अठारहवीं शताब्दी में कर्नाटक (अर्काट) की राजनीतिक तथा आर्थिक स्थिति
अठारहवीं शताब्दी में कर्नाटक, विशेषकर अर्काट क्षेत्र, राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और विदेशी हस्तक्षेप का प्रमुख केंद्र बन गया। औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) के बाद मुगल साम्राज्य की शक्ति तेजी से क्षीण होने लगी, जिससे प्रांतीय शासकों ने स्वतंत्रता की नीति अपनाई। कर्नाटक (अर्काट) के नवाब और हैदराबाद के निज़ाम के बीच उत्तराधिकार संबंधी संघर्षों ने प्रशासन को कमजोर कर दिया तथा क्षेत्र में निरंतर अशांति का वातावरण उत्पन्न हुआ। इसी परिस्थिति का लाभ उठाकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी ने स्थानीय राजनीति में हस्तक्षेप करना प्रारंभ किया। दोनों यूरोपीय शक्तियों ने अपने-अपने समर्थक शासकों को सत्ता दिलाने के लिए कर्नाटक युद्ध लड़े, जिसके परिणामस्वरूप स्थानीय शासन विदेशी कंपनियों के प्रभाव में आ गया। निरंतर युद्धों और राजनीतिक संघर्षों के कारण प्रशासनिक व्यवस्था तथा व्यापार दोनों प्रभावित हुए।
आर्थिक दृष्टि से भी कर्नाटक की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। युद्धों के भारी व्यय की पूर्ति के लिए नवाबों ने यूरोपीय कंपनियों और साहूकारों से ऋण लिया तथा भू-राजस्व में वृद्धि कर दी। इससे किसानों पर करों का बोझ बढ़ा, कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ और ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ गई। साथ ही, व्यापार पर यूरोपीय कंपनियों के बढ़ते नियंत्रण के कारण क्षेत्र की संपत्ति और संसाधनों का प्रवाह धीरे-धीरे यूरोप की ओर होने लगा। इस प्रकार अठारहवीं शताब्दी का कर्नाटक राजनीतिक विघटन, आर्थिक संकट और औपनिवेशिक हस्तक्षेप का प्रतीक बन गया।
मुगल साम्राज्य का पतन
अठारहवीं शताब्दी में दक्षिण भारत का कर्नाटक क्षेत्र (अरकोट तथा उसके आसपास का कोरोमंडल तटीय प्रदेश) राजनीतिक अस्थिरता, सत्ता संघर्षों और विदेशी शक्तियों के बढ़ते हस्तक्षेप का प्रमुख केंद्र बन गया था। इस समय भारत की केंद्रीय सत्ता कमजोर हो चुकी थी और प्रांतीय शासक धीरे-धीरे स्वतंत्र होने लगे थे। कर्नाटक के नवाब भी स्वतंत्र शासन स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन आंतरिक कलह, उत्तराधिकार संबंधी विवादों और बाहरी शक्तियों के हस्तक्षेप के कारण वे अपनी स्थिति को स्थायी रूप से मजबूत नहीं कर सके। 1707 ई. में मुगल सम्राट औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया तीव्र हो गई। उसके उत्तराधिकारी कमजोर और अयोग्य सिद्ध हुए, जिसके कारण केंद्रीय प्रशासन शिथिल पड़ गया। दरबारी षड्यंत्रों, उत्तराधिकार संघर्षों और प्रांतीय महत्त्वाकांक्षाओं ने मुगल सत्ता को और अधिक कमजोर कर दिया। परिणामस्वरूप विभिन्न प्रांतों के सूबेदारों और स्थानीय शासकों ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित करनी प्रारंभ कर दी।
स्वतंत्र राज्यों का उदय
फर्रुखसियर (1713–1719 ई.) के शासनकाल में सैयद बंधुओं—सैयद अब्दुल्ला खाँ और सैयद हुसैन अली खाँ—का मुगल दरबार में अत्यधिक प्रभाव बढ़ गया। उन्होंने फर्रुखसियर को सिंहासन प्राप्त करने में सहायता दी थी, जिसके कारण वे साम्राज्य के वास्तविक नियंत्रक बन गए। बाद में मुहम्मद शाह ने 1720 ई. में उनके प्रभाव को समाप्त कर दिया, लेकिन वह मुगल साम्राज्य को पुनः संगठित करने में सफल नहीं हो सका। 1739 ई. में ईरान के शासक नादिरशाह के आक्रमण ने मुगल साम्राज्य की कमजोर स्थिति को पूरी तरह उजागर कर दिया। नादिरशाह ने दिल्ली पर अधिकार कर अपार धन-संपत्ति लूटी, जिससे मुगल सत्ता की प्रतिष्ठा को गंभीर आघात पहुँचा। इसके बाद अनेक प्रांतीय शासकों ने लगभग स्वतंत्र रूप से शासन करना प्रारंभ कर दिया।
इस काल में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक स्वतंत्र राज्यों का उदय हुआ। बंगाल, बिहार और उड़ीसा में अलीवर्दी खाँ ने स्वतंत्र सत्ता स्थापित की। हैदराबाद में निजाम-उल-मुल्क आसफ जाह ने स्वतंत्र राज्य की नींव रखी। रुहेलखंड में अली मुहम्मद खाँ रोहिला, फर्रुखाबाद में मुहम्मद खाँ बंगश और भरतपुर में जाट शासकों ने अपनी शक्ति स्थापित की। राजपूत शासकों ने भी अपनी स्वायत्तता पुनः प्राप्त कर ली। यद्यपि ये शासक औपचारिक रूप से मुगल सम्राट की अधीनता स्वीकार करते थे, किंतु वास्तव में वे स्वतंत्र शासक के रूप में कार्य कर रहे थे।
कर्नाटक की भौगोलिक एवं प्रशासनिक स्थिति
दक्षिण भारत के पूर्वी तटीय क्षेत्र को कोरोमंडल तट कहा जाता था। इसी तट के उत्तरी भाग में कर्नाटक प्रांत स्थित था। मुगल सम्राट औरंगजेब के समय इस क्षेत्र के प्रशासन के लिए पहले जुल्फिकार अली खाँ और बाद में दाऊद खाँ को नियुक्त किया गया था। 1710 ई. में सादुल्ला खाँ को कर्नाटक का प्रशासक बनाया गया, जिसने 1732 ई. तक शासन किया। उसकी मृत्यु के बाद उसका भतीजा दोस्त अली खाँ कर्नाटक का शासक बना। दोस्त अली खाँ ने अरकोट (अर्काट) को अपनी राजधानी बनाया और धीरे-धीरे स्वयं को स्वतंत्र शासक के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। उसका राज्य उत्तर में आंगोल से लेकर दक्षिण में जिंजी तक विस्तृत था। इसके पश्चिम में पहाड़ी क्षेत्र तथा दक्षिण में त्रिचनापल्ली, तंजावुर और मदुरा जैसे छोटे-छोटे राज्य स्थित थे, जो विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद अस्तित्व में आए थे।
दोस्त अली खाँ ने अपने राज्य का विस्तार करने की नीति अपनाई। 1736 ई. में उसके पुत्र सफदर अली और दामाद चंदा साहब ने त्रिचनापल्ली पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में कर लिया। इसके बाद मदुरा को भी कर्नाटक राज्य में मिला लिया गया। हालांकि तंजावुर पर अधिकार करने में उन्हें सफलता नहीं मिली, लेकिन वहां भारी लूटपाट की गई। इससे मराठे अत्यंत नाराज हो गए। कर्नाटक मूल रूप से हैदराबाद के निजाम के अधीन माना जाता था, लेकिन दोस्त अली खाँ ने धीरे-धीरे निजाम के नियंत्रण से स्वयं को मुक्त कर लिया। दूसरी ओर, मराठों की चौथ की राशि भी लंबे समय से बकाया थी। इन परिस्थितियों ने मराठों को कर्नाटक में हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान किया।
मराठों का आक्रमण और कर्नाटक में संकट
1740 ई. में मराठों ने फतेहसिंह और रघुजी भोंसले के नेतृत्व में कर्नाटक पर आक्रमण किया। दोस्त अली खाँ ने दामलचेरी दर्रे पर मराठों को रोकने का प्रयास किया, लेकिन मराठों ने पहाड़ी मार्ग से निकलकर पीछे से आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में दोस्त अली खाँ अपनी सेना सहित मारा गया। इसके बाद मराठों ने अरकोट पर अधिकार करने का प्रयास किया। सफदर अली ने मराठों से समझौता कर लिया और भारी धनराशि देने तथा कुछ क्षेत्रों को वापस करने का वचन दिया। दूसरी ओर, चंदा साहब ने मराठों की शर्तों को स्वीकार नहीं किया। परिणामस्वरूप 1741 ई. में मराठों ने त्रिचनापल्ली पर आक्रमण कर उसे जीत लिया और चंदा साहब को बंदी बनाकर सतारा ले गए। इस घटना ने कर्नाटक की राजनीतिक स्थिति को अत्यंत कमजोर कर दिया।

अनवरुद्दीन खाँ का उदय
दोस्त अली की मृत्यु के बाद कर्नाटक में उत्तराधिकार का संकट उत्पन्न हो गया। सफदर अली की स्थिति कमजोर हो गई और उसके चचेरे भाई मुर्तजा अली ने उसकी हत्या कर सत्ता प्राप्त करने का प्रयास किया, लेकिन सेना के विरोध के कारण वह सफल नहीं हो सका। इसके बाद सफदर अली के अल्पवयस्क पुत्र को नवाब बनाया गया और एक अस्थायी मंत्रिमंडल द्वारा शासन चलाया गया। 1742 ई. में हैदराबाद के निजाम-उल-मुल्क ने कर्नाटक की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप किया। उसने अनवरुद्दीन खाँ को कर्नाटक का नवाब नियुक्त किया। अनवरुद्दीन ने मराठों को पराजित कर त्रिचनापल्ली पर पुनः अधिकार कर लिया। हालांकि उसके शासन में भी पूर्ण शांति स्थापित नहीं हो सकी, क्योंकि कई किले और क्षेत्र पुराने शासक परिवारों के नियंत्रण में थे।
अंग्रेजों और फ्रांसीसियों का हस्तक्षेप
कर्नाटक की राजनीतिक अस्थिरता ने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी और फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी को हस्तक्षेप का अवसर प्रदान किया। प्रारंभ में दोनों कंपनियों का उद्देश्य केवल व्यापारिक लाभ प्राप्त करना था, लेकिन मुगल सत्ता की कमजोरी और स्थानीय संघर्षों के कारण उन्होंने भारतीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी। हैदराबाद और कर्नाटक के उत्तराधिकार संबंधी विवादों में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों ने अलग-अलग पक्षों का समर्थन किया। इसी प्रतिस्पर्धा ने आगे चलकर 1746 ई. से 1763 ई. के बीच हुए तीन कर्नाटक युद्धों को जन्म दिया। इन युद्धों के माध्यम से भारत में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने का संघर्ष प्रारंभ हुआ।
आर्थिक स्थिति
राजनीतिक अस्थिरता का कर्नाटक की आर्थिक स्थिति पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। लगातार युद्धों और सैनिक संघर्षों के कारण कृषि, व्यापार और स्थानीय उद्योगों को भारी नुकसान हुआ। युद्धों के खर्च को पूरा करने के लिए किसानों और व्यापारियों पर करों का बोझ बढ़ाया गया। व्यापारिक मार्ग असुरक्षित हो गए और लूटपाट की घटनाओं में वृद्धि हुई। अंग्रेजों और फ्रांसीसियों ने अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए स्थानीय संसाधनों और बंदरगाहों पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया। उन्होंने व्यापारिक एकाधिकार की नीति अपनाकर अपनी आर्थिक शक्ति को बढ़ाया, जिससे स्थानीय व्यापारियों और अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
इस प्रकार 18वीं शताब्दी का कर्नाटक क्षेत्र राजनीतिक विघटन, उत्तराधिकार संघर्षों और विदेशी हस्तक्षेप से प्रभावित था। मुगल साम्राज्य के पतन से उत्पन्न शक्ति-शून्यता ने अंग्रेजों और फ्रांसीसियों को भारतीय राजनीति में प्रवेश करने का अवसर दिया। कर्नाटक की अस्थिर राजनीतिक स्थिति ही आगे चलकर तीनों कर्नाटक युद्धों का आधार बनी, जिनके परिणामस्वरूप भारत में अंग्रेजी शक्ति के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ।




