आलमगीर द्वितीय (1754–1759 ई.)
मिर्ज़ा अज़ीज़-उद-दीन (1754–1759 ई.), जिन्हें उनके शाही नाम आलमगीर द्वितीय के नाम से जाना जाता है, भारत के सोलहवें मुगल सम्राट थे। उनका शासन 3 जून 1754 ई. से 29 नवंबर 1759 ई. तक रहा। वे जहाँदार शाह के पुत्र और बहादुर शाह प्रथम के पौत्र थे। उनका वास्तविक नाम अजीजुद्दीन था और उनका जन्म 6 जून 1699 ई. को बुरहानपुर में हुआ था। 1712 ई. में बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के संघर्ष में उनके पिता अजीजुद्दीन के स्थान पर उनके चाचा फर्रुखसियर सम्राट बने। बाद में अजीजुद्दीन को इमाद-उल-मुल्क ने बंदी बना लिया और 1714 ई. में कारावास में डाल दिया। 1754 ई. में उसे मुक्त किया गया। अहमद शाह बहादुर को अपदस्थ करने के बाद इमाद-उल-मुल्क ने अजीजुद्दीन को मुगल सिंहासन पर बैठाया और उसे ‘आलमगीर द्वितीय’ की उपाधि प्रदान की। उसने यह नाम औरंगजेब की स्मृति तथा उसकी केंद्रीकृत शासन-व्यवस्था का अनुकरण करने के उद्देश्य से रखा था। आलमगीर द्वितीय के शासनकाल में मुगल साम्राज्य की वास्तविक सत्ता वजीर इमाद-उल-मुल्क के हाथों में रही, जबकि सम्राट की स्थिति अत्यंत कमजोर थी। इसी समय मराठों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था और अहमद शाह दुर्रानी ने भारत पर पुनः आक्रमण किए। जून 1757 ई. में प्लासी का युद्ध हुआ, जिसने बंगाल में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक प्रभाव को मजबूत करने का मार्ग प्रशस्त किया। इमाद-उल-मुल्क ने अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए मराठों का सहयोग लिया और शाही आय पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। उसने आलमगीर द्वितीय के परिवार के साथ भी कठोर व्यवहार किया तथा उनके ज्येष्ठ पुत्र अली गौहर को अपने प्रभाव से दूर करने का प्रयास किया। अक्टूबर 1757 ई. में आलमगीर द्वितीय ने दरबारी सरदारों और शाह वलीउल्लाह जैसे धार्मिक विद्वानों के साथ अहमद शाह दुर्रानी से संपर्क स्थापित किया। अहमद शाह दुर्रानी ने मुगल सम्राट का समर्थन किया और अपने पुत्र तैमूर शाह का विवाह आलमगीर द्वितीय की पुत्री जुहरा बेगम से करने का संबंध स्थापित किया। दूसरी ओर, इमाद-उल-मुल्क ने आलमगीर द्वितीय को अपने लिए खतरा समझते हुए उनकी हत्या की योजना बनाई। नवंबर 1759 ई. में इमाद-उल-मुल्क के लोगों ने उन्हें कोटला फतेह शाह के निकट धोखे से बुलाकर उनकी हत्या कर दी। उनकी मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य में राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ गई तथा इमाद-उल-मुल्क का प्रभाव कुछ समय तक बना रहा। बाद में अली गौहर ने दिल्ली से बाहर जाकर अपना आधार बनाया और 1759 ई. में शाह आलम द्वितीय के नाम से मुगल सम्राट बना।
प्रारंभिक जीवन
आलमगीर द्वितीय का जन्म 6 जून 1699 ई. को बुरहानपुर में हुआ था। वे जहाँदार शाह के दूसरे पुत्र और बहादुर शाह प्रथम के पौत्र थे। उनकी माता का नाम अनूप बाई था, जो राजपूत परिवार से संबंधित थीं। जब 1707 ई. में औरंगज़ेब की मृत्यु हुई, तब अज़ीज़-उद-दीन लगभग सात वर्ष के थे। बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु के बाद हुए उत्तराधिकार संघर्ष में उनके पिता जहाँदार शाह को फर्रुखसियर ने पराजित कर दिया। इसके बाद अज़ीज़-उद-दीन को भी राजनीतिक परिस्थितियों के कारण लंबे समय तक बंदी जीवन बिताना पड़ा। वे लगभग 1714 से 1754 ई. तक कारावास में रहे। 1754 ई. में अहमद शाह बहादुर को अपदस्थ करने के बाद शक्तिशाली वज़ीर ग़ाज़ी-उद-दीन ख़ाँ फ़िरोज़ जंग तृतीय, जिन्हें इमाद-उल-मुल्क कहा जाता था, ने उन्हें कारावास से मुक्त कराया।
इमाद-उल-मुल्क ने अज़ीज़-उद-दीन को ऐसा व्यक्ति माना जो उसके अधिकार को चुनौती नहीं देगा। इसलिए 1754 ई. में उसने उन्हें मुगल सिंहासन पर बैठाया। अज़ीज़-उद-दीन ने ‘आलमगीर द्वितीय’ की उपाधि धारण की। इस उपाधि के माध्यम से उन्होंने औरंगज़ेब, जिन्हें आलमगीर प्रथम कहा जाता है, की राजनीतिक परंपरा से स्वयं को जोड़ने का प्रयास किया। उस समय उनकी आयु लगभग 55 वर्ष थी, किंतु लंबे कारावास के कारण उन्हें शासन और सैन्य कार्यों का पर्याप्त अनुभव नहीं था।
सिंहासनारोहण और इमाद-उल-मुल्क का प्रभाव
1754 ई. में अहमद शाह बहादुर को गद्दी से हटाने के बाद इमाद-उल-मुल्क ने आलमगीर द्वितीय को सम्राट बनाया। यद्यपि आलमगीर द्वितीय मुगल सम्राट थे, किंतु वास्तविक सत्ता इमाद-उल-मुल्क के हाथों में रही। उसने अपनी शक्ति बनाए रखने के लिए मराठा सैनिकों का सहयोग लिया और शाही आय पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। इससे सम्राट और उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब हो गई। इमाद-उल-मुल्क ने आलमगीर द्वितीय के ज्येष्ठ पुत्र अली गौहर के साथ भी कठोर व्यवहार किया। धीरे-धीरे आलमगीर द्वितीय और इमाद-उल-मुल्क के संबंधों में तनाव बढ़ता गया। सम्राट अपने वज़ीर के बढ़ते प्रभाव से चिंतित थे और अपनी स्वतंत्र राजनीतिक स्थिति स्थापित करना चाहते थे।
दुर्रानी साम्राज्य के साथ संबंध
1755 ई. में पंजाब के मुगल सूबेदार मुइन-उल-मुल्क की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी मुग़लानी बेगम ने अहमद शाह दुर्रानी से सहायता माँगी। इसके परिणामस्वरूप अहमद शाह दुर्रानी ने 1756 ई. में भारत पर आक्रमण किया। उसने पंजाब में प्रवेश करके अपने पुत्र तैमूर शाह दुर्रानी को लाहौर का सूबेदार नियुक्त किया। दुर्रानी सेना के दिल्ली की ओर बढ़ने पर मुगल दरबार में चिंता उत्पन्न हुई। जनवरी 1757 ई. में आलमगीर द्वितीय अपने दरबारियों, प्रमुख अमीरों और शाही परिवार के साथ अहमद शाह दुर्रानी से मिलने गए। दुर्रानी ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया और नगर तथा मथुरा में व्यापक लूटपाट की। उसका मुख्य उद्देश्य मराठों की शक्ति को रोकना और इमाद-उल-मुल्क के प्रभाव को समाप्त करना था।
आलमगीर द्वितीय और अहमद शाह दुर्रानी के संबंधों को वैवाहिक संबंधों से भी मजबूती मिली। अहमद शाह दुर्रानी ने मुहम्मद शाह की पुत्री हज़रत बेगम से विवाह किया, जबकि उसके पुत्र तैमूर शाह का विवाह आलमगीर द्वितीय की पुत्री से हुआ। इसके बाद अहमद शाह दुर्रानी काबुल लौट गया और लाहौर में तैमूर शाह के नेतृत्व में अपनी सेना की एक टुकड़ी छोड़ गया।
दिल्ली पर मराठों का अधिकार
1757 ई. में रघुनाथराव के नेतृत्व में मराठों ने दिल्ली की ओर अभियान किया। उन्हें इमाद-उल-मुल्क का समर्थन प्राप्त था। मराठों ने दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया और नगर की घेराबंदी कर दी। मुगल पक्ष की ओर से नजीब-उद-दौला तथा अन्य अमीरों ने प्रतिरोध किया, किंतु वे लंबे समय तक मराठों का सामना नहीं कर सके।
मराठों ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया और नगर में व्यापक लूटपाट हुई। इस परिस्थिति में आलमगीर द्वितीय और उनका परिवार दिल्ली से निकलकर भरतपुर की ओर चले गए। बाद में जाट शासक सूरजमल के सहयोग से उनके लिए दिल्ली लौटने की स्थिति बनी। इस समय मुगल सम्राट का राजनीतिक अधिकार अत्यंत सीमित रह गया था और दिल्ली पर नियंत्रण के लिए मराठों, अफगानों तथा मुगल अमीरों के बीच संघर्ष जारी था।
मराठा विरोधी शक्तियाँ
आलमगीर द्वितीय ने मराठों के बढ़ते प्रभाव का विरोध करने वाले विभिन्न क्षेत्रीय शासकों को समर्थन देने का प्रयास किया। कर्नूल, कडप्पा और सावनूर के नवाबों को मराठों के विरुद्ध संघर्ष में उनका समर्थन प्राप्त हुआ। पंजाब में अदीना बेग को भी मुगल सम्राट ने महत्त्वपूर्ण पद और ‘ज़फ़र जंग बहादुर’ की उपाधि प्रदान की।
मराठों के बढ़ते प्रभाव के विरुद्ध नजीब-उद-दौला जैसे मुगल अमीरों ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। इस प्रकार आलमगीर द्वितीय के शासनकाल में मुगल साम्राज्य के अवशेषों पर अधिकार स्थापित करने के लिए मराठों, अफगानों और मुगल अमीरों के बीच संघर्ष तेज हो गया।
बंगाल और प्लासी का युद्ध
आलमगीर द्वितीय के शासनकाल में बंगाल में भी महत्त्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन हुए। बंगाल के नवाब अलीवर्दी ख़ाँ की मृत्यु के बाद सिराज-उद-दौला उत्तराधिकारी बने। उन्हें मुगल सम्राट से मान्यता प्राप्त थी, किंतु बंगाल के भीतर अनेक शक्तिशाली गुट उनके विरोधी थे।
इसी राजनीतिक अस्थिरता के बीच अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी और सिराज-उद-दौला के बीच संघर्ष हुआ। रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में अंग्रेज़ों ने 23 जून 1757 ई. को प्लासी के युद्ध में सिराज-उद-दौला को पराजित कर दिया। इसके बाद मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया गया। इस घटना ने बंगाल में अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक प्रभाव के विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया और मुगल साम्राज्य की केंद्रीय सत्ता को और कमजोर कर दिया।
दक्कन में स्थिति
आलमगीर द्वितीय के शासनकाल में दक्कन की राजनीति पर मराठों के साथ-साथ फ्रांसीसी और अंग्रेज़ शक्तियों का भी प्रभाव बढ़ रहा था। फ्रांसीसी सेनापति डी बुसी ने सलाबत जंग के साथ मिलकर दक्कन में अपनी स्थिति मजबूत की। सलाबत जंग ने मराठों के विरुद्ध संघर्ष में फ्रांसीसी सहायता प्राप्त की। 1756 ई. में सलाबत जंग की सेना ने भारी मस्कटों का प्रयोग किया। इन हथियारों का उपयोग विशेष रूप से युद्ध में दूर से तीव्र गोलीबारी के लिए किया जाता था। डी बुसी को आलमगीर द्वितीय ने सम्मान और उच्च मनसब प्रदान किया था। फ्रांसीसी प्रभाव के विस्तार से अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों के बीच दक्कन में संघर्ष और तीव्र हो गया।
प्लासी के युद्ध के बाद डी बुसी ने उत्तरी सरकार के क्षेत्रों में फ्रांसीसी प्रभाव बनाए रखने का प्रयास किया, किंतु 1758 ई. में अंग्रेज़ों ने इन क्षेत्रों पर पुनः अधिकार कर लिया। इसके बाद डी बुसी को वापस फ्रांस बुला लिया गया और सलाबत जंग ने अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ समझौता कर लिया।
कश्मीर में मुगल प्रभाव
1754 ई. में कश्मीर के दुर्रानी सूबेदार सुख जीवन मल ने स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने का प्रयास किया। उसने आलमगीर द्वितीय से अपने शासन की मान्यता प्राप्त करने का प्रयास किया। समझौते के अंतर्गत आलमगीर द्वितीय ने उसे कश्मीर में ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की। इससे मुगल सम्राट ने सीमित रूप से ही सही, कश्मीर पर अपना नाममात्र का अधिकार बनाए रखा।
भोपाल की स्थिति
1758 ई. में भोपाल के नवाब फ़ैज़ मोहम्मद ख़ाँ और उनकी सौतेली माता ममोला बाई के बीच संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में मराठों का प्रभाव भी दिखाई दिया। आलमगीर द्वितीय ने फ़ैज़ मोहम्मद ख़ाँ का समर्थन करते हुए उन्हें रायसेन का प्रशासक नियुक्त किया और ‘बहादुर’ की उपाधि प्रदान की। यद्यपि उस समय रायसेन पर तत्काल उनका पूर्ण नियंत्रण स्थापित नहीं हो सका, किंतु बाद में उन्होंने पुनः उस पर अधिकार प्राप्त किया।
मराठा शक्ति का चरम उत्कर्ष
1758 ई. में रघुनाथराव के नेतृत्व में मराठों ने पंजाब में प्रवेश किया और लाहौर पर अधिकार कर लिया। उन्होंने तैमूर शाह दुर्रानी को पंजाब से पीछे हटने के लिए विवश कर दिया। तैमूर शाह और उसकी सेना लाहौर से पीछे हटकर पेशावर की ओर चली गई। पंजाब में मराठों की इस सफलता ने उनकी शक्ति को अत्यधिक बढ़ा दिया। 1760 ई. तक मराठा शक्ति अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। मराठा नेतृत्व में मुगल साम्राज्य को समाप्त करके दिल्ली के सिंहासन पर अपने समर्थित व्यक्ति को बैठाने की योजनाएँ भी बनने लगी थीं। इससे मुगल सम्राट और मराठों के बीच संघर्ष और अधिक तीव्र हो गया।
इमाद-उल-मुल्क से संघर्ष
आलमगीर द्वितीय धीरे-धीरे इमाद-उल-मुल्क के प्रभाव से मुक्त होने का प्रयास कर रहे थे। दूसरी ओर इमाद-उल-मुल्क को भय था कि सम्राट अहमद शाह दुर्रानी से सहायता माँगकर उसकी शक्ति समाप्त कर सकते हैं। उसे यह आशंका भी थी कि सम्राट अपने पुत्र अली गौहर को आगे बढ़ाकर उसके राजनीतिक प्रभुत्व को चुनौती दे सकते हैं। 1759 ई. में अली गौहर दिल्ली से निकलकर पूर्व की ओर चले गए। उनके इस प्रस्थान से इमाद-उल-मुल्क और अधिक चिंतित हो गया। उसे आशंका थी कि अली गौहर भविष्य में मुगल सत्ता को पुनर्गठित करने का प्रयास कर सकते हैं। इसी राजनीतिक तनाव ने आलमगीर द्वितीय और इमाद-उल-मुल्क के बीच अंतिम संघर्ष की भूमिका तैयार की।
आलमगीर द्वितीय की हत्या
1759 ई. में इमाद-उल-मुल्क ने आलमगीर द्वितीय की हत्या की योजना बनाई। हत्या से पहले कुछ मुगल राजकुमार, जिनमें अली गौहर भी शामिल थे, दिल्ली से निकलने में सफल हो गए। नवंबर 1759 ई. में आलमगीर द्वितीय को सूचना दी गई कि एक धार्मिक व्यक्ति उनसे मिलने आया है। धार्मिक व्यक्तियों से मिलने के इच्छुक आलमगीर द्वितीय उससे मिलने के लिए कोटला फ़तेह शाह की ओर गए। वहाँ इमाद-उल-मुल्क के भेजे गए हत्यारों ने उन पर हमला कर दिया और उनकी हत्या कर दी। इस प्रकार 29 नवंबर 1759 ई. को आलमगीर द्वितीय की हत्या कर दी गई। उनकी मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य में व्यापक शोक व्याप्त हुआ और विशेष रूप से मुगल समर्थक तथा मुस्लिम अभिजात वर्ग में इस घटना की तीव्र प्रतिक्रिया हुई।


