प्रागैतिहासिक सभ्यता (Prehistoric Civilization)  

प्रागैतिहासिक सभ्यता (Prehistoric Civilization)  

प्रागैतिहासिक सभ्यता

भारतीय परंपरा में पृथ्वी को जीवन, पालन-पोषण और समस्त सृष्टि का आधार माना गया है। वैदिक साहित्य में पृथ्वी को माता तथा मनुष्य को उसका पुत्र कहा गया है, जो दोनों के बीच गहरे और अविभाज्य संबंध का प्रतीक है। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में पृथ्वी की उत्पत्ति के संबंध में अनेक पौराणिक एवं दार्शनिक व्याख्याएँ मिलती हैं। इसके विपरीत, आधुनिक विज्ञान खगोलशास्त्र, भूविज्ञान तथा जीवाश्म विज्ञान के आधार पर पृथ्वी की उत्पत्ति और उसके क्रमिक विकास की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। प्रागैतिहासिक काल के अध्ययन में धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विशेष महत्त्व है, क्योंकि इससे पृथ्वी, जीवन तथा मानव सभ्यता के विकास को प्रमाणिक रूप से समझा जा सकता है।

पृथ्वी की उत्पत्ति

आधुनिक वैज्ञानिक मत के अनुसार पृथ्वी का निर्माण लगभग 4.54 अरब (454 करोड़) वर्ष पूर्व सौरमंडल के निर्माण के साथ हुआ। वैज्ञानिकों के अनुसार गैस और धूल के विशाल अंतरिक्षीय बादल (सौर नीहारिका) के गुरुत्वाकर्षण के कारण संघनित होने से सूर्य तथा उसके चारों ओर ग्रहों का निर्माण हुआ। प्रारंभिक पृथ्वी अत्यंत गर्म एवं द्रवित पिंड के रूप में थी। समय के साथ इसकी बाहरी सतह ठंडी होकर कठोर भूपर्पटी में परिवर्तित हो गई, जबकि आंतरिक भाग आज भी अत्यधिक गर्म एवं सक्रिय बना हुआ है।

प्रागैतिहासिक सभ्यता (Prehistoric Civilization)  
पृथ्वी की उत्पत्ति

प्रारंभिक पृथ्वी पर निरंतर ज्वालामुखीय गतिविधियाँ होती थीं, जिनसे निकलने वाली गैसों ने प्रारंभिक वायुमंडल का निर्माण किया। बाद में जलवाष्प के संघनन से लगातार वर्षा हुई, जिसके परिणामस्वरूप महासागर, नदियाँ तथा झीलें अस्तित्व में आए। इन्हीं जलाशयों में जीवन के प्रारंभिक रूपों के विकास के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं। इस प्रकार पृथ्वी का निर्माण केवल एक खगोलीय घटना नहीं था, बल्कि करोड़ों वर्षों तक चलने वाली एक सतत भूवैज्ञानिक प्रक्रिया थी।

पृथ्वी का भूवैज्ञानिक इतिहास

पृथ्वी पर जीवन का विकास अत्यंत दीर्घकालिक एवं क्रमिक प्रक्रिया का परिणाम है। भूवैज्ञानिकों ने चट्टानों, जीवाश्मों तथा रेडियोमेट्रिक तिथि-निर्धारण के आधार पर पृथ्वी के इतिहास को विभिन्न महाकल्पों, कल्पों एवं कालों में विभाजित किया है। आधुनिक भूवैज्ञानिक समय-सारणी के अनुसार पृथ्वी के इतिहास को चार प्रमुख महाकल्पों—हैडियन, आर्कियन, प्रोटेरोज़ोइक तथा फैनेरोज़ोइक—में विभाजित किया जाता है।

हैडियन महाकल्प

हैडियन महाकल्प पृथ्वी के निर्माण से लगभग 4.54 अरब वर्ष पूर्व से 4 अरब वर्ष पूर्व तक का काल था। इसे अजीव अथवा आद्य महाकल्प भी कहा जाता है, क्योंकि इस समय पृथ्वी पर जीवन का कोई अस्तित्व नहीं था। पृथ्वी की सतह अत्यधिक गर्म थी तथा उस पर लगातार उल्कापिंडों की वर्षा और तीव्र ज्वालामुखीय गतिविधियाँ होती रहती थीं। इसी काल में पृथ्वी की प्रारंभिक भूपर्पटी और महासागरों के निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई।

आर्कियन एवं प्रोटेरोज़ोइक महाकल्प

हैडियन के बाद आर्कियन तथा प्रोटेरोज़ोइक महाकल्पों में पृथ्वी अपेक्षाकृत स्थिर होने लगी। महासागरों का विस्तार हुआ तथा लगभग 3.5 अरब वर्ष पूर्व सबसे पहले सूक्ष्म एककोशिकीय जीवों—जैसे जीवाणु एवं शैवाल—का विकास हुआ। सायनोबैक्टीरिया द्वारा प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया आरंभ होने से वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ी। इसे ‘महान ऑक्सीकरण घटना’ कहा जाता है, जिसने आगे चलकर जटिल जीवों के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। प्रोटेरोज़ोइक महाकल्प के अंतिम चरण में बहुकोशिकीय जीवों का विकास प्रारंभ हो गया था।

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पृथ्वी का भूवैज्ञानिक इतिहास
फैनेरोज़ोइक महाकल्प

लगभग 54.1 करोड़ वर्ष पूर्व फैनेरोज़ोइक महाकल्प का आरंभ हुआ, जिसमें पृथ्वी पर जीवन का तीव्र विस्तार हुआ। इसे तीन प्रमुख कल्पों में विभाजित किया जाता है—पुराजीवी, मध्यजीवी और नवजीवी।

पुराजीवी कल्प  : पुराजीवी कल्प की अवधि लगभग 54.1 करोड़ वर्ष पूर्व से 25.2 करोड़ वर्ष पूर्व तक मानी जाती है। इस काल में समुद्री जीवन का तीव्र विकास हुआ तथा क्रमशः अकशेरुकी जीव, मछलियाँ, उभयचर और प्रारंभिक सरीसृप विकसित हुए। इसे कैम्ब्रियन, ऑर्डोविशियन, सिल्यूरियन, डेवोनियन, कार्बोनिफेरस तथा पर्मियन कालों में विभाजित किया जाता है।

कैम्ब्रियन काल में प्रसिद्ध कैम्ब्रियन विस्फोट हुआ, जिसमें समुद्री जीवों की अनेक नई प्रजातियाँ अस्तित्व में आईं। ऑर्डोविशियन काल में प्रारंभिक जबड़ारहित मछलियों का विकास हुआ। सिल्यूरियन काल में प्रथम स्थलीय पौधों और जबड़े वाली मछलियों का उद्भव हुआ। डेवोनियन काल को ‘मत्स्य युग’ कहा जाता है, क्योंकि इस समय विभिन्न प्रकार की मछलियों का अत्यधिक विकास हुआ तथा प्रथम उभयचर जीव जल से निकलकर स्थल पर आए।

कार्बोनिफेरस काल में विशाल दलदली वन विकसित हुए, जिनसे बाद में कोयले के विशाल भंडार बने। इसी काल में विशाल कीटों, उभयचरों तथा प्रारंभिक सरीसृपों की संख्या में वृद्धि हुई। पर्मियन काल के अंत में पृथ्वी के इतिहास की सबसे बड़ी पर्मियन महाविलुप्ति हुई, जिसमें लगभग 90 प्रतिशत समुद्री तथा 70 प्रतिशत स्थलीय प्रजातियाँ नष्ट हो गईं।

मध्यजीवी कल्प  : पर्मियन महाविलुप्ति के बाद लगभग 25.2 करोड़ वर्ष पूर्व मध्यजीवी कल्प का आरंभ हुआ, जो लगभग 6.6 करोड़ वर्ष पूर्व तक चला। इसे ‘सरीसृपों का युग’ कहा जाता है। इस कल्प को ट्रायसिक, जुरासिक तथा क्रिटेशियस कालों में विभाजित किया जाता है।

ट्रायसिक काल में प्रथम डायनासोर तथा प्रारंभिक स्तनधारियों का विकास हुआ। जुरासिक काल में डायनासोरों का अत्यधिक विस्तार हुआ तथा प्रथम पक्षी आर्कियोप्टेरिक्स का विकास हुआ। क्रिटेशियस काल में पुष्पीय पौधों (एंजियोस्पर्म) का विकास हुआ तथा स्तनधारियों की विविधता बढ़ी। लगभग 6.6 करोड़ वर्ष पूर्व एक विशाल क्षुद्रग्रह के पृथ्वी से टकराने तथा व्यापक ज्वालामुखीय गतिविधियों के कारण डायनासोर सहित अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो गईं। इस घटना के बाद स्तनधारियों के तीव्र विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ।

नवजीवी कल्प  : क्रिटेशियस काल के बाद नवजीवी कल्प का आरंभ हुआ, जो वर्तमान तक जारी है। इसे ‘स्तनधारियों का युग’ भी कहा जाता है। इस काल में आधुनिक पर्वत-शृंखलाओं, महाद्वीपों तथा नदियों का वर्तमान स्वरूप विकसित हुआ। जलवायु में अनेक परिवर्तन हुए, जिनका जीव-जगत पर गहरा प्रभाव पड़ा।

इसी काल में प्राइमेट अर्थात् वानर एवं कपि समूह का विकास हुआ। आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार मानव का प्रत्यक्ष पूर्वज रामापिथेकस नहीं माना जाता। वर्तमान मत के अनुसार मानव विकास की मुख्य शाखा अफ्रीका में विकसित हुई, जहाँ क्रमशः ऑस्ट्रेलोपिथेकस, होमो हैबिलिस, होमो इरेक्टस, होमो हाइडेलबर्गेन्सिस, होमो निएंडरथालेंसिस तथा अंततः होमो सेपियंस का विकास हुआ।

चतुर्थक काल और मानव का विकास

नवजीवी कल्प के अंतिम भाग को चतुर्थक काल कहा जाता है, जिसका आरंभ लगभग 25.8 लाख वर्ष पूर्व हुआ और यह वर्तमान तक जारी है। इसे दो युगों—प्लाइस्टोसीन (प्रातिनूतन) तथा होलोसीन (सर्वनूतन) में विभाजित किया गया है।

प्लाइस्टोसीन युग में अनेक हिमयुग तथा अंतर-हिमयुग आए, जिन्होंने पृथ्वी की जलवायु, वनस्पति, जीव-जंतुओं तथा मानव विकास को गहराई से प्रभावित किया। इसी काल में प्रारंभिक मानव ने पत्थर के औजार बनाए, शिकार एवं संग्रहण पर आधारित जीवन अपनाया तथा धीरे-धीरे आग के उपयोग, सामाजिक संगठन और भाषा के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की।

लगभग 11,700 वर्ष पूर्व होलोसीन युग का आरंभ हुआ, जो आज तक जारी है। हिमयुग की समाप्ति के बाद जलवायु अपेक्षाकृत स्थिर हुई, जिससे कृषि, पशुपालन तथा स्थायी बस्तियों का विकास संभव हुआ। इसी युग में मानव शिकारी-संग्रहकर्ता जीवन से कृषि-आधारित जीवन की ओर अग्रसर हुआ और आगे चलकर मेसोपोटामिया, मिस्र, सिंधु तथा चीन जैसी महान प्राचीन सभ्यताओं का उदय हुआ।

पृथ्वी पर जीवों का उद्भव और विकास

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति और उसका क्रमिक विकास मानव की जिज्ञासा का अत्यंत प्राचीन विषय रहा है। आदिकाल से ही मनुष्य यह जानने का प्रयास करता रहा है कि जीवन का आरंभ कब, कैसे और किन परिस्थितियों में हुआ तथा वर्तमान जीव-जगत का विकास किस प्रकार हुआ। प्रारंभ में इन प्रश्नों के उत्तर धार्मिक, दार्शनिक और पौराणिक मान्यताओं के आधार पर दिए गए, किंतु आधुनिक विज्ञान ने जीवाश्मों, आनुवंशिकी, आणविक जीवविज्ञान तथा भूविज्ञान के प्रमाणों के आधार पर जीवन के विकास की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की है।

आधुनिक जीवविज्ञान के अनुसार पृथ्वी पर लगभग 87 लाख (8.7 मिलियन) यूकैरियोटिक प्रजातियों के अस्तित्व का अनुमान लगाया जाता है, जिनमें से लगभग 18 से 20 लाख प्रजातियों का वैज्ञानिक रूप से वर्णन किया जा चुका है। इनमें होमो सेपियंस (आधुनिक मानव) सर्वाधिक विकसित बुद्धिमान प्राणी है। जीवों की उत्पत्ति और विकास की व्याख्या के लिए समय-समय पर अनेक सिद्धांत प्रस्तुत किए गए, जिनमें प्रमुख हैं—सतत अस्तित्ववाद, विशिष्ट सृजनवाद, महाप्रलयवाद तथा जैव-विकासवाद। इनमें आधुनिक विज्ञान जैव-विकासवाद को सर्वाधिक प्रमाणित और वैज्ञानिक सिद्धांत मानता है।

प्रागैतिहासिक सभ्यता (Prehistoric Civilization)  
पृथ्वी पर जीवों का उद्भव
सतत अस्तित्ववाद

सतत अस्तित्ववाद के अनुसार संसार के सभी जीव अपनी वर्तमान संरचना और स्वरूप में सृष्टि के प्रारंभ से ही विद्यमान हैं तथा समय के साथ उनमें कोई मौलिक परिवर्तन नहीं हुआ है। इस विचार का समर्थन प्राचीन यूनानी दार्शनिक अरस्तू सहित अनेक विद्वानों ने किया। उनके अनुसार प्रत्येक जीव की एक निश्चित प्रकृति होती है और वह उसी रूप में सदैव बना रहता है। इस मत के अनुसार नई प्रजातियों का निर्माण नहीं होता तथा जीवों का स्वरूप अपरिवर्तनीय होता है।

किंतु आधुनिक जीवाश्म विज्ञान, भूविज्ञान और आनुवंशिकी से प्राप्त प्रमाणों ने इस सिद्धांत का खंडन कर दिया। जीवाश्मों के अध्ययन से ज्ञात हुआ कि पृथ्वी पर अनेक प्रजातियाँ समय-समय पर उत्पन्न हुईं, विकसित हुईं और बाद में विलुप्त भी हो गईं। साथ ही वर्तमान जीवों में भी निरंतर आनुवंशिक परिवर्तन और विकास की प्रक्रिया चलती रहती है। इसलिए आज सतत अस्तित्ववाद का महत्त्व केवल ऐतिहासिक विचारधारा के रूप में स्वीकार किया जाता है।

विशिष्ट सृजनवाद

विशिष्ट सृजनवाद का आधार धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताएँ हैं। इस सिद्धांत के अनुसार समस्त जीव-जंतुओं तथा मानव की रचना किसी सर्वशक्तिमान ईश्वर या दैवी शक्ति द्वारा की गई है। विभिन्न धर्मों में इसकी अलग-अलग व्याख्याएँ मिलती हैं।

भारतीय परंपरा में ऋग्वेद के पुरुषसूक्त, उपनिषदों तथा पुराणों में सृष्टि की उत्पत्ति के विविध वर्णन प्राप्त होते हैं। ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल के अनुसार ईश्वर ने छह दिनों में संपूर्ण सृष्टि का निर्माण किया तथा छठे दिन मानव की रचना की। इसी प्रकार इस्लामी परंपरा में भी मानव की उत्पत्ति ईश्वर की इच्छा और सृजन का परिणाम मानी गई है।

सत्रहवीं शताब्दी में आयरलैंड के आर्कबिशप जेम्स अशर ने बाइबिल के आधार पर यह मत व्यक्त किया कि पृथ्वी की रचना 4004 ईसा पूर्व में हुई थी। यद्यपि आधुनिक भूविज्ञान, खगोलशास्त्र, जीवाश्म विज्ञान तथा रेडियोमेट्रिक तिथि-निर्धारण ने इस मत को वैज्ञानिक रूप से अस्वीकार कर दिया है, फिर भी धार्मिक आस्था के स्तर पर यह सिद्धांत आज भी अनेक समाजों में स्वीकार किया जाता है।

महाप्रलयवाद

महाप्रलयवाद का प्रतिपादन उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में फ्रांसीसी जीवाश्म वैज्ञानिक जॉर्ज क्यूवियर ने किया। उन्होंने जीवाश्मों के अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि पृथ्वी के इतिहास में समय-समय पर भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, समुद्री बाढ़ तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं के कारण भीषण प्रलय हुईं, जिनसे अनेक जीव-जंतु पूर्णतः नष्ट हो गए।

क्यूवियर के अनुसार प्रत्येक महाप्रलय के बाद नई प्रजातियों का सृजन हुआ और पृथ्वी पर जीवन का पुनः आरंभ हुआ। उन्होंने जीवाश्म विज्ञान के विकास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया, किंतु उनका यह निष्कर्ष कि प्रत्येक प्रलय के बाद नई सृष्टि होती है, आधुनिक विकासवादी सिद्धांतों से मेल नहीं खाता।

वर्तमान विज्ञान यह स्वीकार करता है कि पृथ्वी के इतिहास में अनेक बार सामूहिक विलुप्तियाँ अवश्य हुईं, जैसे पर्मियन महाविलुप्ति और क्रिटेशियस महाविलुप्ति, किंतु इनके बाद नई प्रजातियाँ किसी दैवी सृजन से नहीं, बल्कि दीर्घकालीन जैव-विकास की प्रक्रिया द्वारा विकसित हुईं।

जैव-विकासवाद

जैव-विकासवाद जीवों की उत्पत्ति और विकास का सबसे वैज्ञानिक एवं व्यापक रूप से स्वीकृत सिद्धांत है। इसके अनुसार सभी जीव अत्यंत सरल जीवन-रूपों से करोड़ों वर्षों की क्रमिक विकास प्रक्रिया द्वारा विकसित हुए हैं। इस सिद्धांत की मूल अवधारणा यह है कि सभी जीवों का कोई न कोई साझा पूर्वज रहा है और समय के साथ उनमें आनुवंशिक परिवर्तन तथा प्राकृतिक चयन के कारण नई प्रजातियों का निर्माण हुआ।

प्रारंभिक विकासवादी विचार : विकासवाद की अवधारणा आधुनिक युग से बहुत पहले प्राचीन यूनानी विचारकों द्वारा प्रस्तुत की जा चुकी थी। थेलीस ने जीवन की उत्पत्ति को जल से संबंधित माना। एनैक्सिमैंडर ने यह विचार व्यक्त किया कि जीव सरल रूपों से विकसित हुए हैं। एंपीडोक्लीज़ ने प्राकृतिक चयन जैसी अवधारणा का प्रारंभिक संकेत दिया, जबकि रोमन दार्शनिक ल्युक्रेटियस ने जीवों की प्राकृतिक उत्पत्ति का समर्थन किया। यद्यपि इन विचारों में आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाणों का अभाव था, फिर भी उन्होंने जीवों की प्राकृतिक उत्पत्ति की अवधारणा को बल प्रदान किया।

अठारहवीं शताब्दी में फ्रांसीसी प्रकृतिवादी जॉर्ज लुई लेक्लर्क, कॉम्ट डी बफॉन ने यह मत प्रस्तुत किया कि पर्यावरण के प्रभाव से जीवों में परिवर्तन होते हैं। इसके पश्चात एरास्मस डार्विन, जो चार्ल्स डार्विन के पितामह थे, ने भी जीवों के क्रमिक विकास का समर्थन किया। इन विचारों ने आधुनिक विकासवाद की बौद्धिक आधारभूमि तैयार की।

लॉमार्क का विकासवाद : जीवों के क्रमिक विकास का पहला व्यवस्थित वैज्ञानिक सिद्धांत फ्रांसीसी जीवविज्ञानी ज्यां बैप्टिस्ट द लॉमार्क ने प्रस्तुत किया। उन्होंने 1809 ई. में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘फिलॉसफी जूलॉजिकमें विकासवाद का प्रतिपादन किया। लॉमार्क के अनुसार जीव अपने पर्यावरण के अनुरूप स्वयं को अनुकूलित करते हैं। जिन अंगों का अधिक उपयोग होता है, वे अधिक विकसित हो जाते हैं, जबकि जिन अंगों का उपयोग नहीं होता, वे धीरे-धीरे लुप्त हो जाते हैं। उन्होंने यह भी प्रतिपादित किया कि जीवनकाल में अर्जित ये परिवर्तन संतानों में स्थानांतरित हो जाते हैं। जिराफ की लंबी गर्दन तथा साँपों के पैरों के लुप्त होने की व्याख्या उन्होंने इसी सिद्धांत से की। यद्यपि आज यह सिद्धांत पूर्णतः स्वीकार्य नहीं है, फिर भी विकासवाद की वैज्ञानिक आधारशिला रखने का श्रेय लॉमार्क को दिया जाता है।

बाद में आनुवंशिकी के विकास के साथ लॉमार्कवाद की सीमाएँ स्पष्ट हो गईं। जर्मन जीवविज्ञानी ऑगस्ट वीज़मैन ने चूहों की अनेक पीढ़ियों की पूँछ काटकर प्रयोग किया और सिद्ध किया कि अर्जित शारीरिक परिवर्तन संतानों में स्थानांतरित नहीं होते। उन्होंने जर्मप्लाज्म सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार केवल जनन कोशिकाओं में होने वाले आनुवंशिक परिवर्तन ही वंशानुगत होते हैं। बाद में ग्रेगर मेंडल के आनुवंशिक नियमों तथा आधुनिक आनुवंशिकी ने भी यह सिद्ध कर दिया कि अधिकांश अर्जित गुण वंशानुगत नहीं होते।

चार्ल्स डार्विन और प्राकृतिक वरण का सिद्धांत : आधुनिक विकासवाद का सर्वाधिक प्रभावशाली प्रतिपादन चार्ल्स डार्विन ने किया। उनका जन्म 12 फरवरी 1809 ई. को इंग्लैंड में हुआ था। 1831 से 1836 ई. के बीच उन्होंने एच.एम.एस. बीगल नामक जहाज से विश्व-यात्रा की और विभिन्न महाद्वीपों के जीव-जंतुओं, पौधों तथा भू-आकृतियों का विस्तृत अध्ययन किया।

विशेष रूप से गैलापागोस द्वीपसमूह के पक्षियों (फिंच) तथा कछुओं के अध्ययन ने उनके विचारों को नई दिशा प्रदान की। अर्थशास्त्री थॉमस रॉबर्ट माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत से प्रेरित होकर डार्विन ने निष्कर्ष निकाला कि प्रकृति में संसाधन सीमित हैं, जबकि जीवों की प्रजनन क्षमता अत्यधिक होती है। परिणामस्वरूप जीवों के बीच अस्तित्व के लिए संघर्ष होता है।

डार्विन ने 1859 ई. में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज़’ में प्राकृतिक वरण का सिद्धांत प्रस्तुत किया। उनके अनुसार प्रत्येक जीव-समूह में स्वाभाविक विविधताएँ पाई जाती हैं। जिन जीवों में पर्यावरण के अनुकूल गुण होते हैं, उनके जीवित रहने और प्रजनन करने की संभावना अधिक होती है। ये लाभदायक गुण अगली पीढ़ियों में स्थानांतरित होते रहते हैं और दीर्घकाल में नई प्रजातियों का निर्माण होता है।

बाद में 1871 ई. में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘द डिसेंट ऑफ मैन’ में उन्होंने मानव के विकास को भी इसी सिद्धांत के आधार पर समझाया तथा प्रतिपादित किया कि मानव और आधुनिक कपियों का कोई समान पूर्वज रहा है।

आधुनिक संश्लेषित विकासवाद  : डार्विन का सिद्धांत विकासवाद की सबसे महत्त्वपूर्ण व्याख्या था, किंतु वे यह स्पष्ट नहीं कर सके कि जीवों में विभिन्नताएँ कैसे उत्पन्न होती हैं और वे किस प्रकार वंशानुगत बनती हैं। उस समय आनुवंशिकी का विज्ञान विकसित नहीं हुआ था। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में ग्रेगर मेंडल के आनुवंशिक नियमों की पुनः खोज, गुणसूत्रों एवं जीनों पर हुए अनुसंधानों तथा ह्यूगो डी व्रीज़ द्वारा प्रतिपादित उत्परिवर्तनवाद ने इन प्रश्नों का समाधान किया। डी व्रीज़ के अनुसार जीनों में होने वाले आकस्मिक परिवर्तन (उत्परिवर्तन) नई विशेषताओं के विकास का प्रमुख स्रोत हैं। इसके पश्चात आनुवंशिकी, जीवाश्म विज्ञान, कोशिका विज्ञान, जनसंख्या आनुवंशिकी तथा आणविक जीवविज्ञान के समन्वय से आधुनिक संश्लेषित विकासवाद का विकास हुआ। इस सिद्धांत के निर्माण में रॉनाल्ड ए. फिशर, जे. बी. एस. हाल्डेन, सिवॉल राइट, थियोडोसियस डोब्ज़ान्स्की, अर्न्स्ट मेयर तथा जूलियन हक्सले जैसे वैज्ञानिकों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।

आधुनिक विकासवाद के अनुसार उत्परिवर्तन, पुनर्संयोजन, प्राकृतिक वरण, आनुवंशिक बहाव, जीन प्रवाह तथा पर्यावरणीय अनुकूलन मिलकर विकास की प्रक्रिया को संचालित करते हैं। डीएनए तथा आणविक जीवविज्ञान के आधुनिक अनुसंधानों ने यह सिद्ध कर दिया है कि पृथ्वी के सभी जीव एक समान जैविक विरासत से जुड़े हुए हैं तथा मानव सहित समस्त जीव-जगत करोड़ों वर्षों से निरंतर चल रही जैव-विकास की प्राकृतिक प्रक्रिया का परिणाम है। यही कारण है कि आधुनिक जीवविज्ञान, मानवविज्ञान तथा पुराजीवविज्ञान में संश्लेषित विकासवाद को जीवों की उत्पत्ति और विकास की सर्वाधिक प्रमाणित एवं वैज्ञानिक व्याख्या माना जाता है।

प्रागैतिहास

मानव सभ्यता का विकास किसी एक घटना या अल्पकालीन परिवर्तन का परिणाम नहीं था, बल्कि यह लाखों वर्षों तक चलने वाली क्रमिक विकास प्रक्रिया का फल है। प्रारंभिक मानव ने अत्यंत साधारण जीवन से आरंभ करके धीरे-धीरे प्रस्तर उपकरणों का निर्माण, आग का उपयोग, कृषि और पशुपालन का विकास, धातुओं का प्रयोग तथा अंततः नगरों और राज्यों की स्थापना जैसे अनेक विकासात्मक चरणों को पार किया। मानव के इस दीर्घ विकासक्रम को समझने के लिए इतिहासकारों और पुरातत्त्वविदों ने मानव अतीत को मुख्यतः प्रागैतिहासिक, आद्यैतिहासिक तथा ऐतिहासिक कालों में विभाजित किया है। यह वर्गीकरण केवल समय के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों, विशेषकर लेखन-कला तथा पुरातात्त्विक अवशेषों के आधार पर किया गया है।

प्रागैतिहासिक सभ्यता (Prehistoric Civilization)  
प्रागैतिहासिक सभ्यता
प्रागैतिहास की अवधारणा

प्रागैतिहास वह काल है जिसके लिए कोई समकालीन लिखित अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं। इस युग के मानव जीवन का पुनर्निर्माण केवल पुरातात्त्विक उत्खननों, जीवाश्मों, मानव अस्थियों, प्रस्तर उपकरणों, गुफाचित्रों, पशु-अवशेषों तथा अन्य भौतिक साक्ष्यों के आधार पर किया जाता है। चूँकि इस काल में लेखन-कला का विकास नहीं हुआ था, इसलिए मानव जीवन, संस्कृति और तकनीकी प्रगति की जानकारी केवल भौतिक अवशेषों से प्राप्त होती है।

‘प्रागैतिहास’ (प्रीहिस्ट्री) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम उन्नीसवीं शताब्दी में कनाडाई विद्वान डेनियल विल्सन ने किया। प्रसिद्ध इतिहासकार गोविंद चंद्र पांडे के अनुसार साक्षरता ही प्रागैतिहास और इतिहास के मध्य वास्तविक विभाजक रेखा है। जहाँ लिखित स्रोत उपलब्ध नहीं होते, वहाँ मानव अतीत का अध्ययन पुरातत्त्व, भूविज्ञान, जीवाश्म विज्ञान तथा अन्य वैज्ञानिक विधियों के आधार पर किया जाता है।

ऐतिहासिक काल की अवधारणा

ऐतिहासिक काल उस समय को कहा जाता है जिसके लिए लिखित अभिलेख, शिलालेख, साहित्य, ताम्रपत्र, सिक्के तथा अन्य प्रमाणिक दस्तावेज उपलब्ध हों। इन स्रोतों के आधार पर राजनीतिक घटनाओं, सामाजिक व्यवस्था, आर्थिक जीवन, धार्मिक मान्यताओं तथा सांस्कृतिक विकास का अपेक्षाकृत स्पष्ट और प्रमाणिक अध्ययन किया जा सकता है।

विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में ऐतिहासिक काल का आरंभ एक साथ नहीं हुआ। मिस्र तथा मेसोपोटामिया में लगभग तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व से लिखित अभिलेख उपलब्ध होने लगते हैं, जबकि भारत में स्पष्ट ऐतिहासिक काल का प्रारंभ सामान्यतः छठी शताब्दी ईसा पूर्व से माना जाता है। अभिलेखीय दृष्टि से इसका सबसे सुदृढ़ प्रमाण तृतीय शताब्दी ईसा पूर्व के सम्राट अशोक के शिलालेखों से प्राप्त होता है।

आद्यैतिहासिक काल

भारतीय इतिहास के संदर्भ में केवल प्रागैतिहास और इतिहास का द्विभाजन पर्याप्त नहीं माना जाता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि भारत की सिंधु-सरस्वती (हड़प्पा) सभ्यता जैसी विकसित नगरीय संस्कृति के पास अपनी लिपि थी, किंतु वह आज तक पूर्णतः पढ़ी नहीं जा सकी है। इसी प्रकार वैदिक संस्कृति का विशाल मौखिक साहित्य उपलब्ध है, परंतु उसके प्रारंभिक चरण के समकालीन लिखित अभिलेख प्राप्त नहीं होते।

इसी कारण प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् एच. डी. संकालिया सहित अनेक विद्वानों ने इन संस्कृतियों को न तो पूर्णतः प्रागैतिहासिक माना और न ही ऐतिहासिक। इनके लिए आद्यैतिहासिक (प्रोटोहिस्टोरिक) शब्द का प्रयोग किया गया। आद्यैतिहासिक काल वह अवस्था है जिसमें सभ्यता पर्याप्त विकसित हो चुकी होती है, लेखन या लिपि का ज्ञान भी होता है, किंतु या तो उसकी लिपि अपाठ्य होती है अथवा पर्याप्त लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं होते। आधुनिक अनुसंधानों के साथ अनेक आद्यैतिहासिक संस्कृतियाँ धीरे-धीरे ऐतिहासिक श्रेणी में सम्मिलित होती जा रही हैं और भविष्य में नए साक्ष्यों के आधार पर इस वर्गीकरण में परिवर्तन संभव है।

मानव इतिहास का वर्गीकरण

मानव सभ्यता के विकास का अध्ययन केवल लेखन-कला के आधार पर ही नहीं, बल्कि उपकरणों एवं तकनीकी प्रगति के आधार पर भी किया जाता है। प्रारंभिक मानव का जीवन पूर्णतः प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर था। वह शिकार करता था, फल-मूल एवं कंद-मूल एकत्र करता था तथा पत्थर के उपकरणों का उपयोग करता था। समय के साथ उसने अधिक परिष्कृत उपकरण बनाए और बाद में धातुओं का प्रयोग आरंभ किया।

इसी आधार पर डेनमार्क के पुरातत्त्वविद् क्रिश्चियन युर्गेनसेन थॉमसन ने उन्नीसवीं शताब्दी में प्रसिद्ध त्रियुग सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसके अनुसार मानव इतिहास को क्रमशः पाषाण युग, कांस्य युग और लौह युग में विभाजित किया गया।

बाद के अनुसंधानों से स्पष्ट हुआ कि अनेक क्षेत्रों, विशेषकर एशिया और भारत में, ताँबे का स्वतंत्र प्रयोग कांस्य से पहले आरंभ हो चुका था। इसलिए भारतीय पुरातत्त्व में धातु युग को सामान्यतः ताम्रपाषाण (चाल्कोलिथिक), कांस्य तथा लौह युग में विभाजित किया गया है।

पाषाण युग

पाषाण युग मानव इतिहास का सबसे लंबा और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण काल है। यह पूर्णतः प्रागैतिहासिक युग का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी प्रमुख विशेषता पत्थर के उपकरणों का प्रयोग तथा लेखन-कला का अभाव है। इसी काल में मानव ने प्रकृति के साथ संघर्ष करते हुए जीवन-निर्वाह के प्रारंभिक साधन विकसित किए। पाषाण युग को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है—

  1. पुरापाषाण युग (पैलियोलिथिक एज)
  2. मध्यपाषाण युग (मेसोलिथिक एज)
  3. नवपाषाण युग (नियोलिथिक एज)

पुरापाषाण युग में मानव पूर्णतः शिकारी एवं संग्रहकर्ता था। मध्यपाषाण युग में उपकरणों का आकार छोटा एवं अधिक उपयोगी हुआ तथा जीवन-शैली में परिवर्तन दिखाई देने लगा। नवपाषाण युग में मानव ने कृषि, पशुपालन तथा स्थायी निवास की शुरुआत की। इसी काल में भोजन संग्रह करने वाले मानव ने भोजन उत्पन्न करना आरंभ किया। इतिहासकार वी. गॉर्डन चाइल्ड ने इस परिवर्तन को ‘नवपाषाण क्रांति’ की संज्ञा दी है।

धातु युग

धातु युग में मानव ने क्रमशः ताँबा, कांसा तथा लोहे का उपयोग आरंभ किया। धातुओं के प्रयोग से कृषि, शिल्प, युद्ध, व्यापार तथा परिवहन में उल्लेखनीय प्रगति हुई। धातु के उपकरण पत्थर की अपेक्षा अधिक मजबूत एवं टिकाऊ थे, जिससे उत्पादन क्षमता में वृद्धि हुई और समाज का आर्थिक विकास तीव्र गति से होने लगा।

विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में धातुओं का प्रयोग एक ही समय पर आरंभ नहीं हुआ। पश्चिमी एशिया और मिस्र में धातुओं का उपयोग पाँचवीं–चौथी सहस्राब्दी ईसा पूर्व से प्रारंभ हो गया था, जबकि यूरोप के अनेक भागों में इसका विकास अपेक्षाकृत बाद में हुआ। भारत में भी ताम्रपाषाण संस्कृतियाँ, सिंधु सभ्यता तथा प्रारंभिक लौह संस्कृति अलग-अलग समय पर विकसित हुईं। इसलिए प्रत्येक क्षेत्र का काल-विभाजन उसके स्थानीय पुरातात्त्विक विकास के आधार पर किया जाता है।

विश्व में प्रागैतिहास की भिन्न समय-सीमाएँ

प्रागैतिहास, आद्यैतिहास और इतिहास की समय-सीमाएँ विश्व के सभी क्षेत्रों में समान नहीं रहीं। विभिन्न महाद्वीपों में मानव विकास, तकनीकी उन्नति तथा लेखन-कला के विकास की गति अलग-अलग थी। परिणामस्वरूप इन कालों का प्रारंभ और अंत भी विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न समय पर हुआ।

मिस्र और मेसोपोटामिया में तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व तक विकसित लेखन प्रणाली के कारण ऐतिहासिक काल अपेक्षाकृत शीघ्र आरंभ हो गया। इसके विपरीत भारत में सिंधु-सरस्वती सभ्यता की लिपि अभी तक अपठित होने के कारण उसे आद्यैतिहासिक संस्कृति माना जाता है। दूसरी ओर, यूरोप के अनेक क्षेत्रों तथा अमेरिका की कुछ प्राचीन सभ्यताओं में धातुओं का उपयोग होने के बावजूद विकसित लेखन-कला का अभाव था, जैसे, पेरू और बोलिविया की कुछ प्राचीन सभ्यताएँ कांस्य का प्रयोग करती थीं, किंतु उनके पास विकसित लिपि नहीं थी। इससे स्पष्ट होता है कि तकनीकी विकास और लेखन-कला का विकास प्रत्येक क्षेत्र में स्वतंत्र एवं भिन्न गति से हुआ।

प्रागैतिहास के अध्ययन के स्रोत और वैज्ञानिक पद्धतियाँ

प्रागैतिहासिक काल के अध्ययन में लिखित स्रोत उपलब्ध नहीं होते, इसलिए इसके पुनर्निर्माण के लिए विभिन्न वैज्ञानिक विधियों का उपयोग किया जाता है। इनमें प्रमुख हैं—पुरातात्त्विक उत्खनन, जीवाश्म विज्ञान, मानवशास्त्र, भूविज्ञान, पुरावनस्पति विज्ञान, पुराप्राणी विज्ञान, रेडियोकार्बन (कार्बन-14) तिथि-निर्धारण, पोटैशियम-आर्गन तिथि-निर्धारण, तापदीप्ति (थर्मोल्यूमिनेसेंस) तिथि-निर्धारण तथा आधुनिक डीएनए विश्लेषण।

इन वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से मानव अस्थियों, उपकरणों, वनस्पति अवशेषों, पशु-अवशेषों तथा प्राचीन पर्यावरण का अध्ययन किया जाता है। इससे मानव की जीवन-शैली, भोजन, आवास, तकनीकी विकास, सामाजिक संगठन तथा सांस्कृतिक परिवर्तन का क्रमबद्ध पुनर्निर्माण संभव हो सका है।

प्रागैतिहास का महत्त्व

आधुनिक मानव (होमो सेपियंस) का उद्भव लगभग 3 लाख वर्ष पूर्व माना जाता है, जबकि लिखित इतिहास का आरंभ लगभग 5,000–5,500 वर्ष पूर्व हुआ। इस दृष्टि से मानव इतिहास का लगभग 98 प्रतिशत से अधिक भाग प्रागैतिहासिक काल के अंतर्गत आता है और केवल अत्यल्प भाग ही लिखित इतिहास का है। इसलिए मानव सभ्यता की वास्तविक जड़ें प्रागैतिहासिक युग में निहित हैं।

प्रागैतिहासिक सभ्यता (Prehistoric Civilization)  
प्रागैतिहासिक सभ्यता

प्रागैतिहास के अध्ययन से यह समझने में सहायता मिलती है कि मानव ने प्रकृति के साथ संघर्ष करते हुए किस प्रकार उपकरण बनाए, आग का उपयोग सीखा, कृषि और पशुपालन विकसित किया, स्थायी बस्तियाँ बसाईं तथा क्रमशः जटिल सभ्यताओं की स्थापना की। आधुनिक पुरातत्त्व, वैज्ञानिक तिथि-निर्धारण तकनीकों तथा आनुवंशिक अनुसंधानों ने इस काल के अध्ययन को प्रमाणिक एवं वैज्ञानिक बना दिया है। इसी कारण प्रागैतिहास इतिहास, मानवविज्ञान, पुरातत्त्व तथा भूविज्ञान के अध्ययन का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और स्वतंत्र विषय बन गया है।

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