाता है।
ब्रिटेन और रूस की प्रतिद्वंद्विता
19वीं शताब्दी में ब्रिटेन और रूस की प्रतिद्वंद्विता अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक प्रमुख तत्व थी। 1801 में जॉर्जिया पर अधिकार करने के बाद रूस मध्य एशिया की ओर निरंतर विस्तार कर रहा था। अंग्रेजों को आशंका थी कि यदि रूस अफगानिस्तान पर अपना प्रभाव स्थापित कर लेता है, तो यह भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के लिए गंभीर संकट उत्पन्न कर सकता है। ब्रिटेन की नीति का मुख्य उद्देश्य रूसी विस्तारवाद को बाल्कन, मध्य एशिया और सुदूर-पूर्व में आगे बढ़ने से रोकना था। जब रूस ने फारस में भी अपना प्रभाव बढ़ाना आरंभ किया, तब ब्रिटिश सरकार के लिए अफगानिस्तान के संबंध में अपनी नीति को स्पष्ट रूप से निर्धारित करना आवश्यक हो गया।
अफगानिस्तान की राजनीतिक स्थिति
1747 ई. में ईरानी शासक नादिर शाह की हत्या के बाद अफगान कबीलों की पारंपरिक पंचायत, लोया जिरगा, ने सदोजई कबीले के प्रमुख अहमद शाह अब्दाली को अफगानिस्तान का शासक चुना। इस प्रकार दुर्रानी साम्राज्य की स्थापना हुई। परंपरा के अनुसार, ताजपोशी के समय साबिर शाह नामक एक सूफी दरवेश ने अहमद शाह को दुर्र-ए-दुर्रान की उपाधि प्रदान की, जिसका अर्थ ‘मोतियों का मोती’ माना जाता है। इसी से उसके वंश के लिए ‘दुर्रानी’ नाम प्रचलित हुआ। अहमद शाह अब्दाली ने लगभग 25 वर्षों तक शासन किया। 1773 ई. में उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र तैमूर शाह दुर्रानी शासक बना।
1793 ई. में तैमूर शाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र जमान शाह दुर्रानी काबुल का अमीर बना। वह एक शक्तिशाली शासक था और उसके भारत पर आक्रमण की आशंका से अंग्रेज चिंतित थे। जमान शाह ने 1799 ई. में बरकजई पश्तूनों के प्रमुख पयंदा खान तथा अन्य षड्यंत्रकारियों को मृत्युदंड दिया। इन लोगों पर उसे हटाकर उसके भाई शाह शुजा को काबुल की गद्दी पर बैठाने की योजना बनाने का आरोप था।
1800 ई. में महमूद शाह दुर्रानी ने बरकजई तथा अन्य कबीलों के सहयोग से जमान शाह को पदच्युत कर काबुल की गद्दी पर अधिकार कर लिया। जमान शाह को अंधा कर दिया गया और उसने अपने जीवन के शेष वर्ष भारत में शरण लेकर बिताए।
किंतु महमूद शाह भी लंबे समय तक काबुल के सिंहासन पर नहीं रह सका। 1803 ई. में उसके सौतेले भाई शाह शुजा दुर्रानी ने उसे पराजित कर काबुल का अमीर बना दिया। शाह शुजा को व्यापक लोकप्रियता प्राप्त नहीं थी, फिर भी वह 1809 ई. तक सत्ता में रहा।
1809 ई. में महमूद शाह ने शाह शुजा को पराजित कर दिया। शाह शुजा पंजाब की ओर भाग गया और अंततः लाहौर में महाराजा रणजीत सिंह के संरक्षण में रहने लगा। इस प्रकार महमूद शाह पुनः काबुल का अमीर बन गया। इसके बाद भी शाह शुजा काबुल का सिंहासन पुनः प्राप्त करने के प्रयास करता रहा। उसने इसके लिए सिखों से भी सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया, लेकिन उसे तत्काल सफलता नहीं मिली।
1823 ई. में दुर्रानी सत्ता का प्रभावी अंत हो गया और बरकजई वंश का प्रभाव अफगानिस्तान में स्थापित होने लगा। दोस्त मुहम्मद खान 1826 ई. में काबुल का अमीर बना। इससे पहले मार्च 1823 ई. में नौशेरा के युद्ध में महाराजा रणजीत सिंह की सेना ने दोस्त मुहम्मद के सौतेले भाई अजीम खान को पराजित कर पेशावर घाटी पर अधिकार कर लिया था।
दोस्त मुहम्मद खान ने काबुल पर अपना अधिकार मजबूत किया और अगले लगभग तेरह वर्षों तक सफलतापूर्वक शासन किया। उसने अपने पुत्र मुहम्मद अकबर खान के साथ 1837 ई. में जमरूद के युद्ध में सिख सेना को पराजित किया, किंतु पेशावर को पुनः अपने अधिकार में नहीं ले सका। इसी युद्ध में प्रसिद्ध सिख सेनापति हरि सिंह नलवा मारे गए थे। दोस्त मुहम्मद ने काबुल के अतिरिक्त कंधार पर भी अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था, जबकि हेरात अलग सत्ता के अधीन था।
इस समय दोस्त मुहम्मद खान अनेक संकटों से घिरा हुआ था। अफगानिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों में विद्रोह और राजनीतिक अस्थिरता थी। पश्चिम की ओर से उसे फारस और रूस के बढ़ते प्रभाव की चिंता थी, जबकि पूर्व में महाराजा रणजीत सिंह का पेशावर पर अधिकार था। शाह शुजा भी अफगान सिंहासन पर अपना दावा बनाए हुए था और ब्रिटिश सरकार तथा रणजीत सिंह के साथ उसके संबंध थे।
दोस्त मुहम्मद खान
इस संकटपूर्ण स्थिति में दोस्त मुहम्मद खान ने अंग्रेजों से मैत्री स्थापित करने का प्रयास किया। 1836 ई. में ऑकलैंड के भारत आने के बाद उसने गवर्नर-जनरल को बधाई संदेश भेजा और रणजीत सिंह तथा फारस के विरुद्ध सहायता की अपेक्षा व्यक्त की। किंतु ऑकलैंड प्रारंभ में अफगानिस्तान के आंतरिक एवं क्षेत्रीय विवादों में सीधे हस्तक्षेप करने के पक्ष में नहीं था। अंग्रेजों से निराश होकर दोस्त मुहम्मद ने रूस और फारस के साथ संपर्क बढ़ाना आरंभ कर दिया।
अंतरराष्ट्रीय स्थिति और ऑकलैंड की नीति
एशिया में रूस के निरंतर प्रभाव-विस्तार से अंग्रेजों की चिंता बढ़ रही थी। 1826–28 के रूस-फारस युद्ध और उसके बाद की संधियों से फारस में रूसी प्रभाव मजबूत हुआ। 1834 ई. में मोहम्मद शाह काजार फारस का शाह बना और रूस ने फारसी राजनीति में अपना प्रभाव बनाए रखा। रूस और फारस के बढ़ते संबंधों ने ब्रिटिश सरकार की चिंता को और बढ़ा दिया।
1837 ई. में फारस ने हेरात पर आक्रमण कर दिया। हेरात को भारत की सुरक्षा की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता था। फारसी घेराबंदी के पीछे रूसी प्रभाव की भूमिका की आशंका ने अंग्रेजों को चिंतित कर दिया। इस परिस्थिति में दोस्त मुहम्मद ने फारस और रूस के साथ संपर्क बढ़ाया। इससे ब्रिटिश सरकार को लगा कि यदि अफगानिस्तान में रूसी प्रभाव स्थापित हो गया, तो भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा असुरक्षित हो सकती है।
ब्रिटिश सरकार ने ऑकलैंड को निर्देश दिया कि वह रूसी प्रभाव को रोकने का प्रयास करे और आवश्यकता पड़ने पर अफगानिस्तान में हस्तक्षेप करे। ब्रिटिश राजनीतिज्ञों ने इस भौगोलिक तथ्य को पर्याप्त महत्त्व नहीं दिया कि रूस के लिए मध्य एशिया से अफगानिस्तान पार करके पंजाब और फिर ब्रिटिश भारत तक पहुँचना अत्यंत कठिन कार्य था। इसके बावजूद ‘रूसी खतरे’ की आशंका ब्रिटिश नीति-निर्माण में अत्यधिक प्रभावशाली हो गई।
इस समय इंग्लैंड में लॉर्ड मेलबर्न का व्हिग मंत्रिमंडल था और लॉर्ड पामर्स्टन विदेश मंत्री था। ब्रिटिश सरकार को आशंका थी कि यदि रूस ने अफगानिस्तान में अपना प्रभाव स्थापित कर लिया, तो वह भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। इसलिए ऑकलैंड को अफगानिस्तान की घटनाओं पर कड़ी निगरानी रखने तथा आवश्यकता पड़ने पर हस्तक्षेप करने की अनुमति दी गई।
ऑकलैंड के कार्य
ऑकलैंड ने अफगानिस्तान और उसके आसपास की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए। प्रथम, उसने फारस पर दबाव डालने के लिए फारस की खाड़ी में ब्रिटिश सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया, जिससे फारस के शाह पर हेरात की घेराबंदी समाप्त करने का दबाव पड़ा। दूसरे, हेरात की स्थिति का अध्ययन करने और उसकी रक्षा में सहायता देने के लिए एल्ड्रेड पोटिंगर को भेजा गया। तीसरे, उसने अलेक्जेंडर बर्न्स को दोस्त मुहम्मद खान के पास भेजा ताकि उसके साथ मैत्रीपूर्ण समझौता किया जा सके।
दोस्त मुहम्मद ब्रिटिश सरकार के साथ समझौता करने के लिए तैयार था, लेकिन उसकी मुख्य मांग थी कि अंग्रेज महाराजा रणजीत सिंह पर दबाव डालकर उसे पेशावर वापस दिलाएँ। बर्न्स ने इस संबंध में ऑकलैंड से सिफारिश की, लेकिन ऑकलैंड रणजीत सिंह को नाराज करके दोस्त मुहम्मद के साथ समझौता करने के लिए तैयार नहीं हुआ।
इसी बीच दोस्त मुहम्मद ने रूस और फारस के साथ अपने संबंध मजबूत करने शुरू कर दिए। इससे ऑकलैंड की चिंता बढ़ गई। अब ब्रिटिश नीति इस दिशा में बढ़ने लगी कि दोस्त मुहम्मद के स्थान पर शाह शुजा को अफगानिस्तान का शासक बनाया जाए और उसके माध्यम से ब्रिटिश हितों की रक्षा की जाए।
त्रिपक्षीय संधि, 1838 ई.
‘ग्रेट गेम’ की व्यापक पृष्ठभूमि में ब्रिटेन ने अफगानिस्तान में अपने अनुकूल शासन स्थापित करने का प्रयास किया। दोस्त मुहम्मद के रूस और फारस से संपर्क बढ़ाने के कारण ब्रिटिश सरकार ने उसे हटाकर शाह शुजा को अफगान सिंहासन पर पुनः स्थापित करने का निर्णय लिया। इसके लिए ब्रिटिश सरकार, महाराजा रणजीत सिंह और शाह शुजा के बीच त्रिपक्षीय संधि हुई, जिस पर जून 1838 ई. में हस्ताक्षर किए गए।
त्रिपक्षीय संधि की प्रमुख शर्तें इस प्रकार थीं—
- महाराजा रणजीत सिंह और ब्रिटिश सरकार मिलकर शाह शुजा को अफगानिस्तान के सिंहासन पर पुनः स्थापित करेंगे।
- शाह शुजा अपनी विदेश नीति में ब्रिटिश सरकार और महाराजा रणजीत सिंह के हितों को ध्यान में रखेगा।
- अफगानिस्तान की ओर से भारत पर होने वाले किसी आक्रमण को रोकने का प्रयास किया जाएगा।
- शाह शुजा ब्रिटिश प्रतिनिधि को अपने दरबार में स्वीकार करेगा।
- शाह शुजा ने सिंध पर अपने पुराने दावों को छोड़ दिया।
- शाह शुजा ने रणजीत सिंह के सिंधु क्षेत्र में किए गए अधिकारों को स्वीकार किया।
- ब्रिटिश सरकार ने प्रत्यक्ष रूप से अफगानिस्तान को अपने साम्राज्य में मिलाने के बजाय शाह शुजा को अपने अनुकूल शासक के रूप में स्थापित करने की नीति अपनाई।
त्रिपक्षीय संधि के बाद ब्रिटिश दबाव के परिणामस्वरूप फारस ने हेरात की घेराबंदी समाप्त कर दी। रूस ने भी अपने प्रतिनिधि को काबुल से वापस बुला लिया। इस प्रकार तत्काल रूसी-फारसी खतरा काफी हद तक समाप्त हो गया था। फिर भी ऑकलैंड ने अफगानिस्तान में हस्तक्षेप की योजना को नहीं छोड़ा और अंततः त्रिपक्षीय संधि ही प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध की आधारभूमि बनी।
ऑकलैंड की नीति थी कि शाह शुजा को अफगानिस्तान का अमीर बनाकर उसके माध्यम से ब्रिटिश प्रभाव स्थापित किया जाए। उसे पामर्स्टन का समर्थन प्राप्त था, लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों के एक वर्ग ने इस नीति का विरोध किया। एल्फिंस्टन ने अफगानिस्तान की राजनीतिक स्थिति का अध्ययन करके चेतावनी दी कि शाह शुजा को अफगानों पर लंबे समय तक शासन कराना कठिन होगा। ड्यूक ऑफ वेलिंगटन ने भी अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप के खतरों की ओर संकेत किया। इसके बावजूद ऑकलैंड ने युद्ध की योजना को आगे बढ़ाया।
युद्ध की घटनाएँ
फिरोजपुर में ब्रिटिश सेना का एक बड़ा दल एकत्रित किया गया, जिसे अफगानिस्तान पर आक्रमण करना था। इसे सिंध की सेना अथवा Army of the Indus कहा गया। सेना का नेतृत्व जनरल सर जॉन कीन को सौंपा गया और राजनीतिक मामलों में सहायता के लिए विलियम मैकनॉटन को उसके साथ भेजा गया।
महाराजा रणजीत सिंह ने ब्रिटिश सेना को पंजाब के रास्ते अफगानिस्तान जाने की अनुमति नहीं दी। इसलिए ब्रिटिश सेना ने सिंध के रास्ते बोलन दर्रे से अफगानिस्तान में प्रवेश किया।
अप्रैल 1839 ई. में ब्रिटिश सेनाओं ने कंधार पर अधिकार कर लिया। जुलाई 1839 में गजनी पर भी ब्रिटिश सेना ने अधिकार कर लिया। गजनी की विजय के बाद ब्रिटिश सेना काबुल की ओर बढ़ी और अगस्त 1839 में काबुल पर अधिकार कर लिया। 7 अगस्त 1839 ई. को शाह शुजा को काबुल के सिंहासन पर पुनः बैठाया गया।
कुछ समय तक ब्रिटिशों को सफलता प्राप्त होती दिखाई दी। नवंबर 1840 ई. में अमीर दोस्त मुहम्मद खान ने आत्मसमर्पण कर दिया। उसे बंदी बनाकर भारत भेज दिया गया। प्रारंभ में ऑकलैंड की नीति सफल दिखाई दे रही थी, लेकिन वास्तव में यह सफलता अस्थायी थी और शीघ्र ही ब्रिटिश सेना के लिए गंभीर संकट उत्पन्न होने वाला था।
लॉर्ड ऑकलैंड की भूलें
शाह शुजा को अफगान जनता ने अपना स्वाभाविक शासक स्वीकार नहीं किया। उसे अंग्रेजों की सैन्य शक्ति के सहारे सिंहासन पर बैठाया गया था। इसलिए अनेक अफगान उसे विदेशी शक्ति का समर्थक और अपने देश की स्वतंत्रता के लिए खतरा मानते थे।
प्रारंभिक शांति के बावजूद अफगानिस्तान की स्थिति भीतर से अस्थिर थी। ऑकलैंड ने इस स्थिति का सही आकलन नहीं किया और काबुल में ब्रिटिश सैनिकों की बड़ी संख्या बनाए रखी। उसने अफगान कबीलों को दिए जाने वाले भत्तों में कटौती कर दी। ये कबीलाई सरदार भारत और काबुल के बीच जाने वाले मार्गों की सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। भत्तों में कटौती से वे ब्रिटिशों के प्रति असंतुष्ट हो गए और मार्गों की सुरक्षा कमजोर पड़ गई।
दूसरी महत्त्वपूर्ण समस्या काबुल में ब्रिटिश सेना के नेतृत्व की थी। सेना का कमांडर मेजर जनरल विलियम जॉर्ज कीथ एल्फिंस्टन वृद्ध और स्वास्थ्य की दृष्टि से कमजोर था। वह संकट की स्थिति में निर्णायक और त्वरित कार्यवाही करने में असफल रहा।
तीसरी समस्या यह थी कि अफगान जनता शाह शुजा को वैध एवं लोकप्रिय शासक के रूप में स्वीकार नहीं कर रही थी। ऐसी स्थिति में ब्रिटिश सेना को धीरे-धीरे वापस बुलाने की आवश्यकता थी, लेकिन ऑकलैंड और उसके राजनीतिक प्रतिनिधि मैकनॉटन ने स्थिति को गंभीरता से नहीं समझा।
युद्ध पुनः आरंभ
काबुल में ब्रिटिश सेना को अपेक्षाकृत असुरक्षित स्थिति में रखा गया। बाला हिसार का किला शाह शुजा के निवास के लिए छोड़ दिया गया और ब्रिटिश सेना ने शहर के बाहर अपेक्षाकृत कमजोर छावनी में डेरा डाला। ब्रिटिश सैनिकों के व्यवहार और स्थानीय मामलों में उनके हस्तक्षेप से अफगान जनता का असंतोष बढ़ता गया।
इस बीच 27 जून 1839 ई. को महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई। इससे अफगानिस्तान में ब्रिटिश स्थिति और अधिक जटिल हो गई, क्योंकि त्रिपक्षीय व्यवस्था का एक प्रमुख आधार कमजोर पड़ गया था।
काबुल में ब्रिटिश प्रतिनिधि अलेक्जेंडर बर्न्स थे। 2 नवंबर 1841 ई. को अफगान विद्रोहियों ने उसके निवास पर हमला कर दिया और बर्न्स की हत्या कर दी। उसके भाई चार्ल्स बर्न्स तथा लेफ्टिनेंट ब्रॉडफुट भी मारे गए।
यदि ब्रिटिश सेनापति तत्काल और निर्णायक कार्रवाई करता, तो संभवतः विद्रोह को प्रारंभिक अवस्था में ही दबाया जा सकता था। लेकिन एल्फिंस्टन ने प्रभावी कार्रवाई नहीं की। उसने कंधार से जनरल नॉट और जलालाबाद से जनरल सेल के आने की प्रतीक्षा की।
अफगानिस्तान में कठोर सर्दी आरंभ हो चुकी थी और अनेक मार्ग विद्रोही कबीलों के नियंत्रण में थे। इस कारण ब्रिटिश सहायता समय पर काबुल नहीं पहुँच सकी। मैकनॉटन ने विद्रोही नेताओं से समझौता करने का प्रयास किया। इस बीच दोस्त मुहम्मद खान का पुत्र मुहम्मद अकबर खान काबुल पहुँचा और विद्रोह का प्रमुख नेता बन गया।
अंग्रेजी सेना चारों ओर से घिर गई। विद्रोहियों ने ब्रिटिश सेना के रसद-भंडार पर भी नियंत्रण स्थापित कर लिया, जिससे ब्रिटिश सैनिकों के सामने भोजन और आवश्यक सामग्री का संकट उत्पन्न हो गया।
मैकनॉटन ने अकबर खान के साथ समझौते का प्रयास किया। दिसंबर 1841 ई. में बातचीत के दौरान 23 दिसंबर 1841 ई. को मैकनॉटन की हत्या कर दी गई। इसके बाद ब्रिटिश स्थिति पूरी तरह कमजोर हो गई।
संकट की इस घड़ी में एल्फिंस्टन के सामने काबुल में संघर्ष जारी रखने अथवा अफगानिस्तान से पीछे हटने का प्रश्न था। अंततः उसने अकबर खान के साथ समझौता किया। ब्रिटिश सेना ने काबुल छोड़कर जलालाबाद की ओर जाने का निर्णय किया। अफगानों ने सुरक्षित मार्ग देने का आश्वासन दिया, लेकिन पीछे हटती हुई सेना पर विभिन्न स्थानों पर लगातार हमले किए गए।
जनवरी 1842 ई. में काबुल से निकलने वाली ब्रिटिश सेना में लगभग 4,500 सैनिक तथा लगभग 12,000 शिविर-अनुचर और अन्य लोग थे। भीषण ठंड, बर्फ, भूख और अफगान हमलों के कारण लगभग पूरा दल नष्ट हो गया। डॉ. विलियम ब्राइडन ही उन थोड़े से लोगों में से एक थे, जो जीवित बचकर जलालाबाद पहुँचे। बाद में उनकी जलालाबाद पहुँचने की घटना ब्रिटिश पराजय का प्रतीक बन गई।
कंधार में जनरल नॉट और जलालाबाद में जनरल सेल ने अपनी स्थिति बनाए रखी। अफगान सेना और स्थानीय कबीलों के हाथों ब्रिटिश सेना की यह भीषण क्षति प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध की सबसे बड़ी त्रासदी थी।
इस विनाश के लिए अफगानों और अकबर खान को दोषी ठहराया गया, लेकिन ब्रिटिश नीति भी विवादास्पद थी। अफगानों का मानना था कि समझौते के अनुसार अंग्रेज अफगानिस्तान से पूरी तरह हट जाएँगे, जबकि ब्रिटिश सेना ने कंधार और जलालाबाद में अपनी उपस्थिति बनाए रखी। इस कारण दोनों पक्षों के बीच अविश्वास और बढ़ गया।
इस युद्ध के दौरान अलेक्जेंडर बर्न्स, चार्ल्स बर्न्स, सर विलियम मैकनॉटन तथा अनेक ब्रिटिश अधिकारी और सैनिक मारे गए।
लॉर्ड ऑकलैंड की वापसी
अफगानिस्तान में ब्रिटिश सेना के विनाश की सूचना मिलने पर ऑकलैंड को गहरा आघात पहुँचा। उसने स्थिति को संभालने का प्रयास किया और कंधार में जनरल नॉट की सहायता के लिए सैनिक तथा जलालाबाद में जनरल सेल की सहायता के लिए जनरल जॉर्ज पोलक को भेजा।
लेकिन अफगानिस्तान में हुई विनाशकारी घटनाओं के कारण ब्रिटेन में ऑकलैंड की नीति की तीव्र आलोचना होने लगी। ब्रिटिश सरकार ने उसे भारत से वापस बुलाने का निर्णय लिया। उसके स्थान पर लॉर्ड एलेनबरो को भारत का गवर्नर-जनरल नियुक्त किया गया, जिन्होंने 28 फरवरी 1842 ई. को कार्यभार ग्रहण किया।
लॉर्ड एलेनबरो की अफगान नीति
एलेनबरो के मुख्यतः दो उद्देश्य थे—
- अफगानिस्तान में फँसी ब्रिटिश सेनाओं को सुरक्षित भारत वापस लाना।
- अफगानों के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई करके ब्रिटिश प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करना।
एलेनबरो ने मार्च 1842 ई. में घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार अफगानिस्तान में स्थायी विजय अथवा राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने के बजाय अपनी सेना की सुरक्षित वापसी और ब्रिटिश प्रतिष्ठा की पुनर्स्थापना पर ध्यान देगी।
इस बीच अफगानिस्तान में संघर्ष जारी रहा। शाह शुजा की स्थिति लगातार कमजोर होती गई और अप्रैल 1842 ई. में उसकी हत्या कर दी गई। इससे अफगानिस्तान में ब्रिटिश समर्थित शासन का आधार लगभग समाप्त हो गया।
जनरल इंग्लैंड कंधार की ओर बढ़ते हुए पराजित हुआ। बाद में जनरल नॉट और जनरल पोलक ने अपनी स्थिति मजबूत की और अफगानिस्तान के भीतर आगे बढ़ने में सफलता प्राप्त की।
अगस्त 1842 ई. में पोलक ने अफगानों को पराजित करते हुए काबुल की ओर प्रगति की। सितंबर 1842 ई. में ब्रिटिश सेनाएँ काबुल पहुँचीं। ब्रिटिश सेनाओं ने काबुल में प्रवेश करके अपने सैनिकों और प्रतिष्ठा की पुनर्स्थापना का प्रदर्शन किया। नॉट की सेना भी काबुल पहुँची।
इसी दौरान ब्रिटिश सेना ने काबुल में कठोर दंडात्मक कार्रवाई की। काबुल बाजार को नष्ट किया गया और नगर के कई हिस्सों को भारी क्षति पहुँचाई गई। ब्रिटिश सेनाएँ इसके बाद अफगानिस्तान से वापस भारत लौट आईं।
एलेनबरो ने ब्रिटिश सेनापतियों का विजयी स्वागत किया और घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार अफगानिस्तान में ऐसी सरकार को स्वीकार करेगी, जो अपने पड़ोसी राज्यों के साथ शांतिपूर्ण संबंध रखे।
अंततः दोस्त मुहम्मद खान को मुक्त कर दिया गया। वह अफगानिस्तान वापस गया और पुनः काबुल का अमीर बन गया। इस प्रकार ब्रिटिश हस्तक्षेप का मूल उद्देश्य पूरी तरह विफल हो गया।
अंग्रेजों द्वारा महमूद गजनवी के मकबरे से कथित रूप से ‘सोमनाथ के द्वार’ भारत लाने का प्रचार भी किया गया था, लेकिन बाद में यह स्पष्ट हो गया कि वे वास्तविक रूप से सोमनाथ मंदिर के द्वार नहीं थे। इस घटना ने एलेनबरो की प्रतिष्ठा बढ़ाने के बजाय उसकी नीति पर विवाद उत्पन्न किया।
इस प्रकार प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध लॉर्ड ऑकलैंड की अत्यंत महँगी और विनाशकारी नीति सिद्ध हुआ। हजारों ब्रिटिश और भारतीय सैनिक मारे गए तथा भारी मात्रा में धन खर्च हुआ। अंततः अंग्रेजों को दोस्त मुहम्मद को मुक्त करके उसे पुनः अफगानिस्तान का अमीर स्वीकार करना पड़ा।
ऑकलैंड की नीति की समीक्षा
ऑकलैंड की अफगान नीति की व्यापक आलोचना की गई है। ब्रिटिश भारतीय इतिहास में प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध को ब्रिटिश विदेश नीति की सबसे गंभीर भूलों में से एक माना गया है। युद्ध ने ब्रिटिश सैन्य प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचाया और भारत के राजस्व पर भारी आर्थिक बोझ डाला।
ऑकलैंड की नीति की आलोचना करते हुए विंसेंट स्मिथ ने उसके निर्णयों को अत्यंत कठोर दृष्टि से देखा है। उनके अनुसार ऑकलैंड ने अफगानिस्तान की वास्तविक परिस्थितियों को समझने के बजाय अपने सलाहकारों और ब्रिटिश साम्राज्यवादी चिंताओं पर अधिक भरोसा किया। उसने ऐसी नीति अपनाई, जिसे परिस्थितियों के बदल जाने के बाद भी जारी रखा गया। ऑकलैंड की अफगान नीति की आलोचना मुख्यतः निम्नलिखित आधारों पर की जाती है—
1. रूसी खतरे का अतिरंजित आकलन
ऑकलैंड ने रूसी खतरे को आवश्यकता से अधिक गंभीर मान लिया। रूस और ब्रिटिश भारत के बीच विशाल भौगोलिक दूरी थी और रूस के लिए अफगानिस्तान, पंजाब तथा उत्तर-पश्चिमी सीमा को पार करके भारत पर आक्रमण करना अत्यंत कठिन था। इसके अतिरिक्त, हेरात की फारसी घेराबंदी समाप्त हो जाने और रूसी प्रतिनिधि के काबुल से वापस चले जाने के बाद तत्काल युद्ध की आवश्यकता और भी कम हो गई थी।
2. नैतिक दृष्टि से अनुचित नीति
दोस्त मुहम्मद खान एक स्वतंत्र राज्य का शासक था और उसे अन्य शक्तियों के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने का अधिकार था। प्रारंभ में ब्रिटिश सरकार स्वयं गैर-हस्तक्षेप की नीति का समर्थन करती थी। इसलिए बाद में उसी राज्य में सैन्य हस्तक्षेप करना ब्रिटिश नीति की नैतिक संगति पर प्रश्न खड़ा करता था।
3. राजनीतिक दृष्टि से अदूरदर्शिता
दोस्त मुहम्मद खान अफगानों के बीच अपेक्षाकृत लोकप्रिय शासक था और वह स्वयं भी रूसी प्रभाव से चिंतित था। इसके विपरीत, शाह शुजा लंबे समय से अफगानिस्तान से बाहर था और उसकी लोकप्रियता बहुत सीमित थी। उसे ब्रिटिश सेना के बल पर काबुल की गद्दी पर बैठाने से अफगान जनता में स्वाभाविक रूप से विरोध उत्पन्न हुआ।
4. परिणाम की दृष्टि से पूर्ण असफलता
प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध में ब्रिटिश सेना को भारी जनहानि हुई और बहुत बड़ी धनराशि खर्च हुई। इसके बावजूद ब्रिटिश सरकार अपने मूल उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकी। अंततः दोस्त मुहम्मद को मुक्त करना पड़ा और वह पुनः अफगानिस्तान का अमीर बना।
5. सोमनाथ के द्वारों का प्रकरण
महमूद गजनवी के मकबरे से प्राप्त द्वारों को सोमनाथ मंदिर के द्वार बताकर भारत लाने का प्रयास राजनीतिक रूप से अत्यंत विवादास्पद था। बाद में यह स्पष्ट हुआ कि वे सोमनाथ मंदिर के वास्तविक द्वार नहीं थे। इस घटना ने ब्रिटिश नीति की आलोचना को और बढ़ाया।
6. सिंध की विजय से संबंध
प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेनाओं को सिंध के मार्ग से अफगानिस्तान भेजा गया। इसके बाद ब्रिटिश हस्तक्षेप सिंध की राजनीति में भी बढ़ता गया और अंततः 1843 ई. में सिंध का ब्रिटिश अधिग्रहण हुआ। इस दृष्टि से अफगान नीति का प्रभाव सिंध की विजय तक भी पहुँचा।
7. ब्रिटिश अजेयता की धारणा को आघात
अफगानिस्तान में ब्रिटिश सेना की भीषण पराजय ने ब्रिटिश सेना की अजेयता की धारणा को गंभीर रूप से प्रभावित किया। काबुल से ब्रिटिश सेना की वापसी के दौरान हुई भारी जनहानि ने ब्रिटिश प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचाया। अंग्रेजों को अपनी प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करने के लिए 1842 में काबुल पर दंडात्मक कार्रवाई करनी पड़ी।
8. समकालीन आलोचना
कई ब्रिटिश अधिकारियों और राजनीतिज्ञों ने अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप के विरुद्ध चेतावनी दी थी। ड्यूक ऑफ वेलिंगटन सहित अनेक प्रभावशाली व्यक्तियों को आशंका थी कि अफगानिस्तान में प्रवेश करने के बाद ब्रिटिश सेना लंबे और कठिन युद्ध में फँस सकती है। बाद की घटनाओं ने इन आशंकाओं को काफी हद तक सही सिद्ध किया।
इस प्रकार ऑकलैंड की अफगान नीति को ‘मूर्खता, अज्ञान और अहंकार’ के सम्मिश्रण के रूप में आलोचित किया गया है।
ऑकलैंड की नीति के पक्ष में तर्क
कुछ इतिहासकार ऑकलैंड की नीति को पूरी तरह अविवेकपूर्ण नहीं मानते। उनके अनुसार उस समय की अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में अफगानिस्तान भारत की उत्तर-पश्चिमी सुरक्षा का एक महत्त्वपूर्ण बफर क्षेत्र था। रूस और फारस के बढ़ते प्रभाव के कारण ब्रिटिश सरकार के लिए अफगानिस्तान की राजनीति की उपेक्षा करना आसान नहीं था।
दोस्त मुहम्मद से समझौता करने के लिए ब्रिटिश सरकार को महाराजा रणजीत सिंह को असंतुष्ट करना पड़ता, क्योंकि पेशावर का प्रश्न दोस्त मुहम्मद की प्रमुख मांगों में से एक था। ब्रिटिश सरकार रणजीत सिंह के साथ अपने संबंध खराब नहीं करना चाहती थी। इसलिए उसने शाह शुजा को समर्थन देने का विकल्प चुना।
इस दृष्टिकोण के अनुसार ऑकलैंड की आलोचना मुख्यतः इसलिए की जाती है कि उसकी नीति असफल हुई। यदि शाह शुजा सफलतापूर्वक अफगानिस्तान में शासन स्थापित कर लेता और ब्रिटिश हितों की रक्षा करता, तो संभव है कि उसी नीति को एक सफल साम्राज्यवादी रणनीति के रूप में प्रस्तुत किया जाता।
वास्तव में ऑकलैंड की असफलता का एक महत्त्वपूर्ण कारण उसकी नीति का दोषपूर्ण क्रियान्वयन भी था। उसने कई ऐसे निर्णय लिए, जिनसे पहले से अस्थिर अफगानिस्तान में ब्रिटिश विरोध और बढ़ गया।
प्रथम, शाह शुजा की सुरक्षा के लिए काबुल में बड़ी संख्या में ब्रिटिश सैनिकों को लंबे समय तक रखना उचित नहीं था। इससे अफगानों को यह विश्वास होने लगा कि अंग्रेज केवल शाह शुजा को सिंहासन पर बैठाने नहीं आए हैं, बल्कि अफगानिस्तान पर अपना स्थायी प्रभाव स्थापित करना चाहते हैं। यदि शाह शुजा को आर्थिक तथा सैन्य सहायता देकर अपेक्षाकृत स्वतंत्र रूप से शासन करने दिया जाता, तो स्थिति अलग हो सकती थी।
दूसरे, काबुल में एल्फिंस्टन जैसे वृद्ध और कमजोर सेनापति के स्थान पर अधिक सक्षम और सक्रिय सैन्य अधिकारी को नियुक्त किया जाना चाहिए था। साथ ही ब्रिटिश सेना को अधिक सुरक्षित सैन्य स्थिति में रखना आवश्यक था।
तीसरे, भारत और काबुल के बीच संचार तथा रसद-मार्गों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी। कबीलाई सरदारों को दिए जाने वाले भत्तों में अचानक कटौती करना गंभीर भूल थी, क्योंकि इन्हीं कबीलों की सहायता से मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाती थी।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि ऑकलैंड की नीति केवल अपने मूल उद्देश्य के कारण ही असफल नहीं हुई, बल्कि उसके दोषपूर्ण क्रियान्वयन, अफगान राजनीतिक परिस्थितियों की गलत समझ, स्थानीय शक्तियों के प्रति असंवेदनशीलता और सैन्य व्यवस्था की कमजोरियों ने भी इसकी असफलता में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ऑकलैंड का प्रशासनिक पक्ष
ऑकलैंड की भारत में भूमिका केवल अफगान युद्ध तक सीमित नहीं थी। अफगानिस्तान में उसकी असफलता के बावजूद उसके प्रशासनिक कार्यों के कुछ पक्ष उल्लेखनीय थे। कुछ आधुनिक इतिहासकारों ने उसे एक चतुर और सक्षम, किंतु कुछ हद तक आत्म-संतुष्ट एवं अलगाववादी व्हिग अभिजात के रूप में चित्रित किया है।
उसके शासनकाल में शिक्षा, चिकित्सा और सार्वजनिक निर्माण के क्षेत्र में भी कुछ महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए। उसने कलकत्ता से दिल्ली तक ग्रैंड ट्रंक रोड के सुधार और मरम्मत को प्रोत्साहित किया। भारतीय छात्रों को चिकित्सा शिक्षा के लिए विदेश जाने की अनुमति दी गई तथा बंबई और मद्रास में मेडिकल कॉलेजों की स्थापना हुई। उसके शासनकाल में चिकित्सा शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंधित संस्थागत विकास को भी प्रोत्साहन मिला।
इस प्रकार अफगानिस्तान में उसकी विदेश नीति अत्यंत विवादास्पद और अंततः विनाशकारी सिद्ध हुई, लेकिन भारत के आंतरिक प्रशासन के क्षेत्र में उसके शासन की उपलब्धियों को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। इसलिए लॉर्ड ऑकलैंड का मूल्यांकन करते समय उसके असफल अफगान अभियान और उसके प्रशासनिक कार्यों को अलग-अलग देखना अधिक उचित है।
महत्त्वपूर्ण FAQ
1. लॉर्ड ऑकलैंड कौन था और उसका कार्यकाल कब था?
लॉर्ड ऑकलैंड, जिनका वास्तविक नाम जॉर्ज ईडन था, 1836 से 1842 ई. तक भारत के गवर्नर-जनरल रहे। उनके कार्यकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध थी।
2. ऑकलैंड की अफगान नीति का मुख्य उद्देश्य क्या था?
उसकी मुख्य नीति अफगानिस्तान में ब्रिटिश प्रभाव स्थापित करके रूसी प्रभाव को रोकना तथा भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा को सुरक्षित करना था। इसके लिए उसने शाह शुजा को अफगानिस्तान का शासक बनाने का समर्थन किया।
3. त्रिपक्षीय संधि 1838 ई. क्या थी?
1838 ई. की त्रिपक्षीय संधि ब्रिटिश सरकार, महाराजा रणजीत सिंह और शाह शुजा के बीच हुई थी। इसका उद्देश्य शाह शुजा को अफगानिस्तान के सिंहासन पर पुनः स्थापित करना और ब्रिटिश हितों की रक्षा करना था।
4. प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध कब और क्यों हुआ?
प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध 1839–1842 ई. के बीच हुआ। इसका प्रमुख कारण ब्रिटिश सरकार का अफगानिस्तान में रूसी प्रभाव को रोकने तथा दोस्त मुहम्मद खान को हटाकर शाह शुजा को सत्ता में स्थापित करने का प्रयास था।
5. प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध में ब्रिटिश सेना की सबसे बड़ी पराजय कहाँ हुई?
ब्रिटिश सेना को 1842 ई. में काबुल से जलालाबाद की ओर पीछे हटते समय भीषण पराजय का सामना करना पड़ा। लगभग पूरे सैन्य दल का विनाश हो गया और केवल कुछ ही लोग जीवित बच सके। डॉ. विलियम ब्राइडन का जलालाबाद पहुँचना इस घटना का प्रसिद्ध प्रतीक बना।
6. लॉर्ड ऑकलैंड को भारत से वापस क्यों बुलाया गया?
अफगानिस्तान में ब्रिटिश सेना की विनाशकारी पराजय और ऑकलैंड की अफगान नीति की असफलता के कारण ब्रिटिश सरकार ने उसे वापस बुला लिया। उसके स्थान पर 1842 ई. में लॉर्ड एलेनबरो भारत का गवर्नर-जनरल बना।
7. ऑकलैंड की अफगान नीति की प्रमुख आलोचनाएँ क्या थीं?
ऑकलैंड पर रूसी खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने, अफगानिस्तान की आंतरिक राजनीति को गलत समझने, लोकप्रिय शासक दोस्त मुहम्मद को हटाकर अलोकप्रिय शाह शुजा को सत्ता में बैठाने और अफगानिस्तान में अनावश्यक सैन्य हस्तक्षेप करने के आरोप लगाए गए। उसकी नीति के कारण ब्रिटिश सेना को भारी जनहानि और आर्थिक नुकसान हुआ।
8. अफगान युद्ध के बावजूद लॉर्ड ऑकलैंड की प्रशासनिक उपलब्धियाँ क्या थीं?
अफगानिस्तान में असफलता के बावजूद ऑकलैंड के शासनकाल में सार्वजनिक निर्माण और चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य हुए। कलकत्ता से दिल्ली तक ग्रैंड ट्रंक रोड के सुधार को प्रोत्साहन मिला तथा बंबई और मद्रास में मेडिकल कॉलेजों की स्थापना हुई।
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