अजंता गुफाएँ: इतिहास, वास्तुकला, मूर्तिकला और भित्ति-चित्रकला
परिचय
महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (पहले का औरंगाबाद) ज़िले में वाघोरा (वाघुर) नदी की एक गहरी घाटी है। इस घाटी की अर्धचंद्राकार, घोड़े की नाल जैसी बेसाल्ट चट्टान को काटकर बनाई गई गुफाओं का समूह अजंता की गुफाएँ कहलाता है। भारतीय शैलकृत (रॉक-कट) वास्तुकला, मूर्तिकला और भित्ति-चित्रकला के श्रेष्ठतम उदाहरणों में इनकी गिनती होती है। यहाँ पूजा के लिए चैत्य-गृह हैं और भिक्षुओं के निवास, ध्यान और अध्ययन के लिए विहार हैं।
अजंता की दीवारों और छतों पर बुद्ध के जीवन की घटनाएँ और जातक कथाएँ चित्रित हैं। इनके साथ राजदरबार, नगर, उत्सव, वस्त्र, आभूषण, वाद्य-यंत्र, पशु-पक्षी और पुष्प भी बारीकी से अंकित हैं। इसलिए अजंता को केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय समाज का चित्रित दस्तावेज़ है। इसके सबसे पुराने हिस्सों का निर्माण दो हज़ार वर्ष से भी पहले आरंभ हुआ था। 1983 ईस्वी में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। आज यह स्थल भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के संरक्षण में है और देश के सर्वाधिक देखे जाने वाले ऐतिहासिक स्थलों में एक है।
अजंता की भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक परिवेश
अजंता की गुफाएँ वाघोरा नदी की घाटी में घोड़े की नाल (U आकार) में फैली हैं। पूरी कतार लगभग 550 मीटर के अर्धवृत्ताकार चाप में है। घाटी की चट्टानी दीवार कई स्रोतों में लगभग 76 मीटर तक ऊँची बताई जाती है। यह चट्टान दक्कन ट्रैप के ज्वालामुखी लावा से बनी बेसाल्ट है, जिसका एक प्रकार अमग्डेलॉइड बेसाल्ट कहलाता है। दक्कन ट्रैप का निर्माण करोड़ों वर्ष पूर्व, क्रिटेशियस युग के अंत के आसपास लावा के विशाल प्रवाहों से हुआ था। यह चट्टान तराशने में कठिन है, किंतु एक बार तराश दिए जाने पर बहुत टिकाऊ रहती है।
गुफाएँ एक सीध में नहीं हैं। उनके क्रमांक (1 से 29 और 15-ए) घाटी के एक छोर से दूसरे छोर की ओर जाते हैं, परंतु यह क्रमांकन निर्माण के कालक्रम का सूचक नहीं है। गुफाएँ चट्टान में अलग-अलग ऊँचाई पर हैं। गुफा 8 काफ़ी निचले स्तर पर है, जबकि गुफा 26 और उससे आगे की गुफाएँ अपेक्षाकृत ऊँचाई पर हैं। यहाँ का शांत, एकांत और प्राकृतिक सौंदर्य वाला वातावरण भिक्षुओं की साधना के लिए बहुत उपयुक्त था।
अजंता और प्राचीन व्यापारिक मार्ग
अजंता एकांत में होते हुए भी अलग-थलग नहीं था। यह क्षेत्र प्राचीन दक्षिणापथ के समीप पड़ता था। यह मार्ग उज्जैन, प्रतिष्ठान (आज का पैठण) और भरुकच्छ (भरूच) बंदरगाह जैसे नगरों को जोड़ता था। भरुकच्छ के माध्यम से भारत का पश्चिमी जगत के साथ समुद्री व्यापार चलता था। इस मार्ग से व्यापारी, तीर्थयात्री और भिक्षु आते-जाते थे। बौद्ध भिक्षु वर्षा ऋतु में यात्रा रोककर वर्षावास करते थे और घाटी की गुफाएँ उनके लिए सुरक्षित तथा शांत आश्रय बन गईं। पश्चिमी दक्कन की अन्य गुफाएँ, जैसे कार्ले, भाजा, बेडसा, नासिक और जुन्नर भी इसी प्रकार व्यापारिक मार्गों के किनारे विकसित हुईं, जिससे बौद्ध संघ और व्यापारी-वर्ग के गहरे संबंध का पता चलता है।
यहाँ की गुफाओं का निर्माण राजाओं, मंत्रियों, सामंतों, भिक्षुओं और धनी व्यापारियों के दान से हुआ है और कई गुफाओं के अभिलेखों में दानदाताओं के नाम मिलते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि अजंता समाज के अनेक वर्गों के सहयोग से बना और यह केवल एक राजा की परियोजना नहीं थी।
अजंता का निर्माण-काल
अजंता का निर्माण एक ही समय में नहीं हुआ। इतिहासकार इसे मुख्यतः दो चरणों में बाँटते हैं और दोनों के बीच लगभग तीन शताब्दियों का अंतराल है।
पहला चरण: सातवाहन काल (लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. से पहली शताब्दी ई.)
अजंता की सबसे पुरानी गुफाएँ गुफा 9, 10, 12, 13 और 15-ए मानी जाती हैं। इनमें गुफा 9 और 10 चैत्य-गृह हैं, जबकि 12, 13 और 15-ए विहार हैं। कुछ विद्वान गुफा 8 को भी इसी प्रारंभिक चरण में गिनते हैं। यह समय दक्कन में सातवाहन शासन का था, जिसने पश्चिमी भारत में बौद्ध गुफा-निर्माण को संरक्षण दिया। कार्ले, भाजा, बेडसा और नासिक की गुफाएँ भी इसी परंपरा से जुड़ी हैं।
इस चरण में बुद्ध को मानव रूप में नहीं दिखाया गया है। उनकी उपस्थिति स्तूप, बोधिवृक्ष, धर्मचक्र और चरण-चिह्न जैसे प्रतीकों से दर्शाई गई है, जिसे थेरवाद परंपरा से जोड़ा जाता है। पुराने ग्रंथों में इसे ‘हीनयान’ कहा गया है, किंतु यह शब्द महायान परंपरा का दिया हुआ है और आज कई विद्वान इसे ‘थेरवाद’ या ‘प्रारंभिक बौद्ध परंपरा’ कहते हैं। इसी कारण इस चरण की गुफाओं में बुद्ध की विशाल मूर्तियाँ नहीं मिलती हैं।
दूसरा चरण: वाकाटक काल (पाँचवीं शताब्दी)
सातवाहनों के बाद लगभग तीन शताब्दियों तक अजंता में कोई बड़ा निर्माण नहीं हुआ। पाँचवीं शताब्दी में अजंता में दोबारा तेज़ी से काम शुरू हुआ। यह वाकाटक वंश का समय था। इस वंश की वत्सगुल्म शाखा (आज का वाशिम) दक्कन के इस भाग पर शासन करती थी, जिसके शासक हरिषेण के काल में अजंता का निर्माण शिखर पर पहुँचा। वाकाटक उत्तर भारत के गुप्त साम्राज्य के समकालीन थे। गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावतीगुप्ता का विवाह वाकाटकों की मुख्य शाखा के शासक रुद्रसेन द्वितीय से हुआ था, जिससे गुप्तों और वाकाटकों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बल मिला। इसका प्रभाव अजंता की कला-शैली पर भी पड़ा।
इस चरण में गुफा 1, 2, 4, 6, 7, 16, 17, 19, 20, 21, 22 और 26 जैसी गुफाएँ बनीं तथा सबसे प्रसिद्ध भित्ति-चित्र रचे गए। यह महायान बौद्ध धर्म का समय था, जिसमें बुद्ध और बोधिसत्व मानव रूप में दिखाए जाने लगे। इसी कारण इस चरण में बुद्ध की विशाल प्रतिमाएँ, बोधिसत्व-आकृतियाँ और कथा-चित्र बहुतायत में मिलते हैं। इसे अजंता का स्वर्ण-युग कहा जाता है।
हरिषेण और उनके सामंतों का योगदान
इस चरण के शिखर का श्रेय वाकाटक शासक हरिषेण (लगभग 475–500 ई.) को दिया जाता है। गुफा 16 के अभिलेख में हरिषेण के मंत्री वराहदेव का उल्लेख है, जिसने यह गुफा बौद्ध संघ को दान किया था। इसी अभिलेख में वाकाटक वंश की वंशावली भी दी गई है। गुफा 17 का अभिलेख से हरिषेण के अधीन अश्मक प्रदेश के एक राजकुमार के दान की जानकारी मिलती है, इसलिए इसे कभी-कभी ‘अश्मक-गुफा’ भी कहा जाता है। गुफा 26 में भिक्षु बुद्धभद्र द्वारा गुफा दान करने का अभिलेख मिलता है। इन अभिलेखों से पता चलता है कि निर्माण-कार्य राजकीय संरक्षण के साथ-साथ राजपरिवार, अधिकारियों और भिक्षुओं की व्यक्तिगत आस्था पर भी टिका था।
वॉल्टर स्पिंक का कालक्रम-सिद्धांत
अमेरिकी कला-इतिहासकार वॉल्टर एम. स्पिंक का अजंता के आधुनिक अध्ययन में बड़ा योगदान है। पहले विद्वान वाकाटक-चरण को लगभग दो शताब्दियों में फैला मानते थे। स्पिंक ने अभिलेखों और शैली के विश्लेषण से तर्क दिया कि इस चरण का अधिकांश काम पाँचवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लगभग 460 से 480 ईस्वी के बीच कुछ ही दशकों में हुआ। उनके अनुसार वाकाटक सत्ता के अचानक कमज़ोर पड़ने से काम अधूरा रह गया और इसीलिए इस चरण की अनेक गुफाएँ अधूरी हैं। यह मत काफ़ी महत्त्वपूर्ण है, किंतु सभी विद्वान इससे सहमत नहीं हैं। कुछ का मानना है कि छठी और सातवीं शताब्दी तक थोड़ा-बहुत काम चलता रहा। सातवीं शताब्दी के बाद यहाँ कोई बड़ा निर्माण नहीं हुआ, इस पर दोनों पक्ष एकमत हैं।
अंतिम चरण और परित्याग
हरिषेण के बाद वाकाटक सत्ता कमज़ोर पड़ गई और कई गुफाएँ अधूरी रह गईं। इसके बाद दक्कन में चालुक्य और राष्ट्रकूट वंशों का उदय हुआ और संरक्षण एलोरा जैसे नए केंद्रों की ओर चला गया। धीरे-धीरे अजंता की घाटी घने जंगल से ढक गई। स्थानीय भील और चरवाहे इन गुफाओं को जानते थे, किंतु बाहरी दुनिया के लिए ये लगभग एक हज़ार वर्ष तक अदृश्य रहीं।
ह्वेनसांग का वर्णन : क्या अजंता एक बौद्ध विद्यापीठ था?
चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनसांग ने लगभग 640–642 ईस्वी में पुलकेशिन द्वितीय के महाराष्ट्र राज्य की यात्रा की थी। उसने वहाँ पहाड़ी में बने एक विशाल बौद्ध विहार का वर्णन किया है, जिसे कई विद्वान अजंता से जोड़ते हैं। ह्वेनसांग स्वयं अजंता गया था, यह निश्चित नहीं है और इस पहचान पर भी पूर्ण सहमति नहीं है। यह प्रचलित दावा कि दार्शनिक दिङ्नाग अजंता में रहे थे, किसी ठोस प्रमाण पर आधारित नहीं है।
फिर भी अजंता के आकार, चित्र-योजना और अभिलेखों को देखकर विद्वान इसे केवल पूजा-स्थल न मानकर भिक्षुओं के निवास, साधना और अध्ययन का बड़ा केंद्र मानते हैं। इसी कारण इसे ‘गुफा-मंदिर’ कहना अपर्याप्त हैं, क्योंकि इससे इसके मठीय और शैक्षणिक स्वरूप पूरी तरह स्पष्ट नहीं होता है।
अजंता की विस्मृति और 1819 ई. की पुनर्खोज
लगभग सातवीं शताब्दी के बाद अजंता में गतिविधि घटती गई और घाटी जंगल से ढक गई। इस विस्मृति को समाप्त करने वाली घटना 28 अप्रैल 1819 ईस्वी को घटी। उस दिन ब्रिटिश सेना की मद्रास घुड़सवार टुकड़ी (28वीं मद्रास कैवेलरी) के अधिकारी कैप्टन जॉन स्मिथ बाघ के शिकार-अभियान पर इस क्षेत्र में आए थे। स्थानीय लोगों की सहायता से वे घाटी में पहुँचे और नदी के मोड़ के सामने चट्टान में एक गुफा का मुहाना देखा, जो मानव-निर्मित लग रहा था। भीतर जाने पर उन्हें दीवारों पर चित्र और नक्काशी दिखाई दी। यह गुफा 10 थी और स्मिथ ने इसके एक स्तंभ या दीवार पर अपना नाम और तिथि खुरच कर लिखा, जो आज भी दिखाई देती है। जिस स्थान से खड़े होकर स्मिथ ने पहली बार घाटी और गुफाओं का दृश्य देखा, वह ‘व्यू-पॉइंट’ के रूप में जाना जाता है। यहाँ से घोड़े की नाल जैसी घाटी का मनोहारी दृश्य दिखता है।
इस खोज के बाद यह क्षेत्र हैदराबाद के निज़ाम के राज्य में आ गया। इसके बाद 1824 ईस्वी में जेम्स अलेक्ज़ेंडर ने रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के सामने अजंता का वर्णन प्रस्तुत किया। 1843 ईस्वी में जेम्स फर्ग्यूसन ने भारतीय शैलकृत मंदिरों पर अपने शोध-पत्र से अजंता को यूरोप और भारत के विद्वानों में परिचित कराया।
अजंता की वास्तुकला
शैलकृत (रॉक-कट) निर्माण की तकनीक
अजंता की गुफाएँ बनाई नहीं गईं, तराशी गई हैं। कारीगर चट्टान में ऊपर से नीचे की ओर खुदाई करते थे। वे छत के पास से काम शुरू करके धीरे-धीरे नीचे उतरते थे। इसका लाभ यह था कि नीचे पाड़ (मचान) बाँधने की झंझट कम हो जाती थी और तराशा हुआ पत्थर पहले से बने भाग को नुकसान नहीं पहुँचाता था।
पहले गुफा का बाहरी मुख (अग्रभाग) और सामने का हिस्सा तैयार किया जाता था, फिर भीतर का भाग खोदा जाता था। शुरुआती खुदाई में लोहे की कुदाली, गैंती और बड़े टिकाव जैसे औज़ार काम आते थे और महीन नक्काशी के लिए बाद में छेनी-हथौड़े का उपयोग होता था। स्तंभ, दीवारें और छतें सब चट्टान से ही एक इकाई के रूप में गढ़ी गईं। खुदाई के साथ-साथ सतह की सफ़ाई और रंग-लेप का काम भी चलता था।
चैत्य-गृह : पूजा और परिक्रमा का स्थान
अजंता में पाँच चैत्य-गृह हैं : गुफा 9, 10, 19, 26 और 29 (इनमें गुफा 29 अधूरी है)। चैत्य-गृह लंबा होता है, सामने से आयताकार और भीतर पिछले सिरे पर अर्धवृत्ताकार (गजपृष्ठाकार)। बीच में एक बड़ा हॉल होता है और दोनों ओर स्तंभों की पंक्तियाँ होती हैं। हॉल के अंतिम सिरे पर चट्टान से तराशा हुआ स्तूप होता है, जिसकी परिक्रमा करके श्रद्धालु और भिक्षु पूजा करते थे।
छत अर्धवृत्ताकार मेहराबदार होती थी और उस पर लकड़ी की पसलियों जैसी संरचनाएँ भी पत्थर में तराशी जाती थीं। इससे संकेत मिलता है कि पत्थर की वास्तुकला लकड़ी की वास्तुकला से विकसित हुई है। द्वार के ऊपर घोड़े की नाल के आकार की बड़ी खिड़की होती है, जिसे चैत्य-वातायन (चैत्य-मेहराब) कहते हैं और जिससे भीतर प्रकाश आता है।
विहार: भिक्षुओं का निवास और अध्ययन-कक्ष
शेष गुफाएँ विहार हैं। विहार के बीच में एक बड़ा वर्गाकार सभा-कक्ष होता है, जिसके चारों ओर स्तंभ होते हैं। हॉल की तीन दीवारों में छोटे-छोटे कक्ष (कोठरियाँ) बने होते हैं, जिनमें भिक्षु रहते और साधना करते थे। सामने के भाग में गर्भगृह होता है, जहाँ बुद्ध की प्रतिमा स्थापित की जाती है और आगे बरामदा (वरण्डा) होता है।
सातवाहन काल के विहारों में पत्थर के बिस्तर (शिला-शय्याएँ) मिलते हैं, जबकि वाकाटक काल के विहारों में गर्भगृह और मूर्तियाँ जोड़ी गईं। यह परिवर्तन थेरवाद से महायान की ओर बदलाव का सूचक है।
स्तंभ और छतें
अजंता के स्तंभ अलग-अलग शैलियों में तराशे गए हैं। कुछ अष्टकोणीय हैं, कुछ चौकोर या गोल। कई स्तंभों पर घट-पल्लव, कमल, लताएँ, पशु और मानव-आकृतियाँ अंकित हैं। गुफा 1, 2 और 17 की छतें इतनी बारीकी से चित्रित हैं कि लगता है मानो कपड़े का सुंदर वितान (शामियाना) किनारी सहित तना हुआ हो।
अजंता की मूर्तिकला
अजंता की मूर्तियाँ चट्टान से ही काटकर बनाई गई हैं। हर विहार के गर्भगृह में बुद्ध की मूर्ति है, जो ध्यान, उपदेश या धर्मचक्र-प्रवर्तन जैसी मुद्रा में है।
गुफा 1 की बुद्ध-प्रतिमा
अलग-अलग दिशा से प्रकाश पड़ने पर चेहरे के भाव बदलते दिखते हैं। किसी कोण से चेहरा गंभीर और चिंतनशील लगता है, तो दूसरे से शांत और करुणामय।
गुफा 19 का चैत्य-गृह
मूर्तिकला की दृष्टि से इसे अजंता का सर्वोत्तम चैत्य माना जाता है। इसका मुखभाग बुद्ध की मूर्तियों, नाग-आकृतियों और अलंकृत स्तंभों से भरा है। स्तूप के सामने बुद्ध की खड़ी मूर्ति महायान परंपरा का संकेत देती है।
गुफा 26 का महापरिनिर्वाण
गुफा 26 में लेटे हुए बुद्ध की लगभग 7.3 मीटर (23 फुट) लंबी विशाल प्रतिमा है, जो अजंता की सबसे भव्य मूर्तियों में गिनी जाती है। मूर्ति के नीचे शिष्य शोक में दिखाए गए हैं और ऊपर देवलोक में आनंद का वातावरण है। यह विरोधाभासी भावों का मार्मिक अंकन है। यह गुफा सामान्यतः पाँचवीं शताब्दी के उत्तरार्ध की मानी जाती है।
अजंता की मूर्तियों में शांत मुद्रा, अर्धनिमीलित नेत्र और सुगठित शरीर-रचना दिखती है, जो गुप्तकालीन कलात्मक परंपरा से जुड़ी है। इसे सारनाथ की समकालीन बुद्ध-मूर्तियों के साथ तुलना करके समझा जाता है।
अजंता की चित्रकला
चित्रों के विषय
अजंता की भित्ति-चित्रकला भारतीय कला का चरम उदाहरण है। इसके मुख्य विषय बुद्ध का जीवन, बोधिसत्व और जातक कथाएँ हैं। जातक कथाएँ बुद्ध के पूर्वजन्मों की कहानियाँ हैं, जिनमें वे बोधिसत्व के रूप में त्याग, करुणा, सत्य और दान जैसे गुणों का पालन करते हैं। यहाँ महाजनक, शिबि, छद्दंत, हंस, विधुरपंडित, वेस्सन्तर और महाकपि जातक जैसी अनेक कथाएँ चित्रित हैं।
चित्रों में केवल धार्मिक विषय नहीं हैं। राजा-रानी, दरबार, नगर, गाँव, बाज़ार, आश्रम, युद्ध, नृत्य-संगीत, नाविक, किसान, भिखारी और सामान्य स्त्री-पुरुष सब यहाँ मिलते हैं। वस्त्र, आभूषण, केश-सज्जा, बर्तन और अस्त्र-शस्त्र भी विस्तार से बने हैं। यक्ष, किन्नर, गंधर्व और अप्सराएँ भी आम विषय हैं। मंदिर, राजप्रासाद, तंबू, नगर-द्वार, दुर्ग की प्राचीरें और स्तूप भी चित्रित हैं। इसलिए इतिहासकार इन चित्रों को गुप्तकालीन समाज की जानकारी का महत्त्वपूर्ण स्रोत मानते हैं।
छतों पर पुष्प, लताएँ, फल, पक्षी, पशु और मानव-आकृतियों की जटिल संरचनाएँ हैं। इनमें से कई डिज़ाइन हिमरू शालों, पैठणी साड़ियों और अन्य वस्त्र-कलाओं में आज भी देखे जाते हैं, जो अजंता की अलंकरण-परंपरा की निरंतरता का परिचायक है।
चित्र बनाने की तकनीक : फ्रेस्को नहीं, टेम्परा
अजंता के चित्रों को प्रायः ‘फ्रेस्को’ कहा जाता है, किंतु तकनीकी रूप से ये असली फ्रेस्को नहीं हैं। असली फ्रेस्को में गीले प्लास्टर पर रंग किया जाता है। अजंता के चित्र सूखे प्लास्टर पर बने टेम्परा-शैली के हैं, जिसे ‘फ्रेस्को-सेको’ कहा जाता है।
इस प्रक्रिया में पहले चट्टान की दीवार को खुरदरा किया जाता था। उस पर मिट्टी, गोबर, चावल की भूसी, वनस्पतियों के रेशे और चट्टान के बारीक चूर्ण या रेत का मोटा लेप चढ़ाया जाता था। उसके ऊपर चूने की पतली सफ़ेद परत लगाई जाती थी। सूखने के बाद चित्रकार पहले लाल या भूरे रंग से रेखांकन (आउटलाइन) करते थे। फिर रंग भरे जाते थे और अंत में काली रेखाओं से आकृतियों की रूपरेखा स्पष्ट की जाती थी।
प्रयुक्त रंग और उनके स्रोत
रंग प्राकृतिक खनिजों और वनस्पतियों से बनाए जाते थे और उनमें गोंद जैसा प्राकृतिक चिपकाने वाला पदार्थ मिलाया जाता था। लाल और पीले रंग गेरू (रेड ओकर और येलो ओकर) से बनते थे। हरा रंग ग्लॉकोनाइट (टेरा-वर्ट) नामक खनिज से, सफ़ेद रंग चूने, जिप्सम या सफ़ेद चिकनी मिट्टी से और काला रंग काजल (लैंप-ब्लैक) से प्राप्त किया जाता था।
नीले रंग के विषय में माना जाता है कि कुछ स्थानों पर वह लैपिस लाज़ुली (लाजवर्द) से बना है। यह बहुमूल्य पत्थर मुख्यतः अफ़ग़ानिस्तान के बदख्शां क्षेत्र से व्यापारिक मार्गों द्वारा आता था। लाजवर्द दूर से आता था, इसीलिए नीले रंग का प्रयोग अपेक्षाकृत सीमित है।
गुफाओं के अँधेरे में चित्र बनाने के लिए कारीगर संभवतः बाहर की धूप को दर्पण जैसी चमकदार सतहों या धातु से परावर्तित करके भीतर पहुँचाते थे और कहीं-कहीं तेल के दीपकों का भी उपयोग हुआ होगा। यह अनुमान है क्योंकि इसके प्रत्यक्ष प्रमाण सीमित हैं।
चित्रकला के दो कालखंड
पहला कालखंड प्रारंभिक चरण का है, जिसमें चित्रकारी सीमित और आरंभिक थी। इसके अवशेष गुफा 9 और 10 में मिलते हैं, जैसे गुफा 10 में छद्दंत जातक और शाम जातक के अंश। दूसरा कालखंड वाकाटक काल का है। पाँचवीं शताब्दी से आगे चित्रकला अधिक परिपक्व रूप में दिखती है और गुफा 1, 2, 16 और 17 की चित्रकारी इसी उत्कृष्ट कालखंड की देन है।
अजंता चित्र-शैली की विशेषताएँ
अजंता शैली की सबसे बड़ी विशेषता रेखाओं की सजीवता है। आकृतियों में हल्की और गहरी छाया देकर उभार और गोलाई दिखाई गई है, जिससे चित्र त्रिआयामी लगते हैं। चेहरों पर करुणा, शोक, प्रेम, भय, आनंद और ध्यान जैसे भाव पहचाने जा सकते हैं, और हाथों की मुद्राएँ भाव-अभिव्यक्ति में सहायक हैं। कला-आलोचकों ने कुछ चित्रों की तुलना यूरोपीय पुनर्जागरण के चित्रों से की है।
अजंता की गुफाओं की संख्या और वर्गीकरण
भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण और यूनेस्को की सामान्य गणना के अनुसार अजंता में कुल 30 गुफाएँ हैं (गुफा 1 से 29 और उनके साथ 15-ए)। गुफा 15-ए की पहचान 1956 ई. में हुई थी। कोई अलग ‘गुफा 30’ नहीं है। कई गुफाएँ (3, 4, 5, 14, 21 से 25, 27, 28 और 29) पूर्णतः या आंशिक रूप से अधूरी हैं।
गुफाओं में चैत्य-गृह पाँच हैं : गुफा 9, 10, 19, 26 और 29। शेष 25 विहार हैं, जो भिक्षुओं के आवास और अध्ययन के स्थान थे। प्रारंभिक (सातवाहन/थेरवाद) चरण में गुफा 9, 10, 12, 13 और 15-ए आती हैं, यद्यपि कुछ विद्वान गुफा 8 भी जोड़ते हैं। शेष अधिकांश गुफाएँ महायान (वाकाटक) चरण की हैं।
प्रमुख गुफाओं का विवरण
गुफा 1: पद्मपाणि और जातक कथाओं का भव्य विहार
यह वाकाटक काल का विशाल विहार है, जिसका हॉल 20 स्तंभों पर टिका है। स्तंभों पर सुंदर अलंकरण हैं। गर्भगृह में बुद्ध की बड़ी मूर्ति धर्मचक्र-प्रवर्तन मुद्रा में है और प्रकाश की दिशा बदलने पर उसके चेहरे के भाव बदलते दिखते हैं। दीवारों पर महाजनक, शिबि, शंखपाल और चम्पेय जातक के दृश्य हैं। शिबि जातक में राजा शिबि शरण में आए कबूतर को बाज़ से बचाने के लिए अपने शरीर का मांस देने को तैयार हो जाते हैं।
इस गुफा के सबसे प्रसिद्ध चित्र बोधिसत्व पद्मपाणि (हाथ में नीला कमल थामे) और वज्रपाणि के हैं। कमल पवित्रता और करुणा का प्रतीक है। पद्मपाणि की झुकी हुई मुद्रा और चेहरे की शांति के कारण इसे अजंता का सर्वोत्कृष्ट चित्र माना जाता है। यहाँ मार के प्रलोभन, छत पर पशु-पक्षियों और फूलों के अलंकरण तथा एक दरबारी दृश्य का चित्रण भी है, जिसमें विदेशी दूत भारतीय राजा को उपहार भेंट करते दिखते हैं। इस दृश्य को परंपरागत रूप से कभी फारसी दूतमंडल से जोड़ा गया है, किंतु यह पहचान विवादित है। एक चित्र में सांड की ऐसी आकृति है जो हर कोण से दर्शक की ओर आती लगती है।
गुफा 2 : बुद्ध-जन्म कथा और सहस्र बुद्ध
गुफा 2 भी वाकाटक काल की है और गुफा 1 से मिलती-जुलती योजना पर बनी है। दीवारों पर बुद्ध की माता महामाया के स्वप्न का दृश्य है, जिसमें उन्होंने एक श्वेत हाथी को गर्भ में प्रवेश करते देखा। बुद्ध का जन्म भी चित्रित है। एक दीवार पर श्रावस्ती के चमत्कार में अनेक बुद्ध-आकृतियाँ अलग-अलग मुद्राओं में दिखाई गई हैं, जिसे सहस्र बुद्ध का चित्र कहते हैं। यहाँ हंस जातक भी है। छत पर ज्यामितीय और पुष्प अलंकरण इतने सुंदर हैं कि उनके डिज़ाइन आज भी हिमरू शालों और साड़ियों पर उतारे जाते हैं। गर्भगृह के निकट बाल-रक्षक देवी हारीति और उनके पति पंचिक की मूर्तियाँ हैं।
गुफा 3, 4 और 5 : अधूरी परंतु महत्त्वपूर्ण
गुफा 3 अत्यंत प्रारंभिक अवस्था में ही रुक गई। इससे खुदाई की पद्धति और क्रम को समझने में मदद मिलती है। गुफा 4 अजंता का सबसे विशाल विहार है, जिसमें 28 स्तंभ हैं। द्वार पर द्वारपाल और युगल-आकृतियाँ हैं, गर्भगृह में बुद्ध की विशाल मूर्ति है और आसपास अष्टमहाभय-अग्नि, सर्प, हाथी, सिंह, जल, चोर, बंधन और शत्रु आदि से रक्षा करने वाले बुद्ध का शिल्पांकन है। यह गुफा भी पूर्ण नहीं हो सकी। गुफा 5 भी अधूरी है।
गुफा 6: दो मंज़िला विहार
गुफा 6 अजंता की एकमात्र दो मंज़िला गुफा है। निचली मंज़िल में सभा-कक्ष और गर्भगृह है, जिसमें बुद्ध पद्मासन में विराजमान हैं। ऊपरी मंज़िल में स्तंभों वाला सभा-कक्ष है। प्रवेश-द्वार पर मकर और पुष्पों की सजावट है और ऊपरी गर्भगृह की दीवारों पर बुद्ध के चमत्कारों और मार-विजय के चित्रांश दिखते हैं।
गुफा 7 और 8
गुफा 7 सामान्य मठ-योजना से भिन्न है। इसमें सभा-कक्ष नहीं है, केवल दो छोटे बरामदे या मंडप हैं। गर्भगृह में बुद्ध की मूर्ति है, पीछे की दीवार पर प्रभामंडल की नक्काशी है और दीवारों पर बुद्ध की अनेक छोटी आकृतियाँ हैं। गुफा 8 सबसे निचले स्तर पर है और काफ़ी क्षतिग्रस्त है। आधुनिक काल में यहाँ विद्युत-जनरेटर रखे गए, इसलिए प्राचीन कला के अवशेष बहुत कम हैं।
गुफा 9 और 10: सबसे प्राचीन चैत्य-गृह
गुफा 9 अजंता की प्राचीनतम चैत्य-गुफाओं में है। इसके भीतर चट्टान से तराशा हुआ अर्धगोलाकार स्तूप है, जिसके ऊपर छत्र बना है। दीवारों पर बुद्ध की आकृतियाँ हैं, जिनमें बाद के काल में जोड़े गए चित्र भी शामिल हैं।
गुफा 10 अजंता की सबसे प्रसिद्ध प्रारंभिक चैत्य-गुफा है। इसका मुख्य कक्ष लगभग 39–40 अष्टकोणीय स्तंभों पर टिका है, जो हॉल को मध्य के नाभि-भाग और दोनों ओर की परिक्रमा-वीथियों में बाँटते हैं। हॉल के अंत में अर्धगोलाकार स्तूप है। यहाँ की ब्राह्मी लिपि में प्राकृत भाषा के अभिलेख के आधार पर इसे दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का माना जाता है। अभिलेखों से उस युग में दानदाताओं और व्यापारी-वर्ग के धार्मिक संरक्षण की परंपरा का पता चलता है। यहाँ छद्दंत और शाम जातक के प्राचीन चित्रांश हैं। इसी गुफा में जॉन स्मिथ ने 1819 ई. में अपना नाम खुरचा था।
गुफा 11 से 15-ए
गुफा 11 का सभा-कक्ष बड़ा है और उसके गर्भगृह में बुद्ध की मूर्ति है। इसका आरंभिक निर्माण पहले चरण में हुआ और मूर्तियाँ बाद में जोड़ी गईं। गुफा 12 सातवाहन काल का थेरवाद विहार है, जिसमें पत्थर के पलंग बने हैं। गुफा 13 उसी काल का छोटा विहार है, जिसमें शिला-शय्याएँ हैं। गुफा 14 अधूरा विहार है। गुफा 15 में मुख्य मंडप, सभा-मंडप और गर्भगृह है, और गुफा 15-ए इन्हीं के पास स्थित छोटी गुफा है। कुछ गुफाओं का वर्तमान में भंडार-गृह आदि के रूप में उपयोग होने की बात कही जाती है, पर यह अस्थायी व्यवस्था की जानकारी है और बदल सकती है।
गुफा 16: वराहदेव की गुफा और ‘मरणासन्न राजकुमारी’
गुफा 16 अजंता की सबसे महत्त्वपूर्ण चित्र-गुफाओं में है। यहाँ हरिषेण के मंत्री वराहदेव का अभिलेख है। बाईं दीवार पर बुद्ध के चचेरे (सौतेले) भाई नंद की कथा चित्रित है, जिसने सांसारिक सुख छोड़कर भिक्षु-जीवन अपना लिया था। इसी कथा में नंद की पत्नी सुंदरी शोक से मूर्छित होकर एक सेविका की गोद में दिखाई देती है। यह चित्र ‘मरणासन्न राजकुमारी’ के नाम से प्रसिद्ध है और करुणा का अद्भुत अंकन है। यहाँ माया के स्वप्न और ज्योतिषी द्वारा उसका अर्थ बताने का दृश्य भी है। चित्रों में छाया और परिप्रेक्ष्य से गहराई का प्रभाव है और स्तंभों तथा छत में पत्थर में लकड़ी के काम की नकल का प्रयास दिखता है।

गुफा 17: सर्वाधिक चित्रों वाली गुफा
अजंता की गुफाओं में सबसे अधिक चित्र गुफा 17 में सुरक्षित हैं। यहाँ छद्दंत जातक (छह दाँतों वाले हाथी की कथा), महाकपि जातक (बुद्ध वानर के रूप में), वेस्सन्तर जातक (दानशील राजकुमार) और सिंहल अवदान जैसी कथाएँ हैं। एक भावुक चित्र में बुद्ध कपिलवस्तु लौटकर पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल से भिक्षा माँगते दिखाए गए हैं। एक अन्य दृश्य में देवदत्त द्वारा भेजा गया उन्मत्त हाथी नालागिरि बुद्ध की करुणा के आगे शांत हो जाता है। यहाँ एक उड़ती हुई अप्सरा का भी प्रसिद्ध चित्र है। छत का चित्रण कपड़े के वितान जैसा दिखता है और यहाँ अश्मक-राजकुमार का दान-अभिलेख भी है।
गुफा 18 से 20
गुफा 18 आयताकार गुफा है, जिसमें अष्टकोणीय स्तंभ और जल-संग्रह की टंकी है। गुफा 19 घोड़े की नाल के आकार का सुंदर चैत्य-गृह है। इसके अग्रभाग पर नागराज और उनकी पत्नी की आकृतियाँ हैं, और बीच में तीन छत्रों वाला स्तूप है जिस पर बुद्ध की खड़ी आकृति तराशी गई है। यह महायान काल की श्रेष्ठ शिल्पकृति है। गुफा 20 एक विहार है, जिसके गर्भगृह में बुद्ध उपदेश देते दिखाए गए हैं। इसके स्तंभों पर विविध अलंकरण हैं और यहाँ भी दान-अभिलेख मिलता है।
गुफा 21 से 25
गुफा 21 आंशिक रूप से पूर्ण विहार है, जिसके अलंकृत स्तंभ उल्लेखनीय हैं। यहाँ हारीति और नाग-आकृतियों का अंकन है। गुफा 22 भी अधूरी है, पर इसकी दीवार पर सात मानुषी बुद्ध और भावी बुद्ध मैत्रेय का चित्रण है। गुफा 23 अधूरी है, किंतु उसके स्तंभों में शिल्पकला दिखती है। गुफा 24 यदि पूरी होती, तो अपने आकार के कारण अजंता की सबसे भव्य गुफाओं में गिनी जाती। गुफा 25 अधूरा विहार है।
गुफा 26: महापरिनिर्वाण की विशाल चैत्य-गुफा
गुफा 26 अजंता की सबसे भव्य चैत्य-गुफाओं में से एक है। इसके भीतर बुद्ध-आकृतियों की बारीक नक्काशी है और स्तूप के सामने बुद्ध की बैठी हुई विशाल प्रतिमा है। बाईं दीवार पर लगभग 7.3 मीटर लंबी महापरिनिर्वाण की मूर्ति है और उसी दीवार पर मार और उसकी सेना का चित्रण भी है। यहाँ भिक्षु बुद्धभद्र का दान-अभिलेख है।

गुफा 27 से 29
गुफा 27 क्षतिग्रस्त विहार है, जो गुफा 26 से जुड़ा माना जाता है। गुफा 28 और 29 चट्टान की ऊँचाई पर हैं और अधूरी तथा दुर्गम हैं। गुफा 29 अधूरा चैत्य-गृह है, जिसकी सीढ़ियाँ अब लगभग समाप्त हो चुकी हैं।
चित्रों की प्रतिलिपियाँ और संरक्षण के प्रयास
अजंता के चित्रों की नकल बनाने के प्रयास उन्नीसवीं शताब्दी में शुरू हुए। 1844 ईस्वी से रॉबर्ट गिल ने ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए चित्रों की प्रतिकृतियाँ बनाईं, जिन्हें लंदन के क्रिस्टल पैलेस में प्रदर्शित किया गया, जो 1866 ईस्वी की आग में नष्ट हो गईं। 1872 से 1885 ईस्वी के बीच जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट, बंबई के जॉन ग्रिफ़िथ्स और उनके छात्रों ने फिर प्रतिकृतियाँ बनाईं। इनमें से अनेक 1885 ईस्वी में साउथ केंसिंग्टन संग्रहालय (के वी एंड ए) की आग में नष्ट हो गईं। 1909 से 1911 ईस्वी के बीच लेडी क्रिस्टियाना हेरिंघम और उनके साथी कलाकारों ने प्रतिकृतियाँ बनाईं। इस दल में नंदलाल बोस जैसे भारतीय कलाकार भी थे।
1920 के दशक में हैदराबाद के निज़ाम की सरकार ने इटली के विशेषज्ञों, जैसे प्रो. लौरेंज़ो चेकोनी और काउंट ओरसीनी को संरक्षण के लिए बुलाया। उन्होंने चित्रों पर रासायनिक परत और वार्निश चढ़ाई। बाद में इनमें से कई पदार्थ नुकसानदेह सिद्ध हुए।
स्वतंत्रता के बाद संरक्षण की ज़िम्मेदारी भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के पास है। नमी, धूल, कीटों और पर्यटकों की साँसों से उत्पन्न आर्द्रता और कार्बन-डाइऑक्साइड से चित्रों को बचाने के लिए प्रवेश-नियंत्रण, वेंटिलेशन और अन्य नियम लागू हैं। संरक्षण की दृष्टि से कुछ गुफाओं में सीमित संख्या में ही दर्शकों को एक साथ प्रवेश दिया जाता है और फ़्लैश फ़ोटोग्राफ़ी पर रोक है।
अजंता और एलोरा में प्रमुख अंतर
अजंता की चर्चा प्रायः एलोरा के साथ होती है। एलोरा छत्रपति संभाजीनगर से लगभग 30 किलोमीटर दूर है और उसे भी 1983 ईस्वी में ही विश्व धरोहर घोषित किया गया। दोनों स्थलों में कई अंतर हैं। अजंता में लगभग 30 गुफाएँ हैं, जबकि एलोरा में 34। अजंता केवल बौद्ध स्थल है, जबकि एलोरा में 17 हिंदू, 12 बौद्ध और 5 जैन गुफाएँ हैं। अजंता का मुख्य काल दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से लगभग सातवीं शताब्दी ईस्वी तक है, जबकि एलोरा का काल लगभग छठी से दसवीं शताब्दी है। अजंता की विशेषता भित्ति-चित्रकला है, जबकि एलोरा मूर्तिकला और स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध है, जिसका शिखर कैलाश मंदिर (गुफा 16) है।
यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में अजंता
1983 ईस्वी में अजंता को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। इसे मानव रचनात्मक प्रतिभा का उत्कृष्ट उदाहरण और बौद्ध कला का अनुपम केंद्र माना गया। यह स्थल भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण की देखरेख में है और भारत के सर्वाधिक देखे जाने वाले पर्यटन स्थलों में है।
अजंता का कला-जगत पर प्रभाव
अजंता की चित्र-शैली का प्रभाव भारत और उसके बाहर भी माना जाता है। मध्य प्रदेश की बाघ गुफाओं के चित्र अजंता शैली से मिलते हैं। श्रीलंका के सिगिरिया के भित्ति-चित्रों में समान परंपरा की छाप देखी जाती है। मध्य एशिया के बौद्ध स्थलों और चीन तक फैली बौद्ध कला में भी इसका प्रभाव माना जाता है। आधुनिक भारत में बंगाल शैली के कलाकारों, जैसे अबनींद्रनाथ टैगोर और नंदलाल बोस ने अजंता से प्रेरणा ली और उसे राष्ट्रीय कला-पुनर्जागरण से जोड़ा।
इस प्रकार अजंता की गुफाएँ भारतीय कलाकारों की श्रद्धा, धैर्य और सृजन-शक्ति का जीवित प्रमाण हैं। सातवाहन काल के सादे स्तूपों से लेकर वाकाटक काल के भव्य विहारों और रंगीन भित्ति-चित्रों तक की यात्रा बौद्ध धर्म और भारतीय कला के विकास की कहानी कहती है। यहाँ की चट्टानों पर बुद्ध, बोधिसत्व, राजा, रानियाँ, पशु-पक्षी और फूल उस युग की आत्मा को आज भी जीवित रखे हैं। लगभग एक हज़ार वर्ष के विस्मरण के बाद 1819 ईस्वी की पुनर्खोज से अजंता आज विश्व की साझा धरोहर बन चुका है।


