दिल्ली सल्तनत के काल में राजत्व-सिद्धांत (Theory of Kingship during the Delhi Sultanate)

दिल्ली सल्तनत के काल में राजत्व-सिद्धांत (Theory of Kingship during the Delhi Sultanate)

दिल्ली सल्तनत के काल में राजत्व-सिद्धांत

Table of Contents

राजत्व-सिद्धांत की अवधारणा

दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों की शक्ति, प्रतिष्ठा तथा राजनीतिक प्रभाव का आकलन उनके द्वारा अपनाए गए राजत्व-सिद्धांत से किया जा सकता है। सल्तनत काल में राजसत्ता की अवधारणा स्थिर नहीं थी, बल्कि समय के साथ उसका क्रमिक विकास हुआ। इस विकास पर इस्लामी राजनीतिक विचारधारा, ईरानी राजकीय परंपराओं तथा भारतीय प्रशासनिक परिस्थितियों का संयुक्त प्रभाव दिखाई देता है। दिल्ली सल्तनत की शासन-व्यवस्था केवल सैन्य शक्ति पर आधारित नहीं थी, बल्कि उसकी वैधानिकता और गरिमा को सुदृढ़ करने के लिए एक सुस्पष्ट राजकीय सिद्धांत भी विकसित किया गया।

सल्तनत काल में मध्य एशिया, ईरान, खुरासान तथा इस्लामी जगत के अन्य भागों से अनेक विद्वान, इतिहासकार, विधिवेत्ता, सूफी, प्रशासक, साहित्यकार, कलाकार, अमीर तथा राजकुमार भारत आए। वे अपने साथ अपने-अपने क्षेत्रों की राजनीतिक धारणाएँ, प्रशासनिक परंपराएँ और सांस्कृतिक आदर्श भी लेकर आए। इन प्रवासियों के प्रभाव से दिल्ली सल्तनत के शासकों की राजनीतिक सोच विकसित हुई और उन्होंने भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप एक विशिष्ट राजत्व-सिद्धांत का निर्माण किया।

इल्तुतमिश और राजत्व-सिद्धांत की प्रारंभिक स्थापना

दिल्ली सल्तनत में सुव्यवस्थित राजत्व-सिद्धांत का प्रारंभ शम्सुद्दीन इल्तुतमिश के शासनकाल से माना जाता है। इतिहासकार राम प्रसाद त्रिपाठी ने भी यह मत व्यक्त किया है कि दिल्ली सल्तनत की वास्तविक प्रभुसत्ता और वैधानिक राजसत्ता का विकास इल्तुतमिश के शासनकाल में ही हुआ। कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा स्थापित राज्य को स्थायित्व और वैधानिक स्वरूप प्रदान करने का श्रेय इल्तुतमिश को ही प्राप्त है।

इल्तुतमिश ने दिल्ली को तुर्की राज्य की स्थायी राजधानी बनाया। इसके साथ ही दिल्ली राजनीतिक, प्रशासनिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गई। उसकी प्रतिष्ठा इतनी बढ़ी कि उसे ‘हज़रत-ए-दिल्ली’ अथवा ‘शहर-ए-दिल्ली’ जैसी सम्मानसूचक उपाधियों से संबोधित किया जाने लगा। राजधानी के रूप में दिल्ली के विकास ने सुल्तान की सत्ता को भी नई वैधानिकता प्रदान की।

ईरानी परंपरा का प्रभाव

इल्तुतमिश ने अपने शासन को सुदृढ़ बनाने के लिए ईरानी राजकीय परंपराओं से प्रेरणा ग्रहण की। उसने निरंकुश राजसत्ता की अवधारणा को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाया। मध्यकालीन स्रोतों में उल्लेख मिलता है कि उसने ईरानी राजनीतिक परंपराओं से संबंधित ग्रंथों का अध्ययन कराया, जिनमें सासानी सम्राटों की राजकीय गरिमा, राजकीय अनुशासन तथा निरंकुश शासन की अवधारणा का विस्तृत वर्णन था। यद्यपि उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाणों से इन ग्रंथों के नामों की पूर्ण पुष्टि नहीं होती, फिर भी यह स्पष्ट है कि ईरानी राजनीतिक विचारधारा ने उसके शासन को गहराई से प्रभावित किया।

इल्तुतमिश स्वयं को खलीफा का प्रतिनिधि तथा इस्लाम का संरक्षक मानता था। साथ ही वह यह भी मानता था कि सुल्तान का पद सामान्य व्यक्तियों से ऊपर है और उसकी सत्ता दैवी संरक्षण से संपन्न है। उसकी राजनीतिक स्थिति इसलिए भी सुदृढ़ थी क्योंकि उसे अब्बासी खलीफा से वैधानिक मान्यता प्राप्त हो चुकी थी। इसके अतिरिक्त उसे चहलगानी (चालीस तुर्की अमीरों का दल) तथा ताजिक अधिकारियों का भी पर्याप्त सहयोग प्राप्त था, जिससे उसकी राजसत्ता मजबूत हुई।

बलबन का राजत्व-सिद्धांत

दिल्ली सल्तनत में राजत्व-सिद्धांत का सर्वाधिक विकसित स्वरूप ग़ियासुद्दीन बलबन (1266–1287 ई.) के शासनकाल में दिखाई देता है। उसने सुल्तान की प्रतिष्ठा और गरिमा को अभूतपूर्व ऊँचाई प्रदान की। बलबन जब सत्ता में आया, तब इल्तुतमिश की मृत्यु के लगभग तीस वर्ष बीत चुके थे। इस अवधि में चहलगानी अमीरों का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया था। अनेक सुल्तानों को अमीरों ने गद्दी पर बैठाया और हटाया। रुक्नुद्दीन फ़िरोज़, रज़िया, मुइज़ुद्दीन बहराम शाह, अलाउद्दीन मसूद शाह तथा नासिरुद्दीन महमूद जैसे शासकों के शासनकाल में दरबारी षड्यंत्रों और अमीरों के हस्तक्षेप ने राजसत्ता को अत्यंत दुर्बल बना दिया था।

बलबन स्वयं इन परिस्थितियों का प्रत्यक्ष साक्षी रहा था। वह समझता था कि यदि सुल्तान की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित नहीं की गई, तो उसका शासन भी अस्थिर हो जाएगा। इसलिए उसने सबसे पहले राजसत्ता की गरिमा को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया और सुल्तान के पद को सर्वोच्च एवं पवित्र घोषित किया।

दैवी राजसत्ता का सिद्धांत

बलबन का विश्वास था कि सुल्तान का पद ईश्वर की देन है। वह अपने अमीरों और अधिकारियों से बार-बार कहता था कि राजसत्ता किसी व्यक्ति की निजी उपलब्धि नहीं, बल्कि ईश्वर की विशेष कृपा का परिणाम है। उसके अनुसार सुल्तान पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि (ज़िल्लुल्लाह) है तथा पैग़म्बर के बाद उससे अधिक प्रतिष्ठित कोई पद नहीं है। वह यह भी मानता था कि सुल्तान केवल ईश्वर के प्रति उत्तरदायी है, न कि अमीरों अथवा सामान्य जनता के प्रति।

इस सिद्धांत का उद्देश्य स्पष्ट था। बलबन यह स्थापित करना चाहता था कि उसकी शक्ति का स्रोत अमीर वर्ग नहीं, बल्कि ईश्वर है। यदि सुल्तान को ईश्वरीय प्रतिनिधि माना जाएगा, तो उसके विरुद्ध विद्रोह केवल राजनीतिक अपराध नहीं, बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी अनुचित माना जाएगा। इस प्रकार उसने राजसत्ता को दैवी वैधता प्रदान कर उसे दरबारी षड्यंत्रों से सुरक्षित बनाने का प्रयास किया।

उच्च वंश की अवधारणा

बलबन ने यह सिद्ध करने का भी प्रयास किया कि केवल उच्च कुल में जन्मे व्यक्ति ही राजसिंहासन के अधिकारी हो सकते हैं। उसने स्वयं को तूरान के प्रसिद्ध पौराणिक शासक अफ़्रासियाब का वंशज घोषित किया। यद्यपि इस दावे का कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, फिर भी इसका राजनीतिक महत्त्व अत्यधिक था। इस दावे के माध्यम से वह यह संदेश देना चाहता था कि निम्न कुल अथवा साधारण व्यक्ति को राजसत्ता प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। वास्तव में, बलबन स्वयं दास-प्रथा से ऊपर उठकर सत्ता तक पहुँचा था। इसलिए उसकी वंशपरंपरा अत्यंत साधारण थी। संभवतः इसी कमी को छिपाने तथा अपने शासन को वैधानिक आधार प्रदान करने के लिए उसने उच्च वंश और दैवी अधिकार की अवधारणा को विशेष महत्त्व दिया।

सासानी परंपरा का प्रभाव

बलबन के राजत्व-सिद्धांत पर ईरान के सासानी शासकों का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। सासानी सम्राट स्वयं को ईश्वर की कृपा से राज्य करने वाला शासक मानते थे और उनकी सत्ता को दैवी माना जाता था। केवल राजवंश के सदस्य ही सिंहासन पर बैठ सकते थे। बलबन ने इसी आदर्श को अपनाते हुए सुल्तान के पद को सामान्य मानवीय स्तर से ऊपर उठाने का प्रयास किया। उसने अपने जीवन और शासन में भी इसी सिद्धांत को व्यवहार में उतारा। उसने स्वयं को सामान्य जनता से दूर रखा, जिससे उसकी गरिमा बनी रहे। उसका उद्देश्य यह था कि सुल्तान के प्रति भय, सम्मान और श्रद्धा का वातावरण निर्मित हो।

दरबारी अनुशासन और राजकीय गरिमा

बलबन ने राजदरबार में अत्यंत कठोर अनुशासन लागू किया। उसकी उपस्थिति में किसी भी दरबारी को ऊँचे स्वर में बातचीत करने या परस्पर हँसी-मज़ाक करने की अनुमति नहीं थी। स्वयं बलबन भी दरबार में अत्यंत गंभीर रहता था और सार्वजनिक रूप से हँसने अथवा अनौपचारिक व्यवहार से बचता था। उसने अपने व्यक्तित्व को सामान्य मनुष्य के स्थान पर एक आदर्श सम्राट के रूप में प्रस्तुत किया। वह सदैव बहुमूल्य एवं राजसी वस्त्र धारण करता था। यहाँ तक कि उसके निजी सेवक भी उसे साधारण वेशभूषा में नहीं देख सकते थे। उसके सिंहासन के पीछे सशस्त्र अंगरक्षक आकर्षक वेशभूषा में सदैव उपस्थित रहते थे। इन सभी व्यवस्थाओं का उद्देश्य सुल्तान की गरिमा और प्रभाव को बढ़ाना था।

सिजदा और पैबोस की परंपरा

राजकीय प्रतिष्ठा को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए बलबन ने दरबार में सिजदा तथा पैबोस की प्रथा को अनिवार्य बनाया। सिजदा का अर्थ सुल्तान के समक्ष झुककर अभिवादन करना था, जबकि पैबोस में सुल्तान के चरण अथवा सिंहासन को स्पर्श कर सम्मान व्यक्त किया जाता था। यद्यपि कुछ धार्मिक विद्वानों ने इन परंपराओं पर आपत्ति व्यक्त की, फिर भी बलबन ने इन्हें राजकीय अनुशासन का अनिवार्य अंग बनाए रखा। उसका विश्वास था कि राजकीय वैभव, कठोर अनुशासन और भय का वातावरण ही राजसत्ता की स्थिरता सुनिश्चित कर सकता है। इसलिए उसने कठोर दंड-व्यवस्था अपनाई और विद्रोह अथवा अनुशासनहीनता के प्रति अत्यंत कठोर नीति अपनाई। उसके शासन की प्रसिद्ध ‘रक्त और लौह’  नीति इसी दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति थी।

ईरानी संस्कृति और राजकीय परंपराएँ

बलबन ने ईरानी संस्कृति और शाही परंपराओं को भी विशेष महत्त्व दिया। उसके शासनकाल में दरबार की भाषा, शिष्टाचार तथा राजकीय समारोहों में फ़ारसी प्रभाव और अधिक स्पष्ट हो गया। उसने अपने उत्तराधिकारियों के लिए भी ईरानी परंपरा से प्रेरित नाम—जैसे कैकुबाद, कैखुसरो और कैमुर्स प्रचलित किए। इससे यह स्पष्ट होता है कि वह स्वयं को ईरानी राजकीय परंपरा का उत्तराधिकारी प्रदर्शित करना चाहता था।

राजनीति और धर्म का संबंध

बलबन व्यक्तिगत जीवन में धार्मिक आस्था रखने वाला शासक था, किंतु उसने शासन-व्यवस्था को धार्मिक हस्तक्षेप से यथासंभव अलग रखने का प्रयास किया। उसका विश्वास था कि राज्य की स्थिरता सर्वोच्च प्राथमिकता है और यदि आवश्यक हो तो राजनीतिक निर्णय व्यावहारिक आधार पर लिए जाने चाहिए। उसने उलमा का सम्मान अवश्य किया, किंतु उन्हें शासन-संचालन में सर्वोच्च अधिकार नहीं दिया।

इस प्रकार बलबन का राजत्व-सिद्धांत मूलतः व्यावहारिक, निरंकुश तथा राजकीय गरिमा पर आधारित था। उसने दैवी अधिकार, उच्च वंश, कठोर अनुशासन, राजकीय वैभव तथा केंद्रीकृत सत्ता के माध्यम से दिल्ली सल्तनत में राजसत्ता की प्रतिष्ठा को अभूतपूर्व ऊँचाई प्रदान की और सुल्तान के पद को मध्यकालीन भारत की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक संस्था के रूप में स्थापित किया।

खिलजी काल में राजत्व-सिद्धांत
खिलजी वंश के उदय की राजनीतिक पृष्ठभूमि

ग़ियासुद्दीन बलबन की मृत्यु के बाद दिल्ली सल्तनत में पुनः राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हो गई। उत्तराधिकार संबंधी संघर्ष, अमीरों के षड्यंत्र, तुर्की कुलीनों की पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता तथा बलबन के अयोग्य उत्तराधिकारियों की दुर्बलता ने इलबारी (ममलूक) वंश को कमजोर कर दिया। इन परिस्थितियों का लाभ उठाकर 1290 ईस्वी में जलालुद्दीन फ़िरोज़ खिलजी ने खिलजी वंश की स्थापना की। यद्यपि जलालुद्दीन का शासन अपेक्षाकृत उदार था, किंतु 1296 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी के सत्ता ग्रहण के साथ ही दिल्ली सल्तनत में पुनः सशक्त एवं केंद्रीकृत राजसत्ता की स्थापना हुई।

अलाउद्दीन खिलजी का राजत्व-सिद्धांत

अलाउद्दीन खिलजी ने राजत्व की अवधारणा को बलबन की परंपरा से आगे बढ़ाया, किंतु उसमें कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन भी किए। उसने सुल्तान की निरंकुश सत्ता को स्वीकार किया, परंतु बलबन की भाँति उच्च वंश या रक्त की शुद्धता को शासन की अनिवार्य शर्त नहीं माना। उसके अनुसार किसी व्यक्ति की योग्यता, सैन्य क्षमता और प्रशासनिक दक्षता ही राजसत्ता का वास्तविक आधार थीं। इस प्रकार उसने वंशगत श्रेष्ठता की अपेक्षा व्यक्तिगत क्षमता को अधिक महत्त्व दिया।

अलाउद्दीन ने स्वयं को किसी पौराणिक अथवा उच्च कुल से संबंधित सिद्ध करने का प्रयास नहीं किया और न ही उसने राजकीय गरिमा बनाए रखने के लिए जनता से अत्यधिक दूरी बनाई। उसका उद्देश्य सुल्तान की शक्ति को व्यावहारिक आधार पर सुदृढ़ करना था। यद्यपि उसने अपने शासन में राजकीय वैभव और अनुशासन बनाए रखा, फिर भी उसका दृष्टिकोण बलबन की अपेक्षा अधिक व्यावहारिक था।

निरंकुश राजसत्ता और दैवी अधिकार

अलाउद्दीन खिलजी स्वयं को पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि मानता था तथा औपचारिक रूप से खलीफा की सर्वोच्चता को भी स्वीकार करता था। समकालीन इतिहासकार अमीर ख़ुसरो ने अपनी कृति खज़ाइन-उल-फुतूह में उसे ‘संसार का सुल्तान’, ‘पृथ्वी के शासकों का शासक’, ‘विश्व-विजेता’ तथा ‘जनता का संरक्षक’ जैसी उपाधियों से विभूषित किया है। यद्यपि इन उपाधियों में दरबारी अतिशयोक्ति का तत्व विद्यमान है, फिर भी उनसे यह स्पष्ट होता है कि अलाउद्दीन की सत्ता अत्यंत प्रभावशाली और केंद्रीकृत थी।

इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी के अनुसार आदर्श सुल्तान वह है जो परिस्थितियों के अनुसार कठोरता और उदारता दोनों का संतुलित प्रयोग करे, न्याय स्थापित करे, धर्म की रक्षा करे तथा यह सुनिश्चित करे कि उसकी प्रजा भूखी और असुरक्षित न रहे। अलाउद्दीन ने कठोर शासन व्यवस्था के साथ-साथ व्यापक आर्थिक और प्रशासनिक सुधार भी किए। बाजार नियंत्रण, मूल्य-नियमन, राजस्व सुधार तथा सेना के पुनर्गठन जैसी नीतियाँ उसकी प्रजाहितकारी दृष्टि का परिचय देती हैं। इसी कारण अनेक इतिहासकार उसे मध्यकालीन भारत का एक सक्षम और व्यावहारिक शासक मानते हैं।

राजनीति और धर्म का पृथक्करण

अलाउद्दीन खिलजी के राजत्व-सिद्धांत की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता राजनीति को धर्म से अलग रखने का प्रयास था। उसने स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया कि शासन केवल धार्मिक सिद्धांतों के आधार पर नहीं चलाया जा सकता। प्रसिद्ध क़ाज़ी क़ाज़ी मुगीसुद्दीन के साथ वार्तालाप में उसने कहा कि राज्य संचालन में वह उलमा के निर्देशों का पूर्णतः पालन नहीं कर सकता, क्योंकि शासन की आवश्यकताएँ अनेक बार धार्मिक नियमों से भिन्न होती हैं।

अलाउद्दीन का मत था कि सुल्तान का दायित्व राज्य की सुरक्षा, व्यवस्था और स्थिरता बनाए रखना है, जबकि शरीअत की व्याख्या करना क़ाज़ियों और मुफ़्तियों का कार्य है। उसने यह भी स्वीकार किया कि उसे यह ज्ञात नहीं है कि उसके सभी प्रशासनिक नियम शरीअत के अनुरूप हैं या नहीं, किंतु जो भी निर्णय वह लेता है, वे राज्यहित और लोककल्याण को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं। इस प्रकार उसने शासन में व्यावहारिक राजनीति (ज़वाबित) को धार्मिक विधि से अलग पहचान प्रदान की। इतिहासकार राम प्रसाद त्रिपाठी का मत है कि अलाउद्दीन ने ऐसा कोई कार्य नहीं किया जिसे इस्लामी व्यवस्था के मूल सिद्धांतों का प्रत्यक्ष उल्लंघन कहा जा सके। उसने धार्मिक प्रतिष्ठान का सम्मान बनाए रखा, किंतु शासन-संचालन में राज्यहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।

खिलजी राजत्व-सिद्धांत का स्वरूप

अलाउद्दीन खिलजी स्वयं को एक शक्तिशाली सम्राट के रूप में स्थापित करना चाहता था। समकालीन स्रोतों से ज्ञात होता है कि उसके मन में सिकंदर महान की भाँति विश्व-विजय की आकांक्षा भी थी, किंतु उसने शीघ्र ही समझ लिया कि यह व्यावहारिक नहीं है। इसलिए उसने अपनी ऊर्जा भारतीय उपमहाद्वीप में एक सुदृढ़ और केंद्रीकृत साम्राज्य के निर्माण में लगाई।

औपचारिक रूप से उसने ‘यमीन-उल-खिलाफत’ तथा ‘नासिर अमीर-उल-मोमिनीन’ जैसी उपाधियाँ धारण कर स्वयं को खलीफा का प्रतिनिधि माना। किंतु उसके उत्तराधिकारी कुतुबुद्दीन मुबारक शाह ने इस परंपरा से हटकर स्वयं को ही खलीफा घोषित कर दिया। उसने स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि, महान इमाम तथा सर्वोच्च इस्लामी शासक घोषित करते हुए यह संकेत दिया कि दिल्ली सल्तनत किसी बाहरी धार्मिक सत्ता की अधीनस्थ नहीं है।

इस प्रकार खिलजी राजत्व-सिद्धांत का आधार न तो उच्च वंश की श्रेष्ठता था, न खलीफा की स्वीकृति और न ही निर्वाचन की परंपरा। उसका वास्तविक आधार सुल्तान की सैन्य शक्ति, प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक योग्यता थी। खिलजी शासकों, विशेषकर अलाउद्दीन खिलजी, ने यह सिद्ध किया कि एक सशक्त एवं संगठित राज्य का संचालन धार्मिक स्वीकृति पर नहीं, बल्कि प्रभावी शासन, सक्षम प्रशासन और शक्तिशाली राजसत्ता पर निर्भर करता है। यही खिलजी काल के राजत्व-सिद्धांत की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता और उसकी ऐतिहासिक उपलब्धि थी।

तुगलक एवं सैय्यद काल में राजत्व-सिद्धांत
तुगलक वंश की स्थापना और राजसत्ता की वैधता

दिल्ली सल्तनत में तेरहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक वंशानुगत उत्तराधिकार की परंपरा पर्याप्त सुदृढ़ हो चुकी थी। उमरा (अमीर वर्ग) और उलमा दोनों का सामान्य मत था कि सत्ता का अधिकार उसी वंश के योग्य उत्तराधिकारी को मिलना चाहिए जिसने वैध रूप से राज्य की स्थापना की हो। 1320 ईस्वी में नासिरुद्दीन ख़ुसरो शाह के संक्षिप्त शासन के पतन के पश्चात् ग़ियासुद्दीन तुगलक ने सिंहासन ग्रहण करने से पूर्व अलाउद्दीन खिलजी तथा कुतुबुद्दीन मुबारक शाह के परिवार के जीवित सदस्यों की खोज करवाई, ताकि यदि कोई वैध उत्तराधिकारी उपलब्ध हो तो उसे गद्दी सौंपी जा सके। किंतु यह स्पष्ट हो चुका था कि ख़ुसरो शाह ने खिलजी वंश के अधिकांश सदस्यों का वध करा दिया था। ऐसी स्थिति में गयासुद्दीन तुगलक का सिंहासनारोहण निर्विवाद रहा और उसे व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ।

गयासुद्दीन तुगलक का राजत्व-सिद्धांत

गयासुद्दीन तुगलक ने स्वयं को इस्लाम का संरक्षक और दिल्ली सल्तनत का वैध शासक सिद्ध करने का प्रयास किया। समकालीन मुस्लिम समाज की दृष्टि में उसने उस राजनीतिक एवं धार्मिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना की, जिसे ख़ुसरो शाह के शासनकाल में क्षति पहुँची थी। अपने आचरण और प्रशासन में उसने धार्मिक मूल्यों को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया तथा पूर्ववर्ती सुल्तानों की परंपरा का अनुसरण करते हुए ‘नासिर-उल-मोमिनीन’ जैसी उपाधि धारण की।

यद्यपि उसने धार्मिक प्रतिष्ठा को महत्त्व दिया, फिर भी उसके राजत्व-सिद्धांत में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं था। उसका शासन खिलजी शासकों की तरह एक शक्तिशाली एवं केंद्रीकृत राजसत्ता पर आधारित था। उसने प्रशासनिक अनुशासन, सैन्य संगठन और न्याय व्यवस्था को सुदृढ़ करने का प्रयास किया तथा राज्य की स्थिरता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।

मुहम्मद बिन तुगलक का बुद्धिवादी राजत्व

मुहम्मद बिन तुगलक का राजत्व-सिद्धांत अपने पूर्ववर्तियों की अपेक्षा अधिक मौलिक और बुद्धिवादी था। शासन के प्रारंभिक वर्षों में उसने खिलाफत से औपचारिक दूरी बना ली और अपनी योग्यता, क्षमता तथा सार्वभौमिक सत्ता पर पूर्ण विश्वास व्यक्त किया। उसका मानना था कि सुल्तान पृथ्वी पर ईश्वर की छाया (ज़िल्ल-ए-इलाही) है तथा उसकी शक्ति किसी बाहरी स्वीकृति पर निर्भर नहीं करती। इसी विचार को उसने अपने सिक्कों पर भी विभिन्न अभिलेखों के माध्यम से व्यक्त कराया।

मुहम्मद बिन तुगलक ने राजनीति को धर्म से पृथक रखने का प्रयास किया। इसका अर्थ यह नहीं था कि वह शरीअत या इस्लामी धर्म का विरोधी था, बल्कि वह शासन को व्यावहारिक आवश्यकताओं के अनुरूप संचालित करना चाहता था। वह इस संकीर्ण धारणा को स्वीकार नहीं करता था कि शासन का अधिकार केवल किसी विशेष जाति, वंश या कुलीन वर्ग को ही प्राप्त होना चाहिए। इसी कारण उसने पुराने तुर्क अमीरों के स्थान पर निम्न अथवा गैर-कुलीन वर्गों के योग्य व्यक्तियों को भी प्रशासन में महत्त्वपूर्ण पद प्रदान किए। इस नीति ने पारंपरिक अमीर वर्ग में असंतोष अवश्य उत्पन्न किया, किंतु इससे प्रशासन में योग्यता को महत्त्व मिलने लगा। उसने अपने सिक्कों पर ऐसे अभिलेख अंकित कराए जिनमें यह विचार व्यक्त किया गया कि सार्वभौमिक सत्ता केवल विशिष्ट और योग्य व्यक्ति को ही प्राप्त होती है, सुल्तान ईश्वर की छाया है तथा ईश्वर उसका सहायक है। इन अभिलेखों से उसकी राजसत्ता के दैवी एवं सार्वभौमिक स्वरूप की पुष्टि होती है।

खिलाफत के प्रति पुनः निष्ठा

मुहम्मद बिन तुगलक की अनेक महत्वाकांक्षी योजनाएँ अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सकीं। परिणामस्वरूप साम्राज्य के विभिन्न भागों में विद्रोह प्रारंभ हो गए और उसकी लोकप्रियता में कमी आने लगी। इन परिस्थितियों में उसने यह अनुभव किया कि मुस्लिम समाज में वैधानिक प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए खिलाफत के प्रति निष्ठा प्रकट करना उपयोगी हो सकता है। इसलिए उसने अपनी पूर्व नीति में परिवर्तन किया। उसने मिस्र स्थित अब्बासी खलीफा के प्रति औपचारिक निष्ठा व्यक्त की, सिक्कों पर खलीफा का नाम अंकित कराया, खुत्बा में उसका नाम पढ़वाया तथा राजकीय आदेश भी उसके नाम से जारी किए। उसने स्वयं को खलीफा का प्रतिनिधि प्रदर्शित करने का प्रयास किया और उसके सम्मान में राजकीय समारोह भी आयोजित किए। किंतु इन उपायों का अपेक्षित राजनीतिक लाभ नहीं मिला। उस समय तक खिलाफत की वास्तविक राजनीतिक शक्ति समाप्त हो चुकी थी और अधिकांश लोग यह समझ चुके थे कि खलीफा केवल धार्मिक प्रतीक मात्र रह गया है। दूसरी ओर उसकी अनेक प्रशासनिक योजनाओं से अमीर वर्ग, उलमा तथा सामान्य जनता पहले ही असंतुष्ट हो चुके थे। इसलिए केवल धार्मिक वैधता प्राप्त कर लेना उसकी राजनीतिक समस्याओं का समाधान सिद्ध नहीं हुआ।

इतिहासकारों का मत है कि मुहम्मद बिन तुगलक अपने युग से आगे सोचने वाला शासक था। उसकी अनेक नीतियाँ सिद्धांततः प्रगतिशील थीं, किंतु तत्कालीन सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियाँ उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थीं।

फिरोज शाह तुगलक का धार्मिक राजत्व

फ़िरोज़ शाह तुगलक का राजत्व-सिद्धांत मुहम्मद बिन तुगलक से स्पष्ट रूप से भिन्न था। उसे सिंहासनारोहण के समय उलमा, काज़ियों, सूफी शेखों, अमीरों और मलिकों का व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त मिस्र स्थित अब्बासी खिलाफत से भी उसके शासन को औपचारिक स्वीकृति मिली। इन परिस्थितियों ने उसके राजत्व की वैधानिक स्थिति को सुदृढ़ किया।

फिरोज शाह ने अपने नाम के साथ दिल्ली के पूर्ववर्ती सुल्तानों का नाम भी खुत्बा में पढ़वाना प्रारंभ किया तथा स्वयं को खलीफा का नायब घोषित किया। यद्यपि वह कुशल प्रशासक और जनकल्याणकारी शासक था, परंतु सैन्य और राजनीतिक दृष्टि से वह अपने पूर्ववर्ती की अपेक्षा कम सशक्त था। इस कमी की पूर्ति के लिए उसने धार्मिक वर्ग को विशेष महत्त्व दिया तथा उलमा के प्रभाव को पुनः बढ़ावा दिया। उसने स्वयं को इस्लाम का संरक्षक घोषित किया और धार्मिक संस्थाओं, मस्जिदों, मदरसों तथा विद्वानों को व्यापक संरक्षण प्रदान किया। उसके शासनकाल में शरीअत के सिद्धांतों को प्रशासन में अधिक महत्त्व मिला। साथ ही उसने नहरों का निर्माण, उद्यानों की स्थापना, सरायों, चिकित्सालयों तथा लोककल्याणकारी संस्थाओं की व्यवस्था कर प्रजा के हित में अनेक कार्य किए। उसकी उदारता और धार्मिक आचरण के कारण उसकी मृत्यु के बाद भी जनता की निष्ठा तुगलक वंश के प्रति कुछ समय तक बनी रही।

सैय्यद शासकों का राजत्व-सिद्धांत

तैमूर के आक्रमण के पश्चात् दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक स्थिति अत्यंत दुर्बल हो गई। 1414 ईस्वी में खिज्र ख़ाँ ने सैय्यद वंश की स्थापना की। उसने स्वयं को स्वतंत्र सुल्तान घोषित करने के स्थान पर तैमूरी शासकों का प्रतिनिधि माना तथा “रैयत-ए-आला” की उपाधि धारण की। उसके शासनकाल में खुत्बा में तैमूर का नाम पढ़ा जाता था और इसी के माध्यम से उसने अपनी वैधानिकता स्थापित करने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप खलीफा का नाम खुत्बा और सिक्कों दोनों से लुप्त हो गया।

खिज्र ख़ाँ के उत्तराधिकारी मुबारक शाह ने तैमूरी प्रभुत्व से स्वयं को मुक्त करने का प्रयास किया। उसने तैमूर और तुगलक शासकों के नाम खुत्बा तथा सिक्कों से हटाकर अपने नाम के सिक्के जारी किए और ‘शाह सुल्तान’ तथा ‘नायब अमीर-उल-मोमिनीन’ जैसी उपाधियाँ धारण कीं। किंतु उसकी यह स्वतंत्र नीति सफल नहीं हो सकी। तैमूरी शासकों का समर्थन समाप्त हो गया, सीमांत क्षेत्रों पर उनके आक्रमण बढ़ने लगे और राज्य के विभिन्न भागों में विद्रोह फैल गए। परिणामस्वरूप सैय्यद वंश न तो अपनी सार्वभौमिक सत्ता को सुदृढ़ कर सका और न ही राजत्व-सिद्धांत के विकास में कोई महत्त्वपूर्ण योगदान दे सका।

अफगान राजत्व-सिद्धांत
अफगान राजसत्ता की प्रकृति और बहलोल लोदी का दृष्टिकोण

दिल्ली सल्तनत में लोदी वंश के उदय के साथ राजत्व-सिद्धांत के विकास में एक नया चरण प्रारंभ हुआ। तुर्क शासकों के विपरीत अफगानों का सामाजिक एवं राजनीतिक संगठन कबायली व्यवस्था पर आधारित था। प्रत्येक कबीला अपने सरदार के नेतृत्व में पर्याप्त स्वायत्तता का अधिकारी था और सामूहिक परामर्श की परंपरा को महत्त्व देता था। इसलिए अफगानों में पूर्ण निरंकुश तथा अविभाज्य सार्वभौमिक सत्ता की अपेक्षा सामूहिक नेतृत्व और कबायली समानता की भावना अधिक प्रबल थी।

बहलोल लोदी ने इसी राजनीतिक परंपरा को ध्यान में रखते हुए अपना राजत्व-सिद्धांत विकसित किया। वह भली-भाँति जानता था कि उसका राज्य विभिन्न अफगान कबीलों का एक संघ था, जिसकी स्थिरता उनके सहयोग पर निर्भर थी। इसलिए उसने तुर्क सुल्तानों, विशेषकर बलबन और अलाउद्दीन खिलजी की निरंकुश शासन-पद्धति को नहीं अपनाया। उसने स्वयं को अफगान कबायली सरदारों से ऊपर न मानकर उनके बीच प्रथम समान के रूप में प्रस्तुत किया।

बहलोल लोदी की शासन-शैली

बहलोल लोदी के शासन की सबसे प्रमुख विशेषता उसकी विनम्रता और परामर्श-प्रधान कार्यशैली थी। वह सामान्यतः दरबार में सिंहासन पर नहीं बैठता था और न ही अपने को अन्य अमीरों से सर्वथा श्रेष्ठ प्रदर्शित करता था। वह अमीरों के साथ समान स्तर पर बैठकर राज्य के महत्त्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श करता था। वह प्रमुख अफगान सरदारों को सम्मानपूर्वक ‘मसनद-ए-आली’ की उपाधि से संबोधित करता था, जिससे उनमें सम्मान और सहभागिता की भावना बनी रहती थी।

यदि कोई प्रभावशाली अमीर अथवा कबायली सरदार उससे असंतुष्ट हो जाता, तो बहलोल स्वयं उसके निवास पर जाकर उसे मनाने का प्रयास करता था। वह अपनी तलवार उतारकर उसके सामने रख देता और आवश्यकता पड़ने पर अपनी पगड़ी भी उसके समक्ष रखकर यह कहता कि यदि वह शासन के योग्य नहीं समझा जाता, तो अफगान सरदार किसी अन्य योग्य व्यक्ति को अपना नेता चुन सकते हैं। इस विनम्र व्यवहार का अमीरों पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता था और अधिकांश विवाद शांतिपूर्वक समाप्त हो जाते थे।

बहलोल की नीति के परिणाम

बहलोल लोदी की इस नीति के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों परिणाम सामने आए। एक ओर अमीरों के बीच सत्ता-संघर्ष और षड्यंत्रों की प्रवृत्ति में कमी आई तथा वे शासन में सहभागी होने के कारण संतुष्ट रहे। दूसरी ओर, अफगान सरदार अपनी शक्ति और स्वतंत्रता के प्रति अत्यधिक सजग हो गए। परिणामस्वरूप सुल्तान की प्रतिष्ठा अपेक्षाकृत कम हो गई और वह एक सर्वोच्च शासक के बजाय अमीरों का प्रमुख मात्र प्रतीत होने लगा।

इस व्यवस्था ने ताज की गरिमा को कुछ हद तक कम किया और केंद्रीय सत्ता अपेक्षाकृत कमजोर बनी रही। इसके अतिरिक्त गैर-अफगान तत्वों को शासन और प्रशासन में अपेक्षित स्थान नहीं मिल सका। फलतः प्रशासन में अफगानों का प्रभुत्व स्थापित हो गया और अन्य वर्ग राजनीतिक प्रक्रिया से काफी हद तक अलग हो गए।

सिकंदर लोदी का राजत्व-सिद्धांत

बहलोल लोदी की मृत्यु के बाद अफगान कबीलों की एकता धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी। परंपरा के अनुसार बहलोल ने अपने उत्तराधिकारी को यह सावधानी बरतने की सलाह दी थी कि अत्यधिक महत्वाकांक्षी कबीलों को अनावश्यक शक्ति न दी जाए। जब सिकंदर लोदी सिंहासन पर बैठा, तब उसने अपने पिता की कबायली नीति को त्यागकर तुर्क सुल्तानों की केंद्रीकृत राजसत्ता की परंपरा को अपनाया।

सिकंदर लोदी का विश्वास था कि राज्य की शक्ति अविभाज्य होनी चाहिए और सुल्तान की सत्ता में किसी अन्य व्यक्ति की साझेदारी नहीं हो सकती। उसने अमीरों के प्रति अपने पिता की उदार नीति का स्थान कठोर अनुशासन को दिया। उसने पुनः तुर्की दरबारी परंपराओं को लागू किया और सुल्तान की प्रतिष्ठा तथा गरिमा को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया।

राजकीय अनुशासन और सुल्तान की प्रतिष्ठा

सिकंदर लोदी ने राजकीय अनुशासन को अत्यधिक महत्त्व दिया। उसके आदेशों का पालन सभी अधिकारियों और अमीरों के लिए अनिवार्य था। यहाँ तक कि उसकी अनुपस्थिति में भी उसके फरमानों के प्रति पूर्ण सम्मान प्रदर्शित किया जाता था। प्रमुख अमीरों को राजकीय फरमान प्राप्त करने के लिए कई मील आगे जाकर उसका स्वागत करना पड़ता था, उसे सिर से लगाना पड़ता था और सार्वजनिक रूप से उसका वाचन करना राजकीय परंपरा का अंग बन गया था।

सिकंदर स्वयं अनुशासनप्रिय, परिश्रमी और दृढ़ निश्चयी शासक था। उसकी प्रशासनिक क्षमता और न्यायप्रियता के कारण अधिकांश अफगान अमीर भी उसके अधिकार को स्वीकार करने लगे। यद्यपि कुछ अमीरों ने उसके छोटे भाई फतह खाँ को गद्दी पर बैठाने का षड्यंत्र रचा, किंतु सिकंदर ने समय रहते उसका पता लगा लिया और अनेक षड्यंत्रकारी अमीरों को दंडित कर दिया। इस प्रकार उसने केंद्रीय सत्ता को पुनः सुदृढ़ किया तथा प्रशासन में अनुशासन स्थापित करने में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की।

इब्राहिम लोदी और निरंकुश राजसत्ता

इब्राहिम लोदी ने अपने पिता सिकंदर लोदी की नीतियों को और अधिक कठोर रूप में अपनाया। उसने तुर्की राजत्व-सिद्धांत के अनुसार यह मान लिया कि राजा का कोई संबंधी नहीं होता और सुल्तान की इच्छा ही सर्वोच्च कानून है। उसने अफगान कबायली परंपराओं की उपेक्षा करते हुए पूर्ण निरंकुश शासन स्थापित करने का प्रयास किया।

दरबार में अमीरों को अत्यंत अनुशासित और अधीनस्थ स्थिति में खड़ा रहना पड़ता था। सुल्तान को किसी भी अमीर पर संदेह होने पर वह उसके विरुद्ध कठोर सैन्य कार्रवाई करने से नहीं हिचकिचाता था। उसकी इस कठोर नीति से अफगान अमीरों में असंतोष और भय दोनों उत्पन्न हुए। परिणामस्वरूप वे उसके प्रति निष्ठावान नहीं रह सके और केंद्रीय सत्ता का आधार कमजोर होने लगा।

इब्राहिम लोदी अपने अमीरों का विश्वास बनाए रखने में असफल रहा। यही कारण था कि अनेक प्रभावशाली अफगान सरदार उससे विमुख हो गए और अंततः उन्होंने ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर को भारत पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया। 1526 ईस्वी के प्रथम पानीपत के युद्ध में इब्राहिम लोदी की पराजय और मृत्यु के साथ दिल्ली सल्तनत तथा लोदी वंश का अंत हो गया।

अफगान राजत्व-सिद्धांत की विशेषताएँ

अफगान राजत्व-सिद्धांत दिल्ली सल्तनत के पूर्ववर्ती तुर्की राजत्व-सिद्धांत से कई दृष्टियों से भिन्न था। बहलोल लोदी ने कबायली समानता, परामर्श और सहयोग को शासन का आधार बनाया, जबकि सिकंदर लोदी और इब्राहिम लोदी ने केंद्रीकृत तथा निरंकुश राजसत्ता को स्थापित करने का प्रयास किया। इस प्रकार लोदी काल में अफगान और तुर्की राजनीतिक परंपराओं का एक विशिष्ट समन्वय दिखाई देता है।

इस प्रकार दिल्ली सल्तनत के अधिकांश सुल्तानों का विश्वास था कि सार्वभौमिक सत्ता अविभाज्य, सर्वोच्च और पवित्र है। सुल्तान को खलीफा का प्रतिनिधि, इस्लाम का संरक्षक, प्रजा का हितैषी तथा पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। उसकी सत्ता दैवी अधिकार से संपन्न समझी जाती थी और वह अपने कार्यों के लिए किसी सामाजिक वर्ग के प्रति नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति उत्तरदायी माना जाता था। इसी कारण दिल्ली सल्तनत के लगभग सभी शासकों ने अपने-अपने ढंग से सुल्तान की प्रतिष्ठा, गरिमा और राजकीय अधिकार को सुदृढ़ बनाने का निरंतर प्रयास किया।

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