बौद्ध संगीतियाँ (Buddhist Councils)

बौद्ध संगीतियाँ (Buddhist Councils)
बौद्ध संगीतियाँ मुख्य लेख : गौतम बुद्ध की शिक्षाएँ  बौद्ध संगीति अथवा बौद्ध परिषदें गौतम […]

बौद्ध संगीतियाँ

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मुख्य लेख : गौतम बुद्ध की शिक्षाएँ 

बौद्ध संगीति अथवा बौद्ध परिषदें गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात् उनकी शिक्षाओं, उपदेशों, विनय-नियमों और संघीय अनुशासन को सुरक्षित, व्यवस्थित तथा संरक्षित करने के उद्देश्य से आयोजित भिक्षुओं की महत्त्वपूर्ण सभाएँ थीं। इन सभाओं में बुद्ध के उपदेशों का सामूहिक पाठ, विभिन्न मतभेदों पर विचार-विमर्श तथा बौद्ध परंपराओं को व्यवस्थित करने का सतत प्रयास किया गया। परंपरागत रूप से प्राचीन भारत में चार प्रमुख बौद्ध संगीतियों का उल्लेख मिलता है। प्रथम संगीति राजगृह में मगध नरेश अजातशत्रु के संरक्षण में महाकाश्यप की अध्यक्षता में आयोजित हुई थी। द्वितीय संगीति वैशाली में मगध नरेश कालाशोक के समय संपन्न हुई। तृतीय संगीति पाटलिपुत्र में सम्राट अशोक के शासनकाल में मोग्गलिपुत्त तिस्स की अध्यक्षता में हुई, और चतुर्थ संगीति को परंपरागत रूप से कश्मीर में कुषाण सम्राट कनिष्क के समय आचार्य वसुमित्र के नेतृत्व से जोड़ा जाता है। इन संगीतियों ने बौद्ध साहित्य के संरक्षण, संघीय अनुशासन के निर्धारण, दार्शनिक मतभेदों के निराकरण तथा बौद्ध धर्म के व्यापक प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालाँकि इनकी तिथियों, स्वरूप और ऐतिहासिक विवरणों के संबंध में विभिन्न बौद्ध परंपराओं—जैसे थेरवाद और महायान—तथा आधुनिक इतिहासकारों में पर्याप्त मतभेद पाए जाते हैं, फिर भी इन संगीतियों का ऐतिहासिक और साहित्यिक महत्त्व निर्विवाद है।

बौद्ध संगीतियाँ (Buddhist Councils)
बौद्ध संगीतियाँ

बौद्ध संगीतियों का अर्थ और उद्देश्य

“संगीति” शब्द का अर्थ है परिषद, सभा अथवा सामूहिक संगायन। बौद्ध संगीतियाँ वे महासभाएँ हैं जो बुद्ध के परिनिर्वाण के पश्चात् उनके उपदेशों को संग्रहीत करने और संरक्षित करने के उद्देश्य से समय-समय पर आयोजित की गईं, और इन्हें प्रायः “धम्म-संगीति” के नाम से भी जाना जाता है। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के समय उनकी शिक्षाएँ लिखित रूप में संकलित नहीं थीं, बल्कि केवल मौखिक परंपरा अर्थात् श्रुति-परंपरा के माध्यम से भिक्षुओं की स्मृति में सुरक्षित थीं। इस स्थिति में उनकी शिक्षाओं और संघ के विनय-नियमों में विकृति या विस्मृति की आशंका बनी रहती थी, इसलिए इन्हें व्यवस्थित रूप से संकलित करने और सुरक्षित रखने की आवश्यकता महसूस हुई। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए विभिन्न अवसरों पर बौद्ध भिक्षुओं की बड़ी सभाएँ बुलाई गईं, जिनमें बुद्ध के उपदेशों, विनय-नियमों और संघीय परंपराओं का सामूहिक पाठ, संरक्षण और व्यवस्थित प्रस्तुतीकरण किया गया। बौद्ध परंपरा में सामान्यतः प्रथम संगीति को राजगृह, द्वितीय को वैशाली, तृतीय को पाटलिपुत्र और कनिष्क से संबंधित परिषद् को कश्मीर से जोड़ा जाता है। इनके अतिरिक्त कालांतर में श्रीलंका, मांडले और यांगून में भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण बौद्ध परिषदें आयोजित हुईं, जिन्होंने त्रिपिटक के संरक्षण और प्रामाणीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।

प्रथम बौद्ध संगीति (लगभग 483 ई.पू.)

बुद्ध के महापरिनिर्वाण के लगभग तीन माह बाद, परंपरा के अनुसार 483 ई.पू. के आसपास, मगध नरेश अजातशत्रु के राजकीय संरक्षण में प्रथम धम्म संगीति का आयोजन राजगृह की सप्तपर्णि गुफा के द्वार पर हुआ। इस ऐतिहासिक संगीति की अध्यक्षता वयोवृद्ध स्थविर महाकस्सप, जिन्हें ‘महाकश्यप’ भी कहा जाता है, ने की थी। इस सभा में पाँच सौ अर्हत्-पद-प्राप्त भिक्षु सम्मिलित हुए थे, जिस कारण इसे “पंचशतिका” के नाम से भी जाना जाता है। संगीति के दौरान बुद्ध के परम शिष्य आनंद ने बुद्ध के उपदेशों अर्थात् सुत्त का पाठ प्रस्तुत किया, जबकि उपालि ने विनय-नियमों का पाठ किया। इस प्रकार बुद्ध की समस्त शिक्षाओं का संकलन कर उन्हें सुत्त-पिटक और विनय-पिटक नामक दो प्रमुख पिटकों में विभाजित किया गया। यह संगीति लगभग सात माह तक चली और महाकस्सप के अथक तथा संगठित प्रयासों ने बुद्ध-वचनों को भावी पीढ़ियों के लिए एक व्यवस्थित मौखिक परंपरा के रूप में सुरक्षित करने में निर्णायक भूमिका निभाई। इस संगीति का ऐतिहासिक महत्त्व इसी बात में निहित है कि इसने बुद्ध के महापरिनिर्वाण के तुरंत बाद उत्पन्न हो सकने वाली मतभिन्नता और विस्मृति की आशंका को रोकते हुए संघ में शिक्षाओं की एकरूपता स्थापित करने का पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण प्रयास किया।

द्वितीय बौद्ध संगीति (लगभग चौथी शताब्दी ई.पू.)

बुद्ध के महापरिनिर्वाण के लगभग एक शताब्दी बाद चौथी शताब्दी ई.पू. में मगध नरेश कालाशोक के संरक्षण में द्वितीय धम्म संगीति वैशाली के वालुकाराम विहार में आयोजित हुई। यह संगीति मुख्यतः विनय-नियमों को लेकर संघ में उत्पन्न हुए गंभीर मतभेद को सुलझाने के उद्देश्य से महास्थविर रेवत की मध्यस्थता में बुलाई गई थी, जिसमें लगभग सात सौ भिक्षुओं ने भाग लिया। विवाद का मूल कारण वैशाली के वज्जिपुत्तक भिक्षुओं द्वारा माने जाने वाले “दस वस्तु” नामक दस आचरण थे, जिनमें स्वर्ण-रजत ग्रहण करने जैसी विनय-विरुद्ध प्रथाएँ सम्मिलित थीं। स्थविरों ने इन दस वस्तुओं को अस्वीकार्य घोषित करते हुए वज्जिपुत्तकों को संघ से निष्कासित कर दिया। इस निर्णय से असंतुष्ट होकर निष्कासित वज्जिपुत्तकों ने पाटलिपुत्र में एक पृथक् महासंगीति का आयोजन किया और अपने आप को “महासांघिक” नाम से संबोधित करते हुए एक स्वतंत्र मतवाद स्थापित किया। इस प्रकार बौद्ध संघ स्पष्ट रूप से दो प्रमुख निकायों-स्थविरवादी और महासांघिक में विभक्त हो गया और कालांतर में स्थविरवाद से सत्रह अन्य उपवाद निकले, जिसके परिणामस्वरूप संपूर्ण बौद्ध संघ लगभग अठारह निकायों में विभाजित हो गया। इस संगीति का ऐतिहासिक महत्त्व इसलिए अत्यधिक है क्योंकि इसके पश्चात् संघ में स्थविरों और महासांघिकों के बीच विभाजन की प्रक्रिया अधिक स्पष्ट और स्थायी रूप ले चुकी थी। हालाँकि इस विभाजन के वास्तविक स्वरूप और उसके तत्कालीन परिणामों के विषय में विभिन्न बौद्ध स्रोतों में भिन्न-भिन्न विवरण प्राप्त होते हैं, फिर भी इसे बौद्ध संघ के प्रारंभिक संप्रदायगत विभाजन को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना माना जाता है।

तृतीय बौद्ध संगीति (लगभग 250 ई.पू.)

बौद्ध अनुश्रुतियों के अनुसार बुद्ध के महापरिनिर्वाण के लगभग 236 वर्ष बाद मौर्य सम्राट अशोक के राजकीय संरक्षण में पाटलिपुत्र के अशोकाराम विहार में तृतीय बौद्ध संगीति संपन्न हुई। इस संगीति की अध्यक्षता विद्वान स्थविर मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की और इसका आयोजन उस समय संघ में प्रविष्ट हो चुके अनेक भ्रष्ट और विधर्मी तत्त्वों को दूर कर संघ की शुद्धि करने के विशेष उद्देश्य से भी किया गया था। इस संगीति में बुद्ध की शिक्षाओं में एक नया पिटक “अभिधम्म” जोड़ा गया, जिससे त्रिपिटक अर्थात् सुत्त, विनय और अभिधम्म तीनों पिटकों को अंतिम और पूर्ण स्वरूप प्राप्त हुआ। इसी अवसर पर मोग्गलिपुत्त तिस्स द्वारा रचित “कथावत्थु” नामक ग्रंथ का भी संकलन हुआ, जिसे बाद में अभिधम्म-पिटक का ही एक भाग स्वीकार किया गया। इस संगीति का सर्वाधिक दूरगामी और महत्त्वपूर्ण निर्णय विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु धर्म-दूतों के रूप में भिक्षुओं को भेजना था। परंपरा के अनुसार महेंद्र अथवा महिंद को श्रीलंका, सोण और उत्तर को सुवर्णभूमि अर्थात् वर्तमान म्यांमार-थाईलैंड क्षेत्र, मज्झंतिक को कश्मीर-गांधार तथा महारक्खित को यवन अर्थात् यूनानी प्रदेश की ओर भेजा गया। इसके परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, लाओस और कंबोडिया सहित समूचे दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापक रूप से फैल गया। त्रिपिटक को अंतिम रूप देना और एक अंतरराष्ट्रीय धर्म-प्रचार अभियान का सूत्रपात करना, इन दोनों दृष्टियों से यह संगीति बौद्ध धर्म के एक क्षेत्रीय परंपरा से विश्व-धर्म बनने की यात्रा में मील का पत्थर सिद्ध हुई।

लंका द्वीप की पुस्तकारोपण संगीति (लगभग प्रथम शताब्दी ई.पू.)

बुद्ध के परिनिर्वाण के लगभग साढ़े चार सौ वर्ष बाद ताम्रपर्णि अर्थात् श्रीलंका में राजा वट्टगामणि अभय के शासनकाल में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण संगीति महास्थविर धर्मरक्षित की अध्यक्षता में आयोजित हुई। इस संगीति का आयोजन मातुल जनपद की आलोक लेन गुफा से संबंधित परंपरा में विशेष रूप से वर्णित है। इस संगीति में समस्त बुद्धवचनों अर्थात् संपूर्ण त्रिपिटक को पहली बार लिखित रूप में ताड़पत्रों पर उत्कीर्ण किया गया, और इसी कारण इस संगीति को “पुस्तकारोपण संगीति” अथवा लेखन-आरोहण परिषद् के नाम से जाना जाता है। इससे पूर्व बुद्ध की शिक्षाएँ केवल मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित होती रही थीं, जिसमें कालांतर में परिवर्तन, विस्मृति अथवा मिश्रण की स्वाभाविक आशंका बनी रहती थी। त्रिपिटक को ताड़पत्रों पर लिखित रूप में सुरक्षित करने की यह घटना बौद्ध साहित्य के इतिहास में अत्यंत निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई, क्योंकि इससे मौखिक परंपरा पर पूर्ण निर्भरता समाप्त हुई और बौद्ध शिक्षाओं के संरक्षण को एक स्थायी, प्रामाणिक तथा दीर्घजीवी आधार प्राप्त हुआ।

कनिष्क से संबंधित चतुर्थ बौद्ध संगीति (लगभग प्रथम शताब्दी ई.)

चतुर्थ बौद्ध संगीति परंपरा के अनुसार कुषाण सम्राट कनिष्क के शासनकाल में प्रथम शताब्दी ईस्वी के आसपास कश्मीर के कुंडलवन नामक स्थान पर आयोजित हुई मानी जाती है। इस संगीति की अध्यक्षता विद्वान आचार्य वसुमित्र ने की, जबकि उपाध्यक्ष के रूप में प्रसिद्ध कवि, दार्शनिक और संगीतज्ञ अश्वघोष ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस परिषद् का संबंध विशेष रूप से सर्वास्तिवाद नामक बौद्ध संप्रदाय की परंपरा से जोड़ा जाता है। इस संगीति में त्रिपिटक के प्रामाणिक पाठ और उसके विस्तृत भाष्यों पर संस्कृत भाषा में “महाविभाषा” नामक एक विशाल और महत्त्वपूर्ण टीका-ग्रंथ की रचना की गई, जिसे बाद में ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण कराकर एक स्वर्ण-पिटारी में अत्यंत सुरक्षित रूप से रखा गया और एक स्तूप में स्थापित किया गया। परंपरा के अनुसार इसी संगीति के दौरान बौद्ध धर्म स्पष्ट रूप से दो प्रमुख शाखाओं-हीनयान और महायान में विभाजित हो गया और इसके पश्चात् अनेक धर्म-प्रचारक मध्य एशिया, तिब्बत तथा चीन की दिशा में गए, जिससे बौद्ध धर्म का उत्तर की ओर अत्यंत व्यापक प्रसार हुआ।

कनिष्क से संबंधित इस परिषद् की वास्तविक तिथि, आयोजन-स्थल और ऐतिहासिक स्वरूप को लेकर आधुनिक विद्वानों और विभिन्न बौद्ध परंपराओं में गंभीर मतभेद पाए जाते हैं। विशेष रूप से थेरवादी परंपरा इसे “चतुर्थ बौद्ध संगीति” के रूप में मान्यता नहीं देती, इसलिए इसे समस्त बौद्ध परंपराओं द्वारा समान रूप से स्वीकृत घटना के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। तथापि उत्तर भारत और मध्य एशिया में बौद्ध दर्शन तथा विशेषतः महायान परंपरा के विकास के संदर्भ में इस संगीति का ऐतिहासिक महत्त्व असंदिग्ध है।

पाँचवीं बौद्ध संगीति : शिलाक्षरारोपण संगीति (1871 ई.)

1871 ईस्वी में ब्रह्मदेश, जिसे आज म्यांमार कहा जाता है, के राजा मिनदोन मिन के शासनकाल में मांडले नगर में पाँचवीं बौद्ध धम्म-संगीति भदंत जागर स्थविर की अध्यक्षता में आयोजित की गई। इस संगीति में सैकड़ों थेरवादी भिक्षुओं ने भाग लिया और संपूर्ण त्रिपिटक को सात सौ उनतीस (729) संगमरमर की शिलाओं पर सावधानीपूर्वक उत्कीर्ण किया गया। प्रत्येक शिला को एक छोटे स्तूपाकार मंडप में सुरक्षित रखा गया, जिसके परिणामस्वरूप मांडले में विश्व-प्रसिद्ध “कुथोडॉ पैगोडा” का निर्माण हुआ, जिसे आज “विश्व की सबसे बड़ी पुस्तक” के रूप में भी जाना जाता है। इसी विशेषता के कारण इस संगीति को “शिलाक्षरारोपण संगीति” के नाम से जाना जाता है। इस संगीति का ऐतिहासिक महत्त्व इसलिए अत्यंत विशिष्ट है क्योंकि इसने त्रिपिटक के पाठ को कागज़ या ताड़पत्र जैसे नाशवान माध्यमों के स्थान पर एक स्थायी और अपरिवर्तनीय पाषाण-माध्यम में सुरक्षित कर दिया, जिससे भावी शताब्दियों के लिए एक अत्यंत प्रामाणिक संदर्भ-स्रोत उपलब्ध हो गया।

छठी बौद्ध संगीति : यांगून महासंगीति (1954–1956 ई.)

बुद्ध के महापरिनिर्वाण की 2500वीं वर्षगाँठ के भव्य उपलक्ष्य में, 17 मई 1954 से लेकर 24 मई 1956 तक म्यांमार की राजधानी यांगून, जिसे पहले रंगून कहा जाता था, में एक विशेष और अंतरराष्ट्रीय संगीति आयोजित की गई। यह संगीति एक विशेष रूप से निर्मित कृत्रिम गुफा में हुई, जिसे “महापाषाण शैल गुहा” का नाम दिया गया था, ताकि प्रथम संगीति की सप्तपर्णि गुफा का प्रतीकात्मक स्मरण कराया जा सके। इस संगीति की अध्यक्षता भदंत रेवत स्थविर ने की, और इसमें म्यांमार, कंबोडिया, लाओस, नेपाल, श्रीलंका, भारत, जर्मनी तथा थाईलैंड सहित कुल आठ देशों के विद्वान भिक्षुओं ने सक्रिय भाग लिया। इस भव्य आयोजन को म्यांमार सरकार का, विशेष रूप से तत्कालीन प्रधानमंत्री ऊ नू के नेतृत्व में, पूर्ण राजकीय संरक्षण प्राप्त था। इस संगीति में सम्मिलित सभी प्रतिभागी देशों को अपनी-अपनी मातृभाषा तथा लिपि में त्रिपिटक को लिपिबद्ध करने की विशेष अनुमति दी गई। इस संगीति का प्रमुख उद्देश्य विभिन्न देशों में प्रचलित पालि त्रिपिटक के विभिन्न पाठों की सूक्ष्म समीक्षा, तुलना और अंततः प्रामाणीकरण करना था। इस दीर्घकालिक और श्रमसाध्य प्रक्रिया के परिणामस्वरूप जो संस्करण प्रकाशित हुआ, उसे “छट्ठ संगायन त्रिपिटक” के नाम से जाना जाता है, जो आज भी संपूर्ण थेरवादी बौद्ध जगत में सर्वाधिक प्रामाणिक संस्करण माना जाता है। आधुनिक युग में यह संगीति थेरवादी बौद्ध जगत के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय सहयोगात्मक प्रयासों में से एक थी, जिसने पालि त्रिपिटक को वैश्विक स्तर पर एक एकीकृत और मानकीकृत स्वरूप प्रदान किया।

बौद्ध संगीतियों की तालिका
संगीति
कालखंड
स्थान
योगदान
प्रथम483 ई.पू.राजगृहत्रिपिटक (सुत्त-विनय) का मौखिक संकलन
द्वितीय383 ई.पू.वैशालीविनय-विवाद, स्थविरवादी-महासांघिक विभाजन
तृतीय250 ई.पू.पाटलिपुत्रअभिधम्म-पिटक जोड़ा गया, विदेशों में धर्म-प्रचार
पुस्तकारोपण29–17 ई.पू.श्रीलंकात्रिपिटक का प्रथम लिखित संस्करण
चतुर्थ (कनिष्क)प्रथम शताब्दी ईस्वीकश्मीरमहाविभाषा रचना, हीनयान-महायान विभाजन
पंचम1871 ई.मांडलेत्रिपिटक का शिलालेखन (729 शिलाएँ)
षष्ठ1954–56 ई.यांगूनअंतरराष्ट्रीय त्रिपिटक-प्रामाणीकरण

बौद्ध संप्रदायों और संगीतियों का महत्त्व

बौद्ध संप्रदायों के क्रमिक विकास ने बौद्ध धर्म को अनेक दार्शनिक, धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप प्रदान किए। थेरवाद संप्रदाय ने प्रारंभिक बौद्ध परंपराओं, समृद्ध पालि साहित्य और अर्हत् के आदर्श को अत्यंत निष्ठापूर्वक संरक्षित रखा, जबकि महायान संप्रदाय ने बोधिसत्त्व के आदर्श, करुणा की भावना और समस्त प्राणियों की सार्वभौमिक मुक्ति की व्यापक अवधारणा को प्रमुखता प्रदान की। इसके आगे वज्रयान संप्रदाय ने महायान की ही दार्शनिक पृष्ठभूमि पर मंत्र, मंडल, मुद्रा और विविध तांत्रिक साधना-पद्धतियों का विकास किया। इन तीनों प्रमुख परंपराओं के माध्यम से बौद्ध धर्म ने भारत, श्रीलंका, दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य एशिया, तिब्बत और पूर्वी एशिया सहित एशिया के विविध क्षेत्रों में वहाँ की स्थानीय संस्कृतियों के साथ अत्यंत गहरा और स्थायी संबंध स्थापित किया।

दूसरी ओर, विभिन्न बौद्ध संगीतियों ने बुद्ध की शिक्षाओं और संघीय अनुशासन को सुरक्षित रखने में सर्वाधिक निर्णायक भूमिका निभाई। प्रथम संगीति ने बुद्ध की शिक्षाओं के मौखिक संरक्षण को एक व्यवस्थित रूप प्रदान किया, द्वितीय संगीति ने विनय संबंधी गंभीर विवादों पर गहन विचार-विमर्श किया और संप्रदायगत विभाजन की प्रक्रिया को स्पष्ट किया, तृतीय संगीति सम्राट अशोक के काल में संघ की शुद्धि तथा अंतरराष्ट्रीय धर्म-प्रचार की महत्त्वपूर्ण परंपरा से जुड़ी रही, जबकि कनिष्क से संबंधित परिषद् ने उत्तर भारतीय बौद्ध दर्शन, विशेषकर सर्वास्तिवाद संप्रदाय और महायान परंपरा, के विकास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसके पश्चात् श्रीलंका की पुस्तकारोपण संगीति ने त्रिपिटक को स्थायी लिखित रूप प्रदान किया, और बाद की मांडले तथा यांगून की परिषदों ने थेरवादी त्रिपिटक के संरक्षण, प्रामाणीकरण तथा वैश्विक प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

इस प्रकार बौद्ध संगीतियाँ केवल बुद्ध-वचनों के संरक्षण का साधन-मात्र नहीं थीं, बल्कि वे बौद्ध संघ की आंतरिक एकता, संघीय अनुशासन और सैद्धांतिक स्पष्टता को बनाए रखने का भी सबसे प्रमुख माध्यम रहीं। मौखिक श्रुति-परंपरा से आरंभ होकर ताड़पत्रों पर लिखित त्रिपिटक तक, और राजगृह की प्राचीन सप्तपर्णि गुफा से लेकर यांगून की आधुनिक अंतरराष्ट्रीय परिषद् तक- इन संगीतियों का दीर्घकालिक इतिहास बौद्ध धर्म की अद्भुत निरंतरता, अनुकूलनशीलता और वैश्विक प्रसार की गाथा प्रस्तुत करता है।

बौद्ध संगीतियों से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. बौद्ध संगीति क्या थी?

बौद्ध संगीति भिक्षुओं की ऐसी सभा या परिषद थी, जिसमें बुद्ध के उपदेशों, विनय-नियमों और संघीय परंपराओं का सामूहिक पाठ, संरक्षण तथा व्यवस्थित प्रस्तुतीकरण किया जाता था।

2. प्रथम बौद्ध संगीति कहाँ आयोजित हुई थी?

प्रथम बौद्ध संगीति परंपरा के अनुसार राजगृह की सप्तपर्णी गुफा में आयोजित हुई थी। इसकी अध्यक्षता महाकाश्यप ने की और मगध के राजा अजातशत्रु ने इसका संरक्षण किया।

3. द्वितीय बौद्ध संगीति का मुख्य विषय क्या था?

द्वितीय बौद्ध संगीति वैशाली में आयोजित हुई और इसका मुख्य विषय विनय-नियमों तथा संघीय अनुशासन से संबंधित विवाद था। परंपरागत रूप से इसे बौद्ध संघ में स्थविर और महासांघिक जैसी धाराओं के विकास से जोड़ा जाता है।

4. तृतीय बौद्ध संगीति किसके शासनकाल में हुई थी?

तृतीय बौद्ध संगीति सम्राट अशोक के शासनकाल में पाटलिपुत्र में आयोजित होने की परंपरा है। इसकी अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की थी और इसे संघ की शुद्धि तथा बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार से जोड़ा जाता है।

5. चतुर्थ बौद्ध संगीति किससे संबंधित थी?

चतुर्थ बौद्ध संगीति की परंपरा कुषाण सम्राट कनिष्क से संबंधित है और इसे सामान्यतः कश्मीर में आयोजित माना जाता है। इसका संबंध विशेष रूप से सर्वास्तिवाद परंपरा से जोड़ा जाता है। इसकी तिथि और स्वरूप के संबंध में विद्वानों में मतभेद हैं।

6. बौद्ध संगीतियों का ऐतिहासिक महत्त्व क्या है?

बौद्ध संगीतियों ने बुद्ध की शिक्षाओं, बौद्ध साहित्य, विनय-नियमों और संघीय परंपराओं के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनके माध्यम से बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को व्यवस्थित किया गया तथा विभिन्न क्षेत्रों में उसके प्रसार और विकास को आधार मिला।

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