शाह आलम द्वितीय (1759–1806 ई.)
शाह आलम द्वितीय (25 जून 1728–19 नवंबर 1806 ई.), जिनका वास्तविक नाम अली गौहर था, मुगल सम्राट आलमगीर द्वितीय के पुत्र और मुगल वंश के सत्रहवें सम्राट थे। उनका जन्म 25 जून 1728 ई. को शहज़ादा अज़ीज़-उद-दीन के रूप में हुआ था। अज़ीज़-उद-दीन स्वयं मुगल सम्राट जहाँदार शाह के पुत्र थे। अली गौहर का प्रारंभिक जीवन लाल किले के शाही परिसर में व्यतीत हुआ। अपने पिता के शासनकाल में उन्हें महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त हुए और वे उत्तराधिकार के लिए निर्धारित वली-अहद अर्थात् युवराज बने।
आलमगीर द्वितीय के शासनकाल में वास्तविक राजनीतिक शक्ति मुख्यतः वज़ीर इमाद-उल-मुल्क के हाथों में थी। अली गौहर और इमाद-उल-मुल्क के संबंध धीरे-धीरे तनावपूर्ण होते गए। उन्हें अपनी जान का भय होने लगा और इसी कारण 1758 ई. में वे दिल्ली से निकलकर पूर्वी भारत की ओर चले गए। 1759 ई. में आलमगीर द्वितीय की हत्या के समय अली गौहर दिल्ली से बाहर थे।
दिल्ली से प्रस्थान और सम्राट के रूप में उदय
दिल्ली से निकलने के बाद अली गौहर ने अपनी सेना संगठित की और बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में मुगल अधिकार पुनः स्थापित करने का प्रयास किया। इस बीच दिल्ली में इमाद-उल-मुल्क का प्रभाव बना रहा और उसने शाहजहाँ तृतीय को मुगल सिंहासन पर बैठाया। दूसरी ओर, नजीब-उद-दौला ने दिल्ली के बाहर अपनी शक्ति संगठित की और इमाद-उल-मुल्क को पीछे हटने के लिए विवश किया। 1761 ई. में अहमद शाह दुर्रानी के नेतृत्व में अफ़गान सेनाओं और मराठों के बीच तीसरा पानीपत युद्ध हुआ। मराठों की पराजय के बाद दिल्ली की राजनीति में शक्ति-संतुलन बदल गया और अली गौहर को वैध मुगल सम्राट के रूप में मान्यता मिलने लगी। उन्होंने शाह आलम द्वितीय की उपाधि धारण की, किंतु वे तत्काल दिल्ली वापस नहीं लौट सके।
पूर्वी भारत में मुगल सत्ता स्थापित करने का प्रयास
1760 ई. के आसपास शाह आलम द्वितीय ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा में मुगल अधिकार पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से अभियान चलाया। उनके साथ लगभग 30,000 सैनिकों की सेना थी। उनका उद्देश्य पूर्वी सूबों पर मुगल सम्राट के अधिकार को पुनः स्थापित करना तथा स्थानीय राजनीतिक शक्तियों पर अपना प्रभाव कायम करना था। इस अभियान में मुहम्मद कुली ख़ान, क़ादिम हुसैन, कामगार ख़ान, हिदायत अली, मीर अफ़ज़ल और गुलाम हुसैन तबातबाई जैसे अधिकारियों ने उनका साथ दिया। शुजाउद्दौला, नजीब-उद-दौला और अहमद ख़ान बंगश की सेनाओं से भी उन्हें सहायता मिली। फ्रांसीसी अधिकारी जीन लॉ द लॉरिस्टन और उसके साथ आए लगभग 200 फ्रांसीसी सैनिकों ने भी उनके अभियान में सहयोग किया।
शाह आलम द्वितीय की सेना पटना तक पहुँची और वहाँ घेरा डाला। मीर जाफ़र ने अपने सहयोगी रामनारायण की सहायता के लिए अपने पुत्र मीरन को भेजा तथा अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी से भी सहायता माँगी। कंपनी की सैन्य सहायता के कारण शाह आलम द्वितीय की सेना को पीछे हटना पड़ा। इस संघर्ष ने पूर्वी भारत में मुगल सम्राट और अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच बढ़ते राजनीतिक टकराव की पृष्ठभूमि तैयार की।
मीर कासिम के साथ संबंध
मीरन की मृत्यु के बाद 1760 ई. में मीर कासिम को बंगाल का नवाब बनाया गया। उसने मुगल सम्राट से बंगाल, बिहार और उड़ीसा के सूबेदार के रूप में अपनी नियुक्ति की पुष्टि प्राप्त की तथा सम्राट को वार्षिक राजस्व देने पर सहमति व्यक्त की। इसके बाद शाह आलम द्वितीय इलाहाबाद चले गए, जहाँ 1761 से 1764 ई. तक अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने उन्हें संरक्षण दिया।
इस बीच मीर कासिम और अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी के संबंध तेजी से बिगड़ने लगे। मीर कासिम ने प्रशासनिक और सैन्य सुधार किए तथा कंपनी को प्राप्त कर-संबंधी विशेषाधिकारों को समाप्त करने का प्रयास किया। उसने रामनारायण को पद से हटा दिया और अपनी सेना को आधुनिक बनाने के लिए आग्नेयास्त्रों के निर्माण की व्यवस्था की। इन नीतियों के कारण कंपनी और मीर कासिम के बीच संघर्ष बढ़ गया। अंततः मीर कासिम को बंगाल से हटना पड़ा और उसने अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा शाह आलम द्वितीय के साथ मिलकर अंग्रेज़ों का सामना करने का निर्णय लिया।
बक्सर का युद्ध
22 अक्टूबर 1764 ई. को बक्सर के निकट अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी और संयुक्त भारतीय सेनाओं के बीच निर्णायक युद्ध हुआ। संयुक्त सेना में बंगाल के नवाब मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की सेनाएँ शामिल थीं। कंपनी की सेना का नेतृत्व मेजर हेक्टर मुनरो कर रहे थे। युद्ध में ईस्ट इंडिया कंपनी की निर्णायक विजय हुई। इस पराजय ने मुगल सम्राट, अवध के नवाब और बंगाल की राजनीतिक शक्तियों की स्थिति को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया तथा बंगाल और बिहार में कंपनी की राजनीतिक एवं राजस्व शक्ति को निर्णायक आधार प्रदान किया।
इलाहाबाद की संधि
बक्सर के युद्ध के बाद 1765 ई. में शाह आलम द्वितीय और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच इलाहाबाद की संधि हुई। इस संधि के अंतर्गत शाह आलम द्वितीय ने कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी, अर्थात् राजस्व वसूली का अधिकार प्रदान किया। इसके बदले कंपनी ने सम्राट को वार्षिक 26 लाख रुपये देने का वचन दिया। इलाहाबाद और कोरा के क्षेत्र भी शाह आलम द्वितीय को प्राप्त हुए, जबकि अवध से संबंधित क्षेत्रों का पुनर्गठन किया गया।
12 अगस्त 1765 ई. को बनारस में रॉबर्ट क्लाइव और शाह आलम द्वितीय के बीच हुए समझौते के माध्यम से कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी का अधिकार औपचारिक रूप से प्राप्त हुआ। इस व्यवस्था के परिणामस्वरूप मुगल सम्राट की संप्रभुता नाममात्र रूप से बनी रही, जबकि इन प्रांतों के राजस्व पर अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी का निर्णायक नियंत्रण स्थापित हो गया।
इलाहाबाद में निवास
इलाहाबाद की संधि के बाद शाह आलम द्वितीय लगभग छह वर्षों तक इलाहाबाद में रहे। इस अवधि में वे आर्थिक और राजनीतिक रूप से अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी पर निर्भर हो गए। कंपनी ने बंगाल में राजस्व प्रशासन पर अपना नियंत्रण लगातार मजबूत किया और धीरे-धीरे मुगल सम्राट के प्रति अपनी वित्तीय प्रतिबद्धताओं को कम किया। बाद में इलाहाबाद और कोरा के क्षेत्र अवध के नवाब को सौंप दिए गए। इससे शाह आलम द्वितीय की राजनीतिक स्थिति और अधिक कमजोर हो गई।
दिल्ली वापसी और मराठा संरक्षण
1771 ई. में महादजी सिंधिया के नेतृत्व में मराठों ने उत्तरी भारत में पुनः अपना प्रभाव स्थापित किया। शाह आलम द्वितीय मई 1771 ई. में इलाहाबाद से दिल्ली के लिए रवाना हुए और 1772 ई. में मराठा संरक्षण में दिल्ली पहुँचे। इस प्रकार लंबे समय तक दिल्ली से दूर रहने के बाद वे पुनः मुगल सिंहासन पर आसीन हुए। महादजी सिंधिया ने मुगल सम्राट की औपचारिक प्रतिष्ठा को बनाए रखते हुए दिल्ली की राजनीति पर अपना प्रभाव स्थापित किया।
दिल्ली लौटने के बाद शाह आलम द्वितीय ने मराठों के सहयोग से रोहिलखंड में मुगल प्रभाव पुनः स्थापित करने का प्रयास किया। इस अभियान में ज़ाबिता ख़ान को पराजित कर पत्थरगढ़ के किले पर अधिकार किया गया तथा वहाँ का खजाना प्राप्त किया गया। बाद में युद्ध की लूट और उसके बँटवारे को लेकर शाह आलम द्वितीय और महादजी सिंधिया के बीच मतभेद उत्पन्न हुए, जिससे दोनों के संबंधों में तनाव बढ़ गया।
मुगल सेना का पुनर्गठन
इसके बाद शाह आलम द्वितीय ने मुगल सत्ता को पुनर्गठित करने का प्रयास किया। उनके प्रमुख सेनापति मिर्ज़ा नजफ़ ख़ान ने मुगल सेना के पुनर्गठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। सेना में पैदल सैनिकों की संख्या और महत्त्व बढ़ाया गया तथा उन्हें बंदूकों और तलवारों से लैस किया गया। आग्नेयास्त्रों, तोपखाने और घुड़सवार सेना के बेहतर उपयोग पर भी ध्यान दिया गया। इस सैन्य पुनर्गठन के कारण कुछ समय के लिए उत्तरी भारत में मुगल सत्ता का प्रभाव पुनः दिखाई देने लगा।
मिर्ज़ा नजफ़ ख़ान के नेतृत्व में मुगल सेना ने रोहिलखंड और अन्य क्षेत्रों में अभियान चलाए तथा मुगल प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया। 1782 ई. में नजफ़ ख़ान की मृत्यु के बाद यह व्यवस्था कमजोर पड़ने लगी। दरबारी गुटबंदी, नेतृत्व संबंधी विवाद और प्रशासनिक दुर्बलता के कारण मुगल सत्ता पुनः गंभीर संकट में आ गई।
जाटों का विस्तार
18वीं शताब्दी में भरतपुर के जाट शासकों ने मुगल सत्ता के विरुद्ध अपनी शक्ति का विस्तार किया। सूरजमल के नेतृत्व में जाटों ने आगरा और उसके आसपास के क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाया। 1761 ई. में जाटों ने आगरा पर अधिकार कर लिया और लगभग 20 दिनों की घेराबंदी के बाद 12 जून 1761 ई. को वहाँ के मुगल अधिकारियों ने आत्मसमर्पण किया। इसके बाद जाटों ने आगरा में व्यापक लूटपाट की। सूरजमल के पुत्र जवाहर सिंह ने जाट शक्ति का और विस्तार किया तथा दोआब, बल्लभगढ़ और आगरा के क्षेत्रों में अपना प्रभाव स्थापित किया। 1761 से 1774 ई. के बीच आगरा और दिल्ली के आसपास के अनेक क्षेत्रों में जाटों का प्रभाव बना रहा।
सिखों का उदय
मुगल शासन और सिखों के बीच संघर्ष 17वीं शताब्दी से चला आ रहा था। गुरु तेग बहादुर को 1675 ई. में मुगल शासन द्वारा मृत्युदंड दिए जाने के बाद यह संघर्ष और तीव्र हो गया। 18वीं शताब्दी के मध्य तक सिख मिसलों ने पंजाब और उसके आसपास के क्षेत्रों में अपनी शक्ति बढ़ा ली थी। 1764 ई. में सिखों ने सरहिंद के मुगल फौजदार ज़ैन ख़ान सरहिंदी को पराजित कर दिया और वह युद्ध में मारा गया। इसके बाद सिख दलों ने पंजाब से आगे बढ़कर दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों तक अभियान किए तथा मुगल सत्ता को लगातार चुनौती दी।
1777 ई. में मिर्ज़ा नजफ़ ख़ान ने ज़ाबिता ख़ान की सेनाओं को पराजित किया और सिखों के बढ़ते प्रभाव को कुछ समय के लिए नियंत्रित करने में सफलता प्राप्त की। नजफ़ ख़ान की सैन्य सफलताओं से मुगल सत्ता को अस्थायी रूप से बल मिला, किंतु 1782 ई. में उनकी मृत्यु के बाद यह स्थिति अधिक समय तक कायम नहीं रह सकी।
दिल्ली पर सिखों का प्रभाव
1783 ई. में जस्सा सिंह अहलूवालिया, जस्सा सिंह रामगढ़िया और बघेल सिंह के नेतृत्व में सिख सेना ने दिल्ली की ओर अभियान किया। सिखों ने दिल्ली के अनेक क्षेत्रों पर अधिकार कर मुगल दरबार पर दबाव बनाया। इस समय मुगल सम्राट की वास्तविक राजनीतिक शक्ति अत्यंत सीमित थी और दिल्ली की राजनीति में मराठों का प्रभाव भी बढ़ रहा था। मुगल दरबार और सिखों के बीच समझौते के परिणामस्वरूप सिखों को दिल्ली में कुछ धार्मिक स्थलों के निर्माण की अनुमति मिली तथा राजस्व में उनका हिस्सा निर्धारित किया गया। इसके बदले उन्होंने शाही क्षेत्रों में व्यापक लूटपाट न करने पर सहमति व्यक्त की। इस समझौते ने दिल्ली में मुगल सत्ता की वास्तविक दुर्बलता को स्पष्ट कर दिया।
मुगल सत्ता का पतन
मिर्ज़ा नजफ़ ख़ान की मृत्यु के बाद मुगल सेना और प्रशासन की पूर्व व्यवस्था कमजोर पड़ गई। शाह आलम द्वितीय के दरबार में गुटबंदी, व्यक्तिगत स्वार्थ और नेतृत्व संबंधी विवाद बढ़ने लगे। परिणामस्वरूप मुगल सेना की संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक प्रभाव में लगातार गिरावट आई।
अठारहवीं शताब्दी के अंतिम दशकों तक शाह आलम द्वितीय की वास्तविक सत्ता मुख्यतः दिल्ली और उसके आसपास के सीमित क्षेत्र तक सिमट गई थी। यद्यपि मुगल सम्राट की राजनीतिक शक्ति लगभग समाप्त हो चुकी थी, फिर भी तैमूरी वंश के प्रति सम्मान बना हुआ था। अनेक भारतीय शासक अपनी वैधता के लिए मुगल सम्राट की औपचारिक स्वीकृति को महत्त्वपूर्ण मानते थे और उनके नाम पर सिक्के ढाले तथा खुतबा पढ़वाया जाता था।
गुलाम कादिर की कैद
1788 ई. में नजीब ख़ान के पोते और मुगल सत्ता के प्रमुख विरोधियों में से एक गुलाम कादिर ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। उसने शाह आलम द्वितीय को अपने प्रभाव में लेकर शाही महलों में उस खजाने की तलाश शुरू की, जिसकी अत्यधिक बड़ी राशि होने की संभावना व्यक्त की जाती थी। अपेक्षित खजाना न मिलने और सम्राट द्वारा उसके विरुद्ध कार्रवाई के प्रयास से क्रोधित होकर गुलाम कादिर ने 10 अगस्त 1788 ई. को शाह आलम द्वितीय को अंधा कर दिया। गुलाम कादिर ने शाह आलम द्वितीय और शाही परिवार के साथ अत्यंत क्रूर व्यवहार किया। शाही परिवार के सदस्यों को अपमानित किया गया और अनेक प्रकार की यातनाएँ दी गईं। इस घटना ने मुगल सम्राट की राजनीतिक और व्यक्तिगत स्थिति की दयनीय अवस्था को उजागर कर दिया। अंततः महादजी सिंधिया ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने गुलाम कादिर को पराजित कर 2 अक्टूबर 1788 ई. को दिल्ली पर पुनः अधिकार कर लिया और शाह आलम द्वितीय को दोबारा मुगल सिंहासन पर बैठाया। इसके बाद महादजी सिंधिया सम्राट के संरक्षक बन गए और दिल्ली तथा उत्तर भारत की राजनीति में मराठों का प्रभाव और अधिक मजबूत हो गया।
महादजी सिंधिया का संरक्षण
गुलाम कादिर से मुक्ति दिलाने और उन्हें पुनः सिंहासन पर बैठाने के लिए कृतज्ञ होकर शाह आलम द्वितीय ने महादजी सिंधिया को ‘वकील-उल-मुतलक’ तथा ‘अमीर-उल-उमरा’ जैसी उपाधियाँ प्रदान कीं। इन उपाधियों के माध्यम से सिंधिया को मुगल दरबार में उच्च राजनीतिक प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। वास्तविक राजनीतिक शक्ति हालांकि दिल्ली और उत्तर भारत में मराठों के हाथों में केंद्रित हो गई।
1788 ई. के बाद सिंधिया शक्ति ने दिल्ली पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। अगले लगभग पंद्रह वर्षों तक दिल्ली और उत्तर भारत की राजनीति में मराठों का प्रभुत्व बना रहा। 1803 ई. में दूसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के दौरान अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी ने दिल्ली पर अधिकार कर इस मराठा प्रभुत्व का अंत कर दिया।
ब्रिटिश संरक्षण में शाह आलम द्वितीय
यूरोप में फ्रांसीसी शक्ति के बढ़ते प्रभाव और भारत में उसके संभावित विस्तार से अंग्रेज़ चिंतित थे। शाह आलम द्वितीय ने आंग्ल-मैसूर संघर्षों के दौरान हैदर अली और बाद में उनके पुत्र टीपू सुल्तान के साथ पत्र-व्यवहार किया था। इस कारण अंग्रेज़ों को मुगल सम्राट की प्रतिष्ठा और अधिकार के संभावित राजनीतिक उपयोग की चिंता बनी हुई थी।
दूसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के दौरान 1803 ई. में अंग्रेज़ों ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। 14 सितंबर 1803 ई. को अंग्रेज़ी सेना के दिल्ली में प्रवेश के बाद शाह आलम द्वितीय ब्रिटिश संरक्षण में आ गए। उस समय वे वृद्ध और दृष्टिहीन हो चुके थे तथा उनके पास अपनी राजनीतिक इच्छा लागू कराने के लिए स्वतंत्र सैन्य शक्ति नहीं थी। इसके बावजूद पूरे भारत में तैमूरी वंश के प्रतिनिधि के रूप में उनकी प्रतिष्ठा बनी रही।
भारतीय शासकों के लिए मुगल सम्राट की औपचारिक स्वीकृति अभी भी राजनीतिक वैधता का महत्त्वपूर्ण साधन थी। उनके नाम पर सिक्के ढाले जाते रहे और उनके नाम से खुतबा पढ़ा जाता था। विभिन्न शासक मुगल दरबार से उपाधियाँ प्राप्त करने को अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा और वैधता के लिए महत्त्वपूर्ण मानते थे। इस प्रकार शाह आलम द्वितीय के पास वास्तविक राजनीतिक सत्ता न होने के बावजूद मुगल सम्राट के रूप में उनकी औपचारिक प्रतिष्ठा बनी रही।
1804 का दिल्ली अभियान
1804 ई. में यशवंतराव होल्कर के नेतृत्व में मराठों ने दिल्ली पर पुनः अधिकार करने के उद्देश्य से अंग्रेज़ों के विरुद्ध अभियान चलाया और दिल्ली की घेराबंदी की। अंग्रेज़ों ने इस घेराबंदी का सफलतापूर्वक सामना किया और मराठों को पीछे हटना पड़ा। इसके बाद दिल्ली पर अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण और अधिक सुदृढ़ हो गया तथा शाह आलम द्वितीय ब्रिटिश संरक्षण में ही रहे।
शाह आलम द्वितीय का साहित्यिक योगदान
शाह आलम द्वितीय साहित्य और कविता में भी रुचि रखते थे। उन्होंने अपना दीवान लिखा और ‘आफ़ताब’ उपनाम से कविताएँ रचीं। उनकी कविताओं के संकलन और संपादन में मिर्ज़ा फ़ाख़िर मकीन का योगदान माना जाता है। उन्होंने ‘अजाइब-उल-क़सस’ नामक कृति की भी रचना की, जिसे उर्दू गद्य की आरंभिक महत्त्वपूर्ण रचनाओं में माना जाता है।
शाह आलम द्वितीय की मृत्यु
शाह आलम द्वितीय की मृत्यु 19 नवंबर 1806 ई. को हुई। उनका मकबरा दिल्ली के महरौली में सूफी संत क़ुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के निकट स्थित है। उनका मकबरा संगमरमर से घिरे उस परिसर में है, जहाँ मुगल सम्राट बहादुर शाह प्रथम, जिन्हें शाह आलम प्रथम भी कहा जाता है और अकबर शाह द्वितीय के मकबरे भी स्थित हैं।


