विश्व राजनीति में हथियारबंदी की होड़
1871 ई. से 1914 ई. तक का काल विश्व राजनीति के इतिहास में ‘सशस्त्र-शांति’ तथा ‘अंतरराष्ट्रीय अराजकता’ का युग माना जाता है। इस अवधि की सबसे प्रमुख विशेषता राष्ट्रों के बीच हथियारबंदी की होड़ थी। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में यूरोपीय राष्ट्रों ने अपनी सुरक्षा, राष्ट्रीय गौरव और साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए सैन्य शक्ति को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उग्र राष्ट्रवाद और प्रचंड साम्राज्यवाद के इस युग में युद्ध को राष्ट्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति का सबसे प्रभावी साधन माना जाता था। युद्ध केवल वांछनीय ही नहीं, बल्कि आवश्यक भी समझा जाता था। जर्मनी और इटली ने अपने राष्ट्रीय एकीकरण और साम्राज्य की स्थापना युद्ध के माध्यम से की, जबकि फ्रांस 1870–71 ई. के फ्रांस-प्रशा युद्ध में मिली पराजय का प्रतिशोध लेने के अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था।
हथियारबंदी की होड़ का आरंभ
युद्ध में विजय के लिए आधुनिक अस्त्र-शस्त्रों और शक्तिशाली सेना की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए 1871 ई. के बाद यूरोप के देशों में सैन्य शक्ति बढ़ाने की तीव्र प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हो गई। प्रत्येक राष्ट्र अपनी सेना को अधिक आधुनिक और शक्तिशाली बनाने का प्रयास करने लगा। एक देश की सैन्य-वृद्धि दूसरे देश के लिए चुनौती बन जाती थी, जिसके परिणामस्वरूप हथियारों की होड़ निरंतर तेज होती गई। हथियारबंदी अंतरराष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख आधार बन गई।
अनिवार्य सैनिक सेवा और सैन्यीकरण
यूरोप के अधिकांश देशों में सैनिक शिक्षा को अनिवार्य बना दिया गया। ब्रिटेन को छोड़कर लगभग सभी यूरोपीय देशों में अनिवार्य सैनिक सेवा लागू कर दी गई। इस व्यवस्था का उद्देश्य युद्ध की स्थिति में बड़ी संख्या में प्रशिक्षित सैनिक उपलब्ध कराना था। अनिवार्य सैनिक सेवा की शुरुआत फ्रांसीसी क्रांति के दौरान फ्रांस ने की थी, जिसे बाद में प्रशा और फिर अन्य यूरोपीय देशों ने भी अपनाया।
सैन्य व्यय और स्थायी सेनाओं का विस्तार
इस काल में यूरोपीय देशों का सैन्य व्यय अभूतपूर्व रूप से बढ़ गया। अनेक देशों ने अपनी राष्ट्रीय आय का अत्यधिक भाग सेना और हथियारों पर खर्च करना प्रारंभ कर दिया। स्थायी सेनाओं का निरंतर विस्तार हुआ तथा आधुनिक हथियारों के निर्माण में तीव्र प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई। किसी राष्ट्र की प्रतिष्ठा का मापदंड उसकी सैन्य शक्ति और हथियारों की क्षमता मानी जाने लगी। परिणामस्वरूप पूरे यूरोप में सैन्यवाद का वातावरण व्याप्त हो गया और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अविश्वास तथा तनाव बढ़ता गया। यही कारण था कि इस काल को ‘अंतरराष्ट्रीय अराजकता’ का युग भी कहा जाता है।

फ्रांस और जर्मनी के बीच सैन्य प्रतिस्पर्धा
सैनिकवाद की इसी पृष्ठभूमि में यूरोप के राष्ट्र एक महायुद्ध की तैयारी कर रहे थे। 1870–71 ई. की पराजय के बाद फ्रांस ने अपने सैन्य संगठन का तीव्र विस्तार किया। इससे जर्मनी को अपनी सुरक्षा के प्रति आशंका हुई और उसने भी बड़े पैमाने पर हथियारबंदी प्रारंभ कर दी। 1885 ई. में फ्रांस की सेना लगभग 5,00,000 तथा जर्मनी की 4,27,000 थी। अगले बीस वर्षों में फ्रांस की सेना बढ़कर 5,45,000 और जर्मनी की 5,05,000 हो गई। इसके बाद भी जर्मनी संतुष्ट नहीं हुआ और 1913 ई. के सैनिक विधेयक के माध्यम से उसने अपनी सेना की संख्या बढ़ाकर लगभग 8,00,000 कर दी। जर्मनी की इस बढ़त का उत्तर देते हुए फ्रांस ने भी नया सैनिक विधेयक पारित कर अपनी सेना का विस्तार किया। इस प्रकार दोनों देशों के बीच हथियारबंदी और सैन्य विस्तार की प्रतिस्पर्धा लगातार तीव्र होती गई, जिसने अंततः प्रथम विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की।
आंग्ल-जर्मन नौसैनिक प्रतिस्पर्धा
इस काल में हथियारबंदी की होड़ का सबसे गंभीर पक्ष ब्रिटेन और जर्मनी के बीच नौसैनिक प्रतिस्पर्धा था। नौसेना ब्रिटेन की राष्ट्रीय सुरक्षा तथा उसके विशाल साम्राज्य की आधारशिला थी। बिस्मार्क इस तथ्य को भली-भाँति समझता था। इसलिए प्रारंभ में वह जर्मनी के औपनिवेशिक विस्तार का विरोधी था। उसका मत था कि उपनिवेशों की स्थापना का अर्थ है नौसेना का विस्तार, और नौसेना का विस्तार ब्रिटेन की शत्रुता को आमंत्रित करना है। बिस्मार्क ऐसा जोखिम उठाने के पक्ष में नहीं था। वह ब्रिटेन के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखना चाहता था। इसी कारण उसने जर्मनी की नौसेना को इस सीमा तक विकसित नहीं होने दिया कि ब्रिटेन उसे अपने लिए खतरा समझे।
बाद में बिस्मार्क जर्मनी के औपनिवेशिक विस्तार का समर्थक अवश्य बन गया, किंतु उसने ब्रिटेन की सद्भावना बनाए रखते हुए ही जर्मनी की औपनिवेशिक नीति का आरंभ किया। परंतु जब कैसर विलियम द्वितीय जर्मनी का शासक बना, तो उसे बिस्मार्क की यह नीति स्वीकार नहीं थी। वह ‘विश्व राजनीति’ का समर्थक था। बिस्मार्क का मानना था कि जर्मनी को केवल अपनी सुरक्षा और यूरोपीय राजनीति तक ही सीमित रहना चाहिए, जबकि कैसर विलियम द्वितीय जर्मनी को विश्व-शक्ति बनाना चाहता था। उसका उद्देश्य था कि जर्मनी विश्व राजनीति में नेतृत्वकारी भूमिका निभाए और उसकी अनुमति के बिना अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय न लिया जा सके।
इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जर्मनी के लिए विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य और शक्तिशाली नौसेना का होना आवश्यक था। जर्मनी के पास पहले से ही एक सुदृढ़ स्थल-सेना थी, किंतु नौसेना अपेक्षाकृत कमजोर थी। कैसर विलियम द्वितीय के लिए यह स्थिति अस्वीकार्य थी। उसका विश्वास था कि बिना शक्तिशाली नौसेना के न तो उपनिवेशों की रक्षा की जा सकती है और न ही विश्व-राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाई जा सकती है। इसलिए उसने नौसेना के तीव्र विस्तार को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बना लिया।
ब्रिटेन-जर्मनी संघर्ष का तीव्र होना
ऐसी परिस्थितियों में ब्रिटेन और जर्मनी के बीच टकराव स्वाभाविक था। ब्रिटेन अपने समुद्री प्रभुत्व को किसी भी कीमत पर चुनौती नहीं देने देना चाहता था। दूसरी ओर, कैसर विलियम द्वितीय के नेतृत्व में जर्मनी की नौसैनिक शक्ति तीव्र गति से बढ़ रही थी। यद्यपि कैसर बार-बार यह दावा करता था कि उसका उद्देश्य ब्रिटेन से संघर्ष नहीं, बल्कि केवल जर्मनी की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, फिर भी ब्रिटिश नेतृत्व उसके वास्तविक इरादों को भली-भाँति समझता था। उन्हें स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि जर्मनी भविष्य में ब्रिटेन के समुद्री वर्चस्व को चुनौती देने वाला सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी बन सकता है।
फलस्वरूप, ब्रिटेन ने नौसैनिक क्षेत्र में जर्मनी का दृढ़ता से मुकाबला करने का निर्णय लिया। इसी के साथ विश्व इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण आंग्ल-जर्मन नौसैनिक प्रतिस्पर्धा का आरंभ हुआ। इस प्रतिस्पर्धा के पीछे प्रमुख प्रेरक स्वयं कैसर विलियम द्वितीय था। उसे नौसैनिक मामलों में सलाह देने वाला सबसे प्रभावशाली व्यक्ति एडमिरल अल्फ्रेड फ़ॉन टिरपिट्ज़ था, जो निरंतर कैसर को नौसेना के विस्तार के लिए प्रेरित करता रहता था।
बोअर युद्ध का प्रभाव
द्वितीय बोअर युद्ध के दौरान जर्मनी ने पहली बार गंभीरता से अनुभव किया कि शक्तिशाली नौसेना के अभाव में वह विश्व राजनीति में प्रभावी हस्तक्षेप नहीं कर सकता। यद्यपि जर्मन जनमत बोअरों के पक्ष में था, फिर भी नौसैनिक शक्ति की कमी के कारण जर्मनी उन्हें कोई ठोस सहायता नहीं दे सका। इस अनुभव ने जर्मन नेतृत्व को यह विश्वास दिलाया कि यदि जर्मनी को विश्व राजनीति में प्रभावशाली स्थान प्राप्त करना है, तो उसकी नौसेना का तीव्र विस्तार अनिवार्य है। एडमिरल टिरपिट्ज़ लगातार कैसर को इसी दिशा में प्रेरित करता रहा, जिसके परिणामस्वरूप जर्मनी और ब्रिटेन के बीच नौसैनिक प्रतिस्पर्धा और अधिक तीव्र होती चली गई।
जर्मनी का नौसैनिक विस्तार का प्रयास
इन्हीं भावनाओं से प्रेरित होकर जर्मन संसद ने 1898 ई. में प्रथम नौसेना विधेयक को पारित किया। इस विधेयक के माध्यम से जर्मन सरकार को एक सुसंगठित नौसैनिक बेड़े के निर्माण की अनुमति मिल गई, जिससे जर्मनी के समुद्री तटों की प्रभावी रक्षा की जा सके। एडमिरल टिरपिट्ज़ ने संसद को आश्वस्त किया कि इस योजना के अनुसार 1904 ई. तक जर्मनी की नौसेना इतनी सशक्त हो जाएगी कि कोई भी राष्ट्र उसकी उपेक्षा नहीं कर सकेगा।
1898 ई. की योजना के अंतर्गत निर्मित जहाजी बेड़ा मुख्यतः जर्मनी के तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त था, किंतु दूरस्थ समुद्री क्षेत्रों में अभियान चलाने की उसकी क्षमता सीमित थी। इसी समय अन्य प्रमुख यूरोपीय राष्ट्र भी अपनी नौसैनिक शक्ति का तीव्र विस्तार कर रहे थे और जर्मनी अभी भी उनसे पीछे था। टिरपिट्ज़ का दृढ़ विश्वास था कि जब तक जर्मनी अपने समुद्री बेड़े का व्यापक विस्तार नहीं करेगा, तब तक वह विश्व राजनीति में एक महाशक्ति के रूप में अपना उचित स्थान प्राप्त नहीं कर सकेगा।
इसी विचार का समर्थन करते हुए जर्मन चांसलर बर्नहार्ड फ़ॉन बूलो ने कहा : ‘तूफ़ान किसी भी क्षण उठ सकते हैं। भूमि अथवा समुद्र पर होने वाले किसी भी आकस्मिक आक्रमण का सामना करने के लिए हमें सदैव तैयार रहना चाहिए। हमारे पास इतना शक्तिशाली नौसैनिक बेड़ा होना चाहिए कि वह किसी भी महान राष्ट्र के आक्रमण को रोक सके। अब द्वितीय नौसेना विधेयक प्रस्तुत करने का उपयुक्त समय आ गया है।’
फलस्वरूप, 1900 ई. में द्वितीय नौसेना विधेयक भी जर्मन संसद द्वारा पारित कर दिया गया। इस विधेयक का उद्देश्य जर्मनी की नौसैनिक शक्ति को लगभग दोगुना करना था। इसके अंतर्गत 16 वर्षों में 34 युद्धपोत निर्मित किए जाने थे। साथ ही, क्रूज़र, टॉरपीडो नौकाओं तथा अन्य सहायक युद्धपोतों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि का प्रावधान किया गया।
1900 ई. के इस विधेयक का वास्तविक उद्देश्य जर्मनी के नौसैनिक बेड़े को इतना शक्तिशाली बनाना था कि उसके विरुद्ध किसी भी प्रमुख नौसैनिक शक्ति, विशेषकर ब्रिटेन की समुद्री श्रेष्ठता चुनौती के घेरे में आ जाए। चांसलर बूलो ने स्पष्ट शब्दों में कहा—’हम किसी पर आक्रमण करने का विचार नहीं रखते, किंतु हमारी उपेक्षा भी नहीं की जा सकती।’
इस प्रकार बीसवीं शताब्दी के आरंभ में जर्मनी ने अपनी नौसैनिक शक्ति के तीव्र विस्तार के लिए संगठित और व्यापक प्रयास प्रारंभ किए, जिसने ब्रिटेन और जर्मनी के बीच नौसैनिक प्रतिस्पर्धा को और अधिक तीव्र बना दिया।
ब्रिटिश प्रतिक्रिया और नौसैनिक प्रतिस्पर्धा
ब्रिटेन की बढ़ती चिंता
यद्यपि प्रारंभिक वर्षों में जर्मनी की नौसैनिक शक्ति ब्रिटेन के समुद्री वर्चस्व को चुनौती देने की स्थिति में नहीं थी, फिर भी 1904 ई. तक जर्मनी के तीव्र नौसैनिक विस्तार ने ब्रिटेन की चिंताओं को बढ़ा दिया। इससे पहले ब्रिटेन कई बार जर्मनी के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने का प्रयास कर चुका था, किंतु जर्मनी ने उन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया। परिणामस्वरूप, ब्रिटेन ने अपनी पारंपरिक ‘शानदार पृथकता’ की नीति का परित्याग कर दिया। उसने पहले 1902 ई. में जापान और बाद में 1904 ई. में फ्रांस के साथ संधियाँ करके अपनी कूटनीतिक स्थिति को सुदृढ़ किया तथा जर्मनी की बढ़ती नौसैनिक शक्ति का मुकाबला करने की तैयारी आरंभ कर दी।
ब्रिटिश नौसेना का आधुनिकीकरण
ब्रिटेन ने 1903 ई. में स्कॉटलैंड के रोजाइथ में एक प्रथम श्रेणी का नौसैनिक अड्डा स्थापित करने का निर्णय लिया। साथ ही, प्रतिवर्ष चार नए युद्धपोतों के निर्माण की योजना भी स्वीकृत की गई। 1904 ई. में सर जॉन फिशर को ब्रिटिश नौसेना का प्रथम समुद्री लॉर्ड नियुक्त किया गया। उनके नेतृत्व में ब्रिटिश नौसेना का व्यापक पुनर्गठन किया गया। पुराने और अप्रचलित युद्धपोतों को सेवा से हटाया गया तथा अधिकांश आधुनिक जहाजों को यूरोप के निकटवर्ती समुद्री क्षेत्रों में तैनात किया गया।
‘ड्रेडनॉट’ युद्धपोत का निर्माण
अक्टूबर 1905 ई. से ब्रिटेन ने ‘ड्रेडनॉट’ नामक अत्याधुनिक युद्धपोत का निर्माण प्रारंभ किया। यह अपने समय का सबसे बड़ा, सबसे तेज़ और सबसे अधिक शक्तिशाली हथियारों से सुसज्जित युद्धपोत था। इसके निर्माण ने विश्व नौसैनिक इतिहास में एक नई क्रांति ला दी। ड्रेडनॉट के सामने पुराने प्रकार के सभी युद्धपोत लगभग अप्रासंगिक हो गए।

जर्मनी की प्रत्युत्तरात्मक नीति
ब्रिटेन द्वारा ड्रेडनॉट के निर्माण के बाद एडमिरल टिरपिट्ज़ ने एक नई रणनीति अपनाई। उसका विचार था कि चूँकि ड्रेडनॉट अभी एक नई तकनीक का युद्धपोत है और ब्रिटेन ने भी इसका बड़े पैमाने पर निर्माण नहीं किया है, इसलिए यदि जर्मनी तुरंत इसी प्रकार के युद्धपोतों का निर्माण प्रारंभ कर दे, तो वह शीघ्र ही ब्रिटेन की बराबरी कर सकता है। टिरपिट्ज़ का यह आकलन निराधार नहीं था। परिणामस्वरूप, जर्मनी ने भी ड्रेडनॉट श्रेणी के युद्धपोतों का निर्माण आरंभ कर दिया।
इसके बाद ब्रिटेन ने कई बार जर्मनी के साथ नौसैनिक प्रतिस्पर्धा को सीमित करने के उद्देश्य से समझौते का प्रयास किया, किंतु कोई सफलता नहीं मिली। परिणामस्वरूप, दोनों देशों के बीच नौसैनिक शस्त्र-प्रतिस्पर्धा निरंतर तीव्र होती गई।
हथियारबंदी की आर्थिक और राजनीतिक परिणतियाँ
विशाल सेनाओं और आधुनिक हथियारों के निर्माण से सैन्य-व्यय अत्यधिक बढ़ गया। 1873 ई. में यूरोप के विभिन्न देश सेना और युद्ध सामग्री पर कुल मिलाकर लगभग 115 करोड़ रुपये खर्च करते थे, जबकि 1913 ई. तक यह राशि बढ़कर लगभग 568 करोड़ 20 लाख रुपये हो गई। राष्ट्रीय आय का विशाल भाग युद्ध की तैयारियों पर व्यय होने लगा। इसका बोझ अंततः करदाताओं पर पड़ा और राष्ट्रीय विकास के लिए उपलब्ध संसाधन सीमित होते गए। परिणामस्वरूप, यूरोप में यह भावना बलवती होने लगी कि निरंतर बढ़ता सैन्य व्यय दीर्घकाल में विनाशकारी सिद्ध होगा।
इसी पृष्ठभूमि में सैनिकवाद को नियंत्रित करने तथा हथियारबंदी की होड़ को सीमित करने के प्रयास प्रारंभ हुए।
प्रथम हेग सम्मेलन (1899 ई.)
सैन्यवाद को नियंत्रित करने का पहला संगठित सरकारी प्रयास 1899 ई. में रूस के जार निकोलस द्वितीय की पहल पर हुआ। 18 मई 1899 ई. को हेग में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें 26 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन का प्रमुख उद्देश्य हथियारबंदी की होड़ को नियंत्रित करना तथा अंतरराष्ट्रीय शांति को प्रोत्साहित करना था।

रूस ने प्रस्ताव रखा कि कम-से-कम पाँच वर्षों तक सभी राष्ट्र अपनी सेना की संख्या और सैन्य बजट में कोई वृद्धि न करें। किंतु जर्मनी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से स्पष्ट इनकार कर दिया। उसके विरोध के कारण सम्मेलन अपने मूल उद्देश्य में सफल नहीं हो सका। फिर भी सम्मेलन ने एक सामान्य प्रस्ताव पारित किया, जिसमें यह कहा गया कि मानवता के हित में सभी देशों को अपने सैन्य व्यय में कमी करने का प्रयास करना चाहिए। इसके बाद 29 जुलाई 1899 ई. को सम्मेलन समाप्त हो गया।
द्वितीय हेग सम्मेलन (1907 ई.)
प्रथम हेग सम्मेलन की असफलता के बाद भी शस्त्रीकरण की गति कम नहीं हुई। इसके विपरीत, द्वितीय बोअर युद्ध (1899–1902 ई.), रूस-जापान युद्ध (1904–05 ई.) तथा ब्रिटेन-जर्मनी की नौसैनिक प्रतिस्पर्धा ने अंतरराष्ट्रीय तनाव को और अधिक बढ़ा दिया। यूरोप की राजनीतिक स्थिति अत्यंत जटिल होती जा रही थी।
इन परिस्थितियों में जार निकोलस द्वितीय ने पुनः पहल करते हुए 15 जून 1907 ई. को हेग में 44 देशों का दूसरा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया। इस सम्मेलन में भी निरस्त्रीकरण, युद्ध के कानूनों, युद्धबंदियों के संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर विचार किया गया। इस सम्मेलन में कुल 13 कन्वेंशन (संधियाँ) की गईं। किंतु विभिन्न राष्ट्रों के परस्पर विरोधी हितों और अविश्वास के कारण कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जा सका। अंततः 18 अक्टूबर 1907 ई. को सम्मेलन बिना किसी महत्त्वपूर्ण सफलता के समाप्त हो गया।

हेग सम्मेलनों की उपलब्धियाँ और सीमाएँ
यूरोप के इतिहास में 1899 ई. और 1907 ई. के दोनों हेग सम्मेलनों का विशेष महत्त्व है। आधुनिक युग में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरस्त्रीकरण की दिशा में ये प्रथम संगठित प्रयास थे। यद्यपि ये सम्मेलन अपने मुख्य उद्देश्य—हथियारबंदी की होड़ को रोकने में सफल नहीं हो सके, फिर भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग और शांति स्थापना की दिशा में इनका ऐतिहासिक योगदान महत्त्वपूर्ण रहा।
असफलता के प्रमुख कारण
रूस के उद्देश्य पर अविश्वास
हेग सम्मेलनों की असफलता का प्रमुख कारण रूस के प्रस्तावों पर अन्य देशों का अविश्वास था। अनेक यूरोपीय राष्ट्रों का मानना था कि निरस्त्रीकरण का प्रस्ताव वास्तव में रूसी साम्राज्यवादियों की एक कूटनीतिक चाल था। उस समय रूस सैन्य दृष्टि से अपेक्षाकृत कमजोर था और हथियारों की दौड़ में अन्य महाशक्तियों से पीछे चल रहा था। इसलिए यह माना गया कि रूस अपनी सैन्य शक्ति को पुनर्गठित करने और समय प्राप्त करने के उद्देश्य से निरस्त्रीकरण का समर्थन कर रहा था।
इसके अतिरिक्त, रूस-जापान युद्ध (1904–05 ई.) में जापान से पराजित होने के कारण रूस की सैन्य प्रतिष्ठा को गंभीर आघात पहुँचा था। दूसरी ओर, उसके प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र अपनी सैन्य शक्ति का निरंतर विस्तार कर रहे थे। ऐसी परिस्थितियों में अधिकांश देशों ने रूस के प्रस्तावों को संदेह की दृष्टि से देखा। निरस्त्रीकरण जैसी संवेदनशील समस्या का समाधान तभी संभव था, जब सभी राष्ट्र पारस्परिक विश्वास और सद्भावना के साथ विचार करते; किंतु उस समय यूरोप में ऐसा वातावरण बिल्कुल नहीं था।
शस्त्र उद्योग और पूँजीपति वर्ग का प्रभाव
हेग सम्मेलनों की असफलता का दूसरा महत्त्वपूर्ण कारण यूरोप में विकसित हो चुका शक्तिशाली शस्त्र उद्योग और पूँजीपति वर्ग था। इस वर्ग के आर्थिक हित हथियारों के निरंतर उत्पादन और सैन्य व्यय में वृद्धि से जुड़े हुए थे। राजनीतिक रूप से भी उनका सरकारों पर पर्याप्त प्रभाव था।
जब भी निरस्त्रीकरण पर विचार करने के लिए कोई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित होता, यह प्रभावशाली वर्ग अपनी-अपनी सरकारों पर दबाव डालता था कि वे सैन्य शक्ति में कमी संबंधी किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार न करें। परिणामस्वरूप, सरकारें भी उनके आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव की उपेक्षा नहीं कर पाती थीं। इसलिए दोनों हेग सम्मेलनों की असफलता के लिए शस्त्र उद्योग से जुड़े हित समूहों को भी काफी हद तक उत्तरदायी माना जाता है।
जर्मनी का विरोध
हेग सम्मेलनों की असफलता का एक प्रमुख कारण जर्मनी का कठोर रुख भी था। जर्मनी ने अधिकांश निरस्त्रीकरण प्रस्तावों का विरोध किया। उसका तर्क था कि उस समय की जटिल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में वह अपनी सैन्य शक्ति कम नहीं कर सकता। एक ओर फ्रांस उसकी पराजय का प्रतिशोध लेने के लिए तत्पर था और दूसरी ओर रूस के नेतृत्व में स्लाव शक्तियाँ उसके लिए चुनौती बनी हुई थीं। ऐसी स्थिति में जर्मन नेतृत्व के अनुसार निरस्त्रीकरण राष्ट्रीय सुरक्षा के विरुद्ध था।
विशेष रूप से कैसर विलियम द्वितीय सेना और नौसेना में कमी संबंधी किसी भी प्रस्ताव से अत्यंत असंतुष्ट रहता था। उसके मत में ऐसे प्रस्ताव जर्मनी की राष्ट्रीय संप्रभुता और महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा के विरुद्ध थे। इसलिए जर्मनी की ओर से निरस्त्रीकरण के प्रति कोई सकारात्मक पहल नहीं हुई।
हेग सम्मेलनों की उपलब्धियाँ
यद्यपि हेग सम्मेलन निरस्त्रीकरण के अपने मूल उद्देश्य में सफल नहीं हो सके, फिर भी उनके महत्त्व को कम नहीं माना जा सकता है। इन सम्मेलनों ने अंतरराष्ट्रीय विधि के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। युद्ध संचालन के अनेक नियमों को अधिक मानवीय बनाने का प्रयास किया गया तथा युद्ध के दौरान मानवीय व्यवहार संबंधी सिद्धांतों को प्रोत्साहित किया गया।
हेग सम्मेलनों की सबसे बड़ी उपलब्धि स्थायी पंचाट न्यायालय की स्थापना थी। यह पहली ऐसी अंतरराष्ट्रीय संस्था थी, जिसका उद्देश्य विभिन्न देशों के बीच उत्पन्न विवादों का शांतिपूर्ण और कानूनी समाधान करना था। स्थापना के बाद इस न्यायालय ने अनेक अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।
इस प्रकार निरस्त्रीकरण के क्षेत्र में हेग सम्मेलनों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली और यूरोप में हथियारबंदी की होड़ निरंतर जारी रही। फिर भी इन सम्मेलनों ने अंतरराष्ट्रीय कानून के विकास, युद्ध के मानवीय नियमों के निर्माण तथा विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की परंपरा स्थापित करने में ऐतिहासिक योगदान दिया। इस दृष्टि से हेग सम्मेलन आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के विकास की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध हुए।




