फ़ारसी (हख़ामनी) सभ्यता : उदय, विस्तार और पतन
प्राचीन विश्व की सभ्यताओं में फ़ारसी (हख़ामनी/आकेमेनिड) सभ्यता का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। यह मानव इतिहास की पहली ऐसी सभ्यता थी जिसने पश्चिमी एशिया, मिस्र, मध्य एशिया तथा उत्तर-पश्चिमी भारत तक फैले विशाल भूभाग को एक ही केंद्रीय शासन-व्यवस्था के अंतर्गत संगठित किया। राजनीतिक संगठन, प्रशासनिक दक्षता, धार्मिक सहिष्णुता, कला-स्थापत्य तथा सांस्कृतिक समन्वय के क्षेत्र में हख़ामनी साम्राज्य का योगदान इतना महत्त्वपूर्ण रहा कि इसकी छाप शताब्दियों बाद तक विश्व-इतिहास पर दिखाई देती है।
नामकरण और भौगोलिक पृष्ठभूमि
पर्सिया से ईरान तक: नामकरण की कहानी
फ़ारसी सभ्यता का उदय ईरान के दक्षिण-पश्चिमी भाग पर्सिस (यूनानी नाम) अथवा फ़ार्स (स्थानीय नाम) क्षेत्र में हुआ, इसी कारण प्राचीन काल में इस समूचे भूभाग को पश्चिमी जगत में ‘पर्सिया’ (फारस) के नाम से जाना जाता था। यह नाम स्वयं पार्सा/फ़ार्स प्रांत से व्युत्पन्न है, जहाँ हख़ामनी वंश की जड़ें थीं। 1935 ई. में तत्कालीन शासक रज़ा शाह पहलवी के अनुरोध पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस देश का आधिकारिक नाम ‘ईरान’ स्वीकार किया गया, जो वस्तुतः ‘आर्यों की भूमि’ का द्योतक प्राचीन शब्द ‘एरान’ (एरानशहर) से व्युत्पन्न है। उल्लेखनीय है कि प्राचीन फ़ारसी अभिलेखों में भी शासक स्वयं को ‘आर्य’ तथा अपने वंश को ‘आर्य वंश’ कहते थे, अतः आधुनिक नाम ‘ईरान’ वास्तव में एक अत्यंत प्राचीन स्वपहचान का ही पुनरुद्धार है।
ईरान की भौगोलिक स्थिति और सामरिक महत्त्व
पश्चिमी एशिया के प्रमुख देशों में ईरान का अत्यंत महत्त्वपूर्ण भौगोलिक-राजनीतिक स्थान है। इसके उत्तर-पश्चिम में तुर्की, पश्चिम में इराक, दक्षिण में फ़ारस की खाड़ी एवं ओमान की खाड़ी, पूर्व में अफ़ग़ानिस्तान तथा बलूचिस्तान का क्षेत्र और उत्तर में कैस्पियन सागर स्थित है। इस भौगोलिक स्थिति ने प्राचीन काल से ही ईरान को एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बीच व्यापार, संस्कृति तथा राजनीतिक संपर्कों का प्रमुख सेतु बना दिया और यही कारण था कि यह क्षेत्र निरंतर विभिन्न सभ्यताओं के आदान-प्रदान का केंद्र बना रहा।
भौगोलिक संरचना: पठार, पर्वत और जलवायु
भौगोलिक संरचना की दृष्टि से ईरान का अधिकांश भाग एक विशाल त्रिभुजाकार पठार पर स्थित है, जिसे ‘ईरानी पठार’ कहा जाता है और जो फ़ारस की खाड़ी तथा कैस्पियन सागर के मध्य विस्तृत है। इसकी औसत ऊँचाई लगभग 900 से 1,500 मीटर के बीच है। इसके दक्षिण-पश्चिम में ज़ाग्रोस पर्वतमाला तथा उत्तर में अल्बुर्ज़ पर्वतमाला स्थित है, जिसकी ऊँची चोटियाँ वर्षभर हिमाच्छादित रहती हैं। ये पर्वतमालाएँ जहाँ एक ओर प्राकृतिक सुरक्षा-कवच का कार्य करती थीं, वहीं अनेक नदियों के उद्गम-स्थल भी थीं। दक्षिणी तटीय क्षेत्र सामान्यतः शुष्क तथा मरुस्थलीय हैं, जबकि कैस्पियन सागर के तटीय मैदान पर्याप्त वर्षा के कारण अत्यंत उपजाऊ हैं। पर्वतीय घाटियों तथा सिंचाई-सुविधा वाले क्षेत्रों में कृषि का समुचित विकास हुआ, जिसने इस सभ्यता को दीर्घकालिक स्थायित्व प्रदान किया, जबकि दक्षिणी-मध्य भाग की शुष्कता के कारण वहाँ कृत्रिम सिंचाई पर आधारित कृषि की जाती थी।
प्राकृतिक संसाधन और व्यापार मार्ग
प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से भी ईरान अत्यंत समृद्ध था। यहाँ ताँबा, लोहा, चाँदी, सोना तथा बहुमूल्य पत्थर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे, जिनकी उपलब्धता ने हस्तशिल्प, धातु-उद्योग तथा व्यापार को व्यापक प्रोत्साहन दिया। फ़ारस की खाड़ी के माध्यम से संचालित समुद्री व्यापार तथा मध्य एशिया एवं मेसोपोटामिया को जोड़ने वाले स्थल-मार्गों ने ईरान को अंतरराष्ट्रीय व्यापार का एक प्रमुख केंद्र बना दिया, जिसके परिणामस्वरूप प्राचीन ईरान अनेक सभ्यताओं के सांस्कृतिक एवं आर्थिक संपर्क का माध्यम बन गया।
हख़ामनी साम्राज्य के ऐतिहासिक स्रोत
साहित्यिक स्रोत
फ़ारसी सभ्यता के इतिहास-निर्माण के लिए साहित्यिक तथा पुरातात्त्विक दोनों प्रकार के स्रोत उपलब्ध हैं। साहित्यिक स्रोतों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अवेस्ता है, जो प्राचीन ईरानियों का पवित्र धार्मिक ग्रंथ है। ईरानी सभ्यता में उसका वही केंद्रीय स्थान है जो भारतीय सभ्यता में वेदों को प्राप्त है। अवेस्ता से तत्कालीन धार्मिक मान्यताओं, सामाजिक जीवन-पद्धति तथा सांस्कृतिक परंपराओं का अत्यंत विस्तृत और प्रामाणिक परिचय प्राप्त होता है।
इसके अतिरिक्त यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस, जिसे पश्चिमी परंपरा में ‘इतिहास का जनक’ कहा जाता है, के विवरण अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। उसने अपने ग्रंथ ‘हिस्टोरिआई’ में हख़ामनी साम्राज्य के शासन, प्रशासन, सामाजिक रीति-रिवाजों तथा युद्धों का विस्तृत और जीवंत वर्णन प्रस्तुत किया है, यद्यपि उसके कुछ विवरण यूनानी दृष्टिकोण से प्रभावित तथा कहीं-कहीं अतिरंजित हैं। इनके अतिरिक्त टीसियस (पर्सिका), ज़ेनोफ़न (एनाबेसिस), स्ट्रैबो, एरियन, डिओडोरस तथा प्लूटार्क जैसे अन्य यूनानी-रोमन लेखकों के विवरण भी हख़ामनी इतिहास के पुनर्निर्माण में सहायक हैं।
पुरातात्त्विक स्रोत
पुरातात्त्विक दृष्टि से हख़ामनी शासकों के स्वयं के अभिलेख तथा पर्सेपोलिस, सूसा, एकबताना (हमदान), पसारगादे तथा नक़्श-ए-रुस्तम जैसे स्थलों से प्राप्त महल, मंदिर, शिलालेख, मूर्तियाँ तथा समाधियाँ फ़ारसी सभ्यता की उन्नत प्रशासनिक व्यवस्था, स्थापत्य-कौशल तथा सांस्कृतिक समृद्धि का सजीव और मूर्त प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। इन स्थलों से प्राप्त अभिलेखों में दारा प्रथम, क्षयार्ष प्रथम (ज़र्क्सीज़) तथा अर्तक्षत्र (आर्टाक्सर्क्सीज़) के शिलालेख विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
बेहिस्तून अभिलेख
इन सभी अभिलेखों में दारा प्रथम का बेहिस्तून (बीसतून) अभिलेख सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें उसके राज्यारोहण, विभिन्न प्रांतीय विद्रोहों के दमन तथा अपनी विजयों का अत्यंत विस्तृत, तिथिवार विवरण अंकित है। यह अभिलेख पश्चिमी ईरान के केरमानशाह प्रांत में एक ऊँची चट्टान पर उत्कीर्ण है और तीन भाषाओं- प्राचीन फ़ारसी, एलामाइट तथा बेबीलोनियाई (अक्कादी) में लिखा गया है, जिसके कारण उन्नीसवीं शताब्दी में हेनरी रॉलिंसन जैसे विद्वानों को कीलाक्षर (क्यूनिफॉर्म) लिपि को समझने में सफलता मिली, ठीक उसी प्रकार जैसे मिस्री चित्रलिपि को समझने में रोज़ेटा स्टोन सहायक सिद्ध हुआ था। इन अभिलेखों की भाषा प्राचीन फ़ारसी है, जिसे मध्यकालीन तथा आधुनिक फ़ारसी भाषा की प्रत्यक्ष पूर्ववर्ती माना जाता है और अवेस्ता की भाषा के साथ इसमें पर्याप्त संरचनात्मक तथा शब्दावली-संबंधी समानता भी है, जो दोनों के एक समान प्राचीन इंडो-ईरानी मूल की ओर संकेत करती है। इसके अतिरिक्त पर्सेपोलिस से प्राप्त ‘पर्सेपोलिस फोर्टिफिकेशन टैबलेट्स’ तथा ‘पर्सेपोलिस ट्रेजरी टैबलेट्स’, जो एलामाइट भाषा में लिखे गए हैं, प्रशासनिक और आर्थिक जीवन को समझने के अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।
ईरानी आर्यों का आगमन और प्रारंभिक समाज
भारोपीय जातियों का प्रव्रजन
प्रागैतिहासिक काल में ईरान के मूल निवासियों के विषय में निश्चित और प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। सामान्यतः यह माना जाता है कि द्वितीय सहस्राब्दी ईसा पूर्व के प्रारंभिक काल में भारोपीय (इंडो-यूरोपीय) जातियों की एक शाखा, जिसे ‘ईरानी आर्य’ कहा जाता है, मध्य एशिया से पलायन कर ईरानी पठार पर आकर बसी। आरंभिक अवस्था में इनका जीवन खानाबदोश स्वरूप का था और ये मुख्यतः पशुपालन पर निर्भर थे, विशेषकर भेड़, बकरी, घोड़े, ऊँट तथा गाय पालना इनकी आजीविका का प्रमुख आधार था। घोड़ा इस समाज की सैन्य शक्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा दोनों का प्रतीक था और ईरानी अश्वारोही सैनिक प्राचीन विश्व के श्रेष्ठतम घुड़सवारों में गिने जाते थे। यह सैन्य दक्षता आगे चलकर हख़ामनी साम्राज्य के विशाल सैन्य विस्तार का एक प्रमुख आधार भी बनी।
प्रारंभिक आर्थिक और सामाजिक जीवन
समय के साथ इन जनजातियों ने स्थायी बस्तियाँ बसानी शुरू कीं, कृषि को अपनाया और गेहूँ, जौ, अंगूर तथा विविध फलों की खेती धीरे-धीरे विकसित हुई। शुष्क क्षेत्रों में भी कृषि को संभव बनाने के लिए नहरों तथा भूमिगत जलस्रोतों की एक अत्यंत सूझबूझपूर्ण प्रणाली, जिसे ‘क़नात प्रणाली’ कहा जाता है, विकसित की गई, जो प्राचीन ईरानी अभियांत्रिकी-कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण है। ईरानी समाज में परिवार सामाजिक जीवन की मूल इकाई था, जिसका स्वरूप पितृसत्तात्मक था। पिता परिवार का प्रधान होता था और परिवार संयुक्त स्वरूप का होता था। महिलाओं को धार्मिक अनुष्ठानों तथा कुछ आर्थिक गतिविधियों में सहभागिता का अपेक्षाकृत सम्मानजनक अवसर प्राप्त था, यद्यपि राजनीतिक अधिकार मुख्यतः पुरुषों के हाथों में केंद्रित थे। सामाजिक संरचना में पुरोहित, योद्धा, कृषक, पशुपालक, व्यापारी तथा कारीगर जैसे भिन्न-भिन्न वर्ग विद्यमान थे और धर्म एवं शासन के अत्यंत घनिष्ठ संबंध के कारण धार्मिक नेताओं का सामाजिक जीवन पर विशेष प्रभाव था।
आर्य शाखाओं का विभाजन : भारत और ईरान
कालांतर में जलवायु-परिवर्तन तथा चरागाहों की कमी के कारण इन भारोपीय समूहों में विभिन्न दिशाओं की ओर व्यापक प्रव्रजन (स्थानांतरण) प्रारंभ हुआ। कुछ समूह यूरोप के विभिन्न भागों- जर्मनी, फ्रांस, स्पेन तथा ब्रिटेन की ओर गए, जबकि अन्य समूह एशिया माइनर, यूनान, इटली तथा भारतीय उपमहाद्वीप की दिशा में अग्रसर हुए। इनमें से एक शाखा मध्य एशिया में कुछ काल तक निवास करने के पश्चात दक्षिण की दिशा में बढ़ी और आगे चलकर दो प्रमुख उपशाखाओं में विभाजित हो गई। एक शाखा भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश कर ‘आर्य’ नाम से प्रसिद्ध हुई, जबकि दूसरी शाखा ईरान में स्थायी रूप से बसकर ‘ईरानी-आर्य’ कहलाई। इन्हीं ईरानी-आर्यों ने आगे चलकर प्राचीन फ़ारसी सभ्यता तथा उसके व्यापक राजनीतिक-सांस्कृतिक विकास की सुदृढ़ नींव रखी। भाषावैज्ञानिक दृष्टि से भी अवेस्ता की भाषा और वैदिक संस्कृत में इतनी समानता है कि विद्वान दोनों को एक समान ‘इंडो-ईरानी’ मूल-भाषा से व्युत्पन्न मानते हैं।
प्राक्-हख़ामनी काल : मीड और फ़ारसी जनजातियाँ
प्रमुख ईरानी जनजातियाँ
प्राचीन फ़ारसियों के संपूर्ण राजनीतिक इतिहास को मुख्यतः दो व्यापक कालखंडों में विभाजित किया जाता है- प्राक्-हख़ामनी (पूर्व-आकेमेनिड) काल तथा हख़ामनी (आकेमेनिड) काल। हख़ामनी साम्राज्य की औपचारिक स्थापना से पूर्व ईरान में अनेक आर्य जनजातियाँ निवास करती थीं, जिनमें मीड (मादी) तथा फ़ारसी (पर्शियन) सर्वाधिक प्रमुख और शक्तिशाली थीं। अवेस्ता, हख़ामनी शासकों के अभिलेख तथा हेरोडोटस के विवरणों से ज्ञात होता है कि वैदिक आर्यों की भाँति ईरानी आर्य भी अनेक जनजातीय शाखाओं में विभाजित थे, जिनमें मीड, फ़ारसी, पार्थियन, बैक्ट्रियन, अराकोशियन, मार्जियन, सोग्डियन, कोरस्मियन, ड्रैन्जियन, सैगर्टियन तथा हाइरकेनियन जनजातियाँ प्रमुख थीं। इन सभी जनजातियों में प्राक्-हख़ामनी काल के दौरान मीडों ने सर्वाधिक राजनीतिक प्रतिष्ठा और शक्ति अर्जित की तथा आगे चलकर प्राचीन ईरानी साम्राज्य की आधारशिला रखी।
मीडों का प्रमुख निवास-क्षेत्र वर्तमान हमदान (प्राचीन मीडिया) था, जबकि फ़ारसी जनजाति प्रारंभ में उर्मिया झील के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्रों में निवास करती थी और बाद में क्रमशः दक्षिण की ओर विस्थापित होकर फ़ार्स (पार्सा) प्रदेश में स्थायी रूप से बस गई, जो आगे चलकर संपूर्ण फ़ारसी साम्राज्य का मूल केंद्रीय क्षेत्र बन गया। इसी काल में ज़ाग्रोस पर्वतमाला के आसपास के क्षेत्रों में निवास करने वाली ईरानी जनजातियों, विशेषकर मीड और फ़ारसी पर असीरियाई साम्राज्य द्वारा बार-बार आक्रमण किए गए, किंतु असीरियाई शक्ति इन्हें पूर्णतः अपने अधीन नहीं कर सकी।
मितन्नी राज्य और भारोपीय संपर्क
इसी प्रारंभिक चरण में मितन्नी लोगों ने काकेशस क्षेत्र को पार कर फरात (यूफ्रेटीस) नदी के ऊपरी भाग में अपना निवास बनाया और लगभग पंद्रहवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक पश्चिमी एशिया की एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरे। उनके संधि-पत्रों तथा अभिलेखों में मित्र, वरुण, इंद्र तथा नासत्य जैसे प्रत्यक्षतः वैदिक देवताओं का उल्लेख मिलता है, जो उनके भारोपीय मूल का सुदृढ़ प्रमाण है और भारतीय-ईरानी सांस्कृतिक एकता का परिचायक है। बाद में हित्ती साम्राज्य के उत्कर्ष के परिणामस्वरूप मितन्नियों की शक्ति क्षीण हो गई।
पौराणिक परंपरा: पेशदादी वंश और शाहनामा
प्राक्-हख़ामनी ऐतिहासिक तथ्यों के साथ-साथ ईरान की एक समृद्ध पौराणिक विरासत भी विद्यमान थी, जिसका प्रमुख आधार अवेस्ता के ‘यश्त’ खंड तथा महान फ़ारसी कवि फ़िरदौसी द्वारा रचित विश्वप्रसिद्ध महाकाव्य ‘शाहनामा’ (लगभग दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी ई.) है। शाहनामा के अनुसार ईरान का प्राचीनतम राजवंश ‘पेशदादी वंश’ था। पेशदादी वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक जमशेद था, जिसके शासनकाल में अनेक कलाओं, शिल्पों तथा सामाजिक व्यवस्थाओं के विकास की कथाएँ जुड़ी हैं। किंतु आधुनिक इतिहासकार इन्हें ऐतिहासिक तथ्य न मानकर पौराणिक परंपरा का अंग मानते हैं। इसी महाकाव्य में सीस्तान के महान वीर साम, उसके पुत्र ज़ाल तथा पौत्र रुस्तम जैसे वीरगाथाओं के प्रमुख नायकों का भी उल्लेख मिलता है, जो ईरानी सांस्कृतिक चेतना में आज भी अत्यंत सम्मानित हैं।
मीड साम्राज्य का उत्कर्ष एवं पतन
डिओसीज
मीडिया प्रदेश ईरान के उत्तर-पश्चिम में स्थित होने और असीरियाई साम्राज्य के निकट होने के कारण निरंतर आक्रमणों का सामना करता रहा, यद्यपि असीरियाई शासक इसे कभी स्थायी रूप से पराजित नहीं कर सके। आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्द्ध में डिओसीज, जिसे असीरियाई अभिलेखों में ‘दायौक्कु’ कहा गया है, के नेतृत्व में मीड जनजातियों के संगठन की प्रक्रिया प्रारंभ हुई और मीडों द्वारा प्रथम संगठित राज्य स्थापित हुआ। परंपरा के अनुसार जनसमर्थन से शासक चुने गए डिओसीज ने विभिन्न मीड जनजातियों को संगठित कर एकबताना (हमदान) को अपनी राजधानी बनाया, जो सात विशाल परकोटों से सुरक्षित था और जहाँ शासक तक पहुँचने के लिए अत्यंत कठोर राजकीय शिष्टाचार का पालन करना पड़ता था। यह जानकारी हेरोडोटस के विवरण से मिलती है। असीरियाई सम्राट सारगोन द्वितीय के अभिलेखों में भी दायौक्कु का उल्लेख उसके ऐतिहासिक अस्तित्व की पुष्टि करता है।
फ्रवर्तीज (फ्राओर्तेस)
डिओसीज के पश्चात उसका पुत्र फ्रवर्तीज (लगभग 675–653 ई. पू.) मीड साम्राज्य का शासक बना। उसने अपने पिता द्वारा स्थापित राज्य को सुदृढ़ करने तथा विभिन्न मीड जनजातियों को एक राजनीतिक इकाई में संगठित किया, साथ ही उसने पारसियों सहित अनेक अन्य ईरानी जनजातियों को भी अपने नेतृत्व में लाने का प्रयत्न किया और सिम्मेरियन तथा सीथियन जनजातियों को भी अपने प्रभाव में लेकर असीरिया के विरुद्ध एक संघ बनाने का प्रयास किया। किंतु हेरोडोटस के अनुसार जब उसने असीरिया की राजधानी निनवेह पर आक्रमण किया, तो यह अभियान असफल रहा और लगभग 653 ईसा पूर्व में युद्ध के दौरान ही उसकी मृत्यु हो गई। उसके निधन के पश्चात मीड राज्य अस्थिर हो गया, जिसका लाभ उठाकर सीथियनों ने मीडिया पर अधिकार कर लिया। हेरोडोटस के अनुसार लगभग अट्ठाईस वर्षों (653–625 ई. पू.) तक मीडिया पर सीथियन प्रभुत्व बना रहा।
साइक्सरीज़ : मीड शक्ति का चरमोत्कर्ष
फ्रवर्तीज का पुत्र साइक्सरीज़ (लगभग 625–585 ई. पू.) मीडिया का सर्वाधिक प्रतिभाशाली और शक्तिशाली शासक था, जिसे क्याक्षारेस के नाम से भी जाना जाता है। सीथियनों के दीर्घकालीन प्रभुत्व का मीडों पर एक अप्रत्याशित लाभकारी प्रभाव भी पड़ा। मीडों ने सीथियनों की घुड़सवारी तथा तीव्र गति के युद्ध-संचालन की कला को आत्मसात कर लिया। साइक्सरीज़ ने इन्हीं तकनीकों का उपयोग कर अपनी सेना का व्यापक पुनर्गठन किया, पैदल सेना, घुड़सवार सेना तथा धनुर्धारियों को पृथक-पृथक संगठित कर मीड सैन्य शक्ति को पूर्वापेक्षा कहीं अधिक प्रभावशाली बनाया। इसके पश्चात उसने उर्मिया झील के आसपास के क्षेत्रों पर पुनः अधिकार स्थापित किया और छलपूर्वक सीथियन नेताओं का अंत करते हुए उन्हें मीडिया से निष्कासित कर मीड राज्य को पुनः पूर्ण स्वतंत्र बना दिया।
सीथियनों से मुक्ति के पश्चात साइक्सरीज़ ने अपने पिता की अधूरी नीति को आगे बढ़ाते हुए असीरिया के विनाश का दृढ़ निश्चय किया। उसी समय बेबीलोन (कैल्डिया) का शासक नबोपोलास्सर भी असीरिया के विरुद्ध संघर्षरत था और समान हितों के कारण दोनों शासकों के मध्य मैत्री तथा सैन्य सहयोग की संधि हुई, जिसे और अधिक सुदृढ़ करने के लिए साइक्सरीज़ (क्याक्षारेस) की पुत्री अमीतिस का विवाह नबोपोलास्सर के पुत्र नेबूकदनेस्सर द्वितीय के साथ संपन्न हुआ। लगभग 614 ईसा पूर्व में साइक्सरीज़ ने असीरिया के प्राचीन नगर अश्शूर पर अधिकार कर लिया। इसके पश्चात मीड-बेबीलोनियाई संयुक्त सेनाओं ने 612 ईसा पूर्व में असीरिया की राजधानी निनवेह पर आक्रमण किया। भीषण युद्ध के उपरांत निनवेह पर विजय प्राप्त कर ली गई, जिससे असीरियाई साम्राज्य का वास्तविक पतन प्रारंभ हो गया। यद्यपि असीरियन कुछ वर्षों तक प्रतिरोध करते रहे, किंतु अंततः 609 ईसा पूर्व तक असीरिया का स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व पूर्णतः समाप्त हो गया।
असीरिया के पतन के बाद साइक्सरीज़ पश्चिमी एशिया का सबसे शक्तिशाली शासक बन गया। इसके पश्चात उसका सामना एशिया माइनर के समृद्ध लीडिया राज्य से हुआ। दोनों शक्तियों के मध्य लगभग पाँच वर्षों तक चलने वाले संघर्ष में 590 ईसा पूर्व में साइक्सरीज़ ने लीडिया पर आक्रमण किया, किंतु निर्णायक युद्ध के समय 28 मई 585 ईसा पूर्व को घटित हुए सूर्यग्रहण, जिसकी भविष्यवाणी मिलेटस के दार्शनिक थेल्स ने की थी, को उस युग में दैवी संकेत मान लिया गया, जिससे दोनों पक्षों ने युद्ध रोक दिया। बेबीलोन के शासक की मध्यस्थता से संधि हुई, जिसमें हैलिस (किज़िलइरमाक) नदी को दोनों राज्यों की सीमा स्वीकार किया गया और इस मैत्री को स्थायी बनाने के लिए लीडिया के राजा अलियात्तेस ने अपनी पुत्री आर्येनिस का विवाह मीड साम्राज्य के युवराज अस्तियाजेस से किया। साइक्सरीज़ के शासनकाल में मीडिया, असीरिया तथा पारस के प्रदेश एक व्यापक साम्राज्य का भाग बनकर मीडिया को पश्चिमी एशिया की निर्विवाद प्रमुख शक्ति बना चुके थे। लगभग 585 ईसा पूर्व में साइक्सरीज़ की मृत्यु हो गई।
अस्टियाजेस और मीड साम्राज्य का पतन
साइक्सरीज़ की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र अस्टियाजेस मीडिया का शासक बना, जिसे असीरियाई स्रोतों में इश्तुवेग कहा गया है। उसे एक विशाल एवं सुसंगठित साम्राज्य उत्तराधिकार में प्राप्त हुआ, किंतु वह अपने पिता के समान दूरदर्शी तथा कुशल शासक नहीं था और उसने साम्राज्य के विस्तार एवं प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण की अपेक्षा विलासिता तथा राजसी वैभव को अधिक महत्त्व दिया। यूनानी परंपराओं में उसका चित्रण एक कठोर तथा कभी-कभी क्रूर शासक के रूप में मिलता है, यद्यपि हेरोडोटस द्वारा वर्णित अनेक कथाओं को पूर्णतः ऐतिहासिक नहीं माना जा सकता है। मैत्री-संबंधों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अस्टियाजेस ने अपनी पुत्री मांडाने का विवाह फ़ारसी शासक कैंबिसीज प्रथम के साथ करवाया और यही विवाह आगे चलकर हख़ामनी वंश के उत्थान का निर्णायक बिंदु सिद्ध हुआ।
साइरस द्वितीय (महान साइरस) का विद्रोह
फ़ारसी शासक साइरस द्वितीय (महान साइरस), जो अस्टियाजेस का दौहित्र (नाती) था, ने फ़ारसी तथा असंतुष्ट मीड शक्तियों को साथ लेकर अस्टियाजेस के विरुद्ध विद्रोह किया। हेरोडोटस तथा टीसियस के विवरणों के अनुसार मीड साम्राज्य के अनेक प्रमुख सरदार अस्टियाजेस के शासन से असंतुष्ट थे और उन्होंने साइरस का खुलकर समर्थन किया। अंततः लगभग 550 ईसा पूर्व में साइरस ने अस्टियाजेस को पराजित कर एकबताना पर अधिकार कर लिया तथा उसे बंदी बना लिया। इसके साथ ही मीडिया का स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व सदैव के लिए समाप्त हो गया और उसका संपूर्ण राज्य हख़ामनी साम्राज्य में विलीन हो गया।
यह घटना केवल एक सैन्य विजय नहीं थी, बल्कि एक राजवंशीय परिवर्तन भी थी, क्योंकि साइरस ने मीड प्रशासन, सेना तथा अधिकारियों को बड़े पैमाने पर यथावत बनाए रखा और मीड कुलीन वर्ग के साथ अत्यंत उदार व्यवहार किया। इस प्रकार उसने मीड शक्ति को नष्ट करने के स्थान पर उसे अपने साम्राज्य-विस्तार का सुदृढ़ आधार बनाया, जिससे उसे विशाल सैन्य संसाधन, अनुभवी प्रशासनिक अधिकारी तथा पश्चिमी एशिया में व्यापक प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।
हख़ामनी साम्राज्य पर मीड सांस्कृतिक प्रभाव
यद्यपि अस्टियाजेस की पराजय के साथ मीडिया का स्वतंत्र राज्य समाप्त हो गया, तथापि उसकी सांस्कृतिक परंपराओं का हख़ामनी फ़ारसी साम्राज्य पर गहरा और स्थायी प्रभाव पड़ा। फ़ारसी शासकों ने मीड प्रशासनिक परंपराओं, दरबारी रीति-रिवाजों, सैन्य संगठन तथा राजकीय संस्थाओं को बड़े पैमाने पर आत्मसात किया। वस्त्र-विन्यास, दरबारी समारोह, स्तंभयुक्त वास्तुकला, घुड़सवार सेना का संगठन तथा अनेक प्रशासनिक व्यवस्थाएँ मूलतः मीड परंपरा से ही विकसित हुईं। इस प्रकार राजनीतिक रूप से विलीन हो जाने के बावजूद मीडों की सांस्कृतिक विरासत हख़ामनी फ़ारसी सभ्यता का एक अभिन्न और स्थायी अंग बनी रही।
हख़ामनी वंश की उत्पत्ति
हखामनिष से कैंबिसीज प्रथम तक
ईरानी आर्यों की विभिन्न शाखाओं में फ़ारसी (पर्शियन) शाखा ने सर्वाधिक ऐतिहासिक प्रसिद्धि प्राप्त की। जिस काल में उत्तर-पश्चिमी ईरान में मीड अपनी राजनीतिक शक्ति का विस्तार कर रहे थे, उसी समय दक्षिण-पश्चिमी ईरान के पार्सा (फार्स) तथा अंशान क्षेत्र में फ़ारसी जनजातियाँ भी संगठित हो रही थीं। इन जनजातियों में पासारगादे कुल का हख़ामनी (आकेमेनिड) वंश सर्वाधिक प्रतिष्ठित था, जिसने आगे चलकर विश्व के महानतम साम्राज्यों में से एक की स्थापना की।
प्रारंभिक काल में फ़ारसी शासक एलाम की अधीनता स्वीकार करते थे, किंतु सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व में एलाम की शक्ति के पतन का लाभ उठाकर उन्होंने स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। परंपरा के अनुसार इस राज्य का संस्थापक हखामनिष (एकेमनीज़) था। दारा प्रथम के बेहिस्तून अभिलेख में उसे हख़ामनी वंश का आदिपुरुष बताया गया है। यद्यपि हखामनिष के जीवन के संबंध में प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण बहुत कम हैं और कुछ आधुनिक इतिहासकार उसके व्यक्तित्व को अर्द्ध-ऐतिहासिक मानते हैं, तथापि हख़ामनी राजवंश स्वयं उसे अपना संस्थापक मानता था।
हखामनिष के पश्चात उसका पुत्र तीस्पीज या चिशपिश (लगभग 675–640 ई. पू.) गद्दी पर आसीन हुआ। उसने एलाम की प्रभुता से पूर्ण मुक्ति प्राप्त कर अंशान क्षेत्र पर अधिकार स्थापित किया और फ़ारसी शक्ति को सुदृढ़ किया। हेरोडोटस के अनुसार उस समय तक फ़ारसी शासकों को कभी-कभी मीडों की अधीनता भी स्वीकार करनी पड़ती थी, किंतु तीस्पीज ने धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्र स्थिति सुदृढ़ कर ली।

वंश-विभाजन और पुनर्मिलन
तीस्पीज की मृत्यु के पश्चात उसका राज्य उसके दो पुत्रों के मध्य विभाजित कर दिया गया- बड़े पुत्र साइरस प्रथम (कुरुष प्रथम) को अंशान तथा पार्सुमश का शासन प्राप्त हुआ, जबकि दूसरे पुत्र अरियाराम्नेस (अरियम्नीज़) को फ़ार्स (पार्सा) का भाग मिला। यह विभाजन अधिक समय तक स्थायी नहीं रह सका। साइरस प्रथम के पश्चात उसका पुत्र कैंबिसीज प्रथम (कंबुजिय) शासक बना, जिसने अरियाराम्नेस के उत्तराधिकारी अर्सामेस को अधीनस्थ बनाकर दोनों शाखाओं का पुनः एकीकरण कर दिया, यद्यपि अर्सामेस तथा उसके वंशजों को स्थानीय शासक के रूप में शासन करते रहने की अनुमति दी गई।
कैंबिसीज प्रथम के काल में फ़ारसी राज्य की प्रतिष्ठा इतनी अधिक बढ़ गई कि मीड सम्राट अस्टियाजेस (इश्तुवेग) ने अपनी पुत्री मांडाने का विवाह उसके साथ संपन्न किया। इस वैवाहिक संबंध ने मीड तथा फ़ारसी राजवंशों के बीच घनिष्ठ राजनीतिक निकटता स्थापित की और इसी विवाह से जन्मे पुत्र साइरस द्वितीय (महान साइरस) ने आगे चलकर हख़ामनी साम्राज्य की वास्तविक और स्थायी स्थापना की। इस वंश का नाम इसके आदिपुरुष हखामनिष के नाम पर पड़ा और प्रारंभिक काल में एलाम तथा मीड शक्तियों के अधीन रहने के बावजूद इस वैवाहिक संबंध ने वंश की राजनीतिक प्रतिष्ठा को और अधिक सुदृढ़ किया, जिससे आगे चलकर फ़ारसी और मीड शक्तियों के एकीकरण की पृष्ठभूमि तैयार हुई।
साइरस द्वितीय : महान साइरस (559–530 ई. पू.)
सिंहासनारोहण और मीडिया विजय
कैंबिसीज प्रथम की मृत्यु के पश्चात 559 ईसा पूर्व में उसका पुत्र साइरस द्वितीय हख़ामनी साम्राज्य के सिंहासन पर बैठा, जिसे इतिहास में साइरस महान के नाम से जाना जाता है। सत्ता ग्रहण करते समय उसके अधीन केवल फ़ार्स और अंशान जैसे अपेक्षाकृत सीमित क्षेत्र थे, जबकि उस समय मीड साम्राज्य पश्चिमी एशिया की सबसे बड़ी शक्ति था। किंतु अपनी अद्वितीय सैन्य क्षमता, राजनीतिक कुशलता तथा असाधारण नेतृत्व-क्षमता के बल पर उसने अत्यंत शीघ्रता से मीडों को पराजित कर उनकी संपूर्ण शक्ति अपने अधीन कर ली और इस विजय ने साइरस को पश्चिमी एशिया की राजनीति में एक निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया।
लीडिया विजय: क्रॉयसस की पराजय
मीडिया पर अधिकार स्थापित करने के बाद साइरस का सामना एशिया माइनर के समृद्ध राज्य लीडिया से हुआ, जिसका शासक क्रॉयसस (क्रोइसस) अपनी अपार संपत्ति तथा सामरिक शक्ति के लिए प्रसिद्ध था और जिसकी राजधानी सार्डिस व्यापार तथा स्वर्ण-संपदा के कारण अत्यंत समृद्ध थी। अस्टियाजेस के पतन से भयभीत क्रॉयसस ने साइरस की बढ़ती शक्ति को रोकने के उद्देश्य से युद्ध की तैयारी की और इस संबंध में डेल्फी के प्रसिद्ध देववाणी-स्थल से परामर्श भी लिया। परंपरा के अनुसार उसे यह उत्तर मिला कि यदि वह हैलिस नदी पार करेगा तो एक महान साम्राज्य का विनाश होगा। क्रॉयसस ने इसे फ़ारसी साम्राज्य के विनाश का संकेत समझ लिया, जबकि वास्तविकता में यह भविष्यवाणी स्वयं उसी के राज्य पर लागू हुई।
लगभग 547–546 ईसा पूर्व में क्रॉयसस ने हैलिस नदी पार कर कप्पाडोसिया पर आक्रमण किया। साइरस ने तत्काल अपनी सेना लेकर उसका सामना किया। प्रारंभिक युद्ध अनिर्णीत रहा, किंतु क्रॉयसस शीतकाल के लिए अपनी राजधानी लौट गया और यह आशा की कि अगले वर्ष तक उसके सहयोगी- मिस्र, स्पार्टा तथा बेबीलोन उसकी सहायता के लिए आ जाएँगे। किंतु साइरस ने उसे यह अवसर नहीं दिया और तीव्र गति से आगे बढ़ते हुए वह सीधे सार्डिस पहुँच गया। निर्णायक युद्ध में साइरस ने अपनी सेना के अग्रभाग में ऊँटों को खड़ा किया। ऊँटों की गंध तथा असामान्य स्वर से लीडिया के प्रसिद्ध घोड़े भयभीत हो गए, जिससे क्रॉयसस की घुड़सवार सेना का संगठन पूरी तरह टूट गया और इसका लाभ उठाकर फ़ारसी सेना ने लीडियन सेना को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। शीघ्र ही सार्डिस पर अधिकार कर लिया गया (546 ई. पू.) और लीडिया का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया।
क्रॉयसस के भाग्य के विषय में प्राचीन स्रोतों में परस्पर विरोधी विवरण मिलते हैं। हेरोडोटस के अनुसार साइरस ने उसे चिता पर रखवाने का आदेश तो दिया, किंतु जब क्रॉयसस ने एथेंस के विधिनिर्माता सोलन की शिक्षा का स्मरण कर तीन बार उसका नाम लिया और साइरस को इसका कारण ज्ञात हुआ, तो उसने प्रभावित होकर उसे मुक्त कर दिया तथा बाद में उसने क्रॉयसस को अपना सम्मानित सलाहकार बना लिया। इसके विपरीत नाबोनिडस क्रॉनिकल तथा कुछ अक्कादी परंपराओं से संकेत मिलता है कि युद्ध के पश्चात क्रॉयसस की मृत्यु हो गई थी। जो भी हो, यह निर्विवाद है कि लीडिया की पराजय के साथ ही एशिया माइनर का अधिकांश भाग हख़ामनी साम्राज्य के अधीन आ गया।
आयोनियन यूनानी नगरों की अधीनता
लीडिया के पतन के पश्चात एशिया माइनर के तटवर्ती आयोनियन यूनानी नगर-राज्य भी फ़ारसी सत्ता के अधीन आ गए। केवल मिलेटस ने समय रहते साइरस के साथ संधि कर ली, इसलिए उसे अपेक्षाकृत अधिक स्वायत्तता प्राप्त हुई। अन्य अधिकांश नगरों ने साइरस को अपेक्षित सहायता नहीं दी थी, अतः साइरस ने अपने योग्य सेनापति हार्पागस को इन नगरों के अधिग्रहण का दायित्व सौंपा और हार्पागस ने क्रमशः सभी प्रमुख नगरों को पराजित कर उन्हें हख़ामनी साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया। इन नगरों को पूर्णतः नष्ट न करके करदाता (करद) राज्यों के रूप में संगठित किया गया और स्थानीय प्रशासन को अधिकांशतः यथावत रखा गया। उन्हें फ़ारसी साम्राज्य के प्रति निष्ठा तथा आवश्यकता पड़ने पर सैन्य सेवा देना अनिवार्य कर दिया गया, किंतु उनके व्यापार में कोई अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं किया गया, क्योंकि भूमध्यसागर के साथ होने वाला समुद्री व्यापार साम्राज्य की आर्थिक समृद्धि के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण था।
मध्य एशियाई अभियान
पश्चिमी क्षेत्रों को सुरक्षित करने के बाद साइरस ने अपना ध्यान मध्य एशिया की ओर केंद्रित किया। उसने हाइरकेनिया, पार्थिया, ड्रैन्जियाना (द्रांगियाना), एराकोशिया, मार्जियाना तथा बैक्ट्रिया जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित किया और तत्पश्चात जक्सर्तीज़ (सिर दरिया) नदी तक साम्राज्य का विस्तार करते हुए सीमा-सुरक्षा हेतु अनेक दुर्ग तथा नगर बसाए। भारत की ओर उसके अभियानों के विषय में प्राचीन स्रोतों में मतभेद है। नियार्कस तथा मेगस्थनीज़ के अनुसार साइरस ने भारत पर कोई प्रत्यक्ष आक्रमण नहीं किया, जबकि स्ट्रैबो के अनुसार उसने गेद्रोसिया (मकरान) के मार्ग से भारत की ओर एक अभियान भेजा जो कठिन प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण असफल रहा। एरियन के अनुसार सिंधु और कोफेन (काबुल) नदियों के मध्य का क्षेत्र बाद में फ़ारसी साम्राज्य के अधीन आ गया, जहाँ से साइरस को कर प्राप्त होता था। आधुनिक इतिहासकार एडवर्ड मेयर का मत है कि साइरस ने हिंदूकुश तथा काबुल घाटी तक अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था, यद्यपि गंगा घाटी अथवा भीतरी भारत पर उसके अधिकार का कोई प्रमाण नहीं मिलता है।
बेबीलोन विजय और साइरस सिलेंडर
539 ईसा पूर्व में साइरस ने पश्चिमी एशिया के सबसे समृद्ध नगर बेबीलोन पर आक्रमण किया, जहाँ उस समय नाबोनिडस शासन कर रहा था और जो जनता में अत्यंत अलोकप्रिय था। ओपिस के निकट हुए निर्णायक युद्ध में बेबीलोन की सेना पराजित हो गई और इसके पश्चात फ़ारसी सेना बिना किसी बड़े विनाश के बेबीलोन नगर में प्रविष्ट हो गई। प्रसिद्ध साइरस सिलेंडर, जो आज ब्रिटिश म्यूज़ियम में सुरक्षित है, के अनुसार बेबीलोन के अनेक निवासियों ने उसे विजेता के स्थान पर मुक्तिदाता के रूप में स्वीकार किया। साइरस ने नगर-प्रवेश के पश्चात स्थानीय देवता बेल-मार्दुक का सम्मान किया, स्वयं को उसका संरक्षक घोषित किया, बेबीलोन के मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया तथा विभिन्न धार्मिक समुदायों को व्यापक धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की।
इस विजय की सर्वाधिक प्रसिद्ध घटना साइरस द्वारा बेबीलोन में बंदी बनाकर रखे गए यहूदियों को मुक्त कर उनके पैतृक देश यहूदा (जूडिया) लौटने और यरूशलेम के मंदिर के पुनर्निर्माण की अनुमति देना तथा मंदिर-निर्माण के लिए आवश्यक सामग्री तथा सहायता उपलब्ध कराना थी। इसी उदार नीति के कारण यहूदी धार्मिक परंपरा (यशायाह) में साइरस को ‘ईश्वर का अभिषिक्त शासक’ कहा गया है। साइरस की इस उदार नीति का विस्तृत उल्लेख साइरस सिलेंडर में मिलता है, जिसे कुछ आधुनिक विद्वान मानवाधिकारों की प्रारंभिक घोषणा मानते हैं, किंतु यह तत्कालीन मेसोपोटामियाई राजकीय परंपरा के अनुरूप संभवतः एक विजय-उद्घोषणा थी।
बेबीलोन की विजय का महत्त्व केवल एक राज्य के अधिग्रहण तक सीमित नहीं था। यह विश्व इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटना थी, क्योंकि इस विजय ने लगभग डेढ़ सहस्राब्दी तक पश्चिमी एशिया के इतिहास को प्रभावित करने वाली प्राचीन मेसोपोटामियाई राजनीतिक-सांस्कृतिक परंपरा के प्रभुत्व का अंत कर दिया। इसके साथ ही सीरिया, फिनीशिया तथा बेबीलोन के अन्य अधीनस्थ पश्चिमी प्रदेश भी स्वतः हख़ामनी साम्राज्य का अंग बन गए और इस प्रकार साइरस का साम्राज्य मध्य एशिया से लेकर भूमध्यसागर तक विस्तृत हो गया, जो लगभग 55 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला उस समय का विश्व का सबसे बड़ा साम्राज्य था।
साइरस की मृत्यु
बेबीलोन विजय के पश्चात साइरस ने मिस्र-विजय की तैयारी प्रारंभ की और इस अभियान का उत्तरदायित्व अपने पुत्र कैंबिसीज द्वितीय को सौंपा, किंतु इसी बीच साम्राज्य की उत्तर-पूर्वी सीमा पर रहने वाली घुमंतू जनजातियों में विद्रोह कर दिया और साइरस को अपना ध्यान पूर्व की ओर लगाना पड़ा। उत्तर-पूर्व में साइरस का सामना मस्सागेटी नामक शक्तिशाली घुमंतू जाति से हुआ, जो कैस्पियन सागर के पूर्व तथा अराल सागर के आसपास के क्षेत्रों में निवास करती थी और जिसकी शासिका रानी टोमिरिस थी। हेरोडोटस के अनुसार प्रारंभिक संघर्ष में साइरस ने सफलता प्राप्त कर टोमिरिस के पुत्र स्पार्गापीसिस को बंदी बना लिया, जिसने बंदी बनने के पश्चात आत्महत्या कर ली। पुत्र की मृत्यु से क्रोधित होकर रानी टोमिरिस ने पुनः युद्ध किया, जिसमें फ़ारसी सेना पराजित हुई और लगभग 530 ईसा पूर्व में साइरस युद्धभूमि में मारा गया। हेरोडोटस के अनुसार विजय के पश्चात टोमिरिस ने साइरस का सिर कटवाकर रक्त से भरे पात्र में डलवा दिया। यद्यपि इस घटना की ऐतिहासिकता विवादास्पद है, फिर भी अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि साइरस की मृत्यु उत्तर-पूर्वी अभियान के दौरान युद्धभूमि में ही हुई थी। साइरस के पार्थिव शरीर को पसारगादे लाया गया, जहाँ उसका प्रसिद्ध मकबरा है।
साइरस का मूल्यांकन
साइरस द्वितीय की गणना प्राचीन विश्व के महानतम शासकों में की जाती है। वह केवल महान विजेता ही नहीं, बल्कि एक आदर्श प्रशासक और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ भी था, जिसने विभिन्न जातियों, भाषाओं तथा धर्मों को समान सम्मान देकर एक बहुसांस्कृतिक साम्राज्य की मौलिक अवधारणा प्रस्तुत की। उसकी साम्राज्य-निर्माण की क्षमता की तुलना प्रायः भारत के चंद्रगुप्त मौर्य, यूनान के सिकंदर महान तथा बेबीलोन के हम्मूराबी जैसे विश्वविख्यात शासकों से की जाती है। उसने केवल सैन्य शक्ति के बल पर ही विजय प्राप्त नहीं की, बल्कि वैवाहिक संबंधों, राजनीतिक कूटनीति तथा स्थानीय कुलीन वर्ग के सहयोग से भी अपने साम्राज्य का विस्तार किया। उसकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता उसकी धार्मिक सहिष्णुता और उदारता थी, जिसने हख़ामनी साम्राज्य को दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान की।
कैंबिसीज द्वितीय (530–522 ई. पू.)
साइरस द्वितीय की मृत्यु के पश्चात उसका ज्येष्ठ पुत्र कैंबिसीज द्वितीय हख़ामनी साम्राज्य के सिंहासन पर बैठा। वह अपने पिता के समान वीर तथा योग्य सेनानायक था, किंतु उसका स्वभाव अत्यंत कठोर, क्रोधी तथा असंतुलित था। साइरस ने अपने जीवनकाल में ही कैंबिसीज को बेबीलोन का शासक नियुक्त किया था, जबकि छोटे पुत्र स्मर्दिस (बर्दिय) को साम्राज्य के पूर्वी प्रांतों का प्रशासन सौंपा गया था। सत्ता संभालने के बाद कैंबिसीज को यह आशंका उत्पन्न हुई कि स्मर्दिस उसके विरुद्ध विद्रोह कर सकता है, अतः बेहिस्तून अभिलेख के अनुसार उसने गुप्त रूप से स्मर्दिस की हत्या करवा दी। यह घटना उसके शासनकाल की सबसे विवादास्पद घटना है, क्योंकि आगे चलकर इसी हत्या के कारण साम्राज्य को एक गंभीर उत्तराधिकार-संकट का सामना करना पड़ा। यूनानी स्रोतों के अनुसार उसने अपनी पत्नी, बहन तथा कुछ निकट संबंधियों की भी हत्या करवाई थी, किंतु हेरोडोटस द्वारा वर्णित ये कथाएँ कुछ सीमा तक अतिरंजित प्रतीत होती हैं।
मिस्र विजय
साइरस की अधूरी योजना को पूर्ण करने के उद्देश्य से कैंबिसीज ने अपना ध्यान मिस्र की ओर केंद्रित किया, जहाँ उस समय प्राचीन मिस्र के 26वें राजवंश (सैटिक राजवंश) का अंतिम शासक फ़राओ पसाम्तिक तृतीय (लगभग 526–525 ई. पू.) शासन कर रहा था। लगभग 525 ईसा पूर्व में दोनों पक्षों की सेनाओं के मध्य पेलूसियम के निकट निर्णायक युद्ध हुआ, जिसमें फ़ारसी सेना ने मिस्री सेना को पराजित कर दिया तथा पसाम्तिक तृतीय को मेम्फिस में बंदी बना लिया और बाद में उसे मार डाला गया। इसके पश्चात मिस्र की राजधानी मेम्फिस पर भी कैंबिसीज का अधिकार हो गया, जिससे संपूर्ण नील घाटी हख़ामनी साम्राज्य का हिस्सा बन गई और साम्राज्य का विस्तार अफ्रीका महाद्वीप तक फैल गया। यह विजय हख़ामनी साम्राज्य की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी, क्योंकि इससे हख़ामनी साम्राज्य भूमध्यसागर से लेकर नील नदी तक विस्तृत हो गया।
असफल अभियान : कार्थेज, अम्मोन और इथियोपिया
मिस्र विजय के पश्चात कैंबिसीज ने अपने साम्राज्य-विस्तार के लिए तीन प्रमुख सैन्य अभियान चलाया- कार्थेज, अम्मोन (सीवा मरुद्यान) तथा इथियोपिया (नूबिया) की ओर। किंतु कार्थेज के विरुद्ध अभियान प्रारंभ ही नहीं हो सका, क्योंकि फ़ारसी नौसेना का मुख्य आधार फीनीशियाई नाविक थे, और उन्होंने अपने ही उपनिवेश कार्थेज के विरुद्ध युद्ध करने से इनकार कर दिया। अम्मोन के मरुद्यान की ओर भेजी गई सेना के विषय में यूनानी स्रोतों से पता चलता है कि लगभग पचास हज़ार सैनिक रेगिस्तान में आए भीषण तूफान के कारण नष्ट हो गए। यद्यपि इस घटना का कोई पुष्ट पुरातात्त्विक प्रमाण नहीं है, फिर भी यह प्राचीन परंपराओं में प्रसिद्ध है। इथियोपिया के विरुद्ध अभियान भी लंबी दूरी, कठिन भूगोल तथा रसद-अभाव के कारण असफल रहा, जिससे फ़ारसी सेना को वापस लौटना पड़ा। इसके बावजूद लीबिया, साइरीन और बार्का के शासकों ने फ़ारसी प्रभुत्व स्वीकार कर कर देना आरंभ कर दिया, किंतु इन असफल अभियानों ने कैंबिसीज की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचाया।
गउमत का विद्रोह और कैंबिसीज की मृत्यु
मिस्री अभियानों के दौरान कैंबिसीज का अधिकांश समय राजधानी से दूर व्यतीत हुआ, जिसके कारण हख़ामनी साम्राज्य में राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हो गई। इस अवसर का लाभ उठाकर गउमत नामक एक मागी (मागुस पुरोहित) ने सत्ता पर अधिकार करने का प्रयास किया। दारा प्रथम के बेहिस्तून अभिलेख के अनुसार गउमत का चेहरा तथा व्यक्तित्व साइरस द्वितीय के छोटे पुत्र स्मर्दिस (बर्दिय) से मिलता-जुलता था, अतः उसने स्वयं को स्मर्दिस घोषित करते हुए 522 ईसा पूर्व में सिंहासन पर अधिकार कर लिया। चूँकि अधिकांश लोगों को यह ज्ञात नहीं था कि वास्तविक स्मर्दिस की हत्या पहले ही कैंबिसीज के गुप्त आदेश से की जा चुकी थी, इसलिए जनता ने गउमत को ही वास्तविक उत्तराधिकारी मान लिया। गउमत ने सत्ता प्राप्त करने के पश्चात करों में कुछ रियायतें दीं तथा सैनिकों और किसानों को आर्थिक लाभ प्रदान किए, जिसके परिणामस्वरूप कैंबिसीज के अत्याचारों से त्रस्त जनता ने उसका स्वागत किया और अनेक प्रांतों ने बिना किसी विरोध के उसकी सत्ता स्वीकार कर ली।
विद्रोह का समाचार मिलते ही कैंबिसीज तत्काल मिस्र से पारस की ओर चल पड़ा, किंतु सूसा पहुँचने से पूर्व ही मार्ग में उसकी मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के विषय में विभिन्न मत हैं — बेहिस्तून अभिलेख के अनुसार उसने आत्महत्या कर ली, हेरोडोटस के अनुसार यात्रा के दौरान उसकी स्वयं की तलवार से ही घातक चोट लग गई थी, जबकि अन्य कुछ स्रोत इसे दुर्घटना अथवा प्राकृतिक मृत्यु मानते हैं। कारण जो भी रहा हो, उसकी मृत्यु के साथ ही हख़ामनी साम्राज्य एक गंभीर उत्तराधिकार-संकट में फँस गया, जिसका समाधान अंततः दारा प्रथम के उदय के साथ हुआ।
दारा प्रथम (522–486 ई. पू.)
कैंबिसीज द्वितीय की मृत्यु के पश्चात हख़ामनी राजवंश के समक्ष उत्तराधिकार का गंभीर प्रश्न उत्पन्न हुआ। पूर्व-वर्णित विभाजन के अनुसार अरियाराम्नेस की शाखा में उसका उत्तराधिकारी हिस्टास्प (विष्टास्प) उस समय पार्थिया का गवर्नर था। सिद्धांततः वह भी राजवंश का वैध सदस्य था और स्वयं सिंहासन पर दावा कर सकता था, किंतु उसने ऐसा नहीं किया। उसके पुत्र दारा प्रथम (दारयवहुश) ने अपने बेहिस्तून अभिलेख में यह दावा किया है कि गउमत एक धोखेबाज़ था जिसने अवैध रूप से सिंहासन पर अधिकार कर लिया था और उसने स्वयं को हख़ामनी वंश का वैध उत्तराधिकारी घोषित करते हुए राजवंश की वैध सत्ता को पुनः स्थापित करने का दावा किया।
सत्ता प्राप्ति और सप्त फ़ारसी
दारा (दारयवहुश) ने ओटानेस, गोब्रियास, इंटाफेर्नेस, मेगाबाइजस, हिदार्नेस तथा अस्पाथाइन्स नामक छह प्रमुख फ़ारसी कुलीन सरदारों की सहायता से 522 ईसा पूर्व में गउमत (छद्म बर्दिय) की हत्या कर दी और दारा प्रथम को हख़ामनी साम्राज्य का सम्राट घोषित किया गया। सम्राट सहित इन सात प्रमुख व्यक्तियों को यूनानी लेखक ‘सेवन पर्शियंस’ (सप्त फ़ारसी) कहते हैं और बाइबिल के ‘बुक ऑफ एस्तेर’ में भी फ़ारसी साम्राज्य के सात प्रमुख सरदारों का उल्लेख मिलता है। सत्ता ग्रहण करने के पश्चात दारा ने अपनी राजनीतिक वैधता को सुदृढ़ करने हेतु साइरस महान की पुत्री तथा कैंबिसीज द्वितीय की बहन अतोसा से विवाह किया, जिससे उसे शाही परिवार से प्रत्यक्ष संबंध तथा फ़ारसी अभिजात वर्ग का व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ।
विद्रोहों का दमन
दारा के सिंहासनारोहण के समय साम्राज्य का अधिकांश भाग विद्रोहों की आग में जल रहा था। गउमत की मृत्यु के पश्चात बेबिलोनिया, मीडिया, एलम, असीरिया, अर्मीनिया, सगार्टिया, पार्थिया, हाइरकेनिया, बैक्ट्रिया तथा एराकोशिया सहित अनेक क्षेत्रों में विभिन्न व्यक्तियों ने स्वयं को वैध राजा घोषित कर दिया। दारा प्रथम ने अत्यंत दृढ़ता और सैन्य कौशल का परिचय देते हुए इन सभी विद्रोहों का क्रमशः दमन किया। उसके अनुसार सिंहासन ग्रहण करने के प्रारंभिक दो वर्षों में उसे उन्नीस बड़े युद्ध लड़ने पड़े और नौ विद्रोही राजाओं को पराजित करना पड़ा, जिनका विस्तृत विवरण बेहिस्तून शिलालेख में उत्कीर्ण है। सबसे कठिन विद्रोह बेबीलोन में हुआ, जहाँ लंबी घेराबंदी के पश्चात दारा ने नगर पर पुनः अधिकार स्थापित किया और यूनानी स्रोतों के अनुसार लगभग 3,000 प्रमुख बेबिलोनियाई नागरिकों को मृत्युदंड दिया गया ताकि भविष्य में कोई विद्रोह न हो। इसी प्रकार पार्थिया और हाइरकेनिया में हुए विद्रोहों को दारा के पिता हिस्टास्प ने दबाया, बैक्ट्रिया तथा एराकोशिया पर पुनः नियंत्रण स्थापित किया गया, मिस्र के क्षत्रप अर्यंडीज को पराजित कर मृत्युदंड दिया गया तथा एशिया माइनर के शक्तिशाली क्षत्रप ओरीटीज को भी दारा के समक्ष आत्मसमर्पण करना पड़ा। इन सफल अभियानों के फलस्वरूप कुछ ही वर्षों के भीतर संपूर्ण हख़ामनी साम्राज्य पुनः संगठित हो गया और दारा प्रथम की सत्ता निर्विवाद रूप से स्थापित हो गई।
यूरोप अभियान: सीथियन युद्ध
आंतरिक विद्रोहों के दमन के पश्चात दारा प्रथम ने विस्तारवादी नीति अपनाई। साइरस महान ने भूमध्यसागर के पूर्वी तट तथा कैंबिसीज द्वितीय ने दक्षिणी तट पर अधिकार स्थापित किया था, किंतु थ्रेस तथा यूरोप का उत्तर-पूर्वी भाग अभी भी साम्राज्य के बाहर था। दारा ने यह अनुभव किया कि एशिया माइनर की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यूरोप के समीपवर्ती क्षेत्रों पर भी नियंत्रण आवश्यक है। लगभग 513–512 ईसा पूर्व में दारा ने बोस्फोरस जलडमरूमध्य पार कर यूरोप पर आक्रमण किया, जो विश्व इतिहास में किसी एशियाई शक्ति द्वारा यूरोप पर किया गया प्रथम बड़ा संगठित सैन्य अभियान था। उसने लगभग 70,000 सैनिकों की विशाल सेना के साथ थ्रेस में प्रवेश किया। अनेक स्थानीय जनजातियों ने बिना युद्ध के आत्मसमर्पण कर दिया, केवल गेटी जाति ने प्रतिरोध किया जो शीघ्र ही पराजित हो गई। इसके बाद फ़ारसी सेना डैन्यूब नदी के उत्तर तक पहुँच गई और मकदूनिया (मैसीडोन) के शासक अमिंटास प्रथम ने भी दारा की अधीनता स्वीकार कर ली, जिससे हख़ामनी साम्राज्य की सीमा यूरोप में डैन्यूब नदी तक विस्तृत हो गई और यूनान के विरुद्ध भविष्य के अभियानों के लिए एक सुदृढ़ आधार तैयार हो गया।
साम्राज्य का चरम विस्तार
दारा प्रथम के शासनकाल में हख़ामनी साम्राज्य अपने चरम विस्तार पर पहुँच गया, जिसमें पारस, मीडिया, मेसोपोटामिया, मिस्र, सीरिया, फिनीशिया, फिलिस्तीन, साइप्रस, एशिया माइनर, पूर्वी एजियन द्वीप, थ्रेस, मैसीडोन, अफ़ग़ानिस्तान तथा उत्तर-पश्चिमी भारत (गांधार, पश्चिमी पंजाब, सिंध) के प्रदेश सम्मिलित थे। यह उस समय विश्व का सबसे विशाल और सुव्यवस्थित साम्राज्य था। पर्सेपोलिस तथा नक़्श-ए-रुस्तम के अभिलेखों और हेरोडोटस के विवरणों से ज्ञात होता है कि गांधार, पश्चिमी पंजाब तथा सिंध उसके साम्राज्य के अधीन थे, यद्यपि बेहिस्तून शिलालेख में भारतीय प्रदेशों का उल्लेख नहीं मिलता, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि भारत की विजय उसके शासनकाल के प्रारंभिक वर्षों के बाद संपन्न हुई होगी।
दारा प्रथम के प्रशासनिक और आर्थिक सुधार
दारा प्रथम (522–486 ई. पू.) की गणना केवल फ़ारसी इतिहास ही नहीं, अपितु प्राचीन विश्व के महानतम शासकों में की जाती है। यद्यपि हख़ामनी साम्राज्य की नींव साइरस द्वितीय ने रखी थी, परंतु उसे सुव्यवस्थित, सुदृढ़ तथा स्थायी रूप प्रदान करने का श्रेय मुख्यतः दारा प्रथम को ही प्राप्त है। उसने साम्राज्य को बीस क्षत्रपियों में विभाजित कर एक सुसंगठित प्रशासनिक ढाँचा दिया, सूसा से सार्डिस तक ‘रॉयल रोड’ (शाही राजमार्ग) का निर्माण कराया, स्वर्ण दारिक तथा रजत सिग्लोस सिक्कों की मुद्रा-प्रणाली आरंभ की तथा नील नदी को लाल सागर से जोड़ने वाली नहर बनवाई। इस प्रकार दारा प्रथम का शासनकाल हख़ामनी साम्राज्य और संपूर्ण फ़ारसी सभ्यता के चरम उत्कर्ष का युग था।
आयोनियन विद्रोह और मैराथन का युद्ध 499–493 ईसा पूर्व)
आयोनियन विद्रोह के कारण
दारा प्रथम की यूनान-विजय की योजना को मूर्त रूप देने में आयोनियन विद्रोह (499–494 ई. पू.) निर्णायक सिद्ध हुआ, जिसका आरंभ नक्सोस अभियान की असफलता से हुआ था। नक्सोस द्वीप के कुछ निष्कासित कुलीन मिलेटस के शासक अरिस्टागोरस के पास पहुँचे और सहायता की प्रार्थना की। अरिस्टागोरस ने फ़ारसी साम्राज्य के पश्चिमी क्षत्रप आर्टाफर्नेस से सहयोग माँगा और दारा की अनुमति से मेगाबेटीज़ के नेतृत्व में लगभग 200 युद्धपोतों का विशाल बेड़ा भेजा गया, किंतु अभियान के दौरान मेगाबेटीज़ और अरिस्टागोरस के मध्य मतभेद पैदा हो गए और नक्सोस अभियान पूर्णतः असफल रहा। इस असफलता से अरिस्टागोरस की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचा। अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए उसने लगभग 499 ईसा पूर्व में एशिया माइनर के आयोनियन यूनानी नगरों को फ़ारसी शासन के विरुद्ध विद्रोह के लिए प्रेरित किया और इन नगरों ने फ़ारसी समर्थित तानाशाहों (टाइरेंट) को हटाकर पुनः अपने पुराने आयोनियन संघ की स्थापना की।
सार्डिस का दहन
विद्रोहियों ने यूरोप के यूनानी नगर-राज्यों से सहायता की अपील की। स्पार्टा के राजा क्लियोमेनीज़ प्रथम ने दूरी और राजनीतिक कारणों से सहायता देने से इनकार कर दिया, किंतु एथेंस ने लगभग बीस युद्धपोत तथा इरेट्रिया ने कुछ अतिरिक्त जहाज़ भेजे, जो आगे चलकर पर्सिया और एथेंस के बीच प्रत्यक्ष संघर्ष का कारण बना। एथेंस-इरेट्रिया की सहायता से अरिस्टागोरस ने फ़ारसी प्रशासनिक केंद्र सार्डिस पर अचानक आक्रमण कर दिया। प्रारंभ में विद्रोहियों को सफलता मिली और उन्होंने नगर पर अधिकार कर लिया, किंतु दुर्ग पर नियंत्रण स्थापित करने से पूर्व ही नगर में आग लग गई, जिसमें सार्डिस का अधिकांश भाग नष्ट हो गया। सार्डिस का यह विनाश दारा प्रथम के लिए केवल सैन्य पराजय नहीं, अपितु उसकी साम्राज्यिक प्रतिष्ठा पर सीधा आघात था। नगर जलने के बाद यूनानी सेना वापस लौटने लगी, किंतु इफेसस के निकट फ़ारसी सेना ने उसका पीछा कर उसे पराजित कर दिया। इसके बाद एथेंस ने अपने सैनिक वापस बुला लिए, जबकि आयोनियन नगरों को अकेले ही संघर्ष करना पड़ा। अंततः 494 ईसा पूर्व में लाडे के समुद्री युद्ध में फ़ारसी नौसेना की निर्णायक विजय हुई, जिसके पश्चात मिलेटस सहित अधिकांश विद्रोही नगरों पर पुनः फ़ारसी नियंत्रण स्थापित हो गया और आयोनियन विद्रोह समाप्त हो गया।
आयोनियन विद्रोह, सार्डिस के दहन तथा एथेंस-इरेट्रिया की भूमिका ने दारा प्रथम को अत्यंत क्रोधित कर दिया और उसने निश्चय किया कि इस अपराध का कठोर दंड दिया जाएगा। हेरोडोटस के अनुसार दारा ने अपने एक सेवक को आदेश दिया कि वह प्रतिदिन भोजन के समय तीन बार उसे स्मरण कराए : “महाराज! एथेंसवासियों को याद रखिए,” जिससे पता चलता है कि दारा एथेंस को दंडित करने के अपने संकल्प को कभी नहीं भूला।
492 ईसा पूर्व में दारा ने एथेंस के विरुद्ध अपने दामाद मर्दोनियस के नेतृत्व में एक विशाल स्थल-नौसैनिक सेना भेजी, जो प्रथम फ़ारसी अभियान था। मर्दोनियस ने पहले थ्रेस पर पुनः अधिकार स्थापित किया और मेसीडोन को भी अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया, किंतु जब उसकी नौसेना दक्षिण की ओर बढ़ रही थी, माउंट एथोस के निकट आए भीषण समुद्री तूफान में फ़ारसी बेड़े के अनेक जहाज़ नष्ट हो गए और स्थल सेना को भी थ्रेस की जनजातियों से क्षति पहुँची, जिसके कारण अभियान अधूरा छोड़कर वापस लौटना पड़ा।
मैराथन का युद्ध (490 ई. पू.)
दारा प्रथम का वास्तविक उद्देश्य एथेंस और इरेट्रिया को दंडित करना था, क्योंकि उन्होंने आयोनियन विद्रोह में सक्रिय सहायता दी थी और साथ ही एथेंस का निष्कासित शासक हिप्पियस भी फ़ारसी दरबार में रहकर यूनान पर आक्रमण के लिए निरंतर प्रेरित कर रहा था। दारा ने यूनानी नगर-राज्यों के पास दूत भेजकर ‘भूमि और जल’ की माँग की, जो फ़ारसी प्रभुता स्वीकार करने का प्रतीक था। थीब्स, आर्गोस तथा एजिना जैसे अनेक नगर-राज्यों ने माँग स्वीकार कर ली, किंतु स्पार्टा और एथेंस ने स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया। 490 ईसा पूर्व में दारा ने दातिस तथा आर्टाफर्नेस के नेतृत्व में द्वितीय अभियान भेजा, जिसमें हिप्पियस भी सम्मिलित था। फ़ारसी सेना ने पहले नक्सोस तथा अन्य साइक्लेडीज़ द्वीपों पर अपना अधिकार स्थापित किया। इसके पश्चात् उसने इरेट्रिया पर आक्रमण किया और उसे पूर्णतः पराजित कर लूट लिया तथा नगर को जला दिया। इरेट्रिया के निवासियों को बंदी बनाकर एशिया भेज दिया गया। इस प्रकार सार्डिस के अग्निकांड का प्रतिशोध लिया गया।
इरेट्रिया को नष्ट करने के बाद फ़ारसी सेना ने समुद्री मार्ग से एटिका की ओर प्रयाण किया और एथेंस के उत्तर-पूर्व में स्थित मैराथन के मैदान में पहुँच गई। इस स्थान के चयन में एथेनियाई अत्याचारी हिप्पियास की सलाह की भी भूमिका थी, जो फ़ारसी सेना के साथ था और एथेंस में पुनः अपनी सत्ता स्थापित करना चाहता था। एथेंस ने तुरंत अपनी लगभग 10,000 की सेना मैराथन भेजी और स्पार्टा से सहायता माँगी। स्पार्टा धार्मिक उत्सव कार्निया के कारण तत्काल सेना नहीं भेज सका, किंतु प्लेटाइआ ने तुरंत 1,000 हॉपलाइट सैनिक एथेंस की सहायता के लिए भेज दी। दूसरी ओर फ़ारसी सेना की संख्या प्राचीन स्रोतों में 30,000 से 100,000 तक भिन्न-भिन्न बताई गई है, जबकि आधुनिक इतिहासकार सामान्यतः इसे 20,000–30,000 के बीच मानते हैं। एथेनियन सेनापति मिल्टियाडीज़ ने कुशल रणनीति अपनाते हुए अपनी सेना के दोनों पंखों को सुदृढ़ रखा और मध्य भाग को अपेक्षाकृत हल्का बनाया। जब फ़ारसी सेना मध्य भाग में आगे बढ़ी, तब यूनानी सैनिकों ने दोनों ओर से उसे घेर लिया। भारी कवचधारी यूनानी हॉप्लाइट सैनिक फ़ारसी हल्के पैदल सैनिकों पर भारी पड़े और अंततः फ़ारसी सेना को पराजित होकर पीछे हटना पड़ा। हेरोडोटस के अनुसार इस युद्ध में लगभग 6,400 फ़ारसी सैनिक मारे गए, जबकि केवल 192 एथेनियन सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। यद्यपि प्राचीन स्रोतों में संख्याओं में अतिशयोक्ति हो सकती है, तथापि यह निर्विवाद है कि मैराथन का युद्ध (490 ई. पू.) यूनान की निर्णायक विजय के साथ समाप्त हुआ।
मैराथन का युद्ध विश्व इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि एक अनुशासित और प्रेरित नागरिक-सेना किसी भी विशाल साम्राज्य की सेना को पराजित कर सकती है। यदि दारा प्रथम इस युद्ध में सफल हो जाता, तो संभवतः यूनानी नगर-राज्यों की स्वतंत्र राजनीतिक व्यवस्था समाप्त हो जाती और यूरोप के इतिहास की दिशा ही बदल जाती। इस विजय ने यूनानी आत्मविश्वास को अत्यधिक बढ़ा दिया, जिससे आगे चलकर सलामिस और प्लाटिया जैसी भावी विजयों का मार्ग प्रशस्त हुआ। परवर्ती यूनानी परंपरा में इस युद्ध से जुड़ी एक प्रसिद्ध किंवदंती है कि धावक फ़िडिपिडीज़ ने विजय का समाचार देने के लिए मैराथन से एथेंस तक दौड़ लगाई, जिसकी स्मृति में आधुनिक ओलंपिक खेलों में ‘मैराथन दौड़’ की शुरुआत हुई, यद्यपि इस कथा की ऐतिहासिकता संदिग्ध है।
दारा प्रथम की मृत्यु
मैराथन की पराजय से दारा प्रथम की प्रतिष्ठा को आघात अवश्य पहुँचा, किंतु उसने इसे अंतिम असफलता न मानते हुए यूनान पर एक अधिक व्यापक आक्रमण की तैयारी प्रारंभ कर दी। किंतु इसी बीच मिस्र में विद्रोह भड़क उठा, जिसके कारण दारा प्रथम को अपना ध्यान यूनान से हटाकर मिस्र की ओर केंद्रित करना पड़ा। वह मिस्र के विरुद्ध निर्णायक अभियान प्रारंभ ही कर रहा था कि 486 ईसा पूर्व में उसकी मृत्यु हो गई। फलतः यूनान पर द्वितीय विशाल फ़ारसी आक्रमण उसके उत्तराधिकारी क्षयार्ष प्रथम (ज़र्क्सीज़) के शासनकाल में हुआ।
क्षयार्ष प्रथम/ज़र्क्सीज़ (486–465 ई. पू.)
आंतरिक विद्रोहों का दमन
दारा प्रथम की मृत्यु के पश्चात उसकी रानी अतोसा से उत्पन्न पुत्र क्षयार्ष प्रथम (ज़र्क्सीज़) हख़ामनी साम्राज्य के सिंहासन पर बैठा। वह योग्य, साहसी तथा कुशल प्रशासक था, किंतु विलासप्रिय तथा संभवतः कठोर स्वभाव का भी था। उसके शासन के आरंभिक वर्षों में साम्राज्य को अनेक आंतरिक विद्रोहों का सामना करना पड़ा, जिनका सफलतापूर्वक दमन कर उसने अपनी सत्ता को सुदृढ़ किया।
क्षयार्ष के शासनारंभ के समय मिस्र में विद्रोह भड़क उठा और दारा प्रथम की मृत्यु से उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर वहाँ के विद्रोहियों ने स्वतंत्रता प्राप्त करने का प्रयास किया, किंतु क्षयार्ष ने शीघ्र ही सैन्य अभियान चलाकर विद्रोह का दमन कर मिस्र पर पुनः हख़ामनी प्रभुत्व स्थापित किया। मिस्र के शांत होते ही लगभग 482 ईसा पूर्व में बेबीलोन में भी विद्रोह हुआ, जिसे क्षयार्ष ने कठोर नीति अपनाते हुए कुचल दिया। परंपरागत विवरणों के अनुसार उसने बेबीलोन के प्रमुख मंदिरों को क्षति पहुँचाई तथा एसागिला मंदिर में स्थापित बेल-मार्दुक की स्वर्ण प्रतिमा को हटवा दिया। मंदिर-विध्वंस की घटना के बाद क्षयार्ष ने ‘बेबीलोन का राजा’ जैसी पारंपरिक उपाधि का प्रयोग करना बंद कर दिया और स्वयं को केवल ‘फ़ारस और मीडिया का राजा’ कहलवाना शुरू किया। इस प्रकार उसने बेबीलोन की विशिष्ट सांस्कृतिक-धार्मिक स्वायत्तता को समाप्त कर उसे एक सामान्य प्रांत का दर्जा दे दिया।
द्वितीय यूनान अभियान (480-479 ई. पू.)
यद्यपि क्षयार्ष स्वयं प्रारंभ में यूनान के विरुद्ध युद्ध के पक्ष में नहीं था, किंतु फ़ारसी दरबार के युद्ध-समर्थक वर्ग तथा एथेंस से निष्कासित यूनानी नेताओं के प्रभाव से उसने अपने पिता दारा प्रथम की अधूरी योजना पूरी करने का निश्चय किया। उसका उद्देश्य केवल एथेंस और स्पार्टा को दंडित करना ही नहीं, बल्कि संपूर्ण यूनान को हख़ामनी साम्राज्य के अधीन लाना भी था। यूनान अभियान हेतु विशाल थल तथा नौसेना का संगठन किया गया, जिसमें साम्राज्य के अनेक प्रांतों तथा अधीनस्थ जातियों के सैनिक सम्मिलित थे। हेरोडोटस ने सैनिकों की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर (लगभग 20-25 लाख) बताई है, जबकि आधुनिक इतिहासकार लगभग दो से तीन लाख सैनिकों का अनुमान युक्तिसंगत मानते हैं। इस विशाल सेना को यूरोप ले जाने के लिए हेलिसपॉन्ट पर नावों के दो पुल बनाए गए। हेरोडोटस के अनुसार पहली बार तूफान ने पुल तोड़ दिया था, जिसके पश्चात क्षयार्ष ने और अधिक मज़बूत पुल बनवाए।
थर्मोपाइले का युद्ध (अगस्त 480 ई.पू.)
क्षयार्ष की विशाल सेना ने हेलिसपॉन्ट पार कर यूनान की ओर प्रयाण किया। उसके बढ़ते ही थेसली और मेसीडोन सहित अनेक उत्तरी यूनानी राज्यों ने बिना विशेष प्रतिरोध के अधीनता स्वीकार कर ली। इसके पश्चात फ़ारसी सेना दक्षिण की ओर बढ़ी; यूनानियों ने आक्रमणकारियों को रोकने हेतु थर्मोपाइले के संकरे दर्रे पर मोर्चा संभाला, जहाँ स्पार्टा के राजा लियोनिदास के नेतृत्व में यूनानियों ने असाधारण वीरता का प्रदर्शन किया, किंतु इफ़िआल्टीज़ नामक एक स्थानीय व्यक्ति द्वारा गुप्त पर्वतीय मार्ग बताए जाने के बाद फ़ारसी सेना ने दर्रे को घेर लिया और अंततः उस पर अधिकार कर लिया।
सलामिस का नौसैनिक युद्ध (सितंबर 480 ई.पू.)
थर्मोपाइले के पतन के बाद फ़ारसी सेना ने एथेंस अधिकार नगर को जला दिया। किंतु युद्ध का परिणाम शीघ्र ही बदल गया। एथेनियाई नौसेनापति थेमिस्टोक्लीज़ की रणनीति के अनुसार यूनानी नौसेना ने 480 ई. पूर्व में सलामिस की संकरी खाड़ी में फ़ारसी नौसेना को फँसाकर निर्णायक रूप से पराजित किया। इस युद्ध में पराजय के बाद शेष अभियान की ज़िम्मेदारी अपने सेनापति मार्डोनियस को सौंपकर क्षयार्ष स्वयं फ़ारस लौट गया।
प्लेटाइआ का युद्ध (अगस्त 479 ई. पू.)
इसके बाद अगस्त 479 ई. पू. में स्पार्टा के सेनापति पॉसानियास के नेतृत्व में यूनानी नगर-राज्यों की संयुक्त सेना ने बोईओतिया का प्लेटाइआ में मार्डोनियस की फ़ारसी सेना का सामना किया। इस युद्ध में मार्डोनियस मारा गया और फ़ारसी स्थल-सेना पूर्णतः पराजित हुई। यह यूनान की धरती पर फ़ारसी सैन्य उपस्थिति का प्रभावी अंत था।
माइकेले का युद्ध (अगस्त 479 ई. पू.)
संभवतः प्लेटाइआ के युद्ध के दिन ही एशिया माइनर के पश्चिमी तट पर आयोनिया क्षेत्र के माइकेले में तैनात फ़ारसी बेड़े तथा स्थल-सेना पर यूनानी सेना ने आक्रमण किया और फ़ारसी सेना को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। इस विजय के बाद आयोनिया के यूनानी नगरों में फ़ारसी शासन के विरुद्ध विद्रोह पुनः तीव्र हो गया और कई नगर फ़ारसी नियंत्रण से मुक्त हो गए।
इस प्रकार द्वितीय यूनानी-फ़ारसी युद्ध में क्रमिक पराजयों ने फ़ारसी हख़ामनी साम्राज्य की यूरोप-विस्तार महत्त्वाकांक्षा को स्थायी रूप से रोक दिया और क्षयार्ष का यूनान को पूर्णतः जीतने का स्वप्न सदैव के लिए टूट गया।
हत्या और उत्तराधिकार
यूनान-अभियान की विफलता के बाद क्षयार्ष ने अपना अधिकांश समय साम्राज्य के आंतरिक प्रशासन तथा निर्माण-कार्यों में लगाया। उसने पर्सेपोलिस सहित अनेक राजकीय भवनों का विस्तार करवाया, जिनमें प्रसिद्ध ‘सभी राष्ट्रों का द्वार’ (गेट ऑफ ऑल नेशंस) भी सम्मिलित था। परंतु यूनान में मिली असफलता के कारण उसकी प्रतिष्ठा पूर्ववत् नहीं रह सकी और दरबार में षड्यंत्र बढ़ने लगे। अंततः 465 ईसा पूर्व में उसके प्रधान अंगरक्षक अर्तबानस ने उसकी हत्या कर दी।
उत्तरकालीन हख़ामनी शासक
अर्तक्षत्र (465–424 ई. पू.)
क्षयार्ष की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र अर्तक्षत्र प्रथम (आर्टाज़र्क्सीज़ प्रथम) सिंहासन पर बैठा। उसके शासनारंभ में ही उसके भाई हिस्तास्पेस, जो बैक्ट्रिया का शासक था, ने विद्रोह कर दिया। अर्तक्षत्र ने इस विद्रोह का सफलतापूर्वक दमन किया तथा राजवंश के अन्य संभावित प्रतिद्वंद्वियों को समाप्त कर अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली। इसके पश्चात उसे मिस्र में पुनः विद्रोह का सामना करना पड़ा, जिसे उसने यूनान-समर्थित विद्रोहियों को पराजित कर नील डेल्टा पर पुनः फ़ारसी अधिकार स्थापित करते हुए दबा दिया। उसने यूनानी राज्यों के साथ कैलियस की संधि (लगभग 449 ई. पू.) के माध्यम से लंबे संघर्षों को औपचारिक रूप से समाप्त किया, जिसके अंतर्गत एशिया माइनर के यूनानी नगरों की स्वायत्तता स्वीकार करने के बदले एथेंस ने भी फ़ारसी क्षेत्रों में हस्तक्षेप न करने का आश्वासन दिया। यद्यपि उसने साम्राज्य की एकता बनाए रखी, फिर भी उसके शासनकाल में हख़ामनी साम्राज्य का कोई विशेष विस्तार नहीं हुआ। 424 ईसा पूर्व में उसकी मृत्यु हो गई।
दारा द्वितीय और उत्तराधिकार-संघर्ष (423–404 ई. पू.)
अर्तक्षत्र प्रथम की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार को लेकर राजवंश में संघर्ष प्रारंभ हो गया। पहले क्षयार्ष द्वितीय/ज़र्क्सीज़ द्वितीय (424 ई. पू.) शासक बना, किंतु 45 दिन बाद उसके सौतेले भाई सोग्डियनस ने उसकी हत्या कर सिंहासन पर अधिकार कर लिया। सोग्डियनस भी अधिक समय तक शासन नहीं कर सका, क्योंकि उसके भाई दारा द्वितीय नोथस (ओकस) ने लगभग छह माह बाद उसे पराजित कर राजगद्दी हथिया ली और अपनी वैधता सुदृढ़ करने के उद्देश्य से दारा द्वितीय (दारयवहुश द्वितीय) की उपाधि धारण की। परंपरा के अनुसार सोग्डियनस को राख में दबाकर मार डाला गया, जो संभवतः राजरक्त बहाए बिना मृत्युदंड देने की धार्मिक परंपरा से जुड़ी थी।
दारा द्वितीय के शासनकाल में मिस्र और लीडिया में विद्रोह हुए, जिनका उसने सफलतापूर्वक दमन किया, यद्यपि सीरिया की अशांति को पूर्णतः नियंत्रित नहीं किया जा सका। यह काल यूनान के पेलोपोनेसियन युद्ध का अंतिम चरण था और दारा द्वितीय ने स्पार्टा का समर्थन कर एथेंस के विरुद्ध नीति अपनाई, जिसके परिणामस्वरूप फ़ारसी साम्राज्य ने एशिया माइनर के यूनानी नगरों पर पुनः अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। दारा द्वितीय की मृत्यु 404 ईसा पूर्व में हुई, जिसके पश्चात उसका ज्येष्ठ पुत्र अर्तक्षत्र द्वितीय सिंहासन पर आरूढ़ हुआ।
अर्तक्षत्र द्वितीय (404–358 ई. पू.)
साइरस कनिष्ठ का विद्रोह
अर्तक्षत्र द्वितीय ने दीर्घकाल तक शासन किया, किंतु उसका शासनकाल गृहकलह, उत्तराधिकार-संघर्ष तथा प्रांतीय विद्रोहों से निरंतर प्रभावित रहा। अर्तक्षत्र के शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना उसके छोटे भाई साइरस कनिष्ठ का विद्रोह था। साइरस कनिष्ठ एक अत्यंत योग्य, साहसी तथा महत्त्वाकांक्षी राजकुमार था, जिसमें साइरस द्वितीय और दारा प्रथम जैसे महान शासकों के अनेक गुण विद्यमान थे। उसकी माता पेरिसातिस भी उसे ही राजगद्दी पर देखना चाहती थी, परिणामस्वरूप उसने अर्तक्षत्र द्वितीय के विरुद्ध षड्यंत्र रचना प्रारंभ किया। विद्रोह की आशंका होने पर अर्तक्षत्र ने उसे एशिया माइनर का शासन सौंप दिया तथा उसकी गतिविधियों पर दृष्टि रखने के लिए तिस्साफर्नीस को नियुक्त किया, किंतु साइरस ने अपने उद्देश्य का परित्याग नहीं किया। उसने एशिया माइनर के संसाधनों का उपयोग करते हुए एक बड़ी सेना संगठित की, जिसमें लगभग दस हज़ार यूनानी भाड़े के सैनिक भी सम्मिलित थे। साइरस द्वितीय अपनी सेना के साथ सूसा की ओर बढ़ा ताकि अर्तक्षत्र को पराजित कर स्वयं सम्राट बन सके। 401 ईसा पूर्व में कुनाक्सा के मैदान में दोनों भाइयों की सेनाओं के मध्य निर्णायक युद्ध हुआ। युद्ध के प्रारंभिक चरण में साइरस कनिष्ठ की सेना को सफलता मिली और उसने समझ लिया कि यदि वह सीधे अपने भाई को मार गिराए तो युद्ध तत्काल समाप्त हो जाएगा। इसी उद्देश्य से वह अर्तक्षत्र की ओर बढ़ा और उसे घायल भी कर दिया, किंतु इस साहसिक प्रयास में वह स्वयं गंभीर रूप से घायल होकर युद्धभूमि में मारा गया। उसकी मृत्यु के साथ ही विद्रोह समाप्त हो गया। उसकी सेना का अधिकांश भाग या तो नष्ट हो गया अथवा बंदी बना लिया गया, केवल लगभग दस हज़ार यूनानी सैनिक सुरक्षित रूप से एशिया माइनर लौट सके। इस घटना का वर्णन यूनानी सेनानायक ज़ेनोफ़न ने अपनी कृति ‘एनाबेसिस’ में किया है, जिसे इतिहास में ‘दस हज़ार का प्रत्यावर्तन’ के नाम से जाना जाता है।
कुनाक्सा युद्ध के पश्चात अर्तक्षत्र द्वितीय ने साम्राज्य पर अपना नियंत्रण पुनः स्थापित कर लिया और दीर्घकाल तक शासन किया, किंतु उसके शासन के अंतिम वर्षों में उत्तराधिकार का प्रश्न पुनः संकट का कारण बना। उसके ज्येष्ठ पुत्र दारियस ने उसके विरुद्ध षड्यंत्र किया, जिसका पता चलने पर उसे मृत्युदंड दे दिया गया। इसके बाद उसके दूसरे पुत्र अर्तक्षत्र तृतीय (ओकस) की महत्त्वाकांक्षाएँ भी स्पष्ट होने लगीं। वृद्ध सम्राट अपने ही परिवार के षड्यंत्रों से अत्यंत दुःखी हो गया और अंततः 358 ईसा पूर्व में उसकी मृत्यु हो गई।
अर्तक्षत्र तृतीय ‘ओकस’ (358–338 ई. पू.)
अर्तक्षत्र द्वितीय की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अर्तक्षत्र तृतीय ओकस सिंहासन पर बैठा। वह अत्यंत कठोर, महत्त्वाकांक्षी तथा शक्तिशाली शासक था, जिसने शासन के प्रारंभ में ही अपने अनेक भाइयों तथा संभावित प्रतिद्वंद्वियों का वध कराकर राजसत्ता को सुरक्षित कर लिया। उसने साम्राज्य में फैले विद्रोहों का कठोरता से दमन किया तथा मिस्र, जो कुछ समय के लिए स्वतंत्र हो गया था, पर पुनः हख़ामनी अधिकार स्थापित किया। उसके शासनकाल में साम्राज्य की शक्ति कुछ समय के लिए पुनर्जीवित हुई, किंतु दरबारी षड्यंत्र समाप्त नहीं हुए। 338 ईसा पूर्व में उसके प्रभावशाली किन्नर महामंत्री बागोस ने उसे विष देकर मृत्यु के घाट उतार दिया, ताकि सिंहासन पर एक ऐसे कमज़ोर शासक को बिठाया जा सके जिसके माध्यम से वह स्वयं वास्तविक सत्ता का संचालन कर सके।
आर्सेस (338–336 ई. पू.) और दारा तृतीय (336–330 ई. पू.)
अर्तक्षत्र तृतीय की मृत्यु के पश्चात उसके पुत्र आर्सेस को महामंत्री बागोस ने सिंहासन पर बैठाया, अत्यंत युवा और अनुभवहीन था। प्रारंभ में उसने बागोस के इशारों पर शासन किया और वास्तविक सत्ता बागोस के हाथों में रही। बागोस ने पहले आर्सेस के भाइयों की हत्या करवा दी ताकि भविष्य में कोई प्रतिद्वंद्वी न बचे। परंतु जब आर्सेस ने स्वतंत्र रूप से सत्ता संचालित करने और बागोस के प्रभाव से मुक्त होने का प्रयास किया, तो बागोस ने 336 ईसा पूर्व में आर्सेस और उसके छोटे बच्चों की भी हत्या करवा दी। इसके बाद उसने हख़ामनी वंश की एक दूरस्थ शाखा के एक सदस्य कोडोमानस को सिंहासन पर बैठाया, जिसने दारा तृतीय की उपाधि धारण की। यही वह अंतिम हख़ामनी सम्राट था जिसे कुछ ही वर्षों बाद सिकंदर महान के आक्रमण का सामना करना पड़ा और जिसके साथ ही 330 ईसा पूर्व में हख़ामनी साम्राज्य का अंत हुआ। उल्लेखनीय है कि दारा तृतीय ने बाद में स्वयं बागोस को मरवा दिया, जब उसने संदेह हुआ कि बागोस उसे भी विष देने की योजना बना रहा है।
दारा तृतीय हख़ामनी वंश का अंतिम सम्राट था। उसके राज्यारोहण के समय साम्राज्य आंतरिक षड्यंत्रों, प्रांतीय विद्रोहों तथा प्रशासनिक शिथिलता से अत्यंत दुर्बल हो चुका था। यद्यपि वह साहसी, विनम्र तथा अनुभवी शासक था। पूर्व में वह अर्मीनिया का क्षत्रप रह चुका था तथा अनेक विद्रोहों का सफलतापूर्वक दमन कर चुका था। किंतु परिस्थितियाँ उसके अनुकूल नहीं थीं, क्योंकि उसके सामने मैसीडोनिया के उदीयमान शासक सिकंदर महान जैसी असाधारण चुनौती उपस्थित थी।
सिकंदर महान का आक्रमण
336 ईसा पूर्व में फिलिप द्वितीय की हत्या के बाद उसका पुत्र सिकंदर मैसीडोनिया का शासक बना। यूनानी नगर-राज्यों को संगठित कर उसने फ़ारसी साम्राज्य पर आक्रमण की योजना बनाई और 334 ईसा पूर्व में लगभग 30,000 पैदल तथा 5,000 अश्वारोही सैनिकों के साथ हेलिसपॉन्ट पार कर एशिया माइनर में प्रवेश किया।
ग्रैनिकस का युद्ध (334 ई. पू.)
सिकंदर का पहला प्रमुख संघर्ष 334 ईसा पूर्व में ग्रैनिकस नदी के तट पर हुआ, जिसमें फ़ारसी क्षत्रपों का मार्ग रोकने का प्रयास सिकंदर की युद्धनीति के सामने विफल हो गया, जिससे एशिया माइनर का अधिकांश भाग उसके नियंत्रण में आ गया।
इस्सुस का युद्ध (333 ई. पू.)
ग्रैनिकस की पराजय के बाद दारा तृतीय ने स्वयं विशाल सेना का नेतृत्व किया। दोनों सेनाओं का सामना 333 ईसा पूर्व में इस्सुस के मैदान में हुआ। फ़ारसी सेना संख्या में अधिक थी, किंतु युद्धभूमि के संकरा होने के कारण उसका पूर्ण लाभ नहीं मिल सका। सिकंदर ने अपने अश्वारोही दल के नेतृत्व में तीव्र आक्रमण कर फ़ारसी सेना की व्यवस्था भंग कर दी और दारा तृतीय युद्धभूमि छोड़कर भागने को विवश हुआ। उसकी माता सिसिगाम्बिस, पत्नी स्टेटाइरा तथा उसकी पुत्रियाँ सिकंदर के हाथ लग गईं, जिनके साथ सिकंदर ने सम्मानजनक व्यवहार किया। इस्सुस की पराजय के बाद दारा तृतीय ने सिकंदर के पास अनेक शांति-प्रस्ताव भेजे और भारी धनराशि, अपनी पुत्री का विवाह तथा फरात नदी के पश्चिम का प्रदेश देने तक का प्रस्ताव रखा, किंतु सिकंदर ने सभी प्रस्ताव अस्वीकार कर स्पष्ट कर दिया कि यदि दारा संधि चाहता है तो उसे स्वयं उसके समक्ष उपस्थित होना होगा।
गौगामेला का युद्ध (331 ई. पू.)
संधि की असफलता के बाद दारा तृतीय ने पुनः विशाल सेना संगठित की। दोनों सेनाओं का अंतिम निर्णायक संघर्ष 331 ई. पू. में गौगामेला (अरबेला के निकट) के मैदान में हुआ। फ़ारसी सेना संख्या में अधिक थी, जबकि सिकंदर की सेना अपेक्षाकृत छोटी किंतु अनुशासित और प्रशिक्षित थी। सिकंदर ने अपनी प्रसिद्ध तिरछी युद्ध-रचना अपनाकर फ़ारसी सेना के केंद्र पर तीव्र प्रहार किया और दारा तृतीय एक बार फिर युद्धभूमि छोड़कर भागने को विवश हुआ। इस विजय के बाद बेबिलोन, सूसा और पर्सेपोलिस पर सिकंदर का अधिकार हो गया तथा हख़ामनी साम्राज्य का वास्तविक पतन प्रारंभ हो गया। परंपरा के अनुसार सिकंदर की सेना ने पर्सेपोलिस में विजयोपरांत उत्सव के दौरान राजप्रासाद को आग लगा दी थी, जिससे इस भव्य नगर का अधिकांश भाग सदा के लिए नष्ट हो गया।
दारा तृतीय की मृत्यु और हख़ामनी साम्राज्य का अंत
गौगामेला के पश्चात दारा तृतीय पहले एकबताना पहुँचा और वहाँ से पूर्व की ओर बढ़ने लगा, जबकि सिकंदर उसका लगातार पीछा कर रहा था। इसी दौरान बैक्ट्रिया के क्षत्रप बेसस ने अपने सहयोगियों के साथ षड्यंत्र रचकर 330 ईसा पूर्व में दारा तृतीय की हत्या कर दी और स्वयं को शासक घोषित करने का प्रयास किया। जब सिकंदर को दारा की मृत्यु का समाचार मिला, तो उसने उसे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार दिलवाया। इसके बाद उसने बेसस का पीछा कर उसे बंदी बनाया और कठोर दंड दिया। दारा तृतीय की मृत्यु के साथ ही लगभग दो शताब्दियों तक पश्चिमी एशिया पर शासन करने वाले हख़ामनी साम्राज्य तथा उसके राजवंश का अंत हो गया।
हख़ामनी साम्राज्य के पतन के कारण
हख़ामनी (आकेमेनिड) साम्राज्य प्राचीन विश्व के सबसे विशाल और शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था। मीडिया के अधीन एक छोटे-से फ़ारसी राज्य से विकसित होकर इसने पश्चिमी एशिया, मिस्र, एशिया माइनर तथा उत्तर-पश्चिमी भारत तक अपना प्रभुत्व स्थापित किया। साइरस द्वितीय और दारा प्रथम जैसे महान शासकों के नेतृत्व में यह साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा, किंतु लगभग ढाई शताब्दियों के भीतर इसका पतन हो गया। यह पतन किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि राजनीतिक, प्रशासनिक, सैन्य, सामाजिक तथा बाह्य कारणों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम था।
साम्राज्य की अत्यधिक विशालता एक प्रमुख कारण थी। फ़ारसी साम्राज्य का विस्तार पूर्व में सिंधु प्रदेश से लेकर पश्चिम में एशिया माइनर तथा मिस्र तक और उत्तर में काकेशस से दक्षिण में फ़ारस की खाड़ी तक फैला हुआ था। उस समय संचार और यातायात के साधनों की सीमित उपलब्धता के कारण इतने विशाल साम्राज्य का प्रभावी संचालन अत्यंत कठिन था। साइरस द्वितीय तथा दारा प्रथम ने प्रशासनिक संगठन को सुदृढ़ करने का प्रयास किया, किंतु उनके उत्तराधिकारी उस व्यवस्था को प्रभावी रूप से बनाए नहीं रख सके, जिससे दूरस्थ प्रांतों पर केंद्र का नियंत्रण धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ता गया।
प्रांतीय व्यवस्था की कमज़ोरियाँ दूसरा प्रमुख कारण थीं। दारा प्रथम द्वारा स्थापित क्षत्रप-व्यवस्था प्रारंभ में अत्यंत सफल सिद्ध हुई, किंतु प्रांतीय प्रशासन को प्राप्त व्यापक स्वायत्तता समय के साथ साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुई। जब तक केंद्रीय सत्ता शक्तिशाली रही, तब तक क्षत्रप सम्राट के प्रति निष्ठावान रहे, किंतु जैसे ही केंद्रीय शासन दुर्बल होने लगा, अनेक क्षत्रपों ने स्वतंत्र होने अथवा स्वयं सत्ता प्राप्त करने का प्रयास किया। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण बैक्ट्रिया के क्षत्रप बेसस का है, जिसने सिकंदर के आक्रमण के समय दारा तृतीय की हत्या कर स्वयं सत्ता प्राप्त करने का प्रयास किया। इससे जुड़ी हुई एक अन्य कमज़ोरी ‘राजा की आँखें और कान’ नामक निगरानी-तंत्र की सीमाएँ थीं। यह व्यवस्था अत्यंत प्रभावी थी, किंतु समय के साथ इसमें भी दोष उत्पन्न हो गए थे। अनेक अवसरों पर सम्राट केवल प्राप्त सूचनाओं के आधार पर बिना पर्याप्त जाँच-पड़ताल के क्षत्रपों को पदच्युत अथवा दंडित कर देता था, जिससे अधिकारियों में भय और असुरक्षा उत्पन्न हुई तथा प्रशासनिक स्थिरता प्रभावित हुई।
सांस्कृतिक विविधता और राष्ट्रीय एकता का अभाव भी एक महत्त्वपूर्ण कारण था। हख़ामनी साम्राज्य अनेक जातियों, भाषाओं, धर्मों और संस्कृतियों का समूह था। फ़ारसी, मीड, बेबिलोनियन, असीरियन, फीनिशियन, मिस्री, लीडियन, आयोनियन, बैक्ट्रियन, सोग्डियन, भारतीय, अरब, आर्मीनियाई, सीथियन आदि अनेक समुदाय इसके अधीन थे। यद्यपि हख़ामनी शासकों ने धार्मिक सहिष्णुता और स्थानीय परंपराओं का सम्मान किया, फिर भी साम्राज्य में किसी प्रकार की सांस्कृतिक अथवा राष्ट्रीय एकता विकसित नहीं हो सकी। अतः केंद्रीय सत्ता के कमज़ोर होते ही विभिन्न प्रदेशों ने स्वतंत्र होने का प्रयास प्रारंभ कर दिया।
सैन्य संगठन की कमज़ोरियाँ भी पतन का एक कारण बनीं। फ़ारसी सेना संख्या की दृष्टि से अत्यंत विशाल थी, किंतु उसकी संरचना में अनेक व्यावहारिक कमियाँ थीं। सेना में साम्राज्य के विभिन्न भागों से सैनिक भर्ती किए जाते थे, जिनकी भाषा, युद्ध-पद्धति, हथियार, वेशभूषा और प्रशिक्षण भिन्न-भिन्न थे। क्षयार्ष के यूनान-अभियान के समय सेना में लगभग छियालीस विभिन्न जातियों के सैनिक सम्मिलित थे। इससे सेना में समन्वय और एकरूपता का अभाव बना रहता था। चूँकि फ़ारसी सेना का बड़ा भाग अधीनस्थ प्रदेशों तथा भाड़े के सैनिकों पर आधारित था, इसलिए उनमें फ़ारसी राज्य के प्रति वैसी राष्ट्रीय निष्ठा नहीं थी जैसी यूनानी सैनिकों में अपने नगर-राज्यों के प्रति थी। परिणामस्वरूप संकट की स्थिति में सेना का मनोबल शीघ्र टूट जाता था। मैराथन, सलामिस, प्लेटाइआ, ग्रैनिकस, इस्सुस और गौगामेला के युद्धों में यह कमज़ोरी स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
उत्तराधिकार का निश्चित नियम न होना भी एक गंभीर संरचनात्मक दोष था। हख़ामनी साम्राज्य में ज्येष्ठ पुत्र के उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम नहीं था, परिणामस्वरूप प्रत्येक शासक की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार को लेकर राजपरिवार में संघर्ष उत्पन्न हो जाता था। कैंबिसीज द्वितीय के समय को छोड़कर साइरस द्वितीय से लेकर क्षयार्ष प्रथम तक उत्तराधिकार अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा, किंतु इसके बाद राजसिंहासन के लिए निरंतर संघर्ष, षड्यंत्र और गृहकलह का दौर आरंभ हो गया। इतिहासकार विल ड्युरेंट का मत है कि राजमहलों में षड्यंत्र और हत्याओं की दृष्टि से केवल उत्तरकालीन रोमन साम्राज्य ही पर्सिया की बराबरी कर सकता था। इसी से जुड़ा हुआ एक अन्य कारण अयोग्य एवं विलासी उत्तराधिकारी थे। साइरस द्वितीय और दारा प्रथम जैसे दूरदर्शी शासकों के बाद अधिकांश उत्तराधिकारी उनकी प्रशासनिक और सैन्य क्षमता का परिचय नहीं दे सके और साम्राज्य की समृद्धि ने राजदरबार को अत्यधिक विलासिता की ओर अग्रसर कर दिया।
अंतिम एवं निर्णायक कारण यूनान का उदय और सिकंदर महान का आक्रमण था। दारा प्रथम द्वारा यूनान पर आक्रमण और मैराथन (490 ई. पू.) की पराजय ने पहली बार फ़ारसियों की अजेयता की धारणा को समाप्त कर दिया। क्षयार्ष प्रथम ने पुनः यूनान पर आक्रमण किया और प्रारंभिक सफलताएँ प्राप्त कीं, किंतु सलामिस, प्लेटाइआ और माइकेले के युद्धों में फ़ारसी सेना की पराजय ने साम्राज्य की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचाया, जबकि यूनानी राज्यों का आत्मविश्वास निरंतर बढ़ता गया। अंततः जब मैसीडोनिया के सिकंदर महान ने एशिया पर आक्रमण किया, तब तक हख़ामनी साम्राज्य आंतरिक संघर्षों, प्रशासनिक शिथिलता तथा सैन्य दुर्बलता से पूर्णतः ग्रस्त हो चुका था। ग्रैनिकस, इस्सुस और गौगामेला जैसे युद्धों में सिकंदर की संगठित, अनुशासित तथा प्रशिक्षित सेना ने फ़ारसी सेना को पराजित कर दिया और अंततः 330 ईसा पूर्व में दारा तृतीय की मृत्यु के साथ हख़ामनी साम्राज्य का अंत हो गया।
राजनीतिक-प्रशासनिक संगठन
सम्राट की सत्ता और दैवी अधिकार
हख़ामनी साम्राज्य का प्रशासनिक ढाँचा मुख्यतः साइरस द्वितीय द्वारा स्थापित किया गया था, जिसे दारा प्रथम ने सुव्यवस्थित तथा परिपक्व रूप प्रदान किया। इस विशाल साम्राज्य में पार्स (फार्स) के अतिरिक्त बेबिलोनिया, सीरिया, फिनीशिया, फिलिस्तीन, मिस्र, एशिया माइनर, मध्य एशिया तथा उत्तर-पश्चिमी भारत के प्रदेश सम्मिलित थे। रोमन साम्राज्य के उदय से पूर्व यह प्राचीन विश्व का सबसे विस्तृत और संगठित साम्राज्य था, जिस पर लगभग दो शताब्दियों तक हख़ामनी शासकों का प्रभुत्व बना रहा।
हख़ामनी साम्राज्य में सम्राट ही राज्य की समस्त शक्तियों का केंद्र था। वह सर्वोच्च विधिनिर्माता, मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च सेनापति तथा संपूर्ण प्रशासन का प्रधान अधिकारी माना जाता था। उसकी आज्ञा ही कानून थी और उसके निर्णय के विरुद्ध किसी प्रकार की अपील का प्रावधान नहीं था। दारा प्रथम ने अपने बेहिस्तून अभिलेख में स्पष्ट उल्लेख किया है कि उसे राजसत्ता अहुरमज़्दा की कृपा से प्राप्त हुई है और उसी देवता ने उसे समस्त साम्राज्य का शासन सौंपा है। इस प्रकार फ़ारसी राजसत्ता को दैवी अधिकार का स्वरूप प्रदान किया गया, जिससे शासक की प्रतिष्ठा और अधिकार दोनों सुदृढ़ हुए। हख़ामनी सम्राट के अधीन अनेक अधीनस्थ राजा और सामंत शासन करते थे, इसी कारण वह ‘राजाधिराज’ (क्षायथियानाम् क्षायथिय अर्थात ‘राजाओं का राजा’) की उपाधि धारण करता था।
यद्यपि सिद्धांततः फ़ारसी सम्राट निरंकुश था, फिर भी व्यवहार में उसकी शक्ति पर कुछ परंपरागत तथा राजनीतिक नियंत्रण भी विद्यमान थे। विशेष रूप से पासारगादे कुल के छह प्रमुख कुलीन परिवार, जिन्होंने दारा प्रथम को गउमत के विरुद्ध षड्यंत्र में सहायता देकर उसे सिंहासन प्राप्त करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था, अत्यधिक प्रतिष्ठित थे और उन्हें किसी भी समय सम्राट से मिलने का विशेषाधिकार प्राप्त था। इनके पास विशाल जागीरें थीं, जिनसे वे कर वसूलते थे तथा स्थानीय प्रशासन एवं न्यायिक कार्य भी संपन्न करते थे। मीड को फ़ारसियों के बाद दूसरा सर्वोच्च स्थान प्राप्त था और हिब्रू समुदाय को भी विशेष सम्मान प्राप्त था, क्योंकि बेबीलोन पर फ़ारसी विजय के समय उन्होंने हख़ामनी शासकों का समर्थन किया था।
क्षत्रप व्यवस्था
इतने विशाल साम्राज्य के कुशल प्रशासन हेतु दारा प्रथम ने साम्राज्य को लगभग बीस क्षत्रपियों (प्रांतों) में विभाजित किया, यद्यपि विभिन्न कालों में इनकी संख्या तथा सीमाएँ परिवर्तित होती रहीं। फार्स, मीडिया तथा एलम को राजनीतिक दृष्टि से विशेष महत्त्व प्राप्त था, पार्थिया, अर्मीनिया और कप्पाडोसिया सैनिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण थे, जबकि मिस्र, बेबिलोनिया और भारत साम्राज्य के सर्वाधिक समृद्ध आर्थिक प्रदेशों में गिने जाते थे। प्रत्येक प्रांत का प्रशासन क्षत्रप के अधीन होता था, जो अपने प्रांत का प्रशासक, सेनानायक तथा सर्वोच्च न्यायाधिकारी होता था। वह कानून-व्यवस्था बनाए रखता, सीमाओं की रक्षा करता, कर एकत्र करता, पड़ोसी राज्यों से संबंध स्थापित करता तथा आवश्यकता पड़ने पर सैन्य अभियान भी संचालित करता था। प्रशासन में भ्रष्टाचार तथा विद्रोह की संभावना कम करने के लिए दारा ने सैन्य, वित्तीय तथा प्रशासनिक अधिकारों का पृथक्करण किया। प्रत्येक प्रांत में क्षत्रप से स्वतंत्र सेनाध्यक्ष तथा वित्तीय अधिकारी नियुक्त किए गए, जो सीधे सम्राट के प्रति उत्तरदायी होते थे।
राजा की आँखें और कान: गुप्तचर व्यवस्था
साम्राज्य में शाही निरीक्षकों का एक विशेष वर्ग कार्य करता था, जिन्हें यूनानी लेखक “राजा की आँखें और कान” कहते थे। ‘राजा की आँखें’ कहलाने वाले अधिकारी प्रांतीय प्रशासन का निरीक्षण कर सम्राट को प्रत्यक्ष सूचना देते थे, जबकि ‘राजा के कान’ कहलाने वाले सम्राट के विशेष दूत एवं गुप्तचर थे, जो साम्राज्य के विभिन्न भागों से समाचार एकत्र कर राजधानी तक पहुँचाते थे। इस व्यापक गुप्तचर-व्यवस्था के कारण प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर नियंत्रण रखने तथा विद्रोहों एवं बाहरी संकटों की समय रहते सूचना प्राप्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई गई और सम्राट को साम्राज्य के प्रत्येक भाग की समुचित जानकारी निरंतर प्राप्त होती रहती थी। इतिहासकार विल ड्युरेंट के अनुसार रोमन साम्राज्य के उदय से पहले भूमध्यसागरीय क्षेत्र में किसी भी राज्य ने प्रशासनिक संगठन की ऐसी उत्कृष्ट व्यवस्था स्थापित नहीं की थी।
न्याय व्यवस्था और दंड-विधान
न्याय-व्यवस्था में सम्राट सर्वोच्च न्यायाधीश था और उसका निर्णय अंतिम माना जाता था, तथापि साम्राज्य के विभिन्न भागों में स्थानीय न्यायालय स्थापित थे, जिनके ऊपर सात प्रमुख न्यायाधीशों वाला एक उच्च न्यायालय कार्य करता था। न्यायाधीशों का पद सामान्यतः आजीवन रहता था, किंतु रिश्वत लेने, पक्षपात करने अथवा अन्यायपूर्ण निर्णय देने पर उन्हें तत्काल पदच्युत कर कठोर दंड दिया जाता था। इतिहास में एक प्रसिद्ध उदाहरण मिलता है कि कैंबिसीज द्वितीय ने एक भ्रष्ट न्यायाधीश की खाल उतरवाकर उससे न्यायासन तैयार कराया और उसी पर उसके पुत्र को न्यायाधीश बनाकर बैठाया, ताकि वह सदैव निष्पक्ष न्याय देने की प्रेरणा प्राप्त करे। न्यायिक प्रक्रिया सुव्यवस्थित थी, जिसमें वादी और प्रतिवादी दोनों को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाता था। अनेक मामलों में पंचों अथवा मध्यस्थों की सहायता से भी निर्णय किया जाता था और मुकदमों में अनावश्यक विलंब रोकने के लिए समय-सीमा निर्धारित रहती थी। न्याय करते समय न्यायालय केवल अपराध ही नहीं, बल्कि अभियुक्त के पूर्व जीवन, सेवाओं और चरित्र का भी ध्यान रखता था, जिससे न्याय अपेक्षाकृत संतुलित बन सके।
दंड-व्यवस्था अत्यंत कठोर थी। सामान्य अपराधों के लिए कोड़े लगाने का प्रावधान था, जबकि देशद्रोह, बलात्कार, राजमहल के निषिद्ध भाग में प्रवेश जैसे गंभीर अपराधों के लिए दागना, अंग-भंग करना, आँखें निकालना अथवा विषपान, सूली, उल्टा लटकाना, नदी में डुबाना, जीवित दफनाना, पत्थरों से कुचलना अथवा प्रसिद्ध ‘स्कैफ़िज़्म’ (नाव-विधि) जैसी अत्यंत क्रूर विधियों से मृत्युदंड दिया जाता था। दारा प्रथम स्वयं को बेबीलोन के महान सम्राट हम्मूराबी की भाँति एक आदर्श विधिनिर्माता के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहता था। हम्मूराबी की प्रसिद्ध विधिसंहिता सूसा से प्राप्त हुई थी, जो हख़ामनी साम्राज्य की प्रमुख राजधानियों में से एक थी, अतः यह संभावना व्यक्त की जाती है कि दारा उससे परिचित रहा होगा। हम्मूराबी तथा दारा दोनों ही अपनी विधियों को दैवी प्रेरणा का परिणाम मानते थे, यद्यपि इन समानताओं के बावजूद दोनों की विधि-व्यवस्था समान नहीं थी। हम्मूराबी ने अपने सभी कानूनों को एक संगठित संहिता के रूप में शिलालेख पर अंकित कराया, जबकि दारा के आदेश विभिन्न अभिलेखों और प्रशासनिक निर्देशों में बिखरे हुए मिलते हैं, अतः हख़ामनी साम्राज्य में किसी एक संगठित विधिसंहिता का विकास नहीं हो सका।
रॉयल रोड और संचार व्यवस्था
विशाल साम्राज्य को एक सूत्र में बाँधने के लिए दारा प्रथम ने यातायात और संचार-व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया। सबसे प्रसिद्ध राजमार्ग सार्डिस से सूसा तक लगभग 2,400 किलोमीटर लंबा ‘रॉयल रोड’ था, जिस पर नियमित अंतराल पर विश्रामगृह, घुड़सालें तथा डाक-चौकियाँ स्थापित की गईं। इस व्यवस्था के कारण सामान्य यात्री इस मार्ग को लगभग तीन महीनों में तथा घोड़ों की रिले-व्यवस्था के कारण राजकीय संदेशवाहक इसे लगभग एक सप्ताह में पार कर लेते थे। दारा प्रथम ने नील नदी को लाल सागर से जोड़ने वाली नहर का भी निर्माण कराया, जिससे मिस्र और फारस के मध्य व्यापार तथा आवागमन को नई गति मिली, और उसके नौसेनाध्यक्ष स्काइलैक्स ऑफ कैरियांडा ने सिंधु नदी से फ़ारस की खाड़ी तक भारत और फारस के मध्य समुद्री मार्ग का सर्वेक्षण किया, जिससे दोनों क्षेत्रों के बीच समुद्री व्यापार को महत्त्वपूर्ण प्रोत्साहन मिला।
कर-व्यवस्था
हख़ामनी साम्राज्य की आर्थिक शक्ति का प्रमुख आधार उसकी सुव्यवस्थित कर-व्यवस्था थी। प्रत्येक प्रांत से निश्चित मात्रा में कर, उपहार तथा अन्य सामग्री प्राप्त होती थी। हेरोडोटस के अनुसार भारतीय प्रांत साम्राज्य का सबसे अधिक राजस्व देने वाला प्रदेश था, जहाँ से प्रतिवर्ष 360 टैलेंट स्वर्ण-धूलि कर के रूप में प्राप्त होती थी, जबकि बेबीलोन से एक हज़ार टैलेंट तथा मिस्र से सात सौ टैलेंट चाँदी प्राप्त होती थी। मिस्र से अनाज, मीडिया से भेड़ें, अर्मीनिया से घोड़े तथा बेबीलोन से प्रशिक्षित सेवक और अन्य संसाधन भी प्राप्त होते थे, जिससे केंद्रीय राजकोष अत्यंत समृद्ध रहता था। सिकंदर के आक्रमण के समय भी, युद्ध-व्यय में पर्याप्त धन उपयोग किए जाने के बावजूद, शाही कोष में विशाल संपत्ति विद्यमान थी।
सैन्य संगठन
अनिवार्य सैन्य सेवा
हख़ामनी शासकों का दृढ़ विश्वास था कि उनके विशाल साम्राज्य की स्थिरता और सुरक्षा एक शक्तिशाली सेना पर निर्भर करती है, इसलिए सैनिक सेवा को प्रत्येक योग्य पुरुष का अनिवार्य कर्तव्य माना गया। सामान्यतः 15 से 25 वर्ष की आयु के सभी स्वस्थ पुरुषों को आवश्यकता पड़ने पर सेना में भर्ती होना पड़ता था, और इससे बचने का प्रयास एक गंभीर अपराध माना जाता था। यूनानी परंपरा के अनुसार, जब एक व्यक्ति ने दारा प्रथम से अपने तीन पुत्रों में से एक को सैनिक सेवा से मुक्त करने का अनुरोध किया, तो सम्राट ने उसके तीनों पुत्रों को मृत्युदंड दे दिया। इसी प्रकार क्षयार्ष प्रथम के यूनान-अभियान के समय धनी नागरिक पिथियस ने अपने पाँच पुत्रों में से सबसे छोटे को सेना से मुक्त करने की प्रार्थना की, जिस पर क्रोधित होकर सम्राट ने उसके पुत्र की हत्या करवा दी। यद्यपि इन घटनाओं का उल्लेख मुख्यतः हेरोडोटस जैसे यूनानी इतिहासकारों ने किया है और इनमें अतिशयोक्ति की संभावना है, फिर भी वे हख़ामनी शासन में सैनिक सेवा के महत्त्व के सूचक हैं।
हख़ामनी सेना बहुस्तरीय और अत्यंत सुव्यवस्थित थी। साम्राज्य के विभिन्न प्रांत निश्चित संख्या में सैनिक उपलब्ध कराने के लिए बाध्य थे, जिससे आवश्यकता पड़ने पर लाखों सैनिक शीघ्र संगठित किए जा सकते थे। सेना में पैदल सैनिक, अश्वारोही, रथारोही तथा कुछ क्षेत्रों में गजारोही दल भी सम्मिलित थे। साम्राज्य के कुलीन तथा सामंत प्रायः अश्वारोही सेना में सेवा देते थे, जबकि सामान्य वर्ग के सैनिक पैदल सेना का भाग बनते थे।
पैदल सेना : अमर सेना, स्पाराबारा और ताकाबारा
पैदल सेना की संरचना में मुख्यतः चार प्रकार की इकाइयाँ सम्मिलित थीं। सबसे प्रतिष्ठित दल ‘अमर सेना’ कहलाता था, जिसमें हेरोडोटस के अनुसार सदैव 10,000 सैनिक रहते थे। यदि कोई सैनिक युद्ध में मारा जाता, घायल हो जाता अथवा सेवा के अयोग्य हो जाता, तो उसके स्थान पर तत्काल नया सैनिक नियुक्त कर दिया जाता था। इसी कारण इनकी संख्या कभी कम नहीं होती थी और इन्हें ‘अमर’ कहा जाता था। इन सैनिकों के पास विकर (बेंत) की ढाल, छोटा भाला, तलवार अथवा बड़ा खंजर, मिश्रित धनुष तथा शल्कयुक्त कवच होता था। पर्सेपोलिस की नक्काशियों में उन्हें भव्य वस्त्र, स्वर्णाभूषण तथा कुंडल पहने हुए दिखाया गया है, जिससे उनके विशिष्ट दर्जे का अनुमान लगाया जा सकता है।
दूसरी प्रमुख इकाई ‘स्पाराबारा’ थी, जो बड़े आयताकार ढालों की दीवार बनाकर पीछे खड़े तीरंदाज़ों की रक्षा करती थी। खुले मैदान में इनकी रक्षात्मक व्यवस्था प्रभावशाली थी, किंतु भारी कवचधारी यूनानी हॉप्लाइटों के विरुद्ध ये अपेक्षाकृत कम प्रभावी सिद्ध हुए। ‘ताकाबारा’ अपेक्षाकृत हल्की पैदल सेना थी, जिसकी तुलना यूनानी पेल्टास्ट सैनिकों से की जाती है और जिसका उपयोग तीव्र गति वाले आक्रमण तथा टोही अभियानों के लिए किया जाता था। साम्राज्य के अंतिम चरण में ‘कार्डेस’ नामक एक नई पैदल इकाई का भी गठन किया गया, संभवतः यूनानी शैली की अधिक अनुशासित पैदल सेना तैयार करने के उद्देश्य से।
अश्वारोही, रथ, ऊँट और गजसेना
घुड़सवार सेना में रथ-सेना, अश्वारोही सेना, ऊँट-सेना तथा युद्ध-हाथी सम्मिलित थे। प्रारंभिक काल में रथ-सेना का विशेष महत्त्व था, जिस पर धनुर्धर तथा भालाधारी सैनिक तैनात रहते थे, किंतु समय के साथ रथों का सामरिक महत्त्व घटता गया और वे अधिकतर औपचारिक अवसरों तक सीमित रह गए। अश्वारोही सेना साम्राज्य की सबसे गतिशील शक्ति थी, जिसका प्रमुख कार्य तीव्र गति से आक्रमण, शत्रु का पीछा करना तथा सीमावर्ती क्षेत्रों की रक्षा करना था। ऊँट-सेना का प्रयोग सबसे पहले साइरस महान ने लीडिया के विरुद्ध युद्ध में किया था। ऊँटों की गंध से शत्रु के घोड़े विचलित हो जाते थे, जिससे युद्ध में सामरिक लाभ प्राप्त होता था। युद्ध-हाथियों का उपयोग दारा प्रथम द्वारा उत्तर-पश्चिम भारत पर अधिकार स्थापित करने के बाद प्रारंभ हुआ। यद्यपि गौगामेला के युद्ध में केवल पंद्रह हाथियों का उल्लेख मिलता है, फिर भी उनका मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर्याप्त था और वे शत्रु की पंक्तियों में भय उत्पन्न करने के लिए प्रयुक्त होते थे।
तीरंदाजी को हख़ामनी सैन्य संगठन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। फ़ारसी, मीड, एलामाइट तथा विशेष रूप से सीथियन तीरंदाज़ अपनी दक्षता के लिए प्रसिद्ध थे। फ़ारसी सेना द्वारा प्रयुक्त मिश्रित धनुष लकड़ी, सींग तथा नसों से निर्मित होता था, जिससे उसकी मारक क्षमता सामान्य धनुषों की अपेक्षा अधिक होती थी, और आगे चलकर यूनानियों तथा अन्य सभ्यताओं ने भी इसी प्रकार के धनुष अपनाए।
नौसेना
स्थल सेना के अतिरिक्त हख़ामनी साम्राज्य की एक शक्तिशाली नौसेना भी थी। प्रारंभिक हख़ामनी साम्राज्य मुख्यतः स्थलीय शक्ति था, किंतु दारा प्रथम ने पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में एक सुदृढ़ शाही नौसेना का गठन किया, जिसके निर्माण में फीनीशियाई, विशेषकर सीदोन के नाविक, मिस्रवासियों तथा एशियाई यूनानियों का महत्त्वपूर्ण योगदान था। भूमध्यसागर तथा एशिया माइनर के समुद्री क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए लगभग 1,200 युद्धपोतों का विशाल बेड़ा तैयार रखा जाता था। इन युद्धपोतों की लंबाई लगभग चालीस मीटर तथा चौड़ाई लगभग छह मीटर होती थी और वे लगभग तीन सौ सैनिकों को ले जाने में सक्षम थे। अनेक जहाज़ों के अग्रभाग पर धातु के नुकीले प्रहारक (राम) लगाए जाते थे। यह नौसेना केवल समुद्री युद्ध तक सीमित नहीं थी, बल्कि करुण, टिगरिस, नील और सिंधु जैसी प्रमुख नदियों पर भी गश्त करती थी, जिससे व्यापारिक मार्ग सुरक्षित रहते थे। बोस्फोरस पर दारा प्रथम द्वारा तथा बाद में हेलिसपॉन्ट पर क्षयार्ष प्रथम द्वारा बनाए गए नावों के पुल इस साम्राज्य की उच्च अभियांत्रिक क्षमता के उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जिनसे एशिया और यूरोप के बीच विशाल सेनाओं का आवागमन संभव हुआ।
हख़ामनी सैन्य संगठन की सबसे बड़ी विशेषता उसका बहुजातीय स्वरूप था। साम्राज्य की सीमाएँ पश्चिम में भूमध्यसागर से पूर्व में सिंधु नदी तक तथा उत्तर में मध्य एशिया से दक्षिण में मिस्र और फ़ारस की खाड़ी तक फैली होने के कारण इसकी सेना में अनेक देशों, जातियों तथा संस्कृतियों के सैनिक सम्मिलित थे-फ़ारसी और मीड सैनिकों के अतिरिक्त मैसेडोनियन, थ्रेसियन, यूनानी, हिरकेनियन, असीरियन, बैक्ट्रियन, सैके, पार्थियन, सोग्डियन, गांधारवासी, फोनीशियन, यहूदी, मिस्रवासी, साइप्रसवासी, आयोनियन, अरब, इथियोपियाई, अर्मेनियाई, लिडियन तथा अन्य अनेक समुदायों के सैनिक सेना का भाग थे। क्षयार्ष प्रथम के मकबरे पर उत्कीर्ण सैनिकों की आकृतियाँ इस बहुजातीय स्वरूप का सजीव प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। यह विविधता प्रारंभिक काल में साम्राज्य को विविध भौगोलिक परिस्थितियों में युद्ध करने की क्षमता प्रदान करती थी, किंतु यही विविधता समय के साथ सेना की सबसे बड़ी कमज़ोरी भी सिद्ध हुई, क्योंकि विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों तथा युद्ध-पद्धतियों के कारण सैनिकों के बीच पूर्ण समन्वय स्थापित करना कठिन था।
सामाजिक जीवन और संरचना
वर्ण-व्यवस्था और सामाजिक स्तरीकरण
हख़ामनीकालीन फ़ारसी समाज एक स्पष्ट वर्गीय व्यवस्था पर आधारित था, जिसका संगठन मुख्यतः इंडो-ईरानी परंपरा पर आधारित था और यह सामाजिक तथा आर्थिक कार्य-विभाजन के सिद्धांत पर विकसित हुआ था। समाज को सामान्यतः चार प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जाता था। प्रथम वर्ग में सम्राट तथा राजपरिवार के सदस्य आते थे, जिनका स्थान सर्वोच्च था। दूसरे वर्ग में वंशानुगत भूस्वामी, सामंत तथा उच्च प्रशासनिक अधिकारी सम्मिलित थे, जो राज्य-व्यवस्था के प्रमुख आधार माने जाते थे। तीसरे वर्ग में पुरोहित, विशेषकर जरथुस्त्र धर्म के धार्मिक अधिकारी (मागी), सम्मिलित थे, जिन्हें धार्मिक जीवन तथा शिक्षा पर प्रभाव के कारण समाज में अत्यधिक सम्मान प्राप्त था। चौथे वर्ग में कृषक, पशुपालक, व्यापारी, शिल्पकार तथा श्रमिक जैसे सामान्य जन सम्मिलित थे। यद्यपि यही वर्ग आर्थिक उत्पादन का आधार था, फिर भी इसकी सामाजिक स्थिति अपेक्षाकृत निम्न थी और यह सामंतों तथा भूस्वामियों के नियंत्रण में रहता था।
परिवार और विवाह
फ़ारसी समाज की मूल इकाई परिवार था, जिसकी संरचना पितृसत्तात्मक थी। परिवार का प्रमुख पुरुष होता था, किंतु माता को भी अत्यधिक सम्मान प्राप्त था और पारिवारिक जीवन में उसका महत्त्वपूर्ण स्थान था। विवाह को धार्मिक तथा सामाजिक दृष्टि से अनिवार्य माना जाता था और संतानोत्पत्ति को परिवार तथा समाज की निरंतरता का आधार समझा जाता था। अधिक समय तक अविवाहित रहना अनुचित और धर्मविरुद्ध माना जाता था। विवाह का निर्णय सामान्यतः माता-पिता द्वारा किया जाता था तथा युवावस्था (लगभग पंद्रह वर्ष की आयु) विवाह के लिए उपयुक्त मानी जाती थी। मग (पुरोहित) समुदाय में निकट संबंधियों के मध्य विवाह (ख्वेतूकदास) की प्रथा भी प्रचलित थी, जिसे कुछ धार्मिक समूहों में स्वीकार किया गया था। सामान्य समाज में एकपत्नी विवाह को आदर्श माना जाता था, किंतु राजपरिवार और धनिक वर्ग में बहुविवाह तथा हरम रखने की परंपरा विद्यमान थी। अनेक शासक युद्ध-अभियानों में भी अपनी रखैलों को साथ रखते थे और उत्तरकालीन हख़ामनी दरबारों में सैकड़ों रानियों और उपपत्नियों का उल्लेख मिलता है।
फ़ारसी समाज में संतानोत्पत्ति को अत्यंत शुभ माना जाता था, विशेषकर पुत्र-जन्म को उत्सव के रूप में मनाया जाता था, जबकि कन्या-जन्म को अपेक्षाकृत कम शुभ माना जाता था। अधिक पुत्रों वाले परिवारों को राज्य की ओर से पुरस्कार और सम्मान भी प्रदान किए जाते थे। गर्भपात तथा भ्रूण-हत्या को गंभीर अपराध माना जाता था और इनके लिए कठोर दंड, यहाँ तक कि मृत्युदंड का भी प्रावधान था।
महिलाओं की स्थिति
दारा प्रथम के काल में विशेषकर उच्चवर्गीय महिलाओं की स्थिति में कुछ सुधार दिखाई देता है। वे संपत्ति का स्वामित्व रख सकती थीं, उसका प्रबंधन कर सकती थीं तथा आवश्यकतानुसार यात्राएँ भी करती थीं। पर्सेपोलिस की किलेबंदी पट्टिकाओं से ज्ञात होता है कि समाज में शाही महिलाओं से लेकर सामान्य महिला श्रमिकों तक सभी की आर्थिक भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। महिलाएँ स्वतंत्र श्रमिक, पर्यवेक्षक तथा कार्यबल की नेता के रूप में कार्य करती थीं और अनेक अवसरों पर उन्हें पुरुषों के समान अथवा उनसे अधिक वेतन प्राप्त होता था। यद्यपि किसी महिला ने औपचारिक रूप से सम्राट अथवा संरक्षिका (रीजेंट) का पद धारण नहीं किया, फिर भी अतोसा और पेरिसातिस जैसी प्रभावशाली रानियों ने राज्य की नीतियों और उत्तराधिकार-संबंधी निर्णयों पर गहरा प्रभाव डाला। कालांतर में, विशेषकर दारा प्रथम के पश्चात उच्चवर्गीय स्त्रियों के जीवन में अधिक गोपनीयता और मर्यादा पर बल दिया जाने लगा। वे सामान्यतः पर्दायुक्त रथों में यात्रा करती थीं तथा सार्वजनिक जीवन में उनकी उपस्थिति सीमित हो गई, यद्यपि यह स्थिति मुख्यतः कुलीन वर्ग तक सीमित थी और सामान्य परिवारों की स्त्रियाँ आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय बनी रहीं।
भाषा और बहुसांस्कृतिक समाज
हख़ामनी साम्राज्य एक विशाल बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक साम्राज्य था। साइरस द्वितीय और दारा प्रथम के शासनकाल में जब सूसा प्रमुख राजधानी थी, तब एलामाइट भाषा प्रशासन और राजकोषीय अभिलेखों की प्रमुख भाषा थी। पर्सेपोलिस की प्रसिद्ध पट्टिकाएँ इसी भाषा में प्राप्त हुई हैं। मेसोपोटामिया की विजय के उपरांत अरामी भाषा को साम्राज्य की संपर्क भाषा (लिंगुआ फ़्रैंका) के रूप में अपनाया गया, जो प्रशासन, व्यापार तथा अंतर-प्रांतीय संचार का प्रमुख माध्यम बन गई और ‘शाही अरामी’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। प्राचीन फ़ारसी भाषा मुख्यतः राजकीय अभिलेखों तक सीमित रही, और साम्राज्य में यूनानी भाषा का भी सीमित प्रशासनिक उपयोग होता था।
फ़ारसी लोग स्वभाव से विनम्र, अतिथिप्रिय तथा व्यवहारकुशल थे। सामाजिक संबंधों में आयु और पद के अनुसार सम्मान प्रदर्शित किया जाता था। धार्मिक शुद्धता की भावना के कारण नाखून काटना, बाल कटवाना, जंभाई लेना, सार्वजनिक स्थानों पर थूकना अथवा नाक साफ करना अशुद्ध माना जाता था, और ऐसे कार्यों के पश्चात शुद्धिकरण संबंधी धार्मिक संस्कार किए जाते थे। वस्त्र-विन्यास की दृष्टि से फ़ारसी लोगों ने मीडों की परंपरा अपनाई थी। वे ऐसे वस्त्र पहनते थे जिनसे चेहरा छोड़कर शरीर का अधिकांश भाग ढका रहता था, सिर पर टोपी या उष्णीष तथा पैरों में जूते पहनना सामान्य प्रथा थी। समृद्ध वर्ग के वस्त्र अत्यंत आकर्षक, कढ़ाईदार तथा बहुमूल्य होते थे तथा पुरुष सामान्यतः लंबी दाढ़ी और बाल रखते थे। हेरोडोटस के अनुसार फ़ारसी लोग जन्मदिन अत्यंत धूमधाम से मनाते थे और मदिरापान भी उनके सामाजिक जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग था। जरथुस्त्र धर्म के प्रभाव के कारण फ़ारसी समाज में नैतिकता, सत्यवादिता और सदाचार को अत्यधिक महत्त्व दिया जाता था, यद्यपि हेरोडोटस के विवरण से यह भी स्पष्ट होता है कि व्यवहार में इन आदर्शों का सदैव पालन नहीं होता था।
शिक्षा-व्यवस्था
शिक्षा-व्यवस्था में बालकों को लगभग पाँच से सात वर्ष की आयु में शिक्षा के लिए भेजा जाता था, जो प्रायः मंदिरों अथवा पुरोहितों के निवास-स्थानों में दी जाती थी। विद्यार्थियों को अवेस्ता तथा उसके भाष्यों के साथ-साथ धर्म, कानून, चिकित्सा तथा नैतिक शिक्षा भी दी जाती थी। सामान्य परिवारों के बालकों को अश्वारोहण, तीरंदाजी और सत्य-भाषण की शिक्षा दी जाती थी, जबकि कुलीन एवं धनिक परिवारों के बालकों को प्रशासन, लेखन, शासन और सैन्य नेतृत्व का विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था। युद्धकला का अध्ययन सभी विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य था और कुलीन वर्ग के युवकों की शिक्षा लगभग 20 से 24 वर्ष की आयु तक चलती थी। शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य शिष्ट, विनम्र, सत्यनिष्ठ, साहसी, स्वाभिमानी तथा कर्तव्यपरायण नागरिक तैयार करना था।
अर्थव्यवस्था
कृषि और भूमि-व्यवस्था
हख़ामनी साम्राज्य की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था। अवेस्ता में खेती को सर्वोत्तम व्यवसाय माना गया है तथा भूमि को उपजाऊ बनाना पुण्य कार्य समझा गया है। साम्राज्य में कृषि-भूमि का स्वामित्व विभिन्न प्रकार का था। कुछ भूमि पर किसानों का प्रत्यक्ष अधिकार था, कुछ भूमि सामुदायिक रूप से जोती जाती थी, जबकि विशाल भू-भाग सामंतों, कुलीनों और जमींदारों के अधिकार में था, जिस पर किसान लगान देकर खेती करते थे। कृषि मुख्यतः बैलों द्वारा हल चलाकर की जाती थी, और सिंचाई के लिए वर्षा, नदियों तथा कृत्रिम नहरों तथा क़नात प्रणाली का सहारा लिया जाता था।
दारा प्रथम ने कृषि-व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाने के उद्देश्य से भूमि की पैमाइश करवाई तथा कर-व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण सुधार किए। पहले किसानों से फसल बोने से पूर्व ही अनुमानित कर वसूल लिया जाता था, जिससे उन्हें भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। दारा प्रथम ने इस व्यवस्था को बदलकर पिछले वर्षों की औसत उपज के आधार पर कर निर्धारित किया, जिसे ‘बाजी’ कहा जाता था। गेहूँ और जौ प्रमुख खाद्यान्न फसलें थीं और बागवानी फ़ारसियों का प्रिय व्यवसाय था। अनेक प्रकार के फलदार वृक्ष विदेशों से मँगवाए जाते थे। फ़ारसी समाज मांसाहारी तथा मद्यपान का अभ्यस्त था; वे मछली भी पकड़ते थे तथा ‘हौम’ नामक पवित्र पेय का धार्मिक अनुष्ठानों में प्रयोग करते थे। कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग था। गाय, बैल, भेड़, बकरी, घोड़े, खच्चर तथा ऊँट बड़ी संख्या में पाले जाते थे और मधुमक्खी पालन भी व्यापक रूप से प्रचलित था।
खनिज संसाधन और उद्योग
हख़ामनी साम्राज्य प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध था। सोना, चाँदी, ताँबा, लोहा तथा टिन जैसी धातुएँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थीं। साइप्रस से ताँबा, चाँदी और लोहा, एशिया माइनर से चाँदी-ताँबा, कर्मान से सोना-चाँदी तथा सीस्तान से टिन प्राप्त होता था और लेबनान तथा दजला-फरात क्षेत्र से भी ताँबा और लोहा आयात किया जाता था। इन खनिज-संसाधनों ने धातु-उद्योग और शिल्पकला के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। यद्यपि साम्राज्य में अनेक उद्योग विकसित हुए, फिर भी उनका स्वरूप मुख्यतः घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित रहा। वस्त्र निर्माण, जूते, लकड़ी का फर्नीचर, धातु के बर्तन तथा आभूषण निर्माण प्रमुख उद्योग थे।
व्यापार और बैंकिंग
हख़ामनी साम्राज्य में आंतरिक तथा बाह्य दोनों प्रकार का व्यापार अत्यंत विकसित था। साम्राज्य की विशाल भौगोलिक सीमा ने एशिया, अफ्रीका और यूरोप के बीच व्यापारिक संपर्क स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि फ़ारसी समाज व्यापार को विशेष सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता था, फिर भी मीड, बेबीलोनियन तथा यहूदी व्यापारी इस क्षेत्र में अत्यंत सक्रिय थे। व्यापार की सुविधा के लिए बैंकिंग व्यवस्था भी विकसित हुई। प्रारंभ में बैंक मंदिरों तथा राजपरिवार के नियंत्रण में थे, किंतु बाद में निजी बैंक भी स्थापित होने लगे, जिनमें बेबीलोन का प्रसिद्ध ‘मुराशू बैंकिंग गृह’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह धन जमा करने, ऋण देने तथा व्यापारिक लेन-देन का कार्य करता था।
मुद्रा-प्रणाली : दारिक और सिग्लोस
दारा प्रथम के शासनकाल में सोने (दारिक) और चाँदी के सिक्कों (सिग्लोस) के व्यापक प्रचलन ने विनिमय-प्रणाली का स्थान लेना प्रारंभ कर दिया। सोने और चाँदी का अनुपात लगभग 1:13.5 निर्धारित किया गया था। साथ ही नाप-तौल तथा माप की एक समान प्रणाली भी लागू की गई। इससे पूर्व श्रमिकों को पारिश्रमिक का अधिकांश भाग अन्न, पेय तथा अन्य वस्तुओं के रूप में दिया जाता था, किंतु मुद्रा-प्रचलन बढ़ने के बाद उनका अधिकांश वेतन नकद दिया जाने लगा। इस प्रकार दारा प्रथम के आर्थिक सुधारों ने हख़ामनी साम्राज्य की कृषि, व्यापार, कर-व्यवस्था, मुद्रा-प्रणाली और संचार-व्यवस्था को एक सुदृढ़ एवं संगठित आधार प्रदान किया।
धार्मिक जीवन: फ़ारसी धर्म और जरथुस्त्रवाद
प्राक्-जरथुस्त्र धर्म: बहुदेववादी परंपरा
फ़ारसी संस्कृति में धर्म का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान था। हख़ामनीकालीन धार्मिक जीवन का विकास सामान्यतः तीन चरणों में हुआ- प्रथम चरण प्राक्-जरथुस्त्र काल का था, जिसमें प्राचीन ईरानी धार्मिक परंपराएँ विद्यमान थीं, दूसरा चरण जरथुस्त्र (ज़रथुष्ट्र) के सुधारों का था, जिसने ईरानी धर्म को नया स्वरूप प्रदान किया और तीसरे चरण में जरथुस्त्र के पश्चात उनके सिद्धांतों में अनेक परंपरागत तत्त्व पुनः सम्मिलित हो गए तथा धर्म का स्वरूप मिश्रित हो गया।
प्राक्-जरथुस्त्रकालीन ईरानी धर्म का मूल स्रोत वैदिक आर्यों की धार्मिक परंपरा से संबद्ध था, क्योंकि इसका उद्भव एक ही प्राचीन इंडो-ईरानी सांस्कृतिक विरासत से हुआ था। इस काल का धर्म बहुदेववादी था, जिसमें प्रकृति की विविध शक्तियों को देवत्व प्रदान कर उनकी पूजा की जाती थी। इस धर्म में अहुर को सर्वोच्च देवता का स्थान प्राप्त था, जो आगे चलकर अहुरमज़्दा के रूप में प्रतिष्ठित हुआ और जिसकी तुलना वैदिक वरुण से की जाती है। दोनों को सत्य, न्याय और नैतिक व्यवस्था का संरक्षक माना जाता था। इसके अतिरिक्त मित्र (मिश्र), वायु (वाहयु), अपाम् नपात, अर्त (ऋत), यिम (यम) तथा गंधर्व जैसे देवताओं की भी उपासना होती थी और अनाहिता जैसी देवियों को भी सम्मान प्राप्त था। अवेस्ता में प्रयुक्त ‘यज्न’ (यज्ञ), ‘ज़ओतर’ (होतृ), ‘आथ्रवन’ (अथर्वन्), ‘हओम’ (सोम), ‘मंत्र’ तथा ‘आहुति’ जैसे धार्मिक शब्द भारतीय वैदिक परंपरा से स्पष्ट समानता प्रदर्शित करते हैं, जो प्राचीन ईरानी और वैदिक आर्यों की समान धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत को सिद्ध करता है।
जरथुस्त्र का जीवन-परिचय
जरथुस्त्र (ज़रथुस्त्र अथवा ज़ोरोस्टर) प्राचीन ईरान के महान धार्मिक सुधारक, दार्शनिक तथा फ़ारसी धर्म के प्रवर्तक माने जाते हैं। उनके नाम की व्युत्पत्ति के विषय में विद्वानों में मतभेद है। जर्मन विद्वान बर्थोलोमी ने इसे ‘जरन्त’ तथा ‘उष्ट्र’ से व्युत्पन्न मानते हुए इसका अर्थ “वृद्ध ऊँटों वाला व्यक्ति” बताया है, जबकि हॉग के अनुसार इसका अर्थ “उत्कृष्ट हृदय वाला” अथवा “श्रेष्ठ स्तुतिगायक” है, तथा तारापोरवाला इसे “स्वर्णिम प्रकाश” के अर्थ में ग्रहण करते हैं।
जरथुस्त्र के जीवनकाल के विषय में भी इतिहासकारों में पर्याप्त मतभेद है। एडवर्ड मेयर जैसे विद्वान उन्हें लगभग दसवीं शताब्दी ईसा पूर्व का मानते हैं। उनका तर्क है कि हख़ामनी शासकों के समय तक उनके विचार व्यापक रूप से प्रतिष्ठित हो चुके थे और यह भी कि दारा प्रथम अपने अभिलेखों में स्वयं को अहुरमज़्दा का उपासक तो कहता है, किंतु कहीं भी जरथुस्त्र का उल्लेख नहीं करता है, जिससे संकेत मिलता है कि वे दारा से काफी पहले हुए होंगे। दूसरी ओर थार्नडाइक, शेफर, आर. घिर्शमन, विल ड्युरेंट, हीम तथा बर्न्स जैसे विद्वान उन्हें सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्द्ध अथवा छठी शताब्दी ईसा पूर्व के प्रारंभ का व्यक्ति मानते हैं। एक प्राचीन ईरानी परंपरा के अनुसार जरथुस्त्र के लगभग 258 वर्ष बाद अंतिम हख़ामनी शासक दारा तृतीय का पतन हुआ और सिकंदर ने ईरान पर अधिकार कर लिया। इस आधार पर उनका काल लगभग 588 ईसा पूर्व निर्धारित किया जाता है, जो उस युग से मेल खाता है जब भारत में महावीर और गौतम बुद्ध, चीन में कन्फ्यूशियस और लाओत्से तथा पश्चिमी एशिया में अनेक महान धार्मिक सुधारक सक्रिय थे। यद्यपि गाथाओं की भाषा-शैली के आधार पर कुछ विद्वान जरथुस्त्र को इससे भी प्राचीन (लगभग 1200-1000 ई. पू.) मानने का आग्रह करते हैं।
जरथुस्त्र के जन्मस्थान के विषय में भी निश्चित मत नहीं है। अवेस्ता के अनुसार उनका जन्म ऐर्यनम् वैजः नामक प्रदेश में दैत्य नदी के तट पर हुआ था, जिसकी पहचान कुछ विद्वान आधुनिक उत्तर-पश्चिमी ईरान अथवा मध्य एशिया के किसी क्षेत्र से करते हैं। एक अन्य परंपरा के अनुसार उनका जन्म रागा (आधुनिक रे, तेहरान के समीप) में हुआ था। अरब इतिहासकार शहरस्तानी तथा एल. एच. मिल्स सहित अनेक विद्वान रागा को ही उनका जन्मस्थान स्वीकार करते हैं। परंपरा के अनुसार उनके पिता का नाम पौरुशस्प तथा माता का नाम दुघ्दोवा था।
बाल्यावस्था से ही उनका स्वभाव गंभीर, चिंतनशील तथा एकांतप्रिय था। लगभग पंद्रह वर्ष की आयु में सामान्य शिक्षा पूर्ण कर उन्होंने तपस्या का मार्ग अपनाया और पर्वतों तथा निर्जन स्थलों में साधना की। लगभग दस वर्षों की कठोर साधना के पश्चात वोहु मनः (वोहुमनो) नामक दिव्य सत्ता ने उन्हें अहुरमज़्दा के समक्ष उपस्थित किया, जहाँ उन्हें दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ और मानवता के कल्याण हेतु धर्म-प्रचार का आदेश मिला। इसके पश्चात प्रारंभिक लगभग दस वर्षों तक उन्हें सफलता नहीं मिली क्योंकि जहाँ भी वे गए, लोगों ने उनका उपहास किया और उनकी शिक्षाओं को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अंततः वे पूर्वी ईरान पहुँचे, जहाँ राजा विस्तास्प (विश्तास्प) उनकी शिक्षाओं तथा व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उनके प्रमुख संरक्षक बने और राजकीय संरक्षण के अंतर्गत जरथुस्त्र धर्म का तीव्र प्रसार हुआ। परंपरा के अनुसार जरथुस्त्र के तीन विवाह हुए, जिनसे उनके तीन पुत्र- इसतवस्त्र, ह्वरचित्र तथा उर्वतत्नर तथा तीन पुत्रियाँ- फ्रेनी, श्रिति तथा पौरुचिस्ता उत्पन्न हुईं। उनकी मृत्यु के विषय में भी विभिन्न परंपराएँ प्रचलित हैं। एक के अनुसार तूरानी आक्रमणकारियों ने एक अग्नि-मंदिर पर आक्रमण कर जरथुस्त्र सहित लगभग साठ पुरोहितों की हत्या कर दी, जबकि दूसरी परंपरा के अनुसार उनकी मृत्यु प्राकृतिक अथवा दैवी घटना थी।
जरथुस्त्र की शिक्षाएँ: एकेश्वरवाद और नैतिक द्वैतवाद
जरथुस्त्र की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देन एकेश्वरवाद का प्रतिपादन है। उन्होंने प्रचलित बहुदेववाद का विरोध करते हुए अहुरमज़्दा को एकमात्र सर्वोच्च ईश्वर घोषित किया, जो समस्त सृष्टि का रचयिता, सत्य का संरक्षक तथा न्याय का आधार है। उसकी सहायता के लिए सात दिव्य शक्तियाँ अथवा अमेष स्पेंत कार्य करती हैं- वोहु मनः (सद्विचार), अश वहिष्ट (श्रेष्ठ सत्य एवं धर्म), क्षत्र वैर्य (आदर्श शासन), स्पेंता अरमैति (भक्ति एवं पवित्रता), हउरवतत (पूर्णता) तथा अमेरेतत (अमरता)। इन्हीं दिव्य शक्तियों के कारण इस धर्म को ‘मज़्दावाद’ भी कहा जाता है। दारा प्रथम के बेहिस्तून अभिलेख में भी अहुरमज़्दा को ही राजसत्ता और विजय का स्रोत बताया गया है, जिससे स्पष्ट होता है कि हख़ामनी शासकों ने भी अहुरमज़्दा की सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार किया था।
जरथुस्त्र धर्म का दूसरा प्रमुख दार्शनिक सिद्धांत नैतिक द्वैतवाद है। उनके अनुसार संसार में दो विरोधी शक्तियाँ निरंतर संघर्षरत रहती हैं। अहुरमज़्दा सत्य, प्रकाश और सदाचार का प्रतीक है, जबकि अंग्र मैन्यू (अह्रिमन) असत्य, अंधकार और बुराई का प्रतिनिधित्व करता है। यह सिद्धांत जरथुस्त्र धर्म को समकालीन अनेक धर्मों से भिन्न बनाता है, जहाँ एक ही देवता शुभ-अशुभ दोनों का कारण माना जाता था। मनुष्य को स्वतंत्र इच्छा प्राप्त है और वह अपने सद्विचार (हुमत), सद्वचन (हूख्त) तथा सत्कर्म (हुवर्श्त) के माध्यम से अच्छाई का साथ देता है। जरथुस्त्र धर्म के अनुसार विश्व का इतिहास एक निश्चित नैतिक योजना के अंतर्गत चलता है। अंततः सत्य और धर्म की विजय होगी, मृतकों का पुनर्जीवन होगा, प्रत्येक व्यक्ति का अंतिम न्याय किया जाएगा, सत्कर्मी स्वर्ग प्राप्त करेंगे और दुष्कर्मी अपने कर्मों के अनुसार दंड भोगेंगे।
मृत्यु के बाद जीवन की अवधारणा
जरथुस्त्र आत्मा की अमरता में विश्वास करते थे। मान्यता के अनुसार मृत्यु के पश्चात आत्मा तीन दिनों तक शरीर के समीप रहती है, इसके पश्चात उसे चिनवत पुल से गुज़रना होता है। यह पुल मनुष्य के कर्मों की परीक्षा का प्रतीक है। यदि व्यक्ति ने सद्कर्म किए हों तो यह पुल विस्तृत होकर आत्मा को स्वर्ग की ओर ले जाता है, जबकि पापकर्म करने वालों के लिए यह अत्यंत संकरा होकर आत्मा को अधोलोक में गिरा देता है, यद्यपि नरक की यातनाएँ शाश्वत नहीं मानी जातीं और अंततः अंतिम न्याय के साथ धर्म की पूर्ण विजय होगी।
जरथुस्त्र ने धार्मिक कर्मकांडों को अत्यंत सरल बनाया। अग्नि को पवित्रता का प्रतीक मानते हुए अग्नि-मंदिरों में उसे निरंतर प्रज्ज्वलित रखा जाता था, और पुरोहित प्रतिदिन पाँच बार सुगंधित पदार्थ अर्पित करते थे। अग्नि, जल और पृथ्वी की पवित्रता बनाए रखने के कारण मृत शरीर को न तो जलाया जाता था, न दफनाया जाता था और न ही जल में प्रवाहित किया जाता था। शवों को विशेष स्थानों (दख्मा अथवा ‘टॉवर ऑफ़ साइलेंस’) पर रखा जाता था। यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस के अनुसार प्रारंभिक फ़ारसी लोग देवताओं की मूर्तियाँ, मंदिर अथवा वेदियाँ नहीं बनाते थे, बल्कि सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, अग्नि, जल और वायु जैसी प्राकृतिक शक्तियों को पवित्र मानकर उनकी आराधना करते थे।
धार्मिक सहिष्णुता की नीति
हख़ामनी साम्राज्य की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में उसकी धार्मिक सहिष्णुता थी। इस वंश के शासकों ने अपने अधीन रहने वाली विभिन्न जातियों और समुदायों को अपनी-अपनी धार्मिक परंपराओं का पालन करने की स्वतंत्रता प्रदान की। साइरस महान ने 539 ईसा पूर्व में बेबीलोन विजय के बाद यहूदियों को बंदीगृह से मुक्त कर उन्हें मूल देश लौटकर यरूशलेम के मंदिर का पुनर्निर्माण करने की अनुमति दी थी। इस नीति ने उसे एक उदार एवं सहिष्णु शासक के रूप में प्रतिष्ठित किया। बाद के समय में, विशेषकर अर्तक्षत्र द्वितीय के शासनकाल में धार्मिक परंपराओं में परिवर्तन आया। बेबीलोन के विद्वान बेरोसस के अनुसार इस शासक ने विभिन्न देवताओं की प्रतिमाएँ बनवाकर उन्हें प्रमुख नगरों के मंदिरों में स्थापित कराया, जिससे स्पष्ट होता है कि हख़ामनी काल के उत्तरार्द्ध में फ़ारसी धर्म में मूर्तिपूजा तथा मंदिर-निर्माण की परंपरा का भी विकास होने लगा था और मिथ्र (मित्र) तथा अनाहिता जैसे प्राचीन देवताओं की उपासना पुनः लोकप्रिय हो उठी।
अवेस्ता ग्रंथ
जरथुस्त्र के उपदेश अवेस्ता में संकलित हैं, जो फ़ारसी धर्म का प्रमुख धर्मग्रंथ है। फ़ारसी परंपरा के अनुसार मूल अवेस्ता अत्यंत विशाल ग्रंथ था। अरब इतिहासकार तबरी और मसूदी के अनुसार यह लगभग 12,000 गोचर्म पत्रों पर स्वर्णाक्षरों में लिखी गई थी। किंतु सिकंदर के ईरान-विजय के समय पर्सेपोलिस के राजकीय पुस्तकालय के जल जाने से इसका अधिकांश भाग नष्ट हो गया और इसके अनेक अंश केवल मौखिक परंपरा द्वारा सुरक्षित रह सके। बाद में पार्थियन (अर्शकनी) काल में तथा विशेषकर सासानी शासकों- अर्दशिर प्रथम, शापुर प्रथम तथा शापुर द्वितीय के समय इसका व्यवस्थित पुनर्संकलन कराया गया। वर्तमान अवेस्ता को सामान्यतः यस्न, जिसमें जरथुस्त्र की मूल गाथाएँ संकलित हैं, वीस्परद, यश्त, न्याइश, वेंदीदाद तथा हाधोख्त नस्क सहित अन्य लघु ग्रंथों में विभाजित किया जाता है।
इतिहासकार विल ड्युरेंट के अनुसार जरथुस्त्र धर्म अपने समकालीन धर्मों की तुलना में अधिक उदार, नैतिक, अहिंसक तथा मूर्तिपूजा से अपेक्षाकृत मुक्त धर्म था और यह ईरान के लिए उतना ही महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ जितना चीन के लिए कन्फ्यूशियसवाद। जरथुस्त्र द्वारा प्रतिपादित एकेश्वरवाद, नैतिक उत्तरदायित्व, स्वर्ग-नरक, अंतिम न्याय, मसीहा तथा पुनरुत्थान जैसी अवधारणाओं ने बाद के यहूदी, ईसाई तथा इस्लामी धार्मिक विचारों को भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित किया।
कला एवं स्थापत्य
फ़ारसी कला की मौलिक विशेषताएँ
हख़ामनी युग में फ़ारसी कला और स्थापत्य ने उल्लेखनीय प्रगति की। फ़ारसी कला पूर्णतः मौलिक नहीं थी, किंतु उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उसने विभिन्न सभ्यताओं की कलात्मक परंपराओं को आत्मसात कर एक विशिष्ट समन्वित शैली का विकास किया। इस प्रकार हख़ामनी कला प्राचीन पश्चिमी एशिया की अनेक सांस्कृतिक धाराओं का सृजनात्मक संगम बन गई। प्राचीन लेखक डिओडोरस के अनुसार फ़ारसी शासकों ने मिस्री कलाकारों की सेवाएँ प्राप्त कीं, जबकि प्लिनी के अनुसार भव्य राजप्रासादों के निर्माण में यूनानी वास्तुकारों तथा शिल्पियों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान था। साइरस महान का मकबरा लीडियन स्थापत्य-शैली का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है, जबकि उसके प्रस्तर स्तंभों में असीरियन प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है और पर्सेपोलिस के प्रस्तर उत्कीर्णनों में मिस्री कला की झलक मिलती है। फ़ारसी कला की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि यह मुख्यतः राजकीय अथवा दरबारी कला थी, जिसका उद्देश्य सम्राट की शक्ति, वैभव तथा साम्राज्य की महानता का प्रदर्शन करना था।
पर्सेपोलिस : तख़्त-ए-जमशीद
हख़ामनी वास्तुकला की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति पर्सेपोलिस (तख़्त-ए-जमशीद) में देखने को मिलती है, जिसकी स्थापना दारा प्रथम ने की थी और जिसका निर्माण-कार्य क्षयार्ष प्रथम तथा अर्तक्षत्र प्रथम के काल तक चलता रहा। यह नगर एक विशाल कृत्रिम चबूतरे पर निर्मित था, जिसकी लंबाई लगभग 457 मीटर, चौड़ाई लगभग 275-300 मीटर तथा ऊँचाई लगभग 12 मीटर थी और जो विशाल चूना-पत्थरों से निर्मित किया गया था। चबूतरे तक पहुँचने के लिए दोनों ओर चौड़ी तथा आकर्षक सीढ़ियाँ बनाई गई थीं, जिन पर घुड़सवार भी आसानी से चढ़ सकते थे। इस रचना को मेसोपोटामिया के जिगुरातों से प्रेरित माना जाता है। मुख्य प्रवेशद्वार के समीप ‘सभी राष्ट्रों का द्वार’ (गेट ऑफ ऑल नेशंस) स्थित था, जिसका निर्माण क्षयार्ष प्रथम ने कराया था, जिसके दोनों ओर विशाल पंखयुक्त बैलों की मूर्तियाँ स्थापित थीं। सीढ़ियों की दीवारों पर उत्कीर्ण चित्रों में एक ओर शाही अंगरक्षक तथा दूसरी ओर साम्राज्य के विभिन्न प्रांतों से कर और उपहार लेकर आते हुए प्रतिनिधियों का अत्यंत सुंदर चित्रण किया गया है, जिनसे साम्राज्य की बहुजातीय संरचना तथा प्रशासनिक संगठन का जीवंत परिचय मिलता है।

पर्सेपोलिस का सबसे प्रसिद्ध भवन अपादाना (विशाल सभा-भवन) था, जो लगभग 45 मीटर वर्गाकार था और इसमें कुल 72 विशाल स्तंभ थे, जिनमें आज केवल कुछ ही सुरक्षित हैं। प्रत्येक स्तंभ लगभग 20 मीटर ऊँचा था, इनके आधार पर उल्टे कमल अथवा घंटे जैसी आकृति बनी हुई थी, जबकि शीर्षभाग पर दो आमने-सामने खड़े बैलों, सिंहों या ग्रिफ़िनों की संयुक्त मूर्तियाँ निर्मित थीं, जिन पर लकड़ी की छत टिकाई जाती थी। इन स्तंभों की बनावट मिस्री और यूनानी स्तंभों से भिन्न तथा अधिक पतली और आकर्षक थी। कभी यह मत भी प्रचलित था कि मौर्यकालीन अशोक-स्तंभों का विकास इन्हीं स्तंभों से हुआ था, किंतु भारतीय विद्वान वासुदेव शरण अग्रवाल ने इस मत का खंडन करते हुए सिद्ध किया कि मौर्य स्तंभ पूर्णतः भारतीय परंपरा की देन थे। अपादाना के पीछे ‘सौ स्तंभों वाला सभा-भवन’ (हॉल ऑफ हंड्रेड कॉलम्स) स्थित था, जो शाही समारोहों तथा राजकीय सभाओं के लिए प्रयुक्त होता था। इसके द्वारों पर सिंहासन पर विराजमान सम्राट, उसके सेवक, अंगरक्षक तथा अहुरमज़्दा के प्रतीकों का अत्यंत प्रभावशाली उत्कीर्णन है। परंपरा के अनुसार सिकंदर की सेना ने विजयोपरांत उत्सव के दौरान पर्सेपोलिस को आग लगा दी थी, जिससे इस भव्य नगर का अधिकांश भाग नष्ट हो गया था। इसके अवशेष आज यूनेस्को विश्व-धरोहर स्थल के रूप में सुरक्षित हैं।
सूसा का राजप्रासाद
हख़ामनी साम्राज्य की दूसरी प्रमुख राजधानी सूसा थी, जहाँ दारा प्रथम ने अत्यंत भव्य राजप्रासाद का निर्माण कराया। इस निर्माण में साम्राज्य के विभिन्न भागों से सामग्री और शिल्पियों को बुलाया गया। गंधार और कार्मेनिया से लकड़ी, सार्डिस और बैक्ट्रिया से स्वर्ण, सोग्डियाना से लापीस-लाजुली और कार्नेलियन, चोरास्मिया से फ़िरोज़ा, मिस्र से आबनूस और चाँदी तथा इथियोपिया, सिंध और अरकोसिया से हाथीदाँत मँगवाया गया। पत्थर तराशने वाले आयोनिया और सार्डिस के थे, सुनार मीड और मिस्र के थे, लकड़ी पर काम करने वाले मिस्री और सार्डियन थे, जबकि ईंटों का निर्माण बेबीलोन के कारीगरों ने किया। इससे स्पष्ट होता है कि हख़ामनी स्थापत्य कला वास्तव में एक अंतरराष्ट्रीय सहयोग का सुंदर परिणाम थी।
शाही समाधियाँ और धातुकला
राजमहलों के अतिरिक्त शाही समाधियाँ भी फ़ारसी स्थापत्य की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थीं। पर्सेपोलिस से लगभग 12 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम स्थित नक़्श-ए-रुस्तम हख़ामनी शासकों का प्रसिद्ध श्मशान-स्थल था, जहाँ दारा प्रथम, क्षयार्ष प्रथम, अर्तक्षत्र प्रथम तथा दारा द्वितीय की कब्रें पर्वत को काटकर बनाई गई हैं। हख़ामनी वंश के संस्थापक-परिवार से जुड़े साइरस महान का प्रसिद्ध मकबरा पसारगादे में स्थित है, जिसे आज यूनेस्को विश्व-धरोहर के रूप में मान्यता प्राप्त है। फ़ारसी परंपरा के अनुसार शासक अपने जीवनकाल में ही अपनी समाधि का निर्माण प्रारंभ करा देते थे।
फ़ारसी धातुकला भी उच्च स्तर की थी। स्वर्ण, रजत और कांस्य से निर्मित पात्र, अलंकृत प्याले तथा सिंह और बैल की आकृतियों वाले कलात्मक स्टैंड उत्कृष्ट शिल्पकौशल के परिचायक हैं। इन कलाकृतियों से स्पष्ट होता है कि हख़ामनी कलाकारों ने स्थापत्य, मूर्तिकला तथा अलंकरण को एकीकृत कर राजकीय वैभव और साम्राज्य की शक्ति को अत्यंत प्रभावशाली रूप में अभिव्यक्त किया।
बौद्धिक उपलब्धियाँ: भाषा, साहित्य एवं विज्ञान
भाषा और लिपि
हख़ामनी सम्राटों का प्रमुख लक्ष्य विशाल साम्राज्य का विस्तार, संगठन और सुरक्षा था, परिणामस्वरूप साहित्य, दर्शन तथा विज्ञान जैसे बौद्धिक क्षेत्रों को अपेक्षाकृत कम संरक्षण मिला। फ़ारसी शिक्षा का उद्देश्य आदर्श सैनिक, कुशल प्रशासक तथा अनुशासित नागरिक तैयार करना था, न कि साहित्यकार अथवा वैज्ञानिक। फिर भी यह कहना उचित नहीं होगा कि प्राचीन फ़ारसी इस क्षेत्र में सर्वथा पिछड़े थे।
हख़ामनी काल में प्राचीन फ़ारसी भाषा प्रशासन और राजकीय अभिलेखों की प्रमुख भाषा थी, जो हिंद-ईरानी भाषा-परिवार की सदस्य थी और संस्कृत से इसका घनिष्ठ भाषायी संबंध था। प्रारंभ में फ़ारसी लोगों ने असीरियाई कीलाक्षर (क्यूनिफॉर्म) लिपि को अपनाया, किंतु इसे सरल बनाने के लिए इसमें अनेक संशोधन कर चिह्नों की संख्या घटाकर लगभग 36 संकेतों तक सीमित कर दिया गया। प्रशासनिक कार्यों में अरामी लिपि और भाषा का भी व्यापक उपयोग किया जाता था, क्योंकि यह साम्राज्य की संपर्क-भाषा बन चुकी थी। प्राचीन फ़ारसी से आगे चलकर ज़ेन्द (अवेस्ताई) तथा पहलवी भाषाओं का विकास हुआ। ज़ेन्द भाषा में अवेस्ता की रचना हुई, जबकि पहलवी से मध्यकालीन और आधुनिक फ़ारसी भाषा का विकास हुआ।
साहित्य
प्राचीन फ़ारसियों में लिखित साहित्य की अपेक्षा मौखिक परंपरा अधिक प्रचलित थी। उनका विश्वास था कि लेखन का उपयोग मुख्यतः व्यापारिक और प्रशासनिक कार्यों के लिए होना चाहिए, इसी कारण अनेक पौराणिक आख्यान, वीरगाथाएँ तथा लोककथाएँ लंबे समय तक मौखिक परंपरा में सुरक्षित रहीं। उपलब्ध साहित्यिक धरोहर के रूप में अवेस्ता ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, जो जरथुस्त्र के उपदेशों, धार्मिक मंत्रों, प्रार्थनाओं तथा दार्शनिक विचारों का संग्रह है और भारतीय वैदिक संहिताओं की भाँति फ़ारसी धर्म का मूल धर्मग्रंथ है।
विज्ञान और चिकित्सा
हख़ामनी काल में फ़ारसियों का प्रमुख ध्यान साम्राज्य-विस्तार, युद्ध और प्रशासनिक संगठन पर केंद्रित रहा, परिणामस्वरूप गणित, खगोलशास्त्र अथवा प्राकृतिक विज्ञान जैसे विषयों का स्वतंत्र विकास अपेक्षाकृत सीमित रहा, और फ़ारसी विद्वान इन आवश्यकताओं की पूर्ति बेबिलोनिया की विकसित परंपराओं से करते थे। चिकित्सा-विज्ञान का प्रारंभिक स्वरूप धार्मिक तथा आभिचारिक था। जरथुस्त्र धर्मग्रंथ वेन्दीदाद में रोगों को दुष्ट शक्तियों अथवा अंग्र-मैन्यु के प्रभाव का परिणाम माना गया है और इसमें अनेक रोगों का प्रतीकात्मक उल्लेख मिलता है। प्रारंभ में रोगों के उपचार का उत्तरदायित्व पुरोहितों पर था, जो मंत्रोच्चार, प्रार्थना, शुद्धिकरण तथा धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से उपचार करते थे, किंतु कालांतर में औषधियों तथा व्यावहारिक चिकित्सा का महत्त्व बढ़ा। अर्तक्षत्र द्वितीय के समय तक चिकित्सकों और शल्य-विशेषज्ञों की संख्या बढ़ी और चिकित्सा-व्यवस्था अधिक व्यवस्थित हुई। चिकित्सकों की योग्यता की परीक्षा के लिए विशेष नियम बनाए गए और उनके पारिश्रमिक की व्यवस्था रोगी की सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुसार निर्धारित की गई थी, जिससे स्पष्ट होता है कि चिकित्सा को एक संगठित और सम्मानित व्यवसाय का रूप प्राप्त होने लगा था।
फ़ारसी सभ्यता की ऐतिहासिक विरासत
हख़ामनी साम्राज्य प्राचीन विश्व का प्रथम सुव्यवस्थित बहुराष्ट्रीय साम्राज्य था। इसकी प्रशासनिक व्यवस्था, प्रांतीय शासन, राजमार्ग, डाक-व्यवस्था तथा कर-संगठन ने परवर्ती साम्राज्यों को गहराई से प्रभावित किया। रोमन साम्राज्य ने प्रांतीय प्रशासन, शाही अधिकार तथा केंद्रीकृत शासन के अनेक सिद्धांतों को विकसित करते समय फ़ारसी अनुभवों से प्रेरणा प्राप्त की। रोमन सम्राट डिओक्लेशियन और कॉन्स्टैंटाइन प्रथम ने भी सम्राट के दैवी अधिकार तथा सुदृढ़ राजसत्ता की अवधारणा को विशेष महत्त्व दिया। सिकंदर महान ने भी अपने विशाल साम्राज्य के संगठन में हख़ामनी प्रशासनिक ढाँचे का उपयोग किया। उसने अनेक फ़ारसी अधिकारियों को उनके पदों पर बनाए रखा तथा स्थानीय प्रशासन में फ़ारसी परंपराओं का सहारा लिया।
धार्मिक दृष्टि से जरथुस्त्रवाद ने विश्व के अनेक धर्मों को प्रभावित किया। शुभ और अशुभ के बीच संघर्ष, स्वर्ग-नरक, अंतिम न्याय, मसीहा की अवधारणा तथा मृतकों के पुनर्जीवन जैसे विचार बाद के यहूदी और ईसाई धार्मिक विचारों में अधिक स्पष्ट रूप से विकसित हुए। आर्थिक क्षेत्र में स्वर्ण दारिक तथा रजत सिग्लोस मुद्राओं की प्रचलित प्रणाली, मानकीकृत कर-व्यवस्था तथा शाही व्यापारिक मार्गों ने प्राचीन विश्व के आर्थिक विकास को नई दिशा दी। रॉयल रोड तथा अन्य राजमार्गों ने पूर्व और पश्चिम के बीच व्यापार को सुदृढ़ बनाया तथा आगे चलकर सिल्क रोड के विकास का आधार भी तैयार किया।
कला और स्थापत्य के क्षेत्र में पर्सेपोलिस, सूसा, पसारगादे तथा नक़्श-ए-रुस्तम जैसे स्मारक आज भी फ़ारसी स्थापत्य-कौशल की उत्कृष्टता के जीवंत प्रमाण हैं। उत्तर-पश्चिम भारत में प्रशासन, मुद्रा-प्रणाली तथा खरोष्ठी लिपि के विकास पर भी हख़ामनी प्रभाव है और अरामी लिपि की परंपरा से खरोष्ठी लिपि का विकास हुआ, जो हख़ामनी प्रशासन में प्रचलित थी।
330 ईसा पूर्व में सिकंदर महान के आक्रमण से हख़ामनी साम्राज्य का राजनीतिक अंत अवश्य हो गया, किंतु उसकी प्रशासनिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक परंपराएँ समाप्त नहीं हुईं। सेल्यूसिड, पार्थियन तथा विशेष रूप से सासानी साम्राज्य ने हख़ामनी परंपराओं को अपनाकर उनका और अधिक विकास किया। 224 ईस्वी में अर्दशिर प्रथम द्वारा स्थापित सासानी साम्राज्य स्वयं को हख़ामनी शासकों का उत्तराधिकारी मानता था और उसकी प्रशासनिक व्यवस्था, राजकीय उपाधियाँ, कला, स्थापत्य तथा जरथुस्त्र धर्म पर हख़ामनी प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
इस प्रकार फ़ारसी (हख़ामनी) सभ्यता की सबसे बड़ी देन उसका सुदृढ़ प्रशासन, धार्मिक सहिष्णुता, प्रभावशाली राजमार्ग, विकसित मुद्रा-प्रणाली, भव्य स्थापत्य तथा बहुसांस्कृतिक शासन-पद्धति थी। इन उपलब्धियों ने न केवल प्राचीन विश्व के राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास को गहराई से प्रभावित किया, बल्कि बाद की अनेक सभ्यताओं और साम्राज्यों के लिए भी एक स्थायी प्रेरणा-स्रोत का कार्य किया। यही कारण है कि आज भी इतिहासकार, पुरातत्त्वविद् तथा शोधार्थी हख़ामनी साम्राज्य के अध्ययन को प्राचीन विश्व-इतिहास तथा राजनीति विज्ञान के सबसे महत्त्वपूर्ण अध्यायों में से एक मानते हैं।


