गेलेन
मुख्य लेख : रोमन सभ्यता
एलिअस गैलेनस अथवा क्लॉडियस गैलेनस, जिन्हें सामान्यतः गेलेन या परगामम के गेलेन कहा जाता है, प्राचीन रोमन साम्राज्य के प्रसिद्ध यूनानी चिकित्सक, शल्यचिकित्सक और दार्शनिक थे। उनका जन्म लगभग 129 ईस्वी में परगामम में हुआ था। वे प्राचीन चिकित्सा के सबसे प्रभावशाली विद्वानों में गिने जाते हैं। शरीररचना-विज्ञान, शरीरक्रिया-विज्ञान, रोगविज्ञान, औषधिविज्ञान, शल्यचिकित्सा और तंत्रिका-विज्ञान के अतिरिक्त दर्शन तथा तर्कशास्त्र पर भी उनका गहरा प्रभाव पड़ा। उनकी मृत्यु की तिथि निश्चित नहीं है; विद्वानों में लगभग 199 से 216 ईस्वी तक विभिन्न मत मिलते हैं।
जन्म और प्रारंभिक शिक्षा
गेलेन का जन्म परगामम में हुआ था, जो उस समय एशिया माइनर का एक प्रमुख सांस्कृतिक और बौद्धिक केंद्र था। उनके पिता एलिअस निकॉन एक समृद्ध यूनानी वास्तुकार थे और दर्शन, गणित, तर्कशास्त्र, खगोलशास्त्र, कृषि तथा साहित्य में रुचि रखते थे। गेलेन ने अपने पिता को न्यायप्रिय, उदार और परोपकारी व्यक्ति के रूप में स्मरण किया है।
गेलेन को प्रारंभ में साहित्य और दर्शन की शिक्षा मिली। किशोरावस्था में उन्होंने प्लेटोनिक और स्टोइक दर्शन का अध्ययन किया तथा अरस्तू और एपिक्यूरस सहित विभिन्न दार्शनिक परंपराओं से परिचय प्राप्त किया। उनके पिता चाहते थे कि वे दर्शन अथवा राजनीति के क्षेत्र में प्रतिष्ठित जीवन बिताएँ, किंतु लगभग 145 ईस्वी में एक स्वप्न की घटना के बाद उन्होंने चिकित्सा को अपना प्रमुख अध्ययन-विषय बनाया। लगभग सोलह वर्ष की आयु में उन्होंने परगामम के प्रसिद्ध एस्क्लेपियन में चिकित्सा का अध्ययन आरंभ किया। यह संस्थान धार्मिक केंद्र होने के साथ-साथ उपचार और चिकित्सकीय अध्ययन का भी महत्त्वपूर्ण स्थल था।
चिकित्सा-शिक्षा और यात्राएँ
पिता की मृत्यु के बाद गेलेन को पर्याप्त संपत्ति प्राप्त हुई, जिससे उन्हें विभिन्न चिकित्सा-केंद्रों की यात्रा करने और अलग-अलग चिकित्सा-पद्धतियों का अध्ययन करने का अवसर मिला। उन्होंने स्मिर्ना, कोरिंथ, क्रेते, सिलिसिया और साइप्रस की यात्राएँ कीं तथा अंततः अलेक्जेंड्रिया पहुँचे। उस समय अलेक्जेंड्रिया शरीररचना और चिकित्सा-अध्ययन का प्रमुख केंद्र था। इन यात्राओं से उन्हें विभिन्न चिकित्सकीय परंपराओं और उपचार-पद्धतियों का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त हुआ।
ग्लेडियेटरों के चिकित्सक
लगभग 157 ईस्वी में गेलेन परगामम लौटे और उन्हें एशिया के उच्च पुजारी के अधीन ग्लेडियेटरों का चिकित्सक नियुक्त किया गया। इस पद ने उन्हें गंभीर घावों, अस्थिभंग और अन्य शारीरिक चोटों के उपचार का व्यापक अनुभव दिया। उन्होंने घावों को केवल उपचार की समस्या के रूप में नहीं देखा, बल्कि शरीर की आंतरिक संरचना को समझने के साधन के रूप में भी प्रयोग किया। उन्होंने आहार, व्यायाम, स्वच्छता और निवारक चिकित्सा पर भी बल दिया। ग्लेडियेटरों के उपचार से प्राप्त व्यावहारिक अनुभव ने उनके चिकित्सकीय दृष्टिकोण को अधिक वैज्ञानिक और प्रयोगात्मक बनाया तथा आगे के शरीररचना संबंधी अध्ययनों के लिए आधार तैयार किया।
रोम में आगमन और चिकित्सकीय प्रतिष्ठा
लगभग 162 ईस्वी में गेलेन रोम पहुँचे और शीघ्र ही एक प्रतिष्ठित चिकित्सक के रूप में प्रसिद्ध हो गए। वे चिकित्सा में तर्क, प्रत्यक्ष निरीक्षण और व्यावहारिक अनुभव को विशेष महत्त्व देते थे। इस कारण उनका मत उन चिकित्सकों से कई बार भिन्न रहा जो परंपरागत सिद्धांतों और उपचार-पद्धतियों पर अधिक निर्भर थे। रोम में उन्होंने पेरिपेटेटिक दार्शनिक यूडेमस का उपचार किया। यूडेमस आवर्तक ज्वर से गंभीर रूप से पीड़ित थे और अन्य चिकित्सक उनके स्वस्थ होने की आशा लगभग छोड़ चुके थे। गेलेन ने रोगी के लक्षणों का सूक्ष्म निरीक्षण किया और तर्क तथा अनुभव के आधार पर रोग की प्रकृति तथा संभावित परिणाम का अनुमान लगाया। उनके इस चिकित्सकीय पूर्वानुमान ने उन्हें अपने समकालीनों से अलग पहचान दिलाई।
गेलेन के चिकित्सकीय मतों के कारण कुछ चिकित्सकों से उनका विरोध भी हुआ। यूडेमस ने उन्हें संभावित षड्यंत्रों से सावधान किया। इन परिस्थितियों और अपने बढ़ते प्रभाव को लेकर उत्पन्न आशंकाओं के कारण गेलेन ने कुछ समय के लिए रोम छोड़ दिया।
एंटोनिन प्लेग और शाही सेवा
गेलेन के जीवन में निर्णायक परिवर्तन एंटोनिन प्लेग के दौरान आया। लगभग 166 ईस्वी से रोमन साम्राज्य के विभिन्न भागों में एक गंभीर महामारी फैलने लगी। 168–169 ईस्वी में एक्विलिया में तैनात सैनिकों के बीच भी इसका व्यापक प्रभाव दिखाई दिया। आधुनिक विद्वान इसे सामान्यतः चेचक से जोड़ते हैं, यद्यपि प्राचीन विवरणों के आधार पर इसकी निश्चित पहचान संभव नहीं है।
सम्राट मार्कस ऑरेलियस और लूसियस वेरस के शासनकाल में महामारी गंभीर रूप धारण कर चुकी थी। गेलेन को रोम वापस बुलाया गया और शाही चिकित्सा-सेवा से जोड़ा गया। बाद में उन्हें सम्राट के उत्तराधिकारी कमोडस की चिकित्सा-देखभाल के लिए नियुक्त किया गया। इस प्रकार वे लंबे समय तक शाही परिवार से जुड़े रहे।
गेलेन ने महामारी के रोगियों में त्वचा पर चकत्ते और दाने, बुखार, दस्त, उल्टी, श्वसन संबंधी समस्याएँ तथा शरीर के विभिन्न अंगों में घाव जैसे लक्षणों का उल्लेख किया। उनके विवरण आधुनिक महामारी-विज्ञान की दृष्टि से पूर्ण नहीं हैं, किंतु दूसरी शताब्दी की महामारी को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
महामारी की जनहानि का अनुमान विद्वानों में अलग-अलग है। कुछ इतिहासकारों ने लाखों लोगों की मृत्यु का अनुमान लगाया है, जबकि इसके वास्तविक पैमाने को लेकर पर्याप्त मतभेद हैं। फिर भी यह स्पष्ट है कि एंटोनिन प्लेग ने रोमन साम्राज्य की जनसंख्या, अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन पर गंभीर प्रभाव डाला।
चिकित्सा और शरीररचना संबंधी योगदान
गेलेन की चिकित्सा-पद्धति में निरीक्षण, अनुभव, प्रयोग और तर्क का समन्वय था। उन्होंने शरीररचना और शरीरक्रिया को चिकित्सा का आधार माना तथा यह विचार प्रस्तुत किया कि श्रेष्ठ चिकित्सक को दर्शन और तर्कशास्त्र का भी ज्ञान होना चाहिए। उन्होंने मुख्यतः पशुओं के विच्छेदन और प्रयोगों द्वारा शरीर की संरचना का अध्ययन किया। मानव शव-विच्छेदन के सीमित अवसरों के कारण उनके कई निष्कर्ष पशु-शरीर पर आधारित थे। विशेष रूप से बंदर जैसे प्राइमेट उनके अध्ययन के प्रमुख विषय थे। पशु और मानव शरीर की संरचना में अंतर के कारण उनकी कुछ धारणाएँ बाद में गलत सिद्ध हुईं, फिर भी उनके प्रयोगों ने प्राचीन शरीररचना-विज्ञान को व्यवस्थित दिशा दी।
गेलेन ने स्वरयंत्र, श्वासनली, मांसपेशियों, तंत्रिकाओं, रीढ़ और मेरुरज्जु का अध्ययन किया। जीवित पशुओं पर प्रयोग करके उन्होंने यह समझने का प्रयास किया कि तंत्रिकाएँ शरीर की गति और संवेदना को किस प्रकार नियंत्रित करती हैं। उन्होंने संवेदी और प्रेरक तंत्रिकाओं के बीच अंतर स्पष्ट किया तथा मांसपेशियों की गति और उनके परस्पर विरोधी कार्यों का अध्ययन किया।
रक्त और रक्त-संचार संबंधी विचार
गेलेन ने शिराओं और धमनियों के रक्त में अंतर पहचाना। उनका मानना था कि रक्त मुख्यतः यकृत में बनता है और भोजन से प्राप्त पोषक पदार्थों से इसका निर्माण होता है। यकृत से शिराओं के माध्यम से रक्त शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुँचता है। उनके अनुसार हृदय और फेफड़ों के बीच भी रक्त तथा वायु का संबंध था। उन्होंने यह माना कि हृदय के दाएँ और बाएँ भागों के बीच स्थित पट में सूक्ष्म छिद्र होते हैं, जिनसे रक्त एक भाग से दूसरे भाग तक पहुँचता है। आधुनिक शरीरक्रिया-विज्ञान ने इस धारणा को गलत सिद्ध किया।
गेलेन रक्त के आधुनिक अर्थ में निरंतर परिसंचरण की अवधारणा तक नहीं पहुँच सके। वे शिराओं और धमनियों को अपेक्षाकृत अलग-अलग वितरण-व्यवस्थाओं के रूप में देखते थे। बाद में इब्न अल-नफ़ीस ने फुफ्फुसीय रक्त-संचार की अधिक सही व्याख्या प्रस्तुत की और बताया कि रक्त हृदय के दाएँ भाग से फेफड़ों में जाता है तथा वहाँ से बाएँ भाग में पहुँचता है।
शरीर के तीन प्रमुख तंत्र
गेलेन ने शरीर की कार्यप्रणाली को तीन प्रमुख तंत्रों में समझाने का प्रयास किया। पहला, मस्तिष्क और तंत्रिकाओं का तंत्र, जो विचार, संवेदना और मानसिक गतिविधियों से संबंधित था। दूसरा, हृदय और धमनियों का तंत्र, जिसे उन्होंने जीवनदायी शक्ति के संचार से जोड़ा। तीसरा, यकृत और शिराओं का तंत्र, जिसे पोषण, वृद्धि और शरीर के निर्माण से संबंधित माना। इस प्रकार उन्होंने शरीर के विभिन्न अंगों को विशिष्ट कार्यों से जोड़ने की एक व्यवस्थित व्याख्या प्रस्तुत की।
आत्मा और कार्यों का स्थानीयकरण
गेलेन की कृति ‘ऑन द डॉक्ट्रिन्स ऑफ हिप्पोक्रेट्स एंड प्लेटो’ में शरीर और आत्मा के संबंध पर विस्तार से विचार मिलता है। प्लेटो की अवधारणाओं से प्रभावित होकर उन्होंने आत्मा को तीन भागों में विभाजित किया—तार्किक, उत्साही या भावात्मक तथा इच्छाप्रधान। उनके अनुसार तार्किक आत्मा का केंद्र मस्तिष्क था, जो विचार, स्मृति, ज्ञान, निर्णय और संवेदना से संबंधित था। उत्साही आत्मा का संबंध हृदय से तथा इच्छाप्रधान आत्मा का संबंध यकृत से माना गया। मस्तिष्क को उच्च मानसिक क्रियाओं का केंद्र मानना प्राचीन चिकित्सा-चिंतन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन था। गेलेन ने न्यूमा अर्थात् जीवनदायी शक्ति की अवधारणा के माध्यम से शरीर और आत्मा के संबंध को समझाने का प्रयास किया। उन्होंने जीवनदायी और मानसिक न्यूमा के बीच अंतर किया तथा उन्हें क्रमशः हृदय और मस्तिष्क से संबंधित माना।
ह्यूमरवाद और चिकित्सा-सिद्धांत
गेलेन की चिकित्सा-पद्धति हिप्पोक्रेटिक चार रसों के सिद्धांत पर आधारित थी। उनके अनुसार रक्त, पीला पित्त, काला पित्त और कफ का संतुलन स्वास्थ्य के लिए आवश्यक था। इनके असंतुलन को रोग तथा विभिन्न शारीरिक-मानसिक अवस्थाओं का कारण माना जाता था। उन्होंने इन रसों को चार स्वभावों से भी जोड़ा—रक्त से सैंग्विनिक, पीले पित्त से कोलेरिक, काले पित्त से मेलैन्कोलिक और कफ से फ्लेग्मैटिक स्वभाव। आधुनिक चिकित्सा में यह सिद्धांत वैज्ञानिक रूप से मान्य नहीं है, किंतु लगभग डेढ़ सहस्राब्दी तक यूरोपीय और इस्लामी चिकित्सा पर इसका व्यापक प्रभाव रहा। गेलेन ने वेनिसेक्शन अर्थात् शिरा-छेदन द्वारा रक्तस्रवण की चिकित्सा-पद्धति का भी समर्थन किया। उन्होंने इस पद्धति की चिकित्सकीय उपयोगिता के पक्ष में तर्क प्रस्तुत किए और अपने विरोधी चिकित्सकीय मतों के साथ सार्वजनिक वाद-विवाद भी किए।
चिकित्सा की विचारधाराएँ
गेलेन के समय चिकित्सा-जगत में अनुभववादी, तर्कवादी और मेथोडिस्ट जैसी विभिन्न परंपराएँ थीं। अनुभववादी चिकित्सक प्रत्यक्ष अनुभव और रोगियों के उपचार से प्राप्त ज्ञान पर बल देते थे। तर्कवादी चिकित्सक रोगों के कारणों और शरीर की आंतरिक प्रक्रियाओं की तार्किक व्याख्या को महत्त्व देते थे। मेथोडिस्ट चिकित्सक रोगों के सामान्य स्वरूप और उनके उपचार के व्यावहारिक तरीकों पर ध्यान केंद्रित करते थे। गेलेन ने इन परंपराओं के बीच एक समन्वयवादी दृष्टिकोण विकसित किया। वे न तो केवल अनुभव को पर्याप्त मानते थे और न ही केवल अमूर्त सिद्धांतों को। उनके लिए चिकित्सा में निरीक्षण, प्रयोग और तर्क का संयुक्त उपयोग आवश्यक था।
दर्शन, मनोविज्ञान और मनोचिकित्सा
गेलेन की बौद्धिक दृष्टि पर प्लेटो, अरस्तू, स्टोइक, एपिक्यूरियन और पाइरोनिस्ट परंपराओं का प्रभाव था। वे चिकित्सा और दर्शन को परस्पर संबंधित विषय मानते थे। उनकी प्रसिद्ध धारणा थी कि श्रेष्ठ चिकित्सक को दार्शनिक भी होना चाहिए।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से उन्होंने मानसिक और शारीरिक अवस्थाओं के बीच संबंध स्थापित किया। उनके अनुसार शरीर की संरचना और स्वभाव का प्रभाव व्यक्ति की मानसिक प्रवृत्तियों पर पड़ सकता है। उन्होंने क्रोध, भय, लोभ और अनियंत्रित इच्छाओं जैसी भावनाओं को मानसिक संतुलन से जोड़ा तथा इनके नियंत्रण में आत्मसंयम, विवेक और चिकित्सकीय संवाद को महत्त्व दिया।
गैलेन की साहित्यिक विरासत
गेलेन अत्यंत विपुल लेखक थे। उन्होंने शरीररचना, शरीरक्रिया-विज्ञान, रोगविज्ञान, औषधिविज्ञान, शल्यचिकित्सा, आहार, स्वच्छता, तर्कशास्त्र, दर्शन और मनोविज्ञान सहित अनेक विषयों पर ग्रंथ लिखे। प्राचीन परंपरा के अनुसार उनकी रचनाओं की संख्या सैकड़ों में थी, हालांकि उनका केवल एक भाग ही आज उपलब्ध है। उनकी रचनाओं की प्रमाणिकता भी एक जटिल समस्या है। अनेक ग्रंथ यूनानी, अरबी और लैटिन परंपराओं में अलग-अलग रूपों में सुरक्षित हैं। कुछ मूल यूनानी ग्रंथ नष्ट हो चुके हैं और उनकी जानकारी केवल अरबी अथवा लैटिन अनुवादों से मिलती है। कुछ ऐसी रचनाएँ भी थीं जिन्हें लंबे समय तक गेलेन की कृतियाँ माना गया, किंतु बाद के शोध में उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध पाई गई। उन्नीसवीं शताब्दी में कार्ल गॉटलोब कुह्न ने 1821–1833 ईस्वी के बीच गेलेन की रचनाओं का विशाल संग्रह प्रकाशित किया। इस संस्करण ने आधुनिक गेलेन-अध्ययन को व्यवस्थित आधार प्रदान किया।

मृत्यु और तिथि संबंधी मतभेद
गेलेन की मृत्यु की निश्चित तिथि ज्ञात नहीं है। ‘सूदा’ में उनकी मृत्यु लगभग 70 वर्ष की आयु में होने का उल्लेख मिलता है, जबकि कुछ अरबी स्रोत उन्हें लगभग 87 वर्ष तक जीवित बताते हैं। कुछ विद्वान लगभग 199 ईस्वी की तिथि स्वीकार करते हैं, जबकि अन्य 216 ईस्वी को अधिक संभावित मानते हैं। इसलिए उनकी मृत्यु के संबंध में निश्चित तिथि के बजाय विभिन्न विद्वत् मतों को स्वीकार करना अधिक उचित है।
बाइजेंटाइन और इस्लामी जगत में प्रभाव
पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के बाद पश्चिमी यूरोप में यूनानी भाषा के ज्ञान में कमी आई, किंतु पूर्वी रोमन या बाइजेंटाइन साम्राज्य में गेलेन की चिकित्सा-परंपरा जीवित रही। ओरिबासियस, जॉन ऑफ अलेक्जेंड्रिया और अन्य विद्वानों ने उनकी रचनाओं का अध्ययन और व्याख्या की। आठवीं शताब्दी से अब्बासी शासन के अंतर्गत यूनानी विज्ञान और चिकित्सा-ग्रंथों के अरबी अनुवाद का व्यापक आंदोलन आरंभ हुआ। हुनैन इब्न इशाक ने गेलेन की अनेक रचनाओं के सीरियाई और अरबी अनुवाद में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन अनुवादों के माध्यम से गेलेन के विचार इस्लामी जगत के चिकित्सकों तक पहुँचे।
अल-राज़ी, अल-मजूसी, इब्न सीना, अल-ज़हरावी और इब्न ज़ुहर जैसे चिकित्सकों ने गेलेन की शिक्षाओं का अध्ययन किया, किंतु उन्हें बिना आलोचना स्वीकार नहीं किया। अल-राज़ी ने शुकूक अला जालिनूस में गेलेन के कुछ विचारों की आलोचना की। इब्न सीना ने गैलेनिक चिकित्सा को व्यवस्थित रूप में अल-क़ानून फ़ि अल-तिब्ब में प्रस्तुत किया। इब्न अल-नफ़ीस ने फुफ्फुसीय रक्त-संचार की व्याख्या करके गेलेन की रक्त-संचार संबंधी धारणा में महत्त्वपूर्ण संशोधन किया। अरबी-फ़ारसी चिकित्सा परंपरा के माध्यम से गेलेनिक ह्यूमरवाद भारत तक भी पहुँचा और आगे चलकर यूनानी चिकित्सा-पद्धति के विकास का आधार बना।
मध्ययुगीन यूरोप में गैलेनवाद
ग्यारहवीं शताब्दी के बाद अरबी चिकित्सा-ग्रंथों के लैटिन अनुवाद के साथ पश्चिमी यूरोप में गेलेन की प्रतिष्ठा फिर से बढ़ी। सालेर्नो चिकित्सा-शिक्षा का प्रमुख केंद्र बना और बाद में यूरोपीय विश्वविद्यालयों में गेलेन की रचनाएँ चिकित्सा-पाठ्यक्रम का महत्त्वपूर्ण भाग बन गईं। इब्न सीना की कैनन ऑफ मेडिसिन ने भी इस परंपरा को मजबूत किया।
मध्ययुगीन यूरोप में मानव शव-विच्छेदन के प्रमाण मिलने लगे, किंतु गेलेन का प्राधिकार इतना प्रभावशाली था कि प्रत्यक्ष निरीक्षण से प्राप्त तथ्यों की व्याख्या भी कई बार उनके सिद्धांतों के अनुरूप की जाती थी। मोंडिनो डी लिउज़ी ने मानव शवों का विच्छेदन किया, फिर भी उनकी शरीररचना संबंधी व्याख्याओं में गेलेन का प्रभाव स्पष्ट रहा।
पुनर्जागरण और गैलेनवाद की आलोचना
पुनर्जागरण में मूल यूनानी ग्रंथों के अध्ययन और प्रत्यक्ष निरीक्षण की प्रवृत्ति ने गेलेनवाद को नई चुनौती दी। एंड्रियास वेसालियस ने मानव शवों की प्रत्यक्ष चीर-फाड़ के आधार पर गेलेन की अनेक शरीररचना संबंधी धारणाओं की आलोचना की। उनकी कृति ‘डी ह्यूमानी कॉर्पोरिस फाब्रिका’ ने आधुनिक शरीररचना-विज्ञान के विकास में निर्णायक भूमिका निभाई।
वेसालियस ने दिखाया कि गेलेन की कुछ धारणाएँ मानव शरीर के बजाय पशु-विच्छेदन पर आधारित थीं। विशेष रूप से हृदय के दोनों निलयों के बीच सूक्ष्म छिद्र होने की धारणा को उन्होंने चुनौती दी। इससे चिकित्सा-विज्ञान में प्राचीन प्राधिकार की अपेक्षा प्रत्यक्ष निरीक्षण और प्रमाण को अधिक महत्त्व मिलने लगा। फुफ्फुसीय रक्त-संचार की समझ में माइकल सर्वेटस और बाद में विलियम हार्वे के कार्य निर्णायक रहे। हार्वे ने हृदय की पंपिंग क्रिया और रक्त के निरंतर परिसंचरण को स्पष्ट करके गैलेन की पारंपरिक व्यवस्था से निर्णायक दूरी स्थापित की।
गैलेन का महत्त्व
गेलेन की चिकित्सा-पद्धति का प्रभाव बाइजेंटाइन साम्राज्य, इस्लामी जगत और यूरोप में अनेक शताब्दियों तक बना रहा। उनकी शिक्षाओं पर आधारित दीर्घकालीन चिकित्सा-परंपरा को गैलेनवाद कहा जाता है। उन्होंने हिप्पोक्रेटिक चिकित्सा सहित पूर्ववर्ती यूनानी चिकित्सा-परंपराओं को संकलित, व्यवस्थित और पुनर्व्याख्यायित किया। इस कारण उनके ग्रंथ प्राचीन चिकित्सा-ज्ञान के संरक्षण का प्रमुख माध्यम बने। उनकी कुछ धारणाएँ आधुनिक विज्ञान के विकास के साथ गलत सिद्ध हुईं, विशेषकर रक्त-संचार और मानव शरीररचना से संबंधित विचार। फिर भी उनकी ऐतिहासिक महत्ता इससे कम नहीं होती। उन्होंने चिकित्सा को निरीक्षण, अनुभव, प्रयोग, तर्क और दर्शन के साथ जोड़कर एक व्यापक ज्ञान-व्यवस्था का रूप दिया। उनकी रचनाओं का अरबी और लैटिन में अनुवाद, बाइजेंटाइन विद्वानों द्वारा संरक्षण तथा यूरोपीय विश्वविद्यालयों में अध्ययन ने प्राचीन चिकित्सा-ज्ञान को मध्ययुगीन और आरंभिक आधुनिक विश्व तक पहुँचाया। इस दृष्टि से गेलेन केवल प्राचीन चिकित्सा के एक महान चिकित्सक नहीं थे, बल्कि यूनानी, बाइजेंटाइन, इस्लामी और आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान के बीच एक महत्त्वपूर्ण बौद्धिक सेतु भी थे।


