इंडोनेशिया में स्वतंत्रता आंदोलन (Indonesian Independence Movement)

इंडोनेशिया में स्वतंत्रता आंदोलन इंडोनेशिया दक्षिण-पूर्वी एशिया का एक ऐसा देश है, जिसका स्वतंत्रता संग्राम […]

इंडोनेशिया में स्वतंत्रता आंदोलन

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इंडोनेशिया दक्षिण-पूर्वी एशिया का एक ऐसा देश है, जिसका स्वतंत्रता संग्राम एशियाई उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलनों में विशेष स्थान रखता है। लगभग साढ़े तीन शताब्दियों तक डच औपनिवेशिक शासन के अधीन रहने के बाद इंडोनेशिया की जनता ने बीसवीं सदी में एक संगठित राष्ट्रीय आंदोलन के माध्यम से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए संघर्ष किया। यह आंदोलन धीरे-धीरे एक व्यापक राष्ट्रीय और सशस्त्र संघर्ष में परिवर्तित हुआ। बीसवीं सदी के प्रारंभ में इंडोनेशिया में आधुनिक राष्ट्रवाद का विकास होने लगा। बूदि उतोमो और सरेकत इस्लाम जैसी संस्थाओं ने शिक्षित वर्ग तथा आम जनता में राजनीतिक और राष्ट्रीय चेतना के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1928 ई. में इंडोनेशियाई युवाओं ने ‘सुम्पाह पेमूडा’ नामक ऐतिहासिक प्रतिज्ञा ली, जिसमें एक मातृभूमि, एक राष्ट्र और एक भाषा की भावना को स्वीकार किया गया। इस प्रतिज्ञा ने विभिन्न द्वीपों, जातीय समूहों और भाषाई समुदायों के बीच राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत किया तथा इंडोनेशियाई राष्ट्रवाद को नई दिशा प्रदान की। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1942 ई. में जापान ने डच ईस्ट इंडीज पर अधिकार कर लिया और डच औपनिवेशिक शासन का अंत हो गया। यद्यपि जापानी सैन्य शासन भी दमनकारी था, फिर भी इस अवधि में अनेक इंडोनेशियाई राष्ट्रवादी नेताओं को राजनीतिक गतिविधियों के लिए अवसर मिला तथा स्थानीय युवाओं को सैन्य और अर्धसैनिक संगठनों में प्रशिक्षण दिया गया। जापान के 15 अगस्त 1945 ई. को आत्मसमर्पण करने के बाद उत्पन्न राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए सुकर्णो और मोहम्मद हट्टा ने 17 अगस्त 1945 ई. को जकार्ता में इंडोनेशिया की स्वतंत्रता की घोषणा की। स्वतंत्रता की घोषणा के बाद नीदरलैंड ने इंडोनेशिया पर पुनः औपनिवेशिक नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया, जिसके परिणामस्वरूप इंडोनेशियाई राष्ट्रवादियों और डच सेनाओं के बीच सशस्त्र संघर्ष शुरू हुआ। नवंबर 1945 ई. में हुआ सुराबाया का युद्ध इस संघर्ष की प्रमुख घटनाओं में से एक था। इसके साथ-साथ इंडोनेशियाई नेतृत्व ने कूटनीतिक स्तर पर भी संघर्ष जारी रखा और अंतरराष्ट्रीय समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया। संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप तथा विभिन्न समझौतों और वार्ताओं के माध्यम से संघर्ष को समाप्त करने और इंडोनेशिया की स्वतंत्रता को मान्यता दिलाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। अंततः अंतरराष्ट्रीय दबाव, इंडोनेशियाई प्रतिरोध और कूटनीतिक प्रयासों के परिणामस्वरूप नीदरलैंड ने 27 दिसंबर 1949 ई. को औपचारिक रूप से इंडोनेशिया की संप्रभुता का हस्तांतरण किया। इस प्रकार इंडोनेशिया के स्वतंत्रता संघर्ष का प्रमुख चरण समाप्त हुआ। इस संघर्ष के दौरान भारत ने भी इंडोनेशिया के स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन किया और अंतरराष्ट्रीय मंचों, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र में, इंडोनेशिया के पक्ष को उठाया।

इंडोनेशिया की भौगोलिक स्थिति

इंडोनेशिया, जिसे हिंदेशिया भी कहा जाता है, दक्षिण-पूर्वी एशिया का सबसे बड़ा देश है। यह लगभग तीन हज़ार से अधिक छोटे-बड़े द्वीपों का समूह है, जो पूर्व से पश्चिम तक लगभग 4800 किमी तथा उत्तर से दक्षिण तक लगभग 2400 किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। संपूर्ण इंडोनेशिया भूमध्य रेखा से 11° अक्षांशों के भीतर स्थित है और इसका कोई भी द्वीप इतना बड़ा नहीं है कि वह अपनी जलवायु-दशाओं को स्वतंत्र रूप से प्रभावित कर सके। इस द्वीप-समूह में जावा, सुमात्रा, बाली, तिमोर, बोर्नियो, फ्लोरेस, मलक्का, न्यूगिनी और पापुआ प्रमुख द्वीप हैं।

जावा : इंडोनेशिया का हृदय-स्थल

इंडोनेशिया के समस्त द्वीपों में जावा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है और इसे देश का हृदय-स्थल कहा जाता है। जावा घनी आबादी वाला क्षेत्र है, जबकि शेष द्वीपों में जनसंख्या अपेक्षाकृत विरल है। इस द्वीप की लंबाई लगभग 960 किमी है और यह भूमध्य रेखा से इंडोनेशिया के अन्य भागों की तुलना में सबसे अधिक दूर स्थित है। जकार्ता नगर, जिसे पहले बटाविया कहा जाता था, 1619 ई. में स्थापित हुआ और आज यह देश की राजधानी, प्रमुख बंदरगाह तथा सबसे बड़ा नगर है।

प्राचीन भारतीय प्रभाव

प्राचीन काल में इंडोनेशिया के अनेक द्वीपों पर भारतीय मूल के शासकों का शासन रहा। पश्चिमी जावा, सुमात्रा और बोर्नियो के विभिन्न क्षेत्रों में प्राप्त प्राचीन लेखों और शिलाओं से यह स्पष्ट होता है कि इन द्वीपों में भारत की पौराणिक गाथाएँ, देवी-देवता तथा सामाजिक रहन-सहन उसी रूप में प्रचलित थे जैसे भारत में थे। शंख, त्रिशूल, गदा, चक्र और पद्म जैसे भारतीय प्रतीक-चिह्न जावा में मिले हैं, जबकि बोर्नियो में ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नन्दी, गणेश और स्कंद-महाकाली जैसी मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। बाद में इस्लाम के आगमन के साथ मुस्लिम व्यापारियों और धर्म-प्रचारकों के प्रयासों से जावा, सुमात्रा, बाली, बोर्नियो आदि द्वीपों के अधिकांश निवासियों ने इस्लाम धर्म अपना लिया, जिससे हिंदू प्रभुत्व धीरे-धीरे समाप्त होता गया।

यूरोपीय शक्तियों का आगमन

पुर्तगालियों का प्रवेश

इंडोनेशिया के द्वीपों में सर्वप्रथम प्रवेश पुर्तगालियों ने किया। 1511 ई. में उन्होंने व्यापारिक और रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण द्वीप मलक्का पर अधिकार कर वहाँ एक दुर्ग की स्थापना कर ली।

डचों का आगमन और वर्चस्व

सत्तरहवीं शताब्दी के आरंभ में हॉलैंड के डच व्यापारी भी इंडोनेशिया पहुँचे। उनका आगमन पुर्तगालियों को अच्छा नहीं लगा, जिसके परिणामस्वरूप दोनों के मध्य प्रतिस्पर्धा शुरू हुई, जो शीघ्र ही संघर्ष का रूप ले बैठी। इस संघर्ष में डचों को सफलता मिली और 1641 ई. में उन्होंने मलक्का पर अधिकार कर दक्षिण-पूर्वी एशिया के विभिन्न द्वीपों पर अपना राजनैतिक प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास किया।

हॉलैंड में डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई, जिसने जावा द्वीप के बटाविया (जकार्ता) नगर को अपना प्रमुख केंद्र बनाया। अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के नाम पर डचों ने इन द्वीपों में अपनी सेना संगठित की और धीरे-धीरे जावा, सुमात्रा तथा बोर्नियो पर अपना राजनैतिक प्रभुत्व स्थापित कर लिया। इसके बाद इंडोनेशिया के शेष द्वीप भी उनके अधीन हो गए। यद्यपि द्वीपवासियों ने डच शासन को सरलता से स्वीकार नहीं किया और उसके विरुद्ध अनेक विद्रोह भी किए, तथापि उन्हें सफलता नहीं मिली और संपूर्ण इंडोनेशिया पर डच शासन स्थापित हो गया।

स्वतंत्रता संघर्ष का प्रारंभ

जिस प्रकार भारतीयों ने अंग्रेज़ों की दासता से मुक्त होने के लिए स्वतंत्रता आंदोलन आरंभ किया, उसी प्रकार बीसवीं सदी के आरंभ में इंडोनेशिया के लोगों ने भी डच दासता से मुक्त होने का प्रयास शुरू किया। पाश्चात्य देशों में शिक्षा प्राप्त कर स्वदेश लौटे कुछ इंडोनेशियाई नवयुवकों ने देश की दुर्दशा की ओर ध्यान आकर्षित किया और उसे डच दासता से मुक्त कराने के लिए संगठित प्रयास प्रारंभ किए। 1908 ई. में जावा के बुद्धिजीवियों ने राष्ट्रीय आंदोलन प्रारंभ किया। कुछ लोगों ने इस्लाम के हितों की रक्षा के नाम पर जनता को संगठित किया, जिसके आधार पर बाद में मुसलमानों ने ‘शिरकत इस्लाम’ नामक दल बनाया, जिसका उद्देश्य इस्लामियत के हितों की रक्षा करना था।

प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् राष्ट्रवादी आंदोलन ने और अधिक ज़ोर पकड़ा। इंडोनेशिया के कई द्वीपों में डच शासन के विरुद्ध विद्रोह हुए- 1920 ई. में जावा तथा सुमात्रा में हुआ विद्रोह कई वर्षों तक चलता रहा। 1921 ई. में उदारवादी (नरम) दल ने आंदोलन से उग्रवादियों को अलग कर दिया, जिसके फलस्वरूप उग्रवादियों ने हिंसा का सहारा लिया और डच सरकार ने राष्ट्रवादियों का निर्ममतापूर्वक दमन किया। यद्यपि डच सरकार ने इस दौरान शासन में कुछ सुधार कर लोगों को सीमित अधिकार भी दिए, परंतु ये सुधार अपर्याप्त थे, जिसके कारण राष्ट्रवादी संतुष्ट नहीं हो सके और उन्होंने अपने आंदोलन को और गति प्रदान की।

सुकर्णो का नेतृत्व

अहमद सुकर्णो के नेतृत्व में इंडोनेशियाई राष्ट्रवादियों ने अपने दल को पुनः संगठित किया और एशिया के अन्य देशों के राष्ट्रवादी आंदोलनों से संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया। सुकर्णो के नेतृत्व में इंडोनेशियाई राष्ट्रवादियों के एक दल ने 1927 ई. के पद-दलित राष्ट्रों के ब्रुसेल्स सम्मेलन में भाग लिया। युवकों को जागृत करने के लिए जगह-जगह स्कूल खोले गए, जिससे डच सरकार भयभीत हो गई और उसने राष्ट्रवादियों पर अनेक प्रतिबंध लगा दिए। 1929 ई. में एक सरकारी आदेश द्वारा सुकर्णो के दल को भंग कर दिया गया, जिससे कुछ समय के लिए आंदोलन दुर्बल प्रतीत हुआ।

प्रथम तथा द्वितीय विश्वयुद्धों के मध्यवर्ती काल में समाजवादी और साम्यवादी विचारधाराओं ने भी देशवासियों को प्रभावित करना आरंभ कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप श्रमिक विवाद और हड़तालें होने लगीं। 1934 ई. तक डचों ने सभी प्रमुख राष्ट्रवादी नेताओं को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया और वे तब तक स्वतंत्र नहीं हो सके जब तक 1942 ई. में जापान ने डच इंडोनेशिया पर आक्रमण कर उन्हें मुक्त नहीं कराया।

द्वितीय विश्वयुद्ध और इंडोनेशिया

द्वितीय विश्वयुद्ध का प्रभाव इंडोनेशिया के राष्ट्रीय आंदोलन पर स्पष्ट रूप से पड़ा और यह आंदोलन पुनः सक्रिय हो उठा। जापान ने युद्ध आरंभ होने से पूर्व ही यह स्पष्ट कर दिया था कि वह संपूर्ण दक्षिण-पूर्वी एशिया को अपना प्रभाव-क्षेत्र मानता है। 7 दिसंबर 1941 ई. को जापान ने पर्ल हार्बर पर आक्रमण कर दक्षिण-पूर्वी एशिया में महायुद्ध का सूत्रपात किया और फिलीपींस तथा सिंगापुर पर अधिकार करने के बाद इंडोनेशिया की ओर बढ़ा। चूँकि उस समय हॉलैंड पर जर्मनी का अधिकार हो चुका था, अतः जापान ने मार्च 1942 ई. तक इंडोनेशिया के सभी द्वीपों पर अधिकार कर लिया और वहाँ डच शासन समाप्त हो गया।

जापानी शासन और राष्ट्रवाद का उभार

जापानी प्रचारकों द्वारा गोरी चमड़ी के प्रति घृणा की भावना को क्रमशः प्रभावी बनाया गया, जिससे इंडोनेशिया में तीव्र राष्ट्रवाद की भावना जागृत हुई। नीदरलैंड ईस्ट इंडिया में जापानी सेना के समर्पण के मात्र दो दिनों बाद ही डचों के पूर्व राजनैतिक बंदी अहमद सुकर्णो, जिन्होंने जापानी अधिग्रहण सेना को इसलिए सहयोग दिया था क्योंकि बदले में उन्हें इंडोनेशिया की स्वतंत्रता का वचन दिया गया था, ने इंडोनेशिया गणतंत्र की घोषणा कर दी। नीदरलैंड की सरकार ने इस नए राज्य को जापानी कठपुतली सरकार कहकर उससे समस्त सरकारी संबंध तोड़ लिए। जावा में अति-राष्ट्रवादियों ने ‘इंडोनेशिया पीपुल्स आर्मी’ का गठन कर सुकर्णो सरकार की इच्छा के विरुद्ध ही डचों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

जब हेग में यह घोषित किया गया कि डच सरकार इंडोनेशिया से कोई वार्ता नहीं करेगी, तो नीदरलैंड ईस्ट इंडिया के डच गवर्नर-जनरल ने त्यागपत्र दे दिया। प्रगतिशील दृष्टिकोण रखने वाले नए गवर्नर-जनरल हुबर्टस वान मूक ने घोषणा की कि डचों को प्राचीन औपनिवेशिक प्रणाली समाप्त कर देनी चाहिए और इंडोनेशियावासियों को भी सरकार में भागीदार बनाना चाहिए। इस बीच इंडोनेशिया पीपुल्स आर्मी तथा ब्रिटिश थल, नभ और नौसेना के मध्य संघर्ष जारी रहा।

दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों की भाँति जापानियों ने इंडोनेशिया में भी अपने शासन के दौरान आर्थिक शोषण किया। उन्होंने सभी द्वीपों से आवश्यक सामग्री लेकर स्थानीय जनता को दरिद्र बना दिया और वहाँ दमनकारी सैनिक शासन बनाए रखा। यद्यपि जापानियों ने प्रत्यक्ष रूप से किसी स्वतंत्रता आंदोलन को प्रोत्साहित नहीं किया, परंतु युद्ध के अंतिम वर्षों में उन्होंने इंडोनेशियाई राष्ट्रवादियों को अपने प्रशासन में सलाहकार के रूप में अवश्य नियुक्त किया। अपने आत्मसमर्पण से कुछ समय पूर्व जापान ने इन सहयोगी राष्ट्रवादियों को स्वतंत्रता की घोषणा करने की अनुमति दे दी।

स्वतंत्र सरकार की घोषणा (17 अगस्त 1945 ई.)

17 अगस्त 1945 ई. को डॉ. सुकर्णो के नेतृत्व में इंडोनेशिया में एक स्वतंत्र राष्ट्रीय सरकार की स्थापना की गई। डॉ. हत्ता को उपराष्ट्रपति बनाया गया और जकार्ता को राजधानी घोषित किया गया।

डचों द्वारा पुनराधिग्रहण के प्रयास

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति और जापान की पराजय के पश्चात् डचों के पास इतनी सैन्य शक्ति शेष नहीं थी कि वे इंडोनेशिया पर प्रभावी ढंग से पुनः अधिकार कर सकें। इस बीच जनता के व्यापक समर्थन से सुकर्णो सरकार व्यवस्थित ढंग से कार्य कर रही थी। इंडोनेशियावासियों में राष्ट्रीय स्वतंत्रता की भावना इतनी प्रबल हो चुकी थी कि वे किसी भी दशा में अपनी स्वतंत्रता छोड़ने को तैयार नहीं थे। किंतु डच सरकार इंडोनेशिया गणतंत्र की स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। उसका उद्देश्य गणराज्य को समाप्त कर पुनः अपना औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित करना था। अतः डच सरकार ने भारी संख्या में सेना भेजनी आरंभ कर दी, जिसके परिणामस्वरूप डच सेना और गणतंत्र की सेना के मध्य युद्ध छिड़ गया।

दिसंबर 1945 ई. में डच लेफ्टिनेंट गवर्नर-जनरल हेग वापस लौटे और उन्होंने एक प्रसारण में कहा कि इंडोनेशिया में हो रही प्रगति उस अंतरराष्ट्रीय प्रवृत्ति का स्पष्ट रूप है, जो एक पक्ष द्वारा दूसरे पर बलपूर्वक किए गए किसी भी दमनकारी कार्य को स्वीकार नहीं करेगी।

लिगाजती समझौता

फरवरी 1946 ई. में नीदरलैंड की सरकार ने ब्रिटिश दबाव में आकर इंडोनेशिया के संवैधानिक भविष्य से संबंधित एक प्रस्ताव प्रकाशित किया, जिसकी मुख्य विशेषता इंडोनेशिया कॉमनवेल्थ की स्थापना थी, जिसमें आंतरिक मामलों को स्वतंत्र रूप से कॉमनवेल्थ की अपनी संस्था में व्यवस्थित किया जाना था। यह कॉमनवेल्थ ब्रिटिश साम्राज्य का ही एक अंग रहता।

सितंबर 1946 ई. में नीदरलैंड से एक प्रतिनिधिमंडल कुछ तथ्यों को व्यवस्थित करने के उद्देश्य से जावा पहुँचा और अक्टूबर में एक सम्मेलन आयोजित किया गया। दो सप्ताह बाद एक अस्थायी युद्ध-विराम पर सहमति बनी, क्योंकि डच सरकार भली-भाँति समझ चुकी थी कि इंडोनेशिया पर आधिपत्य अब केवल सैन्य बल के आधार पर कायम नहीं रखा जा सकता है। अंततः 15 नवंबर 1946 ई. को डच तथा इंडोनेशियाई प्रतिनिधिमंडल के मध्य लिगाजती समझौता संपन्न हुआ, जिसकी प्रमुख शर्तें निम्नलिखित थीं —

1. इंडोनेशिया गणतंत्र में जावा, सुमात्रा तथा मदुरा को सम्मिलित माना गया।

2. जनवरी 1949 ई.से ‘संयुक्त राज्य इंडोनेशिया’ में इंडोनेशिया गणतंत्र, बोर्नियो तथा द्वीप-समूह का पूर्वी भाग (जिसे ‘ग्रेट ईस्ट’ कहा जाएगा) सम्मिलित होंगे। इसका निर्माण फेडरल आधार पर होगा तथा संविधान-निर्माण हेतु एक संवैधानिक सभा कार्य करेगी।

3. 1 जनवरी 1949 ई. से नीदरलैंड-इंडोनेशिया संघ की स्थापना की जाएगी, जिसके दो अंग होंगे- नीदरलैंड का राज्य तथा संयुक्त राज्य इंडोनेशिया। नीदरलैंड की महारानी इस संघ की प्रमुख होंगी और विदेशी संबंध, रक्षा तथा आवश्यकता पड़ने पर आर्थिक मामलों को भी देखेंगी।

समझौते को कार्यरूप देने की समस्याएँ

अनेक विरोधों के बाद मार्च 1947 ई. में इस समझौते पर हस्ताक्षर हुए। यह समझौता दोनों पक्षों के लिए आंशिक विजय और आंशिक पराजय दोनों था। गणराज्य को मान्यता मिलना इंडोनेशिया की बड़ी उपलब्धि थी, परंतु डचों ने ‘संयुक्त राज्य इंडोनेशिया’ और फिर ‘नीदरलैंड-इंडोनेशिया संघ’ बनाकर गणराज्य को मात्र एक स्थानीय शासन के समकक्ष दर्जा दे दिया। परिणामस्वरूप दोनों पक्ष इस समझौते को संदेह की दृष्टि से देखते रहे और इसे लागू करने में अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न हुईं।

27 मई 1947 ई. को डच कमिश्नर-जनरल ने पाँच माँगें रखीं, जिसके उत्तर में इंडोनेशिया सरकार ने लिगाजती समझौते के अनुसार पंचायत बुलाने की सलाह दी, जिसे डचों ने अस्वीकार कर दिया। इंडोनेशिया के प्रधानमंत्री ने अपनी ओर से अनेक रियायतें दीं, परंतु उन्हें अपनी ही पार्टी के विरोध का सामना करना पड़ा। अंततः संयुक्त राज्य अमेरिका के हस्तक्षेप पर इंडोनेशिया से शीघ्र अंतरिम सरकार के गठन की माँग की गई। 8 जुलाई तथा पुनः 17 जुलाई को इंडोनेशिया के नए प्रधानमंत्री ने एक को छोड़कर डचों की सभी माँगें स्वीकार कर लीं और ब्रिटेन ने डचों को उस अंतिम माँग पर भी समझौता करने की सलाह दी। परंतु डचों ने 21 जुलाई को “असहनीय स्थिति की समाप्ति” (इंड ऑफ़ द अनटॉलरेबल सिचुएशन) के नाम पर इंडोनेशिया गणतंत्र के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही आरंभ कर दी, ताकि कानून-व्यवस्था की स्थिति बहाल की जा सके।

31 जुलाई 1947 ई. को भारत के अनुरोध पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने इंडोनेशिया की स्थिति पर ध्यान देना आरंभ किया और दोनों पक्षों से शांतिपूर्ण युद्ध-विराम लागू करने को कहा। साथ ही संयुक्त राज्य अमेरिका, बेल्जियम तथा ऑस्ट्रेलिया को मिलाकर एक संयुक्त राष्ट्र आयोग का गठन किया गया, जिसने दिसंबर में डच और इंडोनेशिया के मध्य वार्ता आरंभ की। इंडोनेशिया ने आयोग का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, परंतु डचों ने इसे अस्वीकार कर दिया।

समझौते का पुनः प्रयास

जनवरी 1948 ई. में डच प्रधानमंत्री ने बटाविया में घोषणा की कि अंतरिम सरकार की स्थापना के लिए शीघ्र कदम उठाए जाएँगे। कुछ समय पश्चात् आयोग ने सुरक्षा परिषद को रिपोर्ट दी कि डच और इंडोनेशिया अभी भी निम्नलिखित तथ्यों पर असहमत हैं —

  1. संयुक्त राज्य इंडोनेशिया के निर्माण को किस रूप में कार्यान्वित किया जाए।
  2. राज्यों के संघ में इंडोनेशिया गणतंत्र का स्थान क्या हो।
  3. राज्यों के संघ और नीदरलैंड-इंडीज़ संघ के मध्य शक्ति का बँटवारा किस प्रकार हो।

जून 1948 ई. में संयुक्त राष्ट्र आयोग की देख-रेख में हो रही डच और गणतंत्र प्रतिनिधिमंडलों की वार्ता समाप्त हो गई। दिसंबर 1948 ई. तक डचों ने इंडोनेशिया गणतंत्र के क्षेत्र से बाहर अनेक नए राज्यों का निर्माण किया। ऐसा प्रतीत होता है कि वे इंडोनेशिया गणतंत्र, जिसमें वास्तव में इंडोनेशिया की लगभग 80% जनसंख्या निवास करती थी, के प्रभाव को कम करना चाहते थे। सैनिक और राजनीतिक कार्यवाहियों के माध्यम से उन्होंने गणतंत्र के क्षेत्र को उसके वास्तविक आकार से काफी कम कर दिया। डचों का मानना था कि संयुक्त राष्ट्र आयोग इस प्रकार विभाजित था कि वे आसानी से इसके प्रस्तावों को अस्वीकार कर सकते थे।

3 दिसंबर 1948 ई. को संयुक्त राष्ट्र आयोग ने रिपोर्ट दी कि डच और गणतंत्र के मध्य स्थिति सुधारने के उनके सभी प्रयास विफल रहे। दो दिनों बाद डच मिशन ने बटाविया छोड़ दिया और लगभग दो सप्ताह बाद डचों ने इंडोनेशिया गणतंत्र पर अचानक आक्रमण कर राष्ट्रपति सुकर्णो तथा अन्य उच्च राजनैतिक व सैनिक अधिकारियों को बंदी बना लिया। जुलाई 1947 ई. की भाँति ही यह कार्यवाही भी “असहनीय स्थिति की समाप्ति” के नाम पर पुलिस कार्यवाही कहकर की गई थी।

अंतरराष्ट्रीय समर्थन और दबाव

1949 ई. में संयुक्त राज्य अमेरिका ने 1947 ई. की तुलना में कहीं अधिक सक्रियता से इंडोनेशिया का पक्ष लिया। अमेरिकी प्रतिनिधियों ने सुरक्षा परिषद की बैठक में नीदरलैंड को दोषी ठहराया तथा निम्नलिखित माँगें रखीं- जकार्ता में गणतंत्र सरकार की पुनर्स्थापना, डच सेना की वापसी, एक नए संयुक्त राष्ट्र आयोग का गठन, 1949 ई.तक इंडोनेशिया में आम चुनाव तथा 1950 ई. तक संयुक्त राज्य इंडोनेशिया को पूर्ण स्वतंत्रता।

इसी समय अनेक देशों में डचों की कार्यवाही का व्यापक विरोध हुआ। एशिया में यह भावना उस समय और प्रबल हुई जब भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निमंत्रण पर 19 एशियाई, अफ्रीकी तथा सुदूर-पूर्व के देशों ने इंडोनेशिया समस्या के समाधान हेतु दिल्ली में एक सम्मेलन आयोजित किया। इसके तुरंत बाद सुरक्षा परिषद ने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें —

1. इंडोनेशिया के राजनैतिक बंदियों की शीघ्र रिहाई,

2. इंडोनेशिया गणतंत्र सरकार को तुरंत जकार्ता लौटाना,

3. तीन शक्तियों के एक नए संयुक्त राष्ट्र आयोग का गठन, जो यह देखे कि डच सेना को कहाँ-कहाँ से हटाया जाना है,

4. 15 मार्च 1949 ई. तक संघ की अंतरिम सरकार का गठन,

5. अक्टूबर 1949 ई. तक चुनाव, तथा

6. जुलाई 1950 ई. तक संयुक्त राज्य इंडोनेशिया की स्थापना, जैसी माँगें शामिल थीं।

स्वतंत्रता प्राप्ति (1949 ई.)

इस प्रस्ताव, अंतरराष्ट्रीय जनमत के दबाव, नाटो के माध्यम से पश्चिमी यूरोप की आर्थिक व सैन्य शक्ति बढ़ाने में नीदरलैंड की सहायता की इच्छा तथा इंडोनेशिया में एक लाख से भी अधिक सैनिकों का भार वहन करने जैसी समस्याओं ने डच नीति में भारी परिवर्तन ला दिया। यह निर्णय लिया गया कि इंडोनेशिया से संबंधित सभी समस्याओं के समाधान हेतु एक गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। संयुक्त राष्ट्र आयोग की मध्यस्थता से एक समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत जकार्ता में इंडोनेशिया गणतंत्र सरकार की वापसी, सैनिक कार्यवाहियों पर रोक तथा समस्त राजनैतिक बंदियों की रिहाई सुनिश्चित की गई।

अंततः 6 जुलाई 1949 ई. को राष्ट्रपति सुकर्णो तथा अन्य नेता जकार्ता पहुँचे। तीन सप्ताह बाद हेग में संयुक्त राष्ट्र आयोग की उपस्थिति में गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया और 2 नवंबर 1949 ई. को इस पर हस्ताक्षर हुए। इस सम्मेलन का प्रस्तावित समाधान मूलतः लिगाजती और रेनविल समझौतों पर आधारित था, किंतु इसमें एक महत्त्वपूर्ण अंतर यह था कि इसमें सत्ता का हस्तांतरण तुरंत करने की बात कही गई थी।

पूर्ण सत्ता का हस्तांतरण

गणतन्त्रात्मक संयुक्त राज्य इंडोनेशिया को पूर्ण सत्ता तुरंत हस्तांतरित करने के लिए 27 दिसंबर 1949 ई. को हेग में एक औपचारिक सम्मेलन आयोजित किया गया। नए राज्य में डच न्यू गिनी को छोड़कर प्राचीन नीदरलैंड ईस्ट इंडीज़ के सभी क्षेत्र सम्मिलित किए गए, जबकि न्यू गिनी के भविष्य का निर्णय बाद के लिए स्थगित कर दिया गया। नीदरलैंड के शासक की अध्यक्षता में दोनों राज्यों के बीच पारस्परिक हित के मामलों, विशेषतः विदेशी संबंध और रक्षा पर ऐच्छिक सहयोग हेतु नीदरलैंड-इंडोनेशिया संघ का गठन किया गया। एक स्थायी सचिवालय स्थापित करने तथा वर्ष में दो बार मंत्रियों का सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय भी लिया गया। सभी निर्णयों को कार्यरूप देने से पूर्व दोनों पक्षों में सहमति तथा संबंधित संसद से अनुमोदन आवश्यक था।

गणतंत्र की स्थापना और सुदृढ़ीकरण

अहमद सुकर्णो को नए फेडरल गणतंत्र का राष्ट्रपति बनाया गया, जबकि मुहम्मद हत्ता इसके प्रधानमंत्री बने। इसी दौरान कुछ संवैधानिक इकाइयों में विद्रोह भड़क उठे, जिसके बाद अगस्त 1950 ई. में राष्ट्रीय नेताओं ने नई सरकार को अधिक शक्ति प्रदान करने के उद्देश्य से एक नया संविधान अपनाया। इसके अंतर्गत फेडरल व्यवस्था को समाप्त कर संपूर्ण इंडोनेशिया के लिए एक केंद्रीय संघीय राज्य का निर्माण किया गया, जिसमें पूर्व के 16 राज्यों के स्थान पर 10 क्षेत्र बनाए गए। इसी समय देश का नाम बदलकर ‘इंडोनेशिया गणतंत्र’ रखा गया।

सितंबर 1950 ई. में इंडोनेशिया गणतंत्र को संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता प्राप्त हुई। 1951 ई. तक स्वतंत्रता संग्राम के अवशिष्ट प्रभाव भी लगभग समाप्त हो गए। डचों ने अपनी सेनाएँ पूर्ण रूप से वापस बुला लीं तथा दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता करने वाले संयुक्त राष्ट्र आयोग को भी समाप्त कर दिया गया।

इस प्रकार डचों के विरुद्ध इंडोनेशिया की जनता का यह सफल स्वतंत्रता संग्राम इस बात का सुदृढ़ प्रमाण है कि वहाँ के निवासियों में राष्ट्रीय स्वतंत्रता की भावना अत्यंत प्रबल रूप से विद्यमान थी। सुकर्णो के नेतृत्व में लगभग साढ़े तीन शताब्दियों की औपनिवेशिक दासता के बाद इंडोनेशिया ने न केवल स्वतंत्रता प्राप्त की, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान भी स्थापित की। यह संघर्ष एशिया-अफ्रीका के अन्य उपनिवेशों के स्वतंत्रता आंदोलनों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गया।

इंडोनेशिया के स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. इंडोनेशिया में स्वतंत्रता आंदोलन का मुख्य उद्देश्य क्या था?

इंडोनेशिया के स्वतंत्रता आंदोलन का मुख्य उद्देश्य डच औपनिवेशिक शासन से मुक्ति प्राप्त करना और एक स्वतंत्र एवं संप्रभु इंडोनेशियाई राष्ट्र की स्थापना करना था। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में राष्ट्रवाद के विकास के साथ यह आंदोलन अधिक संगठित हुआ।

2. इंडोनेशिया के स्वतंत्रता आंदोलन में सुकर्णो और मोहम्मद हत्ता की क्या भूमिका थी?

सुकर्णो और मोहम्मद हत्ता इंडोनेशियाई राष्ट्रवादी आंदोलन के प्रमुख नेताओं में थे। सुकर्णो ने राष्ट्रवादी राजनीति को व्यापक जनसमर्थन दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जबकि हत्ता भी स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख वैचारिक और राजनीतिक नेताओं में शामिल थे। दोनों ने 17 अगस्त 1945 ई. को इंडोनेशिया की स्वतंत्रता की घोषणा की।

3. जापानी कब्जे ने इंडोनेशिया के स्वतंत्रता आंदोलन को कैसे प्रभावित किया?

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1942 ई. में जापान ने डच ईस्ट इंडीज पर कब्जा कर लिया। जापानी शासन दमनकारी था, लेकिन इस अवधि में इंडोनेशियाई राष्ट्रवादियों को राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों के कुछ अवसर मिले। जापान की पराजय के बाद उत्पन्न राजनीतिक परिस्थिति ने इंडोनेशिया की स्वतंत्रता की घोषणा के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा कीं।

4. इंडोनेशिया ने स्वतंत्रता की घोषणा कब की?

इंडोनेशिया ने 17 अगस्त 1945 ई. को स्वतंत्रता की घोषणा की। सुकर्णो और मोहम्मद हत्ता ने जकार्ता में स्वतंत्रता की घोषणा की। इसके बाद इंडोनेशिया और नीदरलैंड के बीच स्वतंत्रता को लेकर संघर्ष और कूटनीतिक वार्ताओं का दौर चला।

5. इंडोनेशिया को नीदरलैंड से पूर्ण स्वतंत्रता कब मिली?

इंडोनेशिया की स्वतंत्रता की घोषणा 17 अगस्त 1945 ई. को हुई थी, लेकिन नीदरलैंड ने तत्काल इसे स्वीकार नहीं किया। स्वतंत्रता संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद 27 दिसंबर 1949 ई. को नीदरलैंड ने संप्रभुता के हस्तांतरण के माध्यम से इंडोनेशिया की स्वतंत्रता को औपचारिक रूप से मान्यता दी।
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