स्वामी विवेकानंद का शिक्षा-दर्शन
स्वामी विवेकानंद के अनुसार शिक्षा मनुष्य के भीतर पहले से विद्यमान पूर्णता और ज्ञान की अभिव्यक्ति है। उनका मानना था कि ज्ञान बाहर से थोपा नहीं जाता, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर निहित शक्तियों और क्षमताओं को शिक्षा के माध्यम से विकसित एवं प्रकट किया जाता है; शिक्षक का कार्य केवल इन अंतर्निहित शक्तियों को जागृत करने में सहायता करना है। उनके शिक्षा-दर्शन का प्रमुख उद्देश्य चरित्र-निर्माण, आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास, इच्छाशक्ति और व्यक्तित्व का समग्र विकास था। वे ऐसी शिक्षा के पक्षधर थे जो व्यक्ति को अपने पैरों पर खड़ा होने, जीवन की चुनौतियों का सामना करने और समाज के प्रति अपने दायित्वों को निभाने योग्य बनाए। उनके अनुसार शिक्षा में शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास का संतुलित समन्वय होना चाहिए। वे मन की एकाग्रता को ज्ञान प्राप्ति का प्रमुख साधन मानते थे और केवल किताबी ज्ञान के बजाय व्यावहारिक एवं जीवनोपयोगी शिक्षा पर बल देते थे। वे बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा देने के समर्थक थे, ताकि वे विषयों को सहजता से समझ सकें। साथ ही, वे महिला शिक्षा के प्रबल समर्थक थे और मानते थे कि बालिकाओं को भी पुरुषों के समान शिक्षा एवं आत्म-विकास के अवसर मिलने चाहिए। इस प्रकार विवेकानंद का शिक्षा-दर्शन केवल ज्ञान अर्जित करने तक सीमित नहीं था, बल्कि उसका उद्देश्य ऐसे चरित्रवान, आत्मनिर्भर, सशक्त, नैतिक और सेवाभावी मनुष्यों का निर्माण करना था जो स्वयं के विकास के साथ समाज और राष्ट्र के उत्थान में भी योगदान दे सकें।
स्वामी विवेकानंद का परिचय
स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 ई. को कलकत्ता में एक कायस्थ परिवार में हुआ था और उनका पूर्वाश्रम का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता उच्च न्यायालय के प्रसिद्ध वकील थे, जबकि उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक, संस्कारी और प्रबुद्ध महिला थीं। बचपन से ही नरेंद्रनाथ अत्यंत कुशाग्र बुद्धि, जिज्ञासु और तर्कशील स्वभाव के थे। उन्हें तर्कशास्त्र, साहित्य, दर्शन, पाश्चात्य विचारधारा और यूरोपीय इतिहास में विशेष रुचि थी। उनकी प्रारंभिक शिक्षा कलकत्ता के मेट्रोपॉलिटन इंस्टीट्यूशन में हुई और बाद में उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज में अध्ययन किया। वे ईश्वर के अस्तित्व और आध्यात्मिक सत्य को लेकर निरंतर प्रश्न करते थे तथा विभिन्न साधु-संतों और विद्वानों से मिलकर ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुभूति के विषय में जानने का प्रयास करते थे।
इसी खोज के क्रम में 1881 ई. में उनकी भेंट श्रीरामकृष्ण परमहंस से हुई, जो उनके जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्रनाथ के आध्यात्मिक प्रश्नों का समाधान किया और उन्हें आत्म-साक्षात्कार का मार्ग दिखाया। नरेंद्रनाथ उनके शिष्य बन गए और पूर्ण निष्ठा से उनकी सेवा करने लगे। रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें सभी धर्मों की मूल एकता तथा आत्म-साक्षात्कार को जीवन का परम उद्देश्य बताया। 1886 ई. में रामकृष्ण परमहंस के महासमाधि लेने के बाद नरेंद्रनाथ ने उनके संदेश को जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प लिया और संन्यास धारण कर स्वामी विवेकानंद नाम ग्रहण किया। इसके बाद उन्होंने अपने गुरु-भाइयों के साथ मठवासी जीवन को संगठित किया, जो आगे चलकर रामकृष्ण मठ के रूप में विकसित हुआ।
1888 से 1893 ई. तक उन्होंने परिव्राजक संन्यासी के रूप में पूरे भारत का भ्रमण किया और इस दौरान देश की गरीबी, अशिक्षा, सामाजिक असमानता तथा जनसाधारण की कठिनाइयों को निकट से देखा। इन अनुभवों ने उनके चिंतन को नई दिशा दी और वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भारत के पुनर्जागरण के लिए शिक्षा, आत्मनिर्भरता, चरित्र-निर्माण और मानव-सेवा आवश्यक हैं। वे गरीबों, वंचितों और कमजोर वर्गों की सेवा को सच्ची ईश्वर-सेवा मानते थे। उनके जीवन की एक बड़ी उपलब्धि 1893 ई. में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में दिया गया ऐतिहासिक भाषण था, जिसकी शुरुआत उन्होंने “अमेरिका के भाइयों और बहनों!” संबोधन से की। उन्होंने इस मंच से वेदांत, योग, धार्मिक सहिष्णुता, सार्वभौमिकता और मानव-एकता का संदेश विश्व के सामने रखा तथा भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
भारत लौटने के बाद उन्होंने 1897 ई. में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की और आध्यात्मिक साधना को शिक्षा, चिकित्सा, समाज-सेवा तथा मानव-कल्याण से जोड़ा। उनका विश्वास था कि गरीबों, रोगियों और जरूरतमंदों की सेवा ही सच्ची भक्ति है। शिक्षा के संबंध में उनका मानना था कि इसका उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और व्यक्तित्व का विकास करना है। उन्होंने युवाओं को अपनी अंतर्निहित शक्ति पहचानने, निर्भीक बनने और राष्ट्र-निर्माण में सक्रिय योगदान देने के लिए प्रेरित किया। वे सभी धर्मों की मूल एकता में विश्वास रखते थे और धार्मिक कट्टरता तथा संकीर्णता के विरोधी थे। उनके अनुसार विभिन्न धर्म सत्य की प्राप्ति के अलग-अलग मार्ग हैं और अपने धर्म का सम्मान करने के साथ-साथ दूसरे धर्मों का सम्मान करना भी आवश्यक है। उन्होंने राजयोग, कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग के माध्यम से योग और वेदांत को व्यापक रूप में समझाया तथा योग को केवल शारीरिक अभ्यास न मानकर मन, बुद्धि और आत्मा के विकास की साधना बताया। 4 जुलाई 1902 ई. को मात्र 39 वर्ष की आयु में बेलूर मठ में उनका निधन हुआ। अपने संक्षिप्त जीवन में उन्होंने भारतीय आध्यात्मिकता को आधुनिक सामाजिक चेतना, मानव-सेवा, शिक्षा, आत्मविश्वास और राष्ट्र-जागरण से जोड़ा। उनके विचारों और संस्थागत कार्यों का प्रभाव भारत ही नहीं, बल्कि विश्वभर में दिखाई देता है और उनका जीवन आज भी आत्मनिर्भरता, चरित्र-निर्माण, सेवा तथा राष्ट्र-निर्माण की प्रेरणा देता है।
स्वामी विवेकानंद का शिक्षा-दर्शन
स्वामी विवेकानंद के शिक्षा-दर्शन का केंद्र मनुष्य-निर्माण, चरित्र-निर्माण और व्यक्तित्व-विकास था। वे ऐसी शिक्षा के पक्षधर नहीं थे जो केवल परीक्षाएँ उत्तीर्ण करने, अच्छे अंक प्राप्त करने या भाषण देने की क्षमता तक सीमित हो। उनके अनुसार ऐसी शिक्षा का कोई विशेष लाभ नहीं, जो व्यक्ति में चरित्र, आत्मविश्वास, साहस, विवेक, आत्मनिर्भरता और समाज-सेवा की भावना विकसित न करे। वे औपनिवेशिक काल में प्रचलित ऐसी शिक्षा-व्यवस्था के आलोचक थे, जिसे वे मुख्यतः लिपिकीय वर्ग तैयार करने वाली शिक्षा मानते थे। उनका प्रसिद्ध कथन था : “शिक्षा मनुष्य में पहले से विद्यमान पूर्णता की अभिव्यक्ति है।” इस दृष्टि से शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य के भीतर निहित शक्तियों को जागृत करना और उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक व्यक्तित्व का समग्र विकास करना है।

व्यावहारिक एवं जीवनोपयोगी शिक्षा
विवेकानंद सैद्धांतिक और केवल पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा व्यावहारिक तथा जीवनोपयोगी शिक्षा को अधिक महत्त्व देते थे। उनका मानना था कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्ति को जीवन की वास्तविक परिस्थितियों और संघर्षों का सामना करने के योग्य बनाए तथा उसे अपने पैरों पर खड़ा होने की शक्ति दे। वे शिक्षा को केवल ज्ञान-संचय नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति के विकास, आत्मसंयम और जीवन-निर्माण की प्रक्रिया मानते थे। उनके अनुसार, “तुमको कार्य के सभी क्षेत्रों में व्यावहारिक बनना पड़ेगा। सिद्धान्तों के ढेरों ने सम्पूर्ण देश का विनाश कर दिया है।” इसलिए वे ऐसी शिक्षा चाहते थे जो ज्ञान को व्यवहार से जोड़े और व्यक्ति को आत्मनिर्भर एवं कर्मठ बनाए।
चरित्र-निर्माण और मनुष्य-निर्माण
विवेकानंद के शिक्षा-दर्शन में चरित्र-निर्माण को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। वे मानते थे कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल मस्तिष्क में सूचनाएँ भरना नहीं, बल्कि व्यक्ति के विचार, इच्छाशक्ति, आचरण और व्यक्तित्व को विकसित करना है। उनके अनुसार, “जिस शिक्षा से हम अपना जीवन-निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र-गठन कर सकें और विचारों का सामंजस्य कर सकें, वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है।” वे ऐसी शिक्षा चाहते थे जिससे मनुष्य में आत्मविश्वास, साहस, आत्मसंयम, विवेक, नैतिकता और सेवा-भाव का विकास हो। उनके लिए शिक्षित व्यक्ति वही है जो अर्जित ज्ञान को अपने जीवन और चरित्र में उतार सके।
शिक्षा का उद्देश्य: अंतर्निहित शक्तियों का विकास
विवेकानंद के अनुसार प्रत्येक मनुष्य में अनेक शक्तियाँ और संभावनाएँ पहले से विद्यमान रहती हैं। शिक्षा का कार्य बाहर से ज्ञान थोपना नहीं, बल्कि इन अंतर्निहित शक्तियों को विकसित और अभिव्यक्त करना है। उन्होंने कहा था— “शिक्षा मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।” इसीलिए वे शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति के शरीर, मन, बुद्धि, इच्छाशक्ति और आत्मिक चेतना के संतुलित विकास पर बल देते थे। उनके विचार में शिक्षा का अंतिम लक्ष्य मनुष्य के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास और उसके जीवन को उद्देश्यपूर्ण बनाना है।
शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास
विवेकानंद शिक्षा को शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास का माध्यम मानते थे। उनका विश्वास था कि कमजोर शरीर और दुर्बल इच्छाशक्ति वाला व्यक्ति जीवन की चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना नहीं कर सकता। इसलिए शिक्षा में शारीरिक शक्ति, मानसिक दृढ़ता, बुद्धि-विकास और आध्यात्मिक चेतना को समान महत्त्व मिलना चाहिए। वे युवाओं में साहस, ऊर्जा और आत्मविश्वास विकसित करना चाहते थे तथा शिक्षा को जीवन-संघर्ष के लिए तैयार करने वाली शक्ति मानते थे।
लौकिक और पारलौकिक शिक्षा
विवेकानंद शिक्षा के लौकिक और पारलौकिक दोनों पक्षों को आवश्यक मानते थे। लौकिक दृष्टि से शिक्षा व्यक्ति को ज्ञान, कौशल, आत्मनिर्भरता और आजीविका के योग्य बनाए, जबकि पारलौकिक दृष्टि से वह आत्मज्ञान, नैतिकता और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करे। वे ऐसी शिक्षा के पक्षधर थे जो व्यक्ति को सांसारिक जीवन के दायित्वों को निभाने के साथ-साथ अपने उच्चतर आध्यात्मिक उद्देश्य को समझने में भी सहायता करे।
शिक्षा का सार्वभौमीकरण और जनशिक्षा
विवेकानंद भारत के पुनर्निर्माण के लिए जनसाधारण तक शिक्षा पहुँचाने को अत्यंत आवश्यक मानते थे। वे विशेष रूप से गरीब और वंचित वर्गों की शिक्षा पर बल देते थे। उनके अनुसार भारत की गरीबी और सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए शिक्षा का व्यापक प्रसार आवश्यक है। उन्होंने भारत और पश्चिम के सामाजिक-आर्थिक अंतर को शिक्षा की उपलब्धता से जोड़ते हुए शिक्षा को राष्ट्रीय उन्नति का प्रमुख साधन माना। उनके विचार में केवल कुछ वर्गों तक सीमित शिक्षा से देश का वास्तविक विकास संभव नहीं है; शिक्षा का लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचना चाहिए।
स्त्री-शिक्षा और समान अवसर
विवेकानंद बालकों और बालिकाओं दोनों के लिए शिक्षा के समान अवसर के समर्थक थे। वे मानते थे कि राष्ट्र के विकास में महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। उनके अनुसार स्त्रियों को ऐसी शिक्षा मिलनी चाहिए जिससे उनमें आत्मविश्वास, चरित्र, ज्ञान और आत्मनिर्भरता का विकास हो तथा वे अपने जीवन और समाज के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा सकें।
धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा
विवेकानंद धार्मिक शिक्षा को केवल पुस्तकों और धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन तक सीमित रखने के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि धर्म का वास्तविक प्रभाव आचरण, चरित्र और संस्कारों में दिखाई देना चाहिए। इसलिए धार्मिक और नैतिक शिक्षा के माध्यम से सत्य, आत्मसंयम, करुणा, निःस्वार्थ सेवा, सहिष्णुता और मानव-प्रेम जैसे गुणों का विकास किया जाना चाहिए। वे धर्म को जीवन से जोड़ने और उसे व्यावहारिक बनाने पर बल देते थे।
गुरु-शिष्य संबंध
विवेकानंद भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा से प्रभावित थे और शिक्षा में शिक्षक तथा विद्यार्थी के निकट एवं आत्मीय संबंध को महत्त्वपूर्ण मानते थे। उनके अनुसार शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि विद्यार्थी के चरित्र और व्यक्तित्व के निर्माण में मार्गदर्शक होना चाहिए। शिक्षा में व्यक्तिगत संपर्क, अनुशासन, आदर्श आचरण और प्रेरणा का विशेष महत्त्व है। इस दृष्टि से वे गुरु-गृह या आश्रम-आधारित शिक्षा की उपयोगिता को भी स्वीकार करते थे।
तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा
देश की आर्थिक उन्नति के लिए विवेकानंद तकनीकी, व्यावसायिक और कौशल-आधारित शिक्षा को आवश्यक मानते थे। उनका विचार था कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्ति को रोजगार और आत्मनिर्भरता के योग्य बनाए तथा देश के आर्थिक विकास में योगदान दे। केवल सैद्धांतिक ज्ञान के बजाय विज्ञान, तकनीक, उद्योग और व्यावहारिक कौशल का विकास राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए आवश्यक है।
शिक्षा और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण
विवेकानंद के लिए शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण भी था। वे ऐसी शिक्षा चाहते थे जो व्यक्ति में राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक उत्तरदायित्व, सेवा-भाव और आत्मविश्वास विकसित करे। उनका विश्वास था कि भारत की उन्नति का आधार शिक्षित, चरित्रवान, आत्मनिर्भर और साहसी नागरिकों का निर्माण है। इसलिए वे शिक्षा को आर्थिक, सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक पुनर्जागरण का प्रमुख साधन मानते थे।
विद्यार्थी की रुचि और व्यक्तित्व का महत्त्व
विवेकानंद शिक्षा में विद्यार्थी की रुचि, क्षमता और व्यक्तिगत प्रवृत्ति को महत्त्व देते थे। उनका मानना था कि सभी विद्यार्थियों को एक ही ढाँचे में ढालने के बजाय उनकी स्वाभाविक प्रतिभा और रुचियों को पहचानकर उनका विकास किया जाना चाहिए। शिक्षा तभी प्रभावी होगी जब विद्यार्थी उसमें सक्रिय रूप से भाग ले और अपने अनुभवों तथा क्षमताओं के अनुसार ज्ञान को आत्मसात करे।
शिक्षा और व्यक्तित्व-विकास
विवेकानंद के अनुसार देश की आर्थिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए शिक्षा की भूमिका केंद्रीय है। वे शिक्षा के माध्यम से ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना चाहते थे जिसमें ज्ञान के साथ चरित्र, शक्ति के साथ विवेक और आत्मविश्वास के साथ सेवा-भाव हो। उनका विचार था कि केवल बाहरी ज्ञान और दिखावटी विद्वत्ता पर्याप्त नहीं है; शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति के भीतर से विकास करना है। इसी कारण उनका शिक्षा-दर्शन आधुनिक भारत में मनुष्य-निर्माण और राष्ट्र-निर्माण की शिक्षा की महत्त्वपूर्ण आधारभूमि माना जाता है।
राष्ट्रीय युवा दिवस
भारत सरकार ने 1984 ई. में 12 जनवरी अर्थात् स्वामी विवेकानंद की जन्मतिथि को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में घोषित किया। वर्ष 1985 ई. से देशभर में 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य युवाओं को स्वामी विवेकानंद के जीवन, विचारों, चरित्र, आत्मविश्वास, सेवा-भाव और राष्ट्र-निर्माण की भावना से प्रेरित करना है।
स्वामी विवेकानंद का जीवन अत्यंत संक्षिप्त था, किंतु इतने कम समय में उन्होंने भारतीय समाज, धर्म, दर्शन और राष्ट्रीय चेतना पर गहरा प्रभाव डाला। लगभग 39 वर्ष के जीवन में उन्होंने भारत की आध्यात्मिक परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित किया और भारतीय युवाओं में आत्मविश्वास तथा राष्ट्र-सेवा की भावना जागृत की।
विश्व मंच पर भारतीय धर्म और संस्कृति की प्रतिष्ठा
लगभग तीस वर्ष की आयु में स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया। उनके प्रभावशाली भाषण ने पश्चिमी जगत का ध्यान भारतीय धर्म, वेदांत और आध्यात्मिक दर्शन की ओर आकर्षित किया। उन्होंने हिंदू धर्म को संकीर्ण धार्मिक पहचान के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक, उदार और सार्वभौमिक आध्यात्मिक परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया। उनके व्यक्तित्व और विचारों का प्रभाव भारत और विदेशों के अनेक विद्वानों तथा साहित्यकारों पर पड़ा। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी विवेकानंद के अध्ययन को भारत को समझने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम माना। फ्रांसीसी साहित्यकार रोमां रोलां ने उनके व्यक्तित्व में असाधारण नेतृत्व-शक्ति और आध्यात्मिक प्रभाव देखा। इन प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट होता है कि विवेकानंद का प्रभाव केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान उत्पन्न किया।
जन-जागरण और राष्ट्र-निर्माण
स्वामी विवेकानंद केवल संन्यासी नहीं थे; वे महान वक्ता, विचारक, लेखक, देशभक्त और मानवतावादी भी थे। पश्चिम से भारत लौटने के बाद उन्होंने भारतीय जनता में आत्मविश्वास और जागरण की भावना पैदा करने का प्रयास किया। उनका आह्वान था कि भारत का पुनर्निर्माण केवल उच्च वर्ग के माध्यम से नहीं, बल्कि किसान, मजदूर, कारीगर, श्रमिक और सामान्य जनता की सक्रिय भागीदारी से होना चाहिए। उन्होंने ‘नया भारत’ सामान्य जनता के बीच से उभरने की कल्पना की। उनका विश्वास था कि भारत की वास्तविक शक्ति उसके करोड़ों सामान्य लोगों में निहित है। इसलिए उन्होंने शिक्षा, आत्मविश्वास, संगठन और सेवा को राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का आधार माना।
विवेकानंद के विचारों ने आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना को प्रभावित किया। अनेक राष्ट्रवादी नेताओं ने उनके लेखन और भाषणों से प्रेरणा प्राप्त की। यद्यपि यह कहना उचित नहीं होगा कि स्वतंत्रता आंदोलन को प्राप्त जनसमर्थन सीधे उनके आह्वान का परिणाम था, लेकिन भारतीय आत्मगौरव, राष्ट्रीय चेतना और युवाओं में सक्रियता पैदा करने में उनके विचारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।
भारत की आध्यात्मिक विरासत में विश्वास
स्वामी विवेकानंद को भारत की आध्यात्मिक और दार्शनिक परंपरा पर गहरा विश्वास था। वे भारत को धर्म, दर्शन, त्याग, तपस्या और आध्यात्मिक चिंतन की महान भूमि मानते थे। किंतु उनका राष्ट्रवाद अतीत के गौरव तक सीमित नहीं था। वे चाहते थे कि भारत अपनी आध्यात्मिक शक्ति को बनाए रखते हुए आधुनिक विज्ञान, शिक्षा, संगठन और व्यावहारिक ज्ञान को भी अपनाए। उनके लिए भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता का अर्थ दूसरे देशों को हीन समझना नहीं था। वे भारत और पश्चिम की श्रेष्ठ उपलब्धियों के समन्वय के समर्थक थे। उनका विश्वास था कि भारत अपनी आध्यात्मिक दृष्टि के माध्यम से विश्व को कुछ महत्त्वपूर्ण दे सकता है और साथ ही पश्चिम से विज्ञान तथा संगठन की उपयोगी उपलब्धियाँ ग्रहण कर सकता है।


