संत पॉल (Saint Paul)

संत पॉल (Saint Paul)
संत पॉल मुख्य लेख : रोमन सभ्यता पॉल, जिनका यहूदी नाम शाऊल था, लगभग 5 […]

संत पॉल

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मुख्य लेख : रोमन सभ्यता

पॉल, जिनका यहूदी नाम शाऊल था, लगभग 5 ईसा पूर्व से 5 ईस्वी के बीच टार्सस में जन्मे माने जाते हैं। उनकी मृत्यु सामान्यतः 64 से 68 ईस्वी के बीच, रोम में मानी जाती है। वे पहली शताब्दी ईस्वी के प्रमुख ईसाई प्रचारकों में से एक थे और प्रारंभिक ईसाई आंदोलन के विस्तार में उनकी अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। विशेष रूप से गैर-यहूदी समुदायों के बीच ईसाई संदेश के प्रसार तथा विभिन्न ईसाई समुदायों के संगठन में उनका योगदान उल्लेखनीय था। उनके नाम से संबद्ध पत्र नए नियम का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं और ईसाई धर्म के धर्मशास्त्रीय विकास पर उनका गहरा प्रभाव पड़ा।

जीवन और कार्यों के प्रमुख स्रोत

पॉल के जीवन और कार्यों के पुनर्निर्माण के लिए मुख्य स्रोत उनके प्रामाणिक पत्र और नए नियम का ग्रंथ ‘प्रेरितों के कार्य’ हैं। पॉल बारह मूल प्रेरितों में शामिल नहीं थे और यीशु के सार्वजनिक जीवनकाल में उनसे प्रत्यक्ष भेंट का कोई निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। फिर भी वे यीशु के समकालीन थे तथा प्रारंभिक ईसाई समुदाय के प्रमुख नेताओं, जैसे पेत्रुस, यूहन्ना और यीशु के भाई याकूब, से परिचित थे। उनके पत्रों से यह स्पष्ट होता है कि उन्हें प्रारंभिक ईसाई परंपराओं और यीशु से संबंधित शिक्षाओं की जानकारी थी।

पॉल के अपने पत्र उनके जीवन और विचारों के सबसे प्रत्यक्ष स्रोत हैं। ये पत्र विभिन्न ईसाई समुदायों और व्यक्तियों को संबोधित किए गए थे तथा इनमें धार्मिक सिद्धांतों, नैतिक प्रश्नों, सामुदायिक विवादों, मिशनरी गतिविधियों और पॉल के व्यक्तिगत अनुभवों का उल्लेख मिलता है। इनमें उनके धर्म-परिवर्तन, प्रचार-कार्य, यात्राओं तथा अन्य ईसाई नेताओं के साथ संबंधों से संबंधित महत्त्वपूर्ण संकेत भी मिलते हैं।

पॉल के पत्र आत्मकथात्मक ग्रंथ नहीं हैं। इनमें उनके धर्म-परिवर्तन से पहले के जीवन, शिक्षा और पारिवारिक पृष्ठभूमि का अपेक्षाकृत सीमित विवरण मिलता है। इसलिए उनके जीवन की पूरी रूपरेखा तैयार करने के लिए इन पत्रों की तुलना अन्य प्राचीन स्रोतों से करना आवश्यक है। आधुनिक विद्वान सामान्यतः सात पत्रों को पॉल की प्रामाणिक रचनाएँ मानते हैं—रोमियों, 1 और 2 कुरिन्थियों, गलातियों, फिलिप्पियों, 1 थिस्सलुनीकियों और फिलेमोन के पत्र।

‘प्रेरितों के कार्य’ में पॉल के जीवन और मिशनरी गतिविधियों का अपेक्षाकृत विस्तृत विवरण मिलता है। इसमें उनकी यात्राओं, उपदेशों, ईसाई समुदायों की स्थापना, धार्मिक विवादों, गिरफ्तारी और रोम की यात्रा का वर्णन है। किंतु यह ग्रंथ पॉल के जीवन का पूर्ण विवरण नहीं देता। विशेष रूप से रोम पहुँचने के बाद उनके जीवन और मृत्यु का कोई स्पष्ट विवरण नहीं मिलता। इसलिए उनकी मृत्यु और शहादत के संबंध में बाद की ईसाई परंपराओं तथा अन्य प्राचीन स्रोतों का सहारा लेना पड़ता है।

‘प्रेरितों के कार्य’ और पॉल के पत्रों में कुछ घटनाओं के क्रम तथा विवरण में अंतर दिखाई देता है। ऐसी स्थिति में आधुनिक इतिहासकार प्रायः पॉल के अपने पत्रों को अधिक प्रत्यक्ष स्रोत मानते हैं, यद्यपि दोनों स्रोतों का तुलनात्मक अध्ययन अधिक संतुलित ऐतिहासिक समझ विकसित करने में सहायक है।

प्रारंभिक ईसाई साहित्य में रोम के क्लेमेंट का ‘प्रथम क्लेमेंट पत्र’, एंटिओक के इग्नेशियस के पत्र तथा पॉलीकार्प का ‘फिलिप्पियों के नाम पत्र’ पॉल की प्रारंभिक स्मृति और प्रभाव के अध्ययन में उपयोगी हैं। बाद के काल में कैसरिया के यूसेबियस की ‘हिस्टोरिया एक्लेसियास्टिका’ में भी पॉल से संबंधित सामग्री मिलती है। चूँकि यूसेबियस पॉल के समकालीन नहीं थे, इसलिए उनकी सामग्री का उपयोग करते समय स्रोतों की कालगत दूरी को ध्यान में रखना आवश्यक है।

पॉल की लोकप्रियता के कारण बाद की शताब्दियों में उनके नाम से अनेक अपोक्रिफ़ल और स्यूडेपिग्राफ़ल रचनाएँ भी तैयार हुईं। इनमें ‘एक्ट्स ऑफ़ पॉल’, ‘एक्ट्स ऑफ़ पॉल एंड थेक्ला’, ‘एक्ट्स ऑफ़ पीटर एंड पॉल’, ‘थर्ड एपिस्टल टू द कोरिंथियन्स’ तथा पॉल और सेनेका के कथित पत्राचार जैसी रचनाएँ उल्लेखनीय हैं। ‘पॉल का रहस्योद्घाटन’ और ‘कॉप्टिक पॉल का रहस्योद्घाटन’ जैसी रचनाएँ भी बाद की धार्मिक परंपराओं को समझने में उपयोगी हैं। किंतु इनका रचना-काल पॉल के जीवन के काफी बाद का है, इसलिए इन्हें उनके जीवन के प्रत्यक्ष ऐतिहासिक स्रोत के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता।

प्रारंभिक जीवन, जन्म और टार्सस

पॉल के जन्म का निश्चित वर्ष ज्ञात नहीं है। उनका जन्म सामान्यतः पहली शताब्दी ईस्वी के प्रारंभिक दशकों में, लगभग 5 ईसा पूर्व से 5 ईस्वी के बीच माना जाता है। उनका जन्म टार्सस में हुआ माना जाता है, जो रोमन प्रांत सिलिसिया का प्रमुख नगर था। यह नगर भूमध्यसागरीय व्यापार, शिक्षा और संस्कृति का महत्त्वपूर्ण केंद्र था। यहाँ यूनानी भाषा और हेलेनिस्टिक संस्कृति का व्यापक प्रभाव था तथा यहूदी धार्मिक परंपराएँ भी विद्यमान थीं। टार्सस के इस बहुसांस्कृतिक वातावरण ने संभवतः पॉल के बौद्धिक विकास और बाद के मिशनरी कार्य को प्रभावित किया। वे ऐसे समाज में बड़े हुए जहाँ यहूदी धार्मिक परंपरा और यूनानी-रोमन सांस्कृतिक वातावरण का निरंतर संपर्क था।

पारिवारिक और धार्मिक पृष्ठभूमि

पॉल ने अपने पत्र में स्वयं को “इस्राएल के वंश का, बिन्यामीन के गोत्र का, इब्रानियों में इब्रानी और व्यवस्था के विषय में फरीसी” बताया है। इससे उनकी यहूदी पहचान और धार्मिक पृष्ठभूमि स्पष्ट होती है। उनके माता-पिता और परिवार के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। ‘प्रेरितों के कार्य’ में उनकी बहन के पुत्र का उल्लेख मिलता है, जिसने यरूशलेम में पॉल के विरुद्ध रचे गए षड्यंत्र की सूचना देकर उनकी सहायता की थी। पॉल को तंबू बनाने अथवा चमड़े से संबंधित कार्य का ज्ञान था। उन्होंने प्रिस्किल्ला और अक्विला के साथ भी इसी व्यवसाय में काम किया। इससे पता चलता है कि वे अपने मिशनरी कार्य के साथ-साथ श्रम करके अपना निर्वाह भी करते थे।

रोमन नागरिकता और शिक्षा

‘प्रेरितों के कार्य’ में पॉल को जन्म से रोमन नागरिक बताया गया है। उनके परिवार को रोमन नागरिकता किस प्रकार प्राप्त हुई, इसका कोई निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। कुछ विद्वानों ने अनुमान लगाया है कि उनके पूर्वजों को किसी रोमन अधिकारी या संरक्षक के माध्यम से नागरिकता मिली होगी। यह भी अनुमान लगाया गया है कि उनके पूर्वज उन यहूदियों में शामिल रहे होंगे जिन्हें रोमन अभियानों के दौरान बंदी बनाया गया और बाद में मुक्त किया गया। किंतु इन अनुमानों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती। इसलिए उनकी नागरिकता की पारिवारिक पृष्ठभूमि को निश्चित तथ्य के बजाय ऐतिहासिक संभावना के रूप में देखना उचित है।

पॉल का रोमन नाम ‘पौलुस’ था। रोमन नागरिकता और नामकरण की परंपरा को देखते हुए संभव है कि पौलुस उनके रोमन नाम का एक घटक रहा हो। उनका यहूदी नाम शाऊल था। उस समय यहूदियों में यहूदी नाम के साथ यूनानी या रोमन नाम का प्रयोग असामान्य नहीं था। इसलिए यह आवश्यक नहीं कि धर्म-परिवर्तन के बाद उन्होंने अपना नाम शाऊल से पौलुस कर लिया हो। संभवतः वे यहूदी समुदाय में शाऊल और यूनानी-रोमन संसार में पौलुस नाम से परिचित थे।

परंपरागत विवरण के अनुसार पॉल ने यरूशलेम में प्रसिद्ध यहूदी शिक्षक गमालियेल के अधीन शिक्षा प्राप्त की थी। ‘प्रेरितों के कार्य’ में उन्हें गमालियेल का शिष्य बताया गया है। आधुनिक विद्वान यह मानते हैं कि पॉल ने यरूशलेम में यहूदी धार्मिक शिक्षा प्राप्त की होगी, लेकिन गमालियेल से उनके संबंध तथा उनकी शिक्षा की वास्तविक प्रकृति के बारे में निश्चित प्रमाण सीमित हैं।

भाषा और सांस्कृतिक परिवेश

पॉल के उपलब्ध पत्र कोइने यूनानी में लिखे गए हैं और उनमें उनकी यूनानी भाषा पर अच्छी पकड़ दिखाई देती है। उनकी पहली भाषा संभवतः अरामी रही होगी, क्योंकि वे यहूदी धार्मिक और अरामी-भाषी परिवेश से जुड़े थे। किंतु उनका अधिकांश मिशनरी कार्य यूनानी भाषी भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में हुआ, इसलिए यूनानी उनके प्रचार और पत्राचार का प्रमुख माध्यम बन गई।

उनके लेखन में यूनानी-रोमन सांस्कृतिक वातावरण के कुछ प्रभाव दिखाई देते हैं। उन्होंने ऐसे शब्दों, रूपकों और तर्क-पद्धतियों का प्रयोग किया जिन्हें यूनानी भाषी श्रोता समझ सकते थे। कुछ विद्वानों ने उनके विचारों में स्टोइक दर्शन से संबंधित भाषिक समानताओं की ओर संकेत किया है, किंतु इन्हें प्रत्यक्ष दार्शनिक प्रभाव के रूप में स्वीकार करने के बजाय व्यापक सांस्कृतिक वातावरण के संदर्भ में समझना अधिक उचित है।

प्रारंभिक ईसाइयों का विरोध

ईसाई समुदाय में प्रवेश से पहले पॉल उसके प्रबल विरोधी थे। अपने पत्रों में उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि उन्होंने ईसाई समुदाय को सताया था। ‘प्रेरितों के कार्य’ में भी उन्हें ईसाइयों को गिरफ्तार कराने और उनके विरुद्ध अभियान चलाने वाले व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

उनका प्रारंभिक विरोध संभवतः यरूशलेम के उन ईसाइयों से जुड़ा था जिन्हें हेलेनिस्ट कहा जाता था। प्रारंभिक ईसाई समुदाय में धार्मिक और सांस्कृतिक मतभेद मौजूद थे। यीशु की भूमिका, मंदिर-व्यवस्था और यहूदी धार्मिक परंपराओं के पालन जैसे प्रश्नों ने इन मतभेदों को प्रभावित किया होगा। हालांकि, पॉल के अपने पत्र उनके उत्पीड़न की प्रकृति का विस्तृत विवरण नहीं देते।

धर्म-परिवर्तन का अनुभव

पॉल के धर्म-परिवर्तन की तिथि सामान्यतः 31 से 36 ईस्वी के बीच मानी जाती है। अपने पत्रों में वे बताते हैं कि परमेश्वर ने उनमें अपने पुत्र को प्रकट किया, ताकि वे गैर-यहूदियों के बीच सुसमाचार का प्रचार करें। 1 कुरिन्थियों में वे पुनरुत्थित यीशु के प्रकट होने की घटनाओं का उल्लेख करते हुए स्वयं को उन अंतिम व्यक्तियों में रखते हैं जिन्हें यीशु दिखाई दिए।

‘प्रेरितों के कार्य’ के अनुसार दमिश्क की यात्रा के दौरान पॉल को स्वर्गारोहित यीशु का दर्शन हुआ। उनके चारों ओर तेज प्रकाश चमका और उन्होंने एक आवाज सुनी—“शाऊल, शाऊल, तू मुझे क्यों सताता है?” इस अनुभव ने उनके धार्मिक जीवन की दिशा बदल दी। ‘प्रेरितों के कार्य’ 9:1–22 के अनुसार घटना के बाद पॉल तीन दिनों तक दृष्टिहीन रहे। उन्हें दमिश्क ले जाया गया, जहाँ उन्होंने भोजन और जल ग्रहण नहीं किया। इसी दौरान हनन्याह (अनानियास) नामक ईसाई को उनके पास जाने का निर्देश मिला। हनन्याह ने उन पर हाथ रखकर प्रार्थना की, जिसके बाद उनकी दृष्टि लौट आई। पॉल ने बपतिस्मा ग्रहण किया और शीघ्र ही यीशु को मसीहा तथा परमेश्वर का पुत्र घोषित करते हुए प्रचार आरंभ कर दिया। इस अनुभव की प्रकृति को लेकर आधुनिक विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ विद्वानों ने इसे प्राचीन यहूदी रहस्यवादी परंपराओं से जोड़ने का प्रयास किया है, जबकि अन्य विद्वानों ने ऐसी व्याख्याओं की सीमाओं की ओर संकेत किया है। इसलिए पॉल के अनुभव को किसी एक पूर्वनिर्धारित धार्मिक ढाँचे में सीमित करना उचित नहीं है।

धर्म-परिवर्तन के बाद प्रारंभिक प्रचार

धर्म-परिवर्तन के तुरंत बाद पॉल ने दमिश्क में प्रचार आरंभ किया। ‘प्रेरितों के कार्य’ के अनुसार वे आराधनालयों में जाकर यीशु को परमेश्वर का पुत्र और मसीहा घोषित करने लगे। उनका परिवर्तन इसलिए विशेष रूप से उल्लेखनीय था क्योंकि वे पहले ईसाइयों के विरोधी के रूप में जाने जाते थे।

पॉल के अनुसार, धर्म-परिवर्तन के बाद उन्होंने तुरंत यरूशलेम जाकर प्रेरितों से संपर्क नहीं किया। गलातियों के पत्र में वे बताते हैं कि वे पहले अरब गए और फिर दमिश्क लौटे। इस यात्रा का उद्देश्य उन्होंने स्पष्ट नहीं किया है; इसे धार्मिक चिंतन या एकांत साधना से जोड़ना केवल अनुमान है।

धर्म-परिवर्तन के लगभग तीन वर्ष बाद पॉल यरूशलेम गए। वहाँ उन्होंने याकूब से मुलाकात की और पेत्रुस के साथ लगभग पंद्रह दिन बिताए। यह यात्रा लगभग 35–36 ईस्वी के आसपास मानी जाती है। पॉल ने स्पष्ट किया कि उनके सुसमाचार का मूल उन्हें किसी मनुष्य से नहीं, बल्कि यीशु मसीह के प्रकाशन से प्राप्त हुआ था।

अंताकिया और मिशनरी विस्तार

पॉल के जीवन का अगला महत्त्वपूर्ण चरण अंताकिया से जुड़ा था। ‘प्रेरितों के कार्य’ के अनुसार, बरनबास पॉल को अंताकिया लेकर आए। उस समय अंताकिया प्रारंभिक ईसाई आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन चुका था। यहाँ यहूदी और गैर-यहूदी दोनों समुदायों के बीच ईसाई संदेश का प्रसार हो रहा था।

अंताकिया के बहुसांस्कृतिक वातावरण ने पॉल के मिशन को व्यापक दिशा दी। यहीं से गैर-यहूदी समुदायों के बीच ईसाई संदेश के प्रसार को विशेष गति मिली और ईसाई आंदोलन का स्वरूप धीरे-धीरे बहुजातीय तथा बहुसांस्कृतिक होता गया। परंपरा के अनुसार, इसी नगर में यीशु के अनुयायियों को पहली बार “ईसाई” कहा गया।

अकाल और यरूशलेम की सहायता

लगभग 45–46 ईस्वी में सम्राट क्लॉडियस के शासनकाल के दौरान यहूदिया सहित पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र के कुछ भागों में अकाल पड़ा। ‘प्रेरितों के कार्य’ के अनुसार, अंताकिया के ईसाई समुदाय ने यरूशलेम के निर्धन विश्वासियों के लिए आर्थिक सहायता एकत्र की और पॉल तथा बरनबास को यह सहायता पहुँचाने का दायित्व सौंपा। यह घटना प्रारंभिक ईसाई समुदायों के बीच सहयोग और आर्थिक संबंधों को दर्शाती है। पॉल के विचार यरूशलेम के कुछ नेताओं से भिन्न होने के बावजूद उन्होंने उस समुदाय से अपने संबंध बनाए रखने को महत्त्वपूर्ण समझा।

पहली मिशनरी यात्रा

पॉल की पहली मिशनरी यात्रा सामान्यतः 46–49 ईस्वी के बीच मानी जाती है। अंताकिया के ईसाई समुदाय ने पॉल और बरनबास को इस अभियान के लिए नियुक्त किया। दोनों साइप्रस गए और वहाँ विभिन्न स्थानों पर ईसाई संदेश का प्रचार किया। साइप्रस में उनका सामना एलुमास या बार-यीशु नामक व्यक्ति से हुआ, जिसे ‘प्रेरितों के कार्य’ में जादूगर और झूठे भविष्यवक्ता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उसके विरोध के बाद पॉल ने उसे फटकारा और ग्रंथ के अनुसार वह कुछ समय के लिए दृष्टिहीन हो गया।

इसके बाद दोनों पम्फिलिया के पर्गा पहुँचे। वहाँ जॉन मार्क उनसे अलग होकर यरूशलेम लौट गए। बाद में इसी घटना को लेकर पॉल और बरनबास के बीच मतभेद उत्पन्न हुआ।

पर्गा से वे पिसिदिया के अंताकिया पहुँचे। वहाँ पॉल ने आराधनालय में उपदेश दिया और इस्राएल के इतिहास, दाऊद की परंपरा तथा यीशु को मसीहा के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान को ईश्वर की योजना का भाग बताया तथा उनके माध्यम से पापों की क्षमा और उद्धार का संदेश दिया। उनके उपदेश से यहूदी तथा “ईश्वर-भय रखने वाले” गैर-यहूदी लोग प्रभावित हुए। अगले सब्त को बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए, जिससे कुछ यहूदी नेताओं में विरोध उत्पन्न हुआ। इसके बाद पॉल और बरनबास ने गैर-यहूदियों की ओर अपने मिशन को अधिक स्पष्ट रूप से केंद्रित किया। इस यात्रा ने पॉल के गैर-यहूदी मिशन को निर्णायक दिशा दी।

यरूशलेम की परिषद

गैर-यहूदी धर्मान्तरितों की संख्या बढ़ने के साथ यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो गया कि क्या गैर-यहूदी ईसाइयों के लिए खतना और यहूदी धार्मिक व्यवस्था का पालन अनिवार्य होना चाहिए। इस विषय पर पॉल तथा यरूशलेम के नेताओं के बीच गंभीर विचार-विमर्श हुआ। पारंपरिक कालक्रम में इस बैठक को लगभग 49 ईस्वी का माना जाता है।

‘प्रेरितों के कार्य’ के 15वें अध्याय में पेत्रुस, याकूब और अन्य नेताओं की भूमिका का वर्णन मिलता है। बैठक का महत्त्वपूर्ण परिणाम यह था कि गैर-यहूदियों के लिए ईसाई समुदाय में प्रवेश हेतु यहूदी धार्मिक व्यवस्था का पूर्ण पालन अनिवार्य नहीं माना गया। इससे गैर-यहूदी मिशन के विस्तार का मार्ग अधिक स्पष्ट हुआ। किंतु ‘प्रेरितों के कार्य’ और पॉल के पत्रों में यरूशलेम की यात्राओं तथा बैठकों के विवरण में कुछ अंतर हैं। इसी कारण आधुनिक विद्वानों में इन घटनाओं की पहचान और क्रम को लेकर मतभेद है।

अंताकिया की घटना

यरूशलेम में बनी सहमति के बाद अंताकिया में पॉल और पेत्रुस के बीच गंभीर मतभेद उत्पन्न हुआ। इसका मुख्य प्रश्न गैर-यहूदी ईसाइयों के साथ सामूहिक भोजन और यहूदी धार्मिक नियमों से संबंधित था। पॉल के अनुसार पेत्रुस प्रारंभ में गैर-यहूदी ईसाइयों के साथ भोजन करते थे, किंतु याकूब की ओर से आए कुछ लोगों के बाद उन्होंने उनसे दूरी बनानी शुरू कर दी। पॉल ने इस व्यवहार का सार्वजनिक रूप से विरोध किया। उनका तर्क था कि यदि कोई यहूदी स्वयं गैर-यहूदी की तरह जीवन व्यतीत करता है, तो उसे गैर-यहूदियों को यहूदी धार्मिक नियमों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए। इस विवाद का अंतिम परिणाम निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। संभव है कि इसके बाद पॉल ने अपने स्वतंत्र मिशनरी कार्य को अधिक महत्त्व दिया हो।

दूसरी मिशनरी यात्रा

दूसरी मिशनरी यात्रा सामान्यतः 49–52 ईस्वी के बीच मानी जाती है। जॉन मार्क को साथ ले जाने के प्रश्न पर पॉल और बरनबास के बीच मतभेद होने के बाद दोनों अलग हो गए। बरनबास जॉन मार्क को लेकर साइप्रस चले गए, जबकि पॉल ने सिलास को अपना साथी बनाया। पॉल और सिलास ने सीरिया और सिलिसिया से होते हुए डर्बे तथा लिस्त्रा की यात्रा की। लिस्त्रा में उनकी मुलाकात तीमुथियुस से हुई, जो एक प्रतिष्ठित ईसाई युवक था। उसकी माता यहूदी और पिता यूनानी थे। पॉल ने उसे अपने मिशनरी दल में शामिल कर लिया।

इसके बाद पॉल ने एशिया माइनर के विभिन्न क्षेत्रों में यात्रा की। ‘प्रेरितों के कार्य’ के अनुसार, एक रात उन्हें एक मकिदुनी व्यक्ति का दर्शन हुआ, जिसने उनसे मकिदुनिया आकर सहायता करने का आग्रह किया। पॉल ने इसे वहाँ ईसाई संदेश के प्रचार का ईश्वरीय आह्वान माना। इसके बाद उनका मिशन यूरोपीय क्षेत्र तक पहुँचा।

फिलिप्पी में प्रचार और कारावास

मकिदुनिया का फिलिप्पी नगर पॉल की दूसरी यात्रा का महत्त्वपूर्ण केंद्र बना। वहाँ उन्होंने एक दासी से कथित भविष्यवाणी करने वाली आत्मा को निकाल दिया। उसके मालिक इस माध्यम से आर्थिक लाभ कमाते थे। इसलिए उन्होंने पॉल और सिलास का विरोध किया और दोनों को नगर के अधिकारियों के सामने ले जाकर दंडित कराया तथा कारागार में डाल दिया।

‘प्रेरितों के कार्य’ के अनुसार, रात में भूकंप आया, जिससे कारागार के द्वार खुल गए और कैदियों के बंधन टूट गए। पॉल और सिलास वहाँ से भागे नहीं। इस घटना से कारागार का अधिकारी प्रभावित हुआ और उसने ईसाई संदेश स्वीकार किया। फिलिप्पी का ईसाई समुदाय बाद में पॉल के महत्त्वपूर्ण समर्थक समुदायों में शामिल हुआ।

बेरिया और एथेंस

फिलिप्पी से पॉल बेरिया पहुँचे। वहाँ उन्होंने यहूदी समुदाय के बीच प्रचार किया। इसके बाद वे एथेंस पहुँचे, जहाँ उन्होंने यहूदियों और ईश्वर-भय रखने वाले यूनानियों से संवाद किया तथा सार्वजनिक स्थानों पर भी अपने विचार प्रस्तुत किए। एथेंस में उनका प्रसिद्ध भाषण ‘एरियोपागस’ से संबंधित है। उन्होंने यूनानी श्रोताओं के सामने ईश्वर, सृष्टि, मानवता और यीशु के पुनरुत्थान से संबंधित विचार ऐसे तर्कों के माध्यम से प्रस्तुत किए जिन्हें यूनानी बौद्धिक वातावरण में समझा जा सके। इसके बाद वे कोरिंथ पहुँचे।

कोरिंथ में प्रवास

लगभग 50–51 ईस्वी में पॉल कोरिंथ पहुँचे और वहाँ लगभग डेढ़ वर्ष रहे। ‘प्रेरितों के कार्य’ में रोमन प्रांत अखैया के प्रोकौंसुल गैलियो का उल्लेख मिलता है। गैलियो से संबंधित अभिलेखीय प्रमाण पॉल के कोरिंथ प्रवास के काल-निर्धारण में उपयोगी माने जाते हैं। कोरिंथ में उनकी भेंट प्रिस्किल्ला और अक्विला से हुई। वे भी तंबू बनाने के व्यवसाय से जुड़े थे और पॉल के साथ काम करते थे। बाद में वे पॉल के सहयोगियों में शामिल हुए और इफिसुस में ईसाई समुदाय के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लगभग 52 ईस्वी में कोरिंथ से प्रस्थान करते समय पॉल केंख्रेया गए। इसके बाद वे प्रिस्किल्ला और अक्विला के साथ इफिसुस पहुँचे और वहाँ से कैसरिया तथा अंताकिया की ओर गए।

तीसरी मिशनरी यात्रा

पॉल की तीसरी मिशनरी यात्रा सामान्यतः 53–57 ईस्वी के बीच मानी जाती है। उन्होंने पहले गलातिया और फ्रिगिया के क्षेत्रों का दौरा किया तथा वहाँ के विश्वासियों को सुदृढ़ किया। इसके बाद वे इफिसुस पहुँचे, जो पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र का प्रमुख व्यापारिक, धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र था।

पॉल ने इफिसुस में लगभग दो से तीन वर्ष बिताए। यहाँ उन्होंने व्यापक स्तर पर ईसाई संदेश का प्रचार किया और आसपास के क्षेत्रों में भी अपना प्रभाव बढ़ाया। ‘प्रेरितों के कार्य’ में उनके प्रचार से संबंधित उपचार और चमत्कारिक घटनाओं का उल्लेख मिलता है।

इफिसुस में उनके प्रचार से स्थानीय धार्मिक और आर्थिक हित प्रभावित हुए। विशेष रूप से देवी आर्टेमिस के मंदिर से जुड़े कारीगरों और व्यापारियों में असंतोष उत्पन्न हुआ। देमेत्रियुस नामक सुनार ने पॉल के प्रचार से अपने व्यवसाय और आर्टेमिस की प्रतिष्ठा पर पड़ने वाले प्रभाव का विरोध किया। उसके उकसावे पर नगर में बड़ा उपद्रव हुआ और इसके बाद पॉल को इफिसुस छोड़ना पड़ा।

मकिदुनिया और यूनान की यात्रा

इफिसुस से निकलने के बाद पॉल ने मकिदुनिया होते हुए अखैया की यात्रा की। लगभग 56–57 ईस्वी में उन्होंने संभवतः कोरिंथ में लगभग तीन महीने बिताए। इसी अवधि में सामान्यतः रोमियों के नाम पत्र की रचना मानी जाती है। इसमें विश्वास, उद्धार, यहूदी व्यवस्था और गैर-यहूदियों के लिए ईसाई संदेश जैसे विषयों पर उनके विचार व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत हुए हैं।

पॉल ने रोम के ईसाई समुदाय को अपने भावी मिशन और स्पेन की संभावित यात्रा के संदर्भ में भी संबोधित किया। इसके बाद वे यरूशलेम लौटने के लिए विभिन्न नगरों से होते हुए आगे बढ़े। इस यात्रा का उद्देश्य मिशनरी कार्य के साथ-साथ विभिन्न ईसाई समुदायों के बीच संपर्क बनाए रखना और यरूशलेम के मूल ईसाई समुदाय के साथ संबंध सुदृढ़ करना भी था।

यरूशलेम की अंतिम यात्रा

पॉल की अंतिम महत्त्वपूर्ण यरूशलेम यात्रा लगभग 57 ईस्वी में हुई मानी जाती है। इसका प्रमुख उद्देश्य गैर-यहूदी ईसाई समुदायों द्वारा एकत्र की गई आर्थिक सहायता को यरूशलेम के निर्धन ईसाइयों तक पहुँचाना था। यह सहायता केवल आर्थिक सहयोग नहीं थी, बल्कि विभिन्न ईसाई समुदायों के बीच एकता और पारस्परिक उत्तरदायित्व का प्रतीक भी थी। यरूशलेम पहुँचने पर पॉल ने याकूब और अन्य वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की। नेताओं ने उन्हें सावधान किया कि अनेक यहूदियों में यह धारणा फैल चुकी है कि पॉल गैर-यहूदियों के बीच रहने वाले यहूदियों को मूसा की व्यवस्था छोड़ने के लिए प्रेरित करते हैं।

इस धारणा को दूर करने के लिए पॉल ने एक धार्मिक शुद्धि की रस्म में भाग लिया। इससे स्पष्ट होता है कि वे गैर-यहूदियों के लिए खतना और यहूदी धार्मिक व्यवस्था को अनिवार्य नहीं मानते थे, किंतु स्वयं अपनी यहूदी पहचान और परंपरा से पूरी तरह अलग भी नहीं हुए थे।

मंदिर में विवाद और गिरफ्तारी

शुद्धि की रस्म के दौरान एशिया प्रांत से आए कुछ यहूदियों ने पॉल को मंदिर में देखा। उन्होंने आरोप लगाया कि पॉल ने गैर-यहूदियों को मंदिर के पवित्र क्षेत्र में प्रवेश कराया है। इसके बाद भीड़ एकत्र हो गई और पॉल पर हमला करने लगी। रोमन सैन्य अधिकारी ने सैनिकों के साथ पहुँचकर पॉल को भीड़ से बचाया। उन्हें जंजीरों में बाँधकर बैरक ले जाया गया। पॉल ने भीड़ को संबोधित करने की अनुमति माँगी और अपने यहूदी पालन-पोषण तथा ईसाई विश्वास अपनाने की घटना का वर्णन किया। जब उन्होंने गैर-यहूदियों के बीच अपने मिशन का उल्लेख किया, तो भीड़ का आक्रोश फिर भड़क उठा। पूछताछ के दौरान रोमन अधिकारियों ने उन्हें कोड़े मारने की तैयारी की, लेकिन पॉल ने अपनी रोमन नागरिकता का उल्लेख किया। रोमन नागरिक को बिना विधिक प्रक्रिया के कोड़े मारना गंभीर कानूनी उल्लंघन था। इसलिए अधिकारियों ने दंड देने की प्रक्रिया रोक दी।

यहूदी परिषद के सामने पॉल

अगले दिन रोमन अधिकारी ने पॉल को मुख्य याजकों और यहूदी परिषद के सामने प्रस्तुत किया। पॉल ने स्वयं को फरीसी परंपरा से संबंधित बताते हुए मृतकों के पुनरुत्थान की आशा को विवाद का केंद्र बना दिया। इसके बाद परिषद में फरीसियों और सदूकियों के बीच मतभेद उत्पन्न हो गया। फरीसी पुनरुत्थान और स्वर्गदूतों जैसी मान्यताओं को स्वीकार करते थे, जबकि सदूकी इन्हें अस्वीकार करते थे। विवाद बढ़ने पर रोमन अधिकारियों ने पॉल को सुरक्षित बैरक में पहुँचा दिया।

पॉल की हत्या की साजिश

इसके बाद लगभग चालीस लोगों ने पॉल की हत्या की साजिश रची। पॉल के भांजे को इस षड्यंत्र की जानकारी मिली और उसने बैरक में जाकर उन्हें इसकी सूचना दी। पॉल ने उसे रोमन सैन्य अधिकारी के पास भेजा। अधिकारी ने साजिश की गंभीरता समझकर उनकी सुरक्षा की व्यवस्था की। रात में पॉल को कैसरिया भेजने का निर्णय लिया गया। उनकी सुरक्षा के लिए बड़ी संख्या में पैदल सैनिक और घुड़सवार नियुक्त किए गए। उन्हें रोमन प्रांत यहूदिया के राज्यपाल फेलिक्स के पास भेजा गया। इस प्रकार यरूशलेम का धार्मिक विवाद रोमन प्रशासन की न्यायिक प्रक्रिया का विषय बन गया।

कैसरिया में कारावास

कैसरिया पहुँचने के बाद पॉल को राज्यपाल मार्कस एंटोनियस फेलिक्स के अधीन रखा गया। कुछ दिनों बाद मुख्य याजक हनन्याह, कुछ बुजुर्ग और उनके वकील टर्टुलस वहाँ पहुँचे और पॉल के विरुद्ध आरोप लगाए। पॉल ने अपने पक्ष में बोलते हुए इन आरोपों का खंडन किया और अपने धार्मिक विश्वास की व्याख्या की। फेलिक्स ने तत्काल निर्णय नहीं दिया और पॉल को हिरासत में रखने का आदेश दिया। उन्हें कुछ सुविधाएँ प्राप्त थीं और उनके मित्रों को उनसे मिलने की अनुमति थी। ‘प्रेरितों के कार्य’ के अनुसार वे लगभग दो वर्ष तक फेलिक्स के शासनकाल में कैद रहे।

फेलिक्स के बाद पोर्सियस फेस्टस यहूदिया का राज्यपाल बना। यहूदी नेताओं ने पॉल को यरूशलेम ले जाकर मुकदमा चलाने का अनुरोध किया। पॉल को आशंका थी कि वहाँ उनके विरुद्ध षड्यंत्र किया जा सकता है। इसलिए उन्होंने अपने रोमन नागरिक होने के अधिकार का प्रयोग करते हुए “सीज़र के सामने अपील” की। फेस्टस ने उनकी अपील स्वीकार कर ली और उन्हें रोम भेजने का निर्णय हुआ।

रोम की यात्रा और माल्टा में जहाज़ दुर्घटना

पॉल को समुद्री मार्ग से रोम भेजा गया। ‘प्रेरितों के कार्य’ के अनुसार, भूमध्यसागर में जहाज़ को भीषण तूफान का सामना करना पड़ा। कई दिनों तक समुद्र में भटकने के बाद जहाज़ मेलिटा नामक द्वीप के निकट दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसे सामान्यतः वर्तमान माल्टा से पहचाना जाता है। जहाज़ नष्ट हो गया, किंतु सभी यात्री सुरक्षित तट तक पहुँच गए। द्वीप के निवासियों ने यात्रियों की सहायता की। आग जलाते समय पॉल के हाथ से एक विषैला साँप लिपट गया। उन्होंने उसे झटककर आग में गिरा दिया और उन्हें कोई हानि नहीं हुई। इससे स्थानीय लोगों की उनके प्रति धारणा बदल गई।

माल्टा में पॉल की भेंट द्वीप के प्रमुख अधिकारी पब्लियस से हुई। ‘प्रेरितों के कार्य’ के अनुसार पॉल ने उसके बीमार पिता के लिए प्रार्थना की, जिसके बाद वे स्वस्थ हुए। इसके बाद अन्य बीमार लोग भी उनके पास आए। कुछ समय माल्टा में रहने के बाद पॉल और उनके साथी सिराक्यूज़, रेजियम और पुटियोली होते हुए रोम पहुँचे।

रोम में गृह-नज़रबंदी

परंपरागत कालक्रम के अनुसार पॉल लगभग 60 ईस्वी में रोम पहुँचे। उन्हें सामान्य कारागार में रखने के बजाय एक सैनिक की निगरानी में किराए के घर में रहने की अनुमति दी गई। वे लगभग दो वर्ष तक गृह-नज़रबंदी में रहे और लोगों से मिलने तथा ईसाई संदेश का प्रचार करने में सक्षम थे। ‘प्रेरितों के कार्य’ का अंतिम अध्याय इसी अवस्था पर समाप्त होता है। पॉल अपने निवास पर आने वाले लोगों को ईश्वर के राज्य और यीशु मसीह के संबंध में शिक्षा देते तथा निर्भीकता से सुसमाचार का प्रचार करते थे। इसके बाद उनके जीवन की घटनाओं का विवरण इस ग्रंथ में नहीं मिलता है।

स्पेन की संभावित यात्रा

पॉल के रोम के बाद के जीवन के संबंध में स्रोत सीमित हैं। कुछ प्रारंभिक ईसाई स्रोतों से संकेत मिलता है कि वे रोम से आगे पश्चिम की ओर गए और संभवतः स्पेन पहुँचे। रोम के क्लेमेंट ने उल्लेख किया कि पॉल ने पूर्व से पश्चिम तक प्रचार किया और पश्चिम के सुदूर छोर तक पहुँचे। कुछ विद्वान इसे स्पेन की यात्रा का संकेत मानते हैं, जबकि अन्य इसे केवल पश्चिमी भूमध्यसागरीय क्षेत्र का सामान्य उल्लेख मानते हैं।

पॉल ने रोमियों के नाम पत्र में स्पेन जाने की अपनी इच्छा व्यक्त की थी। बाद के ईसाई लेखकों ने भी उनकी स्पेन-यात्रा की परंपरा को अधिक स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया। किंतु उनके वास्तव में स्पेन पहुँचने का प्रत्यक्ष समकालीन प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे ऐतिहासिक संभावना के रूप में देखना अधिक उचित है।

पॉल की मृत्यु

पॉल की मृत्यु की निश्चित तिथि और परिस्थितियाँ पूरी तरह ज्ञात नहीं हैं। सामान्यतः इतिहासकार मानते हैं कि उनकी मृत्यु 64 ईस्वी में रोम की आग के बाद और 68 ईस्वी में नीरो की मृत्यु से पहले हुई। प्रारंभिक ईसाई परंपरा उनकी शहादत को नीरो के शासनकाल में ईसाइयों पर हुए दमन से जोड़ती है। ‘प्रेरितों के कार्य’ पॉल की मृत्यु का विवरण नहीं देता। इसके विपरीत, स्तेफनुस और याकूब जैसे अन्य प्रारंभिक ईसाई नेताओं की मृत्यु का उल्लेख मिलता है। इसलिए ग्रंथ का रोम में पॉल के प्रचार के साथ समाप्त होना संभवतः उसके साहित्यिक उद्देश्य से संबंधित है।

पॉल की मृत्यु के संबंध में नए नियम से बाहर के प्रारंभिक ईसाई स्रोत अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। रोम के क्लेमेंट ने पॉल के कष्टों, उत्पीड़न और शासकों के सामने उनकी गवाही का उल्लेख किया है। बाद में इग्नेशियस और टर्टुलियन ने भी पॉल को शहीद के रूप में स्मरण किया। चौथी शताब्दी के यूसेबियस ने पूर्ववर्ती ईसाई परंपराओं के आधार पर पॉल की मृत्यु को नीरो के शासनकाल से जोड़ा।

शहादत की परंपरा

बाद की ईसाई परंपरा के अनुसार पॉल को रोम में सिर काटकर मृत्युदंड दिया गया। पेत्रुस को जहाँ सूली पर चढ़ाए जाने की परंपरा है, वहीं पॉल के रोमन नागरिक होने के कारण उनके लिए सिर काटना अपेक्षाकृत विशिष्ट दंड माना गया। जेरोम ने परंपराओं के आधार पर लिखा कि पॉल रोम में लगभग दो वर्ष गृह-नज़रबंदी में रहे और संभवतः कुछ समय के लिए मुक्त होकर पश्चिमी क्षेत्रों में प्रचार करने गए। बाद में उन्हें पुनः गिरफ्तार किया गया और रोम में मृत्युदंड दिया गया। उनके अनुसार पॉल को ओस्तियन मार्ग के निकट दफनाया गया।

मध्यकालीन परंपरा ने उनके मृत्युदंड के स्थान को रोम के दक्षिण में स्थित एक्वे साल्वीए से जोड़ा। एक लोकप्रिय कथा के अनुसार सिर काटे जाने के बाद उनका सिर तीन बार भूमि से टकराया और प्रत्येक स्थान पर जलस्रोत फूट पड़ा। इसी परंपरा से वहाँ स्थित धार्मिक स्थल “सैन पाओलो एले त्रे फोंताने” अर्थात् “तीन फव्वारों वाला संत पॉल” नाम से प्रसिद्ध हुआ।

पॉल के दफन और अवशेष

प्राचीन ईसाई परंपरा के अनुसार पॉल को रोम की नगर-दीवारों के बाहर विया ओस्तिएन्सिस के दूसरे मील के निकट ल्यूसिना नामक ईसाई महिला की भूमि पर दफनाया गया था। दूसरी शताब्दी के उत्तरार्ध में ईसाई लेखक कायस ने रोम में पेत्रुस और पॉल से संबंधित स्मारक-स्थलों का उल्लेख किया। इससे संकेत मिलता है कि उस समय तक दोनों प्रेरितों की स्मृति से जुड़े धार्मिक स्थल स्थापित हो चुके थे।

चौथी शताब्दी में सम्राट कॉन्स्टेंटाइन महान ने पॉल की पारंपरिक कब्र के स्थान पर एक प्रारंभिक चर्च का निर्माण कराया। बाद में वैलेन्टिनियन प्रथम, वैलेन्टिनियन द्वितीय, थियोडोसियस प्रथम और आर्केडियस के शासनकाल में इसका विस्तार और पुनर्निर्माण हुआ। इसी स्थापत्य परंपरा का वर्तमान स्वरूप ‘सेंट पॉल आउटसाइड द वॉल्स बेसिलिका’ है, जो रोम के प्रमुख ईसाई तीर्थस्थलों में से एक है।

पॉल की कब्र की पुरातात्त्विक खोज

सेंट पॉल आउटसाइड द वॉल्स बेसिलिका के निकट 2002 ईस्वी से आरंभ हुई पुरातात्त्विक खुदाई में लगभग 2.4 मीटर लंबा संगमरमर का एक ताबूत मिला। उस पर ‘पाउलो अपोस्तोली मार्त’ जैसा अभिलेख पाया गया, जिसका अर्थ सामान्यतः “पॉल प्रेरित, शहीद” माना जाता है। 2006 ईस्वी में खुदाई पूरी होने के बाद वेटिकन के पुरातत्त्वविदों ने इसे पॉल की पारंपरिक कब्र से संबंधित माना। ताबूत वेदी के नीचे स्थित था। उसे बाहर निकालने के बजाय उसके समीप एक निरीक्षण-खिड़की बनाई गई, जिससे भीतर स्थित अवशेषों का अध्ययन किया जा सके।

2009 ईस्वी में पोप बेनेडिक्ट सोलहवें ने घोषणा की कि ताबूत से प्राप्त अस्थि-खंडों की रेडियोकार्बन जाँच में उनका काल पहली या दूसरी शताब्दी ईस्वी के बीच निर्धारित हुआ। इनके साथ बैंगनी रंग के लिनन, सोने के अंश, धूप और लिनन के रेशों से संबंधित सामग्री भी पाई गई। यद्यपि ये निष्कर्ष पॉल की पारंपरिक कब्र के समर्थन में महत्त्वपूर्ण माने गए, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से इनके आधार पर यह निश्चित रूप से सिद्ध नहीं किया जा सकता कि अस्थियाँ स्वयं पॉल की ही हैं। रेडियोकार्बन परीक्षण अवशेषों की आयु निर्धारित कर सकता है, व्यक्ति की पहचान नहीं। इसलिए इन साक्ष्यों का महत्त्व मुख्यतः उस प्राचीन परंपरा के संदर्भ में है जो पॉल के दफन को इसी स्थान से जोड़ती रही है।

पॉल का प्राचीनतम चित्र

रोम के सेंट थेक्ला कैटाकॉम्ब से पॉल की स्मृति से संबंधित एक प्राचीन चित्र प्राप्त हुआ। वेटिकन के शोधकर्ताओं ने इसे चौथी शताब्दी के प्रारंभिक काल का माना है। इसे पॉल का सबसे प्राचीन ज्ञात चित्रण माना जाता है। इस चित्र में पॉल को पेत्रुस, यूहन्ना और एंड्रयू जैसे अन्य प्रमुख प्रेरितों के साथ प्रदर्शित किया गया है। यह प्रमाण दर्शाता है कि चौथी शताब्दी तक रोम के ईसाई समाज में पॉल की धार्मिक प्रतिष्ठा अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो चुकी थी।

चर्च की परंपरा और पॉल की स्मृति

प्रारंभिक ईसाई लेखकों ने पॉल को एक महान धर्मप्रचारक, शिक्षक और शहीद के रूप में स्मरण किया। रोम के क्लेमेंट ने उनके धैर्य, कष्ट-सहन और व्यापक धर्म-प्रचार का उल्लेख किया। उनके अनुसार पॉल ने पूर्व से पश्चिम तक ईसाई संदेश का प्रचार किया और अनेक कष्ट सहने के बाद अपने विश्वास की गवाही दी।

बाद की ईसाई परंपरा में पॉल की शहादत, दफन-स्थल और अवशेषों से संबंधित अनेक कथाएँ विकसित हुईं। इनमें कुछ का धार्मिक महत्त्व अत्यधिक है, किंतु उनकी स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि कठिन है। इसलिए ऐतिहासिक अध्ययन में इन्हें धार्मिक परंपरा के रूप में देखा जाता है। पॉल की खोपड़ी के संबंध में भी मध्यकालीन परंपराओं में विभिन्न दावे मिलते हैं। एक परंपरा के अनुसार उनकी खोपड़ी पेत्रुस की खोपड़ी के साथ रोम के सेंट जॉन लैटरन में सुरक्षित रखी गई थी। इन दावों का स्वतंत्र ऐतिहासिक सत्यापन कठिन है।

पॉल का धर्म-परिवर्तन और पर्व

पॉल के धर्म-परिवर्तन की स्मृति में 25 जनवरी को पर्व मनाया जाता है। रोमन कैथोलिक परंपरा में इसे पॉल के धर्म-परिवर्तन का पर्व कहा जाता है। यह उनके जीवन में हुए उस निर्णायक परिवर्तन की स्मृति है, जब प्रारंभिक ईसाइयों के विरोधी व्यक्ति ने स्वयं को यीशु के संदेश के प्रचारक के रूप में समर्पित कर दिया। 29 जून को पेत्रुस और पॉल का संयुक्त पर्व मनाया जाता है। यह उत्सव दोनों प्रेरितों की शहादत तथा रोम के ईसाई समुदाय में उनके विशेष महत्त्व की स्मृति से जुड़ा है।

पूर्वी रूढ़िवादी परंपरा में भी पॉल को विभिन्न पर्वों और स्मरण-दिवसों के माध्यम से सम्मान दिया जाता है। 29 जून को पेत्रुस और पॉल का प्रमुख पर्व तथा 30 जून को बारह प्रेरितों का सामूहिक स्मरण किया जाता है। अन्य ईसाई परंपराओं, जैसे चर्च ऑफ़ इंग्लैंड और विभिन्न लूथरन परंपराओं में भी 25 और 29 जून से संबंधित स्मरण-दिवस महत्त्वपूर्ण हैं।

ईसाई धर्म पर पॉल का प्रभाव

पॉल की शिक्षाओं का ईसाई धर्म के विकास पर गहरा प्रभाव पड़ा। रोमन कैथोलिक, पूर्वी कैथोलिक, पूर्वी रूढ़िवादी और विभिन्न प्रोटेस्टेंट परंपराओं के धर्मशास्त्र में उनके विचारों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। विशेष रूप से विश्वास, उद्धार, ईसाई स्वतंत्रता, यहूदी धार्मिक व्यवस्था और गैर-यहूदियों के धार्मिक समावेशन से संबंधित उनके विचार अत्यंत प्रभावशाली रहे।

प्रोटेस्टेंट परंपराओं में पॉल के लेखन को इस विचार से जोड़ा गया कि मनुष्य की मुक्ति केवल यहूदी धार्मिक व्यवस्था के पालन से नहीं, बल्कि विश्वास के माध्यम से प्राप्त होती है। दूसरी ओर, कुछ विद्वानों ने तर्क दिया है कि पॉल ने प्रारंभिक ईसाई आंदोलन को उसके यहूदी संदर्भ से दूर कर दिया और यूनानी-हेलेनिस्टिक प्रभावों को बढ़ाया।

आधुनिक शोध में पॉल को केवल यहूदी धर्म से अलग हुए ईसाई चिंतक के रूप में देखने की प्रवृत्ति कम हुई है। इसके स्थान पर उन्हें एक ऐसे यहूदी चिंतक के रूप में समझने का प्रयास किया जा रहा है, जिसने यीशु के संदेश की व्याख्या यहूदी धार्मिक परंपरा के भीतर रहते हुए नए ढंग से की। “पॉल विदिन जुडाइज़्म” जैसी आधुनिक विद्वत् प्रवृत्तियाँ इसी दृष्टिकोण को रेखांकित करती हैं।

इस प्रकार पॉल का ऐतिहासिक महत्त्व केवल एक धर्मप्रचारक के रूप में सीमित नहीं है। उनके पत्र प्रारंभिक ईसाई समुदायों के विश्वास, विवादों, नैतिक प्रश्नों और संगठनात्मक समस्याओं की प्रत्यक्ष जानकारी देते हैं। उनकी मिशनरी गतिविधियों ने ईसाई आंदोलन को यहूदी समुदाय की सीमाओं से बाहर निकालकर व्यापक भूमध्यसागरीय संसार तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जबकि उनकी शहादत और बाद की धार्मिक परंपराओं ने उन्हें ईसाई स्मृति में एक प्रमुख प्रेरित और शहीद के रूप में स्थापित किया।

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