ऐनी बेसेंट (Annie Besant)

ऐनी बेसेंट (Annie Besant)
ऐनी बेसेंट (1847–1933 ई.) मुख्य लेख : थियोसोफिकल सोसायटी  एनी वुड बेसेंट (1 अक्टूबर 1847–20 […]

ऐनी बेसेंट (1847–1933 ई.)

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मुख्य लेख : थियोसोफिकल सोसायटी 

एनी वुड बेसेंट (1 अक्टूबर 1847–20 सितंबर 1933 ई.) ब्रिटिश मूल की प्रसिद्ध समाज-सुधारक, शिक्षाविद्, लेखिका, प्रभावशाली वक्ता, थियोसोफिस्ट तथा भारतीय स्वशासन और होम रूल आंदोलन की प्रमुख समर्थक थीं। उन्होंने अपने जीवन में अनेक वैचारिक चरणों से होकर यात्रा की — ईसाई धर्म से स्वतंत्र चिंतन और नास्तिकता तक, फिर समाजवाद, श्रमिक आंदोलन और महिला अधिकारों के समर्थन तक, तथा अंततः थियोसोफी और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं की ओर।

यद्यपि उनका जन्म भारत में नहीं हुआ था, तथापि भारत में दीर्घकाल तक निवास करते हुए उन्होंने शिक्षा, सामाजिक सुधार, धार्मिक पुनर्जागरण और राजनीतिक स्वशासन के लिए व्यापक कार्य किया। उन्होंने तीन सौ से अधिक पुस्तकों और पुस्तिकाओं की रचना की तथा अपने भाषणों और लेखन के माध्यम से हजारों लोगों को प्रभावित किया। थियोसोफिकल सोसाइटी में वे 1907 से 1933 ई. तक अध्यक्ष पद पर रहीं और भारत में होम रूल आंदोलन की प्रमुख नेताओं में गिनी गईं। भारत के प्रति उनके गहरे लगाव और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका के कारण भारतीय इतिहास में उनका विशेष स्थान है।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

ऐनी बेसेंट का जन्म 1 अक्टूबर 1847 ई. को लंदन, इंग्लैंड में ‘वुड’ परिवार में हुआ था। उनके पिता विलियम बर्टन पर्स वुड एक कुशल चिकित्सक, विद्वान गणितज्ञ और बहुभाषाविद् थे, जिनकी पृष्ठभूमि आयरिश-अंग्रेज़ी थी। उनकी माता एमिली रोश मॉरिस आयरिश मूल की धार्मिक महिला थीं। ऐनी का एक भाई भी था, जो उनसे लगभग दो वर्ष बड़ा था।

जब ऐनी लगभग पाँच वर्ष की थीं, तभी उनके पिता का असमय निधन हो गया। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना से परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत कठिन हो गई और उनकी माता के लिए दोनों बच्चों की शिक्षा का व्यय वहन करना दुरूह हो गया। तथापि ऐनी की माता ने अत्यंत संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में भी उनकी शिक्षा जारी रखने का प्रयास किया। इस माँ के संघर्षशील जीवन ने ऐनी में आत्मनिर्भरता और दृढ़ता की भावना विकसित की।

ऐनी की असाधारण प्रतिभा से प्रभावित होकर एक सुशिक्षित महिला सुश्री एलेन मेरियट ने उन्हें अपने संरक्षण में ले लिया। उनके संरक्षण में ऐनी ने लगभग सोलह वर्षों तक अंग्रेज़ी, फ्रांसीसी, जर्मन, लैटिन, भूगोल, विज्ञान, धर्म और संगीत की व्यवस्थित शिक्षा ग्रहण की। सुश्री मेरियट ने उनमें स्वतंत्रता, आत्मानुशासन और समाज-सेवा की भावना विकसित की। शिक्षा के क्रम में ऐनी ने जर्मनी और फ्रांस की यात्राएँ भी कीं तथा पेरिस में फ्रांसीसी भाषा का गहन अध्ययन किया। इन यात्राओं से उन्हें विभिन्न समाजों, धर्मों और विचारधाराओं को समझने का अवसर प्राप्त हुआ, जिसने उनके बौद्धिक विकास पर गहरा और स्थायी प्रभाव डाला। धार्मिक, आध्यात्मिक और रहस्यवादी पुस्तकों के अध्ययन में भी उनकी विशेष रुचि थी।

प्रारंभिक जीवन में ऐनी ईसाई धर्म तथा ईसा के प्रति गहरी आस्था रखती थीं, किंतु आगे चलकर स्वतंत्र चिंतन के प्रभाव से उनके धार्मिक और सामाजिक विचारों में व्यापक परिवर्तन आया और उन्होंने धार्मिक रूढ़ियों तथा सामाजिक असमानताओं पर प्रश्न उठाना आरंभ किया।

ऐनी बेसेंट (Annie Besant)
ऐनी बेसेंट

विवाह और वैचारिक परिवर्तन

1866 ई. में ऐनी की मुलाकात रेवरेंड फ्रैंक बेसेंट से हुई और दिसंबर 1867 ई. में 22 वर्ष की आयु में उनका विवाह इस एंग्लिकन पादरी से संपन्न हुआ। उनके दो संतानें हुईं — पुत्र आर्थर डिग्बी और पुत्री मेबल, जिनका जन्म 1868 से 1870 ई. के मध्य हुआ।

विवाह उनके लिए सुखद नहीं रहा। ऐनी स्वभाव से स्वतंत्र विचारों वाली और धार्मिक प्रश्नों पर गंभीर चिंतन करने वाली थीं। वे पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं पर प्रश्न उठाने लगीं और सामाजिक समस्याओं पर स्वतंत्र विचार व्यक्त करने लगीं। समय के साथ उनकी ईश्वर, बाइबिल और पारंपरिक ईसाई धर्म के प्रति आस्था कमजोर होती गई। इन धार्मिक और वैचारिक मतभेदों के कारण दांपत्य संबंध तनावपूर्ण होते गए।

चार्ल्स नोल्टन की पुस्तक ‘फ्रूट्स ऑफ फिलॉसफी’ से संबंधित जन्म-नियंत्रण और परिवार-परिसीमन के विचारों के प्रचार के कारण ऐनी को सामाजिक और धार्मिक विरोध का सामना करना पड़ा तथा उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई भी हुई। न्यायाधीश उनके तर्कों से सहमत थे, किंतु जूरी उनके पक्ष में नहीं थी। बाद में अपील के माध्यम से दंड समाप्त कर दिया गया। न्यायालय ने उनकी पुत्री उनके पास रहने दी, जबकि पुत्र उनके पति के पास रहा। अंततः 1873 ई. में दोनों अलग हो गए।

विवाह-विच्छेद के इस अनुभव ने ऐनी के जीवन की दिशा मौलिक रूप से बदल दी। उन्होंने व्यक्तिगत जीवन की सीमाओं से आगे बढ़कर मानवता, सामाजिक न्याय और जनसेवा को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। इसी दौर में वे प्रसिद्ध नास्तिक और समाज-सुधारक चार्ल्स ब्रैडलॉ के संपर्क में आईं।

चार्ल्स ब्रैडलॉ और स्वतंत्र चिंतन

1874 ई. में ऐनी बेसेंट नेशनल सेक्युलर सोसाइटी से जुड़ीं और चार्ल्स ब्रैडलॉ के साथ स्वतंत्र चिंतन तथा धर्मनिरपेक्ष आंदोलन में सक्रिय हो गईं। वे ‘नेशनल रिफॉर्मर’ के लिए नियमित लेख लिखने लगीं और आगे चलकर इसकी सह-संपादक भी बनीं। उन्होंने धार्मिक रूढ़ियों, चर्च के प्रभाव, सामाजिक असमानता और महिलाओं की अधीनता की आलोचना की। अपने सार्वजनिक व्याख्यानों के माध्यम से उन्होंने महिलाओं की राजनीतिक स्थिति, विवाह, परिवार-नियोजन और महिलाओं की स्वतंत्रता जैसे तत्कालीन समाज में अत्यंत संवेदनशील माने जाने वाले विषयों पर अपने निर्भीक विचार व्यक्त किए। उनकी वक्तृत्व-कला और निर्भीकता के कारण वे शीघ्र ही ब्रिटेन की प्रसिद्ध सार्वजनिक वक्ताओं में गिनी जाने लगीं।

जन्म-नियंत्रण और ‘द फ्रूट्स ऑफ फिलॉसफी’ विवाद

महिलाओं के स्वास्थ्य, परिवार-नियोजन और जनसंख्या-वृद्धि से जुड़े प्रश्नों पर ऐनी बेसेंट ने अपने समय में अत्यंत विवादास्पद माने जाने वाले विचार व्यक्त किए। 1877 ई. में उन्होंने चार्ल्स ब्रैडलॉ के साथ मिलकर चार्ल्स नोल्टन की पुस्तक ‘द फ्रूट्स ऑफ फिलॉसफी’ को पुनः प्रकाशित किया। इस पुस्तक में प्रजनन और जन्म-नियंत्रण से संबंधित जानकारी दी गई थी।

इस प्रकाशन के कारण दोनों पर अश्लील प्रकाशन संबंधी कानून के अंतर्गत मुकदमा चलाया गया। ऐनी ने तर्क दिया कि परिवार-नियोजन संबंधी जानकारी महिलाओं का अधिकार है और वैज्ञानिक तथ्यों को अश्लील नहीं माना जाना चाहिए। इस विवाद ने जन्म-नियंत्रण और परिवार-नियोजन को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया। बाद में उन्होंने माल्थुसियन लीग के गठन में भी भूमिका निभाई और जनसंख्या तथा गरीबी के प्रश्नों पर कार्य किया।

महिला अधिकार और विवाह-सुधार

ऐनी बेसेंट ने विक्टोरियन समाज में महिलाओं की कानूनी और सामाजिक स्थिति की तीव्र आलोचना की। उनका मानना था कि विवाह व्यवस्था में महिलाओं को पर्याप्त अधिकार नहीं मिलते थे। अपने निजी अनुभवों और बच्चों की अभिरक्षा से जुड़े विवादों ने उन्हें विवाह, संपत्ति और अभिरक्षा संबंधी कानूनों की आलोचना के लिए और अधिक प्रेरित किया। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, राजनीतिक अधिकार, स्वतंत्रता और सामाजिक सम्मान का सक्रिय समर्थन किया। भारत आने के बाद उन्होंने भारतीय महिलाओं के प्रश्नों पर अधिक सावधानी से विचार किया और भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों को गहराई से समझने के उपरांत ही सुधार की बात करने पर बल दिया।

समाजवाद और फैबियन सोसाइटी

1880 के दशक में ऐनी बेसेंट समाजवादी विचारों की ओर आकर्षित हुईं। वे फैबियन सोसाइटी तथा सोशल डेमोक्रेटिक फेडरेशन से जुड़ीं और समाजवाद, श्रमिक अधिकार, ट्रेड यूनियनवाद तथा आयरिश होम रूल जैसे विषयों पर सक्रिय कार्य किया। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, सिडनी वेब और अन्य समाजवादी नेताओं के साथ उनके घनिष्ठ संपर्क रहे। उन्होंने समाजवाद और सामाजिक सुधार पर अनेक लेख तथा पुस्तिकाएँ लिखीं। 1890 ई. तक वे ब्रिटेन की प्रमुख महिला वक्ताओं और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं में गिनी जाने लगी थीं।

श्रमिकों के लिए संघर्ष

ऐनी बेसेंट ने श्रमिकों, विशेषकर महिला श्रमिकों की दयनीय स्थिति के विरुद्ध भी संघर्ष किया। 1888 ई. में उन्होंने लंदन की माचिस फैक्ट्रियों में काम करने वाली महिला मजदूरों की अमानवीय कार्य-परिस्थितियों पर लिखा और उनके आंदोलन को सक्रिय समर्थन दिया। उन्होंने मजदूरों को संगठित करने तथा बेहतर कार्य-परिस्थितियों की माँग के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका यह प्रयास ब्रिटेन में नए ट्रेड यूनियन आंदोलन के विकास से जुड़ा था। उन्होंने 1888 ई. के ट्राफलगर स्क्वायर के प्रदर्शन में भी भाग लिया और श्रमिकों के अधिकारों तथा सार्वजनिक सभा की स्वतंत्रता के समर्थन में आवाज उठाई। उन्होंने मजदूरों, अकाल-पीड़ितों और अभावग्रस्त लोगों की सहायता के लिए निरंतर कार्य किया तथा वे एक महिला ट्रेड यूनियन की सचिव भी रहीं।

गंभीर आर्थिक संकट के समय ऐनी बेसेंट ने स्वतंत्र विचार, सामाजिक प्रश्नों और धार्मिक विषयों पर लेख लिखकर अपनी आजीविका अर्जित की। प्रसिद्ध पत्रकार विलियम स्टीड के संपर्क में आने के बाद उनकी लेखन और प्रकाशन में रुचि और अधिक प्रगाढ़ हुई।

सोशलिस्ट डिफेन्स संगठन

1880 के दशक में ऐनी बेसेंट ने सोशलिस्ट डिफेंस संगठन के गठन में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस संगठन का उद्देश्य उन श्रमिकों की कानूनी और सामाजिक सहायता करना था, जिन्हें सार्वजनिक जुलूसों और राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने के कारण सरकारी दमन का सामना करना पड़ता था। इसी काल में उनका लेखन और सार्वजनिक भाषण सामाजिक तथा राजनीतिक जागरूकता का महत्त्वपूर्ण माध्यम बन गया।

थियोसोफिकल सोसाइटी से जुड़ाव

थियोसोफी की ओर आकर्षण

ऐनी बेसेंट के जीवन में एक बड़ा वैचारिक परिवर्तन तब आया, जब उन्होंने थियोसोफी का अध्ययन आरंभ किया। 1888 ई. में उन्हें मैडम हेलेना पेट्रोव्ना ब्लावात्स्की की पुस्तकों की समीक्षा करने का अवसर प्राप्त हुआ। उन्होंने ए. पी. सिनेट की थियोसोफिकल पुस्तकें पढ़ीं और 1889 ई. में ब्लावात्स्की की ‘द सीक्रेट डॉक्ट्रिन’ की समीक्षा की। इन पुस्तकों से वे अत्यंत प्रभावित हुईं। 1889 ई. में वे ब्लावात्स्की से मिलीं और थियोसोफिकल सोसाइटी के उद्देश्यों से परिचित हुईं।

21 मई 1889 ई. को वे औपचारिक रूप से थियोसोफिकल सोसाइटी में प्रविष्ट हुईं और ब्लावात्स्की की समर्पित शिष्या तथा सहयोगी बन गईं। थियोसोफी में मानव-सेवा, आध्यात्मिक विकास तथा पूर्वी और पश्चिमी गूढ़ दार्शनिक परंपराओं के समन्वय पर बल दिया जाता था। इस आंदोलन ने ऐनी के जीवन की दिशा को काफी हद तक बदल दिया और वे भारतीय दर्शन, हिंदू धर्म, वेद, उपनिषद और पूर्वी आध्यात्मिक परंपराओं के अध्ययन की ओर गहराई से आकर्षित हुईं।

सोसाइटी में भूमिका और विकास

ऐनी की लेखन और वक्तृत्व-क्षमता ने थियोसोफी को व्यापक जनता तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे ब्लावात्स्की की पत्रिका ‘लूसिफर’ की सह-संपादक बनीं तथा एसोटेरिक सेक्शन के आंतरिक समूह से भी जुड़ीं। लंदन स्थित ब्लावात्स्की लॉज का मुख्यालय उनके घर में स्थापित हुआ और वे उसकी अध्यक्षा चुनी गईं।

थियोसोफिकल सोसाइटी में शामिल होने के बाद ऐनी ने नेशनल सेक्युलर सोसाइटी के उपाध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया और अपने पुराने स्वतंत्र चिंतन तथा समाजवादी राजनीतिक जीवन से दूरी बनानी शुरू की। बाद के वर्षों में उनके विचारों में कुछ समाजवादी तत्व बने रहे, किंतु उनका मुख्य ध्यान थियोसोफी और आध्यात्मिक चिंतन पर केंद्रित हो गया।

1891 ई. में ब्लावात्स्की की मृत्यु के बाद थियोसोफिकल सोसाइटी के नेतृत्व का प्रश्न उठा। विलियम क्यू. जज और हेनरी स्टील ओल्कॉट के साथ संगठनात्मक मतभेद उत्पन्न हुए। महात्मा-पत्रों की प्रामाणिकता को लेकर विवाद हुआ और अमेरिकी शाखा अंततः पृथक हो गई। इस विवाद ने थियोसोफिकल आंदोलन को विभाजित कर दिया।

अंतरराष्ट्रीय अध्यक्षता

1907 ई. में कर्नल एच. एस. ओल्कॉट की मृत्यु के उपरांत ऐनी बेसेंट थियोसोफिकल सोसाइटी की अंतरराष्ट्रीय अध्यक्षा निर्वाचित हुईं और जीवन के अंतिम समय तक इस पद पर रहीं। उनका प्रमुख कार्यक्षेत्र मद्रास के अड्यार स्थित थियोसोफिकल सोसाइटी का मुख्यालय रहा। उनके नेतृत्व में संगठन की सदस्य-संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जहाँ 1907 ई. में सदस्यों की संख्या लगभग 14,700 थी, वहीं 1928 ई. तक यह 45,000 से भी अधिक हो गई। उन्होंने थियोसोफिकल ऑर्डर ऑफ सर्विस और युवाओं के लिए ‘द राउंड टेबल’ जैसे संगठनों को विकसित किया। 1908 ई. में उन्होंने ‘ऑर्डर ऑफ थियोसोफिकल संन्यासी’ नामक पीत-वस्त्रधारी, सेवाव्रती और समर्पित लोगों की संस्था बनाई। उन्होंने ‘द थियोसोफिस्ट’ का संपादन भी किया। अड्यार स्थित संपत्ति का विस्तार किया गया और अनेक भवन-निर्माण कार्य संपन्न हुए। जुलाई 1921 ई. में पेरिस में आयोजित प्रथम थियोसोफिकल वर्ल्ड कांग्रेस की अध्यक्षता उन्होंने की। 1908 ई. में अड्यार, चेन्नई में ‘वसंत प्रेस’ की स्थापना की गई।

थियोसोफिकल सोसायटी और ऐनी बेसेंट (Theosophical Society and Anne Besant)
थियोसोफिकल सोसायटी और ऐनी बेसेंट

चार्ल्स डब्ल्यू. लीडबीटर के साथ कार्य

1890 ई. में ऐनी बेसेंट की मुलाकात चार्ल्स डब्ल्यू. लीडबीटर से हुई। लीडबीटर पहले एंग्लिकन पादरी थे और बाद में थियोसोफिकल सोसाइटी में एक प्रसिद्ध आध्यात्मिक साधक के रूप में जाने गए। दोनों ने सूक्ष्म लोकों, पूर्वजन्मों और आध्यात्मिक जगत से संबंधित विषयों पर मिलकर कार्य किया।

ऐनी बेसेंट और लीडबीटर ने तथाकथित मानसिक या आध्यात्मिक अनुसंधान के आधार पर ‘ऑकल्ट केमिस्ट्री’ तथा ‘थॉट-फॉर्म्स’ जैसी कृतियों पर कार्य किया। ‘थॉट-फॉर्म्स’ में विचारों के सूक्ष्म रूपों की अवधारणा प्रस्तुत की गई थी। ‘ऑकल्ट केमिस्ट्री’ में रासायनिक तत्वों की सूक्ष्म संरचना के संबंध में उनके आध्यात्मिक निरीक्षणों का वर्णन किया गया, जिसका बाद में सी. जिनराजदास ने विस्तृत संस्करण प्रकाशित किया। इन गतिविधियों ने ऐनी के धार्मिक और आध्यात्मिक चिंतन को और अधिक गहरा किया।

भारत की पहली यात्रा और भारतीय संस्कृति के प्रति दृष्टिकोण

प्रथम भारत-यात्रा

16 नवंबर 1893 ई. को ऐनी बेसेंट भारत के तूतीकोरिन बंदरगाह पर पहुँचीं। थियोसोफिकल सोसाइटी का अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय मद्रास के अड्यार में था। उन्होंने एच. एस. ओल्कॉट के साथ भारत का व्यापक दौरा किया और भारतीय धर्म, दर्शन तथा संस्कृति पर व्याख्यान दिए। उन्होंने काशी को अपना प्रमुख केंद्र बनाया और तत्कालीन काशी नरेश महाराजा प्रभु नारायण सिंह से संपर्क स्थापित किया।

हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति के प्रति दृष्टिकोण

भारत आने के बाद ऐनी बेसेंट भारतीय संस्कृति, धर्म और दर्शन से अत्यंत प्रभावित हुईं। उन्होंने विशेष रूप से वेद, उपनिषद, भगवद्गीता और हिंदू दर्शन का गहन अध्ययन किया। उन्होंने भगवान दास से संस्कृत तथा हिंदू धर्मग्रंथों का अध्ययन किया और भगवद्गीता का अंग्रेज़ी में अनुवाद तथा उस पर टिप्पणी प्रकाशित की। उनका उद्देश्य भारतीयों में अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति गौरव और आत्मसम्मान की भावना जागृत करना था। उनका विश्वास था कि औपनिवेशिक शासन ने भारतीयों के आत्मसम्मान को कमजोर किया है और भारतीय संस्कृति तथा आध्यात्मिक परंपराओं के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है। उन्होंने हिंदू महाकाव्यों- रामायण और महाभारत पर व्याख्यान दिए तथा भारतीय धार्मिक विचारों को आधुनिक शिक्षा के साथ जोड़ने का प्रयास किया। उनकी दृष्टि में भारत केवल एक राजनीतिक इकाई नहीं था, बल्कि मानव सभ्यता के आध्यात्मिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला देश था। वे भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं को विश्व के व्यापक आध्यात्मिक चिंतन का महत्त्वपूर्ण अंग मानती थीं।

शैक्षिक दृष्टिकोण

भारत में ऐनी बेसेंट का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान शिक्षा के क्षेत्र में था। उनका मानना था कि भारत की उन्नति के लिए शिक्षा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साधन है। वे ऐसी शिक्षा की समर्थक थीं, जिसमें आधुनिक विज्ञान और पश्चिमी ज्ञान के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, धर्म और दर्शन का भी अध्ययन कराया जाए। शिक्षा के माध्यम से वे भारतीय युवाओं में ज्ञान, चरित्र, आत्मविश्वास और राष्ट्रीय चेतना का विकास करना चाहती थीं।

सेंट्रल हिंदू कॉलेज की स्थापना

7 जुलाई 1898 ई. को काशी में सेंट्रल हिंदू कॉलेज और हाई स्कूल की स्थापना उनके शैक्षिक कार्यों की सर्वप्रमुख उपलब्धि थी। उन्होंने महाराजा प्रभु नारायण सिंह से कामच्छा स्थित काशी नरेश सभा भवन के निकट भूमि प्राप्त की और वहाँ इस संस्था की स्थापना की। इस संस्था के विकास में डॉ. भगवान दास सहित अनेक भारतीय और थियोसोफिस्ट सहयोगियों ने योगदान दिया।

1904 ई. में सेंट्रल हिंदू गर्ल्स स्कूल की स्थापना की गई। बाद में महामना मदन मोहन मालवीय ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की योजना बनाई और सेंट्रल हिंदू कॉलेज को प्रस्तावित विश्वविद्यालय से जोड़ने का विचार ऐनी बेसेंट के समक्ष रखा। उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार किया और अपना पूर्ण सहयोग प्रदान किया। इसी कारण ऐनी बेसेंट को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की प्रमुख सह-संस्थापिकाओं में माना जाता है।

अन्य शैक्षिक कार्य

उन्होंने मदनपल्ले में नेशनल कॉलेज की स्थापना की तथा 1917 ई. में ‘सोसाइटी फॉर द प्रमोशन ऑफ नेशनल एजुकेशन’ की स्थापना की। 1918 ई. में अड्यार में नेशनल यूनिवर्सिटी की स्थापना की गई, जिसके चांसलर रवींद्रनाथ ठाकुर, वाइस-चांसलर सर एस. सुब्रमण्यम अय्यर और प्रिंसिपल डॉ. जी. एस. अरुंडेल थे। उन्होंने थियोसोफिकल एजुकेशनल ट्रस्ट के माध्यम से भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक विद्यालयों की स्थापना अथवा सहायता की। 14 दिसंबर 1921 ई. को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने उन्हें ‘डॉक्टर ऑफ लेटर्स’ की मानद उपाधि से सम्मानित किया।

शैक्षिक साहित्य और धार्मिक शिक्षा

ऐनी बेसेंट ने शिक्षा के लिए अनेक पुस्तकें और पाठ्य-सामग्री तैयार की। उन्होंने प्राथमिक, माध्यमिक और महाविद्यालय स्तर के लिए ‘सनातन धर्म’ नामक हिंदू धार्मिक पाठ्यपुस्तक तैयार की। सभी धर्मों के विद्यार्थियों के लिए उन्होंने धर्म और नैतिकता पर आधारित ‘यूनिवर्सल टेक्स्टबुक ऑफ रिलिजन एंड मॉरल्स’ भी तैयार की। उन्होंने ‘द सेंट्रल हिंदू कॉलेज मैगज़ीन’ का संपादन किया, जिसमें भारत के विभिन्न क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लेख प्रकाशित होते थे।

सामाजिक सुधार और ‘ऑर्डर ऑफ द ब्रदर्स ऑफ सर्विस’

ऐनी बेसेंट का विश्वास था कि राजनीतिक स्वशासन के साथ-साथ सामाजिक सुधार भी अनिवार्य है। उन्होंने बाल-विवाह, समय से पूर्व मातृत्व, विधवा-विवाह पर सामाजिक रोक, अस्पृश्यता और शिक्षा की कमी जैसी सामाजिक समस्याओं के विरुद्ध आवाज उठाई। उन्होंने ‘ऑर्डर ऑफ द ब्रदर्स ऑफ सर्विस’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करना तथा समाज के वंचित वर्गों, महिलाओं और तथाकथित अस्पृश्यों के प्रति सम्मान और सहयोग की भावना विकसित करना था।

इस संस्था की सदस्यता के लिए निम्नलिखित प्रतिज्ञाएँ करनी होती थीं —

  • जाति-पाँति पर आधारित छुआछूत का पालन न करना।
  • पुत्रों का विवाह 18 वर्ष से पूर्व न करना।
  • पुत्रियों का विवाह 16 वर्ष से पूर्व न करना।
  • पत्नी, पुत्रियों और परिवार की अन्य स्त्रियों को शिक्षा दिलाना, कन्या-शिक्षा का प्रचार करना तथा स्त्रियों की समस्याओं के समाधान का प्रयास करना।
  • जनसाधारण में शिक्षा का प्रचार करना।
  • सामाजिक और राजनीतिक जीवन में वर्ग-आधारित भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास करना।
  • विधवा स्त्री के पुनर्विवाह के मार्ग में आने वाले सामाजिक बंधनों का सक्रिय विरोध करना।
  • कार्यकर्ताओं में आध्यात्मिक शिक्षा तथा सामाजिक और राजनीतिक उन्नति के क्षेत्र में एकता स्थापित करने का प्रयास करना और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व एवं निर्देशन में कार्य करना।

ऐनी बेसेंट का मानना था कि प्रत्येक मनुष्य में समान आत्मिक चेतना विद्यमान है और इसलिए प्रत्येक व्यक्ति सम्मान, शिक्षा और बेहतर जीवन का अधिकारी है। उनके जाति संबंधी विचारों को लेकर इतिहासकारों के बीच बहस भी रही है। उनके कुछ लेखों और वक्तव्यों में जाति-व्यवस्था के प्रति ऐसा दृष्टिकोण दिखाई देता है, जिसमें वे इसे सामाजिक संगठन की एक ऐतिहासिक व्यवस्था के रूप में देखती थीं। अतः उनके सामाजिक विचारों का मूल्यांकन करते समय उनके सुधारवादी दृष्टिकोण के साथ-साथ उनके इन विवादास्पद विचारों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

व्यक्तित्व और भारत के प्रति प्रेम

ऐनी बेसेंट भारतीय संस्कृति और समाज से इतनी गहराई से जुड़ गई थीं कि भारतीयों ने उन्हें सम्मानपूर्वक ‘माँ बसंत’ कहा। महात्मा गांधी ने उन्हें ‘वसंत देवी’ की उपाधि से सम्मानित किया। वे भारतीय धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं के प्रति गहरी श्रद्धा रखती थीं। हिंदू धर्म पर व्याख्यान देने से पूर्व वे ‘ॐ नमः शिवाय’ का उच्चारण करती थीं। उन्हें ‘मेम साहब’ कहलाना पसंद नहीं था और वे ‘अम्मा’ संबोधन को अधिक प्रिय मानती थीं।

ऐनी बेसेंट की स्मरण-शक्ति असाधारण थी और वे सामान्यतः व्याख्यानों के लिए लिखित नोट्स पर निर्भर नहीं रहती थीं। वे समय की अत्यंत पाबंद थीं और अपनी वेशभूषा के प्रति भी सावधान रहती थीं। ऐनी बेसेंट के जीवन का मूल मंत्र ‘कर्म’ था। उनके राजनीतिक विचारों की आधारशिला आध्यात्मिक तथा नैतिक मूल्यों पर आधारित थी। पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ राजनेता वसंत साठे के अनुसार ऐनी बेसेंट की सबसे बड़ी शक्ति उनकी इच्छाशक्ति और संघर्ष करने की क्षमता थी।

पूर्वजन्म और आध्यात्मिक अनुसंधान

ऐनी बेसेंट और लीडबीटर ने पूर्वजन्मों के संबंध में भी अध्ययन किया। 1913 ई. में उन्होंने ‘मैन : व्हेन्स, हाउ एंड व्हेयर’ में अपने और अन्य लोगों के कथित पूर्वजन्मों से संबंधित निष्कर्ष प्रकाशित किए। कृष्णमूर्ति तथा अन्य थियोसोफिस्टों के पूर्वजन्मों से जुड़े विवरण बाद में ‘द लाइव्स ऑफ एल्सीओन’ में प्रकाशित हुए। थियोसोफिकल मान्यता के अनुसार आत्मा विभिन्न जन्मों में पुरुष और महिला- दोनों रूपों में जन्म ले सकती है। ऐनी ने अपने कथित पूर्वजन्मों में हाइपेशिया और जियोर्डानो ब्रूनो जैसे व्यक्तित्वों से अपने संबंध की कल्पना की। इन विश्वासों को उनके आध्यात्मिक जीवन और आत्म-परिचय के संदर्भ में देखा जाता है।

भारतीय राजनीति में प्रवेश

1913-14 ई. के आसपास ऐनी बेसेंट ने भारतीय राजनीति में सक्रिय रूप से प्रवेश किया और भारत के लिए स्वशासन की माँग को अपने राजनीतिक कार्यक्रम का प्रमुख आधार बनाया। वे ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना करने लगीं। उनका मानना था कि भारत और ब्रिटेन के बीच संबंध समाप्त करने के बजाय ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के भीतर भारतीय स्वशासन स्थापित किया जाना चाहिए।

पत्रकारिता और राष्ट्रवादी प्रचार

1914 ई. में ऐनी बेसेंट ने ‘द कॉमनवील’ नामक साप्ताहिक और ‘न्यू इंडिया’ नामक दैनिक समाचार-पत्र प्रारंभ किया। इन पत्र-पत्रिकाओं में ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना की जाती थी और भारतीय स्वशासन की माँग का समर्थन किया जाता था। ‘न्यू इंडिया’ आगे चलकर होम रूल आंदोलन का प्रमुख प्रचार-माध्यम बना। उनकी पुस्तक ‘इंडिया : ए नेशन’ को ब्रिटिश सरकार ने 1916 ई. में जब्त कर लिया, क्योंकि इसमें स्वायत्त शासन की विचारधारा का समर्थन किया गया था। उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया और राजनीतिक जागरूकता फैलाने के लिए सभाएँ तथा व्याख्यान आयोजित किए। ब्रिटिश सरकार ने उनके लेखन को गंभीरता से लिया और उन्हें आर्थिक दंड का सामना भी करना पड़ा।

युवा संगठनों की स्थापना

ऐनी बेसेंट ने युवाओं में नागरिक कर्तव्य और देशभक्ति की भावना विकसित करने के लिए अनेक संस्थाएँ स्थापित कीं। 1914 ई. में उन्होंने मद्रास में ‘यंग मेन्स इंडियन एसोसिएशन’ की स्थापना की और ‘सन्स एंड डॉटर्स ऑफ इंडिया’ संगठन को पुनर्जीवित किया। ब्रिटिश स्काउट आंदोलन में भारतीयों को पर्याप्त अवसर न मिलने के कारण उन्होंने भारतीय युवाओं के लिए एक स्वतंत्र स्काउट संगठन विकसित किया। 1918 ई. में ‘इंडियन भारत स्काउट’ की नींव रखी गई। बाद में ‘इंडियन बॉय स्काउट्स एसोसिएशन’ का विकास हुआ और इसे अंतरराष्ट्रीय स्काउट आंदोलन से जोड़ा गया। ऐनी बेसेंट को भारत के लिए मानद स्काउट कमिश्नर नियुक्त किया गया तथा 1932 ई. में उन्हें ‘सिल्वर वुल्फ’ सम्मान प्रदान किया गया।

महिला अधिकार और विमेंस इंडियन एसोसिएशन

1917 ई. में ऐनी बेसेंट ने मार्गरेट ई. कजिन्स और डोरोथी जिनराजदास द्वारा प्रारंभ की गई ‘विमेंस इंडियन एसोसिएशन’ के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। इस संगठन ने भारतीय महिलाओं की शिक्षा, सामाजिक स्थिति, राजनीतिक अधिकार और सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी के लिए सक्रिय कार्य किया। बाद के वर्षों में संगठन का विस्तार हुआ और 1927 ई. में पूना में ‘ऑल इंडिया विमेंस कॉन्फ्रेंस’ के गठन की दिशा में इसने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ऐनी बेसेंट ने इंग्लैंड में महिला अधिकारों के लिए दीर्घकाल तक संघर्ष किया था, किंतु भारत में उन्होंने महिलाओं के प्रश्नों पर अपेक्षाकृत सावधान दृष्टिकोण अपनाया। उनका मानना था कि भारतीय समाज और संस्कृति को समझे बिना पश्चिमी नारीवादी मूल्यों को सीधे भारतीय समाज पर आरोपित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने महिला शिक्षा, विधवा-विवाह, बाल-विवाह की आलोचना और महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में प्रवेश का समर्थन किया। साथ ही उनके कुछ विचार पारंपरिक हिंदू आदर्शों से भी प्रभावित थे। यही कारण था कि भारतीय सुधारकों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं के बीच उनके विचारों को लेकर कभी-कभी आलोचना भी हुई।

होम रूल आंदोलन

ऑल इंडिया होम रूल लीग

भारत में स्वशासन की माँग को संगठित रूप देने के लिए 1916 ई. में होम रूल आंदोलन को व्यापक स्वरूप प्रदान किया गया। यह आंदोलन आयरिश होम रूल आंदोलन से प्रेरित था। भारत में दो प्रमुख होम रूल लीगें स्थापित हुईं – लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अप्रैल 1916 ई. में पूना में अपनी होम रूल लीग स्थापित की, जबकि ऐनी बेसेंट ने 1 सितंबर 1916 ई. को मद्रास में ‘ऑल इंडिया होम रूल लीग’ की स्थापना की।

ऐनी बेसेंट ने अमेरिका और इंग्लैंड में भी होम रूल की शाखाएँ स्थापित कीं। इंग्लैंड की शाखा से लॉर्ड लेंसबरी और जॉर्ज बर्नार्ड शॉ जैसे व्यक्तित्वों का संबंध था। लीग ने पूरे देश में शाखाएँ स्थापित कीं और सार्वजनिक सभाओं, भाषणों, प्रचार तथा राजनीतिक शिक्षा के माध्यम से आंदोलन को व्यापक बनाया। 1917 ई. के अंत तक लीग की सदस्य-संख्या लगभग 27,000 तक पहुँच गई थी। जवाहरलाल नेहरू सहित अनेक युवा भारतीयों को इसी आंदोलन के माध्यम से प्रारंभिक राजनीतिक अनुभव प्राप्त हुआ।

ऐनी बेसेंट (Annie Besant)
अड्यार में सदस्यों के साथ एनी बेसेंट; उनके दाईं ओर जे. कृष्णमूर्ति और बाईं ओर सी.डब्ल्यू. लीडबीटर और जे. नित्यानंद हैं।

तिलक और होम रूल आंदोलन

ऐनी बेसेंट ने बाल गंगाधर तिलक के होम रूल आंदोलन के साथ सहयोग बढ़ाने का प्रयास किया। प्रारंभिक प्रयासों में उन्हें अधिक सफलता नहीं मिली, किंतु आगे चलकर दोनों के आंदोलन एक ही उद्देश्य की दिशा में कार्य करने लगे। ऐनी बेसेंट ने भारत में संवैधानिक तरीकों से स्वशासन प्राप्त करने पर बल दिया। उनका विश्वास था कि भारत को राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने के साथ-साथ सामाजिक और शैक्षिक रूप से भी सशक्त होना चाहिए।

कांग्रेस और राष्ट्रीय एकता

ऐनी बेसेंट ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को सुदृढ़ करने और विभिन्न राजनीतिक समूहों के बीच एकता स्थापित करने का प्रयास किया। उन्होंने लोकमान्य तिलक और गोपाल कृष्ण गोखले के बीच उत्पन्न राजनीतिक दूरी को कम करने तथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सहयोग बढ़ाने में भूमिका निभाई। उनका मानना था कि भारत की स्वतंत्रता के लिए विभिन्न धर्मों, समुदायों और संस्कृतियों के बीच एकता अनिवार्य है। उनके राजनीतिक चिंतन की आधारशिला आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों पर आधारित थी।

गिरफ्तारी और रिहाई

होम रूल आंदोलन की बढ़ती लोकप्रियता से ब्रिटिश सरकार चिंतित हो गई। जून 1917 ई. में ऐनी बेसेंट को जी. एस. अरुंडेल और बी. पी. वाडिया के साथ नजरबंद कर दिया गया। नजरबंदी से पूर्व उन्होंने भारतवासियों को संदेश देते हुए विश्वास व्यक्त किया था कि वे अपने जीवनकाल में भारत को स्वायत्त शासन प्राप्त करते हुए देखेंगी। उनकी नजरबंदी के विरुद्ध भारत के अनेक भागों में व्यापक विरोध हुआ। महिलाओं ने भी इन आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग सहित विभिन्न राजनीतिक संगठनों ने उनकी रिहाई की माँग की। जनता और राजनीतिक संगठनों के व्यापक दबाव के परिणामस्वरूप अंततः सितंबर 1917 ई. में ब्रिटिश सरकार को उन्हें रिहा करना पड़ा। नजरबंदी के कारण उनकी लोकप्रियता और अधिक बढ़ी तथा वे राष्ट्रीय आंदोलन की प्रमुख हस्ती बन गईं।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षता

1917 ई. में ऐनी बेसेंट भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षा निर्वाचित हुईं। वे कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्षा थीं। दिसंबर 1917 ई. में कलकत्ता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन की अध्यक्षता उन्होंने की। उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष पद को केवल वार्षिक अधिवेशन तक सीमित न रखकर वर्ष भर सक्रिय राजनीतिक भूमिका में परिणत करने का प्रयास किया। उनके अध्यक्षीय कार्यकाल में कांग्रेस ने अस्पृश्यता की सामाजिक समस्याओं को समाप्त करने की आवश्यकता पर प्रस्ताव पारित किया। उनकी अध्यक्षता भारतीय महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के इतिहास में भी एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी।

गांधी से वैचारिक मतभेद और सक्रिय राजनीति से दूरी

1919-20 ई. के पश्चात भारतीय राजनीति में महात्मा गांधी का प्रभाव तेजी से बढ़ा। ऐनी बेसेंट गांधी के सत्याग्रह, असहयोग और बड़े पैमाने पर कानून-उल्लंघन की रणनीति से सहमत नहीं थीं। वे संवैधानिक तरीकों और कानून के दायरे में रहकर क्रमिक राजनीतिक सुधार प्राप्त करने की पक्षधर थीं। उनका मानना था कि व्यापक सत्याग्रह और हड़तालों से हिंसा उत्पन्न होने की संभावना रहती है। वे भारत के लिए स्वशासन की समर्थक थीं, किंतु ब्रिटिश कॉमनवेल्थ से पूर्ण संबंध-विच्छेद के पक्ष में नहीं थीं।

1924 ई. में बेलगाँव में गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस अधिवेशन आयोजित हुआ। ऐनी बेसेंट लंबी रेल-यात्रा के बाद अधिवेशन में पहुँचीं। उनके पहुँचने पर उपस्थित जनों ने उनका स्वागत किया। उन्होंने अध्यक्ष के स्थान पर बैठने के बजाय अन्य सदस्यों के साथ बैठना पसंद किया। गांधी जी ने अधिवेशन की कार्यवाही रोककर उनसे अपने विचार व्यक्त करने का आग्रह किया। उन्होंने अपने भाषण में सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा की। इसके बाद भी उन्होंने भारत में शिक्षा, सामाजिक सुधार और थियोसोफिकल गतिविधियाँ जारी रखीं।

कॉमनवेल्थ ऑफ इंडिया बिल

1922-25 ई. के बीच ऐनी बेसेंट ने भारतीय नेताओं के साथ मिलकर भारत के लिए संवैधानिक सुधारों की योजना पर कार्य किया। सर तेज बहादुर सप्रू, सी. पी. रामास्वामी अय्यर, पी. एस. शिवस्वामी अय्यर, श्रीनिवास शास्त्री, पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास और हरि सिंह गौर आदि के सहयोग से ‘कॉमनवेल्थ ऑफ इंडिया बिल’ तैयार किया गया। यह विधेयक ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत किया गया, किंतु इसे पर्याप्त राजनीतिक समर्थन नहीं मिल सका और यह आगे नहीं बढ़ पाया।

विश्व-गुरु की अवधारणा

1908 ई. के पश्चात ऐनी बेसेंट और लीडबीटर ने विश्व-गुरु या ‘वर्ल्ड टीचर’ के आगमन की अवधारणा का प्रचार किया था। थियोसोफिकल विचार के अनुसार विश्व-गुरु मानवता के आध्यात्मिक विकास के एक नए चरण का मार्गदर्शन करता है। ऐनी बेसेंट ने भगवान मैत्रेय को इस आध्यात्मिक पद से जोड़ा। उनका विश्वास था कि विश्व-गुरु की शिक्षाएँ मानवता में एकता, शांति और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ावा देंगी। बेसेंट के जीवन के अंतिम चरण में उनका ध्यान कृष्णमूर्ति और इस अवधारणा पर अधिक केंद्रित हो गया।

1922 ई. में कैलिफोर्निया के ओजाई में कृष्णमूर्ति को गंभीर शारीरिक और मानसिक अनुभव हुए, जिन्हें थियोसोफिस्टों ने आध्यात्मिक तैयारी के रूप में देखा। 28 दिसंबर 1925 ई. को अड्यार में एक बड़े आयोजन के अवसर पर कृष्णमूर्ति के विश्व-गुरु के रूप में प्रकट होने की धारणा को और अधिक बल मिला।

जिद्दू कृष्णमूर्ति से संबंध

अड्यार में ऐनी बेसेंट और चार्ल्स लीडबीटर की मुलाकात जिद्दू कृष्णमूर्ति से हुई। 1909 ई. में ऐनी बेसेंट ने कृष्णमूर्ति को उनके माता-पिता से अपने संरक्षण में लिया। लीडबीटर ने कृष्णमूर्ति को संभावित विश्व-गुरु का माध्यम माना। ऐनी बेसेंट ने भी इस विचार को स्वीकार किया और कृष्णमूर्ति तथा उनके भाई नित्यानंद की देखरेख की जिम्मेदारी संभाली। कृष्णमूर्ति के नाम से ‘एट द फीट ऑफ द मास्टर’ जैसी पुस्तक भी प्रकाशित हुई। बाद में उनके लिए ‘ऑर्डर ऑफ द स्टार इन द ईस्ट’ नामक अंतरराष्ट्रीय संगठन बनाया गया।

1912 ई. में कृष्णमूर्ति और नित्यानंद के पिता नारायणैया ने अपने पुत्रों की अभिरक्षा वापस पाने का प्रयास किया। मद्रास उच्च न्यायालय ने उनके पक्ष में निर्णय दिया, किंतु ऐनी बेसेंट ने लंदन में अपील की और अंततः दोनों लड़कों की देखरेख अपने पास रखी। कृष्णमूर्ति और नित्यानंद ने लंदन में शिक्षा प्राप्त की।

कृष्णमूर्ति की अपनी शिक्षाएँ धीरे-धीरे थियोसोफिकल अपेक्षाओं से भिन्न होती गईं। उन्होंने कहा कि सत्य किसी संगठन या बाहरी प्राधिकरण के माध्यम से प्राप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने व्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रत्यक्ष अनुभव और वर्तमान क्षण की जागरूकता पर बल दिया। वे अपने चारों ओर विकसित हो रहे व्यक्तिपूजक वातावरण और नए धर्म की संभावना के विरुद्ध थे। 1929 ई. में ऐनी बेसेंट की उपस्थिति में उन्होंने ‘ऑर्डर ऑफ द स्टार’ को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया। यह घटना थियोसोफिकल आंदोलन के लिए एक महत्त्वपूर्ण मोड़ थी।

जर्मन थियोसोफिकल शाखा से विवाद

विश्व-गुरु की अवधारणा को लेकर थियोसोफिकल सोसाइटी के भीतर भी मतभेद उत्पन्न हुए। जर्मन शाखा के प्रमुख रुडोल्फ स्टीनर ने इस विचार का विरोध किया। उन्होंने निर्देश दिया कि जो सदस्य ‘ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ द ईस्ट’ से जुड़ेगा, उसे जर्मन थियोसोफिकल सोसाइटी से बाहर कर दिया जाएगा। ऐनी बेसेंट ने इसे विश्वास की स्वतंत्रता के सिद्धांत के विरुद्ध माना। विवाद बढ़ने पर जर्मन शाखा का चार्टर रद्द कर दिया गया। अनेक लॉज स्टीनर के नेतृत्व में पृथक हो गए और बाद में एंथ्रोपोसोफिकल सोसाइटी के गठन की दिशा में आगे बढ़े।

थियोसोफी, भारतीय राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पुनर्जागरण

ऐनी बेसेंट के लिए भारतीय राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं था। वे इसे भारतीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आत्मसम्मान से जोड़ती थीं। उनका मानना था कि भारत को अपनी प्राचीन दार्शनिक परंपराओं, धार्मिक विचारों और सांस्कृतिक विरासत के प्रति आत्मविश्वास पुनः प्राप्त करना चाहिए। उनकी थियोसोफिकल गतिविधियों ने भारतीय धार्मिक और दार्शनिक विचारों को पश्चिमी जगत में लोकप्रिय बनाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

थियोसोफी ने चर्च, राज्य और औपनिवेशिक श्रेष्ठता की धारणाओं को चुनौती दी तथा मानव-भाईचारे, धार्मिक विविधता और स्त्री-पुरुष समानता की बात की। इस कारण अनेक भारतीय राष्ट्रवादी और बुद्धिजीवी इससे प्रभावित हुए। यद्यपि थियोसोफी की आलोचना भी हुई। इसके आलोचकों ने इसके आध्यात्मिक दावों, तथाकथित महात्माओं और गूढ़ घटनाओं पर विश्वास तथा भारतीय धार्मिक परंपराओं के रोमानीकरण पर प्रश्न उठाए। कुछ आलोचकों ने यह भी कहा कि भारतीय समाज की परंपराओं का आदर्शीकरण सामाजिक सुधार की आवश्यकताओं को कमजोर कर सकता है।

साहित्यिक, लेखन कार्य और पत्रकारिता

ऐनी बेसेंट एक विपुल लेखिका और प्रभावशाली वक्ता थीं। उन्होंने धर्म, दर्शन, थियोसोफी, शिक्षा, सामाजिक सुधार और भारतीय राजनीति सहित अनेक विषयों पर अत्यंत विस्तृत लेखन किया। उन्होंने 1893 ई. में अपनी आत्मकथा प्रकाशित की। थियोसोफी पर उन्होंने लगभग 220 पुस्तकें और लेख लिखे तथा ‘अजैक्स’ उपनाम से भी लेखन किया। उनकी थियोसोफी-पूर्व रचनाओं की संख्या लगभग 105 बताई जाती है। उन्होंने भारतीय संस्कृति, शिक्षा और सामाजिक सुधारों पर लगभग 48 ग्रंथ और पैम्फलेट लिखे तथा भारतीय राजनीति पर लगभग 77 पुस्तकों की रचना की। उन्होंने ‘लूसिफेर’, ‘द कॉमनवील’ और ‘न्यू इंडिया’ का संपादन भी किया।

ऐनी बेसेंट (Annie Besant)
ऐनी बेसेंट

ऐनी बेसेंट की प्रमुख कृतियाँ

ऐनी बेसेंट की प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं —

  • डेथ ऐंड आफ्टर (थियोसोफिकल मैन्युअल III), 1893 ई.
  • आत्मकथा, 1893 ई.
  • इन द आउटर कोर्ट, 1895 ई.
  • कर्म (थियोसोफिकल मैन्युअल IV), 1895 ई., इसमें कर्म-व्यवस्था का विवेचन किया गया है।
  • द सेल्फ ऐंड इट्स शीथ्स, 1895 ई.
  • मैन ऐंड हिज़ बॉडीज़ (थियोसोफिकल मैन्युअल VII), 1896 ई.
  • द पाथ ऑफ डिसाइपलशिप, 1896 ई., इसमें मुमुक्षु के मार्ग का वर्णन है।
  • द ऐंश्यिएंट विज़्डम, 1897 ई.
  • फोर ग्रेट रिलिजन्स, 1897 ई., यह प्रसिद्ध कृति बाद में चार भागों में प्रकाशित हुई, जिनमें हिंदुइज़्म, ज़ोरास्ट्रियनिज़्म, बुद्धिज़्म और क्रिश्चियनिटी सम्मिलित थे।
  • एवोल्यूशन ऑफ लाइफ ऐंड फॉर्म, 1899 ई.
  • सम प्रॉब्लम्स ऑफ लाइफ, 1900 ई.
  • थॉट पावर : इट्स कंट्रोल ऐंड कल्चर, 1901 ई.
  • रिलिजस प्रॉब्लम इन इंडिया, 1902 ई., यह कृति बाद में इस्लाम, जैनिज़्म, सिखिज़्म और थियोसोफी से संबंधित चार भागों में प्रकाशित हुई।
  • द पेडिग्री ऑफ मैन, 1904 ई.
  • ए स्टडी इन कॉन्शसनेस, 1904 ई.
  • ए स्टडी इन कर्म, 1912 ई., कर्म-सिद्धांत पर आधारित कृति।
  • वेक अप, इंडिया : ए प्ली फॉर सोशल रिफॉर्म, 1913 ई.
  • इंडिया ऐंड ए एम्पायर, 1914 ई.
  • फॉर इंडियाज़ अपलिफ्ट, 1914 ई.
  • द कॉमनवील, 1914 ई., जुलाई से प्रकाशित होने वाला प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्र।
  • न्यू इंडिया, 1915 ई., मद्रास (चेन्नई) से प्रकाशित होने वाला दैनिक पत्र।
  • हाऊ इंडिया रॉट फॉर फ्रीडम, 1915 ई., आधिकारिक अभिलेखों के आधार पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इतिहास से संबंधित प्रसिद्ध कृति।
  • इंडिया : ए नेशन, 1915 ई., ‘द पीपुल्स बुक्स सीरीज़’ की इस पुस्तक को 1916 ई. में ब्रिटिश सरकार ने जब्त कर लिया। इसमें भारत के स्वायत्त शासन की विचारधारा का समर्थन किया गया था।
  • कांग्रेस स्पीचेज़, 1917 ई.
  • द बर्थ ऑफ न्यू इंडिया, 1917 ई., यह कृति ‘फॉर इंडियाज़ अपलिफ्ट’ से विषय की दृष्टि से मिलती-जुलती थी।
  • लेटर्स टू ए यंग इंडियन प्रिंस, 1921 ई., इसमें देशी रियासतों को आधुनिक तरीकों से पुनर्गठित करने का सुझाव दिया गया था।
  • द फ्यूचर ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स, 1922 ई., यह तत्कालीन राजनीतिक समस्याओं को समझने के लिए उपयोगी कृति मानी गई।
  • ब्रह्म विद्या, 1923 ई.
  • इंडियन आर्ट, 1925 ई., भारतीय संस्कृति पर आधारित यह कृति कलकत्ता विश्वविद्यालय में दिए गए कमला व्याख्यानों पर आधारित थी।
  • इंडिया : बाउंड ऑर फ्री?, 1926 ई., इसमें भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य का व्यवस्थित सर्वेक्षण प्रस्तुत किया गया था तथा इसे भारतीय इतिहास का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज माना गया।

इसके अतिरिक्त उनकी अन्य उल्लेखनीय कृतियों में माई पाथ टू एथीज़्म, हिंदू आइडियल्स, वर्ल्ड प्रॉब्लम्स ऑफ टुडे, रेडिकलिज़्म एंड सोशलिज़्म, सोशल प्रॉब्लम्स, लेक्चर्स ऑन पॉलिटिकल साइंस और द रिलीजियस प्रॉब्लम्स इन इंडिया आदि भी सम्मिलित हैं।

भारत के प्रति अंतिम समय तक प्रेम

भारतीय संस्कृति के प्रति ऐनी बेसेंट का लगाव उनके जीवन के अंतिम क्षण तक बना रहा। ब्रिटिश समाचार-पत्रों ने उन्हें ‘पूरब का सितारा’ कहा था। वे भारत के प्रति इतनी गहराई से जुड़ी हुई थीं कि उनकी इच्छा थी कि उनका अगला जन्म एक हिंदू परिवार में हो। उन्होंने अपने अंतिम संस्कार की इच्छा वाराणसी में गंगा के तट पर भारतीय पद्धति से किए जाने की व्यक्त की थी।

निधन और अंतिम इच्छा

1930 ई. के पश्चात ऐनी बेसेंट का स्वास्थ्य धीरे-धीरे क्षीण होने लगा। वे अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक थियोसोफिकल सोसाइटी और भारत से जुड़ी रहीं। 20 सितंबर 1933 ई. को 86 वर्ष की आयु में अड्यार, मद्रास (वर्तमान चेन्नई, तमिलनाडु) में उनका निधन हुआ। उनकी इच्छा के अनुरूप उनका अंतिम संस्कार भारतीय पद्धति से किया गया। उस समय उनके पार्थिव शरीर को विमान या रेल द्वारा वाराणसी ले जाना संभव नहीं था, अतः उनका दाह-संस्कार किया गया और बाद में उनकी अस्थियों को बनारस लाकर दशाश्वमेध घाट पर गंगा में विसर्जित किया गया। शेष अस्थियाँ अड्यार स्थित ‘गार्डन ऑफ रिमेंबरेंस’ में रखी गईं। उनके निधन के बाद भी भारत में उनकी स्मृति जीवंत बनी रही। 1 अक्टूबर 1963 ई. को भारतीय डाक विभाग ने उनके सम्मान में डाक-टिकट जारी किया।

ऐनी बेसेंट का महत्त्व और मूल्यांकन

ऐनी बेसेंट का जीवन अनेक वैचारिक और सामाजिक चरणों से गुजरने वाला असाधारण जीवन था। उन्होंने नास्तिकता, स्वतंत्र चिंतन, समाजवाद, श्रमिक आंदोलन, महिला अधिकार, थियोसोफी, भारतीय संस्कृति, शिक्षा और राजनीतिक स्वशासन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय एवं प्रभावशाली भूमिका निभाई। भारत में उनका सर्वाधिक स्थायी प्रभाव शिक्षा, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और होम रूल आंदोलन के क्षेत्र में दिखाई देता है। सेंट्रल हिंदू कॉलेज की स्थापना, राष्ट्रीय शिक्षा का प्रसार, महिला संगठनों का समर्थन, होम रूल लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्षता उनके प्रमुख योगदानों में सम्मिलित हैं। उनके जीवन से यह भी सीख मिलती है कि किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व का मूल्यांकन केवल उसके एक वैचारिक चरण के आधार पर नहीं किया जा सकता है। ऐनी बेसेंट ने अपने जीवन में कई बार अपने विचार परिवर्तित किए और प्रत्येक चरण में अपने विश्वासों के अनुरूप सक्रिय रूप से कार्य किया।

वे मूल रूप से ब्रिटिश थीं, किंतु भारत के प्रति उनके गहरे लगाव ने उन्हें भारतीय राष्ट्रीय जीवन का अभिन्न अंग बना दिया। भारतीयों द्वारा उन्हें ‘माँ बसंत’ और महात्मा गांधी द्वारा ‘वसंत देवी’ के रूप में सम्मानित किया जाना उनके और भारत के बीच स्थापित गहरे भावनात्मक संबंध का परिचायक है। उन्होंने स्वयं अपनी समाधि के लिए जिन शब्दों की इच्छा व्यक्त की थी : “उन्होंने सत्य का पीछा करने की कोशिश की”, ये शब्द उनके पूरे जीवन की वैचारिक यात्रा का सार प्रस्तुत करते हैं। भारतीय इतिहास में ऐनी बेसेंट का स्थान एक ऐसी विदेशी महिला के रूप में सदैव अमर रहेगा, जिसने भारत को केवल राजनीतिक कार्यक्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि अपनी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक भूमि के रूप में स्वीकार किया और भारतीय राष्ट्रीय जागरण तथा स्वशासन के संघर्ष में अविस्मरणीय योगदान दिया।

ऐनी बेसेंट से संबंधित FAQs

1. ऐनी बेसेंट कौन थीं?

ऐनी बेसेंट ब्रिटिश मूल की समाज सुधारक, शिक्षाविद्, लेखिका, थियोसोफिस्ट और भारतीय स्वशासन की प्रमुख समर्थक थीं। उन्होंने भारत में शिक्षा, सामाजिक सुधार, महिला अधिकार और राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

2. ऐनी बेसेंट का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

ऐनी बेसेंट का जन्म 1 अक्टूबर 1847 ई. को लंदन, इंग्लैंड में हुआ था। उनका मूल नाम एनी वुड था।

3. ऐनी बेसेंट थियोसोफिकल सोसाइटी से कब जुड़ीं?

ऐनी बेसेंट 1889 ई. में थियोसोफिकल सोसाइटी से जुड़ीं। बाद में वे इसकी प्रमुख नेताओं में शामिल हुईं और 1907 ई. में इसकी अध्यक्ष बनीं। वे 1933 ई. में अपनी मृत्यु तक इस पद पर रहीं।

4. ऐनी बेसेंट ने भारत में शिक्षा के क्षेत्र में क्या योगदान दिया?

उन्होंने भारतीय शिक्षा में आधुनिक ज्ञान के साथ भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति के अध्ययन पर बल दिया। 1898 ई. में बनारस में सेंट्रल हिंदू कॉलेज की स्थापना में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान था, जो आगे चलकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के विकास से जुड़ा।

5. ऐनी बेसेंट ने होम रूल आंदोलन में क्या भूमिका निभाई?

उन्होंने 1916 ई. में ऑल इंडिया होम रूल लीग की स्थापना की और भारत के लिए स्वशासन की मांग को व्यापक रूप से प्रचारित किया। उन्होंने भाषणों, लेखों, सभाओं और समाचार-पत्रों के माध्यम से होम रूल आंदोलन को लोकप्रिय बनाया।

6. ऐनी बेसेंट भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष कब बनीं?

ऐनी बेसेंट 1917 ई. में कलकत्ता अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। वे कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली महिला थीं।

7. ऐनी बेसेंट ने महिला अधिकारों के लिए क्या कार्य किया?

उन्होंने महिला शिक्षा, राजनीतिक अधिकार, सामाजिक सम्मान और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी का समर्थन किया। उन्होंने महिलाओं की स्थिति सुधारने तथा बाल विवाह जैसी सामाजिक समस्याओं के विरुद्ध भी आवाज उठाई।

8. ऐनी बेसेंट का जे. कृष्णमूर्ति से क्या संबंध था?

ऐनी बेसेंट ने जिद्दू कृष्णमूर्ति और उनके भाई नित्यानंद की देखरेख की। थियोसोफिकल आंदोलन में कृष्णमूर्ति को संभावित विश्व-गुरु के रूप में देखा गया और बेसेंट ने उनके आध्यात्मिक प्रशिक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

9. ऐनी बेसेंट की प्रमुख पुस्तकें कौन-सी हैं?

उनकी प्रमुख कृतियों में ‘एन ऑटोबायोग्राफी’, ‘माई पाथ टू एथीज़्म’, ‘हिंदू आइडियल्स’, ‘इंडिया: ए नेशन’, ‘इंडिया: बॉन्ड ऑर फ्री?’, ‘द फ्यूचर ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स’ और ‘हाउ इंडिया रॉट हर फ्रीडम’ आदि शामिल हैं।

10. ऐनी बेसेंट का निधन कब हुआ?

ऐनी बेसेंट का निधन 20 सितंबर 1933 ई. को अड्यार, मद्रास में हुआ। उनकी मृत्यु के समय उनकी आयु 85 वर्ष थी। भारतीय शिक्षा, सांस्कृतिक पुनर्जागरण, थियोसोफी और होम रूल आंदोलन में उनके योगदान के कारण उन्हें भारतीय इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
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