गांधी हत्याकांड (Gandhi Assassination)  

गांधी हत्याकांड (Gandhi Assassination)  
गांधी हत्याकांड: एक ऐतिहासिक पुनरावलोकन वर्तमान संदर्भ में गांधी-विरोध की प्रवृत्ति वर्ष 2019 ईस्वी में […]

गांधी हत्याकांड: एक ऐतिहासिक पुनरावलोकन

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वर्तमान संदर्भ में गांधी-विरोध की प्रवृत्ति

वर्ष 2019 ईस्वी में शहीद दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में एक अत्यंत निंदनीय घटना घटित हुई थी, जिसमें किसी संगठन की महिला नेता द्वारा महात्मा गांधी के चित्र पर नकली रिवॉल्वर से गोली मारी गई थी और उस चित्र के नीचे खून की तस्वीर लगाकर “गोडसे अमर रहें” के नारे लगाए गए थे, जो शीघ्र ही सोशल मीडिया पर वायरल भी हो गए थे। इस घटना को गंभीरता से लेते हुए सरकार ने जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्यवाही की और पाँच व्यक्तियों को गिरफ्तार भी किया गया। किंतु दुर्भाग्यवश यह खबर शीघ्र ही आई-गई हो गई, जैसा कि आजकल अधिकतर संवेदनशील खबरों के साथ होता रहता है। कुछ स्थानों पर इस घटना के विरोध में प्रदर्शन हुए, भाषणबाजी की गई और इतने भर से ही सामाजिक कर्तव्य की इतिश्री मान ली गई। किंतु वास्तव में यह प्रतीकात्मक घटना उस व्यापक गांधी-विरोध का एक छोटा-सा नमूना भर है, जो जनमानस के एक वर्ग में निरंतर पोषित हो रहा है।

इसी प्रकार का एक और महत्त्वपूर्ण उदाहरण बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में भी सामने आया था, जब मराठी लेखक प्रदीप दलवी ने “मी नाथूराम गोडसे बोलतोय” नामक विवादास्पद नाटक की रचना की थी। लेखक ने अपनी इस कृति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आवरण में प्रस्तुत किया, जिस पर उस समय पक्ष और विपक्ष दोनों ओर से खूब बहस, चर्चा-परिचर्चा हुई। किंतु इन सभी बहसों के बावजूद मूलभूत प्रश्न जस-का-तस बना रहा- क्या गांधी वास्तव में हिंदू जनता के विरोधी थे? आज, उनकी हत्या के लगभग अठहत्तर वर्ष बीत जाने के बाद भी यह प्रश्न प्रासंगिक बना हुआ है कि आखिर हत्या से जुड़ा यह “आकर्षण” अब तक क्यों समाप्त नहीं हुआ, जबकि यह सर्वविदित तथ्य है कि भारत की सनातन सांस्कृतिक धारा को युगधर्म से जोड़कर राष्ट्रीय जन-आंदोलन और सत्याग्रही प्रक्रिया को अधिक गतिशील और प्रभावी बनाने का श्रेय एकमात्र गांधी को ही है।

चूँकि गतिशीलता स्वयं में एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, इसलिए उसमें पूर्णता की खोज करना तार्किक दृष्टि से उचित नहीं है। इस बात पर लगभग समस्त विद्वान एकमत हैं कि गांधी भारतीय जन-आंदोलन के प्रवर्तक अथवा पायनियर थे। यदि गहराई से विश्लेषण किया जाए तो यह स्पष्ट होता है कि भारत की भौगोलिक अस्मिता को एक एकीकृत राजनीतिक अस्मिता प्रदान करने वाले प्रथम व्यक्ति भी गांधी ही थे। वह ऐसे विरल व्यक्तित्व हैं जो अपने आप में एक संपूर्ण संस्था बन जाने का दुर्लभ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

हत्या के प्रति उभरती स्वीकृति और गोडसे के औचित्य-तर्क

पिछले कुछ वर्षों में घटित विभिन्न घटनाओं का अवलोकन करने पर ऐसा प्रतीत होता है कि मानो गांधी के वध को समाज के एक वर्ग में धीरे-धीरे एक प्रकार की स्वीकृति मिलती जा रही हो। यह एक विचित्र संयोग ही है कि ‘वध-निष्ठा’ जैसी अमानवीय राजनीति करने वाले लोग स्वयं को राष्ट्र-जीवन के अधिकृत विद्वान के रूप में प्रस्तुत करने का साहस दिखाने लगे हैं। ऐसे में इक्कीसवीं सदी के प्रथम चतुर्थांश तक पहुँच चुके भारतीय जनमानस के समक्ष यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या उसे अतीतजीवी बनकर ही रहना चाहिए? यदि इसका उत्तर नकारात्मक है, तो उसे चाहिए कि वह ऐतिहासिक तथ्यों से भलीभाँति अवगत होकर निःसंकोच भाव से आगे की ओर बढ़े, क्योंकि इतिहास का स्वभाव ही यह है कि वह कभी भी बीते हुए कल के सुधार की अपील नहीं करता, बल्कि वह केवल तथ्यों को संरक्षित रखता है और  राजनीति को भी इसी भावना से इतिहास का सम्मान करना चाहिए। गांधी के ऊपर आज भी हमले होना, चाहे वे प्रतीकात्मक ही क्यों न हों, इस बात का सुस्पष्ट प्रमाण है कि वे आज भी विचारधारा के स्तर पर जीवित हैं, अन्यथा उन पर हमले करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती?

गोडसे ने अपनी हत्या को उचित ठहराते हुए यह तर्क दिया था कि “वह एक धार्मिक कृत्य था। जिस प्रकार कंस का वध और शिशुपाल का वध एक धर्मानुरूप कृत्य माना जाता है, उसी प्रकार गांधी का वध भी एक धार्मिक कृत्य है।” प्रदीप दलवी के विवादास्पद नाटक का मूल कथ्य भी यही है। किंतु यदि इस तर्क पर थोड़ा गहराई से विचार किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह तथाकथित ‘धार्मिक कृत्य’ वास्तव में एक आदिम और असभ्य व्यवस्था का ही उदाहरण है, जहाँ कोई व्यक्ति स्वयं ही न्यायाधीश और जल्लाद दोनों की भूमिका निभा लेता है। कोई भी सभ्य समाज ऐसी व्यवस्था और ऐसे कानून की पुनरावृत्ति कभी नहीं चाहेगा, क्योंकि किसी के भी कथित बुरे कार्य के लिए उचित दंड निर्धारित करने की व्यवस्था मनुष्य द्वारा स्वयं चुनी गई सरकारों और न्यायपालिका ने बनाई है, न कि किसी व्यक्ति-विशेष ने। संभवतः इसी सुदृढ़ तर्क के आधार पर गांधी के अनुयायी और समर्थक कभी भी गोडसे से बदला लेने की बात नहीं करते, क्योंकि गांधी स्वयं भी क्षमादान और अहिंसा के प्रबल हिमायती थे और आज के गांधीवादी भी विनम्रतापूर्वक अपने कार्यों में विश्वास रखते हैं, न कि प्रतिशोध में। कुछ लोग इस संपूर्ण प्रकरण को केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दृष्टिकोण से देखते हैं, किंतु उन्हें यह समझना चाहिए कि किसी विचार का उचित उत्तर विचार से ही दिया जाना चाहिए, हिंसा से नहीं और यह प्रश्न सदैव प्रासंगिक बना रहेगा कि गोडसे ने अपने जीवन में कोई सार्थक वैचारिक लड़ाई कब लड़ी थी?

गांधी की हत्या के पश्चात् गोडसे के पास पर्याप्त समय था, जिसका पूर्ण उपयोग उसने अपने कुकृत्य को वैचारिक आवरण देकर उचित सिद्ध करने के प्रयास में किया। यह मानव-स्वभाव की सामान्य प्रवृत्ति है कि कोई भी अपराधी अपने बचाव के लिए हर संभव तर्क और प्रयास करता है और गोडसे ने भी ठीक यही किया। अपने बचाव में उसने जो प्रमुख कारण गिनाए, उनमें सबसे प्रमुख कारण यह था कि गांधी ने न केवल देश का विभाजन कराया, बल्कि उसे स्वीकार भी किया। इसके अतिरिक्त उसने दूसरा महत्त्वपूर्ण कारण यह बताया था कि गांधी ने पाकिस्तान, जिसने उस समय भारत के विरुद्ध युद्ध छेड़ रखा था, को उसके हिस्से के 55 करोड़ रुपये भारत सरकार से दिलवाने के लिए अनशन किया। सतही तौर पर यह तर्क किसी सामान्य व्यक्ति को भी गांधी के प्रति क्षुब्ध और आक्रोशित कर सकता है, किंतु इसकी ऐतिहासिक सत्यता की जाँच अत्यंत आवश्यक है।

चुनी भाई वैद्य का तथ्यात्मक खंडन

सर्वोदय आंदोलन के वरिष्ठ चिंतक चुनी भाई वैद्य ने अपनी महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘गांधी की हत्या : क्या सच, क्या झूठ’ में गोडसे द्वारा गढ़े गए इन समस्त तर्कों का अत्यंत दृढ़तापूर्वक और तथ्यों के आधार पर खंडन किया है। उनके शोध के अनुसार गांधी की हत्या के कुल आठ प्रयास किए गए थे और इनमें से चार प्रयास तो उस काल में हुए थे जब न तो पाकिस्तान का निर्माण हुआ था और न ही 55 करोड़ रुपये की बात ही कहीं थी। इस ऐतिहासिक तथ्य से यह स्पष्ट रूप से सिद्ध हो जाता है कि गांधी की हत्या के पीछे केवल तात्कालिक और सतही कारण नहीं थे, बल्कि उन्हें राजनीतिक दृश्यपटल से हटाने के सुनियोजित प्रयास बहुत पहले से ही निरंतर चल रहे थे। गांधी की हत्या के चार  प्रयासों का क्रमबद्ध ऐतिहासिक विवरण निम्नलिखित है—

पहला प्रयास (1934 ई.)

गांधी की हत्या का पहला प्रयास 1934 ईस्वी में उस समय किया गया था जब गांधी पूना नगरपालिका द्वारा आयोजित एक सम्मान समारोह में सम्मिलित होने के लिए जा रहे थे। इस अवसर पर उनकी गाड़ी पर बम फेंका गया, किंतु सौभाग्यवश वे इस हमले में सुरक्षित बच गए। इस दुर्घटना में नगरपालिका के मुख्य अधिकारी सहित कुल सात व्यक्ति घायल हुए थे। ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि उस समय तक पाकिस्तान नामक राष्ट्र की कल्पना अधिक से अधिक कवि इकबाल की काव्य-कल्पना और छात्र रहमत अली के मस्तिष्क तक ही सीमित थी। अतः इससे यह सिद्ध होता है कि बहुप्रचारित “पाक फैक्टर” गांधी पर हुए हमलों का सदैव कारण नहीं रहा। वास्तविकता यह थी कि कुछ कट्टरपंथी संगठनों के कार्यकर्ताओं को गांधी के सत्याग्रह और हरिजनोंद्धार जैसे अन्य आंदोलनात्मक कार्यक्रम बहुत अखरते थे। यह भी सत्य है कि अंग्रेज़ सरकार भी उनके आंदोलनों का प्रमुख लक्ष्य थी, इसलिए ब्रिटिश सरकार द्वारा उनके विरुद्ध की गई कूट-रचना और बेवजह गिरफ्तारियों पर किसी को कोई संशय नहीं था।

दूसरा प्रयास (जुलाई 1944 ई.)

जुलाई 1944 ईस्वी में भी पाकिस्तान की भूमिका पूर्णतः अस्पष्ट थी। इस घटना में नाथूराम गोडसे स्वयं छुरा लेकर गांधी के सम्मुख आ गया था, किंतु सतारा जिला बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष श्री भिसारे ने अत्यंत सतर्कतापूर्वक उसका हथियार छीन लिया, जिससे यह हमला विफल हो गया। इस घटना के पश्चात् गांधी ने तत्काल गोडसे को बातचीत के लिए आमंत्रित किया, किंतु गोडसे ने उस आमंत्रण को कभी स्वीकार नहीं किया।

तीसरा प्रयास (सितंबर 1944 ई.)

गांधी की हत्या का तीसरा प्रयास सितंबर 1944 ईस्वी में उस समय किया गया जब गांधी मोहम्मद अली जिन्ना से महत्त्वपूर्ण वार्ता करने के उद्देश्य से बंबई जाने वाले थे। इस अवसर पर पूना का एक संगठित समूह वर्धा नामक स्थान पर पहुँचा था। इस समूह में सम्मिलित एक व्यक्ति, जिसका नाम थत्ते था, के पास से पुलिस को एक छुरा बरामद हुआ। पूछताछ में थत्ते ने यह दावा किया कि उसने वह छुरा केवल गांधी की गाड़ी को पंचर करने के उद्देश्य से रखा था। गांधी के निजी सचिव प्यारेलाल के लिखित विवरण के अनुसार उस दिन डी.सी.पी. (उप-पुलिस आयुक्त) का फोन आया था, जिसमें यह चेतावनी दी गई थी कि प्रदर्शन के दौरान कोई अनहोनी घटना घटित हो सकती है। इस सूचना पर तत्परता दिखाते हुए पुलिस ने गांधी के गंतव्य से निकलने से पूर्व ही समस्त प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया। इस अवसर पर भी न तो पाकिस्तान की स्वीकृति का प्रश्न था और न ही 55 करोड़ रुपये की चर्चा।

चौथा प्रयास (जून 1946 ई.)

जून 1946 ईस्वी में गांधीजी जिस रेलगाड़ी से बंबई से पूना की ओर यात्रा कर रहे थे, उसे रेल-पथ पर पत्थर रखकर पलटाने का कुत्सित प्रयास किया गया। सौभाग्यवश ट्रेन के ड्राइवर की सतर्कता और सावधानी के कारण यह बड़ी दुर्घटना टल गई। इस अवसर पर भी रुपयों संबंधी विवाद की कोई बात सामने नहीं आई थी। इस घटना के तुरंत पश्चात् आयोजित प्रार्थना सभा में गांधी ने स्वयं कहा था : “मैं सात बार इस प्रकार के प्रयासों से बच गया हूँ। मैं इस प्रकार मरने वाला भी नहीं हूँ।” इसके विपरीत, नाथूराम गोडसे ने अपने मराठी पत्र ‘अग्रणी’ में स्पष्ट रूप से लिखा था : “परंतु जीने कौन देगा”,  जिसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि उसने गांधी की हत्या का दृढ़ संकल्प बहुत पहले ही कर लिया था।

गांधी ने विभाजन के प्रश्न पर यह स्पष्ट घोषणा की थी कि वे अपनी लाश पर से ही विभाजन को स्वीकार होने देंगे। यह उल्लेखनीय तथ्य है कि विभाजन और 55 करोड़ रुपये की चर्चा केवल हत्या के अंतिम प्रयासों के समय ही सामने आई थी, न कि आरंभिक प्रयासों में। अंततः मदनलाल पहवा और नाथूराम गोडसे के संयुक्त अंतिम प्रयास सफल हो गए, जिसके परिणामस्वरूप गांधीजी की दुःखद हत्या हुई। इन तथ्यों के समग्र विश्लेषण से यह सरलता से समझा जा सकता है कि गांधी की हत्या के पीछे कोई एक तात्कालिक कारण नहीं था, बल्कि उन्हें समाप्त करने की दीर्घकालिक योजना बहुत पहले से ही क्रियान्वित हो रही थी।

मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप की समीक्षा

गांधी को दोषी ठहराने वाले लोग प्रायः यह आरोप लगाते हैं कि वे मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति के लिए उत्तरदायी थे। इस आरोप का उत्तर देते हुए चुनी भाई वैद्य कहते हैं कि भारत की एकता के प्रति जितनी आग्रहशीलता अन्य राजनीतिक विचारधाराओं के लोगों में थी, उतनी ही गहरी प्रतिबद्धता गांधी और उनके अनुयायियों में भी थी। दोनों पक्षों के बीच वास्तविक अंतर केवल इस विषय को लेकर था कि उस राष्ट्रीय एकता को प्राप्त करने के लिए कौन-सा मार्ग सर्वाधिक उपयुक्त होगा। एक विचारधारा यह मानती थी कि यह देश और भारत माता केवल हिंदुओं की है, मुस्लिम इस भूमि पर बाहरी आक्रांता हैं और उन्हें एक दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में यहाँ निवास करना होगा। इसके सर्वथा विपरीत, गांधी का दृढ़ विश्वास यह था कि किसी समुदाय को बार-बार “पराया” कहकर संबोधित करने से उनका परायापन घटने के बजाय और अधिक बढ़ेगा ही। साथ ही, उन्होंने यह भी माना कि केवल ऊपरी तौर पर “तुम भी अपने ही हो” कह देना भी वास्तविक एकता के लिए पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए आवश्यक था कि हृदय से, सच्चे मन से, उन्हें भारतीय संस्कृति में एक समान साझेदार के रूप में स्वीकार किया जाए, तभी वास्तविक व स्थायी राष्ट्रीय एकता संभव हो सकेगी।

भारतीय इतिहास पर दृष्टिपात करने से यह तथ्य स्पष्ट होता है कि मुस्लिम भारत में पहले आक्रमणकारी नहीं थे। इससे पूर्व जो भी विदेशी आक्रांता यहाँ आए, वे कालांतर में भारतीय समाज और संस्कृति में पूर्णतः घुल-मिल गए और इसके अभिन्न अंग बन गए। किंतु मुस्लिम समुदाय के साथ यह सांस्कृतिक समरसता की प्रक्रिया उतनी पूर्णता से नहीं हो सकी। मुस्लिम धार्मिक दर्शन ने विशेष रूप से भारत की उस वंचित जनता को अपनी ओर आकर्षित किया, जो सदियों से सामाजिक भेदभाव और जातिगत उत्पीड़न की शिकार रही थी। जब मुस्लिम सत्ता का विस्तार और स्थापना हुई, तब सत्तापेक्षी सामाजिक समूहों ने भी अपने लाभ की दृष्टि से उनकी ओर आशा-भरी दृष्टि से देखा और इस कारण कई लोगों ने स्वेच्छा से इस्लाम धर्म को स्वीकार भी किया। इस ऐतिहासिक सत्य से भी मुख नहीं मोड़ा जा सकता कि कुछ शासकों ने बलपूर्वक धार्मिक परिवर्तन भी कराए, किंतु अधिकांश ऐसे मामलों में इसके मूल में शुद्ध धार्मिक भावना के बजाय राजनीतिक उद्देश्य और स्वार्थ ही प्रमुख था। यह भी उल्लेखनीय है कि भारतीय मुस्लिम शासक अपने पूरे शासनकाल में कभी भी स्वयं को पूर्णतः थियोक्रेटिक (धर्म-आधारित) राज्य घोषित करने में सफल नहीं हो सके। वर्तमान भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में निवास करने वाले अधिकांश मुसलमान वंशानुगत रूप से मूलतः हिंदू ही रहे होंगे और अरबी मूल के वास्तविक मुसलमान इन क्षेत्रों में अत्यंत ही अल्प संख्या में मिलेंगे, यदि विशेष खोज की जाए, तो भी शायद वे न मिल सकें।

यह भी एक ऐतिहासिक सत्य है कि मुस्लिम समुदाय को एक पृथक धार्मिक-राजनीतिक पहचान भारतीय समाज ने नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासकों ने अपनी “फूट डालो और राज करो” की नीति के अंतर्गत प्रदान की। यदि ऐसा न हुआ होता, तो सावरकर, सैयद अहमद और यहाँ तक कि स्वयं मोहम्मद अली जिन्ना भी हिंदू और मुस्लिम समुदायों को एक ही इंद्रधनुष के दो पृथक रंगों के समान न मानते। यह भी एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य है कि 1916 के लखनऊ अधिवेशन में, जहाँ हिंदू-मुस्लिम एकता का ऐतिहासिक समझौता हुआ, गांधी की कोई विशेष या प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी। इस अधिवेशन में हिंदू-मुस्लिम एकता का यह प्रसिद्ध नारा वस्तुतः बाल गंगाधर तिलक और मोहम्मद अली जिन्ना ने संयुक्त रूप से बुलंद किया था। यह तथ्य भी उल्लेखनीय  है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए आवश्यक भूमि एक हिंदू राजा द्वारा प्रदान की गई थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय के व्यापक सामाजिक परिवेश में तुष्टीकरण जैसी संकीर्ण राजनीति का कोई स्थान नहीं था। गांधी वस्तुतः इसी उदार और समावेशी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए यह दृढ़तापूर्वक मानते थे कि समस्त भारतवासी- चाहे वे किसी भी धर्म के हों, एक ही राष्ट्र की संतान हैं और उन्हें संगठित होकर ब्रिटिश साम्राज्य की दमनकारी औपनिवेशिक नीतियों का सम्मिलित रूप से विरोध करना चाहिए।

विभाजन-स्वीकृति के आरोप और गांधी की विवशता

गांधी की हत्या को नैतिक रूप से उचित सिद्ध करने के प्रयास में एक अन्य गंभीर आरोप यह भी लगाया जाता रहा है कि गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने देश के विभाजन को बिना किसी सार्थक विरोध के सहजता से स्वीकार कर लिया और इस अवसर पर उन्होंने कोई अनशन भी नहीं किया, जबकि वे अन्य अनेक अवसरों पर सत्याग्रह के रूप में अनशन का सहारा नियमित रूप से लेते रहे थे। किंतु ऐतिहासिक शोध से यह स्पष्ट होता है कि यह आरोप भी झूठे और अपरिपक्व विश्लेषण पर आधारित है, क्योंकि गांधी अपने जीवन के अंतिम क्षण तक भी द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को कभी स्वीकार नहीं किए थे।

1930 ईस्वी में इलाहाबाद में आयोजित मुस्लिम लीग के सम्मेलन में प्रसिद्ध कवि-दार्शनिक मुहम्मद इकबाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा था : “मैं चाहता हूँ कि पंजाब, पश्चिमोत्तर प्रांत, सिंध एवं बलूचिस्तान एक हो जाएँ एवं वे एक राज्य बनें। मुझे लगता है कि जहाँ तक पश्चिमोत्तर भारत का संबंध है, वहाँ तक पश्चिमोत्तर मुस्लिम राज्य, चाहे वह ब्रिटिश राज्य के अंदर हो या बाहर, यही मुस्लिमों का आखिरी भाग्य है।” उल्लेखनीय है कि यह विचार भी उस समय एक पृथक इस्लामी राष्ट्र की स्पष्ट माँग नहीं था, अपितु एक क्षेत्रीय स्वायत्तता की परिकल्पना मात्र थी। इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि 1940 ईस्वी तक स्वयं मुस्लिम लीग भी इस विचार को कोई गंभीर राजनीतिक माँग नहीं मानती थी। इस काल में कांग्रेस के लगभग सत्ताईस माह के प्रांतीय शासनकाल के दौरान प्रस्तुत की गई पीरपुर रिपोर्ट और शफीपुर रिपोर्ट में भी कहीं यह उल्लेख नहीं मिलता कि मुस्लिम समुदाय को एक पृथक राष्ट्र की आवश्यकता है। इन रिपोर्टों में केवल मुस्लिमों पर होने वाले कथित अत्याचारों का विरोध दर्ज किया गया था। इन रिपोर्टों में स्वयं जिन्ना भी अपने लिए एक ठोस राजनीतिक जनाधार खोजते हुए दिखाई देते हैं।

इसके ठीक विपरीत, 1937 में ही अहमदाबाद में आयोजित हिंदू महासभा के अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण देते हुए वीर सावरकर ने स्पष्ट रूप से घोषणा की थी : “आज हिंदुस्तान एक प्राण, एकात्म राष्ट्र हो गया है, यह मानने की भूल करने से अपना काम नहीं चलेगा। उल्टे इस देश में मुख्यतः हिंदू और मुसलमान दो राष्ट्र हैं, इसे स्वीकार कर चलना चाहिए।” इन ऐतिहासिक उद्धरणों की तुलनात्मक समीक्षा से यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की बात न तो गांधी कर रहे थे और न ही कांग्रेस, अपितु यह विचार अन्यत्र से प्रबल रूप से उभर रहा था।

गांधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दीर्घकाल में भी उनकी नियमित प्रार्थना सभाओं में समस्त धर्मों- हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी के अनुयायी समान रूप से सम्मिलित होते थे और यह उदार परंपरा उनके साबरमती आश्रम में भी उसी निष्ठा के साथ जारी रही। कौमी अर्थात् सांप्रदायिक एकता संपूर्ण स्वराज आंदोलन की मूल आत्मा और अभिन्न अंग थी। जलियांवाला बाग के उस भीषण नरसंहार में भी, जब निर्दोष नागरिकों को हथकड़ियों से बाँधा गया था, तो एक ही हथकड़ी एक हिंदू और एक सिख या मुस्लिम को एक साथ बाँधती थी, जो उस समय की साझा राष्ट्रीय पीड़ा और एकता का प्रतीक थी।

किंतु आगामी वर्षों में जब कुछ हिंदू संगठन मुस्लिम-विरोध की राजनीतिक भूमि पर अधिक आक्रामक होते गए, तो इस परिवर्तित वातावरण से जिन्ना की पूर्व की राजनीतिक हताशा स्वतः ही दूर हो गई। इस अवसर का लाभ उठाते हुए वे पुनः वकालत के पेशे को छोड़कर पूर्णकालिक राजनीति में सक्रिय हो गए और इसी बदले माहौल में उन्हें मुस्लिम जनसामान्य को अपनी विचारधारा की ओर आकर्षित करने में भी सफलता प्राप्त हुई। चालक ब्रिटिश शासक इसी विभाजनकारी अवसर की प्रतीक्षा में थे, जिसका उन्होंने भरपूर राजनीतिक लाभ उठाया। उस समय के अवर्णनीय सांप्रदायिक खून-खराबे के वातावरण में उचित-अनुचित का शांत मन से विवेकपूर्ण परीक्षण करना लगभग असंभव हो चुका था। इसी बीच लॉर्ड वावेल द्वारा प्रस्तुत योजना ने विभिन्न राजनीतिक पक्षों की महत्त्वाकांक्षाओं को और अधिक हवा दे दी।

इस विषम और हृदयविदारक परिस्थिति में गांधी मानसिक और भावनात्मक रूप से पूर्णतः टूट चुके थे। एक व्यक्ति के रूप में उनका आत्मविश्वास गंभीर रूप से डगमगा गया था और वे निराशा में “हे भगवान! अब मुझे उठा लो” जैसे वेदनापूर्ण शब्द बोलने लगे थे। अंततः भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने गांधी को इस निर्णय-प्रक्रिया से अलग रखते हुए स्वतंत्र रूप से यह ऐतिहासिक निर्णय लिया कि यदि पाकिस्तान का निर्माण अब अपरिहार्य ही हो चुका है, तो उसे स्वीकार कर लिया जाए। इस संबंध में जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और लॉर्ड माउंटबेटन ने पहले आपस में विभाजन पर पूर्ण सहमति स्थापित कर ली और उसके पश्चात् ही इस अंतिम निर्णय की सूचना गांधी को भेजी गई।

इस असहाय स्थिति में गांधी के पास वास्तव में कोई ठोस विकल्प शेष नहीं बचा था। वे किसे अपना आधार बनाकर, किसके सक्रिय समर्थन के बल पर इस विभाजन के विरुद्ध संघर्ष करते? जो लोग आज गांधी को विभाजन के लिए पूर्णतः दोषी ठहराते हैं, वे स्वयं भी उस निर्णायक क्षण में गांधी के साथ दृढ़ता से खड़े नहीं थे। ऐसी विवश परिस्थिति में उनके समक्ष अनशन जैसा कोई प्रभावी मार्ग भी शेष नहीं बचा था। गांधी ने स्वयं इस असहनीय पीड़ा को एक पत्र में इन शब्दों में व्यक्त किया था : “एक व्यक्ति के रूप में मेरा कोई मूल्य नहीं है। जिन लोगों का प्रतिनिधि बनकर मैं बोलता था, वे मुझे छोड़कर चले गए हैं। उनको मेरी बात जँचती नहीं, उन्हें विभाजन स्वीकार है। मैत्री, भाईचारा, शांति और प्रेम की मेरी अपील से वे खुश नहीं हैं। जब पूरी परिस्थिति ही बदल चुकी है तो मैं किसके समर्थन से अखंड भारत और अविभाजित राष्ट्र की लड़ाई लड़ूँ?” इन मार्मिक शब्दों से उनकी उस समय की गहरी मानसिक वेदना और असहाय पीड़ा का यथार्थ चित्रण स्पष्टतः परिलक्षित होता है।

55 करोड़ रुपये संबंधी अनशन का वास्तविक ऐतिहासिक संदर्भ

55 करोड़ रुपयों के भुगतान के लिए किए गए प्रसिद्ध अनशन की संपूर्ण घटना को भी उसके सही ऐतिहासिक और परिस्थितिजन्य संदर्भ में ही समझा जाना चाहिए। उस विशेष समय में गांधी की इच्छा थी कि वे प्रसिद्ध सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान से व्यक्तिगत रूप से मिलने के उद्देश्य से पाकिस्तान की यात्रा करें। इसी बीच वे सांप्रदायिक दंगों को शांत कराने के उद्देश्य से नोआखाली क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्यरत थे। इसके साथ ही वे यह भी सत्यापित करना चाहते थे कि मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान में अपने द्वारा किए गए राजनीतिक वादों को कहाँ तक निष्ठापूर्वक पूरा कर रहे हैं। इस अवसर पर उन्होंने अपनी विश्व-बंधुत्व की भावना व्यक्त करते हुए कहा था : “मैं पाकिस्तान को अपना ही देश मानता हूँ, इसलिए मुझे वीज़ा की आवश्यकता नहीं होगी।” यह कथन गांधी की उस वैश्विक और उदार दृष्टि का प्रमाण है, जिसमें उन्हें भारतीय संस्कृति की सर्वोच्च अवधारणा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अत्यंत प्रिय थी।

इसी दौरान अंग्रेज़ सरकार ने भारत और उसकी संपत्ति दोनों के विभाजन में एक विवादास्पद मध्यस्थ की भूमिका निभाई। जब गांधी नोआखाली से दिल्ली वापस लौटे, तो वहाँ की सांप्रदायिक स्थिति अत्यंत वीभत्स और हृदयविदारक रूप ले चुकी थी। इस असहनीय पीड़ा और गहन वेदना की चरम स्थिति में उन्होंने अपना प्रसिद्ध उपवास आरंभ किया। इस अनशन के समय भी 55 करोड़ रुपयों का मुद्दा उनकी वाणी पर कहीं नहीं था। उनके उपवास से संबंधित किसी भी सार्वजनिक बयान में इस आर्थिक विवाद का कोई उल्लेख नहीं मिलता है। वस्तुतः यह उपवास भारत में हिंदुओं और सिखों द्वारा तथा साथ ही पाकिस्तान में मुस्लिमों द्वारा दोनों पक्षों में किए जा रहे पाशविक और अमानवीय कृत्यों के सशक्त विरोध में था। इस अनशन का मूल उद्देश्य भारत और पाकिस्तान- दोनों ही देशों में निवास करने वाली अल्पसंख्यक जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करना था।

गांधी का यह ऐतिहासिक अनशन 13 जनवरी से आरंभ होकर 18 जनवरी तक चला। सरकार ने इस अनशन के आरंभ होने के मात्र तीसरे दिन ही 55 करोड़ रुपये पाकिस्तान को देने की औपचारिक घोषणा कर दी, साथ ही यह स्पष्टीकरण भी दिया कि इससे पूर्व अपनाए गए विलंबकारी रवैये के पीछे ठोस कानूनी और अन्य प्रशासनिक कारण विद्यमान थे। जिस दिन गांधी ने अपना यह अनशन समाप्त किया, उस दिन उनका स्वास्थ्य अत्यंत गंभीर और चिंताजनक स्थिति में पहुँच चुका था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्वयं बिरला भवन पहुँचे ताकि गांधी का अनशन समाप्त कराया जा सके। उस अवसर पर उनके कक्ष में जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, पाकिस्तान के उच्चायुक्त जाहिद हुसैन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रतिनिधि, हिंदू महासभा के प्रतिनिधि, सिख संगठनों के प्रतिनिधि, दिल्ली के प्रतिष्ठित मुस्लिम नागरिक तथा चीफ कमिश्नर सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। दिल्ली की सांप्रदायिक स्थिति में हुए वास्तविक सुधार से पूर्णतः आश्वस्त होने के पश्चात् ही उन्होंने अपना यह ऐतिहासिक अनशन समाप्त किया। इसी प्रकार की शांति और सद्भावना बनाए रखने की हार्दिक अपील उन्होंने पाकिस्तानी प्रतिनिधि से भी की थी, क्योंकि उनके हृदय में यह दृढ़ आस्था और विश्वास था कि भविष्य में किसी दिन दोनों देशों के बीच पुनः स्थायी एकता अवश्य स्थापित होगी।

इन समस्त प्रामाणिक ऐतिहासिक तथ्यों के विश्लेषण के पश्चात् यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि गोडसे का यह तर्क कि उसने केवल 55 करोड़ रुपये के भुगतान के कारण गांधी की हत्या की, आखिर किस प्रकार तार्किक और न्यायसंगत माना जा सकता है क्योंकि यह तर्क तथ्यात्मक रूप से पूर्णतः खोखला है।

“हे राम” संबंधी विवाद

गोडसे ने अपने बचाव में एक और विचित्र दावा यह भी प्रस्तुत किया था कि गांधी ने अपनी मृत्यु के अंतिम क्षण में “हे राम” शब्द का उच्चारण नहीं किया था। यह प्रत्यक्षतः अत्यंत छोटी-सी और महत्त्वहीन-सी प्रतीत होने वाली बात भी गोडसे और उसके समर्थकों की गहरी चिंता का विषय बन गई, क्योंकि “राम” नाम का उच्चारण करने से गांधी के प्रामाणिक हिंदू होने का एक भावनात्मक प्रमाण जनमानस को मिल जाता। वास्तविकता यह थी कि आम भारतीय हिंदू जनता के हृदय पर गांधी का जो गहन और अद्वितीय प्रभाव स्थापित हो चुका था, वैसा प्रभाव उस काल के अन्य किसी भी तथाकथित हिंदू नेता का नहीं था। गांधी के जीवित रहते हुए उस विशाल जनप्रभाव को किसी भी प्रकार समाप्त कर पाना असंभव था और संभवतः इसी कारण उनके विरोधियों ने उन्हें शारीरिक रूप से समाप्त करने का यह अंतिम और क्रूर उपाय अपनाया।

यदि इतिहास में थोड़ा और पीछे जाकर देखा जाए, तो यह ज्ञात होता है कि तिलक और सावरकर भी अपने-अपने समय में हिंदू जागरण आंदोलन का सक्रिय नेतृत्व करना चाहते थे। जब वे स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से सम्मिलित हुए, तब ब्रिटिश सरकार ने उन पर राजद्रोह का गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने इस आरोप को न्यायालय में दृढ़तापूर्वक अस्वीकार किया, फिर भी उन्हें कारावास की सजा भुगतनी पड़ी। इसके सर्वथा विपरीत, जब गांधी पर भी ठीक इसी प्रकार का राजद्रोह का आरोप लगाया गया, तो उन्होंने इसे विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते हुए स्वेच्छा से जेल यात्रा की। यही गांधी और अन्य समकालीन राष्ट्रवादी नेताओं के मध्य एक बुनियादी और मौलिक वैचारिक अंतर था, जो सत्याग्रह के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता का सूचक है।

गांधी स्वयं को एक सनातन हिंदू के रूप में परिभाषित करते थे, किंतु उनकी धार्मिक दृष्टि पारंपरिक रूढ़िवादिता से कहीं अधिक व्यापक और उदार थी। उन्होंने धर्म को सदैव एक प्रगतिशील और सुधारवादी दृष्टिकोण से देखा, यही कारण था कि पुणे के अनेक परंपरावादी हिंदू उन्हें एक प्रकार से अराजक और खतरनाक विचारक मानते थे। दक्षिण अफ्रीका के गिरमिटिया मजदूरों की समस्याओं का समाधान, जकात चौकी की बंदी जैसी अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं का विरोध तथा चंपारण के किसानों को शोषणकारी नील की खेती से मुक्ति दिलाना उनके सार्वजनिक जीवन की प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण सफलताएँ थीं, जिनमें आगे चलकर अनेक और गौरवशाली उपलब्धियाँ जुड़ती गईं। भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई को केवल राजनीतिक स्तर पर ही नहीं, अपितु सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक तीनों स्तरों पर एक साथ लड़ा जाना अत्यंत आवश्यक था और गांधीजी इस बहुआयामी संघर्ष का सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम उदाहरण थे। कट्टरपंथी हिंदू संगठन गांधी के इस उदार और समावेशी वातावरण को अकारण ही अनुचित मानते थे। यह कहना भी अनुचित और भ्रामक है कि गांधी मुस्लिमों को हिंदुओं की तुलना में अधिक प्रेम करते थे क्योंकि उनके विश्वासपात्र सचिव प्यारेलाल ने अपने महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथ ‘महात्मा गांधी: पूर्णाहुति’ में इस आरोप के विरुद्ध अनेक ठोस और प्रामाणिक उदाहरण प्रस्तुत किए हैं।

इस संदर्भ में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रमाण यह भी है कि 13 जनवरी को अपना उपवास आरंभ करने से ठीक पूर्व आयोजित प्रार्थना सभा में गांधी ने स्वयं यह स्पष्ट रूप से कहा था : “पाकिस्तान के मुसलमान पागल हो गए हैं। अधिकांश हिंदू और सिखों को बाहर निकाल दिया है। अगर भारतीय संघ के हिंदू भी ऐसा ही करेंगे तो इससे उन्हीं का नाश होगा… पाकिस्तान को अपनी हरकतें बंद करनी चाहिए।” यह प्रामाणिक ऐतिहासिक उद्धरण स्वयं इस बात का प्रमाण है कि गांधी किसी एक धार्मिक समुदाय के अंधसमर्थक कदापि नहीं थे, अपितु वे दोनों पक्षों की ज्यादतियों की समान रूप से आलोचना करते थे। दुर्भाग्यवश, उस जटिल और संवेदनशील राजनीतिक परिस्थिति का चतुराईपूर्वक दुरुपयोग करके गांधी की हत्या को एक प्रकार से “आकर्षक” और “अनिवार्य” कृत्य के रूप में प्रस्तुत करने का कुत्सित प्रयास किया गया।

सरदार पटेल का गोलवलकर को पत्र और ऐतिहासिक निष्कर्ष

इस संपूर्ण ऐतिहासिक प्रकरण के अंतिम और अत्यंत महत्त्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में यह उल्लेख करना आवश्यक है कि स्वयं सरदार वल्लभभाई पटेल, जिन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी अपना आदरणीय नेता मानता रहा है, ने संघ प्रमुख गोलवलकर को एक स्पष्ट पत्र लिखकर यह दृढ़तापूर्वक कहा था कि संघ से जुड़े कुछ तत्त्वों के विषाक्त प्रचार और विषवमन के परिणामस्वरूप ही गांधी की दुःखद हत्या हुई। यह भी एक दुखद ऐतिहासिक तथ्य है कि संघ से संबद्ध कुछ लोगों ने इस हत्या के समाचार पर आनंद व्यक्त किया और आपस में मिठाइयाँ बाँटी थी।

आज, जब हम स्वयं को विश्व के समक्ष एक अधिक सभ्य और परिपक्व राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं, तब यह अत्यंत विचारणीय प्रश्न है कि इस ऐतिहासिक त्रुटि ‘राष्ट्रपिता की निर्मम हत्या’ का उत्सव मनाए जाने का आखिर क्या नैतिक औचित्य है? विश्व के अन्य किसी भी देश में वहाँ के राष्ट्रनिर्माता या जननायक के साथ बहुसंख्यक जनता के एक वर्ग का ऐसा असामान्य व्यवहार देखने को नहीं मिलता, जैसा भारत में महात्मा गांधी के संदर्भ में आज भी परिलक्षित होता है। यह विरोधाभास हमारे राष्ट्रीय आत्मचिंतन के लिए एक गंभीर और अनुत्तरित प्रश्न है।

महात्मा गांधी हत्याकांड से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. महात्मा गांधी की हत्या कब और कहाँ हुई थी?

महात्मा गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 ईस्वी को नई दिल्ली स्थित बिड़ला भवन (संप्रति गांधी स्मृति) के प्रार्थना स्थल के निकट हुई थी। उस समय गांधीजी सायंकालीन प्रार्थना के लिए जा रहे थे
।

2. महात्मा गांधी की हत्या किसने की थी?

महात्मा गांधी की हत्या नाथूराम विनायक गोडसे ने की थी। उसने प्रार्थना सभा में जाते समय गांधीजी पर नजदीक से गोली चलाई थी, जिसमें गांधीजी की मृत्यु हो गई।

3. महात्मा गांधी की हत्या के पीछे क्या कारण बताए गए थे?

नाथूराम गोडसे ने अपने मुकदमे के दौरान गांधीजी की राजनीतिक नीतियों और विशेष रूप से हिंदू-मुस्लिम संबंधों तथा भारत-विभाजन के बाद पाकिस्तान को धनराशि दिए जाने के प्रश्न से संबंधित अपनी आपत्तियों को हत्या के कारणों के रूप में प्रस्तुत किया था। किंतु ऐतिहासिक संदर्भ और न्यायिक अभिलेखों के आधार पर इन दावों की है।

4. महात्मा गांधी की हत्या के बाद क्या कार्रवाई हुई?

हत्या के बाद नाथूराम गोडसे को गिरफ्तार किया गया और उसके विरुद्ध मुकदमा चलाया गया। 1949 ईस्वी में नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को फाँसी दी गई। इस मामले में अन्य व्यक्तियों पर भी मुकदमा चला था।

5. महात्मा गांधी हत्याकांड का भारतीय इतिहास में क्या महत्त्व है?

महात्मा गांधी की हत्या स्वतंत्र भारत के प्रारंभिक इतिहास की अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना थी, जिससे देश में व्यापक शोक और राजनीतिक प्रतिक्रिया हुई। इस घटना ने सांप्रदायिक तनाव, राजनीतिक हिंसा और गांधीजी के अहिंसा एवं सांप्रदायिक सद्भाव के विचारों पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चर्चा को प्रभावित किया।
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