संत पीटर (Saint Peter)

संत पीटर (Saint Peter)
संत पीटर मुख्य लेख: रोमन सभ्यता संत पीटर, जिनका जन्मनाम साइमन बार-योना था, पहली शताब्दी […]

संत पीटर

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मुख्य लेख: रोमन सभ्यता

संत पीटर, जिनका जन्मनाम साइमन बार-योना था, पहली शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ में जन्मे माने जाते हैं। उन्हें साइमन पीटर, सेफ़ास और प्रेरित पीटर के नाम से भी जाना जाता है। वे यीशु मसीह के बारह प्रमुख शिष्यों में से एक तथा प्रारंभिक ईसाई समुदाय के प्रमुख नेताओं में थे। नए नियम के चारों सुसमाचारों और प्रेरितों के कार्य में उनका प्रमुखता से उल्लेख मिलता है। वे एंड्रयू के भाई थे और दोनों गलील सागर के आसपास मछली पकड़ने का व्यवसाय करते थे। ईसाई परंपरा के अनुसार यीशु ने उन्हें अपने अनुयायियों के बीच विशेष दायित्व सौंपा था। यीशु की मृत्यु के बाद पीटर ने यरूशलम के प्रारंभिक ईसाई समुदाय के संगठन, नेतृत्व और धार्मिक प्रचार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। पॉल के पत्रों में भी उनका उल्लेख पीटर और सेफ़ास, दोनों नामों से हुआ है। परंपरागत मत के अनुसार मरकुस का सुसमाचार पीटर के उपदेशों और उनके प्रत्यक्ष अनुभवों से प्रभावित था।

पीटर का एंटिओक के प्रारंभिक ईसाई समुदाय से भी संबंध जोड़ा जाता है। कैथोलिक परंपरा में उन्हें रोम के प्रथम बिशप तथा चर्च के प्रथम प्रमुख के रूप में सम्मान दिया जाता है, जबकि पूर्वी रूढ़िवादी परंपरा में भी उन्हें प्रमुख प्रेरित के रूप में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। नए नियम में पीटर को स्पष्ट रूप से रोम का प्रथम बिशप नहीं कहा गया है और न ही उनकी रोम यात्रा का विस्तृत विवरण मिलता है। फिर भी दूसरी से चौथी शताब्दी के अनेक प्रारंभिक ईसाई लेखकों- इरेनियस, टर्टुलियन, हेगेसिपस, क्लेमेंट ऑफ अलेक्जेंड्रिया, लैक्टेंटियस और यूसेबियस ने पीटर के रोम से संबंध का उल्लेख किया है। परंपरा में पॉल के साथ रोम के चर्च की स्थापना से भी उनका संबंध जोड़ा जाता है तथा लिनस को उनका उत्तराधिकारी माना जाता है।

नए नियम में ‘पहला पतरस’ और ‘दूसरा पतरस’ नामक दो पत्र शामिल हैं। पारंपरिक ईसाई मत इन्हें पीटर की रचनाएँ मानता है, किंतु आधुनिक विद्वानों में इनके वास्तविक लेखक को लेकर मतभेद है। इनके अतिरिक्त ‘पीटर के कार्य’, ‘पीटर का सुसमाचार’, ‘पीटर का उपदेश’ और ‘पीटर का रहस्योद्घाटन’ जैसी कई अप्रामाणिक रचनाएँ भी उनके नाम से जुड़ी हैं, जिन्हें विद्वान सामान्यतः बाद की छद्मनामिक रचनाएँ मानते हैं। ईसाई परंपरा के अनुसार पीटर की मृत्यु रोम में सम्राट नीरो के शासनकाल के दौरान, क्रूस पर चढ़ाकर हुई। उनकी शहादत का स्थान परंपरागत रूप से वेटिकन पहाड़ी से जोड़ा जाता है।

मूल नाम और नाम-परंपरा

न्यू टेस्टामेंट में पीटर का मूल नाम साइमन (यूनानी: सिमोन, कहीं-कहीं सिमेओन) बताया गया है। इन नाम-रूपों की विविधता उस समय की यहूदी नामकरण-परंपरा तथा हिब्रू, अरामी और यूनानी भाषाओं के परस्पर प्रभाव से संबंधित है।

ईसाई परंपरा के अनुसार यीशु ने साइमन को सेफ़ास नाम दिया, जो अरामी शब्द केफ़ा से संबंधित है। न्यू टेस्टामेंट के यूनानी पाठ में अधिकांश स्थानों पर उन्हें पेट्रोस कहा गया है, जो यूनानी शब्द पेत्रा से संबंधित है। दोनों का अर्थ ‘पत्थर’ या ‘चट्टान’ है। केफ़ा के सटीक अर्थ को लेकर विद्वानों में मतभेद है, कुछ इसे ‘चट्टान’ या ‘बड़ी चट्टान’, जबकि अन्य ‘पत्थर’ मानते हैं; इसे ‘कीमती पत्थर’ से जोड़ने की व्याख्या भी मिलती है, पर उसके पर्याप्त भाषाई प्रमाण नहीं हैं। सामान्यतः केफ़ा को दृढ़ता, स्थिरता और मजबूती के अर्थ से जोड़ा जाता है। साइमन, सेफ़ास और पेट्रोस  तीनों नाम एक ही व्यक्ति से संबंधित हैं और इनकी विविधता उस समय के यहूदी, अरामी तथा यूनानी भाषाई-सांस्कृतिक संपर्क का सूचक है।

पीटर के जीवन के प्रमुख स्रोत
जन्म और पारिवारिक जीवन

न्यू टेस्टामेंट के अनुसार पीटर मूलतः एक यहूदी मछुआरे थे और गलील क्षेत्र के बेथसैदा से संबंधित थे। उनके पिता का नाम योना बताया गया है (कुछ परंपराओं में जॉन)। उनके भाई एंड्रयू भी मछुआरे थे और आगे चलकर यीशु के प्रमुख शिष्यों में शामिल हुए। पीटर विवाहित थे- सुसमाचारों में उनकी सास का उल्लेख मिलता है, और पहला कुरिंथियों का पत्र भी संकेत करता है कि कुछ प्रेरित अपनी पत्नियों को साथ रखते थे। तीनों सिनॉप्टिक सुसमाचारों में उल्लेख है कि कफ़रनहूम में पीटर की सास बीमार थीं और यीशु ने उन्हें स्वस्थ किया। उनकी पत्नी का नाम, पारिवारिक पृष्ठभूमि और वैवाहिक जीवन का विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है। अलेक्जेंड्रिया के क्लेमेंट ने बाद की परंपरा में उल्लेख किया कि पीटर की पत्नी भी ईसाई विश्वास से जुड़ी थीं और उनके विश्वास के कारण उन्हें मृत्यु का सामना करना पड़ा, किंतु इस विवरण की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती।

मछुआरे से यीशु के शिष्य तक

सिनॉप्टिक सुसमाचारों के अनुसार साइमन अपने भाई एंड्रयू तथा ज़ेबेदी के पुत्र जेम्स और जॉन के साथ मछली पकड़ने का कार्य करते थे। यीशु ने उन्हें गलील की झील के आसपास मछली पकड़ते हुए देखा और अपने अनुयायी बनने के लिए बुलाया, यह कहते हुए कि वे अब ‘मनुष्यों को एकत्र करने वाले’ बनेंगे। लूका के सुसमाचार में इस घटना का अधिक विस्तृत वर्णन मिलता है: यीशु ने पीटर की नाव से उपदेश दिया, फिर जाल डालने को कहा, जिससे बड़ी संख्या में मछलियाँ पकड़ीं। इसके बाद साइमन, जेम्स और जॉन यीशु के अनुयायी बन गए।

यूहन्ना के सुसमाचार में एक अलग परंपरा मिलती है, जिसके अनुसार एंड्रयू ने यीशु को ‘परमेश्वर का मेमना’ कहते सुना और अपने भाई साइमन को उनके पास लाए। यीशु ने साइमन को देखकर उन्हें ‘केफ़ास’ (यूनानी: ‘पेट्रोस’) नाम दिया। यही नाम आगे चलकर पीटर के रूप में प्रसिद्ध हुआ। सिनॉप्टिक सुसमाचारों में कैसरिया फिलिप्पी के क्षेत्र में पीटर द्वारा यीशु को मसीहा स्वीकार करने का उल्लेख मिलता है, जिसके बाद यीशु ने उनके नाम और भूमिका से संबंधित महत्त्वपूर्ण कथन किया।

पानी पर चलने की घटना

मत्ती, मरकुस और यूहन्ना में यीशु के पानी पर चलने की घटना मिलती है। मत्ती के अनुसार पीटर ने यीशु को देखकर पानी पर चलने का प्रयास किया और कुछ दूर चले, किंतु भय और कमजोर विश्वास के कारण डूबने लगे। यीशु ने उन्हें बचाया। यह प्रसंग पीटर के व्यक्तित्व में विश्वास, साहस और मानवीय कमजोरी- तीनों पक्षों को दर्शाता है।

अंतिम भोज और यीशु की गिरफ्तारी

अंतिम भोज पर यीशु ने शिष्यों के पैर धोए; पीटर ने प्रारंभ में विरोध किया, किंतु बाद में अनुमति दी। यीशु की गिरफ्तारी के समय यीशु के एक अनुयायी ने महायाजक के सेवक (माल्खुस) का कान तलवार से काट दिया- यूहन्ना के सुसमाचार में यह व्यक्ति पीटर बताए गए हैं। लूका के अनुसार यीशु ने सेवक के कान को छूकर स्वस्थ कर दिया।

पीटर द्वारा यीशु को नकारना

चारों सुसमाचारों में वर्णित है कि यीशु ने भविष्यवाणी की थी कि पीटर मुर्गे के बाँग देने से पहले तीन बार उन्हें पहचानने से इनकार करेंगे (मार्क में यह दो बार बाँग देने से पहले तीन बार इनकार के रूप में है)। यीशु की गिरफ्तारी के बाद महायाजक के परिसर में तीन अलग-अलग अवसरों पर लोगों ने पीटर को यीशु के अनुयायी के रूप में पहचाना — पहली बार एक दासी ने और तीसरी बार उनके गलीली बोलने के ढंग से। हर बार पीटर ने इनकार किया। तीसरे इनकार के तुरंत बाद मुर्गे ने बाँग दी; पीटर को यीशु की भविष्यवाणी याद आई और वे गहरे पश्चात्ताप में रो पड़े। यह प्रसंग उनके व्यक्तित्व में साहस और मानवीय दुर्बलता के बीच के तनाव का प्रतीक माना जाता है।

लूका के अनुसार यीशु ने पहले ही कहा था कि उन्होंने पीटर के विश्वास के लिए प्रार्थना की है और जब पीटर पुनः दृढ़ हों तो अपने भाइयों को मजबूत करें, जो भविष्य में उनके नेतृत्व की संभावना का संकेत है।

पुनरुत्थान के बाद पुनर्स्थापना

पॉल के ‘कुरिंथियों के नाम प्रथम पत्र’ में पुनरुत्थित मसीह के दर्शन पाने वालों की सूची में पीटर का नाम सबसे पहले आता है। लूका के अनुसार पीटर कब्र तक दौड़कर गए और केवल कफन पड़े हुए देखे। यूहन्ना के सुसमाचार के अंतिम अध्याय में गलील सागर के तट पर यीशु ने पीटर से तीन बार पूछा कि क्या वे उनसे प्रेम करते हैं; प्रत्येक बार पुष्टि के बाद यीशु ने उन्हें अपने अनुयायियों की देखभाल का दायित्व सौंपा (‘मेरे मेमनों को खिलाओ’, ‘मेरी भेड़ों की देखभाल करो’, ‘मेरी भेड़ों को खिलाओ’)। ईसाई परंपरा में इसे पीटर के तीन इनकार के संतुलन और उनकी नेतृत्व-भूमिका की पुनर्स्थापना के रूप में समझा जाता है। गलील सागर तट पर स्थित ‘सेंट पीटर की प्रधानता का चर्च’ इसी परंपरा से जुड़ा है।

प्रारंभिक चर्च में भूमिका

यीशु की मृत्यु के बाद ‘प्रेरितों के कार्य’ में पीटर को यरूशलम के प्रारंभिक ईसाई समुदाय के प्रमुख नेताओं में प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने जॉन के साथ यरूशलम और सामरिया में प्रचार किया, सैनहेड्रिन के समक्ष अपने विश्वास का समर्थन किया और नए विश्वासियों को संगठित करने में योगदान दिया। पॉल के ‘गलातियों के नाम पत्र’ में पीटर से उनकी यरूशलम-यात्राओं के दौरान हुई मुलाकातों का वर्णन है। बाद में एंटिओक में, गैर-यहूदी ईसाइयों के साथ भोजन करने के प्रश्न पर पॉल ने पीटर का सार्वजनिक विरोध किया। यह घटना यहूदी परंपराओं और गैर-यहूदी अनुयायियों के समावेश से जुड़े जटिल प्रश्नों को दर्शाती है।

गैर-यहूदियों के बीच प्रचार

पीटर की गतिविधियाँ यहूदी ईसाई समुदाय तक सीमित नहीं रहीं। जोप्पा में उन्हें एक दर्शन हुआ जिसमें यहूदी परंपरा में अशुद्ध माने जाने वाले पशु दिखाई दिए,  इसे बाद में गैर-यहूदियों को ईसाई संदेश की स्वीकृति से जोड़ा गया। इसी संदर्भ में कैसरिया के रोमी अधिकारी कॉर्नेलियस के साथ पीटर की भेंट विशेष महत्त्व रखती है, जिसमें पीटर ने यह समझ व्यक्त की कि ईश्वर जातीय या धार्मिक पहचान के आधार पर भेदभाव नहीं करते। कॉर्नेलियस और उसके परिवार का ईसाई संदेश स्वीकार करना गैर-यहूदी समाज में ईसाई धर्म के विस्तार की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम माना जाता है।

हेरोद अग्रिप्पा द्वारा गिरफ्तारी

‘प्रेरितों के कार्य’ के बारहवें अध्याय के अनुसार यरूशलम में राजा हेरोद अग्रिप्पा प्रथम ने पीटर को गिरफ्तार किया; परंपरा के अनुसार एक स्वर्गदूत की सहायता से वे मुक्त हुए और यरूशलम से किसी अन्य स्थान चले गए। इसके बाद न्यू टेस्टामेंट में उनके जीवन का क्रमबद्ध विवरण नहीं मिलता- आगे की जानकारी मुख्यतः बाद के ईसाई लेखकों और चर्च परंपराओं पर आधारित है।

प्रेरितों के बीच विशेष स्थान

बारह प्रेरितों की सूचियों में पीटर का नाम सामान्यतः सबसे पहले आता है। जेम्स और जॉन के साथ वे यीशु के निकटतम तीन शिष्यों में शामिल थे और जायरस की पुत्री को जीवित करने, रूपांतरण तथा गेथसेमनी की प्रार्थना जैसे अवसरों पर यीशु के साथ रहे। यरूशलम के चर्च में बाद में यीशु के भाई जेम्स (जेम्स द जस्ट) का प्रभाव अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। इतिहासकार जेम्स डी. जी. डन के अनुसार पीटर की भूमिका को सत्ता-संघर्ष के बजाय उनके व्यापक मिशनरी कार्य और विभिन्न ईसाई समूहों के बीच सेतु के रूप में समझना अधिक उपयुक्त है- यूसेबियस द्वारा दर्ज एक परंपरा के अनुसार पीटर, जेम्स और यूहन्ना ने स्वयं जेम्स द जस्ट को यरूशलम के नेतृत्व सौंपा था। पॉल के अनुसार पीटर को मुख्यतः यहूदियों के बीच प्रेरिताई सौंपी गई थी, जबकि पॉल ने गैर-यहूदियों पर ध्यान दिया — यद्यपि कॉर्नेलियस-प्रसंग दिखाता है कि यह विभाजन पूर्ण नहीं था।

पीटर और चर्च की ‘चट्टान’

मत्ती 16:13–19 में यीशु ने शिष्यों से पूछा कि वे उन्हें क्या मानते हैं। साइमन पीटर ने उत्तर दिया कि यीशु मसीहा और जीवित परमेश्वर के पुत्र हैं। इस स्वीकारोक्ति के बाद यीशु ने पीटर के नाम को ‘चट्टान’ की उपमा से जोड़ते हुए कहा कि वे इसी चट्टान पर अपनी कलीसिया का निर्माण करेंगे, और पीटर को ‘स्वर्ग के राज्य की चाबियाँ’ तथा पृथ्वी पर बाँधने-खोलने का अधिकार देंगे। कैथोलिक परंपरा इसे पीटर को विशेष नेतृत्व दिए जाने का प्रमाण मानती है और इसी आधार पर उन्हें रोम का प्रथम बिशप तथा बाद के पोपों का आध्यात्मिक पूर्ववर्ती मानती है।

भाषिक पृष्ठभूमि: केफ़ा, पेट्रोस, पेत्रा

यूहन्ना 1:42 के अनुसार यीशु ने शमौन को ‘केफा’ नाम दिया, जिसका अरामी अर्थ ‘पत्थर’/’चट्टान’ है। इसका यूनानी रूप ‘केफास’ तथा ‘पेट्रोस’ से संबंधित है। मत्ती 16:18 के यूनानी पाठ में पीटर के लिए पुल्लिंग पेट्रोस और चट्टान के लिए स्त्रीलिंग पेत्रा प्रयुक्त हुए हैं- व्याकरणिक रूप से भिन्न किंतु स्पष्ट भाषिक संबंध वाले शब्द। यदि मूल संवाद अरामी में हुआ हो, तो संभव है दोनों जगह केफा शब्द प्रयुक्त हुआ हो; प्राचीन सीरियाई पेशिट्टा में यह संबंध अधिक स्पष्ट दिखता है।

कुछ प्रोटेस्टेंट व्याख्याकारों ने शास्त्रीय यूनानी के आधार पर पेट्रोस को ‘छोटा पत्थर’ और पेत्रा को ‘बड़ी चट्टान’ बताकर तर्क दिया कि ‘चट्टान’ पीटर के बजाय उनके विश्वास या मसीह की ओर संकेत करती है। किंतु आधुनिक भाषावैज्ञानिक इस कठोर अर्थ-भेद को स्वीकार करने में सतर्क हैं, क्योंकि न्यू टेस्टामेंट शास्त्रीय एटिक नहीं, कोइने यूनानी में है, जहाँ ऐसा भेद स्थापित करना कठिन है।

‘चट्टान’ की विभिन्न ईसाई व्याख्याएँ

कैथोलिक धर्मशास्त्र में ‘चट्टान’ की व्याख्या पीटर के विशिष्ट नेतृत्व और उनके उत्तराधिकारियों के अधिकार की आधारभूमि के रूप में की जाती है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, मत्ती 16:18 में यीशु द्वारा पीटर को ‘चट्टान’ कहे जाने का संबंध कलीसिया में उनके विशेष दायित्व और नेतृत्व से है। टर्टुलियन ने भी इस कथन को पीटर की विशिष्ट भूमिका से जोड़ा। इसके विपरीत, पूर्वी ऑर्थोडॉक्स और अनेक प्रोटेस्टेंट परंपराएँ ‘चट्टान’ की व्याख्या पीटर की विश्वास-घोषणा, स्वयं मसीह या प्रेरितों के सामूहिक विश्वास के संदर्भ में करती हैं और इसे पीटर के व्यक्तिगत सर्वोच्च अधिकार का प्रत्यक्ष आधार नहीं मानतीं। कैसरिया के बेसिल की व्याख्या में मसीह को वास्तविक आधार माना गया है, जबकि पीटर को मसीह से प्राप्त स्थिरता के कारण ‘चट्टान’ कहा जाता है। पॉल के ‘कुरिंथियों के नाम प्रथम पत्र’ (1 कुरिं. 10:4) में ‘पेत्रा’ शब्द मसीह के लिए भी प्रयुक्त हुआ है- “वह चट्टान मसीह थे।” इसी आधार पर जेरोम और ऑगस्टीन जैसे धर्मशास्त्रियों ने मसीह को कलीसिया की वास्तविक आधारशिला माना, जबकि पीटर और अन्य प्रेरितों को उस विश्वास के प्रतिनिधि के रूप में देखा।

लूथरन धर्मशास्त्री ऑस्कर कुल्मन ने एक मध्यम दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने स्वीकार किया कि अरामी केफा शब्द पीटर के नाम और ‘चट्टान’ दोनों के लिए संभव था, इसलिए भाषिक संबंध को पूरी तरह अस्वीकार करना उचित नहीं। किंतु उन्होंने यह भी नहीं माना कि इससे पोप पद की निरंतर संस्थागत उत्तराधिकार-परंपरा सिद्ध होती है।

1870 ईस्वी की प्रथम वेटिकन परिषद में मत्ती 16:18–19 की व्याख्या पोप की प्रधानता और अचूकता के प्रश्न से जुड़ी। कैथोलिक धर्मशास्त्र ने पीटर को चर्च की एकता और नेतृत्व की आधारशिला माना, जबकि प्रोटेस्टेंट परंपराएँ इस पद को पीटर की प्रेरितीय भूमिका तक सीमित रखती हैं- विवाद का मूल प्रश्न यह नहीं कि ‘चट्टान’ किसे कहा गया, बल्कि यह है कि इससे स्थायी पोपीय उत्तराधिकार का निष्कर्ष कितनी दूर तक निकाला जा सकता है।

पीटर नाम का प्रसार

‘पेट्रोस’ प्रारंभिक ईसाई काल में सामान्य व्यक्तिगत नाम नहीं था। पीटर की धार्मिक प्रतिष्ठा बढ़ने के साथ यह यूनानी-भाषी ईसाई समाज में लोकप्रिय हुआ, जो उनकी प्रेरितीय स्मृति के प्रभाव का सूचक है।

प्रेरितों की उत्तराधिकार परंपरा

कैथोलिक और ऑर्थोडॉक्स दोनों परंपराएँ पीटर के नेतृत्व को प्रेरितीय उत्तराधिकार का महत्त्वपूर्ण आधार मानती हैं, यद्यपि प्रधानता की प्रकृति की व्याख्या भिन्न है। कैथोलिक चर्च पीटर को प्रेरितों का प्रमुख और रोम के बिशपों को उनका उत्तराधिकारी मानते हुए पोप पद की निरंतरता स्थापित करता है। पूर्वी और ओरिएंटल ऑर्थोडॉक्स परंपराएँ पीटर की प्राथमिकता स्वीकार करती हैं, पर इसे सम्मान और वरिष्ठता के रूप में समझती हैं, न कि अन्य प्रेरितों पर सार्वभौम अधिकार के रूप में। कॉप्टिक ऑर्थोडॉक्स परंपरा में भी पीटर को प्रेरितों का ‘प्रधान’ कहा जाता है, यह सम्मान पॉल के साथ भी जुड़ा है।

प्रारंभिक ईसाई समुदाय की संस्थागत व्यवस्था आधुनिक चर्च-व्यवस्था से भिन्न थी- यूनानी शब्द ‘एपिस्कोपोस’ (बिशप) और ‘प्रेस्बिटेरोस’ (प्रेस्बिटर) प्रायः निकटवर्ती अर्थों में प्रयुक्त होते थे, और स्पष्ट संस्थागत विभाजन बाद की शताब्दियों में विकसित हुआ। कुछ विद्वानों का मत है कि दूसरी शताब्दी के मध्य से पहले रोम में एकमात्र सर्वोच्च बिशप की व्यवस्था स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं हुई थी, इसलिए पीटर के नेतृत्व और बाद के रोमन बिशपों के अधिकार के बीच सीधी कड़ी स्थापित करना ऐतिहासिक रूप से जटिल है।

एंटिओक और पीटर

पॉल के ‘गलातियों के नाम पत्र’ में पीटर के एंटिओक आने और वहाँ गैर-यहूदी ईसाइयों के साथ भोजन को लेकर पॉल के विरोध का उल्लेख है। बाद की परंपरा में पीटर को एंटिओक का प्रथम बिशप माना गया- ओरिजेन, यूसेबियस और नौवीं शताब्दी के ‘लिबर पोंटिफिकैलिस’ (जिसके अनुसार वे लगभग सात वर्ष वहाँ बिशप रहे) में इसका उल्लेख मिलता है, यद्यपि इसकी स्वतंत्र समकालीन पुष्टि नहीं है। सीरिया और लेबनान के कुछ समुदायों ने स्वयं को पीटर से रक्त-संबंध के आधार पर जोड़ने का दावा भी किया, जिसका निश्चित ऐतिहासिक आधार नहीं है।

चौथी शताब्दी के आसपास संकलित ‘क्लेमेंटाइन साहित्य’ में पीटर की कैसरिया मैरिटिमा से एंटिओक तक की यात्रा, उनके विरोधी साइमन मैगस से सामना, तथा ज़क्कियस व मारो को क्रमशः कैसरिया व त्रिपोलिस का प्रथम बिशप नियुक्त करने की कथाएँ मिलती हैं। इतिहासकार फ्रेड लैफम के अनुसार इसमें वर्णित यात्रा-मार्ग किसी पुराने दस्तावेज़ पर आधारित हो सकता है (शायद एपिफेनियस द्वारा उल्लिखित ‘द आइटिनरेरी ऑफ पीटर’), पर इसकी ऐतिहासिक विश्वसनीयता अनिश्चित है।

कोरिंथ

पीटर के कोरिंथ से संबंध का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, किंतु पॉल के कुरिंथियों के नाम प्रथम पत्र से संकेत मिलता है कि वहाँ के कुछ विश्वासी स्वयं को ‘सेफ़ास’ (पीटर) से जोड़ते थे। दूसरी शताब्दी में कोरिंथ के बिशप डायोनिसियस ने एक पत्र में पीटर और पॉल दोनों को रोम तथा कोरिंथ के समुदायों से जोड़ा, जो दोनों प्रेरितों की संयुक्त स्मृति की विकसित होती परंपरा दर्शाता है।

रोम से संबंध

कैथोलिक चर्च रोम के बिशप (पोप) को पीटर का उत्तराधिकारी मानता है। इरेनियस ने लगभग 180 ईस्वी में लिनस को रोम के चर्च में पीटर-पॉल के बाद का प्रमुख बताया- कैथोलिक परंपरा में लिनस को रोम का दूसरा बिशप माना जाता है, उनके बाद एनाक्लेटस और क्लेमेंट का क्रम आता है। यूसेबियस ने भी इसकी पुष्टि की, और टर्टुलियन ने क्लेमेंट को पीटर से जोड़ने वाली परंपरा प्रस्तुत की।

न्यू टेस्टामेंट के प्रमाण

न्यू टेस्टामेंट में पीटर के रोम जाने का कोई स्पष्ट प्रत्यक्ष विवरण नहीं है। पहला पतरस के अंत में ‘बेबीलोन’ में स्थित समुदाय के अभिवादन का उल्लेख है, जिसे अनेक विद्वान रोम का सांकेतिक नाम मानते हैं (यह पहचान निर्विवाद नहीं)। पॉल के रोमियों के नाम पत्र (लगभग 57 ई.) में रोम के अनेक ईसाइयों को अभिवादन है, पर पीटर का उल्लेख नहीं है,  इसी तरह प्रेरितों के कार्य के अंतिम अध्याय में पॉल के रोम-प्रवास (लगभग 60–62 ई.) के विवरण में भी पीटर नहीं आते। यह मौन प्रमाण निर्णायक नहीं है, क्योंकि इन ग्रंथों का उद्देश्य रोम में उपस्थित हर नेता की सूची देना नहीं था, पर यह पीटर के रोम पहुँचने के समय और वहाँ उनके नेतृत्व की अवधि को लेकर ऐतिहासिक प्रश्न अवश्य उठाता है।

प्रारंभिक चर्च लेखकों की गवाही

एंटिओक के इग्नेशियस, इरेनियस और अलेक्जेंड्रिया के क्लेमेंट सहित अनेक प्रारंभिक लेखकों ने पीटर और पॉल दोनों को रोम के चर्च से जोड़ा। बाद की परंपरा के अनुसार पीटर एंटिओक से रोम गए, जहाँ नीरो के शासनकाल में उन्होंने प्रचार किया- चौथी शताब्दी के लैक्टेंटियस ने भी यह उल्लेख किया।

परंपरा में पीटर के रोम से संबंध को साइमन मैगस की कथा से भी जोड़ा गया है (प्रेरितों के कार्य 8 में उल्लिखित एक कथित जादूगर)। यूसेबियस, जेरोम तथा बाद की अप्रामाणिक रचनाओं (‘पीटर के कार्य’, सातवीं शताब्दी की ‘एक्टस वर्सेलेंसिस’) के अनुसार साइमन मैगस रोम गया और वहाँ पीटर से उसका धार्मिक संघर्ष हुआ; जेरोम के अनुसार पीटर रोम में लगभग पच्चीस वर्ष रहे। इन कथाओं का प्रत्यक्ष ऐतिहासिक मूल्य सीमित है, पर ये दर्शाती हैं कि पीटर की छवि बाद की परंपरा में किस तरह विकसित हुई।

पीटर की मृत्यु और दफ़न
मृत्यु का संकेत

यूहन्ना के सुसमाचार के अंतिम अध्याय में यीशु पीटर से कहते हैं कि वृद्धावस्था में कोई और उन्हें वहाँ ले जाएगा जहाँ वे स्वयं नहीं जाना चाहेंगे। परंपरा में इसे पीटर के क्रूस पर चढ़ाए जाने की भविष्यवाणी माना गया, यद्यपि मूल यूनानी पाठ में क्रूस का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।

रोम में शहादत की परंपरा

प्रारंभिक परंपरा के अनुसार पीटर की मृत्यु रोम में नीरो के शासनकाल में हुई, जिसे सामान्यतः 64 ईस्वी की रोम की आग के बाद के ईसाई-दमन से जोड़ा जाता है — यद्यपि निश्चित तिथि, स्थान व परिस्थितियों पर प्राचीन स्रोतों में एकरूपता नहीं है। अधिकांश विद्वान मृत्यु को 64–68 ईस्वी के बीच रखते हैं।

रोम के क्लेमेंट का प्रथम पत्र (लगभग पहली शताब्दी के अंतिम दशक) पीटर की शहादत का सबसे पुराना स्रोत है, पर यह मृत्यु का स्थान या विधि स्पष्ट नहीं करता। टर्टुलियन, ओरिजेन और यूसेबियस ने दूसरी-तीसरी शताब्दी तक पीटर के उल्टे क्रूस पर शहीद होने की परंपरा दर्ज की। अप्रामाणिक रचना ‘पीटर के कार्य’ के अनुसार पीटर ने स्वयं यीशु के समान क्रूस पर चढ़ने से इनकार करते हुए उल्टा क्रूस चुना- यह कथा बाद की ईसाई कला में गहराई से प्रभावशाली रही और उल्टा क्रूस ‘सेंट पीटर के क्रूस’ का प्रतीक बना।

पीटर की शहादत से जुड़ी ‘क्वो वाडिस’ परंपरा के अनुसार रोम से भाग रहे पीटर की भेंट मार्ग में पुनरुत्थित यीशु से हुई; यीशु ने कहा कि वे रोम में फिर क्रूसित होने जा रहे हैं, जिससे पीटर को अपने कर्तव्य का बोध हुआ और वे लौट आए।

रोम में उपस्थिति पर आधुनिक विवाद

पीटर की रोम-उपस्थिति पर आधुनिक विद्वानों में मतैक्य नहीं है। जर्मन विद्वान ओटो ज़्वियरलाइने (2009, 2013) ने इससे जुड़ी परंपराओं की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए तर्क दिया कि उपलब्ध साक्ष्य निश्चित निष्कर्ष के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसके विपरीत इतिहासकार टिमोथी बार्न्स ने उनके दृष्टिकोण को अत्यधिक संशयवादी बताया। पीटर का रोम पहुँचना और उन्हें औपचारिक रूप से रोम का प्रथम बिशप मानना, ये दो अलग प्रश्न हैं; प्राचीन स्रोत किसी औपचारिक बिशपीय पद का स्पष्ट समकालीन प्रमाण प्रस्तुत नहीं करते।

दफ़न और कब्र की परंपरा

कैथोलिक परंपरा के अनुसार पीटर को वेटिकन पहाड़ी के निकट दफनाया गया, जहाँ बाद में सेंट पीटर की बेसिलिका बनी। दूसरी शताब्दी के लेखक कैयस ने वेटिकन क्षेत्र में पीटर-पॉल से संबंधित स्मारकों का उल्लेख किया (यूसेबियस के माध्यम से सुरक्षित)। जेरोम ने चौथी शताब्दी में इस परंपरा की पुष्टि की। चौथी शताब्दी में सम्राट कॉन्स्टेंटाइन प्रथम ने इसी स्थान पर बेसिलिका बनवाई, जिसके लिए पुराने रोमन कब्रिस्तान को भी समतल करना पड़ा।

1940 के दशक में बेसिलिका के नीचे हुई खुदाई में एक प्राचीन कब्र-संरचना और मानव अस्थियाँ मिलीं; 1960 के दशक की वैज्ञानिक जाँच से संकेत मिला कि ये किसी 60–70 वर्षीय पुरुष की, पहली शताब्दी की अस्थियाँ हो सकती हैं। 1968 ईस्वी में पोप पॉल षष्ठम ने घोषणा की कि इन्हें पीटर की ‘माना जाता है’ — यह वाक्यांश स्वयं दर्शाता है कि पहचान को पूर्ण वैज्ञानिक निश्चितता के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया। 2013 ईस्वी में पोप फ्रांसिस ने इनमें से कुछ अस्थि-खंड सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किए, और 2019 ईस्वी में नौ अस्थि-खंड कॉन्स्टेंटिनोपल के पितामह बार्थोलोम्यू को सौंपे, जिसे कैथोलिक-ऑर्थोडॉक्स संबंधों में एक प्रतीकात्मक कदम माना गया।

पर्व और स्मृति-दिवस

रोमन कैथोलिक और पूर्वी रूढ़िवादी दोनों परंपराओं में 29 जून को पीटर-पॉल का संयुक्त पर्व मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त 22 फरवरी को ‘संत पीटर की कुर्सी’ और 16 जनवरी को पूर्वी परंपरा में ‘पीटर की जंजीरों’ की स्मृति मनाई जाती है।

पतरस की प्रधानता: विभिन्न परंपराओं का दृष्टिकोण

पतरस की प्रधानता की व्याख्या ईसाई परंपराओं में भिन्न-भिन्न है। इसका मुख्य बाइबिलीय आधार तीन अंश हैं: मत्ती 10:2 (प्रेरितों की सूची में पीटर का नाम सबसे पहले आना), मत्ती 16:18–19 (‘चट्टान’ और चाबियों का कथन), और यूहन्ना 21:15–17 (पुनरुत्थान के बाद “मेरी भेड़ों को खिलाओ” का निर्देश)।

कैथोलिक चर्च पीटर को रोम का प्रथम बिशप व प्रथम पोप मानता है, और वर्तमान पोप को उनका उत्तराधिकारी। ध्यान देने योग्य है कि पीटर ने स्वयं ‘पोप’ या ‘मसीह के प्रतिनिधि’ जैसी उपाधियाँ प्रयुक्त नहीं कीं- ये बाद में विकसित हुईं। कैथोलिक धर्मशास्त्र में मसीह चर्च के सर्वोच्च प्रमुख हैं, जबकि पीटर को पृथ्वी पर विशेष नेतृत्व-दायित्व प्राप्त प्रेरित माना जाता है। पीटर से जुड़े प्रतीक- पोप की ‘मछुआरे की अंगूठी’ और चाबियाँ- इसी परंपरा से आए हैं।

पूर्वी ऑर्थोडॉक्स चर्च पीटर को प्रेरितों में अग्रणी मानता है (यूनानी उपाधि ‘कोरिफायोस’ यानी ‘प्रमुख’ भी प्रयुक्त होती है), विशेषकर यरूशलम में उनकी नेतृत्वकारी भूमिका के लिए। किंतु यह प्रधानता सार्वभौमिक प्रशासनिक अधिकार नहीं, बल्कि सामूहिक प्रेरितीय व्यवस्था का हिस्सा मानी जाती है। यरूशलम की सभा में गैर-यहूदियों को लेकर पीटर ने तर्क प्रस्तुत किए, पर अंतिम निर्णय याकूब ने सुनाया- ऑर्थोडॉक्स व्याख्या इसे सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया के प्रमाण के रूप में देखती है। 2007 ईस्वी के रेवेना दस्तावेज़ में कैथोलिक-ऑर्थोडॉक्स प्रतिनिधियों ने स्वीकार किया कि रोम प्राचीन चर्च-व्यवस्था में ‘प्रोटोस’ (प्रथम) स्थान रखता था, पर इसकी प्रकृति की व्याख्या दोनों परंपराओं में अलग है।

सीरियाई ऑर्थोडॉक्स परंपरा में पीटर के ‘केफ़ा’ नाम और उनकी साक्षी-भूमिका पर विशेष बल है। प्रारंभिक सीरियाई लेखक अफ़राहट और एफ़्रेम ने पीटर को धार्मिक उत्तरदायित्व और साक्षी के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया।

अनेक प्रोटेस्टेंट विद्वान पीटर की प्रेरितीय भूमिका और रोम में संभावित उपस्थिति स्वीकार करते हैं, पर इसे आधुनिक पोप-व्यवस्था का प्रत्यक्ष आधार नहीं मानते। लूथरन धर्मशास्त्री इस बात पर बल देते हैं कि पहला पतरस में वर्णित सभी विश्वासियों का ‘राजकीय याजकत्व’ और मत्ती 18 में ‘बाँधने-खोलने’ का सामुदायिक संदर्भ किसी एक व्यक्ति के स्थायी सार्वभौमिक अधिकार को स्वतः सिद्ध नहीं करते। चर्च ऑफ जीसस क्राइस्ट ऑफ लैटर-डे सेंट्स के अनुसार पीटर प्रारंभिक चर्च के प्रमुख नेता थे, पर आधुनिक रोमन पोपों को उनका वैध उत्तराधिकारी नहीं माना जाता — इस परंपरा के अनुसार प्रेरितीय अधिकार समय के साथ लुप्त हो गया और 1829 ईस्वी में पीटर व जॉन द बैपटिस्ट द्वारा जोसेफ स्मिथ और ओलिवर काउडरी को पुनः प्रदान किया गया। न्यू अपोस्टोलिक चर्च पीटर को प्रथम मुख्य प्रेरित मानकर विशेष सम्मान देता है।

गैर-ईसाई दृष्टिकोण

यहूदी परंपरा में पीटर से संबंधित कोई प्रामाणिक मुख्यधारा धार्मिक सिद्धांत विकसित नहीं हुआ; कुछ बाद की लोक-परंपराओं में उन्हें ईसाई आंदोलन और यहूदी परिवेश के बीच मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करने के प्रयास मिलते हैं। इस्लाम में कुरआन ईसा के अनुयायियों को ‘हवारियून’ कहता है, बिना व्यक्तिगत नाम दिए। बाद की इस्लामी व्याख्यात्मक परंपरा में इनमें पीटर की पहचान करने के प्रयास हुए, यद्यपि यह कुरआन के स्पष्ट कथन पर आधारित नहीं है। कुछ शिया व्याख्याओं में पीटर की भूमिका की तुलना पैगंबर मुहम्मद के बाद अली की भूमिका से (धार्मिक नेतृत्व-अवधारणा के तुलनात्मक अध्ययन के रूप में) की जाती है। बहाई धर्म में पीटर को ईसा के प्रमुख प्रेरितों में माना जाता है; ‘चट्टान’ को उनकी दृढ़ आस्था से जोड़ा जाता है, और चर्च की वास्तविक नींव परमेश्वर-विश्वास व दिव्य संदेश की स्वीकृति में निहित मानी जाती है।

तुलनात्मक सांस्कृतिक संदर्भ

ओसेशियन पौराणिक परंपरा के जल-देवता डॉनबेट्तिर (नदियों, मछलियों व मछुआरों से संबद्ध) और पीटर के बीच कुछ तुलनात्मक अध्ययनों ने प्रतीकात्मक समानता की ओर संकेत किया है, यद्यपि प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रभाव का प्रमाण नहीं है। एंडीज़ क्षेत्र में पारंपरिक रूप से प्रयुक्त ‘सैन पेड्रो’ कैक्टस (एकिनोप्सिस पचनोई) का नाम ‘संत पतरस’ के अर्थ में यूरोपीय ईसाई प्रभाव के बाद जुड़ा- पौधे के धार्मिक/औषधीय उपयोग की जड़ें इससे कहीं पुरानी स्थानीय संस्कृतियों में हैं।

पतरस से संबंधित लेखन
प्रथम और द्वितीय पतरस

दोनों पत्र कोइने यूनानी में हैं, पर भाषा-शैली में स्पष्ट अंतर है। प्रथम पतरस की यूनानी अपेक्षाकृत विकसित है- पत्र के अंत में उल्लिखित सिल्वानुस को कुछ विद्वान लेखन-सहायक मानते हैं, जिससे परिष्कृत भाषा के बावजूद पीटर के लेखकत्व को असंभव मानना आवश्यक नहीं होता। द्वितीय पतरस का लेखकत्व अधिक विवादास्पद है- इसकी भाषा-शैली प्रथम पतरस से भिन्न है और यहूदा के पत्र से निकटता दिखाती है; आधुनिक आलोचनात्मक अध्ययन का बड़ा भाग इसे पीटर के प्रत्यक्ष लेखन के बजाय बाद की रचना मानता है। यूसेबियस ने इसे उन ग्रंथों में रखा था जिनकी स्वीकृति पर प्रारंभिक मतभेद था; चौथी शताब्दी तक यह नए नियम में स्थापित हो गया। जेरोम ने दोनों पत्रों को स्वीकार करते हुए भाषा-भेद को अलग-अलग लेखन-सहायकों से समझाया। प्रथम पतरस पोंटस, गलातिया, कप्पदोकिया, एशिया और बिथुनिया के ईसाइयों को संबोधित है, जिन्हें कठिनाइयों में धैर्य और विश्वास बनाए रखने को प्रोत्साहित किया गया है। इसकी रचना-तिथि और उत्पीड़न की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (64 ई. के रोमन दमन तक सीमित न मानी जाए, क्योंकि संबोधित समुदाय एशिया माइनर में थे) पर भी विद्वानों में मतभेद है।

मार्क का सुसमाचार और पीटर

प्राचीन परंपरा (पापियास, अलेक्जेंड्रिया के क्लेमेंट, इरेनियस द्वारा दर्ज) के अनुसार मार्क पीटर के सहयोगी और उनके उपदेशों के लिपिबद्धकर्ता थे- पापियास के अनुसार मार्क ने घटनाओं को अनिवार्य रूप से कालानुक्रम में नहीं, बल्कि पीटर की शिक्षाओं को विश्वसनीय रूप से सुरक्षित रखने के उद्देश्य से लिखा। मार्क का सुसमाचार स्वयं अपने लेखक का नाम नहीं बताता, इसलिए परंपरागत शीर्षक और वास्तविक लेखकत्व को अलग-अलग देखना आवश्यक है।

अपोक्रिफ़ल साहित्य

पीटर से जुड़ी अनेक गैर-मानक रचनाएँ प्राचीन काल में प्रचलित रहीं- गॉस्पेल ऑफ़ पीटर, एक्ट्स ऑफ़ पीटर, पीटर का फिलिप को पत्र (नाग हम्मादी संग्रह में सुरक्षित), एपोकैलिप्स ऑफ़ पीटर, प्रिचिंग ऑफ़ पीटर, एपिस्टुला पेट्री आदि। इनमें से किसी को भी आज मानक धर्मग्रंथों का हिस्सा नहीं माना जाता, पर ये प्रारंभिक ईसाई धर्म की विविध धार्मिक धारणाओं को समझने में उपयोगी हैं। गॉस्पेल ऑफ़ थॉमस और गॉस्पेल ऑफ़ मैरी में भी पीटर से जुड़े प्रसंग मिलते हैं (बाद वाले में पीटर मरियम की स्थिति पर प्रश्न उठाते हैं, जिसका लेवी प्रतिवाद करते हैं)। फय्यूम फ्रैगमेंट में पीटर के इनकार की भविष्यवाणी से मिलती-जुलती सामग्री है।

पीटर का कलात्मक चित्रण

पीटर का प्रारंभिक ज्ञात चित्रण चौथी शताब्दी की ईसाई कला में मिलता है- मजबूत शरीर, छोटी दाढ़ी और छोटे/सफ़ेद बालों के साथ (पौलुस को प्रायः दुबले चेहरे व सिर के मध्य में गंजेपन के साथ दिखाया गया, ताकि दोनों अलग पहचाने जा सकें)। रोम की मार्सेलिनस-पीटर कैटाकॉम्ब में चौथी शताब्दी के ऐसे चित्र सुरक्षित हैं।

चाबियाँ मध्यकाल से पीटर की पहचान का सबसे प्रमुख प्रतीक बनीं (मत्ती में उल्लिखित ‘स्वर्ग के राज्य की कुंजियों’ से जुड़ा), आठवीं शताब्दी तक स्पष्ट रूप से प्रचलन में आ चुकी थीं। पंद्रहवीं शताब्दी के बाद पश्चिमी कला में पीटर को अधिक गंजा दिखाने की प्रवृत्ति बढ़ी, जबकि पूर्वी रूढ़िवादी कला में उन्हें अधिक बालों सहित दिखाया जाता रहा।

यीशु की गिरफ्तारी के दृश्यों में पीटर को सैनिक का कान काटते दिखाया जाता है। काउंटर-रिफॉर्मेशन काल में पीटर के पश्चात्ताप का दृश्य (मुर्गे की तीसरी बाँग के बाद का दुःख) विशेष रूप से लोकप्रिय हुआ- यह केवल व्यक्तिगत कमजोरी का चित्रण नहीं, बल्कि पश्चात्ताप, क्षमा और ईश्वर से पुनर्मिलन का प्रतीक भी बन गया।

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