मध्यकाल में फ़ारसी साहित्य का विकास
मध्यकालीन भारत में फ़ारसी साहित्य का विकास भारतीय सांस्कृतिक इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। यद्यपि फ़ारसी भारत की स्वदेशी भाषा नहीं थी, फिर भी दिल्ली सल्तनत की स्थापना (1206 ई.) से लेकर मुग़ल साम्राज्य के उत्कर्ष तक यह प्रशासन, न्याय, कूटनीति, इतिहास-लेखन, दर्शन, धर्म तथा उच्च संस्कृति की प्रमुख भाषा बनी रही। तुर्क एवं अफ़ग़ान शासकों के संरक्षण, मध्य एशिया और ईरान से आए विद्वानों के आगमन तथा भारतीय सांस्कृतिक परिवेश के साथ निरंतर संपर्क के परिणामस्वरूप भारत फ़ारसी भाषा और साहित्य का एक प्रमुख केंद्र बन गया। इस काल में काव्य, इतिहास, सूफ़ी साहित्य, जीवनी, पत्र-साहित्य और अनुवाद जैसी अनेक विधाओं का विकास हुआ। भारतीय परिस्थितियों, लोकजीवन और सांस्कृतिक तत्त्वों को आत्मसात करते हुए यहाँ एक विशिष्ट इंडो-फ़ारसी साहित्यिक परंपरा विकसित हुई, जो ईरानी फ़ारसी साहित्य से अपनी मौलिक विशेषताओं के कारण भिन्न थी। इस परंपरा ने संस्कृत, हिंदवी, ब्रज, अवधी और अन्य भारतीय भाषाओं के साथ निरंतर संवाद स्थापित किया तथा मध्यकालीन भारत के बौद्धिक और सांस्कृतिक जीवन को नई दिशा प्रदान की।
भारत में फ़ारसी भाषा का आगमन
ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में जब ग़ज़नी के सुल्तान महमूद ने उत्तर भारत पर आक्रमण किए, तब उनके साथ केवल सैन्य शक्ति ही नहीं, बल्कि ग़ज़नवी दरबार की राजभाषा फ़ारसी भी भारत आई। अगले लगभग आठ शताब्दियों तक फ़ारसी भारतीय उपमहाद्वीप के प्रशासन, संस्कृति और बौद्धिक जीवन की प्रमुख भाषा बनी रही। महमूद ग़ज़नवी के समय से ही अनेक फ़ारसी कवि, इतिहासकार, दार्शनिक और विद्वान भारत आने लगे थे। कुछ राजकीय संरक्षण की आशा से आए, जबकि कुछ भारतीय ज्ञान-परंपराओं का अध्ययन करने के उद्देश्य से यहाँ पहुँचे। प्रसिद्ध विद्वान अलबरूनी ने भारत में रहकर भारतीय समाज, धर्म, दर्शन और विज्ञान का गहन अध्ययन किया और अपनी प्रसिद्ध कृति ‘तहक़ीक़-ए-हिंद’ की रचना की, जो भारतीय सभ्यता के अध्ययन का एक अनुपम स्रोत है। इसके पश्चात् मुहम्मद गोरी ने भी विद्वानों और साहित्यकारों को संरक्षण प्रदान किया। उसके दरबार में ताजुद्दीन, शिहाबुद्दीन, मुहम्मद रशीद, रुक्नुद्दीन, क़ाज़ी हामिद बल्खी, अब्दुल रऊफ़ हरवी तथा अबू बक्र खुशरवी जैसे विद्वान प्रतिष्ठित थे। इन विद्वानों के संरक्षण और उनकी रचनात्मक गतिविधियों ने भारत में फ़ारसी भाषा एवं साहित्य की सुदृढ़ नींव रखी, जिसके आधार पर दिल्ली सल्तनत और मुग़ल काल में फ़ारसी साहित्य ने अभूतपूर्व विकास और व्यापक प्रतिष्ठा प्राप्त की।
मध्यकालीन भारत में फ़ारसी भाषा के विकास की पृष्ठभूमि
मध्यकालीन भारत में फ़ारसी भाषा का विकास न तो सरल था और न ही एकतरफ़ा। इसका सामना ऐसे देश से हुआ जहाँ संस्कृत, अपभ्रंश तथा हिंदवी, पंजाबी, ब्रजभाषा और अवधी जैसी समृद्ध साहित्यिक परंपराएँ पहले से विद्यमान थीं। परिणामस्वरूप भारत में विकसित फ़ारसी साहित्य किसी बाहरी संस्कृति का मात्र विस्तार नहीं था, बल्कि भारतीय और ईरानी परंपराओं के सृजनात्मक समन्वय का परिणाम था। इस समन्वय से एक विशिष्ट इंडो-फ़ारसी साहित्यिक परंपरा का जन्म हुआ, जिसने अनेक नवीन साहित्यिक प्रवृत्तियों, शैलियों और अभिव्यक्ति के रूपों को विकसित किया। इनमें से कई साहित्यिक प्रयोग बाद में ईरान में भी प्रतिष्ठित हुए। इस प्रकार भारत केवल फ़ारसी भाषा का उपभोक्ता नहीं रहा, बल्कि उसके विकास और रूपांतरण का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गया।
मध्यकालीन भारत में फ़ारसी भाषा एवं साहित्य के व्यापक विकास का सबसे बड़ा आधार उसे प्राप्त राजकीय संरक्षण था। ग़ज़नवी और गोरी शासकों से लेकर दिल्ली सल्तनत तथा मुग़ल सम्राटों तक लगभग सभी मुस्लिम शासकों ने फ़ारसी को शासन, प्रशासन और उच्च संस्कृति की भाषा के रूप में स्वीकार किया। फलस्वरूप यह राजदरबार, न्यायालय, राजस्व विभाग, कूटनीति तथा राजकीय पत्राचार की आधिकारिक भाषा बन गई। प्रशासनिक प्रतिष्ठा प्राप्त होने के साथ-साथ फ़ारसी साहित्य, इतिहास-लेखन, सूफ़ी चिंतन, जीवनी-साहित्य, पत्र-साहित्य तथा संस्कृत और भारतीय भाषाओं से अनुवाद की परंपरा को भी अभूतपूर्व प्रोत्साहन मिला। धीरे-धीरे फ़ारसी शिक्षित वर्ग की प्रमुख भाषा बन गई और भारतीय विद्वानों ने भी इसमें महत्त्वपूर्ण योगदान देना आरंभ कर दिया।
सामान्यतः भारत में फ़ारसी साहित्य के विकास को चार प्रमुख चरणों में विभाजित किया जाता है—(1) ग़ज़नवी एवं प्रारंभिक सल्तनत काल (ग्यारहवीं–तेरहवीं शताब्दी), (2) परिपक्व दिल्ली सल्तनत काल (तेरहवीं–चौदहवीं शताब्दी), (3) क्षेत्रीय सल्तनतों तथा तैमूरी प्रभाव का काल (चौदहवीं–पंद्रहवीं शताब्दी), तथा (4) मुग़ल काल (सोलहवीं–अठारहवीं शताब्दी), जिसे भारत में फ़ारसी साहित्य का स्वर्णयुग माना जाता है।
ग़ज़नवी काल में फ़ारसी साहित्य का विकास (ग्यारहवीं– तेरहवीं शताब्दी)
भारत में फ़ारसी साहित्य का प्रारंभिक विकास दिल्ली के स्थान पर लाहौर में हुआ, जो ग़ज़नवी शासन के समय फ़ारसी भाषा और साहित्य का प्रमुख केंद्र बन गया था। समकालीन स्रोतों में लाहौर को कभी-कभी ‘छोटा ग़ज़नी’ भी कहा गया है। ग़ज़नवी शासक मूलतः तुर्क थे, किंतु उन्होंने फ़ारसी को अपने दरबार, प्रशासन और साहित्य की प्रमुख भाषा के रूप में अपनाया। इसी समय ईरान और मध्य एशिया में राजनीतिक अस्थिरता तथा सेल्जूक और अन्य संघर्षों के कारण अनेक विद्वान, कवि और साहित्यकार ग़ज़नवी राज्य के भारतीय क्षेत्रों में आकर बस गए। परिणामस्वरूप लाहौर भारत-फ़ारसी साहित्य और संस्कृति का प्रथम महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गया तथा यहीं से इंडो-फ़ारसी साहित्यिक परंपरा का संगठित विकास आरंभ हुआ।
इस काल के प्रमुख कवियों में अबुल-फ़रज रूनी (मृत्यु 1091 ई.) का विशिष्ट स्थान है। उसने अपना अधिकांश जीवन लाहौर में सुल्तान इब्राहीम बिन मसूद तथा मसूद तृतीय के दरबार में राजकवि के रूप में व्यतीत किया। उसे भारत में फ़ारसी क़सीदा (प्रशस्ति-काव्य) परंपरा का प्रथम महान् कवि माना जाता है। उसके दीवान का प्रभाव बाद के प्रसिद्ध फ़ारसी कवि अनवरी की रचनाओं पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
भारत-फ़ारसी साहित्य की स्वतंत्र पहचान स्थापित करने में ग़ज़नवी साम्राज्य के ग्यारहवीं–बारहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध फ़ारसी कवि मसूद साद सलमान (1046–1121 ई.) का महत्त्वपूर्ण योगदान था। वे विशेष रूप से ‘बंदी कवि’ के रूप में प्रसिद्ध हैं, क्योंकि उन्होंने राजद्रोह के आरोप में अपने जीवन का लंबा समय कारावास में बिताया। लगभग 1046 ई. में लाहौर में जन्मे मसूद ने कारागार में ‘हब्सियात’ (कारागार-काव्य) की रचना की, जिससे फ़ारसी साहित्य में एक नवीन काव्य-विधा का विकास हुआ। आगे चलकर यह परंपरा भारत-फ़ारसी (इंडो-फ़ारसी) साहित्य की विशिष्ट पहचान बन गई और इसकी प्रतिध्वनि मिर्ज़ा ग़ालिब सहित अनेक कवियों की रचनाओं में दिखाई देती है। मसूद ने संस्कृत की बारहमासा परंपरा से प्रेरणा लेकर भारतीय ऋतु-चक्र, प्रकृति और लोकजीवन को फ़ारसी काव्य का विषय बनाया, जिससे भारतीय और फ़ारसी साहित्यिक परंपराओं के सृजनात्मक समन्वय को नई दिशा मिली।
ग़ज़नवी काल में सूफ़ी साहित्य का भी उल्लेखनीय विकास हुआ। ग्यारहवीं सदी के प्रसिद्ध फारसी सूफी संत, विद्वान और धर्मशास्त्री अली बिन उस्मान अल-हुजवीरी (दातागंज बख्श या दाता साहब) ने लाहौर में ‘कश्फ़-उल-महजूब’ (छिपे हुए रहस्यों का उद्घाटन) की रचना की, जिसे दक्षिण एशिया में सूफ़ी दर्शन का प्रथम व्यवस्थित फ़ारसी ग्रंथ माना जाता है। इस कृति ने सूफ़ी विचारधारा, आध्यात्मिक चिंतन और रहस्यवादी साहित्य की ऐसी परंपरा स्थापित की, जिसने आगे चलकर भारत में इंडो-फ़ारसी सांस्कृतिक और साहित्यिक विकास की सुदृढ़ आधारशिला रखी। इस प्रकार ग़ज़नवी काल भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ारसी भाषा एवं साहित्य के संगठित विकास का प्रथम और अत्यंत महत्त्वपूर्ण चरण था।
दिल्ली सल्तनत काल में फ़ारसी साहित्य का विकास (1206–1526 ई.)
तेरहवीं शताब्दी के प्रारंभ में 1206 ईस्वी में दिल्ली सल्तनत की स्थापना भारतीय इतिहास तथा फ़ारसी भाषा एवं साहित्य के विकास की दृष्टि से एक युगांतरकारी घटना है। ग़ज़नवी काल में जहाँ लाहौर भारत-फ़ारसी साहित्य का प्रमुख केंद्र था, वहीं सल्तनत की स्थापना के बाद दिल्ली, मुल्तान, बदायूँ, उच्छ (उच्च) तथा अन्य नगर साहित्यिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक गतिविधियों के नए केंद्र बनकर उभरे। इसी समय मध्य एशिया, ख़ुरासान और ईरान पर मंगोल आक्रमणों के कारण बड़ी संख्या में कवि, इतिहासकार, सूफ़ी संत, धर्मशास्त्री, प्रशासक तथा कलाकार भारत आकर बस गए। इन प्रवासी विद्वानों ने भारतीय बौद्धिक जीवन को नई दिशा प्रदान की। चूँकि तुर्क शासकों की राजभाषा फ़ारसी थी, इसलिए यह शीघ्र ही शासन, न्याय, राजस्व, कूटनीति, इतिहास-लेखन तथा साहित्य-सृजन की प्रमुख भाषा बन गई। दिल्ली के सुल्तानों के संरक्षण में फ़ारसी केवल राजभाषा ही नहीं रही, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की उच्च संस्कृति, शिक्षा और बौद्धिक जीवन का भी प्रमुख माध्यम बन गई। इसी काल में भारतीय और ईरानी साहित्यिक परंपराओं के समन्वय से विशिष्ट इंडो-फ़ारसी साहित्य का विकास हुआ।
कुतुबुद्दीन ऐबक का साहित्यिक संरक्षण
दिल्ली सल्तनत के प्रथम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक (1206–1210 ई.) ने ग़ज़नी और ग़ोर के शासकों की साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ाया। अपनी असाधारण उदारता के कारण वह ‘लाखबख्श’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसने कवियों, धर्माचार्यों, क़ुरआन के विद्वानों तथा साहित्यकारों को उदारतापूर्वक सम्मान और आर्थिक सहायता प्रदान की। फलस्वरूप तूस, निशापुर, ग़ज़नी, ग़ोर और ख़ुरासान से अनेक विद्वान भारत आए और दिल्ली को अपना कार्यक्षेत्र बनाया।
ऐबक के संरक्षण में हसन निज़ामी, फ़ख़रुद्दीन मुदब्बिर तथा अन्य विद्वानों को विशेष प्रतिष्ठा मिली। हसन निज़ामी ने अपनी प्रसिद्ध ऐतिहासिक कृति ‘ताज-उल-मआसिर’ की रचना की, जिसमें मुहम्मद गोरी तथा कुतुबुद्दीन ऐबक के अभियानों और प्रारंभिक सल्तनती इतिहास का वर्णन मिलता है। फ़ख़रुद्दीन मुदब्बिर ने ‘आदाब-उल-हर्ब वश-शुजाअत’ जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ की रचना कर सैन्य संगठन, युद्धनीति तथा राजधर्म पर प्रकाश डाला। ऐबक के संरक्षण ने दिल्ली को एक उभरते हुए फ़ारसी साहित्यिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित किया।
इल्तुतमिश के शासनकाल में साहित्यिक उत्कर्ष
सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (1211–1236 ई.) के शासनकाल में फ़ारसी साहित्य को अभूतपूर्व प्रोत्साहन मिला। उसके शासनकाल में दिल्ली इस्लामी शिक्षा, संस्कृति और फ़ारसी साहित्य का प्रमुख केंद्र बन गई। मंगोल आक्रमणों से विस्थापित अनेक विद्वान और साहित्यकार भारत आए तथा दिल्ली के दरबार से जुड़ गए। इस काल में गद्य और पद्य दोनों विधाओं का उल्लेखनीय विकास हुआ।
इल्तुतमिश के संरक्षण में वहाउद्दीन उशी, अमीर रुहानी, ताजुद्दीन रज़ा तथा मुअय्यद जज़ारी जैसे विद्वानों ने साहित्य-सृजन किया। अमीर रुहानी ने सुल्तान की प्रशंसा में अनेक क़सीदों की रचना की, जबकि मुअय्यद जज़ारी ने इमाम ग़ज़ाली की प्रसिद्ध कृति ‘इह्या उलूम अल-दीन’ का फ़ारसी रूपांतरण प्रस्तुत कर उसे इल्तुतमिश को समर्पित किया। इससे स्पष्ट होता है कि इस काल में फ़ारसी मौलिक रचनाओं के साथ-साथ अनुवाद-साहित्य की भी महत्त्वपूर्ण भाषा बन चुकी थी।
इसी काल में मदरसों और शिक्षण संस्थानों के माध्यम से फ़ारसी शिक्षा का व्यापक प्रसार हुआ। परिणामस्वरूप भारतीय विद्वानों की एक नई पीढ़ी तैयार हुई, जिसने आगे चलकर फ़ारसी साहित्य को भारतीय सांस्कृतिक अनुभवों से समृद्ध किया।
इल्तुतमिश के बाद साहित्यिक विकास
इल्तुतमिश के पश्चात् भी फ़ारसी साहित्य का संरक्षण निरंतर जारी रहा। रुक्नुद्दीन फ़िरोज़ और रज़िया सुल्तान के संक्षिप्त शासनकाल के बाद सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद (1246–1266 ई.) के समय फ़ारसी इतिहास-लेखन को विशेष प्रोत्साहन मिला। इसी काल के महान इतिहासकार मिन्हाज-उस-सिराज जुज़जानी ने अपनी प्रसिद्ध ऐतिहासिक कृति ‘तबक़ात-ए-नासिरी’ की रचना की। यह ग्रंथ विश्व-इतिहास की शैली में लिखा गया है, जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर ग़ज़नवी, ग़ुरी और दिल्ली सल्तनत के इतिहास तथा मंगोल आक्रमणों तक का क्रमबद्ध विवरण है। राजनीतिक घटनाओं, प्रशासनिक व्यवस्थाओं तथा समकालीन परिस्थितियों का प्रामाणिक वर्णन होने के कारण यह मध्यकालीन भारतीय इतिहास का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। इसी समय फ़ख़रुद्दीन आमिद सुनामी जैसे दरबारी कवियों ने भी फ़ारसी काव्य-परंपरा को समृद्ध किया।
इस प्रकार नासिरुद्दीन महमूद के शासनकाल में इतिहास-लेखन और काव्य-सृजन दोनों क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई, जिसने आगे चलकर बलबन, खिलजी और तुगलक शासकों के काल में फ़ारसी साहित्य के स्वर्णिम विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
बलबन और शाहज़ादा मुहम्मद का साहित्यिक संरक्षण
सुल्तान ग़ियासुद्दीन बलबन (1266–1287 ई.) के शासनकाल में दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक स्थिरता के साथ-साथ फ़ारसी भाषा एवं साहित्य का भी उल्लेखनीय विकास हुआ। बलबन यद्यपि एक कठोर और अनुशासनप्रिय शासक था, फिर भी वह विद्वानों, कवियों तथा साहित्यकारों का सम्मान करता था। उसके शासनकाल में दिल्ली फ़ारसी साहित्य, इस्लामी शिक्षा और बौद्धिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनी रही। बलबन ने राजकीय संरक्षण के माध्यम से फ़ारसी को प्रशासन, इतिहास-लेखन और साहित्य-सृजन की प्रतिष्ठित भाषा के रूप में और अधिक सुदृढ़ किया। उसके दरबार में मौलाना बुरहानुद्दीन, शम्सुद्दीन दवीर सुनामी तथा अनेक अन्य विद्वानों और कवियों को संरक्षण प्राप्त था। उनके साहित्यिक योगदान से फ़ारसी गद्य और पद्य दोनों का विकास हुआ तथा दिल्ली की साहित्यिक प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई।
बलबन के शासनकाल में उसके ज्येष्ठ पुत्र शाहज़ादा मुहम्मद का साहित्यिक संरक्षण विशेष रूप से उल्लेखनीय था। वह मुल्तान का सूबेदार होने के साथ-साथ उच्चकोटि का साहित्य-प्रेमी और विद्वानों का उदार संरक्षक था। उसके दरबार में मध्य एशिया और ईरान से आए अनेक कवियों और विद्वानों को आश्रय मिला। विशेष रूप से अमीर ख़ुसरो और अमीर हसन सिज्जी देहलवी जैसे महान कवियों को शाहज़ादा मुहम्मद ने संरक्षण दिया। उसकी साहित्यिक अभिरुचि और संरक्षण के कारण मुल्तान फ़ारसी साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गया। 1285 ईस्वी में मंगोलों के विरुद्ध युद्ध में शाहज़ादा मुहम्मद की वीरगति हो गई, जिससे तत्कालीन साहित्यिक जगत को गहरा आघात पहुँचा। अमीर ख़ुसरो ने भी उसकी मृत्यु पर अत्यंत मार्मिक शोक-काव्य की रचना की।
उच्छ (उच्च) में फ़ारसी साहित्य का विकास
दिल्ली और मुल्तान के अतिरिक्त सिंध का उच्छ (उच्च) नगर भी प्रारंभिक सल्तनत काल में फ़ारसी साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था। यहाँ के शासक नासिरुद्दीन कुबाचा (1206–1228 ई.) ने विद्वानों, कवियों और इतिहासकारों को उदार संरक्षण प्रदान किया। उसका मंत्री ऐन-उल-मुल्क फ़ख़रुद्दीन हुसैन स्वयं एक प्रतिष्ठित विद्वान एवं साहित्यकार था, जिसने साहित्यिक गतिविधियों को सक्रिय प्रोत्साहन दिया।
उच्छ के दरबार में अली बिन हामिद कूफ़ी ने सिंध के इतिहास से संबंधित प्रसिद्ध ग्रंथ ‘चचनामा’ का अरबी से फ़ारसी में अनुवाद किया, जो आज भी सिंध के प्रारंभिक इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इसी प्रकार प्रसिद्ध साहित्यकार मुहम्मद औफ़ी ने ‘लुबाब-उल-अलबाब’, जो फ़ारसी कवियों का प्राचीन तज़किरा है तथा ‘जवामे-उल-हिकायत’ जैसी उत्कृष्ट गद्य-कृतियों की रचना की। कुछ समय तक मिन्हाज-उस-सिराज जुज़जानी भी उच्छ में रहे, जिससे यह नगर फ़ारसी साहित्य और इतिहास-लेखन का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गया।
इस प्रकार दिल्ली सल्तनत के प्रारंभिक चरण में राजकीय संरक्षण, मध्य एशिया से आए प्रवासी विद्वानों, इतिहासकारों तथा सूफ़ी संतों के संयुक्त प्रयासों से भारत में एक सुदृढ़ इंडो-फ़ारसी साहित्यिक परंपरा का विकास हुआ। यही परंपरा आगे चलकर खिलजी, तुगलक और मुग़ल काल में अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँची।
अमीर ख़ुसरो : इंडो-फ़ारसी साहित्य के शिल्पी
खिलजी तथा प्रारंभिक तुगलक काल के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार अमीर ख़ुसरो (1253–1325 ई.) भारतीय उपमहाद्वीप में इंडो-फ़ारसी साहित्य के सबसे महान प्रतिनिधि माने जाते हैं। वे केवल उच्चकोटि के कवि ही नहीं, बल्कि इतिहासकार, संगीतज्ञ, सूफ़ी चिंतक और सांस्कृतिक समन्वय के अग्रदूत भी थे। उन्होंने स्वयं को ‘तुर्क-ए-हिंदुस्तानी’ कहकर अपनी मिश्रित सांस्कृतिक पहचान व्यक्त की। फ़ारसी साहित्य की लगभग सभी प्रमुख विधाओं—मसनवी, ग़ज़ल, क़सीदा, रुबाई, इतिहास-काव्य तथा गद्य में उनकी असाधारण प्रतिभा परिलक्षित होती है। भारतीय सांस्कृतिक तत्त्वों, लोकजीवन और फ़ारसी साहित्यिक परंपराओं के सृजनात्मक समन्वय के कारण उन्हें इंडो-फ़ारसी साहित्य का वास्तविक शिल्पी माना जाता है।
इतिहास-लेखन
अमीर ख़ुसरो ने साहित्य के साथ-साथ इतिहास-लेखन में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। उनकी प्रारंभिक मसनवी ‘मिफ़्ताह-उल-फ़ुतूह’ में सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की विजयों का वर्णन मिलता है। ‘ख़ज़ाइन-उल-फ़ुतूह’ (तारीख़-ए-अलायी) में अलाउद्दीन खिलजी की सैन्य सफलताओं, प्रशासन और शासन-व्यवस्था का विस्तृत चित्रण किया गया है। ‘नूह सिपिहर’ (1318 ई.) में उन्होंने भारत की प्राकृतिक संपदा, भाषाओं, समाज और सांस्कृतिक वैभव का प्रभावशाली वर्णन प्रस्तुत किया। उनकी अंतिम ऐतिहासिक मसनवी ‘तुग़लक़नामा’ में खिलजी वंश के पतन, ख़ुसरो ख़ाँ के उदय-पतन तथा ग़ियासुद्दीन तुगलक द्वारा तुगलक वंश की स्थापना का सजीव विवरण मिलता है। इन कृतियों के कारण अमीर ख़ुसरो सल्तनतकालीन इतिहास के महत्त्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत माने जाते हैं।
ख़म्सा, ग़ज़ल और भारतीय शैली का विकास
अमीर ख़ुसरो की सर्वाधिक प्रसिद्ध साहित्यिक उपलब्धि उनकी ‘ख़म्सा’ है, जिसकी रचना उन्होंने निज़ामी गंजवी की ‘ख़म्सा’ से प्रेरित होकर की। इसमें ‘मतला-उल-अनवार’, ‘शिरीन-ओ-ख़ुसरो’, ‘लैला-ओ-मजनूँ’, ‘आइना-ए-सिकंदरी’ तथा ‘हश्त-बिहिश्त’ जैसी पाँच मसनवियाँ सम्मिलित हैं। यद्यपि इनका आधार फ़ारसी परंपरा थी, किंतु भारतीय परिवेश, नवीन कल्पना और मौलिक अभिव्यक्ति ने इन्हें विशिष्ट बना दिया। उन्होंने ग़ज़ल साहित्य को भी नई दिशा प्रदान की तथा अमीर हसन सिज्जी देहलवी के साथ भारत में इंडो-फ़ारसी ग़ज़ल की सुदृढ़ परंपरा विकसित की। उनकी रचनाओं में भारतीय प्रतीकों, कल्पनाशीलता और सूक्तिपरक शैली का ऐसा समन्वय मिलता है, जिसने आगे चलकर ‘सब्क़-ए-हिंदी’ (भारतीय शैली) के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
भारतीय भाषाओं और संस्कृति का समन्वय
अमीर ख़ुसरो का सबसे स्थायी योगदान फ़ारसी और भारतीय भाषाओं के मध्य सांस्कृतिक सेतु का निर्माण था। ‘नूह सिपिहर’ में उन्होंने सिंधी, पंजाबी, कश्मीरी, गुजराती तथा अन्य भारतीय भाषाओं का उल्लेख करते हुए उत्तर भारत की लोकभाषा के लिए ‘हिंदवी’ शब्द का प्रयोग किया। यद्यपि उनकी अधिकांश रचनाएँ फ़ारसी में हैं, फिर भी उनकी हिंदवी पहेलियाँ, मुकरियाँ, दोहे और गीत भारतीय लोकजीवन से उनके गहरे जुड़ाव का प्रमाण हैं। उन्होंने फ़ारसी साहित्य में भारतीय प्रकृति, संगीत, लोकसंस्कृति और सामाजिक जीवन को स्थान देकर एक ऐसी साहित्यिक परंपरा का विकास किया, जिसमें भारतीय और फ़ारसी संस्कृतियों का स्वाभाविक समन्वय दिखाई देता है। इसी कारण अमीर ख़ुसरो भारतीय सांस्कृतिक समन्वय और इंडो-फ़ारसी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि माने जाते हैं।
सूफ़ी संतों का साहित्यिक योगदान
मध्यकालीन भारत में फ़ारसी साहित्य के विकास में सूफ़ी संतों का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। फ़ारसी साहित्य का विकास केवल राजदरबारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सूफ़ी ख़ानक़ाहें भी साहित्य, अध्यात्म और सांस्कृतिक संवाद के प्रमुख केंद्र बन गईं। विशेष रूप से चिश्ती सिलसिले के संतों ने फ़ारसी भाषा को आध्यात्मिक अनुभूति, नैतिक शिक्षा, ईश्वर-प्रेम, मानवीय करुणा तथा धार्मिक सहिष्णुता की अभिव्यक्ति का प्रभावशाली माध्यम बनाया। सूफ़ियों की सरल, उदार और लोकाभिमुख शिक्षाओं ने फ़ारसी साहित्य को जनसामान्य से जोड़ा तथा उसे भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश के अनुरूप नया स्वरूप प्रदान किया। इसी वातावरण में फ़ारसी गद्य की एक विशिष्ट विधा ‘मलफ़ूज़ात’ (संतों के उपदेशों, वार्तालापों और प्रवचनों का संकलन) का विकास हुआ, जिसने इंडो-फ़ारसी साहित्य को स्थायी आधार प्रदान किया।
मलफ़ूज़ात साहित्य का विकास
मलफ़ूज़ात साहित्य सूफ़ी संतों के आध्यात्मिक विचारों और जीवन-दर्शन का प्रामाणिक स्रोत है। इस परंपरा की सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति अमीर हसन सिज्जी देहलवी द्वारा संकलित ‘फ़वाइद-उल-फ़ुआद’ है, जिसमें हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के उपदेश, संवाद और आध्यात्मिक शिक्षाएँ संग्रहीत हैं। यद्यपि यह ग्रंथ फ़ारसी में लिखा गया है, तथापि इसमें अनेक स्थानों पर हिंदवी शब्दों, स्थानीय मुहावरों तथा भारतीय सांस्कृतिक संदर्भों का प्रयोग मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय परिवेश में फ़ारसी भाषा ने स्थानीय भाषाओं और संस्कृति को आत्मसात कर लिया था। इसी कारण यह ग्रंथ केवल धार्मिक साहित्य ही नहीं, बल्कि मध्यकालीन भारतीय समाज, भाषा और संस्कृति के अध्ययन का भी महत्त्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
प्रमुख सूफ़ी साहित्यकार और उनकी कृतियाँ
सूफ़ी संतों ने अपनी रचनाओं और शिक्षाओं के माध्यम से फ़ारसी रहस्यवादी साहित्य को समृद्ध बनाया। ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने प्रेम, सेवा और मानवता के आदर्शों को प्रतिष्ठित कर फ़ारसी आध्यात्मिक साहित्य को नई दिशा दी। उनके शिष्य शेख़ हमीदुद्दीन नागौरी के उपदेशों का संकलन हमीद कलंदर ने ‘सुरूर-उस-सुदूर’ में किया। इसी प्रकार अमीर खुर्द की ‘सियार-उल-औलिया’, शेख़ नासिरुद्दीन चिराग़ देहलवी से संबंधित ‘ख़ैर-उल-मजलिस’ तथा शेख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी की ‘अख़बार-उल-अख़ियार’ जैसी कृतियाँ सूफ़ी संतों के जीवन, विचारों और आध्यात्मिक परंपरा की अमूल्य धरोहर हैं। इन ग्रंथों में केवल धार्मिक सिद्धांत ही नहीं, बल्कि तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक जीवन का भी सजीव चित्रण मिलता है।
तुगलक काल में फ़ारसी इतिहास-लेखन और गद्य साहित्य
तुगलक शासकों के शासनकाल में भी फ़ारसी साहित्य निरंतर विकसित होता रहा। मुहम्मद बिन तुगलक स्वयं विद्वान तथा साहित्य-प्रेमी शासक था। उसके संरक्षण में ज़ियाउद्दीन बरनी ने ‘तारीख़-ए-फ़िरोज़शाही’ और ‘फ़तवा-ए-जहाँदारी’ जैसी महत्त्वपूर्ण कृतियों की रचना की। बरनी की ‘तारीख़-ए-फ़िरोज़शाही’ में बलबन से लेकर फ़िरोज़शाह तुगलक के प्रारंभिक शासनकाल तक का क्रमबद्ध इतिहास मिलता है। इसी काल में इसामी ने ‘फ़ुतूह-उस-सलातीन’ की रचना की, जिसमें ग़ज़नवी आक्रमणों से लेकर मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल तक की घटनाओं का वर्णन है। बद्र-ए-चाच ने अपनी प्रशस्ति-काव्य रचनाओं द्वारा दरबारी काव्य-परंपरा को समृद्ध किया।
फ़िरोज़शाह तुगलक और इंशा साहित्य
फ़िरोज़शाह तुगलक भी साहित्य और विद्या का संरक्षक था। उसने अपनी आत्मकथात्मक कृति ‘फ़ुतूहात-ए-फ़िरोज़शाही’ में अपने शासनकाल की उपलब्धियों का वर्णन किया है। उसके समय शम्स-ए-सिराज अफ़ीफ़ ने ‘तारीख़-ए-फ़िरोज़शाही’ की रचना कर फ़िरोज़शाह के शासन का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया। इसी युग में इंशा साहित्य (पत्र-लेखन साहित्य) का भी उल्लेखनीय विकास हुआ। ऐन-उल-मुल्क मुल्तानी के पत्रों का संग्रह ‘इंशा-ए-महरू’ फ़ारसी गद्य की उत्कृष्ट कृति है। यह ग्रंथ तत्कालीन प्रशासन, कूटनीति और राजनीतिक व्यवस्था के अध्ययन का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
दक्षिण भारत में फ़ारसी साहित्य का विस्तार
मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा राजधानी को अस्थायी रूप से दिल्ली से दौलताबाद स्थानांतरित करने के परिणामस्वरूप फ़ारसी भाषा और साहित्य का प्रभाव दक्षिण भारत तक पहुँचा। बाद में बहमनी, बीजापुर, गोलकुंडा तथा अन्य दक्कनी राज्यों ने भी फ़ारसी साहित्य को संरक्षण प्रदान किया। बहमनी राज्य के प्रसिद्ध मंत्री महमूद गवाँ की ‘रियाज़-उल-इंशा’ फ़ारसी पत्र-साहित्य की उत्कृष्ट कृति है। इसी प्रकार इसामी की ‘फ़ुतूह-उस-सलातीन’ दक्कन में रचित एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक मसनवी है, जिसमें ग़ज़नवी काल से लेकर बहमनी राज्य की स्थापना तक का इतिहास वर्णित है।
मध्यकालीन भारत में सूफ़ी संतों और फ़ारसी साहित्यकारों ने मिलकर एक ऐसी साहित्यिक परंपरा का निर्माण किया, जिसमें अध्यात्म, इतिहास, नैतिकता, प्रेम और सांस्कृतिक समन्वय का अद्भुत संगम दिखाई देता है। चिश्ती सूफ़ियों की मानवीय दृष्टि, मलफ़ूज़ात साहित्य की समृद्ध परंपरा, बरनी और अफ़ीफ़ जैसे इतिहासकारों की ऐतिहासिक कृतियाँ तथा दक्कन में फ़ारसी साहित्य के प्रसार ने इंडो-फ़ारसी साहित्य को एक स्वतंत्र और विशिष्ट पहचान प्रदान की। यही साहित्यिक परंपरा आगे चलकर मुग़ल युग में अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँची और भारतीय सांस्कृतिक इतिहास की अमूल्य धरोहर बन गई।
तैमूर के आक्रमण के बाद फ़ारसी साहित्य
1398 ईस्वी में तैमूर (तैमूरलंग) के भारत आक्रमण ने दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्था को गहरा आघात पहुँचाया। दिल्ली की व्यापक लूट, नरसंहार और विनाश के कारण राजधानी का साहित्यिक एवं बौद्धिक जीवन अस्थायी रूप से अवरुद्ध हो गया। अनेक कवि, इतिहासकार, सूफ़ी संत और विद्वान दिल्ली छोड़कर जौनपुर, गुजरात, मालवा, बंगाल तथा दक्कन जैसे क्षेत्रीय राज्यों में चले गए। फलस्वरूप फ़ारसी साहित्य का केंद्र केवल दिल्ली तक सीमित न रहकर विभिन्न प्रादेशिक दरबारों में फैल गया। इस प्रकार तैमूर का आक्रमण तत्कालीन साहित्यिक गतिविधियों के लिए विनाशकारी अवश्य था, किंतु उसने फ़ारसी साहित्य की परंपरा को समाप्त नहीं किया। इसके विपरीत, क्षेत्रीय सल्तनतों के संरक्षण में फ़ारसी साहित्य नए केंद्रों में विकसित होने लगा, जिसने आगे चलकर मुग़ल काल के साहित्यिक उत्कर्ष की आधारभूमि तैयार की।
सैय्यद काल में फ़ारसी साहित्य का विकास
तैमूर के आक्रमण के बाद स्थापित सैय्यद वंश (1414–1451 ई.) राजनीतिक दृष्टि से अपेक्षाकृत दुर्बल था, फिर भी फ़ारसी भाषा और साहित्य का विकास निरंतर जारी रहा। इस काल की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक कृति याह्या बिन अहमद सरहिंदी द्वारा रचित ‘तारीख़-ए-मुबारकशाही’ है। यह ग्रंथ फ़िरोज़शाह तुगलक के उत्तरकाल से लेकर सैय्यद शासन तक की घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण प्रस्तुत करता है और दिल्ली सल्तनत के उत्तरकालीन इतिहास का प्रमुख स्रोत माना जाता है। इस काल में इतिहास-लेखन की परंपरा जीवित रही तथा फ़ारसी प्रशासन और दरबारी संस्कृति की प्रमुख भाषा बनी रही।
लोदी काल में फ़ारसी साहित्य का विकास
1451 ईस्वी में लोदी वंश की स्थापना के साथ फ़ारसी साहित्य को पुनः नई गति मिली। यद्यपि लोदी शासक अफ़ग़ान मूल के थे और तुर्क सुल्तानों की अपेक्षा अधिक सरल जीवन-शैली अपनाते थे, फिर भी उन्होंने प्रशासन, न्याय और साहित्य में फ़ारसी की प्रतिष्ठा को बनाए रखा। इस युग में फ़ारसी केवल राजभाषा ही नहीं रही, बल्कि शिक्षित वर्ग और प्रशासनिक अधिकारियों की अनिवार्य भाषा बन गई। सरकारी सेवाओं, न्यायालयों तथा राजस्व विभाग में नियुक्ति के लिए फ़ारसी का ज्ञान आवश्यक माना जाने लगा। परिणामस्वरूप अनेक हिंदू अधिकारी, मुंशी और विद्वान भी फ़ारसी का अध्ययन करने लगे।
लोदी वंश के संस्थापक बहलोल लोदी विद्वानों और साहित्यकारों का सम्मान करता था, किंतु फ़ारसी साहित्य का वास्तविक विकास उसके उत्तराधिकारी सिकंदर लोदी (1489–1517 ई.) के शासनकाल में हुआ। सिकंदर स्वयं विद्वान, साहित्य-प्रेमी तथा कवि था और ‘गुलरुख’ उपनाम से फ़ारसी कविता लिखता था। उसकी साहित्यिक अभिरुचि के कारण अरब, ईरान और मध्य एशिया से अनेक कवि, दार्शनिक तथा विद्वान उसकी राजधानी आगरा पहुँचे। उसने प्रसिद्ध विद्वान शेख़ जमाली को विशेष सम्मान दिया। शेख़ जमाली ने ‘मेहर-ओ-माह’ तथा ‘सियर-उल-आरिफ़ीन’ जैसी महत्त्वपूर्ण कृतियों की रचना की। सिकंदर लोदी के दरबार में अब्दुल्लाह तिलंबी, अज़ीज़ुल्लाह तिलंबी, मौलाना सद्रुद्दीन तथा मौलाना अब्दुर्रहमान जैसे विद्वान भी प्रतिष्ठित थे।
अनुवाद और शब्दकोश-परंपरा का विकास
लोदी काल की एक उल्लेखनीय विशेषता भारतीय ज्ञान-परंपराओं का फ़ारसी में अनुवाद था। सिकंदर लोदी के आदेश से आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘महावैद्यक’ का फ़ारसी अनुवाद ‘तिब्ब-ए-सिकंदरी’ नाम से कराया गया। इससे भारतीय चिकित्सा-विज्ञान फ़ारसी भाषी जगत तक पहुँचा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहन मिला।
इसी काल में फ़ारसी भाषा के व्यवस्थित अध्ययन हेतु शब्दकोशों का निर्माण भी हुआ। ज़ियाउद्दीन मुहम्मद द्वारा रचित ‘तुहफ़त-उस-सआदत’ अथवा ‘फ़रहंग-ए-सिकंदरी’ (1510 ई.) इस युग का प्रमुख फ़ारसी शब्दकोश है। इसके अतिरिक्त, शेख़ मुहम्मद बिन शेख़ लाड द्वारा रचित ‘मुअय्यद-उल-फ़ुज़ला’ (1519 ई.) में अरबी, फ़ारसी और तुर्की मूल के शब्दों का सुव्यवस्थित संकलन किया गया। इन ग्रंथों ने भारत में फ़ारसी भाषाविज्ञान और भाषा-अध्ययन की परंपरा को सुदृढ़ किया।
सूफ़ी साहित्य और सांस्कृतिक समन्वय
राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद सूफ़ी साहित्य का विकास निरंतर चलता रहा। चिश्ती और अन्य सूफ़ी संप्रदायों ने फ़ारसी को आध्यात्मिक चिंतन, नैतिक शिक्षा और धार्मिक अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम बनाए रखा। शेख़ जमाली इस युग के प्रमुख सूफ़ी कवि थे। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘सियर-उल-आरिफ़ीन’ में ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती तथा चिश्ती सिलसिले के अन्य प्रमुख संतों के जीवन और आध्यात्मिक विचारों का विस्तृत वर्णन मिलता है। इस प्रकार सूफ़ी साहित्य ने फ़ारसी भाषा को केवल दरबारी भाषा न रहने देकर उसे समाज, धर्म और संस्कृति से भी घनिष्ठ रूप से जोड़ दिया।
तैमूर के आक्रमण के बाद फ़ारसी साहित्य का केंद्र दिल्ली से निकलकर अनेक क्षेत्रीय राज्यों में फैल गया। सैय्यद और लोदी शासकों ने राजनीतिक कठिनाइयों के बावजूद फ़ारसी भाषा और साहित्य को संरक्षण दिया। इतिहास-लेखन, अनुवाद-साहित्य, शब्दकोश-निर्माण, सूफ़ी काव्य तथा हिंदू विद्वानों की बढ़ती भागीदारी ने इस काल को संक्रमण और पुनरुत्थान का युग बना दिया। यही साहित्यिक परंपरा आगे चलकर मुग़ल काल में अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँची और भारत को ईरान के बाहर फ़ारसी भाषा एवं साहित्य का सबसे महत्त्वपूर्ण केंद्र बना दिया।
प्रादेशिक राज्यों में फ़ारसी साहित्य का विकास
दिल्ली सल्तनत के विघटन तथा तैमूर के आक्रमण के पश्चात् राजनीतिक शक्ति अनेक प्रादेशिक राज्यों में विभाजित हो गई। यद्यपि इससे दिल्ली का साहित्यिक प्रभुत्व कम हुआ, परंतु फ़ारसी साहित्य का विकास बाधित नहीं हुआ। इसके विपरीत बंगाल, जौनपुर, गुजरात, मालवा, बहमनी राज्य तथा खानदेश जैसे स्वतंत्र राज्यों ने विद्वानों, कवियों, इतिहासकारों और सूफ़ी संतों को उदार संरक्षण प्रदान किया। फलस्वरूप फ़ारसी साहित्य का केंद्र दिल्ली से निकलकर विभिन्न प्रादेशिक राजधानियों तक फैल गया और भारत में इंडो-फ़ारसी साहित्यिक परंपरा को व्यापक आधार प्राप्त हुआ।
जौनपुर : शीराज़-ए-हिंद
शर्की वंश के संरक्षण में जौनपुर मध्यकालीन भारत का एक प्रमुख साहित्यिक एवं शैक्षिक केंद्र बन गया। अपनी समृद्ध विद्वत् परंपरा के कारण इसे ‘शीराज़-ए-हिंद’ की उपाधि प्राप्त हुई। यहाँ ईरान, मध्य एशिया, अरब तथा दक्कन से अनेक कवि, इतिहासकार, सूफ़ी संत और विद्वान आकर बस गए। शर्की शासकों ने मदरसों, पुस्तकालयों तथा विद्वानों को संरक्षण देकर फ़ारसी भाषा और साहित्य के विकास को प्रोत्साहित किया। क़ाज़ी शिहाबुद्दीन, मखदूम ख़्वाजा ईसा ताज तथा शेख फ़िरोज़ जैसे विद्वानों ने जौनपुर की साहित्यिक प्रतिष्ठा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। परिणामस्वरूप यह नगर शिक्षा, दर्शन और फ़ारसी साहित्य का एक प्रमुख केंद्र बन गया।
गुजरात में फ़ारसी साहित्य
मुज़फ़्फ़री शासकों के अधीन गुजरात फ़ारसी साहित्य का एक समृद्ध केंद्र बनकर उभरा। फ़ारस, यमन, मिस्र और मध्य एशिया से अनेक विद्वान यहाँ आए तथा उन्हें राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ। गुजरात में इतिहास-लेखन, काव्य, दर्शन और धार्मिक साहित्य का उल्लेखनीय विकास हुआ। इस काल के प्रमुख इतिहासग्रंथों में ‘तारीख़-ए-अहमदशाही’, ‘मआसिर-ए-महमूदशाही’, ‘तबक़ात-ए-महमूदशाही’, ‘तारीख़-ए-सद्र-ए-जहाँ’, ‘तारीख़-ए-मुज़फ़्फ़रशाही’, ‘गंज-ए-मआनी’, ‘तारीख़-ए-बहादुरशाही’ तथा ‘तुहफ़त-उस-सआदा’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन ग्रंथों ने गुजरात के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास को सुरक्षित रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
मालवा में फ़ारसी साहित्य
दिलावर ख़ाँ गौरी द्वारा स्थापित मालवा राज्य में भी फ़ारसी राजभाषा होने के कारण साहित्य का उल्लेखनीय विकास हुआ। दिल्ली से अनेक विद्वान और साहित्यकार यहाँ आकर बस गए, जिससे मालवा एक महत्त्वपूर्ण बौद्धिक केंद्र बन गया। शिहाब हकीम ने ‘मआसिर-ए-महमूदशाही’ की रचना की, जबकि शेख अब्दुल्लाह ने दर्शनशास्त्र पर ‘लताइफ़-ए-ग़ैबियाह’ लिखकर उसे सुल्तान ग़ियासशाह को समर्पित किया। मौलाना आलिमुद्दीन ने ‘फ़ुसूस-उल-हिकम’ पर विद्वत्तापूर्ण टीकाएँ लिखीं तथा मुहम्मद बिन दाऊद मालवी ने अनवरी और ख़ाकानी के दीवानों पर महत्त्वपूर्ण भाष्य तैयार किए। इस काल में संस्कृत ग्रंथों के फ़ारसी अनुवाद को भी प्रोत्साहन मिला। विशेष रूप से पशु-चिकित्सा संबंधी संस्कृत ग्रंथ ‘शालिहोत्र’ का फ़ारसी अनुवाद भारतीय और फ़ारसी ज्ञान-परंपराओं के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है।
इन प्रादेशिक राज्यों के संरक्षण से फ़ारसी साहित्य का विकास केवल दरबारी संस्कृति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इतिहास, दर्शन, अनुवाद, काव्य और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से भारतीय बौद्धिक जीवन का अभिन्न अंग बन गया। यही प्रादेशिक साहित्यिक परंपराएँ आगे चलकर मुग़ल काल में फ़ारसी साहित्य के व्यापक उत्कर्ष का सुदृढ़ आधार सिद्ध हुईं।
मुग़ल काल : फ़ारसी साहित्य का स्वर्णयुग
1526 ई. में बाबर द्वारा मुग़ल साम्राज्य की स्थापना के साथ भारत-फ़ारसी साहित्य एक नए चरण में प्रवेश किया। यद्यपि बाबर और हुमायूँ ने फ़ारसी साहित्यिक परंपरा को संरक्षण दिया, किंतु इसका वास्तविक उत्कर्ष अकबर (1556–1605 ई.), जहाँगीर (1605–1627 ई.) और शाहजहाँ (1628–1658 ई.) के शासनकाल में हुआ। इसी कारण इस युग को भारत-फ़ारसी साहित्य का स्वर्णयुग कहा जाता है। इस अवधि में फ़ारसी साम्राज्य की राजभाषा होने के साथ-साथ प्रशासन, इतिहास-लेखन, कूटनीति, शिक्षा और उच्च संस्कृति की प्रमुख भाषा बन गई। मुग़ल सम्राटों ने कवियों, इतिहासकारों, अनुवादकों, सुलेखकारों और विद्वानों को उदार संरक्षण प्रदान किया, जिससे भारत फ़ारसी साहित्य का एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय केंद्र बन गया।
राजकीय संरक्षण के परिणामस्वरूप फ़ारसी साहित्य की विविध विधाओं—काव्य, गद्य, इतिहास, जीवनी, पत्र-साहित्य, सूफ़ी साहित्य तथा अनुवाद-साहित्य—का व्यापक विकास हुआ। ग़ज़ल, मसनवी, क़सीदा, रुबाई और मर्सिया जैसी काव्य-विधाओं को भारतीय परिवेश, प्रकृति, लोकजीवन और सांस्कृतिक अनुभवों से नई विषय-वस्तु एवं अभिव्यक्ति प्राप्त हुई। इसी काल में संस्कृत, प्राकृत तथा भारतीय भाषाओं के अनेक ग्रंथों का फ़ारसी में अनुवाद हुआ, जिससे भारतीय और ईरानी बौद्धिक परंपराओं का सृजनात्मक समन्वय स्थापित हुआ।
सफ़वी ईरान की राजनीतिक एवं धार्मिक परिस्थितियों के कारण बड़ी संख्या में फ़ारसी विद्वान, कवि, चित्रकार, सुलेखकार और इतिहासकार भारत आए। मुग़ल दरबार ने उन्हें सम्मान और संरक्षण प्रदान किया। साथ ही भारतीय विद्वानों, विशेषकर हिंदू साहित्यकारों, की सक्रिय भागीदारी ने भारत-फ़ारसी साहित्य को विशिष्ट स्वरूप प्रदान किया। फ़ैज़ी, अबुल फजल तथा बाद के काल में अब्दुल क़ादिर बेदिल जैसे साहित्यकारों ने फ़ारसी साहित्य को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। फ़ैज़ी ने शास्त्रीय फ़ारसी काव्य को भारतीय बिंबों और रूपकों से समृद्ध किया, जबकि अबुल फजल ने अपने उत्कृष्ट गद्य और इतिहास-लेखन द्वारा फ़ारसी साहित्य को असाधारण गरिमा प्रदान की।
मुग़ल काल में फ़ारसी इतिहास-लेखन भी अपने चरम पर पहुँचा। अबुल फजल की अकबरनामा और आइने-अकबरी तथा ख़ाफ़ी ख़ाँ की मुंतख़ब-उल-लुबाब तत्कालीन राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन के अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इसी प्रकार सूफ़ी साहित्य के विकास में चिश्ती और सुहरावर्दी संतों का उल्लेखनीय योगदान रहा। फ़वायद-उल-फ़ुआद तथा शेख़ अहमद सरहिंदी के मकतूबात जैसी कृतियों ने फ़ारसी को आध्यात्मिक चिंतन और नैतिक शिक्षाओं का प्रभावशाली माध्यम बनाया।
आधुनिक इतिहासकार फ्रांसेस प्रिचेट, सुनील शर्मा तथा रिचर्ड एम. ईटन के अनुसार भारत में विकसित फ़ारसी साहित्य केवल ईरानी परंपरा का विस्तार नहीं था, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक तत्त्वों से समन्वित एक स्वतंत्र भारत-फ़ारसी (इंडो-फ़ारसी) साहित्यिक परंपरा था। यद्यपि ब्रिटिश शासन के दौरान 1835 ई. में अंग्रेज़ी के प्रशासनिक भाषा बनने के बाद फ़ारसी का राजकीय महत्त्व घट गया, फिर भी उसकी साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत आज भी भारतीय इतिहास-लेखन, उर्दू भाषा, पांडुलिपियों, अभिलेखों तथा दक्षिण एशिया की साहित्यिक परंपराओं में स्पष्ट रूप से विद्यमान है।
अकबर का संरक्षण
अकबर का शासनकाल भारत-फ़ारसी साहित्य के इतिहास का सर्वाधिक गौरवपूर्ण चरण माना जाता है। उसकी उदार सांस्कृतिक नीति, राजनीतिक स्थिरता और विद्वानों के संरक्षण ने फ़ारसी साहित्य को अभूतपूर्व प्रोत्साहन प्रदान किया। अकबर ने साहित्य, इतिहास, दर्शन, धर्म तथा अनुवाद-कार्य को विशेष संरक्षण दिया, जिसके परिणामस्वरूप उसका दरबार भारत और ईरान के विद्वानों, कवियों तथा इतिहासकारों का प्रमुख केंद्र बन गया।
अकबर के प्रारंभिक राजकवि ग़ज़ाली मशहदी थे, जिन्हें ‘मलिक-उश-शुअरा’ (राजकवि) की उपाधि प्राप्त थी। उनके पश्चात् फ़ैज़ी इस पद पर आसीन हुए। फ़ैज़ी फ़ारसी साहित्य के महान कवि थे, जिन्होंने अपनी शास्त्रीय भाषा, कलात्मक शैली तथा मौलिक उपमाओं से फ़ारसी काव्य को समृद्ध किया। उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं, ऐतिहासिक प्रसंगों और स्थानीय बिंबों का सफल समावेश कर भारत-फ़ारसी साहित्य को नई दिशा प्रदान की।
फ़ैज़ी के समकालीन उर्फ़ी शीराज़ी भी अकबर के दरबार के प्रमुख कवियों में थे। उनकी रचनाओं में कल्पनाशीलता, भावनात्मक गहराई और शैलीगत नवीनता का सुंदर समन्वय मिलता है। जहाँ फ़ैज़ी का काव्य विद्वत्ता और संतुलित अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध है, वहीं उर्फ़ी की कविताएँ भावनात्मक प्रभाव और कल्पनाशीलता के लिए जानी जाती हैं। इन दोनों कवियों ने मिलकर मुग़लकालीन भारत-फ़ारसी काव्य को समृद्ध किया और उसके स्वर्णयुग की प्रतिष्ठा स्थापित की।
संस्कृत-फ़ारसी अनुवाद आंदोलन
अकबर के शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक उपलब्धियों में संस्कृत और फ़ारसी के मध्य व्यापक अनुवाद आंदोलन था। अकबर का उद्देश्य भारतीय और इस्लामी ज्ञान-परंपराओं के बीच संवाद स्थापित करना था। इसी उद्देश्य से फ़तेहपुर सीकरी में ‘मकतबख़ाना’ (अनुवाद विभाग) की स्थापना की गई। इस विभाग में ब्राह्मण पंडितों, जैन विद्वानों तथा फ़ारसी साहित्यकारों ने मिलकर अनेक संस्कृत ग्रंथों का फ़ारसी में अनुवाद किया। यह केवल भाषाई परिवर्तन नहीं था, बल्कि दो महान सभ्यताओं के बौद्धिक समन्वय का ऐतिहासिक प्रयास था।
महाभारत का फ़ारसी अनुवाद ‘रज़्मनामा’ इस आंदोलन की सबसे प्रसिद्ध उपलब्धि है। इसके अतिरिक्त, रामायण, सिंहासन बत्तीसी, कथासरित्सागर, योगवसिष्ठ तथा अनेक अन्य संस्कृत ग्रंथों का भी फ़ारसी अनुवाद किया गया। इन अनुवादों ने भारतीय दार्शनिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक विचारों को फ़ारसी भाषी संसार तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अबुल फजल
अकबर के दरबार के महान इतिहासकार अबुल फजल ‘अल्लामी’ ने भारत-फ़ारसी गद्य को अभूतपूर्व ऊँचाई प्रदान की। उनकी दो महान कृतियाँ—’अकबरनामा’ तथा ‘आइने-अकबरी’—भारतीय इतिहास के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्रोतों में गिनी जाती हैं।
‘अकबरनामा’ में बाबर से लेकर अकबर के शासनकाल तक का क्रमबद्ध राजनीतिक इतिहास मिलता है, जबकि ‘आइने-अकबरी’ मुग़ल प्रशासन, अर्थव्यवस्था, समाज, धर्म, सेना, कृषि, शिक्षा तथा सांस्कृतिक जीवन का विस्तृत विश्वकोशीय विवरण प्रस्तुत करती है।
अबुल फजल की ‘मुकातिबात-ए-अल्लामी’ (पत्र-संग्रह) भी भारत-फ़ारसी गद्य की उत्कृष्ट कृति मानी जाती है। उनकी लेखन शैली ने आगे आने वाले इतिहासकारों और गद्यकारों को गहराई से प्रभावित किया।
फ़ारसी साहित्य में हिंदू विद्वानों का योगदान
मुग़ल काल की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक यह थी कि फ़ारसी साहित्य अब केवल मुस्लिम विद्वानों तक सीमित नहीं रहा। प्रशासन में फ़ारसी के व्यापक उपयोग तथा अकबर की उदार धार्मिक नीति के परिणामस्वरूप अनेक हिंदू विद्वानों, मुंशियों और कवियों ने भी फ़ारसी भाषा में उत्कृष्ट साहित्य की रचना की। इससे फ़ारसी साहित्य का विषय-विस्तार हुआ और उसमें भारतीय सांस्कृतिक चेतना का समावेश बढ़ा।
राजा मनोहर दास, भूपत राय तथा अन्य अनेक हिंदू साहित्यकारों ने फ़ारसी काव्य और गद्य की विभिन्न विधाओं में उल्लेखनीय योगदान दिया। इन लेखकों ने भारतीय इतिहास, धर्म, दर्शन तथा लोकजीवन को फ़ारसी अभिव्यक्ति के माध्यम से प्रस्तुत किया। इससे फ़ारसी साहित्य अधिक बहुआयामी तथा भारतीय परिवेश के अनुकूल बन गया।
इसी परंपरा के सर्वाधिक प्रसिद्ध साहित्यकार चंद्रभान ब्राह्मण (मृत्यु 1662 ई. के लगभग) थे। वे शाहजहाँ (1628–1658 ई.) और दारा शिकोह के दरबार से जुड़े हुए थे। उन्होंने फ़ारसी गद्य और पद्य दोनों में उच्चकोटि की रचनाएँ कीं। उनकी आत्मकथात्मक कृति ‘चहार चमन’ तत्कालीन मुग़ल दरबार, प्रशासन, समाज तथा सांस्कृतिक जीवन का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। चंद्रभान की एक अन्य रचना ‘मुंशाआत-ए-ब्रह्मण’ है। चंद्रभान ब्राह्मण की भाषा सरल, प्रभावशाली और स्वाभाविक थी, जिसके कारण वे ‘सब्क़-ए-हिंदी’ की अत्यधिक अलंकारपूर्ण शैली से अलग एक संतुलित साहित्यिक परंपरा के प्रतिनिधि माने जाते हैं।
अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना
अकबर के नवरत्नों में सम्मिलित अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना (1556–1627 ई.) मुग़ल युग के उन विरले साहित्यकारों में थे जिन्होंने फ़ारसी तथा ब्रजभाषा दोनों में समान अधिकार के साथ लेखन किया।
रहीम की फ़ारसी कविताओं में दरबारी संस्कृति, नीति, दर्शन और सूफ़ी विचारधारा का प्रभाव मिलता है, जबकि उनके ब्रजभाषा के दोहे भारतीय लोकजीवन, नैतिकता तथा मानवीय संवेदनाओं के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। उनकी द्विभाषी साहित्यिक प्रतिभा यह प्रमाणित करती है कि मुग़ल दरबार में भाषाई सीमाएँ कठोर नहीं थीं, बल्कि फ़ारसी और भारतीय भाषाओं के बीच निरंतर सांस्कृतिक संवाद चलता रहता था।
‘सब्क़-ए-हिंदी’ का विकास
जहाँगीर और शाहजहाँ के शासनकाल में भारत-फ़ारसी साहित्य ने एक विशिष्ट काव्य-शैली विकसित की, जिसे ‘सब्क़-ए-हिंदी’ अथवा भारतीय शैली कहा जाता है। यद्यपि इसका नाम भारतीय शैली है, किंतु इसका प्रभाव आगे चलकर ईरान और मध्य एशिया तक पहुँचा।
इस शैली की प्रमुख विशेषताओं में नवीन कल्पना, गहन बौद्धिकता, सूक्ष्म प्रतीकों का प्रयोग, जटिल रूपक, दार्शनिक चिंतन, नैतिक विषयों की प्रधानता तथा भाषा में नवीन शब्दों और स्थानीय मुहावरों का समावेश था। इस शैली में कवि पारंपरिक उपमाओं तक सीमित नहीं रहते थे, बल्कि नवीन बिंबों और कल्पनाओं के माध्यम से भावों की अभिव्यक्ति करते थे।
इस साहित्यिक प्रवृत्ति के विकास में भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण का महत्त्वपूर्ण योगदान था। भारतीय प्रकृति, दर्शन, लोकसंस्कृति और भाषाई विविधता ने फ़ारसी काव्य को नवीन अभिव्यक्ति प्रदान की। यही कारण है कि ‘सब्क़-ए-हिंदी’ को फ़ारसी साहित्य के इतिहास में एक स्वतंत्र साहित्यिक आंदोलन माना जाता है।
फ़ारसी मुगल साम्राज्य की राजभाषा थी, इसलिए प्रशासन, इतिहास, काव्य, दर्शन और राजकीय अभिलेखों की प्रमुख भाषा भी वही रही। इस काल में फ़ारसी की दो विशिष्ट शैलियाँ विकसित हुईं—भारतीय शैली और ईरानी शैली। भारतीय शैली के प्रमुख प्रवर्तक अबुल फजल थे। उनकी गद्य-शैली अलंकारपूर्ण, जटिल तथा गूढ़ शब्द-विन्यास से युक्त थी। यद्यपि जहाँगीर ने इस शैली को विशेष प्रोत्साहन नहीं दिया, फिर भी शाहजहाँ के दरबार की वैभवपूर्ण संस्कृति की अभिव्यक्ति इसी शैली में सर्वाधिक प्रभावशाली ढंग से हुई। अबुल फजल की शैली का अनुसरण अब्दुल हमीद लाहौरी, चंद्रभान ब्राह्मण तथा मुहम्मद सालेह कंबू जैसे विद्वानों ने भी किया।
भारतीय एवं ईरानी फ़ारसी शैली
मुगलकालीन भारत में फ़ारसी भाषा ने भारतीय सांस्कृतिक परिवेश के अनुरूप नया स्वरूप ग्रहण किया। भारतीय जीवन, विचार, परंपराओं और भावनाओं के समन्वय से फ़ारसी साहित्य का भारतीयकरण हुआ, जिसके कारण उसकी अभिव्यक्ति मूल ईरानी परंपरा से भिन्न और अधिक व्यापक बन गई। दूसरी ओर, ईरान से आए प्रवासी कवियों और विद्वानों ने शुद्ध ईरानी शैली को भी जीवित रखा। इस प्रकार मुगलकाल में भारतीय और ईरानी दोनों साहित्यिक परंपराओं के समन्वय से फ़ारसी साहित्य ने अपनी परिपक्वता और समृद्धि का सर्वोच्च स्तर प्राप्त किया।
मुगलकालीन आत्मकथाएँ एवं ऐतिहासिक साहित्य
मुगलकाल फ़ारसी गद्य-साहित्य, इतिहास-लेखन तथा आत्मकथा-साहित्य के उत्कर्ष का युग था। बाबर को छोड़कर अधिकांश मुगल शासकों एवं समकालीन लेखकों ने अपनी रचनाएँ फ़ारसी भाषा में लिखीं। बाबर ने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा ‘तुज़ुक-ए-बाबरी’ (बाबरनामा) चगताई तुर्की भाषा में लिखी, जिसका बाद में अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना ने फ़ारसी में अनुवाद किया। अकबर के शासनकाल में गुलबदन बेगम ने ‘हुमायूँनामा’, बयाज़ीद बयात ने ‘तज़किरा-ए-हुमायूँ व अकबर’, जौहर आफ़ताबची ने ‘तज़किरात-उल-वाकिआत’ तथा सम्राट जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा ‘तुज़ुक-ए-जहाँगीरी’ की रचना फ़ारसी गद्य में की। ये सभी ग्रंथ साहित्यिक और ऐतिहासिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं।
प्रमुख ऐतिहासिक ग्रंथ
मुगलकाल में इतिहास-लेखन की समृद्ध परंपरा विकसित हुई। बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ तथा औरंगज़ेब के शासनकाल से संबंधित अनेक प्रामाणिक इतिहास-ग्रंथों की रचना की गई। शेख ज़ैन ख्वाफ़ी की ‘तबक़ात-ए-बाबरी’, ख़्वांदमीर की ‘क़ानून-ए-हुमायूँनी’, अबुल फजल की ‘अकबरनामा’ तथा ‘आइने-अकबरी’, अब्बास ख़ाँ सरवानी की ‘तारीख़-ए-शेरशाही’, निज़ामुद्दीन अहमद की ‘तबक़ात-ए-अकबरी’, फ़ैज़ी सरहिंदी की ‘अकबरनामा’, मुहम्मद आरिफ़ कंधारी की ‘तारीख़-ए-अकबरशाही’, अब्दुल हक़ की ‘तारीख़-ए-हक़्की’, मिर्ज़ा अलाउद्दौला क़ज़वीनी की ‘नफ़ाइस-उल-मआसिर’, हसन बेग रूमलू की ‘अहसान-उत-तवारीख़’, अब्दुल कादिर बदायूँनी की ‘मुंतख़ब-उत-तवारीख़’, असद बेग की ‘वाकिआत-ए-असद बेग’, अहमद यादगार की ‘तारीख़-ए-सलातीन-ए-अफ़ग़ाना’, नियामतुल्लाह की ‘मख़ज़न-ए-अफ़ग़ानी’, अब्दुल्लाह की ‘तारीख़-ए-दाऊदी’, मुहम्मद क़ासिम फ़िरिश्ता की ‘गुलशन-ए-इब्राहीमी’, मोतमद ख़ाँ की ‘इक़बालनामा-ए-जहाँगीरी’, मुहम्मद कामगार की ‘मआसिर-ए-जहाँगीरी’, अब्दुल हमीद लाहौरी, मुहम्मद वारिस तथा क़ज़वीनी के ‘बादशाहनामा’, मुहम्मद सालेह कंबू की ‘अमल-ए-सालेह’, इनायतुल्लाह ख़ाँ की ‘शाहजहाँनामा’, मुहम्मद काज़िम शीराज़ी की ‘आलमगीरनामा’, साक़ी मुस्तैद ख़ाँ की ‘मआसिर-ए-आलमगीरी’, भीमसेन की ‘नुस्ख़ा-ए-दिलकुशा’, ईश्वरदास नागर की ‘फ़ुतूहात-ए-आलमगीरी’ तथा सुजान राय भंडारी की ‘खुलासत-उत-तवारीख़’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ये ग्रंथ इतिहास के साथ-साथ फ़ारसी गद्य की उत्कृष्ट साहित्यिक परंपरा के भी प्रतिनिधि हैं।
पत्र-लेखन कला का विकास
मुगलकालीन गद्य-साहित्य में पत्र-लेखन (इंशा) का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान था। राजकीय, प्रशासनिक तथा निजी पत्रों की भाषा अत्यंत परिष्कृत, अलंकारपूर्ण और साहित्यिक होती थी। हुमायूँ के दरबार में ख़्वांदमीर ‘नामा-ए-नामी’ शैली के श्रेष्ठ लेखक माने जाते थे, जबकि मौलाना यूसुफ़ी की लेखन-शैली भी अत्यधिक प्रसिद्ध थी। शाह ताहिर के पत्रों का संग्रह ‘इंशा-ए-शाह ताहिर’ तथा ‘बदी-उल-इंशा’ जैसे ग्रंथ पत्र-लेखन की उत्कृष्ट परंपरा के उदाहरण हैं।
अकबर के शासनकाल में पत्र-लेखन कला का विशेष विकास हुआ। प्रारंभिक काल के फ़तहनामों का संकलन ‘मुंशाआत-ए-नमकीन’ में मिलता है। उत्तरार्द्ध में अबुल फजल, अबुल फ़तह तथा फ़ैज़ी ने इस विधा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। अबुल फजल के पत्रों का संकलन ‘मकतूबात-ए-अल्लामी’ अब्दुस्समद ने 1606–07 ईस्वी में तैयार किया, जबकि फ़ैज़ी के पत्र ‘लताइफ़-ए-फ़ैज़ी’ में संकलित हैं, जिसका संपादन नूरुद्दीन मुहम्मद ने 1625–26 ईस्वी में किया।
शाहजहाँ के समय चंद्रभान ब्राह्मण, जयसिंह, अफ़ज़ल ख़ाँ, अब्दुल्लाह ख़ाँ, फ़ाज़िल ख़ाँ, शेख इनायतुल्लाह, मुल्ला मुहम्मद जौनपुरी, हकीम हाज़िक, सैदा तथा मुल्ला तुग़रा के पत्र फ़ारसी गद्य के उत्कृष्ट नमूने माने जाते थे। इस काल के प्रमुख पत्र-संग्रहों में ‘मुंशाआत-ए-ब्राह्मण’, ‘जवाहर-उल-इंशा’, ‘इंशा-ए-मुनीर’, मुहम्मद सालेह कंबू का ‘बहार-ए-सुख़न’, ‘खुलासत-उस-सियाक’, सुजान राय का ‘खुलासत-उल-मकातिब’, औरंगज़ेब का ‘आदाब-ए-आलमगीरी’, इनायतुल्लाह ख़ाँ का ‘रुक़्क़ाआत-ए-आलमगीरी’, हमीदुद्दीन ख़ाँ का ‘अहकाम-ए-आलमगीरी’ तथा ‘अख़बारात-ए-दरबार-ए-मुअल्ला’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
संस्कृत ग्रंथों का फ़ारसी में अनुवाद
मुगलकाल में संस्कृत और फ़ारसी के मध्य सांस्कृतिक समन्वय को विशेष प्रोत्साहन मिला। अकबर ने संस्कृत ग्रंथों के फ़ारसी अनुवाद के लिए विशेष अनुवाद विभाग स्थापित कराया। उसके संरक्षण में अथर्ववेद, वाल्मीकि रामायण, लीलावती, हरिवंश पुराण, नल-दमयंती तथा सिंहासन बत्तीसी का फ़ारसी में अनुवाद किया गया। अथर्ववेद का अनुवाद हाजी इब्राहीम सरहिंदी ने विद्वानों के सहयोग से किया, जबकि मौलाना शैरी ने हरिवंश पुराण का फ़ारसी रूपांतरण किया।
अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना ने बाबर की ‘तुज़ुक-ए-बाबरी’ का चगताई तुर्की से फ़ारसी में अनुवाद कराया। अब्दुल कादिर बदायूँनी ने रामायण तथा महाभारत का संस्कृत से फ़ारसी में अनुवाद किया। महाभारत के फ़ारसी अनुवाद को ‘रज़्मनामा’ नाम दिया गया। शाहजहाँ के शासनकाल में दारा शिकोह ने स्वयं ‘भगवद्गीता’ तथा ‘योगवासिष्ठ’ का फ़ारसी अनुवाद किया। उसके मुंशी बनवालीदास ने ‘प्रबोधचंद्रोदय’ का ‘गुलज़ार-ए-हाल’ नाम से रूपांतरण किया, जबकि हरकरण ने रामायण का फ़ारसी अनुवाद प्रस्तुत किया। इन अनुवादों ने भारतीय और इस्लामी बौद्धिक परंपराओं के मध्य गहन सांस्कृतिक संवाद स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
धार्मिक साहित्य का विकास
मुगलकाल में मुस्लिम समाज की धार्मिक आस्था ने फ़ारसी गद्य-साहित्य को विशेष समृद्धि प्रदान की। विद्वानों ने क़ुरआन और हदीस पर टीकाएँ लिखीं, पैगंबर मुहम्मद के जीवन, ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन, सूफ़ी संतों तथा विभिन्न सूफ़ी सिलसिलों के सिद्धांतों पर अनेक ग्रंथों की रचना की। बाबर ने अपने आध्यात्मिक गुरु ख्वाजा उबैदुल्लाह अहरार के सम्मान में ‘रिसाला-ए-वालिदिया’ की रचना की। हुमायूँ के शासनकाल में अनेक विद्वानों ने क़ुरआन पर व्याख्यात्मक ग्रंथ लिखे और यह परंपरा अकबर के समय भी निरंतर जारी रही।
दारा शिकोह का योगदान
शाहजहाँ के शासनकाल में दारा शिकोह ने धार्मिक एवं दार्शनिक साहित्य को नई दिशा प्रदान की। उसने ‘सफ़ीनत-उल-औलिया’ में कादिरिया, चिश्तिया, सुहरावर्दिया, नक्शबंदिया तथा कुब्राविया सिलसिलों के प्रमुख सूफ़ी संतों की जीवनियाँ प्रस्तुत कीं। उसकी अन्य महत्त्वपूर्ण कृतियों में ‘रिसाला-ए-हक़नुमा’, ‘हसनात-उल-आरिफ़ीन’, ‘मज्मा-उल-बहरैन’, ‘सकीनत-उल-औलिया’ तथा ‘सिर्र-ए-अकबर’ उल्लेखनीय हैं। ‘सिर्र-ए-अकबर’ में उसने उपनिषदों का फ़ारसी अनुवाद कर भारतीय और इस्लामी आध्यात्मिक परंपराओं के मध्य समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। इसी काल में मोहसिन फ़ानी ने ‘दबिस्तान-ए-मज़ाहिब’ की रचना की, जिसमें भारत के विभिन्न धर्मों और संप्रदायों का तुलनात्मक विवेचन किया गया।
ज्ञान-विज्ञान संबंधी गद्य साहित्य
धार्मिक साहित्य के अतिरिक्त मुगलकालीन फ़ारसी गद्य में चिकित्सा, ज्योतिष, गणित, न्याय, नीतिशास्त्र, दर्शन, समाज-विज्ञान तथा कोश-निर्माण जैसे विविध विषयों पर भी उल्लेखनीय ग्रंथों की रचना हुई। इससे स्पष्ट होता है कि फ़ारसी केवल राजकीय या धार्मिक भाषा ही नहीं रही, बल्कि ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों की भी प्रमुख अभिव्यक्ति बन गई।
फ़ारसी काव्य का विकास
मुगलकाल में फ़ारसी काव्य ने भी उल्लेखनीय प्रगति की। बाबर स्वयं उच्चकोटि का कवि था। उसने अलीशीर नवाई तथा अन्य समकालीन मध्य एशियाई और ईरानी कवियों से प्रेरणा लेकर ग़ज़लें, रुबाइयाँ, मसनवियाँ तथा अन्य काव्य-रचनाएँ कीं। उसने अनेक कवियों को संरक्षण भी प्रदान किया। उसके पुत्र हुमायूँ, कामरान तथा अस्करी भी साहित्यिक अभिरुचि रखते थे। हुमायूँ ने तुर्की भाषा में ‘दीवान’ की रचना की, जबकि कामरान ने भी एक दीवान लिखा। अस्करी समय-समय पर फ़ारसी में कविताएँ रचता था।
फ़ैज़ी, अबुल फजल और दरबारी साहित्य
हुमायूँ के समय शेख ज़ैनुद्दीन ख्वाफ़ी, बकाई, मौलाना जुनूनी बदख्शी, अब्दुल वाजिद फ़रिग़ी, जानी तमन्नाई, हैदर बूनयानी, शाह ताहिर दक्खनी, ख्वाजा अय्यूब, क़ासिम काही तथा शेख जमाली जैसे कवि प्रसिद्ध थे। यद्यपि अकबर स्वयं कवि नहीं था, किंतु वह साहित्य और कला का महान संरक्षक था। उसके संरक्षण में ईरान और मध्य एशिया से अनेक कवि भारत आए और उन्होंने फ़ारसी काव्य को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
अबुल फजल ने ‘आइने-अकबरी’ में अकबरकालीन प्रमुख कवियों का विस्तृत परिचय दिया है। इनमें शेख अबुल फ़ैज़ फ़ैज़ी, ख्वाजा हुसैन सनाई, हुजूनी इस्फ़हानी, क़ासिम काही, ग़ज़ाली मशहदी, उर्फ़ी शीराज़ी, मैली हेराती, जाफ़र बेग क़ज़वीनी, हयाती गीलानी, शकेबी इस्फ़हानी, अनीसी, शामलू, नज़ीरी निशापुरी, शरीफ़ी कश्मीरी, सुबूही चगताई, मौशीकी, सलीही तथा मज़हरी प्रमुख थे। बदायूँनी और निज़ामुद्दीन अहमद ने भी अपने ग्रंथों में इन कवियों का उल्लेख किया है। अकबर की उदार धार्मिक नीति, वैचारिक स्वतंत्रता तथा सांस्कृतिक वातावरण ने फ़ारसी काव्य के विकास के लिए अत्यंत अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान कीं, जिसके परिणामस्वरूप भारत फ़ारसी साहित्य का एक प्रमुख केंद्र बन गया।
जहाँगीर और शाहजहाँ के दरबार के प्रमुख कवि
जहाँगीर और शाहजहाँ के शासनकाल में अनेक ईरानी तथा भारतीय कवि मुग़ल दरबार से जुड़े। इनमें तालिब आमुली, क़ुदसी मशहदी तथा अबू तालिब कलीम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन कवियों ने भारतीय शैली को परिष्कृत किया तथा फ़ारसी कविता में कल्पना और अभिव्यक्ति के नए आयाम जोड़े।
ईरान के प्रसिद्ध कवि साइब तबरीज़ी ने भी भारत में कई वर्ष व्यतीत किए। उन्होंने भारतीय शैली की मौलिकता की प्रशंसा करते हुए इसे फ़ारसी काव्य के विकास की नई दिशा माना। उनके माध्यम से ‘सब्क़-ए-हिंदी’ का प्रभाव पुनः ईरान तक पहुँचा।
अब्दुल क़ादिर बेदिल
भारत-फ़ारसी साहित्य के इतिहास में मिर्ज़ा अब्दुल क़ादिर बेदिल (1644–1720 ई.) का स्थान अत्यंत ऊँचा है। वे मुग़ल काल के महान दार्शनिक कवि तथा ‘सब्क़-ए-हिंदी’ के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि माने जाते हैं। बेदिल की कविताओं में सूफ़ी दर्शन, आत्मचिंतन, आध्यात्मिक अनुभव तथा मानवीय अस्तित्व के गूढ़ प्रश्नों का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण मिलता है। उनकी प्रमुख रचनाओं—’इरफ़ान’, ‘तिलिस्म-ए-हैरत’ तथा ‘तूर-ए-मारिफ़त’—में रहस्यवाद, दर्शन तथा वैज्ञानिक दृष्टि का अद्भुत समन्वय है। उनके साहित्य का प्रभाव भारत के साथ-साथ अफ़ग़ानिस्तान, मध्य एशिया और ईरान तक विस्तृत हुआ।
शब्दकोश-निर्माण और भाषावैज्ञानिक परंपरा
मुग़ल काल में फ़ारसी भाषा के अध्ययन और मानकीकरण के उद्देश्य से अनेक महत्त्वपूर्ण शब्दकोशों की रचना हुई। इन कोशों ने न केवल भारत में, बल्कि संपूर्ण फ़ारसी भाषी संसार में मानक ग्रंथों का स्थान प्राप्त किया।
जमालुद्दीन हुसैन इंजू द्वारा संकलित ‘फ़रहंग-ए-जहाँगीरी’ इस परंपरा की सबसे प्रसिद्ध कृति है। यह फ़ारसी शब्दों के अर्थ, प्रयोग और व्युत्पत्ति का विस्तृत कोश है। इसके अतिरिक्त, मुहम्मद हुसैन तबरीज़ी की ‘बुरहान-ए-क़ाति’ तथा अब्दुर्रशीद तत्तावी की ‘फ़रहंग-ए-रशीदी’ फ़ारसी भाषा-विज्ञान की उत्कृष्ट कृतियाँ हैं। इन ग्रंथों ने भारत में विकसित फ़ारसी भाषावैज्ञानिक परंपरा को अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्रदान की।
सम्राट जहाँगीर को अपने पूर्वज बाबर की भाँति साहित्य और कविता से विशेष अनुराग था। वह स्वयं फारसी में कविताएँ लिखता था तथा विद्वानों और कवियों का सम्मान करता था। उसकी पत्नी नूरजहाँ अरबी और फारसी दोनों भाषाओं की विदुषी थी तथा स्वयं भी काव्य-रचना करती थी। इसी प्रकार अरजुमंद बानू बेगम (मुमताज़ महल) को भी साहित्यिक अभिरुचि प्राप्त थी। जहाँगीर के शासनकाल में अनेक प्रतिभाशाली कवियों एवं साहित्यकारों को संरक्षण मिला, जिनमें इतिकाद ख़ाँ, ख़्वाजा शाहपुर, ख़्वाजा ख़्वाजगी राज़ी, मिर्ज़ा अहमद, अबुल हसन, आसफ़ ख़ाँ, शरीफ़ परमुली, क़ासिम ख़ाँ, मिर्ज़ा हिसामुद्दीन हसन, अबू सईद तथा जाफ़र बेग आसफ़ ख़ाँ प्रमुख थे। इतिमादुद्दौला के परिवार के अनेक सदस्य भी उच्चकोटि के कवि एवं साहित्यकार थे। उन्होंने दीवान, ग़ज़ल, रुबाई तथा मसनवी जैसी विधाओं में रचनाएँ कर फारसी साहित्य को समृद्ध बनाया।
ईरानी कवियों का प्रभाव और भारतीय परिवेश
हुमायूँ के शासनकाल से ही बड़ी संख्या में ईरानी कवि भारत आने लगे थे और यह प्रवृत्ति शाहजहाँ के काल तक निरंतर बनी रही। समकालीन ईरान में फारसी कविता अपेक्षाकृत परंपरागत एवं अलंकारप्रधान होती जा रही थी, जिससे उसमें मौलिकता और नवीन कल्पना का कुछ अभाव दिखाई देता है। किंतु भारत के बहुआयामी सांस्कृतिक वातावरण में पहुँचकर इन कवियों की रचनाओं में नवीन विषय, ताज़गी और सृजनात्मकता का विकास हुआ। भारतीय समाज, प्रकृति और सांस्कृतिक अनुभवों ने उनकी काव्य-दृष्टि को नई दिशा प्रदान की। परिणामस्वरूप भारत में विकसित फारसी काव्य-शैली ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई और फारसी साहित्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
शाहजहाँ काल का फारसी काव्य
शाहजहाँ का शासनकाल फारसी पद्य-साहित्य के उत्कर्ष का युग माना जाता है। इस समय अनेक भारतीय और ईरानी कवियों ने उत्कृष्ट काव्य-रचनाएँ प्रस्तुत कीं। प्रमुख कवियों में सादाई गीलानी, कलीम काशानी, कुदसी, साएब तबरीज़ी, मसीह, रफ़ी, मुनीर, शैदा, हाज़िक, ख़याली, दिलेरी, माहिर, ज़फ़र ख़ाँ अहसन तथा चंद्रभान ब्राह्मण विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन कवियों ने ग़ज़ल, क़सीदा, मसनवी और अन्य काव्य-विधाओं में उच्चकोटि की रचनाएँ प्रस्तुत कर फारसी काव्य को नवीन शैली, भाव-संपन्नता और कलात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की। भारतीय सांस्कृतिक परिवेश और दरबारी संरक्षण के कारण इस काल में फारसी कविता अपने चरम वैभव पर पहुँची।
दारा शिकोह और सांस्कृतिक समन्वय
शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह (1615–1659 ई.) भारत-फ़ारसी साहित्य में धार्मिक और सांस्कृतिक समन्वय के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रतिनिधि थे। वे सूफ़ी दर्शन तथा भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं के गहन अध्येता थे। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘मजमा-उल-बहरैन’ (दो सागरों का संगम) में उन्होंने वेदांत और इस्लामी सूफ़ी दर्शन के बीच समानताओं का विश्लेषण किया। उनका उद्देश्य यह सिद्ध करना था कि विभिन्न धार्मिक परंपराओं का अंतिम सत्य एक ही है।
दारा शिकोह ने लगभग पचास उपनिषदों का फ़ारसी में ‘सिर्र-ए-अकबर’ शीर्षक से अनुवाद कराया। इस अनुवाद ने भारतीय दार्शनिक विचारों को इस्लामी और यूरोपीय बौद्धिक जगत तक पहुँचाने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘सफ़ीनत-उल-औलिया’, ‘सकीनत-उल-औलिया’ तथा ‘हसनात-उल-आरिफ़ीन’ जैसी सूफ़ी कृतियों की भी रचना की।
सरमद और रहस्यवादी साहित्य
दारा शिकोह के समकालीन रहस्यवादी कवि सरमद काशानी भी भारत-फ़ारसी साहित्य की महत्त्वपूर्ण विभूति थे। मूलतः यहूदी परिवार में जन्मे सरमद बाद में सूफ़ी विचारधारा से प्रभावित हुए। उनकी रुबाइयों में आध्यात्मिक स्वतंत्रता, ईश्वर-प्रेम तथा मानवीय समानता की भावना व्यक्त होती है। उनकी रचनाएँ फ़ारसी रहस्यवादी साहित्य की उत्कृष्ट धरोहर मानी जाती हैं।
औरंगज़ेब का शासन और साहित्यिक परिवर्तन
1658 ई. में औरंगज़ेब के शासनारोहण के साथ मुग़ल सांस्कृतिक नीति में परिवर्तन दिखाई देता है। यद्यपि उन्होंने फ़ारसी को राजभाषा बनाए रखा तथा प्रशासनिक लेखन और इतिहास-लेखन को संरक्षण दिया, किंतु साहित्य, संगीत और चित्रकला के प्रति उनका दृष्टिकोण अपेक्षाकृत सीमित था। उनके शासनकाल में ‘मलिक-उश-शुअरा’ (राजकवि) का पद समाप्त कर दिया गया, जिससे दरबारी काव्य-परंपरा को आघात पहुँचा। इस काल में कविता अधिक आत्मनिष्ठ, दार्शनिक तथा रहस्यवादी होती गई। ग़नी कश्मीरी और नासिर अली सरहिंदी जैसे कवियों ने नैतिकता, आध्यात्मिक अनुभव तथा मानवीय जीवन के सूक्ष्म पक्षों को अपनी रचनाओं का विषय बनाया।
औरंगज़ेब के काल में फ़ारसी काव्य
औरंगज़ेब का शासनकाल निरंतर युद्धों, राजनीतिक संघर्षों और आंतरिक विद्रोहों से प्रभावित रहा, जिससे साहित्यिक गतिविधियों के लिए अपेक्षाकृत कम अनुकूल वातावरण उपलब्ध हो सका। यद्यपि औरंगज़ेब स्वयं विद्वान था, परंतु उसे काव्य में विशेष रुचि नहीं थी। इसके बावजूद उसके दरबार तथा प्रमुख अमीरों के संरक्षण में फारसी कविता का सृजन जारी रहा। इस काल के प्रमुख कवियों में हिम्मत ख़ाँ, गनी कश्मीरी, माहिर अकबराबादी, बीना कश्मीरी, गनीमत, तूरत मुसवी, रसिख सरहिंदी, नासिर अली सरहिंदी, आक़िल ख़ाँ राज़ी, जोया कश्मीरी, अशरफ़ माज़न्दरानी, नियामत ख़ाँ ‘आली’, ख़ालिस इस्फ़हानी तथा अब्दुल क़ादिर बेदिल उल्लेखनीय हैं। यद्यपि उन्हें पूर्ववर्ती सम्राटों जैसा व्यापक राजाश्रय प्राप्त नहीं हुआ, फिर भी सामंतों और अभिजात वर्ग के संरक्षण के कारण फारसी काव्य-परंपरा निरंतर विकसित होती रही और अपनी साहित्यिक गरिमा बनाए रखने में सफल रही।
अठारहवीं शताब्दी में मुग़ल साम्राज्य के पतन के साथ फ़ारसी साहित्य का राजनीतिक संरक्षण धीरे-धीरे कम होने लगा। इसी समय फ़ारसी और हिंदवी के दीर्घकालीन समन्वय से विकसित उर्दू एक स्वतंत्र साहित्यिक भाषा के रूप में उभरने लगी। प्रारंभ में इसे ‘रेख़्ता’ अथवा ‘हिंदुस्तानी’ कहा जाता था।
उर्दू ने फ़ारसी से विशाल शब्दावली, ग़ज़ल, मसनवी, क़सीदा, रुबाई जैसी साहित्यिक विधाएँ तथा अलंकारिक शैली ग्रहण की, जबकि उसका व्याकरण भारतीय बोलियों पर आधारित रहा। इस प्रकार उर्दू, फ़ारसी और भारतीय भाषाओं के सांस्कृतिक समन्वय की स्वाभाविक परिणति थी।
अठारहवीं शताब्दी में मुहम्मद अली हज़ीन लाहीजी जैसे ईरानी कवियों ने भारत आकर फ़ारसी साहित्य की परंपरा को आगे बढ़ाया। बाद में मिर्ज़ा ग़ालिब ने फ़ारसी और उर्दू दोनों भाषाओं में उत्कृष्ट काव्य की रचना की। यद्यपि वे उर्दू ग़ज़लों के लिए अधिक प्रसिद्ध हैं, स्वयं ग़ालिब फ़ारसी को अपनी श्रेष्ठ साहित्यिक भाषा मानते थे।
आधुनिक काल में मुहम्मद इक़बाल ने भी फ़ारसी और उर्दू दोनों में दार्शनिक काव्य की रचना की। उनकी ‘जावेद-नामा’ फ़ारसी मसनवी परंपरा की उत्कृष्ट कृति है और यह रूमी की परंपरा को आधुनिक रूप में आगे बढ़ाती है।
फ़ारसी काव्य की प्रमुख विधाएँ
यद्यपि 1835 ईस्वी में अंग्रेज़ी को प्रशासनिक भाषा बनाए जाने के बाद फ़ारसी का राजकीय महत्त्व समाप्त हो गया, फिर भी उसकी सांस्कृतिक विरासत आज भी भारतीय उपमहाद्वीप में जीवित है। इतिहास-लेखन, प्रशासनिक शब्दावली, सूफ़ी साहित्य, उर्दू भाषा, स्थापत्य अभिलेखों तथा पांडुलिपियों में फ़ारसी की अमिट छाप दिखाई देती है। मध्यकालीन भारत में विकसित इंडो-फ़ारसी साहित्य ने भारतीय और ईरानी सांस्कृतिक परंपराओं के समन्वय का जो आदर्श प्रस्तुत किया, वह विश्व साहित्य के इतिहास में एक अद्वितीय उदाहरण माना जाता है।
मुग़ल साम्राज्य का अवसान और उर्दू का उदय
मध्यकालीन भारत में फ़ारसी भाषा एवं साहित्य का अभूतपूर्व विकास हुआ, किंतु इसका यह अर्थ नहीं था कि अन्य भारतीय भाषाओं की साहित्यिक परंपराएँ समाप्त हो गईं। इसके विपरीत, इस काल में संस्कृत, अपभ्रंश, प्राकृत, हिंदवी, ब्रजभाषा, अवधी, पंजाबी तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी निरंतर साहित्य-सृजन होता रहा। चौदहवीं शताब्दी तक अपभ्रंश साहित्य का प्रभाव अवश्य कम होने लगा, किंतु भारतीय भाषाओं में धार्मिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक, तकनीकी तथा काव्य साहित्य की समृद्ध परंपरा निरंतर विकसित होती रही। इस प्रकार मध्यकालीन भारत की साहित्यिक संस्कृति मूलतः बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक थी।
प्राकृत एवं संस्कृत में तकनीकी साहित्य
फ़ारसी साहित्य के समानांतर प्राकृत एवं संस्कृत में भी ज्ञान-विज्ञान संबंधी महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना हुई। हरियाणा के प्रसिद्ध जैन विद्वान ठक्कर फेरू, जो अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में राजकीय टकसाल से जुड़े थे, ने प्राकृत-मिश्रित संस्कृत में गणित, मुद्रा-विज्ञान तथा रत्नशास्त्र पर अनेक ग्रंथों की रचना की। उनकी ‘रत्नपरीक्षा’ (1315 ई.), ‘द्रव्यपरीक्षा’ (1318 ई.) तथा ‘गणितसारकौमुदी’ जैसी कृतियाँ तत्कालीन आर्थिक, वैज्ञानिक तथा प्रशासनिक ज्ञान की उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इन ग्रंथों से स्पष्ट होता है कि फ़ारसी प्रशासनिक व्यवस्था के साथ-साथ भारतीय भाषाओं में भी व्यावहारिक एवं वैज्ञानिक साहित्य का विकास निरंतर जारी था।
भक्ति साहित्य और लोकभाषाओं का उत्कर्ष
मध्यकालीन भारत में फ़ारसी साहित्य के समानांतर भक्ति आंदोलन ने भारतीय भाषाओं को नई साहित्यिक ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। चंदबरदाई की ‘पृथ्वीराज रासो’, कबीर, गुरु नानक, सूरदास तथा गोस्वामी तुलसीदास की रचनाएँ इस काल की महान साहित्यिक उपलब्धियाँ हैं। विशेष रूप से ब्रजभाषा और अवधी साहित्य ने व्यापक लोकप्रियता प्राप्त की। मुग़ल काल में ब्रजभाषा भक्ति-काव्य के साथ-साथ दरबारी काव्य की भी प्रमुख भाषा बन गई। दूसरी ओर संस्कृत में भी नारायण की ‘स्वाहासुधाकरचंपू’ तथा ‘कल्याणमल्ल’ की अनंगरंग जैसी कृतियों के माध्यम से शास्त्रीय साहित्यिक परंपरा निरंतर जीवित रही।
संस्कृत में वैज्ञानिक साहित्य एवं भाषायी समन्वय
मध्यकाल में संस्कृत भाषा में भी वैज्ञानिक एवं भाषावैज्ञानिक ग्रंथों की रचना जारी रही। प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य नीलकण्ठ की ‘ताजिकनीलकण्ठी’ (1587 ई.) भारतीय और इस्लामी खगोलशास्त्रीय परंपराओं के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसी प्रकार वेदांगराय द्वारा रचित ‘पारसीप्रकाश’ (1643 ई.) संस्कृत-फ़ारसी शब्दकोश है, जो दोनों भाषाओं के बीच बौद्धिक संवाद का सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करता है। इससे स्पष्ट होता है कि फ़ारसी और संस्कृत का सम्बन्ध केवल अनुवाद तक सीमित नहीं था, बल्कि दोनों ज्ञान-परंपराएँ एक-दूसरे को समृद्ध भी कर रही थीं।
अवधी सूफ़ी प्रेमाख्यान और सांस्कृतिक समन्वय
फ़ारसी और भारतीय साहित्यिक परंपराओं का सबसे सुंदर समन्वय अवधी के सूफ़ी प्रेमाख्यानों में दिखाई देता है। मलिक मुहम्मद जायसी की ‘पद्मावत’ (लगभग 1540 ई.) में राजपूत जीवन, भारतीय लोककथाओं तथा फ़ारसी सूफ़ी दर्शन का अद्भुत समन्वय मिलता है। इसी प्रकार मंझन की ‘मधुमालती’ में भारतीय प्रेमकथा और फ़ारसी मसनवी परंपरा का सफल संयोजन दिखाई देता है। इन कृतियों ने भारतीय भाषाओं में इंडो-इस्लामी प्रेमाख्यान साहित्य की एक नवीन परंपरा का विकास किया।
समन्वित साहित्यिक संस्कृति की अवधारणा
मध्यकालीन भारत का साहित्यिक इतिहास किसी एक भाषा तक सीमित नहीं था। फ़ारसी, संस्कृत, हिंदवी, ब्रज, अवधी, पंजाबी तथा बाद में उर्दू—सभी भाषाएँ समानांतर रूप से विकसित हुईं और एक-दूसरे को निरंतर प्रभावित करती रहीं। महाभारत का फ़ारसी अनुवाद रज़्मनामा, अमीर ख़ुसरो की हिंदवी रचनाएँ, रहीम की द्विभाषी काव्य-परंपरा, जायसी की पद्मावत तथा पारसीप्रकाश जैसे द्विभाषी शब्दकोश इस सांस्कृतिक समन्वय के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
बारहवीं से अठारहवीं शताब्दी तक विकसित इंडो-फ़ारसी साहित्य विश्व की महान साहित्यिक परंपराओं में से एक था। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसने फ़ारसी और भारतीय भाषाओं के मध्य रचनात्मक संवाद स्थापित किया। परिणामस्वरूप एक ऐसी मिश्रित साहित्यिक संस्कृति का विकास हुआ, जो न तो पूर्णतः फ़ारसी थी और न ही पूर्णतः भारतीय, बल्कि दोनों के समन्वय से निर्मित एक विशिष्ट इंडो-फ़ारसी साहित्यिक परंपरा थी। यही बहुभाषिकता और सांस्कृतिक सहअस्तित्व मध्यकालीन भारतीय साहित्य की सबसे महत्त्वपूर्ण पहचान है।
फ़ारसी साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ
मध्यकालीन भारत में विकसित फ़ारसी साहित्य अपनी विषय-वस्तु, शैली और सांस्कृतिक समन्वय के कारण अत्यंत समृद्ध एवं विशिष्ट था। यह केवल ईरानी साहित्य की परंपरा का विस्तार नहीं था, बल्कि भारतीय परिवेश में विकसित एक स्वतंत्र इंडो-फ़ारसी साहित्यिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता था। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
फ़ारसी साहित्य में मसनवी, ग़ज़ल, क़सीदा, रुबाई, दीवान, तज़किरा, इतिहास-ग्रंथ, जीवनी, आत्मकथा तथा इंशा (पत्र-साहित्य) जैसी विविध विधाओं का उल्लेखनीय विकास हुआ। इससे साहित्य की विषय-वस्तु अत्यंत व्यापक बन गई फ़ारसी साहित्य की एक प्रमुख विशेषता प्रामाणिक इतिहास-लेखन है। सल्तनत और मुग़ल काल के इतिहास, प्रशासन, समाज तथा राजनीतिक घटनाओं का विस्तृत और क्रमबद्ध विवरण फ़ारसी ग्रंथों में सुरक्षित है। फ़ारसी साहित्य पर सूफ़ी संतों की आध्यात्मिक विचारधारा का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। प्रेम, मानवता, सहिष्णुता, ईश्वर-भक्ति और नैतिक जीवन इसके प्रमुख विषय रहे। भारतीय प्रकृति, ऋतु-चक्र, लोकजीवन, संगीत, रीति-रिवाज तथा सांस्कृतिक प्रतीकों को फ़ारसी साहित्य में स्थान मिला। अमीर ख़ुसरो जैसे साहित्यकारों ने फ़ारसी और भारतीय परंपराओं का सफल समन्वय स्थापित किया। फ़ारसी साहित्य अपनी अलंकारिक, मधुर, प्रभावशाली तथा कलात्मक शैली के लिए प्रसिद्ध है। इसमें उपमा, रूपक, प्रतीक और बिंबों का अत्यंत सुंदर प्रयोग मिलता है। संस्कृत तथा अन्य भारतीय ग्रंथों का फ़ारसी में अनुवाद कर भारतीय ज्ञान-परंपरा को व्यापक संसार से परिचित कराया गया। इससे विभिन्न संस्कृतियों के बीच बौद्धिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहन मिला। इस प्रकार फ़ारसी साहित्य इतिहास, धर्म, दर्शन, काव्य, सूफ़ी चिंतन और सांस्कृतिक समन्वय का अद्वितीय संगम है, जिसने मध्यकालीन भारत के साहित्यिक एवं बौद्धिक विकास में अमूल्य योगदान दिया।
फ़ारसी साहित्य का महत्त्व
मध्यकालीन भारत के सांस्कृतिक, बौद्धिक तथा साहित्यिक इतिहास में फ़ारसी साहित्य का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। लगभग छह शताब्दियों तक फ़ारसी राजभाषा रही। परिणामस्वरूप यह केवल शासन और प्रशासन तक सीमित नहीं रही, बल्कि इतिहास, दर्शन, धर्म, सूफ़ी चिंतन, काव्य, शिक्षा तथा कूटनीति की प्रमुख भाषा बन गई। इसी के माध्यम से भारत में एक समृद्ध भारत-फ़ारसी (इंडो-फ़ारसी) साहित्यिक परंपरा विकसित हुई, जिसने भारतीय और ईरानी सांस्कृतिक तत्त्वों का प्रभावशाली समन्वय प्रस्तुत किया।
ऐतिहासिक दृष्टि से फ़ारसी साहित्य मध्यकालीन भारत के अध्ययन का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार है। हसन निज़ामी, मिन्हाज-उस-सिराज, अमीर ख़ुसरो, ज़ियाउद्दीन बरनी, शम्स-ए-सिराज अफ़ीफ़ तथा अबुल फजल जैसे विद्वानों की कृतियाँ तत्कालीन राजनीतिक घटनाओं, प्रशासनिक व्यवस्था, आर्थिक जीवन, सामाजिक संरचना तथा सांस्कृतिक गतिविधियों का विस्तृत और प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करती हैं। इनके अभाव में मध्यकालीन भारतीय इतिहास का सम्यक् अध्ययन संभव नहीं है।
साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में भी फ़ारसी का प्रभाव अत्यंत व्यापक था। सूफ़ी संतों तथा कवियों ने इसे आध्यात्मिक विचारों, प्रेम, मानवता और सांस्कृतिक समन्वय की अभिव्यक्ति का प्रभावी माध्यम बनाया। अमीर ख़ुसरो जैसे साहित्यकारों ने भारतीय लोकजीवन, संगीत, प्रकृति तथा स्थानीय भाषाओं को फ़ारसी साहित्य से जोड़कर उसकी विषय-वस्तु और अभिव्यक्ति को समृद्ध किया। इसी प्रक्रिया ने आगे चलकर उर्दू भाषा तथा हिंदी, पंजाबी, सिंधी, गुजराती और बंगला जैसी भारतीय भाषाओं के शब्द-भंडार, शैली और साहित्यिक विकास को गहराई से प्रभावित किया।
अठारहवीं शताब्दी में मुग़ल साम्राज्य के पतन तथा ब्रिटिश सत्ता के विस्तार के साथ फ़ारसी का राजकीय महत्त्व काम हो गया। अंततः 1837 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी ने न्यायालयों और प्रशासन में फ़ारसी के स्थान पर अंग्रेज़ी तथा स्थानीय भाषाओं को अपना लिया, जिससे फ़ारसी का आधिकारिक प्रभुत्व समाप्त हो गया, किंतु उसकी साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपरा जीवित रही।
आज भी मध्यकालीन भारत के असंख्य ऐतिहासिक ग्रंथ, राजकीय अभिलेख, सूफ़ी रचनाएँ, आत्मकथाएँ तथा साहित्यिक कृतियाँ फ़ारसी में उपलब्ध हैं। भारतीय भाषाओं में प्रचलित अनेक शब्द, प्रशासनिक शब्दावली तथा साहित्यिक अभिव्यक्तियाँ फ़ारसी की स्थायी देन हैं। इस प्रकार फ़ारसी साहित्य केवल एक भाषा की साहित्यिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत का अमूल्य अंग है, जिसने इतिहास, साहित्य, भाषा और संस्कृति को स्थायी रूप से समृद्ध किया।




