द्वितीय विश्व युद्ध में संयुक्त राज्य अमेरिका की भूमिका (The Role of the United States in World War II)

द्वितीय विश्व युद्ध में संयुक्त राज्य अमेरिका की भूमिका (The Role of the United States in World War II)

द्वितीय विश्व युद्ध में संयुक्त राज्य अमेरिका की भूमिका

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द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945 ई.) के प्रारंभ में संयुक्त राज्य अमेरिका ने औपचारिक रूप से तटस्थता और अलगाववाद की नीति अपनाई तथा प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में भाग लेने से परहेज़ किया। प्रथम विश्व युद्ध के अनुभवों के कारण अधिकांश अमेरिकी नागरिक यूरोपीय संघर्षों से दूर रहना चाहते थे। इसी कारण 1930 के दशक में अमेरिकी कांग्रेस ने तटस्थता संबंधी अनेक अधिनियम पारित किए। फिर भी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट का मानना था कि धुरी राष्ट्रों की विस्तारवादी नीति अंततः अमेरिका की सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकती है। इसलिए अमेरिका ने मित्र राष्ट्रों को अप्रत्यक्ष सहायता देना प्रारंभ किया। मार्च 1941 ई. में पारित लेंड-लीज अधिनियम के माध्यम से ब्रिटेन, सोवियत संघ, चीन तथा अन्य मित्र राष्ट्रों को हथियार, युद्ध-सामग्री, खाद्य सामग्री और आर्थिक सहायता प्रदान की गई।

7 दिसंबर 1941 ई. को जापान द्वारा पर्ल हार्बर स्थित अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर किए गए आकस्मिक आक्रमण ने अमेरिकी तटस्थता की नीति का अंत कर दिया। 8 दिसंबर 1941 ई. को अमेरिका ने जापान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की और 11 दिसंबर 1941 ई. को जर्मनी तथा इटली ने भी अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इसके साथ ही संयुक्त राज्य अमेरिका औपचारिक रूप से द्वितीय विश्व युद्ध में सम्मिलित हो गया। युद्ध के दौरान अमेरिका ने यूरोप और प्रशांत—दोनों मोर्चों पर निर्णायक भूमिका निभाई। उसकी विशाल औद्योगिक क्षमता, वैज्ञानिक प्रगति, वित्तीय संसाधनों और सैन्य शक्ति ने मित्र राष्ट्रों की विजय सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 6 और 9 अगस्त 1945 ई. को हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए जाने के बाद जापान ने 15 अगस्त 1945 ई. को आत्मसमर्पण की घोषणा की तथा 2 सितंबर 1945 ई. को औपचारिक आत्मसमर्पण किया। युद्ध के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका का विश्व की प्रमुख महाशक्ति के रूप में उदय हुआ और उसने संयुक्त राष्ट्र, ब्रेटन वुड्स व्यवस्था तथा युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाई।

अमेरिका की तटस्थता और अलगाववाद की नीति

प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918 ई.) के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका में अलगाववाद की भावना अत्यंत प्रबल हो गई थी। अधिकांश अमेरिकी नागरिकों का विश्वास था कि यूरोप के राजनीतिक विवादों और युद्धों से दूर रहना ही राष्ट्रीय हित के अनुकूल होगा। इसी जनमत के प्रभाव में अमेरिकी कांग्रेस ने क्रमशः 1935, 1936 तथा 1937 ई. में तटस्थता अधिनियम पारित किए। इन अधिनियमों के अंतर्गत युद्धरत देशों को हथियारों और युद्ध-सामग्री के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया गया, अमेरिकी नागरिकों को युद्धरत देशों के जहाज़ों पर यात्रा करने से रोका गया तथा युद्धरत राष्ट्रों को ऋण और वित्तीय सहायता देने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। इन कानूनों का उद्देश्य अमेरिका को विदेशी संघर्षों से दूर रखना तथा उसे पुनः किसी विश्व युद्ध में उलझने से बचाना था।

सितंबर 1939 ई. में यूरोप में युद्ध प्रारंभ होने के बाद अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ तेजी से बदलने लगीं। ब्रिटेन और फ्रांस को जर्मनी के विरुद्ध सैन्य सामग्री की आवश्यकता थी। ऐसी स्थिति में अमेरिकी सरकार ने तटस्थता अधिनियम में संशोधन करते हुए ‘कैश एंड कैरी’ व्यवस्था लागू की। इस व्यवस्था के अंतर्गत युद्धरत देश नकद भुगतान कर तथा अपने जहाज़ों द्वारा परिवहन की व्यवस्था करके अमेरिका से युद्ध-सामग्री खरीद सकते थे। इस नीति का सर्वाधिक लाभ ब्रिटेन और फ्रांस को मिला, क्योंकि जर्मनी की नौसैनिक नाकेबंदी के बावजूद वे अपनी समुद्री शक्ति के बल पर अमेरिकी बंदरगाहों से सामग्री प्राप्त कर सकते थे। इस प्रकार अमेरिका औपचारिक रूप से तटस्थ बना रहा, किंतु व्यवहारिक रूप से उसकी नीति मित्र राष्ट्रों के पक्ष में झुकने लगी थी।

युद्ध के लिए आधारभूत घटनाएँ

जब संयुक्त राज्य अमेरिका तटस्थता और अलगाववाद की नीति का पालन कर रहा था, उसी समय यूरोप और एशिया में राजनीतिक तथा सैन्य तनाव निरंतर बढ़ता जा रहा था। जर्मनी में एडोल्फ हिटलर, इटली में बेनिटो मुसोलिनी, जापान में सैन्यवादी नेतृत्व तथा सोवियत संघ में जोसेफ स्टालिन की नीतियों ने विश्व राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। विशेष रूप से जर्मनी, इटली और जापान की विस्तारवादी विदेश नीति ने अंतरराष्ट्रीय शांति तथा सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती पैदा  कर दी। राष्ट्र संघ इन आक्रामक शक्तियों को रोकने में असफल रहा, जिससे उसकी विश्वसनीयता निरंतर घटती गई।

1931 ई. में जापान ने चीन के मंचूरिया क्षेत्र पर अधिकार कर वहाँ मंचुकुओ नामक कठपुतली राज्य की स्थापना कर दी। राष्ट्र संघ ने इस आक्रमण की निंदा तो की, किंतु प्रभावी कार्रवाई करने में विफल रहा। परिणामस्वरूप 1933 ई. में जापान ने राष्ट्र संघ की सदस्यता त्याग दी। इसके बाद 1934 ई. में उसने वाशिंगटन तथा लंदन नौसैनिक संधियों से स्वयं को अलग कर लिया और तीव्र गति से अपने नौसैनिक विस्तार का कार्यक्रम आरंभ किया। 1937 ई. में चीन पर उसके व्यापक आक्रमण ने पूर्वी एशिया को युद्ध की आग में झोंक दिया और जापानी साम्राज्यवाद का वास्तविक स्वरूप विश्व के सामने आ गया।

उधर 1935 ई. में इटली के तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी ने इथियोपिया (अबीसीनिया) पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में ले लिया। इथियोपिया के सम्राट हैले सेलासी को निर्वासन के लिए विवश होना पड़ा। राष्ट्र संघ ने इटली के विरुद्ध कुछ आर्थिक प्रतिबंध लगाए, किंतु सैन्य कार्रवाई न होने के कारण ये प्रतिबंध अप्रभावी सिद्ध हुए। इस घटना ने स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्र संघ आक्रामक राष्ट्रों को रोकने में सक्षम नहीं है।

इसी अवधि में जर्मनी ने भी वर्साय संधि की शर्तों की खुलेआम अवहेलना प्रारंभ कर दी। 1935 ई. में हिटलर ने अनिवार्य सैन्य सेवा पुनः लागू की और बड़े पैमाने पर पुनः शस्त्रीकरण आरंभ किया। 1936 ई. में उसने राइनलैंड का पुनः सैन्यीकरण कर वर्साय तथा लोकार्नो संधियों का उल्लंघन किया। ब्रिटेन और फ्रांस ने इसका कोई प्रभावी प्रतिरोध नहीं किया, जिससे हिटलर का आत्मविश्वास और बढ़ गया।

इसी समय जुलाई 1936 ई. में स्पेन का गृहयुद्ध प्रारंभ हुआ, जो 1939 ई. तक चला। जनरल फ्रांसिस्को फ्रांको ने स्पेन की गणतांत्रिक सरकार के विरुद्ध विद्रोह किया। इस संघर्ष में नाज़ी जर्मनी और फासीवादी इटली ने फ्रांको को सैन्य सहायता प्रदान की, जबकि गणतांत्रिक सरकार को सोवियत संघ तथा अंतरराष्ट्रीय स्वयंसेवी ब्रिगेडों का समर्थन प्राप्त हुआ। संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन ने औपचारिक रूप से अहस्तक्षेप की नीति अपनाई। अंततः 1939 ई. में फ्रांको की विजय हुई और स्पेन में तानाशाही शासन स्थापित हो गया।

यूरोप में इसी अवधि के दौरान धुरी शक्तियों का संगठन भी सुदृढ़ होता गया। 1936 ई. में जर्मनी और जापान के बीच ‘एंटी-कोमिन्टर्न (साम्यवाद-विरोधी) संधि संपन्न हुई, जिसमें 1937 ई. में इटली भी शामिल हो गया। इसके बाद मार्च 1938 ई. में जर्मनी ने ऑस्ट्रिया का विलय कर लिया। उसी वर्ष म्यूनिख समझौते के अंतर्गत ब्रिटेन और फ्रांस ने तुष्टीकरण की नीति अपनाते हुए जर्मनी को सुडेटनलैंड प्राप्त करने की अनुमति दे दी। किंतु हिटलर की महत्त्वाकांक्षाएँ यहीं समाप्त नहीं हुईं। मार्च 1939 ई. में उसने चेकोस्लोवाकिया के शेष भाग पर भी अधिकार कर लिया। इसके पश्चात 22 मई 1939 ई. को जर्मनी और इटली के बीच ‘पैक्ट ऑफ स्टील’ संपन्न हुआ, जिससे धुरी गुट और अधिक संगठित हो गया। इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय तनाव को चरम पर पहुँचा दिया और विश्व को एक नए महायुद्ध की ओर धकेल दिया।

युद्ध की अनिवार्यता

1930 के दशक के उत्तरार्ध तक यूरोप की राजनीतिक परिस्थितियाँ अत्यंत विस्फोटक हो चुकी थीं। प्रथम विश्व युद्ध के बाद स्थापित वर्साय व्यवस्था निरंतर कमजोर होती जा रही थी, जबकि जर्मनी अपनी सैन्य शक्ति और विस्तारवादी नीति के बल पर यूरोप की शक्ति-संतुलन व्यवस्था को चुनौती दे रहा था। दूसरी ओर, ब्रिटेन और फ्रांस जर्मनी की आक्रामक गतिविधियों को रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठा सके। फ्रांस आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा संबंधी चिंताओं से जूझ रहा था, जबकि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री नेविल चेम्बरलेन तुष्टीकरण की नीति का अनुसरण कर रहे थे। उनका विश्वास था कि यदि जर्मनी की कुछ क्षेत्रीय माँगें स्वीकार कर ली जाएँ, तो यूरोप में स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है।

तुष्टीकरण की यह नीति शीघ्र ही असफल सिद्ध हुई। मार्च 1939 ई. में जर्मनी ने म्यूनिख समझौते का उल्लंघन करते हुए चेकोस्लोवाकिया के शेष भाग तथा उसकी राजधानी प्राग पर अधिकार कर लिया। इससे स्पष्ट हो गया कि हिटलर का उद्देश्य केवल जर्मन-भाषी क्षेत्रों का विलय नहीं, बल्कि संपूर्ण यूरोप में जर्मन प्रभुत्व स्थापित करना था। परिणामस्वरूप ब्रिटेन और फ्रांस ने अपनी विदेश नीति में परिवर्तन किया। 31 मार्च 1939 ई. को ब्रिटेन ने पोलैंड की स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा का आश्वासन दिया तथा जर्मन आक्रमण की स्थिति में उसकी सहायता करने की घोषणा की। फ्रांस ने भी इस आश्वासन का समर्थन किया।

उधर सोवियत संघ भी जर्मन विस्तारवाद से चिंतित था। उसने ब्रिटेन और फ्रांस के साथ सामूहिक सुरक्षा समझौते का प्रयास किया, किंतु पारस्परिक अविश्वास और कूटनीतिक मतभेदों के कारण वार्ताएँ सफल नहीं हो सकीं। ऐसी स्थिति में सोवियत नेतृत्व ने अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जर्मनी के साथ समझौता करना अधिक उपयुक्त समझा। फलस्वरूप 23 अगस्त 1939 ई. को जर्मनी और सोवियत संघ के बीच जर्मन–सोवियत अनाक्रमण संधि (मोलोटोव–रिब्बेंट्रॉप संधि) संपन्न हुई। इस संधि के अंतर्गत दोनों देशों ने एक-दूसरे पर आक्रमण न करने का वचन दिया। इसके साथ ही एक गुप्त प्रोटोकॉल के माध्यम से पोलैंड, बाल्टिक राज्यों तथा पूर्वी यूरोप के अन्य क्षेत्रों को दोनों देशों के प्रभाव-क्षेत्रों में विभाजित करने पर भी सहमति बनी। इस संधि ने हिटलर को दो मोर्चों पर युद्ध के भय से मुक्त कर दिया और पोलैंड पर आक्रमण का मार्ग प्रशस्त किया।

1 सितंबर 1939 ई. को जर्मनी ने ब्लिट्जक्रिग (विद्युत युद्ध) की रणनीति अपनाते हुए पोलैंड पर आक्रमण कर दिया। तीव्र गति से किए गए इस सैन्य अभियान के सामने पोलैंड की सेना अधिक समय तक टिक नहीं सकी। ब्रिटेन और फ्रांस ने अपने पूर्व वचन के अनुसार 3 सितंबर 1939 ई. को जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इसी के साथ द्वितीय विश्व युद्ध का औपचारिक प्रारंभ हुआ।

जर्मन आक्रमण के कुछ ही दिनों बाद 17 सितंबर 1939 ई. को सोवियत संघ ने पूर्वी पोलैंड में प्रवेश कर वहाँ अधिकार स्थापित कर लिया। इसके पश्चात उसने एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया पर अपना नियंत्रण स्थापित किया तथा 1940 ई. में रोमानिया से बेस्साराबिया और उत्तरी बुकोविना प्राप्त कर लिए। इसी अवधि में 1939–40 ई. के दौरान सोवियत संघ और फिनलैंड के बीच शीतकालीन युद्ध भी लड़ा गया। यद्यपि फिनलैंड ने साहसपूर्ण प्रतिरोध किया, फिर भी उसे कुछ सीमावर्ती क्षेत्र सोवियत संघ को सौंपने पड़े।

युद्ध के प्रारंभिक चरण में जर्मनी ने अपनी सैन्य शक्ति और आधुनिक युद्धनीति के बल पर उल्लेखनीय सफलताएँ प्राप्त कीं। अप्रैल 1940 ई. में उसने डेनमार्क और नॉर्वे पर अधिकार कर लिया। इसके बाद मई–जून 1940 ई. में जर्मन सेनाओं ने नीदरलैंड, बेल्जियम, लक्ज़मबर्ग और अंततः फ्रांस को पराजित कर दिया। फ्रांस की पराजय के बाद यूरोप का अधिकांश भाग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जर्मन नियंत्रण में आ गया। इसके पश्चात ब्रिटेन अकेला प्रमुख यूरोपीय राष्ट्र था, जो जर्मनी का सामना कर रहा था।

इस समय संयुक्त राज्य अमेरिका यद्यपि औपचारिक रूप से तटस्थ रहा, फिर भी उसने ब्रिटेन को आर्थिक और सैन्य सहायता देना जारी रखा। राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट का मानना था कि यदि ब्रिटेन पराजित हो गया, तो अंततः अमेरिका की सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाएगी। इसी नीति के परिणामस्वरूप ‘कैश एंड कैरी’ व्यवस्था और बाद में मार्च 1941 ई. का लेंड-लीज अधिनियम अस्तित्व में आया, जिसके माध्यम से मित्र राष्ट्रों को व्यापक सहायता प्रदान की गई। इस प्रकार अमेरिका युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से शामिल हुए बिना ही मित्र राष्ट्रों का प्रमुख समर्थक बन गया।

उधर जर्मनी ने 22 जून 1941 ई. को ऑपरेशन बारबारोसा के अंतर्गत सोवियत संघ पर आक्रमण कर दिया। इससे युद्ध का स्वरूप और अधिक व्यापक हो गया। दूसरी ओर, एशिया में जापान अपनी साम्राज्यवादी नीति को आगे बढ़ाते हुए दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर बढ़ रहा था। जापान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का अंत 7 दिसंबर 1941 ई. को पर्ल हार्बर पर हुए जापानी आक्रमण के रूप में हुआ। इसके अगले दिन अमेरिका ने जापान के विरुद्ध तथा शीघ्र ही जर्मनी और इटली के विरुद्ध भी युद्ध में प्रवेश किया। इस प्रकार यूरोप और एशिया के क्षेत्रीय संघर्ष एक व्यापक वैश्विक युद्ध में परिवर्तित हो गए।

अमेरिकी दृष्टिकोण

द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारंभिक चरण में संयुक्त राज्य अमेरिका ने यूरोप और एशिया की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के प्रति अत्यंत सतर्क तथा तटस्थ नीति अपनाई। राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट और उनका प्रशासन अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर निरंतर दृष्टि बनाए हुए थे, किंतु अमेरिकी जनमत अभी भी अलगाववाद का प्रबल समर्थक था। प्रथम विश्व युद्ध के कटु अनुभवों ने अधिकांश अमेरिकियों को यह विश्वास दिलाया था कि यूरोपीय संघर्षों से दूर रहना ही राष्ट्रीय हित में है। परिणामस्वरूप अमेरिका ने प्रारंभिक वर्षों में किसी भी सैन्य गठबंधन या प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से स्वयं को अलग रखा।

अमेरिका में अलगाववादी भावना को सुदृढ़ करने में 1934–1936 ई. के बीच सीनेटर जेराल्ड पी. नाइ की अध्यक्षता में गठित ‘नाइ समिति’ की जाँच का महत्त्वपूर्ण योगदान था। समिति ने निष्कर्ष निकाला कि प्रथम विश्व युद्ध में अमेरिका के प्रवेश के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा की अपेक्षा हथियार उद्योग, बैंकिंग संस्थानों और वित्तीय हितों का अधिक प्रभाव था। इस निष्कर्ष ने कांग्रेस और जनमत दोनों को यह विश्वास दिलाया कि भविष्य में अमेरिका को विदेशी युद्धों से यथासंभव दूर रहना चाहिए। फलस्वरूप विदेश नीति में तटस्थता और सैन्य हस्तक्षेप से बचने की प्रवृत्ति और अधिक मजबूत हो गई।

तटस्थता अधिनियम और प्रारंभिक नीति

इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी कांग्रेस ने 1935, 1936 तथा 1937 ई. में क्रमशः तटस्थता अधिनियम पारित किए। इन अधिनियमों का उद्देश्य अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय युद्धों से दूर रखना था। इनके अंतर्गत युद्धरत देशों को हथियारों की बिक्री, ऋण तथा वित्तीय सहायता देने पर प्रतिबंध लगाया गया। साथ ही अमेरिकी नागरिकों के युद्धरत देशों के जहाज़ों पर यात्रा करने पर भी रोक या कड़े प्रतिबंध लगाए गए। 1937 ई. के अधिनियम में सीमित रूप से ‘कैश एंड कैरी’ व्यवस्था को गैर-सैन्य वस्तुओं के लिए स्वीकार किया गया था, जिसके अनुसार युद्धरत देश नकद भुगतान कर तथा अपने जहाज़ों द्वारा सामान ले जा सकते थे। यद्यपि यह व्यवस्था सीमित थी, फिर भी इससे अमेरिकी नीति में व्यावहारिक लचीलापन दिखाई देने लगा था।

सितंबर 1939 ई. में जर्मनी द्वारा पोलैंड पर आक्रमण के साथ यूरोप में युद्ध आरंभ हो गया। राष्ट्रपति रूज़वेल्ट और विदेश मंत्री कॉर्डेल हल पहले से ही यूरोप की बिगड़ती परिस्थितियों से परिचित थे, इसलिए यह घटना उनके लिए अप्रत्याशित नहीं थी। इसके बावजूद अमेरिकी जनता प्रत्यक्ष युद्ध में भाग लेने के पक्ष में नहीं थी। ‘अमेरिका फ़र्स्ट कमेटी’ जैसे अलगाववादी संगठनों का प्रभाव निरंतर बढ़ रहा था। ऐसी स्थिति में रूज़वेल्ट ने औपचारिक रूप से तटस्थता की घोषणा की, यद्यपि वे व्यक्तिगत रूप से नाज़ी आक्रामकता के विरोधी थे।

नवंबर 1939 ई. में कांग्रेस ने तटस्थता अधिनियम में संशोधन कर ‘कैश एंड कैरी’ व्यवस्था को युद्ध-सामग्री पर भी लागू कर दिया। इसके बाद ब्रिटेन और फ्रांस नकद भुगतान कर तथा अपने जहाज़ों से परिवहन की व्यवस्था करके अमेरिका से हथियार खरीद सकते थे। इस परिवर्तन ने अमेरिका को प्रत्यक्ष युद्ध में शामिल हुए बिना ही मित्र राष्ट्रों का अप्रत्यक्ष सहयोगी बना दिया।

पनामा घोषणा (1939 ई.)

यूरोप में युद्ध प्रारंभ होने के बाद पश्चिमी गोलार्द्ध की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से 23 सितंबर से 3 अक्टूबर 1939 ई. तक पनामा में अमेरिकी गणराज्यों के विदेश मंत्रियों का सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में पनामा घोषणा स्वीकार की गई, जिसके अंतर्गत पश्चिमी गोलार्द्ध के चारों ओर लगभग 300 समुद्री मील चौड़ा तटस्थ सुरक्षा क्षेत्र घोषित किया गया। इस क्षेत्र में युद्धरत देशों की सैन्य गतिविधियों को अवांछनीय माना गया तथा इसकी निगरानी का दायित्व मुख्यतः अमेरिकी नौसेना को सौंपा गया।

यद्यपि ब्रिटेन और जर्मनी ने इस व्यवस्था को औपचारिक मान्यता नहीं दी, फिर भी पनामा घोषणा ने पश्चिमी गोलार्द्ध की सामूहिक सुरक्षा के प्रति अमेरिका की सक्रिय भूमिका को स्पष्ट कर दिया। सम्मेलन में यह भी निर्णय लिया गया कि यूरोपीय युद्ध से उत्पन्न आर्थिक, व्यापारिक तथा सामरिक समस्याओं का समाधान अमेरिकी राष्ट्र आपसी सहयोग और परामर्श के माध्यम से करेंगे। इस प्रकार अमेरिका ने अपनी पारंपरिक तटस्थता बनाए रखते हुए क्षेत्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।

जर्मनी की सैन्य सफलताएँ

1940 ई. में जर्मनी की तीव्र सैन्य सफलताओं ने यूरोप का शक्ति-संतुलन पूरी तरह बदल दिया। 9 अप्रैल 1940 ई. को जर्मनी ने डेनमार्क और नॉर्वे पर अधिकार कर लिया। इसके बाद 10 मई 1940 ई. को उसने नीदरलैंड, बेल्जियम और लक्ज़मबर्ग पर आक्रमण किया तथा ‘ब्लिट्जक्रिग’ (विद्युत युद्ध) की रणनीति के माध्यम से मित्र राष्ट्रों की सेनाओं को शीघ्र ही पराजित कर दिया।

जर्मन सेना ने फ्रांस की सुरक्षा का आधार मानी जाने वाली मैजिनो रेखा को दरकिनार करते हुए आर्डेन के जंगलों से आक्रमण किया और फ्रांसीसी प्रतिरोध को ध्वस्त कर दिया। 14 जून 1940 ई. को पेरिस पर जर्मनी का अधिकार हो गया तथा 22 जून 1940 ई. को फ्रांस ने युद्धविराम स्वीकार कर लिया। इसके परिणामस्वरूप उत्तरी और पश्चिमी फ्रांस जर्मन नियंत्रण में आ गया, जबकि दक्षिणी भाग में मार्शल फिलिप पेटाँ के नेतृत्व में विची सरकार की स्थापना हुई, जिसने जर्मनी के साथ सहयोग की नीति अपनाई।

फ्रांस की पराजय और अमेरिकी चिंता

फ्रांस की अप्रत्याशित पराजय ने अमेरिकी नेतृत्व और जनता दोनों को गहराई से प्रभावित किया। अब तक फ्रांसीसी सेना को यूरोप की सबसे सशक्त सेनाओं में गिना जाता था, किंतु कुछ ही सप्ताहों में उसकी हार ने जर्मनी की वास्तविक सैन्य क्षमता को स्पष्ट कर दिया। इसी बीच 10 जून 1940 ई. को इटली भी जर्मनी के पक्ष में युद्ध में शामिल हो गया, जिससे धुरी राष्ट्रों की शक्ति और बढ़ गई।

इन घटनाओं ने अमेरिकी नीति-निर्माताओं को यह विश्वास दिलाया कि यदि जर्मनी पश्चिमी यूरोप पर स्थायी नियंत्रण स्थापित कर लेता है, तो उसका प्रभाव अटलांटिक महासागर तक फैल जाएगा और अंततः संयुक्त राज्य अमेरिका की सुरक्षा भी संकट में पड़ सकती है। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय रक्षा को सुदृढ़ करने और मित्र राष्ट्रों को अधिक प्रभावी सहायता देने की आवश्यकता स्पष्ट होने लगी।

ब्रिटेन का संघर्ष और अमेरिकी समर्थन

फ्रांस की पराजय के बाद ब्रिटेन पश्चिमी यूरोप में जर्मनी का एकमात्र प्रमुख प्रतिद्वंद्वी रह गया। मई 1940 ई. में विंस्टन चर्चिल के प्रधानमंत्री बनने के बाद ब्रिटेन ने किसी भी परिस्थिति में संघर्ष जारी रखने का निर्णय लिया। इसके पश्चात जर्मनी ने ‘ब्रिटेन का युद्ध’ प्रारंभ किया, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश वायुसेना को पराजित कर इंग्लैंड पर आक्रमण का मार्ग प्रशस्त करना था। किंतु रॉयल एयर फ़ोर्स के प्रभावी प्रतिरोध के कारण जर्मनी अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका।

ब्रिटेन की इस दृढ़ता ने अमेरिकी नेतृत्व को प्रभावित किया। उसे अनुभव हुआ कि यदि ब्रिटेन भी पराजित हो गया, तो जर्मनी को अटलांटिक क्षेत्र में व्यापक सामरिक बढ़त मिल जाएगी और पश्चिमी गोलार्द्ध की सुरक्षा भी संकट में पड़ सकती है। फलस्वरूप अमेरिका ने ब्रिटेन को आर्थिक तथा सैन्य सहायता बढ़ाने की नीति अपनाई और उसकी रक्षा को अपनी सुरक्षा से जोड़कर देखना प्रारंभ किया।

एशिया में जापानी विस्तारवाद

उधर एशिया में जापान अपनी साम्राज्यवादी नीति का लगातार विस्तार कर रहा था। चीन में युद्ध जारी रखते हुए उसने फ्रांसीसी इंडोचीन तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के संसाधन-संपन्न क्षेत्रों पर अपना प्रभाव बढ़ाना प्रारंभ किया। उसकी इस नीति से प्रशांत महासागर में अमेरिका के राजनीतिक, आर्थिक तथा सामरिक हितों को प्रत्यक्ष चुनौती मिलने लगी। विशेष रूप से फिलीपींस, गुआम तथा प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी उपस्थिति के कारण दोनों देशों के संबंध लगातार तनावपूर्ण होते गए।

अमेरिकी नेतृत्व ने यह निष्कर्ष निकाला कि यूरोप और एशिया की घटनाएँ परस्पर जुड़ी हुई हैं। यदि जर्मनी और जापान जैसे धुरी राष्ट्रों की विस्तारवादी नीति को समय रहते नहीं रोका गया, तो अंततः अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री व्यापार तथा वैश्विक आर्थिक हित गंभीर संकट में पड़ सकते हैं।

अमेरिकी विदेश नीति का परिवर्तन

1940 ई. के उत्तरार्द्ध तक अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने अमेरिकी विदेश नीति को नई दिशा दे दी। राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट ने राष्ट्रीय रक्षा को सुदृढ़ करने के लिए सैन्य उत्पादन में तीव्र वृद्धि की, 1940 ई. का चयनात्मक प्रशिक्षण एवं सेवा अधिनियम लागू कर अमेरिकी इतिहास में पहली बार शांतिकालीन अनिवार्य सैन्य भर्ती प्रारंभ की तथा मित्र राष्ट्रों को सहायता देने की नीति को और अधिक सक्रिय बनाया। इस प्रकार अमेरिका औपचारिक रूप से तटस्थ रहते हुए भी व्यवहारिक रूप से मित्र राष्ट्रों के समर्थन की दिशा में आगे बढ़ने लगा।

इतिहासकारों के अनुसार फ्रांस की पराजय, ब्रिटेन पर मंडराते संकट और एशिया में जापानी विस्तारवाद ने अमेरिकी सरकार और जनता दोनों की सोच को बदल दिया। अब यह स्पष्ट हो गया कि यूरोप और प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा से संयुक्त राज्य अमेरिका की सुरक्षा प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई है। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर 1940 ई. के ‘डिस्ट्रॉयर्स फ़ॉर बेसेज़’ समझौते, 1941 ई. के लेंड-लीज़ अधिनियम तथा अंततः दिसंबर 1941 ई. में संयुक्त राज्य अमेरिका के द्वितीय विश्व युद्ध में प्रत्यक्ष प्रवेश का आधार बनीं।

अमेरिकी दृष्टिकोण

द्वितीय विश्व युद्ध के आरंभ से पूर्व एशिया और यूरोप की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के प्रति संयुक्त राज्य अमेरिका ने अत्यंत सतर्क और तटस्थ नीति अपनाई। राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट का प्रशासन अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर निरंतर दृष्टि बनाए हुए था, किंतु अमेरिकी जनमत अभी भी अलगाववाद का समर्थक था। प्रथम विश्व युद्ध के कटु अनुभवों ने अधिकांश अमेरिकियों को यह विश्वास दिलाया था कि यूरोपीय विवादों और सैन्य संघर्षों से दूर रहना ही राष्ट्रीय हित में है। इसलिए अमेरिकी विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य देश को किसी भी विदेशी युद्ध से दूर रखना तथा घरेलू आर्थिक और सामाजिक समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करना था। यद्यपि रूज़वेल्ट यूरोप और एशिया में उभरते अधिनायकवादी शासन—विशेषकर नाज़ी जर्मनी, फासीवादी इटली और साम्राज्यवादी जापान को विश्व शांति के लिए गंभीर खतरा मानते थे, फिर भी वे जनमत की उपेक्षा कर प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करने की स्थिति में नहीं थे। फलस्वरूप 1930 के दशक के उत्तरार्ध तक अमेरिकी नीति आदर्शवाद और व्यावहारिक तटस्थता के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास करती रही।

अमेरिका में अलगाववादी भावना के सुदृढ़ होने के पीछे अनेक ऐतिहासिक कारण थे। प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने के बावजूद अपेक्षित लाभ न मिलने, भारी जन-धन की हानि तथा युद्धोत्तर यूरोपीय समस्याओं में निरंतर उलझाव ने अमेरिकी समाज में यह धारणा विकसित कर दी थी कि यूरोप के शक्ति-संघर्षों से दूरी बनाए रखना ही उचित होगा। इसी मानसिकता को और बल 1934–1936 ई. के बीच सीनेटर जेराल्ड पी. नाइ की अध्यक्षता में गठित नाइ समिति की जाँच से मिला।

नाइ समिति ने प्रथम विश्व युद्ध में अमेरिका के प्रवेश के कारणों की व्यापक समीक्षा की। समिति ने निष्कर्ष निकाला कि युद्ध में अमेरिकी भागीदारी केवल राष्ट्रीय सुरक्षा का परिणाम नहीं थी, बल्कि हथियार उद्योगों, बैंकिंग संस्थानों और बड़े वित्तीय समूहों के आर्थिक हितों का भी उस पर प्रभाव पड़ा था। यद्यपि इस निष्कर्ष पर इतिहासकारों में मतभेद रहे हैं, फिर भी उस समय इसने अमेरिकी जनमत को गहराई से प्रभावित किया। कांग्रेस और जनता के बीच यह विश्वास मजबूत हुआ कि भविष्य में अमेरिका को किसी भी विदेशी युद्ध में अनावश्यक रूप से सम्मिलित नहीं होना चाहिए। परिणामस्वरूप अलगाववाद अमेरिकी राजनीति का प्रभावशाली सिद्धांत बन गया।

तटस्थता अधिनियम और अमेरिकी नीति

अलगाववादी जनमत के प्रभाव में अमेरिकी कांग्रेस ने 1935, 1936 और 1937 ई. में क्रमशः तटस्थता अधिनियम पारित किए। इन अधिनियमों का उद्देश्य संयुक्त राज्य अमेरिका को विदेशी युद्धों से दूर रखना तथा उसे किसी भी संघर्ष में अप्रत्यक्ष रूप से उलझने से रोकना था।

1935 ई. के अधिनियम के अंतर्गत युद्धरत देशों को हथियारों और गोला-बारूद की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया। 1936 ई. के अधिनियम ने इस नीति को और कठोर बनाते हुए युद्धरत राष्ट्रों को ऋण तथा वित्तीय सहायता देने पर भी रोक लगा दी। 1937 ई. के अधिनियम में अमेरिकी नागरिकों को युद्धरत देशों के जहाज़ों पर यात्रा करने से प्रतिबंधित किया गया तथा अधिकांश प्रकार के व्यापार पर भी नियंत्रण स्थापित किया गया। इसी अधिनियम में सीमित रूप से ‘कैश एंड कैरी’ व्यवस्था को गैर-सैन्य वस्तुओं के लिए स्वीकार किया गया, जिसके अनुसार युद्धरत राष्ट्र नकद भुगतान कर तथा अपने जहाज़ों से माल ले जाकर आवश्यक वस्तुएँ खरीद सकते थे।

इन अधिनियमों का मूल उद्देश्य अमेरिका को यूरोप और एशिया के युद्धों से पूर्णतः अलग रखना था। किंतु साथ ही यह भी स्पष्ट होने लगा कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में निरंतर परिवर्तन के कारण भविष्य में इन कानूनों में संशोधन की आवश्यकता पड़ सकती है।

द्वितीय विश्व युद्ध का प्रारंभ और अमेरिकी प्रतिक्रिया

1 सितंबर 1939 ई. को जर्मनी द्वारा पोलैंड पर आक्रमण के साथ यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हो गया। ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी, किंतु संयुक्त राज्य अमेरिका ने स्वयं को औपचारिक रूप से तटस्थ घोषित किया। राष्ट्रपति रूज़वेल्ट पहले से ही यूरोप की बिगड़ती परिस्थितियों से परिचित थे, इसलिए युद्ध का आरंभ उनके लिए अप्रत्याशित नहीं था।

यद्यपि रूज़वेल्ट नाज़ी आक्रामकता के विरोधी थे, फिर भी अमेरिकी जनता का बड़ा वर्ग युद्ध में प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं चाहता था। विशेषकर ‘अमेरिका फ़र्स्ट कमेटी’ जैसे प्रभावशाली अलगाववादी संगठन यह तर्क देते थे कि यूरोपीय संघर्षों में हस्तक्षेप करना अमेरिका के राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध होगा। फलस्वरूप राष्ट्रपति को जनमत और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना पड़ा।

परिस्थितियों में परिवर्तन को देखते हुए कांग्रेस ने नवंबर 1939 ई. में तटस्थता अधिनियम में संशोधन किया। संशोधित ‘कैश एंड कैरी’ व्यवस्था अब युद्ध-सामग्री पर भी लागू कर दी गई। इसके परिणामस्वरूप ब्रिटेन और फ्रांस नकद भुगतान कर तथा अपने जहाज़ों द्वारा परिवहन की व्यवस्था करके अमेरिका से हथियार और अन्य सैन्य सामग्री खरीद सकते थे। इस संशोधन ने अमेरिका को औपचारिक रूप से तटस्थ बनाए रखा, किंतु व्यवहार में वह मित्र राष्ट्रों की सहायता की दिशा में पहला महत्त्वपूर्ण कदम था।

पनामा घोषणा (1939 ई.)

यूरोप में युद्ध प्रारंभ होने के बाद पश्चिमी गोलार्द्ध की सुरक्षा अमेरिका के लिए सर्वोच्च चिंता का विषय बन गई। इस उद्देश्य से 23 सितंबर से 3 अक्टूबर 1939 ई. तक पनामा में अमेरिकी गणराज्यों के विदेश मंत्रियों का सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें 21 अमेरिकी देशों ने भाग लिया।

सम्मेलन की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि पनामा घोषणा थी। इसके अंतर्गत पश्चिमी गोलार्द्ध के चारों ओर अटलांटिक महासागर में लगभग 300 समुद्री मील चौड़ा एक तटस्थ सुरक्षा क्षेत्र घोषित किया गया। इस क्षेत्र में युद्धरत देशों की सैन्य गतिविधियों को अवांछनीय माना गया तथा इसकी निगरानी का दायित्व मुख्यतः संयुक्त राज्य अमेरिका की नौसेना को सौंपा गया।

यद्यपि ब्रिटेन और जर्मनी ने इस व्यवस्था को औपचारिक मान्यता नहीं दी, फिर भी इसका व्यापक राजनीतिक महत्त्व था। इस घोषणा ने पश्चिमी गोलार्द्ध की सामूहिक सुरक्षा को सुदृढ़ किया और यह स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका अपने क्षेत्रीय हितों की रक्षा के लिए अधिक सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार है।

सम्मेलन में यह भी निर्णय लिया गया कि यूरोपीय युद्ध से उत्पन्न आर्थिक, व्यापारिक और सामरिक समस्याओं का समाधान अमेरिकी राष्ट्र परस्पर सहयोग के आधार पर करेंगे। इस प्रकार पनामा घोषणा ने मुनरो सिद्धांत की भावना को नई परिस्थितियों के अनुरूप व्यावहारिक रूप प्रदान किया।

जर्मनी की सैन्य सफलताएँ

1940 ई. जर्मनी की असाधारण सैन्य सफलताओं का वर्ष था। 9 अप्रैल 1940 ई. को जर्मनी ने डेनमार्क और नॉर्वे पर आक्रमण कर शीघ्र ही दोनों देशों पर अधिकार स्थापित कर लिया। इसके पश्चात 10 मई 1940 ई. को जर्मन सेनाओं ने नीदरलैंड, बेल्जियम और लक्ज़मबर्ग पर धावा बोल दिया। जर्मनी ने ‘ब्लिट्जक्रिग’ (विद्युत युद्ध) की रणनीति अपनाई, जिसमें तीव्र गति से बढ़ने वाली बख़्तरबंद सेनाओं, वायुसेना तथा संचार व्यवस्था का समन्वित उपयोग किया गया। इस नवीन युद्ध-पद्धति के सामने मित्र राष्ट्रों की पारंपरिक रक्षा व्यवस्था शीघ्र ही विफल सिद्ध हुई।

फ्रांस ने अपनी सुरक्षा के लिए मैजिनो रेखा पर अत्यधिक भरोसा किया था, किंतु जर्मन सेना आर्डेन के जंगलों से होकर आगे बढ़ी और इस रक्षा-पंक्ति को प्रभावहीन बना दिया। कुछ ही सप्ताहों में फ्रांसीसी प्रतिरोध टूट गया तथा 14 जून 1940 ई. को जर्मन सेना ने पेरिस पर अधिकार कर लिया। अंततः 22 जून 1940 ई. को फ्रांस ने युद्धविराम स्वीकार कर लिया।

युद्धविराम के बाद उत्तरी और पश्चिमी फ्रांस जर्मन नियंत्रण में आ गया, जबकि दक्षिणी भाग में मार्शल फिलिप पेटाँ के नेतृत्व में विची सरकार की स्थापना हुई, जिसने जर्मनी के साथ सहयोग की नीति अपनाई। फ्रांस जैसी शक्तिशाली सैन्य शक्ति का इतनी शीघ्र पराजित होना समूचे विश्व के लिए अत्यंत आश्चर्यजनक घटना थी।

फ्रांस की पराजय और अमेरिकी चिंता

फ्रांस की तीव्र पराजय ने संयुक्त राज्य अमेरिका की विदेश और सुरक्षा नीति पर गहरा प्रभाव डाला। अब तक अनेक अमेरिकी यह मानते थे कि फ्रांसीसी सेना यूरोप की सबसे सक्षम सेनाओं में से एक है, किंतु उसकी अप्रत्याशित हार ने जर्मनी की वास्तविक सैन्य क्षमता को स्पष्ट कर दिया।

स्थिति और अधिक गंभीर तब हो गई जब 10 जून 1940 ई. को इटली भी जर्मनी के पक्ष में युद्ध में शामिल हो गया। इससे धुरी राष्ट्रों की शक्ति और बढ़ गई तथा यूरोप में शक्ति-संतुलन तेजी से उनके पक्ष में झुकने लगा।

अमेरिकी नीति-निर्माताओं ने अनुभव किया कि यदि जर्मनी पश्चिमी यूरोप पर स्थायी नियंत्रण स्थापित कर लेता है, तो उसका प्रभाव अटलांटिक महासागर तक पहुँच जाएगा और अंततः पश्चिमी गोलार्द्ध तथा संयुक्त राज्य अमेरिका की सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय रक्षा को सुदृढ़ करने तथा मित्र राष्ट्रों की सहायता बढ़ाने की आवश्यकता अधिक स्पष्ट होने लगी।

ब्रिटेन का संघर्ष और अमेरिकी समर्थन

फ्रांस की पराजय के बाद ब्रिटेन ही पश्चिमी यूरोप में जर्मनी का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी रह गया। मई 1940 ई. में विंस्टन चर्चिल के प्रधानमंत्री बनने के बाद ब्रिटेन ने किसी भी परिस्थिति में आत्मसमर्पण न करने का संकल्प लिया।

इसके बाद जर्मनी ने ‘ब्रिटेन का युद्ध’ के माध्यम से ब्रिटिश वायुसेना को नष्ट कर संभावित आक्रमण का मार्ग प्रशस्त करने का प्रयास किया। किंतु रॉयल एयर फ़ोर्स ने अत्यंत साहस और कुशलता के साथ जर्मन लुफ़्टवाफ़े का मुकाबला किया और जर्मनी अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका।

ब्रिटेन की इस सफलता का अमेरिकी नेतृत्व पर गहरा प्रभाव पड़ा। अब यह स्पष्ट हो गया कि यदि ब्रिटेन पराजित हो गया, तो जर्मनी को अटलांटिक क्षेत्र में व्यापक सामरिक बढ़त मिल जाएगी, जिससे अमेरिकी सुरक्षा भी सीधे प्रभावित होगी। इसी कारण अमेरिका ने ब्रिटेन को आर्थिक, औद्योगिक और सैन्य सहायता देने की दिशा में अधिक सक्रिय नीति अपनानी प्रारंभ कर दी।

एशिया में जापानी विस्तारवाद और अमेरिका

यूरोप में जर्मनी की सफलताओं के समानांतर एशिया में जापान भी अपनी साम्राज्यवादी नीति का तीव्र विस्तार कर रहा था। चीन में युद्ध जारी रखते हुए उसने फ्रांसीसी इंडोचीन तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के संसाधन-संपन्न क्षेत्रों पर अपना प्रभाव बढ़ाना प्रारंभ किया। जापान का उद्देश्य पूर्वी एशिया में एक व्यापक साम्राज्य स्थापित करना तथा आवश्यक कच्चे माल और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण प्राप्त करना था।

जापानी विस्तारवाद से प्रशांत महासागर में अमेरिका के राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक हितों को प्रत्यक्ष चुनौती मिलने लगी। फिलीपींस, गुआम तथा अन्य अमेरिकी क्षेत्रों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई। अमेरिकी नीति-निर्माताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि यूरोप और एशिया के संकट अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि धुरी राष्ट्रों की समन्वित विस्तारवादी नीति का हिस्सा हैं।

इसी कारण 1940 ई. के उत्तरार्द्ध तक अमेरिकी नेतृत्व यह समझने लगा कि यदि नाज़ी जर्मनी और साम्राज्यवादी जापान की विस्तारवादी महत्त्वाकांक्षाओं को समय रहते नहीं रोका गया, तो अंततः संयुक्त राज्य अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री व्यापार और वैश्विक आर्थिक हित गंभीर संकट में पड़ सकते हैं। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर अमेरिकी विदेश नीति में व्यापक परिवर्तन का आधार सिद्ध हुईं।

अमेरिकी विदेश नीति का परिवर्तन

1940 ई. के मध्य तक यूरोप और एशिया की परिस्थितियों में तीव्र परिवर्तन हो चुका था। फ्रांस की पराजय, ब्रिटेन पर बढ़ता जर्मन दबाव तथा एशिया में जापान की विस्तारवादी नीति ने संयुक्त राज्य अमेरिका की सुरक्षा संबंधी धारणाओं को गहराई से प्रभावित किया। राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट और उनके सहयोगियों का मत था कि यदि धुरी राष्ट्रों को समय रहते नहीं रोका गया, तो उनका प्रभाव केवल यूरोप और एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अटलांटिक और प्रशांत महासागर के माध्यम से अंततः अमेरिकी सुरक्षा और आर्थिक हितों को भी चुनौती देगा। यद्यपि अमेरिका औपचारिक रूप से अभी भी तटस्थ था, फिर भी उसकी विदेश नीति अब पूर्ण अलगाववाद से हटकर मित्र राष्ट्रों के पक्ष में व्यावहारिक सहयोग की दिशा में अग्रसर होने लगी।

राष्ट्रपति रूज़वेल्ट जानते थे कि अमेरिका की सुरक्षा केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है। यदि ब्रिटेन अथवा अन्य लोकतांत्रिक राष्ट्र पराजित हो जाते हैं, तो पश्चिमी गोलार्द्ध की सुरक्षा भी संकट में पड़ सकती है। इसी सोच के आधार पर अमेरिकी प्रशासन ने राष्ट्रीय रक्षा को सुदृढ़ करने, सैन्य उत्पादन बढ़ाने तथा मित्र राष्ट्रों को सहायता उपलब्ध कराने की नीति अपनाई। इस प्रकार 1940–41 ई. के दौरान अमेरिकी विदेश नीति में क्रमिक किंतु निर्णायक परिवर्तन दिखाई देने लगा।

हवाना सम्मेलन (1940 ई.)

फ्रांस, नीदरलैंड और बेल्जियम पर जर्मन अधिकार स्थापित होने के बाद पश्चिमी गोलार्द्ध में स्थित यूरोपीय उपनिवेशों की सुरक्षा एक गंभीर समस्या बन गई। आशंका थी कि यदि इन उपनिवेशों पर धुरी राष्ट्रों का नियंत्रण स्थापित हो गया, तो कैरेबियन क्षेत्र और अटलांटिक महासागर में अमेरिकी सुरक्षा को प्रत्यक्ष खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसी पृष्ठभूमि में 21 से 30 जुलाई 1940 ई. के बीच क्यूबा की राजधानी हवाना में 21 अमेरिकी गणराज्यों के विदेश मंत्रियों का सम्मेलन आयोजित किया गया।

इस सम्मेलन की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि ‘हवाना अधिनियम’ थी। इसके अनुसार यदि यूरोप की कोई शक्ति अपने अमेरिकी उपनिवेशों पर नियंत्रण बनाए रखने में असमर्थ हो जाए अथवा उन पर धुरी राष्ट्रों के अधिकार का खतरा उत्पन्न हो, तो अमेरिकी गणराज्य सामूहिक रूप से उन क्षेत्रों का अस्थायी प्रशासन अपने हाथ में ले सकते थे। इसका उद्देश्य इन उपनिवेशों को जर्मनी अथवा अन्य धुरी शक्तियों के नियंत्रण में जाने से रोकना था। इस निर्णय ने मुनरो सिद्धांत की अहस्तांतरण नीति को नई परिस्थितियों के अनुरूप सुदृढ़ किया।

हवाना सम्मेलन ने अंतर-अमेरिकी सहयोग को भी नई दिशा प्रदान की। इसमें यह स्वीकार किया गया कि पश्चिमी गोलार्द्ध के किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता अथवा राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बाहरी हस्तक्षेप समस्त अमेरिकी देशों की सामूहिक सुरक्षा के लिए चुनौती माना जाएगा। इस प्रकार सम्मेलन ने अमेरिकी महाद्वीप की संयुक्त सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया और क्षेत्रीय नेतृत्व के रूप में संयुक्त राज्य अमेरिका की भूमिका को अधिक स्पष्ट किया।

हस्तक्षेपवाद और अलगाववाद का संघर्ष

विदेश नीति में परिवर्तन के साथ ही अमेरिका के भीतर हस्तक्षेपवादियों और अलगाववादियों के बीच तीव्र वैचारिक संघर्ष प्रारंभ हो गया। हस्तक्षेपवादियों का मत था कि नाजी जर्मनी और उसके सहयोगियों की विजय अंततः अमेरिका के लिए भी गंभीर खतरा सिद्ध होगी। इसलिए ब्रिटेन और अन्य मित्र राष्ट्रों को हथियार, आर्थिक सहायता तथा आवश्यक सैन्य सामग्री उपलब्ध कराना अमेरिकी सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।

इसके विपरीत, अलगाववादी नेताओं और संगठनों का तर्क था कि अमेरिका को यूरोपीय संघर्षों से दूर रहना चाहिए। उनका आरोप था कि राष्ट्रपति रूज़वेल्ट देश को धीरे-धीरे युद्ध की ओर ले जा रहे हैं। उनका विश्वास था कि यूरोप के युद्ध में प्रत्यक्ष भागीदारी अमेरिका को अनावश्यक आर्थिक और मानवीय क्षति पहुँचाएगी।

फिर भी जर्मनी की लगातार सफलताओं और ब्रिटेन पर मंडराते संकट ने अमेरिकी जनमत को धीरे-धीरे प्रभावित किया। अधिकांश नागरिक प्रत्यक्ष युद्ध में प्रवेश के पक्ष में नहीं थे, किंतु वे ब्रिटेन की पराजय भी नहीं चाहते थे। परिणामस्वरूप जनता का एक बड़ा वर्ग मित्र राष्ट्रों को सहायता देने की नीति का समर्थक बनने लगा। यही परिवर्तन आगे चलकर अमेरिकी विदेश नीति का आधार बना।

अमेरिकी सैन्य तैयारियाँ

1940 ई. में राष्ट्रपति रूज़वेल्ट ने राष्ट्रीय रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान की। उन्होंने अमेरिका को संभावित युद्ध के लिए तैयार करने हेतु व्यापक सैन्य कार्यक्रम प्रारंभ किया। मई 1940 ई. में उन्होंने घोषणा की कि अमेरिकी विमान उद्योग को इतना विकसित किया जाए कि वह प्रतिवर्ष लगभग 50,000 सैन्य विमान निर्मित करने में सक्षम हो सके। साथ ही विश्व की सबसे शक्तिशाली वायुसेना के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया गया।

इसी अवधि में ‘द्वि-महासागरीय नौसेना कार्यक्रम’ को स्वीकृति प्रदान की गई। इसका उद्देश्य अटलांटिक और प्रशांत—दोनों महासागरों में अमेरिकी नौसैनिक शक्ति को सुदृढ़ करना था। नए युद्धपोतों, विमानवाहक पोतों, पनडुब्बियों तथा नौसैनिक अड्डों के निर्माण पर विशेष बल दिया गया।

सितंबर 1940 ई. में ‘चयनात्मक प्रशिक्षण एवं सेवा अधिनियम’ पारित किया गया। इसके अंतर्गत अमेरिका के इतिहास में पहली बार शांतिकाल में अनिवार्य सैन्य भर्ती लागू की गई। निर्धारित आयु वर्ग के युवकों को सैन्य प्रशिक्षण के लिए पंजीकरण कराना अनिवार्य बनाया गया। राष्ट्रपति रूज़वेल्ट का मत था कि प्रथम विश्व युद्ध की भाँति अमेरिका को बिना तैयारी के युद्ध में प्रवेश नहीं करना चाहिए।

इसी वर्ष कांग्रेस ने राष्ट्रीय रक्षा के लिए अभूतपूर्व धनराशि स्वीकृत की। नए कारखानों की स्थापना, रक्षा उद्योगों के विस्तार तथा आधुनिक हथियारों के निर्माण पर बड़े पैमाने पर निवेश किया गया। यद्यपि इन कदमों का कुछ वर्गों ने विरोध किया, फिर भी सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर अपने निर्णयों पर दृढ़ रही।

ब्रिटेन को सहायता

1940 ई. में फ्रांस की पराजय के बाद ब्रिटेन अकेला प्रमुख यूरोपीय राष्ट्र रह गया था, जो जर्मनी का सामना कर रहा था। अमेरिकी प्रशासन ने यह अनुभव किया कि यदि ब्रिटेन भी पराजित हो गया, तो अटलांटिक क्षेत्र में जर्मनी की स्थिति अत्यंत मजबूत हो जाएगी। इसलिए अमेरिका ने ब्रिटेन को प्रत्यक्ष युद्ध में शामिल हुए बिना अधिक व्यापक सहायता प्रदान करनी प्रारंभ की।

प्रारंभ में अमेरिका ने ब्रिटेन को अतिरिक्त हथियार, बंदूकें, गोला-बारूद तथा सैन्य विमान उपलब्ध कराए। अमेरिकी युद्ध विभाग ने अपने भंडार से बड़ी मात्रा में रक्षा सामग्री ब्रिटेन को हस्तांतरित की। इससे ब्रिटिश सेना की युद्ध क्षमता बनाए रखने में सहायता मिली। इसी बीच नवंबर 1940 ई. के राष्ट्रपति चुनाव में फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट अभूतपूर्व रूप से तीसरी बार राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। उनकी विजय को अमेरिकी जनता द्वारा मित्र राष्ट्रों की सहायता संबंधी नीति के समर्थन के रूप में भी देखा गया। 29 दिसंबर 1940 को अपने प्रसिद्ध रेडियो भाषण में उन्होंने अमेरिका को ‘लोकतंत्र का महान शस्त्रागार’ घोषित करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक राष्ट्रों की रक्षा करना अमेरिका की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

डिस्ट्रॉयर्स फ़ॉर बेसेज़ समझौता (1940 ई.)

ब्रिटेन की नौसैनिक स्थिति को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से सितंबर 1940 ई. में अमेरिका और ब्रिटेन के बीच ‘डिस्ट्रॉयर्स फ़ॉर बेसेज़’ समझौता संपन्न हुआ। इस समझौते के अंतर्गत संयुक्त राज्य अमेरिका ने ब्रिटेन को 50 पुराने विध्वंसक युद्धपोत उपलब्ध कराए। इसके बदले ब्रिटेन ने न्यूफ़ाउंडलैंड, बरमूडा, ब्रिटिश गयाना तथा कैरेबियन क्षेत्र के अन्य द्वीपों में स्थित अपने अनेक सामरिक नौसैनिक और वायुसेना अड्डों को 99 वर्षों के लिए अमेरिका को पट्टे पर दे दिया। इस समझौते से अमेरिका को अटलांटिक क्षेत्र में अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने का अवसर मिला, जबकि ब्रिटेन को तत्काल आवश्यक नौसैनिक सहायता प्राप्त हुई। यद्यपि यह समझौता औपचारिक तटस्थता नीति के अंतर्गत किया गया था, फिर भी वस्तुतः इससे स्पष्ट हो गया कि संयुक्त राज्य अमेरिका अब मित्र राष्ट्रों के पक्ष में सक्रिय भूमिका निभाने लगा है।

लेंड-लीज़ अधिनियम (1941 ई.)

अमेरिकी विदेश नीति में वास्तविक परिवर्तन मार्च 1941 ई. में ‘लेंड-लीज़ अधिनियम’ के पारित होने से हुआ। इस अधिनियम ने राष्ट्रपति रूज़वेल्ट को यह अधिकार दिया कि वे अमेरिका की सुरक्षा के लिए आवश्यक समझे जाने वाले किसी भी मित्र राष्ट्र को हथियार, गोला-बारूद, युद्धपोत, विमान, खाद्य सामग्री, औद्योगिक उपकरण तथा अन्य रक्षा सामग्री बेच सकते हैं, उधार दे सकते हैं अथवा पट्टे पर उपलब्ध करा सकते हैं।

इस योजना का सबसे बड़ा लाभ ब्रिटेन को मिला, जो जर्मन आक्रमण का निरंतर सामना कर रहा था। जून 1941 ई. में जर्मनी द्वारा सोवियत संघ पर आक्रमण के बाद सोवियत संघ को भी इस सहायता में सम्मिलित कर लिया गया। चीन सहित अन्य मित्र राष्ट्रों को भी इस योजना के अंतर्गत व्यापक सहायता प्राप्त हुई।

लेंड-लीज़ व्यवस्था के माध्यम से अमेरिका प्रत्यक्ष युद्ध में भाग लिए बिना ही मित्र राष्ट्रों का सबसे बड़ा औद्योगिक और आर्थिक सहयोगी बन गया। इससे उसकी रक्षा उद्योगों का तीव्र विस्तार हुआ और मित्र राष्ट्रों की युद्ध क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

अटलांटिक चार्टर (14 अगस्त 1941 ई.)

14 अगस्त 1941 ई. को न्यूफ़ाउंडलैंड के निकट एक युद्धपोत पर राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट और ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की ऐतिहासिक बैठक हुई। इस बैठक में दोनों नेताओं ने युद्धोत्तर विश्व व्यवस्था के सिद्धांतों पर विचार किया और आठ मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित संयुक्त घोषणा जारी की, जिसे अटलांटिक चार्टर कहा जाता है।

चार्टर में घोषणा की गई कि दोनों देश किसी प्रकार के क्षेत्रीय विस्तार की नीति नहीं अपनाएँगे। किसी भी राष्ट्र की सीमाओं में उसकी जनता की इच्छा के विरुद्ध परिवर्तन नहीं किया जाएगा तथा सभी राष्ट्रों को आत्मनिर्णय का अधिकार प्राप्त होगा। इसके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय व्यापार में समान अवसर, आर्थिक सहयोग, सामाजिक सुरक्षा, समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता तथा स्थायी विश्व शांति की स्थापना पर बल दिया गया। यद्यपि अमेरिका उस समय औपचारिक रूप से युद्ध में सम्मिलित नहीं हुआ था, फिर भी अटलांटिक चार्टर ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह युद्धोत्तर विश्व व्यवस्था के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार है। बाद में यही सिद्धांत संयुक्त राष्ट्र संगठन की स्थापना के आधार बने।

अमेरिका-जापान संबंधों में बढ़ता तनाव

यूरोप की घटनाओं के साथ-साथ प्रशांत क्षेत्र की परिस्थितियाँ भी तेजी से बदल रही थीं। 1931 ई. में मंचूरिया पर अधिकार और 1937 ई. में चीन पर व्यापक आक्रमण के बाद जापान लगातार अपनी साम्राज्यवादी नीति का विस्तार कर रहा था। 1940 ई. में फ्रांस की पराजय के पश्चात उसने उत्तरी फ्रांसीसी इंडोचीन पर अधिकार स्थापित कर लिया और सितंबर 1940 में जर्मनी तथा इटली के साथ त्रिपक्षीय संधि करके धुरी राष्ट्रों में शामिल हो गया।

जुलाई 1941 ई. में जापान द्वारा दक्षिणी फ्रांसीसी इंडोचीन में प्रवेश करने के बाद अमेरिका ने जापानी संपत्तियों को फ्रीज़ कर दिया तथा जापान को तेल और अन्य सामरिक वस्तुओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया। इन आर्थिक प्रतिबंधों ने जापान की सैन्य योजनाओं को गंभीर रूप से प्रभावित किया और दोनों देशों के संबंध अत्यधिक तनावपूर्ण हो गए।

युद्ध में प्रवेश

1941 ई. के अंतिम महीनों में अमेरिका और जापान के बीच अनेक दौर की वार्ताएँ हुईं। जापान चाहता था कि अमेरिका आर्थिक प्रतिबंध समाप्त करे और चीन में उसकी स्थिति को स्वीकार करे, जबकि अमेरिका चीन की संप्रभुता तथा एशिया में यथास्थिति बनाए रखने पर दृढ़ रहा। दोनों पक्षों के बीच कोई समझौता नहीं हो सका। 6 दिसंबर 1941 ई. को राष्ट्रपति रूज़वेल्ट ने जापानी सम्राट हिरोहितो को व्यक्तिगत संदेश भेजकर युद्ध टालने की अपील की, किंतु अगले ही दिन 7 दिसंबर 1941 ई. को जापान ने बिना पूर्व सूचना के हवाई द्वीप स्थित अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर पर आकस्मिक आक्रमण कर दिया। इस हमले में अमेरिकी प्रशांत बेड़े को भारी क्षति पहुँची और लगभग 2,400 अमेरिकी सैनिक तथा नागरिक मारे गए। पर्ल हार्बर पर आक्रमण ने अमेरिकी जनमत को पूरी तरह बदल दिया। 8 दिसंबर 1941 ई. को अमेरिकी कांग्रेस ने जापान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इसके तीन दिन बाद 11 दिसंबर 1941 ई. को जर्मनी और इटली ने भी संयुक्त राज्य अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस प्रकार संयुक्त राज्य अमेरिका औपचारिक रूप से द्वितीय विश्व युद्ध में सम्मिलित हो गया और यूरोप तथा प्रशांत—दोनों मोर्चों पर मित्र राष्ट्रों की ओर से निर्णायक भूमिका निभाने लगा।

मित्र राष्ट्रों की सफलता

1942 ई. के उत्तरार्ध से द्वितीय विश्व युद्ध का शक्ति-संतुलन धीरे-धीरे मित्र राष्ट्रों के पक्ष में झुकने लगा। इस परिवर्तन का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण पूर्वी मोर्चे पर सोवियत संघ की सफलता तथा उत्तरी अफ्रीका में ब्रिटिश और अमेरिकी सेनाओं की निर्णायक विजय थी। फरवरी 1943 ई. में स्टालिनग्राड के युद्ध में सोवियत सेना ने जर्मनी की छठी सेना को आत्मसमर्पण के लिए विवश कर दिया। यह युद्ध न केवल जर्मन सैन्य शक्ति के लिए भारी आघात सिद्ध हुआ, बल्कि पूर्वी मोर्चे पर जर्मनी की आक्रामक नीति का अंत भी माना जाता है। इसी समय अक्टूबर–नवंबर 1942 ई. में अल-अलामीन के द्वितीय युद्ध में ब्रिटिश सेनापति बर्नार्ड मोंटगोमेरी के नेतृत्व में मित्र सेनाओं ने जर्मन-इतालवी सेनाओं को पराजित कर उन्हें लीबिया और ट्यूनीशिया की ओर पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

उत्तरी अफ्रीका में इस सफलता को आगे बढ़ाते हुए नवंबर 1942 ई. में संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन ने ऑपरेशन टॉर्च के अंतर्गत मोरक्को और अल्जीरिया में संयुक्त सैन्य अभियान प्रारंभ किया। इसके परिणामस्वरूप मित्र राष्ट्रों ने पूर्व और पश्चिम दोनों दिशाओं से ट्यूनीशिया की ओर बढ़ते हुए धुरी सेनाओं को घेर लिया। मई 1943 ई. तक उत्तरी अफ्रीका से जर्मन और इतालवी सेनाओं का पूर्णतः सफाया कर दिया गया। इसी अवधि में अटलांटिक महासागर में भी मित्र राष्ट्रों ने जर्मन पनडुब्बियों की चुनौती पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर लिया, जिससे यूरोप तक सैनिकों, हथियारों और आवश्यक सामग्रियों की सुरक्षित आपूर्ति संभव हो सकी। साथ ही जर्मनी के औद्योगिक और सैन्य केंद्रों पर व्यापक हवाई बमबारी भी तेज कर दी गई, जिसने उसकी युद्ध क्षमता को लगातार कमजोर किया।

यूरोप में मित्र राष्ट्रों का अभियान

उत्तरी अफ्रीका की विजय के बाद मित्र राष्ट्रों ने यूरोप में दूसरा मोर्चा खोलने की दिशा में कदम बढ़ाया। जुलाई 1943 ई. में उन्होंने सिसिली पर सफल आक्रमण किया, जिसने इटली में फासीवादी शासन की नींव हिला दी। 25 जुलाई 1943 ई. को फासीवादी ग्रैंड काउंसिल ने बेनिटो मुसोलिनी को पद से हटा दिया और राजा विक्टर इमैनुएल तृतीय ने नई सरकार के गठन की प्रक्रिया आरंभ की। इसके बाद सितंबर 1943 ई. में इटली ने मित्र राष्ट्रों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया, यद्यपि उत्तरी इटली में जर्मन सेनाओं ने युद्ध जारी रखा। मित्र राष्ट्र क्रमिक रूप से आगे बढ़ते हुए 4 जून 1944 ई. को रोम पर अधिकार करने में सफल रहे। इसी अवधि में सोवियत सेना ने भी पूर्वी यूरोप में व्यापक प्रतिआक्रमण करते हुए 1944 ई. तक अपने अधिकांश खोए हुए क्षेत्रों को पुनः प्राप्त कर लिया और जर्मनी की सीमाओं की ओर निर्णायक बढ़त बना ली।

पश्चिमी यूरोप की मुक्ति

संयुक्त राज्य अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ‘यूरोप फर्स्ट’ रणनीति अपनाई, जिसके अंतर्गत नाज़ी जर्मनी की पराजय को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। पश्चिमी यूरोप को मुक्त कराने के लिए अमेरिकी सेनापति जनरल ड्वाइट डी. आइज़नहावर को मित्र राष्ट्रों की संयुक्त सेनाओं का सर्वोच्च कमांडर नियुक्त किया गया। लंबी तैयारी के बाद 6 जून 1944 ई. को इतिहास के सबसे बड़े उभयचर सैन्य अभियान डी-डे के अंतर्गत मित्र राष्ट्रों ने फ्रांस के नॉरमंडी तट पर समुद्री और हवाई मार्ग से विशाल आक्रमण किया।

प्रारंभिक चरण में जर्मन प्रतिरोध अत्यंत कठोर था और मित्र राष्ट्रों की सेनाएँ कई सप्ताह तक सीमित क्षेत्र में संघर्ष करती रहीं। किंतु उनकी वायु श्रेष्ठता, निरंतर सैन्य आपूर्ति तथा विशाल औद्योगिक क्षमता के कारण परिस्थितियाँ शीघ्र ही उनके पक्ष में बदल गईं। अगस्त 1944 ई. के अंत तक नॉरमंडी अभियान सफल हो गया और 25 अगस्त को पेरिस को जर्मन नियंत्रण से मुक्त करा लिया गया। इसके बाद जर्मन सेना राइनलैंड की ओर पीछे हटने लगी और पश्चिमी यूरोप में मित्र राष्ट्रों की विजय का मार्ग प्रशस्त हो गया।

जर्मनी की पराजय

1945 ई. के प्रारंभ तक जर्मनी चारों ओर से घिर चुका था। पूर्वी मोर्चे पर सोवियत सेना ओडर नदी पार कर बर्लिन के निकट पहुँच गई, जबकि पश्चिमी मोर्चे पर अमेरिका, ब्रिटेन और उनके सहयोगी देशों की सेनाओं ने मार्च 1945 ई. में राइन नदी पार कर जर्मनी के भीतरी क्षेत्रों में प्रवेश कर लिया। लगातार हो रहे आक्रमणों और हवाई बमबारी के कारण जर्मन प्रतिरोध तेजी से कमजोर पड़ने लगा।

अप्रैल 1945 ई. के अंतिम सप्ताह में सोवियत सेना ने बर्लिन को चारों ओर से घेर लिया। 30 अप्रैल 1945 ई. को एडोल्फ हिटलर ने अपने भूमिगत बंकर में आत्महत्या कर ली। इसके पश्चात जर्मन नेतृत्व ने बिना शर्त आत्मसमर्पण करने का निर्णय लिया। 7 मई 1945 ई. को फ्रांस के रीम्स में आत्मसमर्पण-पत्र पर हस्ताक्षर किए गए तथा 8 मई 1945 ई. को वी-ई डे (यूरोप में विजय दिवस) के रूप में यूरोप में युद्ध की आधिकारिक समाप्ति की घोषणा की गई। इस प्रकार नाज़ी जर्मनी का अंत हुआ और यूरोपीय मोर्चे पर मित्र राष्ट्रों की निर्णायक विजय सुनिश्चित हो गई।

प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी अभियान

यद्यपि अमेरिका ने यूरोप को प्राथमिकता दी, फिर भी उसने प्रशांत महासागर में जापान के विरुद्ध अपने अभियान निरंतर जारी रखे। 1942 ई. के उत्तरार्ध से अमेरिकी सेना ने ‘आइलैंड हॉपिंग’ (द्वीप-दर-द्वीप अभियान) की रणनीति अपनाई। इस नीति के अंतर्गत प्रत्येक जापानी ठिकाने पर आक्रमण करने के बजाय केवल सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण द्वीपों पर अधिकार किया गया, जिससे जापानी ठिकाने अलग-थलग पड़ते गए और उनकी आपूर्ति व्यवस्था बाधित होती गई।

जनरल डगलस मैकआर्थर के नेतृत्व में अमेरिकी और मित्र सेनाओं ने उत्तरी न्यू गिनी में सफल अभियान चलाया तथा सोलोमन द्वीप-समूह के ग्वाडलकैनाल में लंबे और कठिन युद्ध के बाद विजय प्राप्त की। विशाल प्रशांत महासागर, दुर्गम द्वीपों, प्रतिकूल जलवायु और लंबी आपूर्ति-रेखाओं के कारण यह अभियान अत्यंत चुनौतीपूर्ण था, किंतु 1943 ई. के अंत तक अमेरिका ने अनेक सामरिक द्वीपों पर अधिकार स्थापित कर जापान की बाहरी सुरक्षा-रेखा को काफी हद तक कमजोर कर दिया। इन सफलताओं ने आगे चलकर फिलीपींस, इवो जीमा, ओकिनावा तथा अंततः जापान के विरुद्ध अंतिम अभियानों का मार्ग प्रशस्त किया।

जापान की ओर अंतिम बढ़त

1944 और 1945 ई. में अमेरिकी सेना ने प्रशांत क्षेत्र में लगातार सफलताएँ प्राप्त कीं। अक्टूबर 1944 ई. में फिलीपींस में पुनः उतरने के बाद जनरल मैकआर्थर ने अपनी प्रसिद्ध घोषणा —‘मैं फिर लौटूँगा’ को साकार किया। फरवरी 1945 ई. में मनीला मित्र राष्ट्रों के नियंत्रण में आ गया। इसी अवधि में अमेरिकी नौसेना और मरीन कोर ने इवो जीमा पर विजय प्राप्त की तथा उसके बाद ओकिनावा पर भी भीषण युद्ध के बाद अधिकार स्थापित कर लिया।

इन विजयों का महत्त्व केवल क्षेत्रीय विस्तार तक सीमित नहीं था। इवो जीमा और ओकिनावा जैसे द्वीप जापान के मुख्य द्वीपों के निकट स्थित थे और वहाँ से अमेरिकी वायुसेना जापानी औद्योगिक तथा सैन्य केंद्रों पर व्यापक बमबारी कर सकती थी। दूसरी ओर दक्षिण-पूर्व एशिया में मित्र सेनाओं ने बर्मा पर पुनः अधिकार स्थापित कर जापान की स्थिति को और अधिक कमजोर कर दिया। इस समय तक जापान की नौसेना और वायुसेना भी क्षीण हो चुकी थीं।

परमाणु युग की शुरुआत

1945 ई. के मध्य तक जर्मनी पर विजय प्राप्त हो चुकी थी, किंतु जापान ने अभी तक आत्मसमर्पण नहीं किया था। मित्र राष्ट्रों को आशंका थी कि यदि जापान के मुख्य द्वीपों पर प्रत्यक्ष आक्रमण किया गया, तो दोनों पक्षों को भारी जनहानि उठानी पड़ेगी। इसी बीच याल्टा सम्मेलन के निर्णय के अनुसार सोवियत संघ भी जर्मनी की पराजय के बाद जापान के विरुद्ध युद्ध में शामिल होने की तैयारी कर रहा था।

इन परिस्थितियों में अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने मैनहैटन परियोजना के अंतर्गत विकसित परमाणु बम के प्रयोग की अनुमति दी। 6 अगस्त 1945 ई. को जापान के हिरोशिमा पर पहला परमाणु बम गिराया गया और 9 अगस्त 1945 ई. को दूसरा परमाणु बम नागासाकी पर गिराया गया। इन दोनों हमलों में अभूतपूर्व जन-धन की हानि हुई तथा दोनों नगर लगभग पूर्णतः नष्ट हो गए। इसी बीच 8 अगस्त 1945 ई. को सोवियत संघ ने भी जापान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर मंचूरिया में जापानी सेनाओं पर आक्रमण कर दिया।

इन घटनाओं के परिणामस्वरूप जापान ने आत्मसमर्पण का निर्णय लिया। उसने केवल यह अनुरोध किया कि सम्राट हिरोहितो की संस्था को बनाए रखा जाए। मित्र राष्ट्रों द्वारा इस शर्त को स्वीकार करने के बाद 15 अगस्त 1945 ई. को सम्राट हिरोहितो ने रेडियो प्रसारण के माध्यम से जापान के आत्मसमर्पण की घोषणा की। इसके बाद 2 सितंबर 1945 ई. को अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस मिसौरी पर औपचारिक आत्मसमर्पण-पत्र पर हस्ताक्षर किए गए। इसके साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध का आधिकारिक रूप से समापन हो गया।

मित्र राष्ट्रों की विजय के कारण

द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों की विजय किसी एक देश अथवा एक सैन्य अभियान का परिणाम नहीं थी, बल्कि यह अनेक राजनीतिक, आर्थिक, सैन्य और औद्योगिक कारकों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम थी। मित्र राष्ट्रों के परस्पर सहयोग, विशाल संसाधनों, प्रभावी सैन्य नेतृत्व तथा दीर्घकालीन रणनीति ने अंततः धुरी राष्ट्रों की पराजय सुनिश्चित की। युद्ध के दौरान ब्रिटेन, सोवियत संघ, संयुक्त राज्य अमेरिका तथा अन्य सहयोगी देशों ने अपने-अपने मोर्चों पर निर्णायक योगदान दिया, जिससे धुरी राष्ट्रों की युद्ध क्षमता क्रमशः समाप्त होती गई।

ब्रिटेन और सोवियत संघ का योगदान

1940–41 ई. के संकटपूर्ण वर्षों में, जब फ्रांस पराजित हो चुका था और अधिकांश पश्चिमी यूरोप जर्मन नियंत्रण में था, तब ब्रिटेन अकेला ऐसा प्रमुख राष्ट्र था जिसने नाज़ी जर्मनी के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं किया। ब्रिटेन के युद्ध में ब्रिटिश वायुसेना ने जर्मन आक्रमण को विफल कर दिया, जिससे हिटलर की ब्रिटेन पर आक्रमण की योजना असफल हो गई। इसके अतिरिक्त ब्रिटेन ने उत्तरी अफ्रीका, भूमध्यसागर तथा पश्चिमी यूरोप के विभिन्न अभियानों में निरंतर संघर्ष जारी रखा और मित्र राष्ट्रों को आवश्यक सामरिक आधार उपलब्ध कराए।

पूर्वी मोर्चे पर सोवियत संघ का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। 1941 ई. में जर्मनी के आक्रमण के बाद सोवियत सेना ने मास्को, लेनिनग्राड और विशेष रूप से स्टालिनग्राड में जर्मन सेना को निर्णायक पराजय दी। इसके बाद सोवियत सेना ने निरंतर पश्चिम की ओर बढ़ते हुए पूर्वी यूरोप को मुक्त कराया और अंततः बर्लिन पर अधिकार स्थापित किया। इस प्रकार पूर्वी मोर्चे पर जर्मनी की सैन्य शक्ति का अधिकांश भाग नष्ट हो गया।

संयुक्त राज्य अमेरिका की भूमिका

मित्र राष्ट्रों की विजय में संयुक्त राज्य अमेरिका की औद्योगिक, आर्थिक और वैज्ञानिक क्षमता ने निर्णायक भूमिका निभाई। अमेरिका ने युद्ध के दौरान अभूतपूर्व स्तर पर हथियार, टैंक, युद्धपोत, विमान, गोला-बारूद और अन्य सैन्य सामग्री का उत्पादन किया। लेंड-लीज अधिनियम के माध्यम से उसने ब्रिटेन, सोवियत संघ, चीन तथा अन्य मित्र राष्ट्रों को विशाल मात्रा में युद्ध-सामग्री उपलब्ध कराई। अमेरिकी उद्योगों की उत्पादन क्षमता इतनी अधिक थी कि वे एक साथ यूरोप और प्रशांत—दोनों मोर्चों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम रहे।

अमेरिकी सेना और नौसेना ने यूरोप, उत्तरी अफ्रीका, इटली, फ्रांस तथा प्रशांत महासागर के विभिन्न अभियानों में सक्रिय भाग लिया। वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक, उन्नत संचार व्यवस्था तथा प्रभावी रसद प्रबंधन ने भी मित्र राष्ट्रों की सैन्य सफलता में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

अन्य देशों और प्रतिरोध आंदोलनों का योगदान

मित्र राष्ट्रों की विजय में अनेक अधिगृहीत देशों के भूमिगत प्रतिरोध आंदोलनों ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। विशेष रूप से फ्रांस, युगोस्लाविया, पोलैंड, नीदरलैंड तथा अन्य देशों के प्रतिरोध संगठनों ने जर्मन सेना की संचार व्यवस्था को बाधित किया, गुप्त सूचनाएँ मित्र राष्ट्रों तक पहुँचाईं तथा स्थानीय स्तर पर धुरी राष्ट्रों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। यद्यपि इन गतिविधियों ने अकेले युद्ध का परिणाम निर्धारित नहीं किया, फिर भी उन्होंने मित्र राष्ट्रों के सैन्य अभियानों को उल्लेखनीय सहायता प्रदान की।

इसी प्रकार लैटिन अमेरिकी देशों ने भी अप्रत्यक्ष रूप से मित्र राष्ट्रों का सहयोग किया। ब्राज़ील ने अपनी सेना को यूरोपीय मोर्चे पर भेजा, जबकि मेक्सिको ने वायुसेना के माध्यम से सहयोग प्रदान किया। अधिकांश लैटिन अमेरिकी देशों ने संयुक्त राज्य अमेरिका को अपने क्षेत्रों में नौसैनिक तथा वायुसेना अड्डे स्थापित करने की अनुमति दी, जिससे अटलांटिक महासागर और कैरेबियन क्षेत्र की सुरक्षा सुदृढ़ हुई तथा मित्र राष्ट्रों की आपूर्ति व्यवस्था अधिक प्रभावी बन सकी।

द्वितीय विश्व युद्धकालीन अमेरिका की गृह-नीति

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका की आंतरिक नीतियों में व्यापक परिवर्तन किए गए। युद्ध की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य उत्पादन और आर्थिक संसाधनों के प्रभावी उपयोग को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। इसके परिणामस्वरूप संघीय सरकार की शक्तियों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई तथा अनेक प्रशासनिक संस्थाओं और स्वतंत्र एजेंसियों को युद्ध उत्पादन, परिवहन, संसाधन प्रबंधन और आर्थिक नियंत्रण की जिम्मेदारी सौंपी गई। अमेरिकी जनता ने भी राष्ट्रीय एकता का परिचय देते हुए युद्ध प्रयासों में सक्रिय सहयोग दिया।

युद्ध उत्पादन को संगठित और तीव्र गति से संचालित करने के लिए युद्ध उत्पादन बोर्ड (वार प्रोडक्शन बोर्ड), लेंड-लीज़ प्रशासन (लेंड-लीज एडमिनिस्ट्रेशन), रक्षा परिवहन कार्यालय (ऑफिस ऑफ़ डिफेंस ट्रांसपोर्टेशन) तथा द्धकालीन जहाज़रानी प्रशासन (वार शिपिंग एडमिनिस्ट्रेशन) जैसी संस्थाओं की स्थापना की गई। इन एजेंसियों ने नागरिक उद्योगों को सैन्य उत्पादन के अनुरूप परिवर्तित किया तथा टैंक, विमान, युद्धपोत, हथियार और अन्य रक्षा-सामग्रियों के निर्माण को अभूतपूर्व स्तर तक पहुँचा दिया।

युद्धकालीन आवश्यकताओं के कारण अमेरिका में अनेक आर्थिक और सामाजिक प्रतिबंध भी लागू किए गए। युद्ध की समाप्ति तक लगभग 1.2 करोड़ अमेरिकी सैनिक सेना में भर्ती हो चुके थे। सरकार ने आवास निर्माण, ईंधन तथा अनेक उपभोक्ता वस्तुओं के उपयोग पर नियंत्रण स्थापित किया। चीनी, मांस, मक्खन, पेट्रोल, जूते और अन्य आवश्यक वस्तुओं के वितरण के लिए कूपन-आधारित राशन प्रणाली लागू की गई, जिसके अंतर्गत प्रत्येक परिवार को निर्धारित मात्रा में ही वस्तुएँ प्राप्त होती थीं।

युद्ध के दौरान नागरिक उपयोग की अनेक वस्तुओं का उत्पादन सीमित कर दिया गया। फरवरी 1943 ई. से युद्ध की समाप्ति तक निजी उपयोग के लिए मोटरगाड़ियों का निर्माण लगभग बंद कर दिया गया, क्योंकि अधिकांश औद्योगिक क्षमता टैंक, विमान, हथियार और अन्य सैन्य उपकरणों के निर्माण में लगा दी गई थी। इसी प्रकार जापान से रेशम का आयात बंद होने के कारण कृत्रिम नायलॉन का व्यापक उपयोग प्रारंभ हुआ।

सेलेक्टिव सर्विस सिस्टम के अंतर्गत बड़ी संख्या में युवाओं की सैन्य भर्ती होने से उद्योगों में श्रमिकों की कमी उत्पन्न हो गई। इस कमी को पूरा करने के लिए लाखों अमेरिकी महिलाओं ने कारखानों, शिपयार्डों और रक्षा उद्योगों में कार्य करना प्रारंभ किया। उन्होंने युद्धपोतों, विमानों, हथियारों तथा अन्य सैन्य सामग्री के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इन महिलाओं को ‘रोज़ी द रिवेटर’ के प्रतीक के रूप में जाना गया। युद्धकालीन उत्पादन में उनकी सक्रिय भागीदारी ने न केवल मित्र राष्ट्रों की विजय में योगदान दिया, बल्कि अमेरिकी समाज में महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक भूमिका को भी नई पहचान प्रदान की।

युद्धकाल में राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर नागरिक स्वतंत्रताओं पर भी कुछ प्रतिबंध लगाए गए। प्रेस और संचार माध्यमों पर सीमित नियंत्रण रखा गया ताकि संवेदनशील सैन्य सूचनाएँ सार्वजनिक न हो सकें। सरकार ने युद्ध बांड जारी किए, करों में वृद्धि की तथा श्रमिक हड़तालों को राष्ट्रीय हित के विरुद्ध माना। इन उपायों ने युद्धकालीन अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखने और सैन्य आवश्यकताओं की पूर्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

युद्धकालीन गृह-नीति का सबसे विवादास्पद पक्ष जापानी-अमेरिकियों का नजरबंद किया जाना था। फरवरी 1942 ई. में राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट ने कार्यकारी आदेश संख्या 9066 जारी किया, जिसके अंतर्गत लगभग 1,20,000 जापानी-अमेरिकियों को अपने घर छोड़कर पुनर्वास शिविरों में रहने के लिए बाध्य किया गया। इनमें अधिकांश जन्म से अमेरिकी नागरिक थे। उन्हें अपनी संपत्ति कम कीमत पर बेचनी पड़ी और केवल सीमित सामान साथ ले जाने की अनुमति मिली। बाद के वर्षों में इस नीति को अमेरिकी इतिहास में नागरिक अधिकारों के सबसे विवादास्पद निर्णयों में से एक माना गया।

इस ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार करते हुए 1988 ई. में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने सिविल लिबर्टीज़ एक्ट पर हस्ताक्षर किए, जिसके अंतर्गत जीवित बचे प्रत्येक जापानी-अमेरिकी बंदी को 20,000 अमेरिकी डॉलर का मुआवज़ा देने का प्रावधान किया गया। इसके बाद 1989 ई. में राष्ट्रपति जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश ने अमेरिकी सरकार की ओर से औपचारिक रूप से इस अन्याय के लिए क्षमा-याचना की।

यद्यपि संयुक्त राज्य अमेरिका में युद्ध के कारण जनहानि यूरोप और एशिया की तुलना में अपेक्षाकृत कम हुई, फिर भी इस युद्ध का उसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। युद्धकालीन नीतियों ने अमेरिकी उद्योग, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और प्रशासनिक व्यवस्था को अभूतपूर्व गति प्रदान की तथा संघीय सरकार की भूमिका को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सशक्त बना दिया। इससे संयुक्त राज्य अमेरिका युद्धोपरांत विश्व की अग्रणी आर्थिक और सैन्य महाशक्ति के रूप में उभरने में सफल हुआ।

द्वितीय विश्व युद्ध के परिणाम

द्वितीय विश्व युद्ध मानव इतिहास का सबसे व्यापक और विनाशकारी युद्ध सिद्ध हुआ। इस संघर्ष में करोड़ों सैनिकों और नागरिकों ने भाग लिया तथा करोड़ों लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इसकी विभीषिका के शिकार बने। यूरोप और एशिया के अनेक नगर, उद्योग, परिवहन तंत्र तथा प्राकृतिक संसाधन नष्ट हो गए। लाखों लोग विस्थापित हुए और अनेक देशों की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में पड़ गई। युद्ध की समाप्ति के साथ नाज़ी जर्मनी, फासीवादी इटली और साम्राज्यवादी जापान जैसी आक्रामक शक्तियों का पतन हो गया। इसके विपरीत संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व की प्रमुख आर्थिक, औद्योगिक और सैन्य महाशक्ति के रूप में उभरा। युद्धोपरांत उसने संयुक्त राष्ट्र संगठन, ब्रेटन वुड्स व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व बैंक की स्थापना में अग्रणी भूमिका निभाई। साथ ही यूरोप के पुनर्निर्माण, नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के निर्माण और वैश्विक शक्ति-संतुलन को आकार देने में भी अमेरिका की केंद्रीय भूमिका रही।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ ने मिलकर धुरी राष्ट्रों को पराजित किया। किंतु युद्ध समाप्त होते ही दोनों महाशक्तियों के बीच वैचारिक एवं सामरिक मतभेद उभरने लगे। पूर्वी यूरोप में सोवियत प्रभाव के विस्तार, साम्यवाद और पूँजीवाद के वैचारिक संघर्ष तथा युद्धोत्तर शक्ति-संतुलन की प्रतिस्पर्धा ने शीत युद्ध  को जन्म दिया। अगले चार दशकों तक संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ विश्व राजनीति के दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बने रहे। 1991 ई. में सोवियत संघ के विघटन के साथ शीत युद्ध का औपचारिक अंत हुआ।

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