संत जॉन
मुख्य लेख: रोमन सभ्यता
जॉन द अपोस्टल (लगभग 6 ई. से लगभग 100 ई.), जिन्हें ईसाई परंपरा में संत जॉन, जॉन द इवेंजेलिस्ट, प्रिय शिष्य तथा पूर्वी ऑर्थोडॉक्स परंपरा में संत जॉन द थियोलॉजियन कहा जाता है, यीशु मसीह के बारह प्रमुख प्रेरितों में से एक माने जाते हैं। वे ज़ेबेदी और सलोमी के पुत्र तथा प्रेरित जेम्स के भाई थे। परंपरा में उन्हें बारह प्रेरितों में सबसे कम आयु का बताया जाता है। ईसाई परंपरा के अनुसार वे अन्य अधिकांश प्रेरितों से अधिक समय तक जीवित रहे और वृद्धावस्था में प्राकृतिक मृत्यु को प्राप्त हुए।
जॉन का नाम विशेष रूप से जॉन के सुसमाचार, तीन जोहानिन पत्रों और प्रकाशितवाक्य की पुस्तकों से जुड़ा है। परंपरागत ईसाई मत इन रचनाओं का लेखक प्रेरित जॉन को मानता है, किंतु आधुनिक बाइबिल-विद्वानों में इनके लेखकत्व को लेकर व्यापक मतभेद हैं। विशेष रूप से जॉन के सुसमाचार, प्रिय शिष्य और पटमोस के जॉन की पहचान तथा उनके पारस्परिक संबंधों पर लंबे समय से विद्वतापूर्ण चर्चा होती रही है।
जॉन का परिवार और प्रारंभिक जीवन
जॉन का जन्म गलील सागर के आसपास रहने वाले एक यहूदी मछुआरे परिवार में हुआ माना जाता है। वे ज़ेबेदी के पुत्र और जेम्स के छोटे भाई थे। सुसमाचारों के अनुसार ज़ेबेदी और उनके दोनों पुत्र मछली पकड़ने का व्यवसाय करते थे। चर्च की परंपरा जॉन की माता का नाम सलोमी बताती है। कुछ ईसाई परंपराएँ सलोमी को यीशु की माता मरियम की बहन मानती हैं। यदि इस परंपरा को स्वीकार किया जाए, तो जॉन और जेम्स यीशु के संबंधी माने जाएंगे। हालांकि, यह संबंध न्यू टेस्टामेंट में स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं किया गया है और मुख्यतः बाद की परंपराओं पर आधारित है।
यीशु द्वारा बुलाया जाना
सिनॉप्टिक सुसमाचारों के अनुसार यीशु ने गलील सागर के निकट मछली पकड़ रहे जॉन और उनके भाई जेम्स को अपने अनुयायी बनने के लिए बुलाया। उन्होंने अपने पिता ज़ेबेदी और नाव को छोड़कर यीशु का अनुसरण किया। बाद में दोनों भाई बारह प्रेरितों में शामिल हुए।
यीशु ने जेम्स और जॉन को “बोअनरगेस”, अर्थात् “गरजने वाले पुत्र”, नाम दिया। यह नाम उनके उत्साही और प्रबल स्वभाव की ओर संकेत करता है। एक प्रसंग में दोनों भाइयों ने एक सामरी गाँव पर स्वर्ग से अग्नि बरसाने की अनुमति माँगी, लेकिन यीशु ने उन्हें फटकार लगाई। एक अन्य प्रसंग में जॉन ने यीशु को बताया कि उनके नाम पर दुष्टात्माएँ निकालने वाले एक व्यक्ति को उन्होंने रोकने का प्रयास किया था। यीशु ने उत्तर दिया कि जो उनके विरुद्ध नहीं है, वह उनके पक्ष में है।
बारह प्रेरितों में स्थान
सुसमाचारों में जॉन का नाम बारह प्रेरितों की सूचियों में प्रमुख स्थान पर आता है। पीटर और जेम्स के साथ वे यीशु के निकटतम तीन शिष्यों में गिने जाते हैं। इन तीनों को यीशु ने अपनी सार्वजनिक सेवकाई के कुछ विशेष अवसरों पर अपने साथ रखा। वे याईर की पुत्री को जीवित किए जाने, यीशु के रूपांतरण (ट्रांसफिगरेशन) तथा गेथसेमनी के बगीचे में यीशु की पीड़ा के अवसरों पर उपस्थित थे। इन घटनाओं में उनकी विशेष उपस्थिति यह दर्शाती है कि वे यीशु के अत्यंत निकट माने जाते थे।
अंतिम भोज और प्रिय शिष्य
जॉन के सुसमाचार में एक रहस्यमय व्यक्ति का उल्लेख “उस शिष्य के रूप में किया गया है जिससे यीशु प्रेम करते थे”। ईसाई परंपरा ने इस व्यक्ति की पहचान प्रेरित जॉन के रूप में की है, हालांकि आधुनिक विद्वानों में इस पहचान को लेकर मतैक्य नहीं है। अंतिम भोज के समय यह शिष्य यीशु के निकट बैठा था और उसी ने यीशु से पूछा कि उन्हें धोखा देने वाला कौन होगा। इस प्रसंग को परंपरागत रूप से जॉन के यीशु के साथ विशेष संबंध का प्रमाण माना जाता है।
क्रूस पर यीशु के साथ
यीशु की गिरफ्तारी के बाद अधिकांश शिष्य उनसे दूर हो गए थे। जॉन के सुसमाचार के अनुसार पीटर और एक अन्य शिष्य महायाजक के परिसर तक पहुँचे। परंपरा में इस ‘अन्य शिष्य’ की पहचान जॉन से की जाती है। क्रूस पर यीशु के समय भी एक ‘प्रिय शिष्य’ उपस्थित था। यीशु ने अपनी माता मरियम की देखभाल का दायित्व इस शिष्य को सौंपते हुए कहा कि वह उनकी माता को अपनी माता के रूप में स्वीकार करे। परंपरा में इसे जॉन को सौंपा गया दायित्व माना जाता है।
पुनरुत्थान के बाद की घटनाएँ
यीशु के पुनरुत्थान की सूचना मिलने पर मरियम मगदलीनी ने पीटर और प्रिय शिष्य को खाली कब्र के बारे में बताया। दोनों कब्र की ओर दौड़े और प्रिय शिष्य पहले वहाँ पहुँचा, जबकि पीटर पहले कब्र के भीतर गया। इस घटना को जॉन के सुसमाचार में दोनों प्रेरितों की भूमिका के महत्वपूर्ण प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पुनरुत्थान के बाद गलील सागर के किनारे यीशु के प्रकट होने के प्रसंग में भी प्रिय शिष्य का उल्लेख मिलता है। सात शिष्यों के साथ मछली पकड़ते समय उन्होंने चमत्कारिक रूप से बड़ी संख्या में मछलियाँ पकड़ीं। इसी अध्याय में यीशु और पीटर के बीच प्रिय शिष्य के भविष्य को लेकर संवाद भी मिलता है।
प्रारंभिक ईसाई समुदाय में भूमिका
यीशु के स्वर्गारोहण और पिन्तेकुस्त के बाद जॉन ने प्रारंभिक ईसाई समुदाय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रेरितों के काम में उन्हें पीटर के साथ मंदिर में जाते हुए और एक लंगड़े व्यक्ति के उपचार के प्रसंग में उपस्थित बताया गया है। इस घटना के बाद दोनों को गिरफ्तार भी किया गया। बाद में पीटर और जॉन सामरिया गए और वहाँ नए विश्वासियों से मिले। इससे पता चलता है कि प्रारंभिक ईसाई आंदोलन के विस्तार में दोनों की सक्रिय भूमिका थी।
यरूशलम समुदाय और पौलुस से संबंध
पौलुस ने गलातियों को लिखे अपने पत्र में जेम्स, पीटर और जॉन को यरूशलम के ईसाई समुदाय के “स्तंभ” के रूप में उल्लेख किया है। पौलुस के अनुसार इन नेताओं ने उनके द्वारा प्रचारित संदेश को स्वीकार किया और उन्हें अन्यजातियों के बीच प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान की। इस उल्लेख से यह संकेत मिलता है कि पहली शताब्दी के मध्य में जॉन यरूशलम के प्रारंभिक ईसाई नेतृत्व में प्रतिष्ठित व्यक्तियों में शामिल थे।
जॉन और ‘प्रिय शिष्य’ की पहचान
जॉन के सुसमाचार में “प्रिय शिष्य” का उल्लेख कई महत्वपूर्ण प्रसंगों में हुआ है। वह अंतिम भोज में यीशु के निकट बैठता है, क्रूस के समय उपस्थित रहता है, खाली कब्र पर पहुँचता है और पुनरुत्थान के बाद के एक प्रसंग में यीशु और पीटर के संवाद का साक्षी बनता है। जॉन 21:24 में सुसमाचार को उस शिष्य की गवाही पर आधारित बताया गया है। इसी आधार पर प्रारंभिक ईसाई परंपरा ने प्रिय शिष्य की पहचान प्रेरित जॉन से की। हालांकि, आधुनिक विद्वानों का एक बड़ा वर्ग इस पहचान को निश्चित नहीं मानता। कुछ विद्वान प्रिय शिष्य को किसी अन्य ऐतिहासिक व्यक्ति से जोड़ते हैं, जबकि कुछ इसे सुसमाचार की साहित्यिक भूमिका मानते हैं।
जॉन के सुसमाचार का लेखकत्व
चर्च की प्राचीन परंपरा लंबे समय से जॉन के सुसमाचार को प्रेरित जॉन की रचना मानती रही है। दूसरी शताब्दी के उत्तरार्ध से यह परंपरा ईसाई साहित्य में व्यापक रूप से दिखाई देती है। आधुनिक आलोचनात्मक अध्ययन में, हालांकि, इस मत पर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। सुसमाचार का लेखक स्वयं अपना नाम स्पष्ट रूप से नहीं बताता। इसमें “प्रिय शिष्य” की गवाही का उल्लेख है, लेकिन उसे सीधे ज़ेबेदी के पुत्र जॉन नहीं कहा गया है।
अधिकांश आधुनिक विद्वान मानते हैं कि सुसमाचार का वर्तमान रूप पहली शताब्दी के अंतिम दशकों में विकसित हुआ। कुछ विद्वान इसके निर्माण में एक से अधिक चरणों और संपादकीय प्रक्रियाओं की संभावना भी स्वीकार करते हैं। एक मत यह है कि इसकी मूल परंपरा किसी ऐतिहासिक प्रिय शिष्य से जुड़ी थी और बाद में उनके अनुयायियों या समुदाय ने उसे वर्तमान साहित्यिक रूप प्रदान किया।
जोहानिन साहित्य
जॉन के नाम से जुड़ा साहित्य सामान्यतः जोहानिन साहित्य कहलाता है। इसमें जॉन का सुसमाचार, प्रथम, द्वितीय और तृतीय जॉन पत्र तथा प्रकाशितवाक्य शामिल किए जाते हैं। परंपरागत दृष्टि में इन सभी रचनाओं का संबंध प्रेरित जॉन से जोड़ा गया है। किंतु आधुनिक विद्वानों के अनुसार इन रचनाओं की भाषा, शैली, विषय-वस्तु और धार्मिक दृष्टिकोण में पर्याप्त अंतर दिखाई देता है। अधिकांश विद्वान तीनों जॉन पत्रों को एक ही लेखक से जोड़ते हैं, लेकिन इस लेखक की पहचान और उसका सुसमाचार के लेखक से संबंध विवादित है। प्रकाशितवाक्य के लेखकत्व को लेकर भी व्यापक मतभेद है। इसके लेखक ने अपना नाम ‘जॉन’ बताया है, लेकिन उसने स्वयं को प्रेरित जॉन के रूप में प्रस्तुत नहीं किया।
प्रकाशितवाक्य और पटमोस का जॉन
प्रकाशितवाक्य के अनुसार लेखक उस समय पटमोस द्वीप पर था, जहाँ उसे ईसाई विश्वास और परमेश्वर के वचन की गवाही के कारण दर्शन प्राप्त हुए। बाद की ईसाई परंपरा ने इस व्यक्ति की पहचान प्रेरित जॉन से की और माना कि सम्राट डोमिटियन के शासनकाल में उन्हें पटमोस निर्वासित किया गया था।
दूसरी शताब्दी के लेखक जस्टिन मार्टर ने पटमोस के जॉन को प्रेरित जॉन से जोड़ने वाले प्रारंभिक लेखकों में स्थान पाया। हालांकि, आधुनिक विद्वानों का बहुमत प्रकाशितवाक्य के लेखक और जॉन के सुसमाचार से जुड़े लेखक को अलग-अलग व्यक्तियों के रूप में देखने की ओर झुकता है। भाषा और शैली में अंतर भी इस मत का एक प्रमुख आधार है। प्रकाशितवाक्य की यूनानी भाषा और शैली जॉन के सुसमाचार तथा जॉन पत्रों से पर्याप्त रूप से भिन्न है।
जॉन द एल्डर की समस्या
प्रारंभिक ईसाई लेखकों में जॉन द एल्डर (प्रेस्बिटर) नामक एक व्यक्ति का भी उल्लेख मिलता है। यूसेबियस ने पापियास की परंपरा के आधार पर प्रेरित जॉन और जॉन द एल्डर के बीच अंतर की चर्चा की है। इसी कारण कुछ विद्वानों ने यह संभावना व्यक्त की है कि प्रारंभिक ईसाई परंपरा में जॉन नाम के एक से अधिक प्रभावशाली नेता थे। इस प्रश्न का संबंध विशेष रूप से जॉन के सुसमाचार, पत्रों और प्रकाशितवाक्य के लेखकत्व से जोड़ा जाता है।
इफिसुस से संबंध
बाद की ईसाई परंपरा जॉन को इफिसुस से विशेष रूप से जोड़ती है। माना जाता है कि वे अपने जीवन के अंतिम वर्षों में एशिया माइनर के इस प्रमुख नगर में रहे और वहाँ के ईसाई समुदाय को प्रभावित किया। दूसरी शताब्दी के लेखक आइरेनियस ने जॉन के इफिसुस में रहने और सम्राट ट्राजन के समय तक वहाँ जीवित रहने की परंपरा का उल्लेख किया। इसी परंपरा के आधार पर इफिसुस को जॉन के अंतिम जीवन और उनके प्रभाव का प्रमुख केंद्र माना गया।
पॉलीकार्प और अन्य शिष्यों से संबंध
ईसाई परंपरा के अनुसार जॉन ने पॉलीकार्प को शिक्षा दी, जो बाद में स्मिर्ना का बिशप बना। पॉलीकार्प के माध्यम से जॉन की शिक्षाएँ अगली पीढ़ी तक पहुँचीं। बाद में आइरेनियस ने पॉलीकार्प से प्राप्त शिक्षाओं और स्मृतियों का उल्लेख किया। जॉन और पॉलीकार्प से जुड़ी परंपराएँ प्रारंभिक ईसाई समुदायों में प्रेरितिक उत्तराधिकार और मौखिक परंपरा के विकास के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
आइरेनियस ने एक प्रसिद्ध कथा का भी उल्लेख किया है, जिसमें जॉन को इफिसुस के एक स्नानगृह में सेरिंथस नामक व्यक्ति को देखकर वहाँ से निकलते हुए बताया गया है। यह कथा प्रारंभिक ईसाई धर्म में जॉन की धार्मिक मान्यताओं और कुछ वैकल्पिक ईसाई विचारों के विरोध को दर्शाने के लिए प्रयुक्त हुई।
रोम में उबलते तेल की परंपरा
बाद की ईसाई परंपरा में जॉन के जीवन से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा है कि रोमन अधिकारियों ने उन्हें उबलते तेल में डालने का प्रयास किया, लेकिन वे चमत्कारिक रूप से सुरक्षित रहे। इसके बाद उन्हें पटमोस निर्वासित कर दिया गया। यह कथा विशेष रूप से टर्टुलियन और बाद की परंपराओं से जुड़ी है। रोम के लैटिन गेट के निकट इस घटना की स्मृति में सैन जियोवानी ए पोर्ता लातिना नामक चर्च की परंपरा विकसित हुई। हालांकि, इस घटना का स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
जॉन की मृत्यु
ईसाई परंपरा के अनुसार जॉन ने अन्य अधिकांश प्रेरितों की अपेक्षा अधिक लंबा जीवन जिया और लगभग 100 ईस्वी के आसपास इफिसुस में प्राकृतिक कारणों से उनकी मृत्यु हुई। इस परंपरा के अनुसार वे बारह प्रेरितों में ऐसे प्रमुख व्यक्ति थे जिनकी मृत्यु शहादत के बजाय वृद्धावस्था में हुई।
किंतु जॉन की मृत्यु के संबंध में सभी प्राचीन परंपराएँ एक जैसी नहीं हैं। पापियास से संबंधित एक विवादित परंपरा में जॉन की हिंसक मृत्यु का संकेत मिलता है। कुछ विद्वानों ने इस उल्लेख को प्रेरित जॉन के बजाय किसी अन्य जॉन, संभवतः जॉन द बैपटिस्ट, से संबंधित माना है। इसलिए जॉन की मृत्यु की ऐतिहासिक परिस्थितियाँ पूरी तरह निश्चित नहीं मानी जा सकतीं।
जॉन की कब्र और इफिसुस की परंपरा
जॉन की पारंपरिक कब्र इफिसुस के निकट वर्तमान सेल्चुक क्षेत्र में स्थित सेंट जॉन बेसिलिका से जोड़ी जाती है। बाद की परंपराओं में कहा गया कि उनकी कब्र खोलने पर वहाँ उनकी अस्थियाँ नहीं मिलीं। इससे कुछ ईसाई परंपराओं में यह विश्वास विकसित हुआ कि जॉन को शारीरिक रूप से स्वर्ग में उठा लिया गया था। एक अन्य लोकपरंपरा में कहा गया कि जॉन की कब्र से प्रत्येक वर्ष एक चमत्कारी धूल या राख निकलती थी, जिसे मन्ना कहा जाता था और जिसे रोगों के उपचार के लिए उपयोगी माना जाता था। यह विश्वास विशेष रूप से मध्यकालीन ईसाई परंपराओं में लोकप्रिय रहा।
जॉन की ‘नींद’ की किंवदंती
जॉन 21 में यीशु द्वारा प्रिय शिष्य के बारे में कही गई बात- कि यदि वे चाहें कि वह उनके आने तक जीवित रहे, तो यह दूसरों का विषय नहीं है- से बाद में एक किंवदंती विकसित हुई कि जॉन की मृत्यु नहीं हुई, बल्कि वे अपनी कब्र में सो रहे हैं। ऑगस्टीन और अन्य बाद के लेखकों के उल्लेखों में उनकी कब्र के आसपास भूमि के हिलने या साँस लेने जैसी प्रतीकात्मक कथाएँ मिलती हैं। ये कथाएँ ऐतिहासिक प्रमाण की अपेक्षा धार्मिक लोकविश्वास और संत-परंपरा का हिस्सा हैं।
जॉन के अपोक्रिफ़ल कृत्य
जॉन से संबंधित एक्ट्स ऑफ़ जॉन नामक एक अपोक्रिफ़ल रचना भी प्रचलित रही। इसे परंपरागत रूप से जॉन या उनके किसी शिष्य से जोड़ा गया, लेकिन आधुनिक विद्वान इसे दूसरी शताब्दी की एक गैर-प्रामाणिक ईसाई रचना मानते हैं। इस ग्रंथ में जॉन के जीवन, यात्राओं, चमत्कारों और शिक्षाओं से जुड़ी अनेक कथाएँ हैं। इसमें डोसेटिक प्रवृत्तियों के संकेत मिलते हैं, हालांकि आधुनिक विद्वान इसे सीधे तौर पर ग्नॉस्टिक ग्रंथ मानने में सावधानी बरतते हैं। बाद में चर्च परंपरा में इसे प्रामाणिक धर्मग्रंथ के रूप में स्वीकार नहीं किया गया।
जॉन का धार्मिक महत्त्व
जॉन की धार्मिक प्रतिष्ठा मुख्यतः यीशु के निकटतम शिष्यों में उनकी भूमिका, प्रिय शिष्य की परंपरा और जोहानिन साहित्य से उनके संबंध पर आधारित है। पूर्वी ऑर्थोडॉक्स परंपरा में उन्हें जॉन द थियोलॉजियन कहा जाता है, क्योंकि उनके नाम से जुड़े साहित्य में यीशु के स्वरूप, परमेश्वर और दिव्य वचन के संबंध पर गहरा धार्मिक चिंतन मिलता है।
पश्चिमी ईसाई परंपरा में वे प्रेरित और सुसमाचार-लेखक के रूप में विशेष सम्मानित हैं। उनके प्रतीक के रूप में सामान्यतः चील का प्रयोग किया जाता है, जो उनके लेखन की आध्यात्मिक ऊँचाई और चिंतनशील प्रकृति का प्रतीक माना जाता है।
ईसाई धार्मिक कैलेंडर में स्मरण
रोमन कैथोलिक, एंग्लिकन और लूथरन परंपराओं में संत जॉन प्रेरित एवं सुसमाचार-लेखक का पर्व सामान्यतः 27 दिसंबर को मनाया जाता है। पूर्वी ऑर्थोडॉक्स परंपरा में भी जॉन से संबंधित कई स्मृति-दिवस हैं, जिनमें 26 सितंबर का दिन उनके विश्राम-दिवस के रूप में विशेष रूप से प्रसिद्ध है। पूर्वी परंपरा में 8 मई को भी जॉन के स्मरण से जोड़ा जाता है। इससे संबंधित लोकविश्वासों में उनकी कब्र से निकलने वाली चमत्कारी धूल का उल्लेख मिलता है।
इस्लामी परंपरा में जॉन
कुरआन में यीशु के शिष्यों का उल्लेख हवारीयून, अर्थात् अल्लाह के समर्थकों के रूप में किया गया है, लेकिन उनके व्यक्तिगत नाम नहीं दिए गए हैं। इस्लामी परंपरा के कुछ बाद के विद्वानों ने ईसाई स्रोतों के आधार पर यीशु के शिष्यों के नामों की पहचान करने का प्रयास किया। इन परंपराओं में जॉन का नाम भी यीशु के शिष्यों में मिलता है। हालांकि, जॉन के जीवन और उनके कार्यों के संबंध में विस्तृत जानकारी मुख्यतः ईसाई स्रोतों और परंपराओं से आती है, न कि कुरआन से।
ड्रूज़ परंपरा में जॉन
ड्रूज़ धार्मिक परंपरा में जॉन द अपोस्टल को सम्मानित धार्मिक व्यक्तियों में स्थान दिया गया है। व्यापक रूप से ड्रूज़ परंपरा ईसाई धर्म के प्रारंभिक धार्मिक व्यक्तित्वों और सुसमाचार लेखकों के प्रति सम्मान रखती है तथा उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान के वाहक के रूप में देखती है।
लैटर-डे सेंट परंपरा
चर्च ऑफ़ जीसस क्राइस्ट ऑफ़ लैटर-डे सेंट्स की परंपरा जॉन को जॉन द इवेंजेलिस्ट, प्रिय शिष्य और पटमोस के जॉन के साथ एक ही व्यक्ति मानती है। इस परंपरा के अनुसार जॉन को सामान्य मृत्यु प्राप्त नहीं हुई, बल्कि उन्हें यीशु के दूसरे आगमन तक पृथ्वी पर सेवा करते रहने की अनुमति दी गई। लैटर-डे सेंट धर्मग्रंथों में जॉन के संबंध में कई उल्लेख मिलते हैं। इस परंपरा के अनुसार 1829 ईस्वी में जॉन ने पीटर और जेम्स के साथ जोसेफ स्मिथ तथा ओलिवर काउडरी को दर्शन देकर पुरोहिताई अधिकार की पुनर्स्थापना में भूमिका निभाई।
फ्रीमेसनरी में जॉन
फ्रीमेसनरी में संत जॉन द बैपटिस्ट और संत जॉन द इवेंजेलिस्ट दोनों को पारंपरिक संरक्षक संतों के रूप में सम्मानित किया जाता है। इसी कारण अनेक मेसोनिक परंपराओं में जॉन द इवेंजेलिस्ट के पर्व को विशेष धार्मिक-सांस्कृतिक महत्त्व प्राप्त है।
कला में जॉन का चित्रण
ईसाई कला में जॉन का चित्रण बहुत प्राचीन समय से मिलता है। उन्हें सामान्यतः दो प्रमुख रूपों में दर्शाया गया है- एक वृद्ध व्यक्ति के रूप में, जिसके सफेद या धूसर बाल और दाढ़ी हैं, तथा दूसरे रूप में एक युवा, प्रायः बिना दाढ़ी वाले व्यक्ति के रूप में।
बाइजेंटाइन कला में वृद्ध जॉन का चित्रण अधिक सामान्य रहा, जबकि मध्यकालीन पश्चिमी कला में उन्हें अक्सर युवा और कोमल चेहरे वाले व्यक्ति के रूप में दिखाया गया। इस प्रकार के चित्रण का संबंध उनके प्रिय शिष्य के रूप में वर्णन और यीशु के निकटतम शिष्यों में उनकी स्थिति से भी जोड़ा गया है।
जॉन के प्रमुख प्रतीक
जॉन का प्रमुख प्रतीक चील है। ईसाई कला में चील को उनके सुसमाचार की आध्यात्मिक ऊँचाई और गहन धार्मिक चिंतन का प्रतीक माना जाता है। उनके साथ पुस्तक या स्क्रॉल भी दिखाया जाता है, जो उनके नाम से जुड़े सुसमाचार और पत्रों का प्रतीक है। एक अन्य प्रसिद्ध प्रतीक विष का प्याला और उसमें से निकलता हुआ साँप है। यह परंपरा जॉन से जुड़ी एक अपोक्रिफ़ल कथा पर आधारित है, जिसमें उन्हें विष का प्याला पीने की चुनौती दी जाती है और वे सुरक्षित बच जाते हैं।
मध्यकालीन कला में जॉन का स्वरूप
मध्यकालीन और पुनर्जागरणकालीन कला में जॉन को कई बार अत्यंत युवा, कोमल और अपेक्षाकृत स्त्रैण चेहरे के साथ चित्रित किया गया। कला इतिहासकारों ने इन चित्रणों को धार्मिक भावनात्मकता, आध्यात्मिक निकटता और प्रिय शिष्य की अवधारणा से जोड़ा है। विशेष रूप से अंतिम भोज के दृश्यों में जॉन को यीशु के निकट बैठे युवा शिष्य के रूप में चित्रित करना एक व्यापक कलात्मक परंपरा बन गया। इसी कारण बाद की कला में उनके स्वरूप को लेकर अनेक व्याख्याएँ सामने आईं।
द लास्ट सपर और जॉन
लियोनार्डो दा विंची की प्रसिद्ध द लास्ट सपर में यीशु के निकट बैठे युवा व्यक्ति को पारंपरिक रूप से प्रेरित जॉन माना जाता है। आधुनिक लोकप्रिय साहित्य में कभी-कभी इस व्यक्ति को मरियम मगदलीनी के रूप में पहचानने का दावा किया गया है, लेकिन यह व्याख्या मुख्यधारा के कला-इतिहास और ऐतिहासिक साक्ष्यों से समर्थित नहीं है। इस चित्र में जॉन की पहचान उस व्यापक ईसाई कलात्मक परंपरा से जुड़ी है, जिसमें उन्हें अंतिम भोज में यीशु के अत्यंत निकट बैठे युवा शिष्य के रूप में चित्रित किया जाता है।
ऐतिहासिक मूल्यांकन
जॉन द अपोस्टल का ऐतिहासिक व्यक्तित्व मुख्यतः न्यू टेस्टामेंट, प्रारंभिक ईसाई लेखकों और बाद की चर्च परंपराओं के माध्यम से जाना जाता है। न्यू टेस्टामेंट उन्हें यीशु के निकटतम शिष्यों में रखता है, जबकि बाद की परंपराएँ उनके जीवन को इफिसुस, पटमोस और एशिया माइनर के ईसाई समुदायों से जोड़ती हैं। उनके नाम से जुड़े साहित्य के लेखकत्व का प्रश्न आज भी विद्वानों के बीच विवाद का विषय है। प्रेरित जॉन, प्रिय शिष्य, जॉन द एल्डर और पटमोस के जॉन को एक ही व्यक्ति मानने वाली पारंपरिक धारणा का प्रभाव ईसाई धर्म पर अत्यंत व्यापक रहा है, किंतु आधुनिक ऐतिहासिक आलोचना इन पहचानों के बीच अंतर करने की संभावना को गंभीरता से स्वीकार करती है। फिर भी, चाहे जोहानिन साहित्य का अंतिम लेखक स्वयं प्रेरित जॉन रहे हों या उनके निकटवर्ती शिष्यों और समुदाय ने उसे विकसित किया हो, जॉन की परंपरा ने प्रारंभिक ईसाई धर्म के धर्मशास्त्र, साहित्य, आध्यात्मिकता और कला पर गहरा प्रभाव डाला। इस कारण जॉन द अपोस्टल ईसाई इतिहास के सबसे प्रभावशाली और बहुआयामी प्रेरितों में गिने जाते हैं।

