ताइपिंग विद्रोह (1851–1864 ई.)
मुख्य लेख : चीन में नवयुग का आरंभ
ताइपिंग विद्रोह (1851–1864 ई.) चीन के छिंग राजवंश के विरुद्ध हुआ एक विशाल, संगठित और अत्यंत रक्तरंजित किसान विद्रोह तथा गृहयुद्ध था। इसका नेतृत्व होंग श्यूचुआन ने किया, जिसने स्वयं को ईसा मसीह का छोटा भाई घोषित किया। उसने गॉड वर्शिपर्स सोसाइटी की स्थापना की और 1851 ईस्वी में ताइपिंग स्वर्गीय राज्य की घोषणा की। इस आंदोलन का उद्देश्य मांचू शासित छिंग राजवंश का अंत कर चीन में धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक आधार पर एक नई व्यवस्था स्थापित करना था। ताइपिंग विद्रोह के पीछे राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक कारणों का संयुक्त प्रभाव था। छिंग शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता, किसानों पर बढ़ते करों का बोझ, प्राकृतिक आपदाएँ, अकाल तथा तीव्र जनसंख्या वृद्धि ने व्यापक असंतोष को जन्म दिया। अफीम युद्धों में चीन की पराजय से छिंग शासन की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचा और विदेशी शक्तियों के बढ़ते प्रभाव ने जनता में असुरक्षा तथा आक्रोश की भावना को और प्रबल किया। इन परिस्थितियों में होंग श्यूचुआन ने ईसाई धर्म की अपनी विशिष्ट व्याख्या प्रस्तुत करते हुए मांचू शासकों को विदेशी एवं अत्याचारी घोषित किया और हान चीनी जनता से उनके विरुद्ध संघर्ष का आह्वान किया।
जनवरी 1851 ईस्वी में गुआंग्शी प्रांत से आरंभ हुए इस विद्रोह ने शीघ्र ही व्यापक रूप धारण कर लिया। होंग श्यूचुआन ने स्वयं को स्वर्गीय राजा घोषित किया और विद्रोही सेनाओं ने दक्षिणी तथा मध्य चीन के विशाल क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। 1853 ईस्वी में उन्होंने नानजिंग पर विजय प्राप्त की, उसका नाम तियानजिंग (स्वर्गीय राजधानी) रखा और उसे ताइपिंग स्वर्गीय राज्य की राजधानी बनाया। अपने उत्कर्ष काल में इस राज्य का नियंत्रण लगभग तीन करोड़ लोगों की जनसंख्या पर था।
ताइपिंग आंदोलन केवल राजनीतिक सत्ता-परिवर्तन तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक और आर्थिक पुनर्गठन का भी प्रयास था। इसके नेताओं ने भूमि के समान वितरण, सामूहिक कृषि व्यवस्था तथा स्त्री-पुरुष समानता का समर्थन किया। उन्होंने अफीम, तंबाकू, मदिरा, जुआ और वेश्यावृत्ति पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया तथा महिलाओं को सेना और प्रशासन में भागीदारी का अवसर दिया। यद्यपि इन सुधारों का पूर्ण क्रियान्वयन संभव नहीं हो सका, तथापि उन्होंने चीन के सामाजिक इतिहास पर गहरा प्रभाव छोड़ा। ताइपिंग सेनाओं ने एक दशक से अधिक समय तक यांग्त्सी नदी की मध्य और निचली घाटी के विस्तृत क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाए रखा। इस लंबे गृहयुद्ध से भारी जन-धन की हानि हुई। लाखों लोग विस्थापित हुए, असंख्य नगर और ग्राम नष्ट हो गए तथा व्यापक हिंसा और नरसंहार हुए। विभिन्न इतिहासकारों के अनुसार इस संघर्ष में लगभग दो से तीन करोड़ लोगों की मृत्यु हुई, जिस कारण इसे आधुनिक विश्व इतिहास के सर्वाधिक विनाशकारी गृहयुद्धों में गिना जाता है।
1853–1855 ईस्वी के बीच ताइपिंग विद्रोहियों का बीजिंग पर अधिकार करने का प्रयास असफल रहा। 1856 ईस्वी में नेतृत्व के भीतर सत्ता-संघर्ष और आंतरिक षड्यंत्रों ने आंदोलन को गंभीर रूप से दुर्बल कर दिया। इसका लाभ उठाकर छिंग शासन ने ज़ेंग गुओफ़ान के नेतृत्व में शियांग सेना का संगठन किया। 1861 ईस्वी में आनछिंग पर पुनः अधिकार कर लिया गया तथा 1862 ईस्वी में नानजिंग की घेराबंदी आरंभ हुई। जून 1864 ईस्वी में होंग श्यूचुआन की मृत्यु के पश्चात् अगले ही महीने छिंग सेना ने नानजिंग पर पुनः अधिकार कर ताइपिंग स्वर्गीय राज्य का अंत कर दिया। यद्यपि कुछ विद्रोही दलों का प्रतिरोध 1871 ईस्वी तक जारी रहा, तथापि 1864 ईस्वी को विद्रोह का निर्णायक अंत माना जाता है। इस संघर्ष ने छिंग राजवंश को दुर्बल कर दिया, प्रांतीय सेनाओं का महत्त्व बढ़ाया और आत्म-सुदृढ़ीकरण आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार की। साथ ही इसने राष्ट्रवादी आंदोलनों और अंततः छिंग राजवंश के पतन का मार्ग प्रशस्त किया।
ताइपिंग विद्रोह का स्वरूप और नामकरण
ताइपिंग विद्रोह की प्रकृति, स्वरूप और नामकरण को लेकर इतिहासकारों में मतभेद रहे हैं। आधुनिक चीन में इसे प्रायः ‘ताइपिंग स्वर्गीय राज्य आंदोलन’ कहा जाता है। चीनी इतिहास-लेखन के अनुसार यह केवल छिंग राजवंश के विरुद्ध विद्रोह नहीं था, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और वैचारिक परिवर्तन का व्यापक आंदोलन था। ताइपिंग नेतृत्व ने सामाजिक समानता, भूमि सुधार, आर्थिक पुनर्गठन तथा मांचू शासन के उन्मूलन का समर्थन किया। इसी कारण राष्ट्रवादी और साम्यवादी इतिहासकारों ने इसे अपने-अपने दृष्टिकोण से एक प्रगतिशील आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया। इतिहासकार जियान योवेन ने इसे ‘ताइपिंग क्रांतिकारी आंदोलन’ की संज्ञा दी, क्योंकि इसका उद्देश्य केवल छिंग राजवंश को हटाना नहीं, बल्कि चीन की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लाना था।
पाश्चात्य इतिहास-लेखन में इस संघर्ष को दीर्घकाल तक ‘ताइपिंग विद्रोह’ कहा जाता रहा। किंतु आधुनिक इतिहासकारों टोबी मेयर-फोंग और स्टीफन प्लैट का मानना है कि ‘विद्रोह’ शब्द छिंग शासन को वैध तथा ताइपिंग पक्ष को अवैध सिद्ध करने का संकेत देता है। उनके अनुसार यह संघर्ष दो संगठित राजनीतिक शक्तियों और समानांतर शासन-व्यवस्थाओं के बीच लड़ा गया था, इसलिए इसे ‘ताइपिंग गृहयुद्ध’ कहना अधिक उपयुक्त है। इसके विपरीत इतिहासकार जुर्गन ओस्टरहैमेल इसे ‘ताइपिंग क्रांति’ कहते हैं, क्योंकि इसका लक्ष्य चीन की सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन लाना था।
समकालीन ताइपिंग नेतृत्व अपने संघर्ष को धार्मिक और नैतिक उद्देश्य से प्रेरित एक पवित्र अभियान मानता था। होंग श्यूचुआन ने मांचू शासकों को अधर्म और अन्याय का प्रतीक बताते हुए उनके विरुद्ध संघर्ष को पृथ्वी पर ‘स्वर्गीय राज्य’ की स्थापना का माध्यम घोषित किया। इसके विपरीत छिंग शासन ने अपने आधिकारिक अभिलेखों में ताइपिंग विद्रोहियों के लिए ‘युए फ़ेई’ अथवा ‘युए ज़ेई’ जैसे अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया, ताकि उन्हें वैध राजनीतिक शक्ति के बजाय अपराधी और अराजक तत्त्व घोषित किया जा सके। समकालीन चीनी समाज में ताइपिंग विद्रोहियों को प्रायः ‘लंबे बालों वाले’ कहा जाता था, क्योंकि वे छिंग शासन द्वारा अनिवार्य मांचू शैली की चोटी नहीं रखते थे। उस काल में चीन में केश-विन्यास राजनीतिक निष्ठा का प्रतीक माना जाता था, इसलिए ताइपिंग विद्रोहियों का यह स्वरूप छिंग शासन के प्रति उनके खुले विरोध और स्वतंत्र राजनीतिक पहचान का स्पष्ट प्रतीक बन गया।
ताइपिंग विद्रोह की पृष्ठभूमि
उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक चीन का छिंग राजवंश गंभीर राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक संकटों से घिर चुका था। प्रशासनिक भ्रष्टाचार, वित्तीय अव्यवस्था, प्राकृतिक आपदाएँ, अकाल तथा विदेशी शक्तियों के बढ़ते हस्तक्षेप ने शासन की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचाया। विशेष रूप से प्रथम अफीम युद्ध (1839–1842 ई.) में ब्रिटेन के हाथों पराजय के पश्चात् छिंग शासन की सैन्य दुर्बलता और प्रशासनिक अक्षमता स्पष्ट हो गई। नानछिंग की संधि (1842 ई.) के परिणामस्वरूप विदेशी व्यापार का विस्तार हुआ, किंतु चीन की अर्थव्यवस्था पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अफीम के अवैध आयात, व्यापारिक असंतुलन तथा विदेशी आर्थिक प्रभुत्व के कारण राजस्व व्यवस्था दुर्बल होती गई और ग्रामीण समाज आर्थिक संकट से जूझने लगा। ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। भूमि पर अत्यधिक कर, बढ़ते लगान, साहूकारी व्यवस्था और प्राकृतिक आपदाओं के कारण अनेक कृषक अपनी भूमि छोड़ने के लिए विवश हो गए। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विघटन से बेरोज़गारी, लूटपाट तथा सामाजिक असुरक्षा में वृद्धि हुई। परिणामस्वरूप अनेक गुप्त संगठन, स्थानीय आत्मरक्षा दल तथा सशस्त्र समूह अस्तित्व में आए, जिन्होंने समय-समय पर छिंग शासन के विरुद्ध विद्रोह कर अपना असंतोष व्यक्त किया। इस प्रकार चीन के अनेक प्रांतों में राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक अशांति का वातावरण विकसित हो गया।

जनसंख्या वृद्धि एवं सामाजिक तनाव
अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक चीन की जनसंख्या में तीव्र वृद्धि हुई। लगभग 1766 से 1833 ईस्वी के बीच जनसंख्या लगभग दोगुनी हो गई, जबकि कृषि योग्य भूमि का विस्तार उसी अनुपात में नहीं हो सका। परिणामस्वरूप भूमि पर दबाव बढ़ा, कृषकों की आय में कमी आई तथा ग्रामीण निर्धनता और बेरोज़गारी में निरंतर वृद्धि हुई। दक्षिणी चीन में छिंग शासन का प्रशासन अपेक्षाकृत दुर्बल था और स्थानीय समुदायों तथा कबीलों का प्रभाव अधिक था। विशेष रूप से हाक्का समुदाय में मांचू शासकों के प्रति तीव्र असंतोष व्याप्त था। इसी काल में यूरोपीय ईसाई मिशनरियों की गतिविधियाँ भी बढ़ीं, जिनके माध्यम से पश्चिमी धार्मिक विचार चीन के विभिन्न भागों में फैलने लगे।
होंग श्यूचुआन का उदय (1814–1864 ई.)
होंग श्यूचुआन उन्नीसवीं शताब्दी के चीन में ताइपिंग विद्रोह (1850–1864 ई.) के नेता तथा ‘ताइपिंग स्वर्गीय साम्राज्य’ के स्वर्गीय राजा थे। उन्होंने स्वयं को यीशु मसीह का छोटा भाई घोषित किया और ईसाई धर्म के तत्त्वों पर आधारित एक नए धार्मिक-राजनीतिक आंदोलन का नेतृत्व किया। सिविल सेवा परीक्षाओं में बार-बार असफलता और तत्पश्चात् आए एक स्वप्न के प्रभाव से उन्होंने स्वयं को ईश्वर का पुत्र माना और जनवरी 1851 ईस्वी में छिंग राजवंश के विरुद्ध विद्रोह कर ताइपिंग स्वर्गीय साम्राज्य की स्थापना की। 1853 ईस्वी में उन्होंने नानजिंग (तियानजिंग) पर अधिकार कर उसे राजधानी बनाया। उन्होंने संपत्ति के समान वितरण और सामाजिक समानता पर बल दिया। यह विद्रोह विश्व के सर्वाधिक भीषण गृहयुद्धों में से एक था, जिसमें दो करोड़ से अधिक लोगों की मृत्यु हुई।
होंग श्यूचुआन का आरंभिक जीवन
ताइपिंग आंदोलन के प्रवर्तक होंग श्यूचुआन का जन्म 1 जनवरी 1814 ईस्वी को गुआंगदोंग प्रांत के एक निर्धन हाक्का परिवार में हुआ था। उन्होंने पारंपरिक चीनी प्रशासनिक सेवा में प्रवेश के लिए शाही परीक्षाओं में कई बार भाग लिया, किंतु प्रत्येक बार असफल रहे। 1837 ईस्वी में लगातार असफलता के पश्चात् वे मानसिक रूप से गहरी निराशा में डूब गए। इसी अवधि में उन्होंने कुछ रहस्यमय धार्मिक स्वप्न और दिव्य दर्शन होने का दावा किया। उनके अनुसार स्वप्न में एक दिव्य पुरुष ने उन्हें पृथ्वी से दुष्ट शक्तियों का नाश करने तथा सत्य धर्म की स्थापना का आदेश दिया। परवर्ती वर्षों में उन्होंने इन अनुभवों की व्याख्या ईसाई धर्म की अवधारणाओं के आधार पर की और स्वयं को ईसा मसीह का छोटा भाई घोषित किया।
ईसाई विचारों का प्रभाव
1843 ईस्वी में अंतिम बार शाही परीक्षा में असफल होने के पश्चात् होंग श्यूचुआन ने उन ईसाई पुस्तिकाओं का गंभीर अध्ययन किया जो उन्हें कुछ वर्ष पूर्व एक प्रोटेस्टेंट मिशनरी से प्राप्त हुई थीं। इस अध्ययन के पश्चात् उन्होंने अपने पूर्व धार्मिक अनुभवों को ईसाई धर्म से जोड़ते हुए यह विश्वास व्यक्त किया कि उन्हें ईश्वर द्वारा पृथ्वी से अधर्म, मूर्तिपूजा तथा अन्याय का अंत करने का दायित्व सौंपा गया है। उन्होंने कन्फ्यूशियस परंपरा तथा छिंग शासन को भ्रष्ट और अनैतिक घोषित किया तथा स्वयं को ईश्वर की इच्छा का प्रतिनिधि बताया। 1847 ईस्वी में होंग गुआंगझोउ गए, जहाँ उन्होंने अमेरिकी बैपटिस्ट मिशनरी इस्साकर जैकॉक्स रॉबर्ट्स के निर्देशन में बाइबिल का अध्ययन किया। यद्यपि रॉबर्ट्स ने उन्हें औपचारिक रूप से बपतिस्मा नहीं दिया, तथापि इस अध्ययन ने होंग के धार्मिक विचारों को और अधिक स्पष्ट रूप प्रदान किया। उन्होंने ईसाई धर्म की शिक्षाओं को चीनी सांस्कृतिक परंपराओं और अपनी धार्मिक व्याख्याओं के साथ समन्वित कर एक नवीन धार्मिक विचारधारा विकसित की।
गॉड वर्शिपर्स सोसाइटी की स्थापना
1844 ईस्वी में होंग श्यूचुआन और उनके प्रमुख सहयोगी फेंग यूनशान ने गुआंग्शी प्रांत में ‘गॉड वर्शिपर्स सोसाइटी’ की स्थापना की। यह संगठन ईसाई धर्म, पारंपरिक चीनी धार्मिक मान्यताओं तथा स्थानीय लोक-आस्थाओं के समन्वय पर आधारित था। होंग ने इसे प्राचीन चीनी देवता शांगदी की उपासना के पुनरुत्थान के रूप में प्रस्तुत किया। प्रारंभ में इस संगठन का उद्देश्य धार्मिक प्रचार एवं नैतिक सुधार था, किंतु शीघ्र ही यह मांचू-विरोधी राजनीतिक आंदोलन में परिवर्तित हो गया। आंदोलन को विशेष रूप से निर्धन किसानों, हाक्का समुदाय, खनिकों तथा समाज के वंचित वर्गों का व्यापक समर्थन प्राप्त था।
विद्रोह की प्रारंभिक तैयारी
1840 के दशक के उत्तरार्ध में गॉड वर्शिपर्स सोसाइटी का प्रभाव तीव्र गति से बढ़ने लगा। संगठन के अनुयायियों ने दक्षिणी चीन के अनेक क्षेत्रों में अपना प्रभाव स्थापित किया तथा स्थानीय सशस्त्र समूहों को अपने साथ सम्मिलित कर लिया। छिंग शासन द्वारा इस संगठन के विरुद्ध दमनात्मक कार्रवाइयाँ आरंभ किए जाने पर संघर्ष ने गुरिल्ला युद्ध का रूप धारण कर लिया। इसी काल में यांग श्यूछिंग तथा शियाओ चाओगुई जैसे नेताओं ने यह दावा किया कि वे ईश्वर तथा ईसा मसीह के संदेश सीधे जनता तक पहुँचाने में सक्षम हैं। इससे आंदोलन को धार्मिक वैधता प्राप्त हुई और अनुयायियों की संख्या में तीव्र वृद्धि हुई। यही परिस्थितियाँ 1851 ईस्वी में ताइपिंग विद्रोह के व्यापक विस्फोट का आधार बन गईं।
विद्रोह का प्रारंभ और प्रारंभिक विस्तार (1850–1853 ई.)
ताइपिंग विद्रोह का आरंभ 1850 ईस्वी के उत्तरार्ध में गुआंग्शी प्रांत में हुआ। इसका तात्कालिक कारण छिंग शासन द्वारा गॉड वर्शिपर्स सोसाइटी के अनुयायियों के विरुद्ध चलाया गया दमनात्मक अभियान था। स्थानीय अधिकारियों ने इस धार्मिक संगठन को शासन-विरोधी मानते हुए उसके सदस्यों पर कठोर कार्रवाई आरंभ कर दी, जिसके परिणामस्वरूप आंदोलन ने धार्मिक स्वरूप से आगे बढ़कर सशस्त्र विद्रोह का रूप धारण कर लिया। दिसंबर 1850 ईस्वी के अंत में दोनों पक्षों के बीच प्रारंभिक संघर्ष हुआ और जनवरी 1851 ईस्वी के आरंभ में फेंग यूनशान तथा वेई चांगहुई के नेतृत्व में लगभग दस हज़ार विद्रोहियों ने जिंटियन (गुइपिंग, गुआंग्शी) में छिंग सेना को पराजित किया। इस घटना को ‘जिंतियन विद्रोह’ के नाम से जाना जाता है और इसे ताइपिंग आंदोलन का औपचारिक आरंभ माना जाता है।
ताइपिंग स्वर्गीय राज्य की घोषणा
11 जनवरी 1851 ईस्वी को होंग श्यूचुआन ने स्वयं को ‘स्वर्गीय राजा’ घोषित करते हुए ‘ताइपिंग स्वर्गीय राज्य’ की स्थापना की घोषणा की। इसके साथ ही विद्रोह ने एक संगठित राजनीतिक स्वरूप ग्रहण कर लिया। ताइपिंग नेतृत्व ने स्वयं को छिंग शासन का वैकल्पिक शासक घोषित किया तथा चीन में नई धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया। इस घोषणा के पश्चात् विद्रोहियों की संख्या में तीव्र वृद्धि हुई और दक्षिणी चीन के अनेक किसान, श्रमिक तथा वंचित वर्ग इस आंदोलन से जुड़ने लगे।
सैन्य अभियान और क्षेत्रीय विस्तार
सितंबर 1851 ईस्वी में छिंग सेना के बढ़ते दबाव के कारण ताइपिंग सेनाओं ने उत्तर की ओर कूच किया। शियांग नदी के मार्ग से वे हुनान प्रांत पहुँचे, जहाँ उन्होंने चांगशा की घेराबंदी की तथा युएझोउ पर अधिकार स्थापित किया। तत्पश्चात् यांग्त्सी नदी के मार्ग से आगे बढ़ते हुए दिसंबर 1852 ईस्वी में सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण नगर वुचांग पर अधिकार कर लिया। फरवरी 1853 ईस्वी में विद्रोही सेना ने आनछिंग पर भी नियंत्रण कर लिया, जिससे मध्य चीन में उनका प्रभाव और अधिक सुदृढ़ हो गया।
ताइपिंग आंदोलन के प्रारंभिक चरण में कुछ नेताओं का दक्षिणी चीन के ट्रायड जैसे गुप्त संगठनों से संपर्क था। ताइपिंग प्रशासन द्वारा प्रयुक्त कुछ पदवियाँ और संगठनात्मक परंपराएँ ट्रायड संगठनों से मिलती-जुलती थीं, जिससे इन गुप्त समूहों के कुछ सदस्यों ने विद्रोह का समर्थन किया। 1852 ईस्वी में छिंग शासन ने विद्रोही नेता होंग दाक्वान को बंदी बनाया, जिसने पूछताछ के दौरान स्वयं को ताइपिंग नेतृत्व से संबद्ध बताया। यद्यपि उसके कथनों की ऐतिहासिक प्रामाणिकता संदिग्ध है, तथापि इससे स्पष्ट होता है कि उस समय विभिन्न विद्रोही समूहों के बीच संपर्क स्थापित करने के प्रयास किए जा रहे थे। नानजिंग पर ताइपिंग अधिकार के पश्चात् ट्रायड संगठनों और ताइपिंग नेतृत्व के संबंधों में कटुता उत्पन्न हो गई।
नानजिंग पर अधिकार एवं सैन्य अभियान (1853–1860 ई.)
19 मार्च 1853 ईस्वी को ताइपिंग विद्रोहियों ने नानजिंग पर अधिकार कर लिया, जो इस आंदोलन की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सैन्य सफलता थी। विजय के पश्चात् होंग श्यूचुआन ने नानजिंग का नाम बदलकर तियानजिंग (स्वर्गीय राजधानी) रखा और उसे ‘ताइपिंग स्वर्गीय राज्य’ की राजधानी घोषित किया। सत्ता स्थापित होने के पश्चात् विद्रोहियों ने मांचू समुदाय को छिंग शासन का प्रमुख आधार मानते हुए उनके विरुद्ध व्यापक हिंसात्मक कार्रवाई की। नानजिंग में बड़ी संख्या में मांचू सैनिकों और नागरिकों की हत्या की गई, जो ताइपिंग विद्रोह का सर्वाधिक विवादास्पद और रक्तरंजित अध्याय है। राजधानी स्थापित होने के पश्चात् ताइपिंग नेतृत्व ने राज्य-विस्तार के उद्देश्य से उत्तर तथा पश्चिम दिशा में समानांतर सैन्य अभियान प्रारंभ किए। उत्तरी अभियान अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सका, जबकि पश्चिमी मोर्चे पर विद्रोहियों ने कुछ महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित किया।
तियानजिंग में सत्ता-संघर्ष
नानजिंग पर अधिकार के पश्चात् होंग श्यूचुआन ने प्रशासनिक कार्यों से स्वयं को पर्याप्त सीमा तक अलग कर लिया और शासन का संचालन मुख्यतः लिखित आदेशों के माध्यम से करने लगे। उन्होंने धार्मिक गतिविधियों तथा राजकीय वैभव पर अधिक ध्यान दिया, जबकि दैनिक प्रशासन उनके प्रमुख सहयोगियों के हाथों में चला गया। इस व्यवस्था के परिणामस्वरूप ताइपिंग नेतृत्व के भीतर शक्ति-संघर्ष तीव्र होने लगा। यांग श्यूछिंग ने अपने बढ़ते प्रभाव, व्यापक गुप्तचर तंत्र तथा ईश्वर की ओर से आदेश देने के दावों के माध्यम से अधिक राजनीतिक शक्ति अर्जित कर ली, जिससे होंग श्यूचुआन और अन्य प्रमुख नेताओं में उसके प्रति अविश्वास उत्पन्न हो गया।
तियानजिंग घटना (1856 ई.)
आंतरिक तनाव का चरम रूप 1856 ईस्वी की तियानजिंग घटना के रूप में सामने आया। होंग श्यूचुआन के आदेश पर वेई चांगहुई और छिन रिज़गांग ने यांग श्यूछिंग तथा उसके समर्थकों की हत्या कर दी। इसके पश्चात् सत्ता-संघर्ष और अधिक उग्र हो गया। प्रमुख सेनानायक शी दाकाई ने इस नरसंहार का विरोध किया, जिसके परिणामस्वरूप वेई चांगहुई ने उसके परिजनों और सहयोगियों की भी हत्या करा दी। तत्पश्चात् वेई चांगहुई ने स्वयं होंग श्यूचुआन को सत्ता से हटाने का प्रयास किया, किंतु योजना विफल हो गई और होंग ने वेई चांगहुई तथा छिन रिज़गांग दोनों को मृत्युदंड दिलाया। तत्पश्चात् शी दाकाई को संयुक्त ताइपिंग सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति नियुक्त किया गया, किंतु राजनीतिक असुरक्षा के कारण वह तियानजिंग छोड़कर पश्चिम में सिचुआन क्षेत्र की ओर चला गया। इन घटनाओं ने ताइपिंग आंदोलन की संगठनात्मक एकता और सैन्य क्षमता को गंभीर रूप से दुर्बल कर दिया।
जनसमर्थन एवं विदेशी शक्तियों का दृष्टिकोण
आंतरिक संकट के पश्चात् ताइपिंग नेतृत्व ने पुनः जनसमर्थन तथा यूरोपीय शक्तियों का सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया। यद्यपि कुछ यूरोपीय पर्यवेक्षकों ने प्रारंभ में इस आंदोलन में रुचि दिखाई, किंतु ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य पश्चिमी शक्तियों ने अंततः छिंग शासन को ही वैध सरकार मानते हुए औपचारिक तटस्थता बनाए रखी। व्यवहार में अनेक यूरोपीय सैन्य सलाहकार और अधिकारी छिंग सेना को प्रशिक्षण तथा तकनीकी सहायता प्रदान करने लगे। दूसरी ओर, चीन के परंपरावादी विद्वानों, भूमिधरों तथा कन्फ्यूशी अभिजात वर्ग ने भी ताइपिंग आंदोलन का विरोध किया। ताइपिंग नेतृत्व द्वारा कन्फ्यूशी परंपराओं की आलोचना, धार्मिक कट्टरता तथा सामाजिक जीवन पर कठोर नियंत्रण की नीति के कारण उसे ग्रामीण उच्च वर्ग और स्थानीय अभिजात वर्ग का समर्थन नहीं मिल सका।
छिंग सेना का पुनर्गठन एवं प्रतिरोध
छिंग शासन ने विद्रोह के दमन के लिए प्रांतीय स्तर पर शक्तिशाली सेनाओं का गठन किया। हुनान प्रांत में ज़ेंग गुओफ़ान के नेतृत्व में गठित शियांग सेना ताइपिंग विद्रोह के विरुद्ध सर्वाधिक प्रभावी सैन्य शक्ति सिद्ध हुई। इस सेना ने पश्चिमी मोर्चे पर ताइपिंग विद्रोहियों की प्रगति को क्रमशः रोक दिया और हुबेई तथा जियांग्शी के विस्तृत क्षेत्रों पर पुनः अधिकार स्थापित किया। दिसंबर 1856 ईस्वी में छिंग सेना ने वुचांग पर पुनः अधिकार कर लिया। तत्पश्चात् मई 1858 ईस्वी में जिउजियांग तथा उसी वर्ष सितंबर तक जियांग्शी के अधिकांश भाग पर भी छिंग शासन का नियंत्रण पुनर्स्थापित हो गया।
पुनर्गठन एवं नवीन अभियान
1859 ईस्वी में होंग श्यूचुआन के चचेरे भाई होंग रेनगान तियानजिंग पहुँचे और उन्हें प्रशासन तथा नीति-निर्माण में महत्त्वपूर्ण अधिकार प्रदान किए गए। उन्होंने राज्य के पुनर्गठन तथा क्षेत्रीय विस्तार के लिए अनेक योजनाएँ प्रस्तुत कीं। मई 1860 ईस्वी में ताइपिंग सेनाओं ने नानजिंग की घेराबंदी कर रही छिंग सेना को पराजित कर राजधानी को सुरक्षित कर लिया। तत्पश्चात् उन्होंने दक्षिणी जियांग्सू और झेजियांग जैसे समृद्ध प्रांतों की ओर सफल सैन्य अभियान चलाए। मार्च 1860 ईस्वी में हांगझोउ, मई में चांगझोउ तथा जून में सूझोउ पर ताइपिंग सेनाओं ने अधिकार कर लिया। इन सफलताओं से विद्रोहियों को कुछ बल मिला, किंतु उसी समय ज़ेंग गुओफ़ान की शियांग सेना यांग्त्सी नदी के मार्ग से आगे बढ़ते हुए ताइपिंग राज्य को चारों ओर से घेरने की रणनीति पर कार्य कर रही थी।
ताइपिंग विद्रोह की दुर्बलता एवं पतन (1861–1864 ई.)
1861 ईस्वी के पश्चात् ताइपिंग विद्रोह पतनोन्मुख हो गया। आंतरिक सत्ता-संघर्ष, सैन्य नेतृत्व की दुर्बलताएँ, संसाधनों का अभाव तथा छिंग शासन की पुनर्गठित सेनाओं के बढ़ते दबाव ने ताइपिंग स्वर्गीय राज्य की स्थिति को संकटपूर्ण बना दिया। इसी अवधि में छिंग शासन को पश्चिमी शक्तियों का अप्रत्यक्ष सहयोग भी प्राप्त हुआ, जिससे उसकी सैन्य क्षमता में वृद्धि हुई। विद्रोहियों द्वारा नियंत्रित अधिकांश क्षेत्रों पर क्रमशः छिंग शासन का अधिकार पुनर्स्थापित होने लगा और ताइपिंग नेतृत्व रक्षात्मक स्थिति में पहुँच गया।
शंघाई एवं पूर्वी चीन में असफल अभियान
जून 1861 ईस्वी में ताइपिंग सेनाओं ने शंघाई पर अधिकार करने का प्रयास किया, किंतु यह अभियान असफल रहा। लगभग पंद्रह माह तक चले संघर्ष में छिंग सेना को यूरोपीय अधिकारियों का सहयोग प्राप्त था। फ्रेडरिक टाउनसेंड वार्ड के नेतृत्व में संगठित ‘एवर विक्टोरियस आर्मी’ ने विद्रोहियों की प्रगति को प्रभावी ढंग से रोक दिया। परवर्ती काल में इस सेना का नेतृत्व ब्रिटिश अधिकारी चार्ल्स जॉर्ज गॉर्डन ने संभाला। आधुनिक हथियारों, अनुशासित प्रशिक्षण तथा यूरोपीय सैन्य तकनीक से सुसज्जित इस सेना ने ताइपिंग विद्रोह के दमन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी काल में शियानफ़ेंग सम्राट की मृत्यु के पश्चात् टोंगझी सम्राट के शासनारंभ के दौरान छिंग सेनाओं ने अपनी सैन्य स्थिति और सुदृढ़ की। ज़ेंग गुओफ़ान के नेतृत्व में शियांग सेना ने ब्रिटिश नौसेना की सहायता से यांग्त्सी नदी के मार्गों की नाकेबंदी करते हुए आनछिंग पर अधिकार कर लिया। यह विजय ताइपिंग राज्य के लिए गंभीर आघात थी, क्योंकि आनछिंग नानजिंग की सुरक्षा का प्रमुख केंद्र था।
अंतिम सैन्य अभियान
1861 ईस्वी के उत्तरार्ध में ताइपिंग नेतृत्व ने पूर्वी चीन में अंतिम बड़े अभियान का संचालन किया। दिसंबर 1861 ईस्वी में विद्रोहियों ने निंगबो पर अधिकार कर लिया और हांगझोउ की घेराबंदी के पश्चात् उस पर भी नियंत्रण स्थापित कर लिया। इससे उत्साहित होकर जनवरी 1862 ईस्वी में उन्होंने शंघाई पर पुनः आक्रमण किया, किंतु एवर विक्टोरियस आर्मी तथा छिंग सेना के संयुक्त प्रतिरोध के कारण यह प्रयास विफल हो गया। 1862 ईस्वी में छिंग सेनाओं ने निंगबो सहित अनेक संधि-बंदरगाहों पर पुनः अधिकार कर लिया और यांग्त्सी नदी के किनारे स्थित ताइपिंग के महत्त्वपूर्ण सैन्य अड्डों को क्रमशः अपने नियंत्रण में ले लिया।
छिंग सेना का पुनर्गठन
ताइपिंग विद्रोह के दमन में छिंग शासन की सफलता का एक प्रमुख कारण उसकी सेनाओं का प्रभावी पुनर्गठन था। ज़ेंग गुओफ़ान, ज़ुओ ज़ोंगतांग तथा ली होंगझांग के नेतृत्व में शियांग एवं अन्य प्रांतीय सेनाओं की भर्ती स्थानीय स्तर पर की गई थी तथा सैनिकों को नियमित वेतन, कठोर प्रशिक्षण और सक्षम नेतृत्व प्रदान किया गया था। इस व्यवस्था के कारण सैनिक अपने सेनानायकों के प्रति व्यक्तिगत रूप से निष्ठावान रहे और उनकी रणनीतिक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। 1864 ईस्वी के आरंभ तक छिंग शासन ने चीन के अधिकांश विद्रोहग्रस्त क्षेत्रों पर पुनः अधिकार स्थापित कर लिया था।
नानजिंग की घेराबंदी एवं होंग श्यूचुआन की मृत्यु
मई 1862 ईस्वी में शियांग सेना ने नानजिंग की घेराबंदी आरंभ की, जो लगभग दो वर्षों तक चली। संख्या में अधिक होने के बावजूद ताइपिंग सेना घेराबंदी तोड़ने में असफल रही। नगर में खाद्यान्न और अन्य आवश्यक वस्तुओं का अभाव उत्पन्न हो गया। इस संकट के बीच होंग श्यूचुआन ने अपने अनुयायियों को विश्वास दिलाया कि ईश्वर स्वयं राजधानी की रक्षा करेंगे, किंतु परिस्थितियाँ निरंतर बिगड़ती गईं। जून 1864 ईस्वी में दीर्घकालीन रोग और खाद्यान्न संकट के दौरान होंग श्यूचुआन की मृत्यु हो गई। अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार उनकी मृत्यु कुपोषण तथा विषाक्त वनस्पतियों के सेवन से हुई।
नानजिंग का पतन
होंग श्यूचुआन की मृत्यु के पश्चात् उनके पंद्रह वर्षीय पुत्र होंग तियानगुइफ़ू को उत्तराधिकारी घोषित किया गया, किंतु अनुभवहीन नेतृत्व के कारण विद्रोहियों की स्थिति और अधिक दुर्बल हो गई। जुलाई 1864 ईस्वी में भीषण सड़क-युद्ध के पश्चात् छिंग सेना ने नानजिंग पर पुनः अधिकार कर लिया। राजधानी के पतन के साथ ताइपिंग स्वर्गीय राज्य का वास्तविक अंत हो गया। होंग तियानगुइफ़ू कुछ समर्थकों के साथ निकल भागे, किंतु शीघ्र ही बंदी बना लिए गए और उन्हें मृत्युदंड दिया गया। अधिकांश प्रमुख ताइपिंग नेताओं और राजपरिवार के सदस्यों को भी समाप्त कर दिया गया। तत्पश्चात् ज़ेंग गुओफ़ान के आदेश पर होंग श्यूचुआन का शव कब्र से निकालकर सार्वजनिक रूप से नष्ट कर दिया गया, ताकि उनके अनुयायियों में उनके प्रति पुनः श्रद्धा उत्पन्न न हो सके।
अंतिम प्रतिरोध
नानजिंग के पतन के पश्चात् भी ताइपिंग विद्रोह पूर्णतः समाप्त नहीं हुआ। कुछ विश्वासपात्र सेनानायक उत्तरी झेजियांग, जियांग्शी, फ़ुज़ियान तथा गुआंगदोंग के पर्वतीय क्षेत्रों में संघर्ष करते रहे। अक्टूबर 1864 ईस्वी में होंग तियानगुइफ़ू की गिरफ्तारी के पश्चात् प्रतिरोध क्रमशः दुर्बल पड़ता गया। अंततः जनवरी 1866 ईस्वी में गुआंगदोंग में ताइपिंग के प्रमुख सेनानायक वांग हैयांग की पराजय के साथ संगठित ताइपिंग प्रतिरोध का अंत हो गया।
ताइपिंग विद्रोह के परिणाम
1864 ईस्वी में नानजिंग के पतन के साथ ताइपिंग स्वर्गीय राज्य का अंत हो गया, किंतु विद्रोह का पूर्ण दमन तत्काल संभव नहीं हुआ। इसके पश्चात् भी अनेक ताइपिंग सैनिक विभिन्न क्षेत्रों में संघर्ष करते रहे। अनुमानतः कुछ लाख विद्रोही सैनिक 1864 ईस्वी के पश्चात् भी सक्रिय थे। इनमें लगभग ढाई लाख सैनिक जियांग्शी और फ़ुज़ियान के सीमावर्ती क्षेत्रों में छिंग शासन के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे। अंततः अगस्त 1871 ईस्वी में शी दाकाई के पूर्व अनुयायियों से बने अंतिम प्रमुख ताइपिंग सैन्य दल को ली फ़ुज़ोंग के नेतृत्व वाली सरकारी सेनाओं ने हुनान, गुइझोउ और गुआंग्शी की सीमा के निकट पराजित कर समाप्त कर दिया। इसके साथ ही ताइपिंग विद्रोह का अंतिम संगठित प्रतिरोध भी समाप्त हो गया।
वियतनाम और दक्षिण-पूर्व एशिया पर प्रभाव
ताइपिंग विद्रोह का प्रभाव केवल चीन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया के सीमावर्ती क्षेत्रों तक भी पहुँचा। चीन-वियतनाम सीमा क्षेत्र में विद्रोह से जुड़े अनेक सशस्त्र समूह सक्रिय हो गए।
1860 ईस्वी में ज़ुआंग जाति के ताइपिंग नेता वु लिंग्युन ने सीमा क्षेत्र में एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का प्रयास किया और स्वयं को उसका शासक घोषित किया, किंतु 1868 ईस्वी में छिंग शासन के सैन्य अभियान द्वारा उसका राज्य नष्ट कर दिया गया। उसका पुत्र वु याज़ोंग (वु कुन) वियतनाम भाग गया, जहाँ 1869 ईस्वी में थाई गुयेन क्षेत्र में छिंग-वियतनामी संयुक्त सेना ने उसे पराजित कर मार डाला। वु कुन की सेना के विघटन के पश्चात् उसके अनेक सैनिक लघु सशस्त्र समूहों में विभाजित हो गए। इनमें हुआंग चोंगयिंग के नेतृत्व वाली ‘येलो फ्लैग आर्मी’ और लियू योंगफ़ू के नेतृत्व वाली ‘ब्लैक फ्लैग आर्मी’ प्रमुख थीं। लियू योंगफ़ू परवर्ती काल में उत्तरी वियतनाम (टोंकिन) क्षेत्र के एक प्रभावशाली सैन्य नेता बन गए। 1880 के दशक में चीन-फ्रांस युद्ध के दौरान उन्होंने फ्रांसीसी सेनाओं के विरुद्ध गुयेन राजवंश की सहायता की और ताइवान में स्थापित अल्पकालिक फॉर्मोसा गणराज्य के दूसरे तथा अंतिम नेता के रूप में भी भूमिका निभाई।
सशस्त्र समूहों का प्रसार
ताइपिंग विद्रोह के पश्चात् आधुनिक हथियारों से लैस अनेक विद्रोही एवं सैन्य समूह डाकू दलों में परिवर्तित हो गए। इन समूहों ने दक्षिण-पश्चिमी चीन और लाओस क्षेत्र के आसपास व्यापक लूटपाट की। परवर्ती काल में इनमें से कई समूहों ने तथाकथित ‘हो युद्धों’ में भाग लिया, जिन्हें कभी-कभी भ्रमवश चीनी मुस्लिम समूहों से संबंधित मान लिया जाता है। ये संघर्ष 1890 ईस्वी तक चलते रहे, जब अंततः क्षेत्रीय सरकारों की सेनाओं ने इन सशस्त्र समूहों का दमन किया।
समकालीन विद्रोह एवं ताइपिंग आंदोलन की नीतियाँ
ताइपिंग विद्रोह (1851–1864 ई.) के काल में छिंग राजवंश को केवल एक ही विद्रोह का सामना नहीं करना पड़ा, बल्कि चीन के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक अन्य विद्रोह भी सक्रिय थे। इनमें नियान विद्रोह (1853–1868 ई.), दक्षिण-पश्चिम चीन का पंथी विद्रोह (1855–1873 ई.) तथा उत्तर-पश्चिम चीन का दुंगन विद्रोह (1862–1877 ई.) प्रमुख थे। इन विद्रोहों ने छिंग शासन की प्रशासनिक एवं सैन्य क्षमता को अत्यधिक दुर्बल कर दिया, जिससे सरकार के लिए एक साथ कई मोर्चों पर संघर्ष करना कठिन हो गया।
नियान विद्रोह (1853–1868 ई.)
नियान विद्रोहियों और ताइपिंग विद्रोहियों के बीच अनेक अवसरों पर सहयोग स्थापित हुआ। नियान विद्रोहियों ने ताइपिंग सेना के उत्तरी अभियान के दौरान उनका साथ दिया। 1864 ईस्वी में नानजिंग के पतन के पश्चात् जब ताइपिंग आंदोलन दुर्बल होने लगा, तब अनेक पूर्व ताइपिंग सेनानायक और सैनिक नियान सेना में सम्मिलित हो गए। लाई वेनगुआंग जैसे प्रमुख ताइपिंग नेता भी परवर्ती काल में नियान आंदोलन से जुड़ गए। इसी प्रकार 1854–1856 ईस्वी के रेड टर्बन विद्रोह की विफलता के पश्चात् उसके कुछ सैनिक उत्तर की ओर चले गए और शी दाकाई की सेना में सम्मिलित हो गए। सिचुआन में ली योंगहे और लान चाओडिंग के नेतृत्व वाले विद्रोह के दमन के पश्चात् बचे हुए विद्रोही शान्शी (शांक्सी) क्षेत्र में ताइपिंग सेनाओं के साथ जुड़ गए। शंघाई में स्मॉल स्वॉर्ड्स सोसाइटी के विद्रोह के अवशेष सैनिकों ने भी ताइपिंग सेना के साथ पुनर्गठन का प्रयास किया।
पंथी विद्रोह (1855–1873 ई.)
दक्षिण-पश्चिम चीन के युन्नान क्षेत्र में हुआ पंथी विद्रोह भी छिंग शासन के लिए गंभीर चुनौती था। इसका नेतृत्व डू वेनश्यू ने किया, जो ताइपिंग स्वर्गीय राज्य के नेताओं के संपर्क में थे। यह आंदोलन केवल धार्मिक या जातीय संघर्ष नहीं था, बल्कि मुख्यतः छिंग शासन के विरुद्ध राजनीतिक विद्रोह था। डू वेनश्यू का उद्देश्य मांचू शासित छिंग राजवंश को समाप्त करना था, न कि हान चीनी समुदाय के विरुद्ध संघर्ष करना। इस विद्रोह में केवल मुस्लिम समुदाय के लोग ही सम्मिलित नहीं थे, बल्कि हान चीनी, ली, बाई और हानी समुदायों के लोगों ने भी डू वेनश्यू का समर्थन किया। कुछ शान, काचिन तथा पर्वतीय जनजातियों ने भी इस आंदोलन में सहयोग दिया। इस प्रकार यह विद्रोह छिंग-विरोधी व्यापक क्षेत्रीय आंदोलन का स्वरूप ग्रहण कर गया।
दुंगन विद्रोह (1862–1877 ई.)
उत्तर-पश्चिम चीन का दुंगन विद्रोह पंथी विद्रोह से भिन्न प्रकृति का था। इसका उद्देश्य प्रारंभ में छिंग राजवंश को उखाड़ फेंकना नहीं था। इसके प्रमुख नेता मा हुआलोंग ने छिंग शासन से राजकीय उपाधि स्वीकार की थी। यह विद्रोह मुख्यतः हुई मुस्लिम समुदाय और हान चीनी समूहों के बीच उत्पन्न स्थानीय संघर्षों और आपसी तनाव का परिणाम था। आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार दुंगन विद्रोह 1862 ईस्वी में आरंभ हुआ और यह किसी पूर्व नियोजित व्यापक योजना का परिणाम नहीं था। इसका उद्भव स्थानीय विवादों, अफवाहों और सामुदायिक तनावों से हुआ। उस समय यह अफवाह फैली कि हुई मुसलमान ताइपिंग विद्रोहियों की सहायता कर रहे हैं, जिससे दोनों समुदायों के बीच संघर्ष और प्रबल हो गया। हुई नेता मा शियाओशी ने शान्शी क्षेत्र के मुस्लिम विद्रोह को ताइपिंग आंदोलन से संबंधित बताया था। इतिहासकार जोनाथन स्पेंस के अनुसार ताइपिंग विद्रोह की असफलता का एक प्रमुख कारण यह था कि वह चीन के अन्य समकालीन विद्रोहों के साथ प्रभावी समन्वय स्थापित नहीं कर सका।
ताइपिंग स्वर्गीय राज्य की नीतियाँ
ताइपिंग नेतृत्व ने अपने नियंत्रित क्षेत्रों में व्यापक सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक सुधारों की घोषणा की। इन नीतियों का उद्देश्य पारंपरिक चीनी समाज में मूलभूत परिवर्तन लाना था। विद्रोहियों ने स्त्री-पुरुष समानता की अवधारणा प्रस्तुत की, यद्यपि व्यवहार में उन्होंने दोनों के लिए कठोर पृथक्करण की व्यवस्था लागू की। उन्होंने पैरों को बाँधने की प्रथा का विरोध किया, भूमि के सामूहिकीकरण का समर्थन किया तथा निजी व्यापार पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने क्षेत्रों में अफीम के आयात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। धार्मिक क्षेत्र में ताइपिंग शासन ने पारंपरिक कन्फ्यूशियसवाद, बौद्ध धर्म और चीनी लोक धार्मिक मान्यताओं के स्थान पर अपनी विशिष्ट धार्मिक व्यवस्था, ताइपिंग ईसाई धर्म अथवा ईश्वर पूजा को स्थापित किया। होंग श्यूचुआन का विश्वास था कि वे ईश्वर के पुत्र हैं और ईसा मसीह उनके अग्रज हैं। इसी विचारधारा के आधार पर उन्होंने अपने धार्मिक सिद्धांतों को राज्य की आधिकारिक नीति बनाया।
धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन
ताइपिंग शासन ने कन्फ्यूशियस परंपराओं का तीव्र विरोध किया। होंग श्यूचुआन का मानना था कि कन्फ्यूशियसवाद अपने मूल उद्देश्यों से भटक चुका है और छिंग शासन द्वारा हान जनता पर नियंत्रण बनाए रखने का साधन बन गया है। इसीलिए अनेक स्थानों पर कन्फ्यूशियस मंदिरों, ग्रंथालयों और धार्मिक संस्थानों को नष्ट किया गया अथवा उन्हें नए धार्मिक केंद्रों, अस्पतालों तथा पुस्तकालयों में परिवर्तित कर दिया गया। पारंपरिक विचारकों की रचनाओं को नष्ट किया गया और मूर्ति-पूजा का विरोध करते हुए अनेक धार्मिक प्रतिमाएँ तोड़ी गईं।
प्रारंभिक काल में विदेशी मिशनरियों ने ताइपिंग के मूर्ति-विरोधी अभियान का समर्थन किया, क्योंकि वे इसे ईसाई धर्म के प्रसार के अनुकूल मानते थे। किंतु परवर्ती काल में वे ताइपिंग आंदोलन की धार्मिक कट्टरता और हिंसात्मक प्रवृत्तियों से चिंतित होने लगे।
सामाजिक नियंत्रण की नीति
ताइपिंग शासन ने नैतिक अनुशासन स्थापित करने के लिए स्त्री और पुरुषों के बीच कठोर पृथक्करण की नीति अपनाई। प्रारंभिक वर्षों में यह नियम अत्यंत कठोरता से लागू किया गया। यहाँ तक कि परिवार के सदस्यों और विवाहित दंपतियों के बीच भी संपर्क सीमित कर दिया गया। इस कठोर नीति के पीछे धार्मिक नियमों की एक विशेष व्याख्या थी, जिसमें व्यभिचार के साथ-साथ सभी प्रकार की यौन स्वतंत्रता को निषिद्ध माना गया। कालक्रम के साथ इन नियमों में कुछ शिथिलता आई, किंतु प्रारंभिक ताइपिंग शासन की सामाजिक व्यवस्था अत्यधिक अनुशासित और नियंत्रित थी।
ताइपिंग विद्रोह की सैन्य व्यवस्था
सैन्य संगठन एवं अनुशासन
ताइपिंग विद्रोहियों ने ऐसी नवीन एवं प्रभावशाली सैन्य रणनीतियों का प्रयोग किया जिनसे एक काल में छिंग राजवंश की सत्ता गंभीर संकट में पड़ गई। अनेक इतिहासकारों ने ताइपिंग सैन्य व्यवस्था को सत्रहवीं शताब्दी के पश्चात् चीन में हुए महत्त्वपूर्ण सैन्य प्रयोगों में से एक माना है। इस सेना में कठोर अनुशासन, धार्मिक उत्साह और संगठनात्मक क्षमता का विशेष महत्त्व था। सैनिक सामान्यतः लाल जैकेट और नीली पतलून पहनते थे तथा अपने बाल लंबे रखते थे, इसीलिए छिंग शासन के समर्थक उन्हें ‘लंबे बालों वाले’ कहकर संबोधित करते थे। ताइपिंग सेना की एक विशेषता इसमें महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भागीदारी थी। विद्रोह के प्रारंभिक वर्षों में बड़ी संख्या में महिलाएँ सैनिक और सहायक भूमिकाओं में सम्मिलित थीं, जिससे यह सेना उन्नीसवीं शताब्दी की अन्य समकालीन सेनाओं से भिन्न दिखाई देती थी। होंग शुआनजियाओ, सु सानियांग और किउ एरसाओ जैसी महिलाएँ ताइपिंग सेना की प्रमुख सेनानायिकाओं के रूप में प्रसिद्ध हुईं। यद्यपि 1853 ईस्वी के पश्चात् सेना में महिलाओं की संख्या क्रमशः कम होने लगी और सैन्य नेतृत्व मुख्यतः पुरुषों के हाथों में केंद्रित हो गया।
युद्ध नीति एवं रणनीति
ताइपिंग सेना के युद्ध अत्यंत हिंसात्मक और रक्तरंजित होते थे। दोनों पक्षों द्वारा भारी संख्या में सैनिकों का प्रयोग किया जाता था, किंतु निर्णायक विजय प्राप्त करना कठिन होता था। युद्धों में तोपखाने का उपयोग सीमित था, जबकि लघु हथियारों और पारंपरिक युद्ध तकनीकों का व्यापक प्रयोग किया जाता था, जिसके परिणामस्वरूप भारी जनहानि होती थी। ताइपिंग सेना की प्रमुख रणनीति महत्त्वपूर्ण नगरों पर अधिकार करना, वहाँ अपनी प्रशासनिक एवं सैन्य स्थिति सुदृढ़ करना तथा आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से किसानों की भर्ती कर अपनी शक्ति बढ़ाना थी। इस नीति के माध्यम से उन्होंने नगरों और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच एक सैन्य नेटवर्क स्थापित करने का प्रयास किया, जो प्रारंभिक वर्षों में उनकी तीव्र सफलता का प्रमुख आधार बना।
सेना का आकार एवं संगठन
1852 ईस्वी तक ताइपिंग सेना की संख्या लगभग पाँच लाख सैनिकों तक पहुँच गई थी। इसका संगठन प्राचीन चीन के चिन राजवंश की सैन्य व्यवस्था से प्रेरित माना जाता है। सेना बड़े सैन्य दलों में विभाजित थी और प्रत्येक प्रमुख सैन्य इकाई में लगभग तेरह हज़ार सैनिक होते थे, जिन्हें आगे लघु दलों में संगठित किया जाता था। इस प्रकार एक केंद्रीकृत और अनुशासित सैन्य संरचना विकसित की गई। मुख्य नियमित सेना के अतिरिक्त आंदोलन का समर्थन करने वाले अनेक स्थानीय समूह भी थे जिनके पास स्वतंत्र अनियमित सेनाएँ थीं और जो आवश्यकता पड़ने पर मुख्य ताइपिंग सेना को सहायता प्रदान करते थे।
आधुनिक हथियार एवं सैन्य तकनीक
ताइपिंग विद्रोही आधुनिक हथियारों के महत्त्व को समझते थे और उन्होंने विदेशी व्यापारियों से बंदूकें, तोपें तथा गोला-बारूद प्राप्त किए। यद्यपि किसी विदेशी सरकार ने आधिकारिक रूप से उनका समर्थन नहीं किया, तथापि निजी विदेशी व्यापारियों के माध्यम से आधुनिक हथियारों की आपूर्ति होती रही। 1853 ईस्वी तक वे विदेशी हथियारों का उपयोग करने लगे थे। शंघाई स्थित विदेशी रियायत क्षेत्रों के माध्यम से होने वाली इस गतिविधि के कारण छिंग शासन और विदेशी शक्तियों के बीच तनाव उत्पन्न हुआ। अप्रैल 1862 ईस्वी में एक अमेरिकी हथियार व्यापारी द्वारा ताइपिंग विद्रोहियों को बड़ी मात्रा में हथियार उपलब्ध कराए गए, जिनमें मस्कट बंदूकें, कार्बाइन, राइफलें और तोपें सम्मिलित थीं।
ताइपिंग विद्रोही हथियार खरीदने के साथ-साथ उनका निर्माण भी करते थे। उन्होंने अपने नियंत्रित क्षेत्रों में हथियार निर्माण केंद्र स्थापित किए। 1862 ईस्वी में एक पश्चिमी पर्यवेक्षक ने उल्लेख किया कि नानजिंग के ताइपिंग कारखानों में छिंग सेना की तुलना में उत्कृष्ट गुणवत्ता वाले हथियार और भारी तोपें बनाई जा रही थीं। इसके अतिरिक्त उन्होंने युद्ध में प्राप्त आधुनिक उपकरणों को भी अपने शस्त्रागार के विस्तार में प्रयुक्त किया।
युद्ध कौशल एवं किलेबंदी
ताइपिंग सेना ने युद्ध में अनेक नवीन तकनीकों का प्रयोग किया। 1853 ईस्वी के पश्चात् कुछ विदेशी पर्यवेक्षकों ने उनके सैन्य अभियानों का प्रत्यक्ष अध्ययन किया। विद्रोही सैनिक कठिन परिस्थितियों में भी साहस बनाए रखते थे और शीघ्रता से सुरक्षा व्यवस्था स्थापित करने में सक्षम थे। वे अस्थायी किलेबंदी, चलित पुलों तथा घेराबंदी की रणनीतियों का प्रभावी उपयोग करते थे। उनकी एक प्रमुख युद्ध नीति शत्रु के ठिकानों को चारों ओर से घेरकर अग्नि लगा देना थी। जब छिंग सैनिक एक-एक करके बाहर निकलने का प्रयास करते, तब ताइपिंग सैनिक उन पर आक्रमण करते। इस प्रकार वे सीमित संसाधनों के बावजूद अनेक बार शक्तिशाली छिंग सेनाओं को पराजित करने में सफल रहे।
नौसैनिक शक्ति
ताइपिंग विद्रोहियों ने एक लघु नौसेना भी विकसित की थी, जिसमें मुख्यतः वे नावें सम्मिलित थीं जो छिंग सेना से अधिकृत की गई थीं। यह नौसेना यांग्त्सी नदी और उसकी सहायक नदियों में सक्रिय रहती थी तथा सैनिकों और सैन्य सामग्री के परिवहन में सहायता करती थी। इसके प्रमुख अधिकारियों में तांग झेंगकाई — जिन्हें ‘हांग छिंग’ की उपाधि प्राप्त थी — का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस सीमित नौसैनिक शक्ति ने नदी क्षेत्रों में ताइपिंग सेनाओं की गतिविधियों को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ताइपिंग सेना की जातीय संरचना
ताइपिंग विद्रोह के प्रारंभिक चरण में इसकी सेना मुख्यतः हाक्का समुदाय, गुआंगदोंग के स्थानीय निवासियों तथा ज़ुआंग समुदाय के लोगों से बनी थी। हाक्का हान चीनी समाज का एक उपसमूह था, जबकि ज़ुआंग एक गैर-हान जातीय समुदाय था। इन समुदायों ने प्रारंभिक वर्षों में ताइपिंग आंदोलन को महत्त्वपूर्ण समर्थन दिया। जैसे-जैसे ताइपिंग राज्य का विस्तार यांग्त्सी नदी के डेल्टा क्षेत्र तक हुआ और नानजिंग तथा सूझोउ जैसे प्रमुख नगर उसके नियंत्रण में आए, सेना की संरचना में भी परिवर्तन होने लगा। तत्पश्चात् ताइपिंग सेना में स्थानीय जनसंख्या की भागीदारी बढ़ी और यांग्त्सी डेल्टा क्षेत्र के लोगों की भर्ती बड़े पैमाने पर होने लगी। दीर्घकालीन युद्ध के परिणामस्वरूप आनहुई, दक्षिणी जियांग्सू, उत्तरी झेजियांग और उत्तरी जियांग्शी जैसे क्षेत्रों की जनसंख्या में भारी कमी आई तथा युद्ध, अकाल और विस्थापन के कारण इन क्षेत्रों की सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था अत्यधिक प्रभावित हुई।
ताइपिंग आंदोलन की सामाजिक पृष्ठभूमि
ताइपिंग विद्रोहियों का सामाजिक आधार मुख्यतः निम्न वर्गों में था। इसके अधिकांश सैनिक किसान, श्रमिक और समाज के वंचित वर्गों से आते थे। दक्षिणी ताइपिंग सेना के अनेक सैनिक पहले खनिक (खनन श्रमिक) थे, विशेष रूप से ज़ुआंग समुदाय से संबंधित लोग।
ताइपिंग नेतृत्व में पारंपरिक शाही अभिजात वर्ग या प्रशासनिक वर्ग के लोगों की संख्या अत्यल्प थी। अधिकांश नेता और सैनिक छिंग शासन की नौकरशाही व्यवस्था से बाहर के लोग थे और उनमें से प्रायः कोई भी बड़े भूमिधर वर्ग से संबंधित नहीं था। इसके विपरीत, जिन क्षेत्रों पर ताइपिंग सेनाओं ने अधिकार स्थापित किया वहाँ अनेक भूमिधरों को छिंग शासन का समर्थक होने के कारण दंडित किया गया और कई स्थानों पर उनकी हत्या भी कर दी गई।
छिंग राजवंश की सैन्य व्यवस्था
ताइपिंग विद्रोह का सामना करने के लिए छिंग राजवंश ने विशाल सैन्य शक्ति का प्रयोग किया। छिंग सेना में दस लाख से अधिक नियमित सैनिकों के अतिरिक्त बड़ी संख्या में क्षेत्रीय मिलिशिया और विदेशी प्रशिक्षित सैनिक भी सम्मिलित थे। प्रारंभिक काल में केंद्रीय छिंग सेना ताइपिंग विद्रोहियों को प्रभावी रूप से पराजित करने में असफल रही, इसलिए प्रांतीय स्तर पर संगठित सेनाओं पर निर्भरता बढ़ाई गई।
छिंग शासन की सर्वप्रसिद्ध सैन्य इकाइयों में ‘एवर विक्टोरियस आर्मी’ (सदैव विजयी सेना) प्रमुख थी। यह चीनी सैनिकों से बनी एक आधुनिक सैन्य टुकड़ी थी, जिसका नेतृत्व फ्रेडरिक टाउनसेंड वार्ड और परवर्ती काल में चार्ल्स जॉर्ज गॉर्डन जैसे पश्चिमी अधिकारियों ने किया। इस सेना को यूरोपीय हथियार कंपनियों से आधुनिक शस्त्र प्राप्त होते थे, जिससे इसकी युद्ध क्षमता में वृद्धि हुई।
शियांग सेना एवं प्रांतीय सेनाओं की भूमिका
छिंग शासन की सफलता में ज़ेंग गुओफ़ान के नेतृत्व वाली शियांग सेना की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। यह एक प्रांतीय सेना थी, जिसे स्थानीय स्तर पर संगठित किया गया था। इसके अतिरिक्त हुनान के प्रसिद्ध सेनानायक ज़ुओ ज़ोंगतांग ने भी ताइपिंग विद्रोह के दमन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। छिंग राजवंश के प्रत्यक्ष नियंत्रण वाली पारंपरिक सेनाएँ विद्रोह को समाप्त करने में प्रभावी नहीं रहीं, किंतु स्थानीय अभिजात वर्ग और प्रांतीय नेताओं के नेतृत्व में गठित योंग यिंग सेनाओं ने अधिक सफलता प्राप्त की। इन सेनाओं ने स्थानीय संसाधनों, सैनिकों और नेतृत्व का उपयोग करते हुए ताइपिंग शक्ति को क्रमशः दुर्बल कर दिया।
ऐतिहासिक अभिलेखों की समस्या
यद्यपि शाही चीन में प्रशासनिक अभिलेख रखने की परंपरा विकसित थी, तथापि ताइपिंग विद्रोह से संबंधित विश्वसनीय आँकड़े प्राप्त करना कठिन है। इसका मुख्य कारण यह था कि युद्ध के दौरान सैन्य संगठन अत्यधिक विकेंद्रीकृत था और छिंग शासन को विभिन्न क्षेत्रीय सेनाओं पर निर्भर रहना पड़ा। यह एक व्यापक गृहयुद्ध था, जिसके कारण अनेक प्रशासनिक और सैन्य अभिलेख नष्ट हो गए। ताइपिंग स्वर्गीय राज्य के पतन के पश्चात् उसके अधिकांश दस्तावेज नष्ट हो गए और अनुमानतः उसके मूल अभिलेखों का केवल एक लघु भाग ही सुरक्षित रह सका। इस कारण विद्रोह की सैन्य शक्ति, जनहानि और प्रशासनिक व्यवस्था के संबंध में उपलब्ध स्रोत सीमित और अपूर्ण हैं।
ताइपिंग सेना की स्थिति
ताइपिंग विद्रोह के दीर्घकालीन संघर्ष के दौरान विद्रोही सेना को भारी जनहानि और संगठनात्मक संकट का सामना करना पड़ा। अनुमान के अनुसार ताइपिंग पक्ष में भर्ती हुए लगभग नब्बे प्रतिशत सैनिक या तो युद्ध में मारे गए या उन्होंने छिंग शासन का साथ स्वीकार कर लिया। निरंतर युद्ध, संसाधनों की न्यूनता और छिंग सेनाओं के बढ़ते दबाव के कारण ताइपिंग सेना की शक्ति क्रमशः दुर्बल होती गई। छिंग राजवंश ने ताइपिंग विद्रोह को समाप्त करने के लिए अपनी नियमित सेनाओं के साथ-साथ क्षेत्रीय सैन्य संगठनों और स्थानीय मिलिशिया का व्यापक उपयोग किया। छिंग सेना की संरचना विभिन्न सैन्य इकाइयों से मिलकर बनी थी, जिनमें पारंपरिक मांचू सेना, हान चीनी सैनिकों की इकाइयाँ और आधुनिक प्रशिक्षण प्राप्त विशेष सेनाएँ सम्मिलित थीं।
छिंग सेना की प्रमुख सैन्य इकाइयाँ
एट बैनर्स आर्मी छिंग राजवंश की पारंपरिक सैन्य शक्ति थी, जिसमें लगभग ढाई लाख सैनिक सम्मिलित थे। यह सेना मुख्यतः मांचू शासक वर्ग की सैन्य व्यवस्था पर आधारित थी और छिंग शासन की परंपरागत शक्ति का प्रतीक मानी जाती थी। ग्रीन स्टैंडर्ड आर्मी छिंग साम्राज्य की एक अन्य प्रमुख नियमित सेना थी। 1851 ईस्वी में इसकी संख्या लगभग छह लाख ग्यारह हज़ार सैनिकों की थी। यह सेना मुख्यतः हान चीनी सैनिकों से बनी थी और साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में प्रशासनिक एवं सैन्य नियंत्रण बनाए रखने में प्रयुक्त होती थी। शियांग सेना छिंग शासन की सर्वाधिक प्रभावशाली क्षेत्रीय सेनाओं में से एक थी। हुनान प्रांत में ज़ेंग गुओफ़ान के नेतृत्व में गठित इस सेना में लगभग एक लाख तीस हज़ार सैनिक थे और ताइपिंग विद्रोह के दमन में इसकी निर्णायक भूमिका रही। हुआई सेना आनहुई क्षेत्र में संगठित की गई थी और इसमें लगभग साठ से सत्तर हज़ार सैनिक सम्मिलित थे। ली होंगझांग के नेतृत्व में इस सेना ने भी विद्रोह दमन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। चू सेना 1864 ईस्वी तक लगभग चालीस हज़ार सैनिकों वाली एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय सेना बन चुकी थी। एवर विक्टोरियस आर्मी एक लघु किंतु आधुनिक सैन्य इकाई थी, जिसमें 1862 ईस्वी में लगभग साढ़े तीन से पाँच हज़ार सैनिक थे। पश्चिमी अधिकारियों के नेतृत्व और आधुनिक हथियारों के कारण इसे विशेष सफलता मिली।
पश्चिमी शक्तियों के साथ ताइपिंग सरकार के संबंध
ताइपिंग स्वर्गीय राज्य के पश्चिमी शक्तियों के साथ संबंध जटिल और परिवर्तनशील थे। ताइपिंग आंदोलन की धार्मिक विचारधारा के कारण उसके नेता पश्चिमी लोगों को विदेशी शत्रु नहीं, बल्कि धार्मिक दृष्टि से ‘विदेशों से आए भाई-बहन’ मानते थे। इसीलिए उन्होंने विशेष रूप से ईसाई मिशनरियों के प्रति प्रारंभिक वर्षों में सहानुभूतिपूर्ण नीति अपनाई। 1853 ईस्वी में होंग श्यूचुआन ने अमेरिकी बैपटिस्ट मिशनरी इस्साकर जैकॉक्स रॉबर्ट्स को नानजिंग आने का निमंत्रण दिया ताकि वह ताइपिंग सरकार के प्रशासनिक कार्यों में सहायता कर सकें। परवर्ती काल में 1861 ईस्वी में नानजिंग पहुँचने पर रॉबर्ट्स को विदेशी मामलों के निदेशक का पद प्रदान किया गया।
पश्चिमी देशों की बदलती धारणा
प्रारंभिक चरण में कुछ पश्चिमी मिशनरियों और अधिकारियों को ताइपिंग आंदोलन के प्रति आशा थी। वे इसे एक धार्मिक सुधार आंदोलन के रूप में देखते थे और मानते थे कि इसके माध्यम से चीन में ईसाई प्रभाव तथा व्यापारिक संबंधों का विस्तार हो सकता है, किंतु इस आंदोलन को लेकर पश्चिमी जगत में एकमत विचार नहीं था। इतिहासकार प्रेस्कॉट क्लार्क के अनुसार चीन में निवासरत पश्चिमी लोग ताइपिंग विद्रोह के संबंध में दो समूहों में विभाजित थे। एक वर्ग विद्रोहियों को केवल अवसरवादी लुटेरा मानता था, जिनका उद्देश्य छिंग शासन के विरुद्ध विद्रोह कर धन और सत्ता प्राप्त करना था। दूसरा वर्ग उन्हें धार्मिक उत्साह से प्रेरित कट्टरपंथी मानता था, जिन्हें सक्षम नेतृत्व ने छिंग शासन के विरुद्ध संघर्ष के लिए संगठित किया था।
इतिहासकार यूजीन पी. बोर्डमैन के अनुसार 1842–1844 ईस्वी की संधियों के पश्चात् ब्रिटिश और अमेरिकी अधिकारी छिंग शासन की व्यापार-नीतियों से असंतुष्ट थे। उन्हें आशा थी कि ताइपिंग सरकार के ईसाई स्वरूप के कारण पश्चिमी देशों के साथ अधिक अनुकूल व्यापारिक संबंध स्थापित हो सकते हैं। 1863 और 1864 ईस्वी के बीच अनेक पश्चिमी अधिकारियों ने नानजिंग का दौरा किया। अमेरिकी अधिकारी रॉबर्ट मिलिगन मैक्लेन ने तो ताइपिंग सरकार को आधिकारिक मान्यता देने की संभावना पर भी विचार किया था।
पश्चिमी समर्थन में परिवर्तन
कालक्रम के साथ पश्चिमी मिशनरियों और अधिकारियों की ताइपिंग आंदोलन के प्रति धारणा बदलने लगी। अमेरिकी मिशनरी डिवी बेथ्यून मैककार्टी ने नानजिंग की यात्रा के पश्चात् वहाँ की स्थिति को अत्यंत विनाशकारी बताया और लिखा कि उन्हें वहाँ वास्तविक ईसाई धर्म का कोई स्पष्ट प्रमाण दिखाई नहीं दिया। इसी प्रकार होंग श्यूचुआन के विदेशी मामलों के निदेशक इस्साकर रॉबर्ट्स ने भी ताइपिंग धार्मिक व्यवस्था को केवल बाहरी प्रदर्शन बताते हुए उसकी वास्तविक धार्मिक उपयोगिता पर प्रश्न उठाए।
द्वितीय अफीम युद्ध की समाप्ति के पश्चात् फरवरी 1861 ईस्वी में ब्रिटिश नौसेना अधिकारी सर जेम्स होप ने नानजिंग की यात्रा की। यह पश्चिमी पर्यवेक्षकों के सर्ववृहत् अभियानों में से एक था, जिसमें ब्रिटिश सैन्य अधिकारी, व्यापारी, मिशनरी तथा फ्रांसीसी प्रतिनिधि सम्मिलित थे। यात्रा के पश्चात् अनेक पर्यवेक्षकों ने ताइपिंग नियंत्रित क्षेत्रों की स्थिति को अत्यंत शोचनीय बताया और नागरिकों के विरुद्ध हिंसा की घटनाओं का उल्लेख किया। 1861 ईस्वी के अंत में जेम्स होप ने शंघाई पर आक्रमण न करने के लिए ताइपिंग नेतृत्व से समझौता करने का प्रयास किया, किंतु ताइपिंग सरकार ने इसे अस्वीकार कर दिया। इसके पश्चात् ब्रिटेन और फ्रांस का रवैया विद्रोहियों के प्रति और कठोर हो गया। पश्चिमी शक्तियों ने अंततः छिंग शासन को सहायता प्रदान की, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि ताइपिंग विद्रोह की सफलता से एक शक्तिशाली चीन का उदय होगा, जो भविष्य में पश्चिमी हितों को चुनौती दे सकता है।
ताइपिंग विद्रोह का पूर्ण युद्ध स्वरूप
ताइपिंग विद्रोह केवल एक राजनीतिक या सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि यह एक व्यापक पूर्ण युद्ध का स्वरूप ले चुका था। ताइपिंग स्वर्गीय राज्य ने अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में रहने वाले प्रायः सभी सक्षम पुरुषों को सैन्य प्रशिक्षण देकर युद्ध में सम्मिलित किया। ताइपिंग परिवार पंजीकरण व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक परिवार से एक वयस्क पुरुष को सेना में भर्ती करना अनिवार्य था। इस प्रकार ताइपिंग शासन में नागरिक और सैनिक के बीच का अंतर अत्यल्प हो गया था तथा संपूर्ण समाज युद्ध प्रयासों में सम्मिलित हो गया था। इस संघर्ष के दौरान दोनों पक्षों ने एक-दूसरे की सैन्य क्षमता को दुर्बल करने के लिए व्यापक विनाशकारी नीतियाँ अपनाईं। शत्रु पक्ष के संसाधनों को समाप्त करने हेतु उसके नियंत्रित क्षेत्रों से भारी कर और धन वसूला गया, कृषि क्षेत्रों को नष्ट किया गया तथा नगरों की जनसंख्या को बड़े पैमाने पर हिंसा का सामना करना पड़ा। समकालीन विवरणों में ग्रामीण क्षेत्रों की व्यापक तबाही, कृषि व्यवस्था के विनाश और जनसंख्या के बड़े पैमाने पर विस्थापन का उल्लेख मिलता है।
मांचू आबादी के विरुद्ध हिंसा
ताइपिंग विद्रोहियों की विचारधारा में मांचू शासक वर्ग के प्रति तीव्र विरोध था। वे छिंग राजवंश को विदेशी मांचू शासन मानते थे और अनेक क्षेत्रों पर अधिकार करने के पश्चात् वहाँ की मांचू आबादी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की। अनेक स्थानों पर मांचू पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की हत्या की गई। हुनान क्षेत्र के एक छिंग समर्थक व्यक्ति ने ताइपिंग सेनाओं द्वारा मांचू समुदाय के विरुद्ध किए गए नरसंहार का वर्णन किया। उसके अनुसार ताइपिंग सैनिकों ने मांचू लोगों को बिना किसी भेद के मार डाला। 1853 ईस्वी में नानजिंग पर अधिकार करने के पश्चात् ताइपिंग सेनाओं द्वारा लगभग चालीस हज़ार मांचू नागरिकों की हत्या किए जाने का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार उसी वर्ष कांगझोऊ क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में मांचू लोगों की हत्या की गई।
छिंग शासन की प्रतिशोधात्मक नीतियाँ
छिंग राजवंश ने भी विद्रोह को दबाने के लिए अत्यंत कठोर नीतियाँ अपनाईं। चूँकि ताइपिंग आंदोलन का उद्भव गुआंग्शी क्षेत्र में हुआ था, इसलिए छिंग सेनाओं ने वहाँ की स्थानीय बोली बोलने वाले लोगों को भी विद्रोहियों का समर्थक मानकर दंडित किया। हाक्का समुदाय को विशेष रूप से छिंग शासन की कठोर कार्रवाई का सामना करना पड़ा। ताइपिंग विद्रोह के पतन के पश्चात् अनेक क्षेत्रों में हाक्का लोगों के विरुद्ध बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। गुआंगदोंग प्रांत में भारी जनहानि का उल्लेख मिलता है, जहाँ प्रतिशोधात्मक अभियानों के दौरान बड़ी संख्या में लोग मारे गए। इसी प्रकार आनहुई और नानजिंग सहित चीन के अन्य क्षेत्रों में भी नागरिकों के विरुद्ध हिंसक कार्रवाइयाँ की गईं।
ताइपिंग विद्रोह में जनहानि और विनाश
ताइपिंग विद्रोह (1850–1864 ई.) उन्नीसवीं शताब्दी के सर्वाधिक विनाशकारी संघर्षों में से एक था। उस समय चीन में विश्वसनीय जनगणना व्यवस्था के अभाव के कारण मृतकों की वास्तविक संख्या निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार इस लगभग चौदह वर्षों तक चले संघर्ष में सैनिकों और नागरिकों सहित लगभग दो से तीन करोड़ लोगों की मृत्यु हुई। युद्ध, अकाल, महामारी और सामाजिक अव्यवस्था ने जनहानि को और अधिक बढ़ा दिया।
विद्रोह के कारण चीन के मध्य और दक्षिणी क्षेत्रों में व्यापक विनाश हुआ। अनेक नगर और ग्राम नष्ट हो गए, कृषि व्यवस्था प्रभावित हुई तथा लाखों लोग विस्थापित होकर अन्य क्षेत्रों में जाने के लिए विवश हुए। अनुमान है कि लगभग छह सौ नगरों को भारी क्षति पहुँची और अनेक ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिक एवं सामाजिक संरचना गंभीर रूप से प्रभावित हुई। कुछ इतिहासकारों के अनुसार जनहानि लगभग दस करोड़ तक हुई थी, किंतु इस मत को सामान्यतः स्वीकार नहीं किया जाता। कुल मिलाकर ताइपिंग विद्रोह ने चीन के समाज, अर्थव्यवस्था और जनजीवन को गहराई से प्रभावित किया और उन्नीसवीं शताब्दी की सर्वबृहत् मानवीय त्रासदियों में स्थान प्राप्त किया।
छिंग राजवंश की प्रशासनिक एवं सैन्य व्यवस्था पर प्रभाव
ताइपिंग विद्रोह ने चीन के छिंग राजवंश की राजनीतिक, सामाजिक और सैन्य संरचना को गहराई से प्रभावित किया। यद्यपि इस विद्रोह ने व्यापक मानवीय और आर्थिक विनाश उत्पन्न किया, तथापि इसके परिणामस्वरूप छिंग शासन की प्रशासनिक व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आए। विद्रोहियों ने दक्षिणी चीन में स्थित अनेक मांचू सैन्य बस्तियों को नष्ट कर दिया। ये बस्तियाँ ऐसे पृथक् सैन्य केंद्र थे जहाँ मांचू परिवार निवास करते थे और स्थानीय हान चीनी जनता पर उनका प्रभुत्व था। इनके विनाश से दक्षिणी चीन में मांचू अभिजात वर्ग का प्रभाव पर्याप्त रूप से दुर्बल हो गया।
ताइपिंग विद्रोह को दबाने के लिए छिंग सरकार को स्थानीय हान चीनी जमींदारों और अभिजात वर्ग पर निर्भर होना पड़ा। पारंपरिक मांचू एट बैनर्स सेना और ग्रीन स्टैंडर्ड आर्मी — जिन पर छिंग शासन दीर्घकाल से भरोसा करता था — विद्रोह को नियंत्रित करने में असफल सिद्ध हुईं। इनके स्थान पर स्थानीय स्तर पर संगठित योंग यिंग (स्थानीय मिलिशिया) सेनाओं का गठन किया गया। इससे चीन की सत्ता-व्यवस्था कुछ सीमा तक विकेंद्रीकृत हो गई और उच्च प्रशासनिक पदों पर हान चीनी अधिकारियों की संख्या बढ़ने लगी। इतिहासकार फ्रांज़ एच. माइकल के अनुसार ताइपिंग विद्रोह को दबाने के लिए गठित ये स्थानीय सेनाएँ परवर्ती काल में क्षेत्रीय सरदारों (वॉरलॉर्ड्स) की निजी सेनाओं में परिवर्तित हो गईं, जिन्होंने छिंग राजवंश के पतन के पश्चात् चीन की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि कुछ इतिहासकारों ने इस विचार पर प्रश्न उठाते हुए कहा है कि ताइपिंग-विरोधी सेनाओं की परिस्थितियाँ परवर्ती क्षेत्रीय सेनाओं से भिन्न थीं।
राजनीतिक विचारों और क्रांतिकारी आंदोलनों पर प्रभाव
ताइपिंग विद्रोह की विचारधारा ने चीन के परवर्ती क्रांतिकारी आंदोलनों को भी प्रभावित किया। ताइपिंग संगठन में ईसाई धार्मिक विचारों, सामाजिक समानता और पारंपरिक व्यवस्था के विरोध का सम्मिश्रण दिखाई देता था। इन विचारों ने परवर्ती क्रांतिकारियों — विशेषकर सुन यात-सेन और उनके सहयोगियों — को प्रभावित किया। कुछ ताइपिंग समर्थक आगे चलकर चीन के अन्य क्रांतिकारी संगठनों में सम्मिलित भी हुए।
कार्ल मार्क्स ने ताइपिंग विद्रोह पर लेख लिखे, किंतु उन्होंने इसमें किसी स्पष्ट सामाजिक कार्यक्रम या व्यवस्थित परिवर्तन की योजना के बजाय मुख्यतः हिंसा और विनाश को देखा। इसके विपरीत माओ ज़ेडोंग के नेतृत्व वाले चीनी कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने ताइपिंग विद्रोह को प्रारंभिक अथवा प्रोटो-कम्युनिस्ट आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया। चीनी गृहयुद्ध के दौरान राष्ट्रवादी और कम्युनिस्ट दोनों पक्षों के नेताओं ने ताइपिंग संगठन और सैन्य रणनीतियों का अध्ययन किया। अमेरिकी जनरल जोसेफ स्टिलवेल ने भी ज़ेंग गुओफ़ान के सैन्य अभियानों की प्रशंसा करते हुए उनमें साहस, सावधानी तथा दृढ़ नेतृत्व के गुणों को महत्त्वपूर्ण बताया।
जनसंख्या और आर्थिक प्रभाव
ताइपिंग विद्रोह के कारण अकाल, महामारी, नरसंहार और सामाजिक अस्थिरता से चीन की जनसंख्या में भारी कमी आई। इसका सर्वाधिक प्रभाव यांग्त्सी नदी के डेल्टा क्षेत्र पर पड़ा। अनेक क्षेत्रों में श्रमिकों की न्यूनता उत्पन्न हो गई, जिसके कारण भूमि की तुलना में श्रम का महत्त्व बढ़ गया। युद्ध के दौरान शियांग सेना ने अनेक स्थानों पर ‘जलाओ और नष्ट करो’ की नीति अपनाई, जिससे व्यापक विनाश हुआ। आनहुई, दक्षिणी जियांग्सू, उत्तरी झेजियांग और उत्तरी जियांग्शी जैसे क्षेत्रों की जनसंख्या में भारी कमी आई। इन क्षेत्रों में परवर्ती काल में हेनान सहित अन्य क्षेत्रों से आए प्रवासियों को बसाया गया। जनसंख्या में इस कमी के कारण निचले यांग्त्सी क्षेत्र में जमींदारों की संख्या घटी और भूमि स्वामित्व के केंद्रीकरण में भी न्यूनता आई।
हुनान शक्ति का उदय
ताइपिंग विद्रोह के दमन में हुनान की सैन्य शक्तियों — विशेषकर ज़ेंग गुओफ़ान की शियांग सेना — ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके परिणामस्वरूप छिंग सरकार में हुनान क्षेत्र के लोगों का प्रभाव तीव्र गति से बढ़ा। 1865 ईस्वी तक आठ प्रमुख वायसरायों में से पाँच हुनान से संबंधित थे। ताइपिंग विद्रोह के अनुभवों के कारण हुनान के जमींदार और अभिजात वर्ग पश्चिमी प्रभावों के प्रति अधिक सतर्क हो गए तथा चीन के राजनीतिक और सामाजिक सुधारों में भी उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
व्यापार और ऐतिहासिक अभिलेखों पर प्रभाव
ताइपिंग विद्रोह ने चीन के व्यापारिक जीवन को भी प्रभावित किया। शानक्सी और आनहुई के हुइझोउ क्षेत्र के व्यापारियों का महत्त्व न्यून हो गया, क्योंकि देश के बड़े भाग में व्यापारिक गतिविधियाँ बाधित हुईं। इसके विपरीत ग्वांगझू और निंगबो जैसे तटीय क्षेत्रों पर अपेक्षाकृत कम प्रभाव पड़ा। शंघाई में आए बड़ी संख्या में शरणार्थियों ने नगर के आर्थिक विकास में योगदान दिया और वह एक प्रमुख आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ। ताइपिंग शासन द्वारा तैयार किए गए अधिकांश अभिलेख नष्ट हो गए और छिंग सरकार द्वारा विद्रोह के इतिहास को नियंत्रित करने के प्रयासों के कारण आज ताइपिंग द्वारा प्रकाशित केवल लगभग दस प्रतिशत दस्तावेज ही उपलब्ध हैं।
ताइपिंग विद्रोह और आधुनिक क्रांतिकारी
इतिहासकार जॉन छिंग फेयरबैंक ने ताइपिंग विद्रोह और एक शताब्दी पश्चात् माओ ज़ेडोंग के नेतृत्व वाले कम्युनिस्ट आंदोलन के बीच कुछ समानताओं की ओर संकेत किया है। दोनों आंदोलनों में वैचारिक अनुशासन, सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा, प्रतिभाशाली लोगों को संगठित करने की क्षमता और किसान-आधारित सैन्य शक्ति का प्रयोग दिखाई देता है। इसके अतिरिक्त दोनों आंदोलनों ने विदेशी विचारधाराओं को अपनाते हुए उन्हें चीनी सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तित किया।
लोकप्रिय संस्कृति में ताइपिंग विद्रोह
ताइपिंग विद्रोह ने साहित्य, टेलीविजन और सिनेमा में भी अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराई। रॉबर्ट एलिगेंट के 1983 ईस्वी के उपन्यास ‘मैंडरिन’ में ताइपिंग विद्रोहकालीन शंघाई का चित्रण एक यहूदी परिवार के दृष्टिकोण से किया गया है। जॉर्ज मैकडोनाल्ड फ्रेज़र के उपन्यास ‘फ्लैशमैन एंड द ड्रैगन’ में काल्पनिक पात्र हैरी पैगेट फ्लैशमैन के माध्यम से द्वितीय अफीम युद्ध और ताइपिंग विद्रोह के काल की घटनाओं को प्रस्तुत किया गया है। लिसा सी के उपन्यास ‘स्नो फ्लावर एंड द सीक्रेट फैन’ में भी ताइपिंग विद्रोह की पृष्ठभूमि दिखाई देती है। एमी टैन के उपन्यास ‘द हंड्रेड सीक्रेट सेंसेस’ में भी ताइपिंग विद्रोह काल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख है। कैथरीन पैटरसन का ‘रेबेल्स ऑफ द हेवनली छिंगडम’ युवाओं के लिए लिखा गया उपन्यास है, जिसमें ताइपिंग विद्रोह की घटनाओं को केंद्र में रखा गया है। ली बो का उपन्यास ‘टिएनकुओ: द हेवनली छिंगडम’ ताइपिंग की राजधानी नानजिंग और वहाँ के राजनीतिक वातावरण पर आधारित है।
ताइपिंग विद्रोह का महत्व और मूल्यांकन
1850 से 1864 ईस्वी तक चला ताइपिंग विद्रोह उन्नीसवीं शताब्दी के सर्वाधिक भीषण गृहयुद्धों में से एक था। यह केवल राजनीतिक सत्ता-परिवर्तन का प्रयास नहीं था, बल्कि एक धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक आंदोलन भी था जिसका उद्देश्य मांचू (छिंग) राजवंश की सत्ता को चुनौती देना और चीनी समाज में व्यापक परिवर्तन लाना था। इस संघर्ष में लगभग दो से तीन करोड़ लोगों की मृत्यु हुई, जिससे यह मानव इतिहास की सर्वाधिक विनाशकारी घटनाओं में सम्मिलित हो गया।
दीर्घकालीन युद्ध, हिंसा, अकाल और महामारी के कारण चीन के विशाल क्षेत्रों में जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया तथा कृषि उत्पादन, व्यापार और सामाजिक व्यवस्था को भारी क्षति पहुँची। तथापि ताइपिंग आंदोलन का महत्त्व इसके सुधारवादी विचारों में निहित था। विद्रोहियों ने स्त्री-पुरुष समानता का समर्थन किया तथा पैर बाँधने की प्रथा, वेश्यावृत्ति और दासता जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध कदम उठाए। उन्होंने भूमि के समान वितरण और सामुदायिक संपत्ति की व्यवस्था का विचार प्रस्तुत किया, जो उस काल के चीन में अत्यंत क्रांतिकारी था। इसके अतिरिक्त उन्होंने अफीम, जुआ और पारंपरिक सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध भी नीतियाँ अपनाईं।
राजनीतिक दृष्टि से ताइपिंग विद्रोह ने मांचू शासन की दुर्बलताओं को उजागर किया, चीनी समाज में राष्ट्रवादी भावना को प्रबल किया और परवर्ती सुधार आंदोलनों तथा आधुनिकीकरण के प्रयासों को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया। विद्रोह के दमन के पश्चात् क्षेत्रीय सैन्य शक्तियों और प्रांतीय नेताओं का प्रभाव बढ़ा, जिससे छिंग राजवंश की केंद्रीय सत्ता दुर्बल हुई और उसके भविष्य के पतन की पृष्ठभूमि तैयार हो गई।




