नवपाषाणकाल
नवपाषाणकाल प्रागैतिहा सिक युग का अंतिम तथा मानव इतिहास का सर्वाधिक परिवर्तनकारी चरण माना जाता है। यह वह समय था जब मनुष्य ने केवल प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहने के स्थान पर उनका सुनियोजित उत्पादन प्रारंभ किया। इसी कारण प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् वी. गॉर्डन चाइल्ड ने इसे ‘नवपाषाण क्रांति’ की संज्ञा दी। इस क्रांति का आशय केवल नए प्रकार के पाषाण उपकरणों के निर्माण से नहीं था, बल्कि मानव के आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी तथा सांस्कृतिक जीवन में आए व्यापक परिवर्तनों से था। आखेट और खाद्य-संग्रह पर आधारित घुमंतू जीवन के स्थान पर कृषि, पशुपालन, स्थायी निवास, ग्राम-जीवन तथा खाद्योत्पादन पर आधारित अर्थव्यवस्था का विकास हुआ। इसी युग में मानव पहली बार प्रकृति पर आंशिक नियंत्रण स्थापित कर खाद्य का उत्पादक बना।
नवपाषाणकाल का काल-निर्धारण एवं स्वरूप
नवपाषाणकाल का आरंभ विश्व के विभिन्न भागों में अलग-अलग समय पर हुआ। पश्चिमी एशिया के उर्वर अर्धचंद्राकार क्षेत्र में इसका प्रारंभ लगभग 10,000 ईसा पूर्व के आसपास माना जाता है। इसके बाद यह संस्कृति क्रमशः यूरोप, दक्षिण एशिया, पूर्वी एशिया तथा अन्य क्षेत्रों में विकसित हुई। भारतीय उपमहाद्वीप में नवपाषाणकाल सामान्यतः 7000 ईसा पूर्व से 2000 ईसा पूर्व के मध्य विभिन्न क्षेत्रों में विकसित हुआ, यद्यपि इसकी समय-सीमा स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न रही है। नवपाषाणकाल को किसी निश्चित तिथि के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक विशेषताओं—कृषि, पशुपालन, स्थायी निवास, पालिशदार उपकरण तथा मृद्भांड—के आधार पर परिभाषित किया गया है।
नवपाषाण क्रांति की अवधारणा
सर जॉन लुब्बॉक ने पाषाणकाल को पुरापाषाण और नवपाषाण दो भागों में विभाजित किया था तथा इसका आधार उपकरणों की निर्माण-प्रणाली को माना था। पुरापाषाणकाल में मुख्यतः फ्लेक एवं ब्लेड तकनीक से उपकरण बनाए जाते थे, जबकि नवपाषाणकाल में पत्थरों को घिसकर, रगड़कर और पालिश करके अधिक परिष्कृत औजार तैयार किए जाने लगे।
वी. गॉर्डन चाइल्ड ने नवपाषाणकाल की व्याख्या तीन प्रमुख आधारों—भूतात्त्विक, तकनीकी और आर्थिक पर की। भूतात्त्विक दृष्टि से यह काल होलोसीन युग से संबंधित है, जब आधुनिक जलवायु और वनस्पति का विकास हुआ। तकनीकी दृष्टि से पॉलिशदार प्रस्तर उपकरण, मृद्भांड तथा कताई-बुनाई जैसी नई तकनीकों का विकास हुआ। आर्थिक दृष्टि से कृषि और पशुपालन का उदय इस काल की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। ई. सी. वॉर्मन तथा ए. एल. क्रोबर जैसे नृतत्त्वविदों ने भी कृषि और पशुपालन को नवपाषाण संस्कृति का मूल आधार माना है।
नवपाषाणकालीन उपकरण एवं तकनीकी प्रगति
नवपाषाणकाल में उपकरण निर्माण की तकनीक में अत्यंत महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। अब पत्थरों को केवल तोड़ा नहीं जाता था, बल्कि उन्हें घिसकर और पालिश करके अधिक धारदार, मजबूत तथा टिकाऊ बनाया जाता था। इससे उपकरणों की कार्यक्षमता और उपयोगिता दोनों में वृद्धि हुई।
इस काल का सबसे महत्त्वपूर्ण उपकरण पॉलिशदार पत्थर की कुल्हाड़ी थी। इसका उपयोग वृक्ष काटने, जंगल साफ करने, लकड़ी चीरने, भवन निर्माण, नाव बनाने तथा कृषि योग्य भूमि तैयार करने में किया जाता था। इसके अतिरिक्त हंसिया, छेनी (चिसेल), ऐड्ज़, पिक, स्लिंग स्टोन, पालिशिंग स्टोन, ओखली-मूसल, पीसने वाले पत्थर, सुइयाँ, हार्पून, मछली पकड़ने के काँटे तथा धनुष-बाण भी व्यापक रूप से प्रयुक्त होते थे। इन उपकरणों से स्पष्ट होता है कि इस काल में बढ़ईगीरी, कृषि, मत्स्य-आखेट तथा घरेलू उद्योगों का उल्लेखनीय विकास हो चुका था।
कृषि का विकास
नवपाषाणकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि कृषि का विकास था। मानव इतिहास में पहली बार मनुष्य ने भोजन संग्रह करने के स्थान पर स्वयं भोजन उत्पन्न करना प्रारंभ किया। यही परिवर्तन आगे चलकर स्थायी ग्रामों और सभ्यताओं के विकास का आधार बना।
कृषि का विकास किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि दीर्घकालीन अनुभव और पर्यावरणीय परिवर्तनों का फल था। मध्यपाषाणकाल के लोग जंगली घासों, फलों और बीजों का संग्रह करते थे। निरंतर अवलोकन से उन्होंने यह समझा कि भूमि में गिरे बीज वर्षा और नमी मिलने पर अंकुरित होकर नए पौधे उत्पन्न करते हैं। इसी अनुभव ने उन्हें बीज बोने और फसल उगाने की प्रेरणा दी।
प्रारंभिक अवस्था में बीज हाथ से बिखेरे जाते थे अथवा लकड़ी की नुकीली छड़ी से छोटे गड्ढे बनाकर बोए जाते थे। बाद में कुदाल तथा पत्थर के कृषि उपकरणों का प्रयोग होने लगा। इस प्रारंभिक कृषि को कुदाल-कृषि या उद्यान-कृषि कहा जाता है।
प्रमुख फसलें और कृषि क्षेत्र
विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न फसलों का विकास हुआ। पश्चिमी एशिया में गेहूँ और जौ प्रमुख थे, जबकि चीन की यांग्त्सी घाटी में धान तथा पीली नदी के क्षेत्र में बाजरा की खेती विकसित हुई। भारतीय उपमहाद्वीप में उत्तर प्रदेश की बेलन घाटी के कोलडिहवा और महगड़ा से धान की प्रारंभिक खेती के महत्त्वपूर्ण प्रमाण प्राप्त हुए हैं। वर्तमान शोधों के अनुसार धान की खेती का विकास एशिया के विभिन्न क्षेत्रों में लगभग समानांतर रूप से हुआ।
प्रारंभिक कृषि पूर्णतः वर्षा और भूमि की प्राकृतिक उर्वरता पर निर्भर थी। हल, विकसित सिंचाई व्यवस्था तथा उन्नत कृषि तकनीकों का ज्ञान अभी नहीं था। इसलिए भूमि की उर्वरता घटने पर लोग नए क्षेत्रों में जाकर जंगल साफ करके खेती करने लगते थे। इस प्रकार की कृषि को स्थानांतरित कृषि कहा जाता है।
पशुपालन का विकास
कृषि के साथ-साथ पशुपालन का भी तीव्र विकास हुआ। मानव ने भेड़, बकरी, गाय, बैल तथा सूअर जैसे पशुओं को पालतू बनाया। इन पशुओं से मांस, दूध, चमड़ा तथा श्रम-शक्ति प्राप्त होती थी। बैलों का उपयोग बाद के चरणों में कृषि कार्यों तथा भार ढोने के लिए भी होने लगा।
पशुपालन ने मानव की खाद्य-सुरक्षा को मजबूत किया और स्थायी जीवन को प्रोत्साहन दिया। पशुओं के गोबर का उपयोग प्राकृतिक खाद के रूप में होने लगा, जिससे कृषि की उत्पादकता बढ़ी। कृषि और पशुपालन के इस परस्पर संबंध ने मानव अर्थव्यवस्था को अधिक स्थिर और आत्मनिर्भर बनाया।
स्थायी निवास और ग्राम-जीवन
कृषि और पशुपालन के विकास ने मानव को स्थायी रूप से एक स्थान पर बसने के लिए प्रेरित किया। मिट्टी, लकड़ी, पत्थर तथा घास-फूस से बने घरों का निर्माण होने लगा। छोटे-छोटे ग्राम विकसित हुए, जहाँ परिवार और समुदाय मिलकर रहते थे।
स्थायी ग्रामों के विकास के साथ सामाजिक संगठन भी अधिक सुदृढ़ हुआ। परिवार संस्था को स्थिरता मिली, श्रम-विभाजन स्पष्ट हुआ तथा सामुदायिक सहयोग की भावना का विस्तार हुआ। खेती, पशुपालन, निर्माण, उपकरण निर्माण तथा घरेलू उद्योगों में विभिन्न व्यक्तियों की विशिष्ट भूमिकाएँ विकसित होने लगीं।
मृद्भांड, कताई और बुनाई
नवपाषाणकाल की एक अन्य महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मृद्भांडों का निर्माण था। प्रारंभ में हाथ से मिट्टी के बर्तन बनाए जाते थे, जिन्हें आग में पकाकर कठोर बनाया जाता था। इनका उपयोग भोजन पकाने, जल तथा अनाज के संग्रह और परिवहन के लिए किया जाता था।
इसी काल में कताई और बुनाई की तकनीक का भी विकास हुआ। कपास, सन तथा पशुओं के ऊन से धागे बनाए जाने लगे और उनसे वस्त्र तैयार किए गए। इससे मानव जीवन पहले की अपेक्षा अधिक व्यवस्थित और सुविधाजनक हो गया।
खाद्यान्न भंडारण एवं आर्थिक संगठन
कृषि उत्पादन बढ़ने के साथ खाद्यान्न के संरक्षण की आवश्यकता भी उत्पन्न हुई। प्रारंभ में अनाज घरेलू स्तर पर सुरक्षित रखा जाता था, किंतु धीरे-धीरे बड़े भंडारगृह बनने लगे। पश्चिमी एशिया, मिस्र तथा भारतीय उपमहाद्वीप के अनेक नवपाषाण स्थलों से अनाज भंडारण के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
फसल काटने के बाद दानों को अलग करने, सुखाने तथा सुरक्षित रखने की प्रारंभिक तकनीकों का विकास हुआ। अधिशेष उत्पादन ने वस्तुओं के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित किया तथा धीरे-धीरे आर्थिक विशेषीकरण की प्रक्रिया आरंभ हुई।
नवपाषाणकालीन संस्कृति का प्रसार
पश्चिमी एशिया के जेरिको, चातालहोयुक, जार्मो, हलफ़, समर्रा, हस्सुना तथा सियाल्क जैसे स्थल प्रारंभिक कृषि-आधारित समुदायों के प्रमुख केंद्र थे। मिस्र में फ़ैयूम और मेरिम्दे बेनी सलामा से कृषि और पशुपालन के महत्त्वपूर्ण प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
यूरोप में फ्रांस, इंग्लैंड, आयरलैंड, स्विट्ज़रलैंड तथा बाल्कन क्षेत्रों से अनेक नवपाषाणकालीन बस्तियाँ खोजी गई हैं। इन स्थलों से पालिशदार कुल्हाड़ियाँ, मृद्भांड, पालतू पशुओं की अस्थियाँ तथा अनाज के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
भारतीय नवपाषाण संस्कृति
भारतीय उपमहाद्वीप में नवपाषाण संस्कृति का विकास अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा। इसके प्रारंभिक प्रमाण वर्तमान पाकिस्तान के मेहरगढ़ से प्राप्त हुए हैं, जहाँ लगभग 7000 ईसा पूर्व से कृषि और पशुपालन के साक्ष्य मिलते हैं।
कश्मीर के बुर्ज़होम और गुफ़क्राल, उत्तर प्रदेश के कोलडिहवा और महागड़ा, बिहार के चिरांद, कर्नाटक के ब्रह्मगिरि, संगनकल्लू और पिक्लीहल, तथा आंध्र प्रदेश एवं तमिलनाडु के अनेक स्थलों से नवपाषाण संस्कृति के महत्त्वपूर्ण अवशेष प्राप्त हुए हैं। विशेष रूप से कोलडिहवा से धान की प्रारंभिक खेती तथा महागड़ा से पशुपालन के प्रमाण भारतीय नवपाषाण अध्ययन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। जी. आर. शर्मा, डी. टेरा, मार्टीमर व्हीलर तथा अन्य पुरातत्त्वविदों के अनुसंधानों ने भारतीय नवपाषाण संस्कृति के स्वरूप को स्पष्ट करने में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
पशुपालन का विकास
नवपाषाणकालीन क्रांति की दूसरी सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि पशुपालन का विकास था। यद्यपि मानव और पशुओं का संपर्क इससे पहले भी था तथा मध्यपाषाणकाल में कुत्ते का पालतूकरण प्रारंभ हो चुका था, परंतु नवपाषाणकाल में अनेक अन्य पशुओं को भी व्यवस्थित रूप से पालना आरंभ किया गया। इस परिवर्तन ने मानव की आर्थिक व्यवस्था, खाद्य सुरक्षा, कृषि व्यवस्था तथा स्थायी जीवन को नई दिशा प्रदान की। कृषि और पशुपालन के संयुक्त विकास ने मानव को केवल शिकारी और खाद्य-संग्राहक से खाद्य-उत्पादक समाज में परिवर्तित कर दिया। इसी कारण नवपाषाणकाल को मानव सभ्यता के विकास का एक निर्णायक चरण माना जाता है।
पशुपालन के विकास में जलवायु परिवर्तन की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। अंतिम हिमयुग की समाप्ति के बाद विश्व के अनेक भागों में तापमान बढ़ा, घास के मैदानों तथा वनों का विस्तार हुआ और पशुओं के प्राकृतिक आवासों में परिवर्तन आया। परिणामस्वरूप मानव और जंगली पशुओं का संपर्क पहले की अपेक्षा अधिक बढ़ गया। विद्वानों का अनुमान है कि शिकार के दौरान अनेक बार पशुओं के शावक जीवित पकड़ लिए जाते थे और उन्हें मानव बस्तियों के निकट पाला जाने लगा। धीरे-धीरे मनुष्य ने अनुभव किया कि कुछ पशु शांत स्वभाव के होते हैं तथा उन्हें भोजन देकर अपने साथ रखा जा सकता है। इसी क्रमिक प्रक्रिया से पशुओं के पालतूकरण की शुरुआत हुई। आधुनिक पुरातात्त्विक तथा आनुवंशिक अनुसंधानों से यह स्पष्ट हो चुका है कि यह प्रक्रिया किसी एक स्थान पर नहीं, बल्कि विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से विकसित हुई।
कृषि और पशुपालन का पारस्परिक संबंध
विद्वानों में लंबे समय तक यह विवाद रहा कि कृषि पहले विकसित हुई या पशुपालन। कुछ इतिहासकार दोनों के समानांतर विकास का समर्थन करते हैं, जबकि कुछ के अनुसार पशुपालन कृषि से पहले आरंभ हुआ। वर्तमान शोधों के आधार पर सामान्यतः यह स्वीकार किया जाता है कि कृषि और पशुपालन का विकास परस्पर संबद्ध था, किंतु विभिन्न क्षेत्रों में इनका क्रम अलग-अलग रहा।
पश्चिमी एशिया के उर्वर अर्धचंद्राकार क्षेत्र में गेहूँ और जौ की खेती के साथ-साथ भेड़ और बकरी के पालतूकरण के स्पष्ट प्रमाण प्राप्त हुए हैं। दूसरी ओर, कुछ क्षेत्रों में प्रारंभिक कृषक समुदायों ने लंबे समय तक बड़े पालतू पशुओं के बिना भी खेती की। इससे स्पष्ट होता है कि प्रारंभिक कृषि का अस्तित्व पशुपालन पर पूर्णतः निर्भर नहीं था, किंतु दोनों के संयुक्त विकास ने मानव जीवन को अधिक स्थिर और समृद्ध बनाया।
प्रारंभिक नवपाषाणकालीन कृषि में हल, बैल अथवा अन्य पशु-शक्ति का उपयोग नहीं किया जाता था। खेती मुख्यतः कुदाल, खोदने वाली लकड़ी तथा पाषाण उपकरणों की सहायता से की जाती थी। यही कारण है कि इस प्रारंभिक कृषि को कुदाल-कृषि या उद्यान-कृषि कहा जाता है।
पालतू पशुओं का आर्थिक महत्त्व
समय के साथ मनुष्य ने अनुभव किया कि कुछ पशुओं को मारने की अपेक्षा उन्हें जीवित रखना अधिक लाभदायक है। गाय, भेड़ और बकरी जैसे पशुओं से दूध प्राप्त होता था, उनके बच्चों की संख्या बढ़ती रहती थी और आवश्यकता पड़ने पर उनका मांस भी प्राप्त किया जा सकता था। इस प्रकार पशुपालन ने मानव के भोजन को अधिक विविध और सुरक्षित बनाया।
भेड़ और बकरी से ऊन तथा बाल प्राप्त होने लगे, जिनसे वस्त्र बनाए जाने लगे। गाय, बैल और अन्य पशुओं की खाल से जूते, वस्त्र, तंबू, थैले तथा अन्य उपयोगी वस्तुएँ तैयार की जाती थीं। बाद के चरणों में बैलों का उपयोग खेत जोतने तथा भारी सामान ढोने के लिए होने लगा, जिससे कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
मनुष्य ने यह भी अनुभव किया कि जहाँ पशु रहते हैं, वहाँ उनकी बीट से भूमि अधिक उपजाऊ हो जाती है। इससे प्राकृतिक खाद के रूप में गोबर के उपयोग का ज्ञान हुआ और स्थायी कृषि को बल मिला। कृषि और पशुपालन के इस संयुक्त स्वरूप को मिश्रित कृषि कहा जाता है, जिसने नवपाषाणकालीन अर्थव्यवस्था को अधिक स्थिर, उत्पादक और आत्मनिर्भर बनाया।
विभिन्न क्षेत्रों में पशुपालन
विश्व के विभिन्न भागों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग पशुओं का पालतूकरण हुआ। पश्चिमी एशिया में सबसे पहले भेड़, बकरी, गाय तथा सुअर के पालतूकरण के प्रमाण मिलते हैं। बाद के समय में गधे का उपयोग परिवहन के लिए तथा मध्य एशिया में घोड़े का पालतूकरण हुआ।
भारतीय उपमहाद्वीप में भी नवपाषाणकालीन स्थलों से गाय, बैल, भेड़, बकरी और सुअर के पालन के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। मेहरगढ़, महागड़ा, चिरांद तथा दक्षिण भारत के अनेक नवपाषाण स्थलों से प्राप्त पशु-अस्थियाँ इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि पशुपालन भारतीय नवपाषाण संस्कृति का भी एक महत्त्वपूर्ण अंग था। इन पशुओं ने केवल भोजन ही नहीं, बल्कि कृषि, परिवहन, निर्माण तथा सामाजिक जीवन के विकास में भी उल्लेखनीय योगदान दिया।
मृद्भांड कला का विकास
कृषि और पशुपालन के विकास के साथ अनाज, बीज, दूध तथा अन्य खाद्य पदार्थों के सुरक्षित भंडारण की आवश्यकता बढ़ी। इसी आवश्यकता ने मृद्भांड कला के विकास को जन्म दिया। यह नवपाषाणकाल की प्रमुख तकनीकी उपलब्धियों में से एक थी।
प्रारंभ में मनुष्य घास, बाँस और टहनियों की टोकरियों का उपयोग वस्तुओं के संग्रह के लिए करता था। इन्हें जलरोधी बनाने हेतु कभी-कभी बाहर से मिट्टी का लेप चढ़ा दिया जाता था। संभवतः संयोगवश ऐसी किसी मिट्टी-लेपित टोकरी के आग में जल जाने पर यह अनुभव हुआ कि मिट्टी पककर कठोर और टिकाऊ पात्र का रूप धारण कर लेती है। यद्यपि यह केवल एक परिकल्पना है, फिर भी इससे मृद्भांड निर्माण की प्रारंभिक प्रक्रिया को समझने में सहायता मिलती है।
मिट्टी के बर्तनों ने मानव जीवन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किया। अब भोजन पकाना, पानी संग्रह करना, दूध सुरक्षित रखना तथा अनाज का दीर्घकाल तक संरक्षण संभव हो गया। इससे स्थायी ग्राम-जीवन को भी मजबूती मिली।
मृद्भांड निर्माण की तकनीक
मृद्भांड निर्माण एक अत्यंत विकसित शिल्प था। उपयुक्त चिकनी मिट्टी में भूसी, रेत, पिसी हुई सीपी अथवा अन्य मिश्रण मिलाकर उसे अधिक मजबूत बनाया जाता था। प्रारंभिक चरण में अधिकांश बर्तन हाथ से बनाए जाते थे तथा वलय विधि का व्यापक उपयोग होता था। इसमें मिट्टी की लंबी बेलनाकार पट्टियाँ बनाकर उन्हें एक-दूसरे के ऊपर क्रमशः चिपकाया जाता था और फिर भीतर तथा बाहर से समतल करके इच्छित आकार दिया जाता था।
बर्तन सूखने के बाद खुले अग्निकुंड अथवा प्रारंभिक भट्टियों में लगभग 600 से 900 डिग्री सेल्सियस तापमान पर पकाए जाते थे। पश्चिमी एशिया के अनेक नवपाषाण स्थलों से ऐसी प्रारंभिक भट्टियों के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। बाद के समय में बर्तनों पर लाल, काले अथवा अन्य रंगों से रेखाएँ, ज्यामितीय आकृतियाँ तथा अलंकरण भी बनाए जाने लगे, जिससे मृद्भांड कला में सौंदर्यबोध का भी विकास हुआ।
नवपाषाणकालीन समाज में मृद्भांडों का उपयोग प्रचलित था। इनका प्रयोग अनाज, बीज, जल, दूध, घी तथा अन्य खाद्य पदार्थों के संग्रह के लिए किया जाता था। भोजन पकाने, परोसने तथा धार्मिक अनुष्ठानों में भी मिट्टी के बर्तनों का उपयोग होने लगा। बड़े पात्रों में अनाज का भंडारण किया जाता था, जबकि छोटे पात्र दैनिक उपयोग के लिए बनाए जाते थे।
मृद्भांडों के विकास ने न केवल घरेलू जीवन को अधिक व्यवस्थित बनाया, बल्कि अधिशेष उत्पादन के संरक्षण तथा विनिमय को भी संभव बनाया। यही कारण है कि मृद्भांड कला को विकसित सभ्यताओं की आधारभूत तकनीकों में सम्मिलित किया जाता है।
वस्त्र निर्माण कला का विकास
नवपाषाणकाल में वस्त्र निर्माण कला का उल्लेखनीय विकास हुआ। पुरापाषाण और मध्यपाषाण काल में मानव मुख्यतः पशुओं की खाल, वृक्षों की छाल तथा प्राकृतिक रेशों का उपयोग शरीर ढकने के लिए करता था। किंतु कृषि और पशुपालन के विकास के साथ वस्त्र निर्माण एक संगठित शिल्प के रूप में विकसित हुआ। इस परिवर्तन ने केवल दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति ही नहीं की, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी प्रगति को भी नई दिशा प्रदान की।
वस्त्र निर्माण के लिए उपयुक्त रेशों की पहचान, उनसे धागा तैयार करना तथा उन्हें बुनकर वस्त्र बनाना उस समय की महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धियाँ थीं। इससे मानव जीवन अधिक सुविधाजनक और व्यवस्थित बन गया।
वस्त्र निर्माण के कच्चे पदार्थ
पुरातात्त्विक साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि पश्चिमी एशिया और मिस्र के नवपाषाणकालीन समुदाय सन के रेशों से धागा और वस्त्र बनाना जानते थे। मेसोपोटामिया तथा अनातोलिया में भेड़ों के पालतूकरण के साथ ऊन का उपयोग भी बढ़ने लगा।
भारतीय उपमहाद्वीप में कपास के उपयोग के स्पष्ट प्रमाण सिंधु-सरस्वती सभ्यता से प्राप्त होते हैं, जबकि कपास की प्रारंभिक खेती इससे कुछ पहले उत्तर-पश्चिम भारत और पाकिस्तान के क्षेत्रों में विकसित हो चुकी थी। इस प्रकार विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के अनुसार सन, ऊन, कपास तथा अन्य वनस्पति रेशों का उपयोग वस्त्र निर्माण में किया जाने लगा।
धागा कातने और बुनाई की तकनीक
वस्त्र निर्माण की प्रक्रिया दो प्रमुख चरणों में संपन्न होती थी। प्रथम चरण में सन, ऊन अथवा कपास के रेशों को साफ करके तकली और तकुए की सहायता से धागे में बदला जाता था। इसके बाद करघे पर इन धागों को बुनकर वस्त्र तैयार किए जाते थे।
पुरातात्त्विक उत्खननों से तकली के चक्र, तकुए, करघे के भार तथा बुनाई से संबंधित अन्य उपकरण प्राप्त हुए हैं, जो इस शिल्प के पर्याप्त विकास का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। धागा कातने और बुनाई की यह तकनीक मानव की प्रारंभिक वैज्ञानिक उपलब्धियों में गिनी जाती है, क्योंकि इसके लिए रेशों के गुण, धागे के तनाव तथा बुनाई की विभिन्न विधियों का व्यावहारिक ज्ञान आवश्यक था।
नवपाषाणकाल में विकसित पशुपालन, मृद्भांड निर्माण तथा वस्त्र निर्माण जैसी तकनीकों ने मानव समाज को अधिक आत्मनिर्भर, संगठित और उत्पादक बनाया। इन उपलब्धियों ने आगे चलकर धातु युग, नगरों के विकास तथा प्रारंभिक सभ्यताओं की आर्थिक और सांस्कृतिक प्रगति के लिए सुदृढ़ आधार तैयार किया।
नवपाषाणकालीन समाज का विकास
नवपाषाणकाल मानव इतिहास का वह महत्त्वपूर्ण चरण था, जब कृषि, पशुपालन, मृद्भांड निर्माण तथा वस्त्र निर्माण जैसी तकनीकी उपलब्धियों के कारण मानव का जीवन पहले की अपेक्षा अधिक सुरक्षित, स्थिर और संगठित हो गया। खाद्य उत्पादन में निरंतर वृद्धि से भोजन की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित हुई, जिसके परिणामस्वरूप जनसंख्या में क्रमिक वृद्धि होने लगी। अब मनुष्य को जीविका के लिए निरंतर एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकने की आवश्यकता नहीं रही। उसने स्थायी निवास अपनाकर अपने समय और श्रम का उपयोग खेती, पशुपालन, मकान निर्माण, उपकरण निर्माण, बर्तन बनाने तथा अन्य शिल्पों के विकास में करना प्रारंभ किया। इस प्रकार नवपाषाणकाल में मानव केवल जीविका-संग्राहक नहीं रहा, बल्कि योजनाबद्ध उत्पादन और सामाजिक संगठन का आधार निर्मित करने लगा।
परिवार और सामाजिक संगठन
स्थायी जीवन तथा कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था ने परिवार संस्था को अधिक सुदृढ़ बनाया। कृषि, पशुपालन और घरेलू उद्योगों का संचालन सामान्यतः परिवार के सामूहिक सहयोग से किया जाता था। जंगल साफ करना, भूमि तैयार करना, बीज बोना, फसल की रक्षा करना, पशुओं की देखभाल करना तथा आवासों का निर्माण ऐसे कार्य थे, जिनमें अनेक व्यक्तियों के संयुक्त श्रम की आवश्यकता पड़ती थी। इसी कारण परिवार और कुटुंब समाज की मूल इकाइयों के रूप में विकसित हुए।
पुरातात्त्विक प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि नवपाषाणकालीन समाज का आधार सहयोग, पारस्परिक सहायता और सामूहिक उत्तरदायित्व था। समुदाय के सदस्य संसाधनों का साझा उपयोग करते थे तथा आवश्यकता पड़ने पर सामूहिक श्रम द्वारा कृषि, निर्माण और अन्य कार्यों को संपन्न करते थे। यद्यपि इस काल की सामाजिक संरचना के प्रत्यक्ष प्रमाण सीमित हैं, फिर भी विद्वानों का मत है कि अनुभव, आयु और कार्यकुशलता के आधार पर कुछ व्यक्तियों का नेतृत्व स्वीकार किया जाता था। उस समय संगठित राज्य, राजसत्ता, स्थायी प्रशासन अथवा विधिवत राजनीतिक संस्थाओं का विकास नहीं हुआ था; सामाजिक जीवन मुख्यतः पारिवारिक और सामुदायिक सहयोग पर आधारित था।
श्रम-विभाजन और प्रारंभिक शिल्प
नवपाषाणकाल में उत्पादन के विस्तार के साथ प्रारंभिक श्रम-विभाजन का विकास भी हुआ। समाज के कुछ सदस्य कृषि में अधिक दक्ष थे, जबकि अन्य पशुपालन, मृद्भांड निर्माण, उपकरण निर्माण, वस्त्र बुनाई अथवा आवास निर्माण जैसे कार्यों में विशेषज्ञता प्राप्त करने लगे। यद्यपि अधिकांश शिल्प घरेलू स्तर पर संचालित होते थे, फिर भी अनेक कार्य सामूहिक रूप से संपन्न किए जाते थे।
इस श्रम-विभाजन ने उत्पादन क्षमता में वृद्धि की तथा मानव को अपनी आवश्यकताओं की वस्तुएँ अधिक कुशलता से तैयार करने में सहायता प्रदान की। इसी प्रक्रिया ने आगे चलकर विशिष्ट शिल्पकार वर्गों और विकसित आर्थिक संगठन के निर्माण की आधारभूमि तैयार की।
समतावादी सामाजिक व्यवस्था
पुरातात्त्विक उत्खननों से प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर अधिकांश इतिहासकार यह मानते हैं कि नवपाषाणकालीन समाज अपेक्षाकृत समतावादी था। विभिन्न स्थलों से प्राप्त घरों, समाधियों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं में अत्यधिक आर्थिक अथवा सामाजिक विषमता दिखाई नहीं देती। अधिकांश आवास आकार और निर्माण की दृष्टि से लगभग समान हैं, जिससे अनुमान लगाया जाता है कि उस समय समाज में धन और सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण नहीं हुआ था।
यूरोप और पश्चिमी एशिया के कुछ नवपाषाण स्थलों से अपेक्षाकृत बड़े भवन अवश्य प्राप्त हुए हैं, किंतु अधिकांश विद्वान उन्हें सामुदायिक सभा-भवन, अनाज-भंडार या धार्मिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में देखते हैं, न कि किसी राजा अथवा शासक के महल के रूप में। इसी प्रकार युद्ध के उद्देश्य से निर्मित विशेष हथियारों के प्रमाण भी अत्यंत सीमित हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि उस समय समाज का प्रमुख उद्देश्य उत्पादन, सहयोग और जीवन-निर्वाह था, न कि संगठित युद्ध या साम्राज्य-विस्तार।
स्थायी ग्रामों का विकास
कृषि और पशुपालन के विकास के साथ मानव स्थायी ग्रामों में बसने लगा। ये बस्तियाँ सामान्यतः उपजाऊ भूमि, जलस्रोतों और चरागाहों के निकट स्थापित की जाती थीं, जिससे कृषि और पशुपालन दोनों कार्य सुगमता से संपन्न हो सकें। प्रारंभिक घर लकड़ी, बाँस, टहनियों, घास-फूस और मिट्टी से बनाए जाते थे। अनेक स्थानों पर लकड़ी या बाँस की जाली पर मिट्टी का लेप चढ़ाकर दीवारें बनाई जाती थीं, जबकि छतों को फूस, सरकंडों अथवा वृक्षों की छाल से ढका जाता था।
यूरोप के स्विट्ज़रलैंड की झीलों के किनारे खंभों पर बने आवास तथा स्कॉटलैंड के स्कारा ब्रे जैसे नवपाषाणकालीन गाँव इस प्रकार की निर्माण परंपराओं के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। जलभराव वाले क्षेत्रों में खंभों पर निर्मित मकान सुरक्षा और सुविधा दोनों की दृष्टि से उपयुक्त सिद्ध होते थे।
नवपाषाणकालीन गाँव सामान्यतः आकार में छोटे होते थे। इनमें कुछ परिवारों से लेकर लगभग तीस या चालीस परिवारों तक का निवास होता था। घरों के बीच पगडंडियाँ या संकरी गलियाँ होती थीं तथा अनेक स्थानों पर संपूर्ण बस्ती के चारों ओर लकड़ी की बाड़, खाई अथवा पत्थर की घेराबंदी भी की जाती थी, जिससे जंगली पशुओं और बाहरी खतरों से सुरक्षा प्राप्त हो सके। यही ग्राम-समुदाय आगे चलकर विकसित ग्रामीण जीवन, सामाजिक सहयोग और प्रारंभिक सभ्यताओं की आधारशिला बने।
धार्मिक विश्वास और आध्यात्मिक चेतना
नवपाषाणकालीन समाज के धार्मिक विचार प्रकृति, कृषि, उर्वरता और पूर्वजों के सम्मान से गहराई से जुड़े हुए थे। स्थायी कृषि और ग्राम-जीवन के विकास के साथ धार्मिक विश्वास भी अधिक संगठित और व्यवस्थित होने लगे। पुरातात्त्विक उत्खननों से प्राप्त समाधियों, मूर्तियों, पूजा-सामग्रियों तथा अनुष्ठानिक अवशेषों से ज्ञात होता है कि इस काल के लोग मृत्यु के बाद जीवन अथवा किसी आध्यात्मिक अस्तित्व में विश्वास रखते थे।
मृतकों को अत्यंत सावधानी से दफनाया जाता था तथा उनके साथ भोजन, पत्थर के उपकरण, मृद्भांड, आभूषण और दैनिक उपयोग की वस्तुएँ भी रखी जाती थीं। इससे यह संकेत मिलता है कि लोग मानते थे कि मृत्यु के पश्चात भी व्यक्ति को इन वस्तुओं की आवश्यकता पड़ सकती है। अनेक स्थलों पर शवों को घरों के फर्श के नीचे अथवा विशेष कब्रिस्तानों में दफनाने की परंपरा मिलती है, जो पूर्वजों के प्रति सम्मान तथा परिवार की निरंतरता की भावना का परिचायक है।
पूर्वज-पूजा और उर्वरता संबंधी विश्वास
नवपाषाणकालीन धार्मिक जीवन में पूर्वज-पूजा का महत्त्वपूर्ण स्थान था। अनेक विद्वानों का मत है कि कृषक समुदाय यह विश्वास करता था कि पूर्वजों की आत्माएँ भूमि की उर्वरता, पशुओं की वृद्धि तथा फसलों की समृद्धि में सहायक होती हैं। इसी कारण मृतकों को कृषि-भूमि अथवा आवास के समीप दफनाने की परंपरा विकसित हुई। यूरोप, पश्चिमी एशिया तथा भारतीय उपमहाद्वीप के अनेक नवपाषाण स्थलों से प्राप्त समाधियाँ इस विश्वास की पुष्टि करती हैं।
विभिन्न क्षेत्रों में अंतिम संस्कार की विधियाँ भिन्न-भिन्न थीं, किंतु अधिकांश समुदायों में मृतकों के प्रति सम्मान, स्मृति और आध्यात्मिक श्रद्धा का भाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि नवपाषाणकालीन समाज में धार्मिक आस्थाएँ केवल व्यक्तिगत नहीं थीं, बल्कि सामुदायिक जीवन और कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था से भी घनिष्ठ रूप से जुड़ी थीं।
महापाषाणीय स्मारकों की प्रारंभिक परंपरा
नवपाषाणकाल के उत्तरार्द्ध में अनेक क्षेत्रों में विशाल पत्थरों से निर्मित स्मारकों की परंपरा विकसित होने लगी, यद्यपि विभिन्न क्षेत्रों में इनका कालक्रम समान नहीं था। बड़े-बड़े पत्थरों से निर्मित डोल्मेन, मेनहिर, पत्थर-वृत्त तथा अन्य स्मारक यूरोप, पश्चिमी एशिया तथा बाद के काल में दक्षिण भारत सहित अनेक क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं। इनका उपयोग मुख्यतः समाधि-स्मारकों, स्मृति-चिह्नों अथवा सामुदायिक धार्मिक स्थलों के रूप में किया जाता था।
कुछ विद्वानों का मत है कि इन संरचनाओं का उपयोग खगोलीय घटनाओं के अवलोकन तथा सामूहिक धार्मिक अनुष्ठानों के लिए भी किया जाता था। यद्यपि इनके सभी उद्देश्यों के संबंध में पूर्ण सहमति नहीं है, फिर भी यह निर्विवाद है कि इनका संबंध धार्मिक आस्थाओं, सामाजिक एकता तथा सामुदायिक जीवन से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ था। यही परंपराएँ आगे चलकर अधिक विकसित धार्मिक स्थापत्य और स्मारक निर्माण की आधारभूमि बनीं।
प्रकृति-पूजा का विकास
नवपाषाणकालीन समाज में प्रकृति-पूजा का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान था। कृषि-आधारित जीवन के कारण मानव की आजीविका वर्षा, सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, नदियों तथा ऋतुओं पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर हो गई थी। समय पर वर्षा होना, पर्याप्त धूप मिलना, भूमि की उर्वरता तथा ऋतु-चक्र की नियमितता ही कृषि की सफलता का आधार थे। इसलिए इन प्राकृतिक शक्तियों को अलौकिक और जीवनदायिनी मानकर उनकी आराधना की जाती थी।
कृषि की समृद्धि, पशुओं की वृद्धि, वर्षा की प्राप्ति तथा प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा की कामना से सामूहिक धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता था। बीज बोने, फसल पकने और कटाई के अवसर पर विशेष उत्सव मनाए जाते थे, जिनमें पूरा समुदाय सम्मिलित होता था। इन धार्मिक अनुष्ठानों का उद्देश्य केवल देवताओं को प्रसन्न करना ही नहीं था, बल्कि प्रकृति और मानव के मध्य संतुलन तथा सामुदायिक एकता बनाए रखना भी था। आधुनिक लोक-परंपराओं में वर्षा, कृषि और फसल से जुड़े अनेक पर्व एवं अनुष्ठान संभवतः इन्हीं प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के विकसित रूप हैं।
टोटेमवाद और कुलचिह्न
नवपाषाणकालीन धार्मिक जीवन में कुलचिह्न अथवा टोटेम (Totem) संबंधी मान्यताओं के भी संकेत प्राप्त होते हैं। अनेक समुदाय किसी विशेष पशु, पक्षी, वृक्ष या पौधे को अपने कुल अथवा समुदाय का प्रतीक मानते थे। यह कुलचिह्न केवल पहचान का साधन नहीं था, बल्कि उसके प्रति गहरी धार्मिक आस्था और सम्मान भी जुड़ा रहता था।
ऐसे प्रतीकों को पवित्र माना जाता था तथा उनके संरक्षण का विशेष ध्यान रखा जाता था। अनेक आदिम समाजों में यह विश्वास था कि कुलचिह्न उनके पूर्वजों, रक्षक-शक्ति अथवा समुदाय की सामूहिक पहचान का प्रतिनिधित्व करता है। यद्यपि सभी नवपाषाण समुदायों में टोटेमवाद समान रूप से विकसित नहीं था, फिर भी विश्व के अनेक क्षेत्रों के पुरातात्त्विक और नृवंशीय अध्ययनों से इसके पर्याप्त संकेत प्राप्त होते हैं। इस प्रकार टोटेम संबंधी मान्यताओं ने सामाजिक संगठन, पारिवारिक पहचान तथा सामुदायिक एकता को सुदृढ़ बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मातृदेवी और उर्वरता-पूजा
नवपाषाणकालीन धार्मिक परंपराओं में मातृदेवी अथवा पृथ्वी-माता की अवधारणा अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। पश्चिमी एशिया, अनातोलिया, बाल्कन तथा अन्य क्षेत्रों से प्राप्त मिट्टी की अनेक स्त्री-मूर्तियाँ इस विश्वास की सशक्त अभिव्यक्ति हैं। इन मूर्तियों को सामान्यतः उर्वरता, मातृत्व, समृद्धि तथा कृषि-सफलता का प्रतीक माना जाता है।
पुरापाषाणकाल की प्रसिद्ध ‘वीनस’ प्रतिमाएँ मुख्यतः प्रजनन-शक्ति का प्रतीक थीं, किंतु नवपाषाणकाल में कृषि के विकास के साथ यह परंपरा पृथ्वी की उर्वरता और अन्न-समृद्धि से जुड़ गई। बीज बोने, वर्षा की कामना, फसल पकने तथा कटाई के अवसर पर आयोजित सामूहिक अनुष्ठान संभवतः इसी उर्वरता-विश्वास से प्रेरित थे। आगे चलकर मिस्र, मेसोपोटामिया, यूनान तथा अन्य प्राचीन सभ्यताओं में पृथ्वी-माता और उर्वरता-देवियों की पूजा का विकास इन्हीं प्रारंभिक धार्मिक धारणाओं का विस्तृत स्वरूप माना जाता है।
वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति
नवपाषाणकाल तकनीकी और वैज्ञानिक दृष्टि से मानव इतिहास का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण चरण था। इसी काल में मानव ने प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को अधिक व्यवस्थित और वैज्ञानिक बनाया। घिसे एवं पालिश किए हुए पत्थर के औजारों का निर्माण, कृषि और पशुपालन का विकास, मृद्भांड निर्माण, कताई-बुनाई तथा स्थायी आवासों का निर्माण इस युग की प्रमुख उपलब्धियाँ थीं।
इस काल में उपकरण केवल आखेट तक सीमित नहीं रहे, बल्कि कृषि, वानिकी, निर्माण और घरेलू कार्यों में भी व्यापक रूप से प्रयुक्त होने लगे। पालिशदार कुल्हाड़ियाँ जंगलों की सफाई और कृषि-भूमि तैयार करने में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुईं, जबकि हँसिया, छेनी, हथौड़े तथा अन्य उपकरणों ने उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की।
परिवहन और पहिए का प्रारंभिक उपयोग
नवपाषाणकाल में परिवहन तकनीक का भी क्रमिक विकास हुआ। लकड़ी के विशाल तनों को भीतर से खोखला करके डोंगियाँ बनाई जाती थीं, जिनका उपयोग नदियों और झीलों में आवागमन, मत्स्य-शिकार तथा सीमित व्यापार के लिए किया जाता था। इन नौकाओं ने जलमार्गों के माध्यम से विभिन्न समुदायों के बीच संपर्क स्थापित करने में सहायता की।
इसी काल में पहिए का प्रारंभिक उपयोग कुम्हार के चाक के रूप में हुआ। कुम्हार का चाक मिट्टी के बर्तनों को अधिक समान आकार, संतुलन और गुणवत्ता के साथ बनाने में सहायक सिद्ध हुआ। बाद में यही तकनीकी सिद्धांत परिवहन के साधनों के विकास का आधार बना और मानव इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धियों में सम्मिलित हुआ।
घरेलू उद्योग और उत्पादन तकनीक
नवपाषाणकाल में घरेलू उद्योगों का उल्लेखनीय विकास हुआ। अनाज पीसने के लिए सिल-बट्टा, ओखली-मूसल तथा प्रारंभिक चक्कियों का उपयोग होने लगा। इन उपकरणों ने भोजन तैयार करने की प्रक्रिया को अधिक सुविधाजनक बनाया तथा कृषि उत्पादन के प्रभावी उपयोग को संभव किया।
मिट्टी के बर्तनों को नियंत्रित तापमान पर पकाने की तकनीक भी इसी काल में विकसित हुई। उपयुक्त मिट्टी का चयन, उसमें विभिन्न पदार्थों का मिश्रण तथा निश्चित तापमान पर पकाने की प्रक्रिया मानव की वैज्ञानिक समझ का परिचायक है। इसी प्रकार तकली द्वारा धागा कातना तथा करघे पर वस्त्र बुनना भी तकनीकी प्रगति के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इन सभी नवाचारों ने मानव के दैनिक जीवन को अधिक व्यवस्थित और सुविधाजनक बनाया।
प्रारंभिक चिकित्सा एवं वैज्ञानिक ज्ञान
नवपाषाणकालीन मानव को प्राकृतिक संसाधनों तथा वनस्पतियों का पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हो चुका था। अनेक पौधों के औषधीय गुणों का सीमित ज्ञान विकसित हो गया था, जिनका उपयोग सामान्य रोगों और घावों के उपचार में किया जाता था।
कुछ पुरातात्त्विक स्थलों से प्राप्त मानव कंकालों में कपाल-छेदन के प्रमाण भी मिले हैं। इसमें खोपड़ी की हड्डी में नियंत्रित रूप से छेद किया जाता था। विद्वानों का मत है कि यह प्रक्रिया सिर की चोटों के उपचार, रोग-निवारण अथवा धार्मिक-चिकित्सकीय विश्वासों से संबंधित हो सकती थी। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि अनेक कंकालों में इस शल्य-क्रिया के बाद हड्डियों के पुनः जुड़ने के प्रमाण मिले हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि कुछ रोगी उपचार के बाद जीवित भी रहे। यह प्रारंभिक शल्य-चिकित्सा और व्यावहारिक चिकित्सा-ज्ञान का महत्त्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है।
उत्पादन क्षमता और आर्थिक परिवर्तन
नवपाषाणकालीन वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियों ने मानव की उत्पादन क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि की। कृषि और पशुपालन के कारण नियमित खाद्य उत्पादन संभव हुआ, जबकि मृद्भांड निर्माण, अनाज भंडारण तथा वस्त्र निर्माण जैसी तकनीकों ने जीवन को अधिक सुरक्षित और व्यवस्थित बनाया। उपकरणों की गुणवत्ता में सुधार से श्रम की उत्पादकता बढ़ी तथा अतिरिक्त उत्पादन की संभावना उत्पन्न हुई।
इसी आर्थिक परिवर्तन ने स्थायी ग्रामों, सामाजिक सहयोग, श्रम-विभाजन और सीमित वस्तु-विनिमय की प्रक्रिया को गति प्रदान की। उत्पादन-आधारित यह व्यवस्था आगे चलकर जटिल आर्थिक संगठनों, व्यापारिक गतिविधियों तथा विकसित सभ्यताओं के उदय की आधारभूमि सिद्ध हुई।
धातुकाल की ओर संक्रमण
नवपाषाणकाल के उत्तरार्द्ध में जनसंख्या वृद्धि, कृषि विस्तार और उत्पादन की बढ़ती आवश्यकताओं ने मानव को नई तकनीकों की खोज के लिए प्रेरित किया। उपजाऊ नदी-घाटियों में स्थायी बस्तियों का विकास हुआ, जहाँ जल, उपजाऊ मिट्टी और परिवहन की सुविधाएँ उपलब्ध थीं। नील, दजला-फरात (टिगरिस-यूफ्रेटीस), सिंधु तथा ह्वांगहो जैसी नदी-घाटियाँ इसी कारण प्रारंभिक सभ्यताओं के केंद्र बनीं।
इसी संक्रमणकाल में हल, बैलगाड़ी, उन्नत कुम्हार-चाक, पालदार नौकाओं तथा धातुओं के प्रारंभिक उपयोग की दिशा में विकास प्रारंभ हुआ। इन तकनीकी परिवर्तनों ने नवपाषाणकाल से ताम्रपाषाण तथा धातुकाल की ओर संक्रमण का मार्ग प्रशस्त किया और मानव सभ्यता के अगले चरण की नींव रखी।




