महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले
मुख्य लेख : उन्नीसवीं सदी में भारतीय सांस्कृतिक जागरण
महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले उन्नीसवीं शताब्दी के भारत के प्रमुख समाज-सुधारकों, विचारकों, लेखकों और जाति-विरोधी आंदोलन के अग्रणी नेताओं में थे। उन्होंने सामाजिक सुधार को केवल धार्मिक या नैतिक सुधार तक सीमित न रखकर उसे शिक्षा, सामाजिक समानता, स्त्री-मुक्ति, आत्मसम्मान, मानव गरिमा और सामाजिक न्याय के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा तथा जाति-आधारित भेदभाव, अस्पृश्यता, स्त्री-अशिक्षा, बाल-विवाह और रूढ़िवादी धार्मिक प्रथाओं का विरोध किया। उनका मानना था कि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब समाज के सभी वर्गों को शिक्षा, सम्मान, स्वतंत्रता और समान अवसर प्राप्त हों। अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर उन्होंने महिलाओं, शूद्रों, अतिशूद्रों और अन्य वंचित समुदायों की शिक्षा तथा सामाजिक उत्थान के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया और 1873 ई. में सत्यशोधक समाज की स्थापना करके अपने सामाजिक विचारों को संगठित आंदोलन का रूप दिया। उनकी प्रमुख रचनाओं ‘तृतीय रत्न’, ‘गुलामगिरी’, ‘शेतकऱ्याचा आसूड’ और ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ में उनके सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और मानवीय विचारों की स्पष्ट अभिव्यक्ति मिलती है।
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 ई. को महाराष्ट्र के सातारा जिले के कटगुण गाँव में हुआ था। वे माली समुदाय से संबंधित थे, जिसे तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में शूद्र माना जाता था। उनके पिता गोविंदराव फुले फूलों और सब्जियों के व्यवसाय से जुड़े थे और परिवार का संबंध इसी व्यवसाय से होने के कारण ‘फुले’ उपनाम प्रचलित हुआ। उनकी माता चिमणाबाई का निधन ज्योतिराव के बाल्यकाल में ही हो गया था, जिसके बाद उनके पालन-पोषण में परिवार की महिला सगुणाबाई का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। बाद में उनका परिवार पुणे आकर बस गया।
बाल्यकाल से ही ज्योतिराव ने जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता को निकट से देखा। तत्कालीन समाज में जन्म के आधार पर व्यक्ति की सामाजिक स्थिति निर्धारित होती थी और शिक्षा तथा सार्वजनिक अवसरों तक पहुँच भी व्यापक रूप से असमान थी। इन परिस्थितियों ने ज्योतिराव के मन में सामाजिक व्यवस्था के प्रति प्रश्न खड़े किए, जो आगे चलकर उनके जाति-विरोधी और समानतावादी चिंतन के विकास का महत्त्वपूर्ण आधार बने।
शिक्षा और वैचारिक विकास
ज्योतिराव की प्रारंभिक शिक्षा मराठी में हुई और सामाजिक परिस्थितियों के कारण कुछ समय के लिए बाधित भी हुई, किंतु बाद में उन्हें पुनः शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला। वर्ष 1842 ई. में उन्होंने पुणे के स्कॉटिश मिशन हाई स्कूल में प्रवेश लिया और अंग्रेज़ी शिक्षा प्राप्त की, जिसने उन्हें आधुनिक राजनीतिक, सामाजिक और मानवीय विचारों से परिचित कराया। पश्चिमी उदारवादी चिंतन, स्वतंत्रता, समानता, मानवाधिकार और तर्कवाद से संबंधित विचारों ने उनके बौद्धिक विकास को गहराई से प्रभावित किया।
ज्योतिराव फुले थॉमस पेन के विचारों से विशेष रूप से प्रभावित थे; पेन की ‘द राइट्स ऑफ मैन’ जैसी रचनाओं से उन्हें स्वतंत्रता और मानवाधिकार की आधुनिक अवधारणाओं को समझने में सहायता मिली। इसके साथ ही पुणे में आने वाले कबीरपंथी फकीरों के माध्यम से उन्हें संत कबीर के विचारों से परिचित होने का अवसर मिला- वे कबीर की रचनाएँ पढ़ते थे और उनके अनेक दोहे उन्हें कंठस्थ थे। कबीर की जाति-विरोधी और समानतावादी दृष्टि के साथ-साथ संत तुकाराम की भक्ति-परंपरा से भी उन्होंने प्रेरणा ग्रहण की। इस प्रकार आधुनिक उदारवादी विचारों, भक्ति संतों की समानतावादी परंपरा और अपने व्यक्तिगत सामाजिक अनुभवों ने मिलकर फुले की वैचारिक दृष्टि का निर्माण किया, जिसमें तर्क, न्याय और मानवता की कसौटी पर सामाजिक-धार्मिक परंपराओं को परखने पर विशेष बल था।
विवाह और सावित्रीबाई फुले का सहयोग
ज्योतिराव फुले का विवाह 1840 ई. में सावित्रीबाई फुले से हुआ। विवाह के समय सावित्रीबाई औपचारिक शिक्षा से वंचित थीं; ज्योतिराव ने उन्हें शिक्षित किया और आगे चलकर सावित्रीबाई स्वयं भारत के स्त्री-शिक्षा आंदोलन की अग्रणी व्यक्तित्व बनीं। दोनों का संबंध केवल पारिवारिक जीवन तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने मिलकर सामाजिक परिवर्तन का व्यापक अभियान चलाया- सावित्रीबाई ने बालिकाओं को शिक्षित करने, महिलाओं को संगठित करने तथा विधवाओं और संकटग्रस्त बच्चों की सहायता करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और उस समय की सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दी, जब महिलाओं तथा निम्न माने जाने वाले समुदायों की शिक्षा को सामाजिक व्यवस्था के लिए चुनौती माना जाता था।
जातिगत भेदभाव का अनुभव और सामाजिक चेतना
लगभग 1848 ई. के आसपास एक विवाह समारोह में ज्योतिराव को जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा। इस घटना ने उन्हें जाति-व्यवस्था की असमानता पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित किया, और उन्होंने अनुभव किया कि जन्म के आधार पर मनुष्य की सामाजिक प्रतिष्ठा निर्धारित करना मूलतः अन्यायपूर्ण है। इसके बाद उन्होंने जातिगत भेदभाव, सामाजिक वर्चस्व और रूढ़ियों के विरुद्ध आजीवन संघर्ष करने का निर्णय लिया।
फुले का मानना था कि सामाजिक पिछड़ेपन का एक प्रमुख कारण अज्ञान और शिक्षा से वंचित होना है। इसलिए उन्होंने शिक्षा को सामाजिक मुक्ति का सबसे प्रभावी साधन माना। उनके लिए शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने या व्यक्तिगत ज्ञान बढ़ाने का माध्यम नहीं थी, बल्कि वह व्यक्ति में आत्मसम्मान, अधिकार-बोध और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की चेतना उत्पन्न करने का माध्यम थी।
शिक्षा का क्रांतिकारी अभियान
फुले के सामाजिक सुधार कार्यक्रम का केंद्रीय आधार शिक्षा था। वे मानते थे कि महिलाओं और वंचित समुदायों को शिक्षा से दूर रखकर समाज में वास्तविक समानता स्थापित नहीं की जा सकती; उस समय भारतीय समाज में महिलाओं तथा निम्न माने जाने वाले समुदायों की शिक्षा पर अनेक सामाजिक प्रतिबंध थे। 1848 ई. में पुणे के बुधवार पेठ स्थित भिडे वाड़ा में ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले ने बालिकाओं के लिए विद्यालय प्रारंभ किया, जिसकी प्रमुख शिक्षिका सावित्रीबाई बनीं। विद्यालय जाते समय सावित्रीबाई को सामाजिक विरोध, अपमान और गाली-गलौज का सामना करना पड़ता था, फिर भी उन्होंने यह कार्य नहीं छोड़ा, और प्रारंभिक विद्यालय के बाद फुले दंपति ने पुणे में बालिकाओं के लिए अन्य विद्यालय भी स्थापित किए।
फुले दंपति का शैक्षिक अभियान केवल बालिकाओं तक सीमित नहीं था। शिक्षा पर किसी विशेष जाति या वर्ग के एकाधिकार के विरोधी होने के कारण उन्होंने शूद्रों, अतिशूद्रों और अन्य वंचित समुदायों के बच्चों के लिए भी शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास किया और 1853 ई. में कामकाजी लोगों तथा वयस्कों के लिए रात्रि-पाठशाला की व्यवस्था की, ताकि वे अपने काम के साथ शिक्षा प्राप्त कर सकें। उनके लिए शिक्षा का उद्देश्य केवल पढ़ना-लिखना सिखाना नहीं था, बल्कि व्यक्ति में आत्मसम्मान, अधिकार-बोध और सामाजिक व्यवस्था को समझकर अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने की चेतना उत्पन्न करना था। शिक्षा के महत्त्व को व्यक्त करते हुए उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं—
“विद्येविना मती गेली।
मतीविना नीती गेली।
नीतीविना गती गेली।
गतीविना वित्त गेले।
वित्ताविना शूद्र खचले।
इतके अनर्थ एका अविद्येने केले।”
इन पंक्तियों में फुले ने स्पष्ट किया कि अज्ञान व्यक्ति की बुद्धि, नैतिकता, प्रगति और आर्थिक शक्ति को कमजोर करता है तथा अंततः सामाजिक रूप से वंचित वर्गों को और अधिक निर्भर बना देता है, इसलिए उनके सामाजिक कार्यक्रम में शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता प्राप्त थी।
अस्पृश्यता और जाति-व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष
ज्योतिराव फुले जाति-व्यवस्था और जन्म-आधारित श्रेष्ठता के प्रबल आलोचक थे। वे मानते थे कि किसी व्यक्ति की श्रेष्ठता या हीनता उसके जन्म से निर्धारित नहीं हो सकती, और मनुष्य को उसके कर्म, नैतिकता और मानवता के आधार पर देखा जाना चाहिए, न कि उसकी जाति के आधार पर। उन्होंने शूद्रों, अतिशूद्रों और अन्य वंचित समुदायों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई तथा अस्पृश्यता को सामाजिक अन्याय का गंभीर रूप माना। इसी भावना के तहत उन्होंने अपने घर के कुएँ को सभी जातियों के लोगों के लिए खोल दिया। उस समय जातिगत शुद्धता और अस्पृश्यता की प्रचलित धारणाओं के संदर्भ में यह अत्यंत साहसिक कदम था।
फुले का मानना था कि पानी, शिक्षा, सार्वजनिक स्थान और सामाजिक जीवन पर किसी जाति का एकाधिकार नहीं होना चाहिए। उनका आदर्श समाज ऐसा था, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को समान सम्मान और अधिकार प्राप्त हों तथा किसी मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण न किया जाए।
विधवाओं और अनाथ बच्चों के लिए कार्य
फुले महिलाओं की शिक्षा और स्वतंत्रता के साथ-साथ उनके सम्मानपूर्ण जीवन के भी समर्थक थे। वे बाल-विवाह के विरोधी और विधवा-पुनर्विवाह के समर्थक थे। उनके समय में विधवाओं को सामाजिक अपमान, आर्थिक असुरक्षा और अनेक प्रकार के अत्याचारों का सामना करना पड़ता था, और विशेष रूप से गर्भवती विधवाओं की स्थिति अत्यंत कठिन होती थी। इस समस्या के समाधान के लिए ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले ने बालहत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की, जिसका उद्देश्य गर्भवती विधवाओं को आश्रय देना और नवजात शिशुओं की हत्या जैसी अमानवीय घटनाओं को रोकना था। फुले दंपति ने अनाथ और संकटग्रस्त बच्चों की सहायता भी की।
इस प्रकार उनका महिला-सुधार कार्यक्रम केवल शिक्षा तक सीमित नहीं था। वे महिलाओं को सामाजिक सम्मान, स्वतंत्रता, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता प्रदान करने के पक्षधर थे, और उनका मानना था कि महिलाओं की स्थिति में सुधार के बिना समाज की वास्तविक प्रगति संभव नहीं है।
सत्यशोधक समाज की स्थापना (24 सितंबर 1873 ई.)
ज्योतिराव फुले के सामाजिक सुधार आंदोलन का सबसे महत्त्वपूर्ण संगठन सत्यशोधक समाज था। 24 सितंबर 1873 ई. को उन्होंने इसकी स्थापना की। ‘सत्यशोधक’ का अर्थ है सत्य की खोज करने वाला। संगठन का उद्देश्य सामाजिक और धार्मिक असमानता का विरोध करना तथा शूद्रों, अतिशूद्रों, महिलाओं और अन्य वंचित समुदायों में अधिकार-बोध और सामाजिक चेतना उत्पन्न करना था।
सत्यशोधक समाज ने जन्म के आधार पर श्रेष्ठता और हीनता की धारणा को चुनौती दी तथा जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता और पुरोहितवादी वर्चस्व का विरोध किया। संगठन शिक्षा के प्रसार, महिलाओं की सामाजिक भागीदारी, तर्क और विवेक के विकास तथा सामाजिक न्याय की स्थापना के पक्ष में था। इसने विवाह और अन्य सामाजिक संस्कारों को पुरोहितों तथा जटिल कर्मकांडों से मुक्त करने का भी प्रयास किया। ऐसे विवाहों को प्रोत्साहित किया गया जिनमें पुरोहित की अनिवार्य भूमिका न हो और दंपति की समानता, पारस्परिक निष्ठा तथा सामाजिक उत्तरदायित्व को महत्त्व दिया जाए। इस प्रकार फुले ने सामाजिक सुधार को व्यवहारिक जीवन से जोड़ने का प्रयास किया।
सत्यशोधक समाज में सावित्रीबाई की भूमिका
सत्यशोधक समाज के कार्यों में महिलाओं की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। सावित्रीबाई फुले ने संगठन के महिला विभाग का नेतृत्व करते हुए सामाजिक सुधार के विभिन्न कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी की। इस प्रकार सत्यशोधक समाज केवल जाति-विरोधी संगठन नहीं था, बल्कि उसने महिलाओं की सामाजिक भागीदारी को भी सामाजिक परिवर्तन के आवश्यक अंग के रूप में देखा।

धार्मिक और मानवतावादी चिंतन
फुले पारंपरिक धार्मिक रूढ़ियों, अंधविश्वास और जन्म-आधारित धार्मिक-सामाजिक श्रेष्ठता के आलोचक थे। वे ऐसे धर्म की कल्पना करते थे जिसका आधार सत्य, तर्क, समानता, स्वतंत्रता, न्याय और मानवता हो, और जिसका उद्देश्य मनुष्य को विभाजित करना नहीं, बल्कि उसके जीवन में नैतिकता और मानवता को विकसित करना हो। उन्होंने धार्मिक ग्रंथों की अंधस्वीकृति के बजाय तर्क और विवेक को महत्त्व दिया। उनका विरोध किसी व्यक्ति या समुदाय के प्रति व्यक्तिगत घृणा पर आधारित नहीं था, बल्कि ऐसी सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध था जिसे वे असमानता और शोषण का आधार मानते थे।
‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ में उनके मानवतावादी और समानतावादी धार्मिक चिंतन की स्पष्ट अभिव्यक्ति मिलती है, और उनके ‘अखंड’ काव्य में भी मानवधर्म, आत्मपरीक्षण, नीति, सहिष्णुता, विवेक, श्रम और सामाजिक जीवन से जुड़े विषयों पर विचार मिलता है। उनके धार्मिक चिंतन का केंद्र सदैव मनुष्य और उसका कल्याण रहा।
किसान और श्रमिक वर्ग के प्रति दृष्टिकोण
फुले का सामाजिक चिंतन केवल जाति और महिला-शिक्षा तक सीमित नहीं था। उन्होंने किसानों और श्रमिकों की आर्थिक समस्याओं को भी सामाजिक न्याय के व्यापक प्रश्न से जोड़ा। उनका मानना था कि किसान कृषि-व्यवस्था की रीढ़ हैं, फिर भी वे गरीबी, ऋण, साहूकारी और प्रशासनिक कठिनाइयों से जूझते हैं। वे किसानों की स्थिति सुधारने के लिए शिक्षा, वैज्ञानिक कृषि, सिंचाई और आर्थिक सुरक्षा की आवश्यकता पर बल देते थे। उनके लिए सामाजिक समानता का अर्थ केवल जातिगत भेदभाव समाप्त करना नहीं था। वे वंचित वर्गों की आर्थिक आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक आजीविका को भी आवश्यक मानते थे, और इसीलिए किसान-श्रमिक वर्ग के प्रश्न उनके सामाजिक न्याय संबंधी चिंतन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बने।
नगरपालिका और सार्वजनिक जीवन
ज्योतिराव फुले केवल सामाजिक आंदोलन तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने सार्वजनिक प्रशासन में भी भागीदारी की और 1876 से 1882 ई. तक पुणे नगरपालिका के सदस्य रहे। इस दौरान उन्होंने सार्वजनिक संस्थाओं के कार्यों में गरीबों और वंचित समुदायों के हितों को महत्त्व देने की आवश्यकता पर बल दिया, क्योंकि उनका मानना था कि सार्वजनिक संस्थाओं का उद्देश्य केवल प्रभावशाली वर्गों की सेवा करना नहीं, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों की आवश्यकताओं और अधिकारों की रक्षा करना भी होना चाहिए। इस प्रकार उनका सामाजिक दृष्टिकोण स्थानीय प्रशासन और सार्वजनिक नीति से भी जुड़ा हुआ था।
साहित्यिक कृतियाँ
ज्योतिराव फुले ने अपने सामाजिक विचारों को समाज तक पहुँचाने के लिए नाटक, पोवाड़ा, निबंध, पत्र, रिपोर्ट और सामाजिक-धार्मिक लेखन का उपयोग किया। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘तृतीय रत्न’ (1855 ई.), ‘छत्रपति शिवाजीराजे भोसले यांचा पोवाडा’ और ‘ब्राह्मणांचे कसब’ (दोनों 1869 ई.), ‘गुलामगिरी’ (1873 ई.), ‘शेतकऱ्याचा आसूड’ (1883 ई.) तथा निधन के बाद प्रकाशित ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ (1891 ई.) प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त ‘सत्सार’ और ‘इशारा’ जैसी रचनाओं के माध्यम से भी उन्होंने सामाजिक और धार्मिक प्रश्नों पर विचार व्यक्त किए। उनका साहित्य केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं था, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और जनजागरण का माध्यम भी था।
‘तृतीय रत्न’
‘तृतीय रत्न’ ज्योतिराव फुले द्वारा 1855 ई. में लिखा गया नाटक है, जिसमें अशिक्षा, अंधविश्वास और धार्मिक शोषण की आलोचना की गई है। फुले ने दिखाया कि किस प्रकार अज्ञान और धार्मिक आडंबर का लाभ उठाकर गरीब तथा अशिक्षित लोगों का सामाजिक-आर्थिक शोषण किया जाता है, और शिक्षा-विवेक को इस शोषण से मुक्ति का महत्त्वपूर्ण साधन बताया गया है।
नाटक में अशिक्षित कुणबी, उसकी पत्नी, जोशी, ईसाई धर्मोपदेशक, मुसलमान और विदूषक जैसे पात्र समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसकी विशेषता यह है कि इसमें सामाजिक समस्या को केवल व्यक्तिगत घटना के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया है। नाटक का विदूषक विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। वह केवल हास्य उत्पन्न करने वाला पात्र नहीं, बल्कि घटनाओं पर टिप्पणी करने वाला, सामाजिक पाखंड को उजागर करने वाला और दर्शकों को विवेक की ओर प्रेरित करने वाला पात्र है। इस प्रकार फुले ने नाटक को सामाजिक शिक्षा और जनजागरण का माध्यम बनाया।
‘गुलामगिरी’
1873 ई. में प्रकाशित ‘गुलामगिरी’ फुले की सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है, जिसमें उन्होंने भारतीय समाज की जातिगत असमानता और सामाजिक वर्चस्व की आलोचना की। उन्होंने जातिगत शोषण की तुलना दासता से की और सामाजिक स्वतंत्रता के प्रश्न को व्यापक मानवाधिकार के प्रश्न से जोड़ा। फुले ने इसे अमेरिका में दासप्रथा के विरुद्ध संघर्ष करने वाले लोगों को समर्पित किया, जिससे उन्होंने सामाजिक शोषण और जातिगत वर्चस्व के प्रश्न को अंतरराष्ट्रीय दासता-विरोधी संघर्ष से जोड़ने का प्रयास किया। यह कृति आगे चलकर गैर-ब्राह्मण, दलित और सामाजिक न्याय आंदोलनों के चिंतन में महत्त्वपूर्ण संदर्भ बनी।
‘शेतकऱ्याचा आसूड’
‘शेतकऱ्याचा आसूड’ (1883 ई.) में फुले ने किसानों की आर्थिक दुर्दशा और शोषण का विश्लेषण किया — उन्होंने कृषि-समाज की गरीबी, साहूकारी, प्रशासनिक व्यवस्था और सामाजिक विषमता की आलोचना की। उनका मानना था कि किसान कृषि-व्यवस्था की रीढ़ होते हुए भी अपने श्रम का उचित लाभ प्राप्त नहीं कर पाता। उन्होंने किसानों की स्थिति सुधारने के लिए शिक्षा, वैज्ञानिक कृषि, सिंचाई और प्रशासनिक संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया, तथा किसान-प्रश्न को सामाजिक न्याय के व्यापक प्रश्न से जोड़कर आर्थिक असमानता समाप्त करने की आवश्यकता रेखांकित की।
‘सार्वजनिक सत्यधर्म’
‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ फुले की महत्त्वपूर्ण दार्शनिक-सामाजिक रचना है, जिसका प्रकाशन उनके निधन के बाद 1891 ई. में हुआ। इसमें उन्होंने सत्य, समानता, स्वतंत्रता, मानव-कल्याण और नैतिक आचरण पर आधारित धर्म की कल्पना प्रस्तुत की। फुले के अनुसार मनुष्य को जाति, वंश या जन्म के आधार पर श्रेष्ठ नहीं माना जाना चाहिए, और स्त्री-पुरुष दोनों को समान अधिकार प्राप्त होने चाहिए। उन्होंने कर्मकांड की अपेक्षा मनुष्य के वास्तविक जीवन, उसकी स्वतंत्रता, विवेक और सामाजिक सुख को अधिक महत्त्व दिया। यह रचना उनके मानवतावादी और समानतावादी चिंतन को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
‘दीनबंधु’ और जनजागरण
सत्यशोधक समाज के विचारों और वंचित वर्गों की समस्याओं को सार्वजनिक विमर्श तक पहुँचाने में ‘दीनबंधु’ मराठी साप्ताहिक समाचार-पत्र की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही, जिसका प्रारंभ कृष्णराव पांडुरंग भालेकर ने 1877 ई. में किया था। यह पत्र किसानों, श्रमिकों और सामाजिक रूप से वंचित समुदायों की समस्याओं को सामने लाने का माध्यम बना। इस प्रकार फुले के सामाजिक आंदोलन में शिक्षा, संगठन और साहित्य के साथ पत्रकारिता भी जनजागरण का महत्त्वपूर्ण माध्यम बनी।
‘महात्मा’ की उपाधि
ज्योतिराव फुले के सामाजिक कार्यों और समाज-सुधार में योगदान को देखते हुए 11 मई 1888 ई. को मुंबई के कोळीवाड़ा में आयोजित एक सार्वजनिक समारोह में विठ्ठलराव कृष्णाजी वंडेकर ने उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि प्रदान की। इसके बाद वे व्यापक रूप से ‘महात्मा फुले’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। यह सम्मान उनके लंबे सामाजिक संघर्ष और वंचित समुदायों के अधिकारों के लिए किए गए कार्यों की सार्वजनिक स्वीकृति का प्रतीक था।
फुले और डॉ. भीमराव आंबेडकर
ज्योतिराव फुले की विचारधारा का प्रभाव आगे चलकर भारतीय सामाजिक न्याय की परंपरा पर पड़ा। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने फुले को अपने महत्त्वपूर्ण वैचारिक प्रेरणास्रोतों में स्थान दिया और बुद्ध, कबीर तथा फुले की परंपरा को सामाजिक समानता एवं मानव-मुक्ति के संघर्ष से जोड़ा। फुले ने शिक्षा, आत्मसम्मान और जाति-विरोध को सामाजिक परिवर्तन का आधार बनाया, और आगे चलकर डॉ. आंबेडकर ने इन प्रश्नों को राजनीतिक अधिकारों, कानूनी सुरक्षा और संवैधानिक व्यवस्था के व्यापक संघर्ष से जोड़ा। इस दृष्टि से फुले आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय की वैचारिक परंपरा की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं।
ज्योतिराव फुले का निधन
लगातार सामाजिक संघर्ष और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहने के बाद 28 नवंबर 1890 ई. को पुणे में ज्योतिराव गोविंदराव फुले का निधन हुआ। उनके निधन के बाद सावित्रीबाई फुले ने सत्यशोधक समाज तथा सामाजिक सुधार के कार्य को आगे बढ़ाया। फुले का जीवन इस बात का उदाहरण है कि सामाजिक परिवर्तन केवल कानून और प्रशासनिक व्यवस्था के माध्यम से नहीं, बल्कि शिक्षा, संगठन, वैचारिक संघर्ष और सामाजिक चेतना के माध्यम से भी संभव है।
फुले की विरासत
महात्मा ज्योतिराव फुले की सबसे महत्त्वपूर्ण विरासत शिक्षा को सामाजिक मुक्ति का माध्यम बनाने में दिखाई देती है। उन्होंने शिक्षा को केवल व्यक्तिगत ज्ञान या रोजगार का साधन न मानकर सामाजिक शोषण से मुक्ति, आत्मसम्मान और अधिकार-बोध का माध्यम माना, और जाति, लिंग तथा आर्थिक स्थिति के आधार पर शिक्षा में होने वाले भेदभाव को चुनौती दी। उन्होंने सामाजिक न्याय को शिक्षा, जाति-विरोध, महिला-मुक्ति और आर्थिक प्रश्नों के साथ एक व्यापक दृष्टि में देखा, और उनका मानना था कि जब तक वंचित वर्गों को ज्ञान और आत्मसम्मान प्राप्त नहीं होगा, तब तक वास्तविक समानता स्थापित नहीं हो सकती। उनकी विचारधारा ने आगे चलकर सामाजिक न्याय, गैर-ब्राह्मण आंदोलन, दलित आंदोलन और वंचित समुदायों के अधिकारों से जुड़े अनेक आंदोलनों को प्रभावित किया, और डॉ. भीमराव आंबेडकर सहित बाद के सामाजिक न्याय आंदोलनों के लिए महत्त्वपूर्ण वैचारिक आधार प्रदान किया।
महाराष्ट्र और देश के अन्य भागों में उनकी स्मृति में अनेक शैक्षणिक संस्थानों, सामाजिक संगठनों और सार्वजनिक स्थलों का नामकरण किया गया है, और 11 अप्रैल को विभिन्न स्थानों पर उनकी जयंती मनाई जाती है। फुले की विरासत का वास्तविक अर्थ उनके नाम के स्मरण अथवा स्मारकों में नहीं, बल्कि उस समाज की दिशा में निरंतर प्रयास करने में है जिसमें जन्म, जाति, लिंग या सामाजिक स्थिति के आधार पर किसी व्यक्ति के अधिकार और सम्मान में कोई भेदभाव न हो।
200वीं जयंती (2027)
2027 ई. में ज्योतिराव फुले की 200वीं जयंती होगी। यह अवसर उनके जीवन और कार्य को स्मरण करने के साथ-साथ उनके विचारों की वर्तमान प्रासंगिकता पर विचार करने का भी अवसर है। फुले जिस समाज की कल्पना करते थे, उसमें शिक्षा, सम्मान और अवसर किसी विशेष जाति या वर्ग तक सीमित नहीं थे। आज भी सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव, महिलाओं की शिक्षा, किसानों की आर्थिक समस्याएँ और वंचित वर्गों की सामाजिक भागीदारी जैसे प्रश्न महत्त्वपूर्ण बने हुए हैं। इसलिए फुले की विरासत को केवल जयंती समारोहों, प्रतिमाओं और स्मारकों तक सीमित करने के बजाय उनके मूल विचारों- समानता, शिक्षा, आत्मसम्मान, स्वतंत्रता और मानव गरिमा को समझना अधिक महत्त्वपूर्ण है।
साहित्यिक और सांस्कृतिक स्मृति
महात्मा ज्योतिराव फुले के जीवन और विचारों को नाटक, फिल्म, धारावाहिक और साहित्य के माध्यम से भी प्रस्तुत किया गया है। ‘मी जोतीराव फुले बोलतोय..!’ नामक नाटक की शुरुआत 2002 ई. में पुणे से हुई; इसके लेखक, निर्देशक, संगीतकार, गीतकार और निर्माता सिद्धार्थ सीताराम मोरे हैं, जिन्होंने ज्योतिराव फुले की भूमिका भी निभाई, जबकि सुप्रिया सिद्धार्थ ने सावित्रीबाई फुले की भूमिका निभाई। यह नाटक मराठी और हिंदी दोनों भाषाओं में प्रस्तुत किया गया और देश के विभिन्न भागों में इसके मंचन हुए; वर्ष 2010 ई. में पुणे के बालगंधर्व रंगमंदिर में इसका 750वाँ प्रयोग प्रस्तुत किया गया।
ज्योतिराव फुले के जीवन पर आधारित ‘महात्मा फुले’ नामक फिल्म का निर्माण आचार्य प्रल्हाद केशव अत्रे ने 1955 ई. में किया था। फुले के जीवन पर डॉ. सोमनाथ मुटकुळे द्वारा ‘असूड’ नामक नाटक भी लिखा गया, जिसका रंगमंचीय निर्देशन बी. पाटील ने किया। इसके अतिरिक्त ‘महात्मा जोतीबा फुले’, ‘सत्यशोधक’ तथा ‘जोती-सावित्री’ जैसे नाट्य-प्रयोगों के माध्यम से भी उनके जीवन को प्रस्तुत किया गया है, और फुले दंपति के जीवन पर आधारित ‘सावित्रीजोती’ धारावाहिक का प्रसारण 6 जनवरी 2020 ई. से हुआ था।
फुले के जन्मस्थान खानवडी में प्रतिवर्ष ‘महात्मा फुले प्रबोधन मराठी साहित्य सम्मेलन’ आयोजित किया जाता है। इसके अतिरिक्त फुले-आंबेडकर साहित्य सम्मेलन, फुले-शाहू-आंबेडकर राष्ट्रीय साहित्य सम्मेलन और सावित्रीबाई फुले साहित्य सम्मेलन जैसे आयोजन भी फुले दंपति के विचारों और सामाजिक कार्यों को आगे बढ़ाने का माध्यम बने हैं।
फुले पर लिखे गए प्रमुख ग्रंथ
महात्मा फुले के जीवन, विचारों और सामाजिक कार्यों पर अनेक ग्रंथ लिखे गए हैं, जिनमें ‘क्रांतिजागर : महात्मा फुले यांची समग्र कविता’, ‘क्रांतिबा फुले’, ‘गोष्टीरूप महात्मा फुले’, ‘भारतीय समाजक्रांतीचे जनक महात्मा जोतीराव फुले’, ‘महात्मा ज्योतिबा फुले’, ‘महात्मा जोतीराव फुले और उनका कार्य’, ‘महात्मा जोतीराव फुले : जीवन और कार्य’, ‘महात्मा जोतीराव फुले—वारसा और वसा’, ‘महात्मा फुले और शेतकरी चळवळ’, ‘महात्मा फुले और सत्यशोधक चळवळ’, ‘महात्मा फुले : टीका और टीकाकार’, ‘महात्मा फुले यांचा शोध व बोध’, ‘महात्मा फुले यांची कविता : एक विचारमंथन’, ‘महात्मा फुले यांचे शैक्षणिक कार्य’ तथा ‘महात्मा फुले समग्र वाङ्मय’ आदि उल्लेखनीय हैं। इन ग्रंथों के माध्यम से फुले के सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, साहित्यिक और वैचारिक योगदान का अध्ययन किया गया है।


