अफ्रीका का विभाजन
अफ्रीका का विभाजन से तात्पर्य 1881 ई. से 1914 ई. के बीच यूरोपीय शक्तियों द्वारा अफ्रीका के विभिन्न क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित करने, उनका उपनिवेशीकरण करने तथा उन्हें आपस में बाँट लेने की प्रक्रिया से है। इसे ‘अफ्रीका के लिए प्रतिद्वंद्विता’ तथा ‘अफ्रीका की विजय’ भी कहा जाता है। यह काल नव साम्राज्यवाद के उत्कर्ष का प्रतीक माना जाता है।
1870 ई. तक अफ्रीका के केवल लगभग 10 प्रतिशत भाग पर यूरोपीय शक्तियों का नियंत्रण था, किंतु 1914 ई. तक लगभग 90 प्रतिशत अफ्रीका उनके अधीन आ चुका था। केवल अबीसीनिया (इथियोपिया) और लाइबेरिया ही स्वतंत्र रह सके। 1884–85 ई. में आयोजित बर्लिन सम्मेलन ने अफ्रीका के विभाजन को औपचारिक रूप प्रदान किया तथा उपनिवेशों के अधिग्रहण के नियम निर्धारित किए। यद्यपि यूरोपीय शक्तियों के बीच तीव्र राजनीतिक और आर्थिक प्रतिस्पर्धा थी, फिर भी उन्होंने अधिकांश अफ्रीका का विभाजन आपसी समझौतों और कूटनीति के माध्यम से कर लिया। इस प्रक्रिया ने यूरोपीय साम्राज्यवाद को नई शक्ति प्रदान की, जबकि अफ्रीकी देशों की राजनीतिक स्वतंत्रता, आर्थिक संसाधनों और सामाजिक संरचना पर इसका अत्यंत गहरा और दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक अफ्रीका को यूरोप में ‘अंध महाद्वीप’ कहा जाता था। यद्यपि यह महाद्वीप यूरोप के अत्यंत निकट स्थित था, फिर भी यूरोपीय देशों को इसके आंतरिक भूगोल, प्राकृतिक संसाधनों, समाज और संस्कृति के बारे में बहुत कम जानकारी थी। उस समय यूरोपीय व्यापारियों का अफ्रीका से मुख्य संबंध दास व्यापार तक ही सीमित था। वे अफ्रीकी लोगों को पकड़कर अमेरिका ले जाते थे और उन्हें दासों के रूप में बेचते थे। यूरोपीय शक्तियाँ केवल उत्तरी अफ्रीका के कुछ क्षेत्रों—जैसे मिस्र, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया और मोरक्को—तथा कुछ समुद्री तटीय भागों से ही परिचित थीं। अफ्रीका के घने वन, विशाल नदियाँ, विस्तृत मरुस्थल, दुर्गम पर्वत और विविध जनजातियाँ यूरोपवासियों के लिए रहस्य और कौतूहल का विषय थीं। कठिन प्राकृतिक परिस्थितियों, उष्णकटिबंधीय रोगों तथा दुर्गम भू-भाग के कारण लंबे समय तक यूरोपीय शक्तियों ने अफ्रीका के आंतरिक क्षेत्रों में प्रवेश करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया। किंतु उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से खोज यात्राओं, भौगोलिक अन्वेषणों और प्राकृतिक संसाधनों की जानकारी बढ़ने लगी। परिणामस्वरूप अफ्रीका के आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक महत्त्व का बोध हुआ तथा यूरोपीय शक्तियों का ध्यान इस महाद्वीप की ओर तीव्र गति से आकर्षित होने लगा।
अफ्रीका के विभाजन के कारण
अफ्रीका का विभाजन किसी एक कारण का परिणाम नहीं था, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक, आर्थिक, सामरिक, धार्मिक तथा साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं का संयुक्त प्रभाव कार्य कर रहा था। 1798 ई. में नेपोलियन बोनापार्ट ने मिस्र पर आक्रमण करके सबसे पहले अफ्रीका के सामरिक महत्त्व को स्पष्ट किया। उसका उद्देश्य मिस्र और सीरिया के स्थल मार्ग पर अधिकार स्थापित कर भारत से ब्रिटेन के संपर्क को बाधित करना था। यद्यपि नेपोलियन अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका, फिर भी उसके अभियान ने यूरोपीय शक्तियों का ध्यान अफ्रीका की ओर आकर्षित कर दिया।
उन्नीसवीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप यूरोपीय देशों को अपने उद्योगों के लिए कच्चे माल, नए बाज़ारों तथा निवेश के सुरक्षित क्षेत्रों की आवश्यकता थी। अफ्रीका सोना, हीरा, ताँबा, हाथी-दाँत तथा अन्य बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध था, इसलिए वह यूरोपीय शक्तियों के लिए अत्यंत आकर्षक बन गया। दूसरी ओर, एशिया के अधिकांश उपयुक्त क्षेत्रों पर पहले से विभिन्न शक्तियों का प्रभाव स्थापित हो चुका था तथा मुनरो सिद्धांत के कारण यूरोपीय राष्ट्र अमेरिका में अपने साम्राज्य का विस्तार नहीं कर सकते थे। परिणामस्वरूप उनका ध्यान अफ्रीका की ओर केंद्रित हुआ।
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में यूरोप में उग्र राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद का तीव्र विकास हुआ। जर्मनी और इटली जैसे नव-एकीकृत राष्ट्र भी इंग्लैंड और फ्रांस की भाँति विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित कर अपनी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा बढ़ाना चाहते थे। उपनिवेश राष्ट्रीय शक्ति, गौरव और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के प्रतीक माने जाने लगे। इसी कारण यूरोपीय देशों के बीच अफ्रीका पर अधिकार स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा तीव्र हो गई।
इसके अतिरिक्त, ईसाई मिशनरियों ने अफ्रीका में धर्म-प्रचार तथा पाश्चात्य शिक्षा और संस्कृति के प्रसार का कार्य किया। खोज यात्राओं और मिशनरियों की गतिविधियों ने अफ्रीका के भीतरी भागों की जानकारी यूरोप तक पहुँचाई, जिससे साम्राज्यवादी विस्तार को और प्रोत्साहन मिला। इसी प्रकार यूरोपीय महाशक्तियाँ अपनी सैन्य शक्ति और समुद्री प्रभुत्व का प्रदर्शन करने के लिए भी अधिकाधिक उपनिवेश प्राप्त करना चाहती थीं।
ब्रिटेन द्वारा 1807 ई. में दास व्यापार पर प्रतिबंध तथा 1833 ई. में दास-प्रथा के उन्मूलन के बाद पश्चिमी अफ्रीका के तट पर उसकी नौसैनिक गतिविधियाँ बढ़ीं। यद्यपि इसका घोषित उद्देश्य अवैध दास व्यापार को रोकना था, किंतु इसके माध्यम से ब्रिटेन ने अफ्रीका में अपना राजनीतिक और सामरिक प्रभाव भी सुदृढ़ कर लिया। इस प्रकार आर्थिक स्वार्थ, सामरिक हित, राष्ट्रवाद, धर्म-प्रचार तथा साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा जैसे अनेक कारणों ने मिलकर अफ्रीका के विभाजन की प्रक्रिया को जन्म दिया।
अफ्रीका के विभाजन की विशेषताएँ
अफ्रीका का विभाजन अनेक दृष्टियों से विशिष्ट था, जिसने न केवल यूरोप की राजनीति को प्रभावित किया, बल्कि अफ्रीका के इतिहास, समाज और अर्थव्यवस्था को भी गहराई से बदल दिया। अफ्रीका के विभाजन की सबसे प्रमुख विशेषता यह थी कि इसका अधिकांश भाग यूरोपीय शक्तियों के बीच प्रत्यक्ष युद्ध के बिना ही बाँट लिया गया। यद्यपि ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम तथा अन्य यूरोपीय देशों के बीच अफ्रीका के विभिन्न क्षेत्रों को लेकर कई बार गंभीर मतभेद उत्पन्न हुए और अनेक अवसरों पर युद्ध की संभावना भी दिखाई दी, फिर भी अधिकांश विवाद कूटनीति, संधियों और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों के माध्यम से सुलझा लिए गए। विशेष रूप से 1884–85 ई. के बर्लिन सम्मेलन ने उपनिवेशों के अधिग्रहण के नियम निर्धारित किए और यूरोपीय शक्तियों के बीच प्रत्यक्ष संघर्ष की संभावना को काफी हद तक कम कर दिया। इस प्रकार यूरोपीय देशों ने आपसी युद्ध से बचते हुए अफ्रीका के विशाल भूभाग का विभाजन कर लिया।
अफ्रीका के विभाजन की दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषता इसकी अत्यधिक तीव्र गति थी। लगभग 25 से 30 वर्षों के अल्प समय में ही अफ्रीका का अधिकांश भाग यूरोपीय शक्तियों के अधिकार में चला गया। इसका प्रमुख कारण उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जर्मनी और इटली जैसे नव-एकीकृत राष्ट्रों का साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा में शामिल होना था। ये दोनों राष्ट्र शीघ्र-से-शीघ्र अपने औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित करना चाहते थे। दूसरी ओर, पहले से उपनिवेशवादी प्रतिस्पर्धा में अग्रणी ब्रिटेन और फ्रांस भी अधिकाधिक क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित करने में जुट गए। परिणामस्वरूप अफ्रीका के विभिन्न भागों पर अधिकार स्थापित करने की होड़ इतनी तीव्र हो गई कि कुछ ही वर्षों में लगभग सम्पूर्ण महाद्वीप यूरोपीय शक्तियों के बीच बाँट लिया गया।

अफ्रीका के विभाजन की तीसरी प्रमुख विशेषता यह थी कि अधिकांश स्थानीय शासक, जनजातीय प्रमुख और छोटे-छोटे राज्य यूरोपीय शक्तियों का प्रभावी प्रतिरोध नहीं कर सके। इसका प्रमुख कारण उनकी राजनीतिक असंगठितता, आधुनिक सैन्य तकनीक का अभाव, पारस्परिक संघर्ष तथा यूरोपीय कूटनीति से अपरिचित होना था। अनेक अवसरों पर यूरोपीय अधिकारी स्थानीय सरदारों से ऐसी संधियों पर हस्ताक्षर करा लेते थे, जिनका वास्तविक अर्थ वे स्वयं भी नहीं समझते थे। कई बार थोड़े-से उपहार, शराब अथवा तात्कालिक लाभ के बदले वे अपने विशाल भूभागों पर अधिकार संबंधी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर देते थे। दूसरी ओर लंदन, पेरिस, ब्रुसेल्स और बर्लिन में बैठे साम्राज्यवादी नेता मानचित्रों पर रेखाएँ खींचकर अफ्रीका की सीमाएँ निर्धारित कर देते थे, जबकि स्थानीय जनता को इसकी कोई जानकारी तक नहीं होती थी। यही कारण था कि बाद में अनेक कृत्रिम सीमाएँ अस्तित्व में आईं।
1875 ई. से पूर्व अफ्रीका का केवल सीमित भाग ही यूरोपीय शक्तियों के अधिकार में था। 1830 ई. में फ्रांस ने अल्जीरिया पर अधिकार स्थापित किया और धीरे-धीरे उत्तर अफ्रीका में अपना प्रभाव बढ़ाया। दक्षिणी अफ्रीका में 1806 ई. में ब्रिटेन ने केप कॉलोनी पर अधिकार कर लिया तथा 1843 ई. में नेटाल को अपने अधीन कर लिया। पुर्तगाल के अधिकार में पश्चिमी तट पर अंगोला और पूर्वी तट पर मोजाम्बिक थे। पश्चिमी अफ्रीका में फ्रांस के अधीन सेनेगल, गैबॉन और आइवरी कोस्ट, ब्रिटेन के अधीन गाम्बिया, सिएरा लियोन, गोल्ड कोस्ट (घाना), लागोस तथा नाइजर नदी का मुहाना, जबकि स्पेन के अधीन रियो डी ओरो तथा स्पेनिश गिनी जैसे क्षेत्र थे। इसके बावजूद अफ्रीका का विशाल आंतरिक भाग यूरोपीय नियंत्रण से बाहर था।
अफ्रीका के भीतरी भागों का अन्वेषण प्रारंभ में किसी यूरोपीय सरकार ने नहीं किया। यह कार्य मुख्यतः ईसाई धर्म-प्रचारकों, भूगोलविदों तथा खोजयात्रियों ने किया। इनमें डॉ. डेविड लिविंगस्टोन का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने मध्य और दक्षिणी अफ्रीका के विशाल क्षेत्रों की यात्राएँ कीं तथा वहाँ की नदियों, झीलों, प्राकृतिक संसाधनों और जनजातीय जीवन का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया। बाद में हेनरी मॉर्टन स्टैनली जैसे खोजयात्रियों ने भी कांगो क्षेत्र का अन्वेषण किया। इन यात्राओं से यूरोप को अफ्रीका की अपार प्राकृतिक संपदा, व्यापारिक संभावनाओं तथा सामरिक महत्त्व की जानकारी मिली, जिससे यूरोपीय शक्तियों की रुचि इस महाद्वीप की ओर तीव्र गति से बढ़ी।
जैसे-जैसे अफ्रीका के संसाधनों और व्यापारिक संभावनाओं का ज्ञान बढ़ा, वैसे-वैसे यूरोप की प्रमुख शक्तियाँ इस महाद्वीप पर अधिकार स्थापित करने के लिए प्रतिस्पर्धा करने लगीं। प्रत्येक राष्ट्र अधिक-से-अधिक भूमि, खनिज संपदा, व्यापारिक मार्ग और सामरिक क्षेत्रों पर अधिकार चाहता था। कुछ ही वर्षों में अफ्रीका साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। यूरोपीय शक्तियाँ इस प्रकार अफ्रीका पर टूट पड़ीं मानो कोई शिकारी अपने शिकार पर झपटता हो। परिणामस्वरूप 1890 ई. के आसपास तक अफ्रीका का अधिकांश भाग यूरोपीय साम्राज्यों के बीच बाँटा जा चुका था और नवीन साम्राज्यवाद अपने सबसे स्पष्ट एवं आक्रामक रूप में विश्व राजनीति के सामने प्रकट हुआ।
अफ्रीका का विभाजन
प्रारंभिक घटनाएँ
अफ्रीका में संगठित रूप से प्रवेश करने का प्रथम महत्त्वपूर्ण प्रयास बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड द्वितीय ने किया। वह डॉ. लिविंगस्टोन तथा हेनरी मॉर्टन स्टैनली की खोज यात्राओं से अत्यंत प्रभावित था। 1876 ई. में उसने ब्रुसेल्स में यूरोपीय राष्ट्रों का एक अंतरराष्ट्रीय भौगोलिक सम्मेलन आयोजित किया, जिसका घोषित अफ्रीका के भौगोलिक अन्वेषण, वैज्ञानिक अध्ययन तथा वहाँ के विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना था। इसी सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय अफ्रीका संघ की स्थापना की गई और विभिन्न देशों में इसकी शाखाएँ खोलने का निर्णय लिया गया। किंतु शीघ्र ही इस संस्था का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप समाप्त हो गया और शीघ्र ही प्रत्येक यूरोपीय शक्ति ने अफ्रीका में अपने-अपने साम्राज्यवादी हितों के अनुसार कार्य करना प्रारंभ कर दिया।
1878 ई. में प्रसिद्ध अन्वेषक हेनरी मॉर्टन स्टैनली अपनी अफ्रीका यात्रा पूर्ण कर यूरोप लौटे। उनकी खोजों ने अफ्रीका, विशेषकर कांगो क्षेत्र, के प्रति यूरोपीय देशों की रुचि को अत्यधिक बढ़ा दिया। स्टैनली ब्रिटिश नागरिक थे और प्रारंभ में चाहते थे कि उनकी खोजों का लाभ ब्रिटेन को प्राप्त हो, किंतु तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उनके प्रस्तावों में विशेष रुचि नहीं दिखाई। इस स्थिति का लाभ उठाते हुए बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड द्वितीय ने उन्हें अपने संरक्षण में कार्य करने का प्रस्ताव दिया, जिसे स्टैनली ने स्वीकार कर लिया।
अफ्रीका पहुँचने के बाद स्टैनली ने मुख्यतः कांगो क्षेत्र में अपना कार्य प्रारंभ किया। उन्होंने स्थानीय अफ्रीकी सरदारों और जनजातीय प्रमुखों के साथ अनेक संधियाँ संपन्न कराईं। इन संधियों के वास्तविक राजनीतिक और कानूनी परिणामों से अधिकांश स्थानीय शासक अनभिज्ञ थे। अनेक अवसरों पर भय, दबाव, प्रलोभन और छल का सहारा लेकर उनसे ऐसे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करा लिए गए, जिनके माध्यम से उनके विशाल भूभागों पर यूरोपीय अधिकार स्थापित कर लिया गया। परिणामस्वरूप कुछ ही वर्षों में लियोपोल्ड द्वितीय ने स्टैनली के सहयोग से कांगो क्षेत्र में अपना प्रभाव सुदृढ़ कर लिया और आगे चलकर कांगो फ्री स्टेट की स्थापना की।
कांगो में बेल्जियम के बढ़ते प्रभाव ने अन्य यूरोपीय शक्तियों को भी चिंतित कर दिया। परिणामस्वरूप ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और पुर्तगाल भी अफ्रीका में अपने-अपने उपनिवेश स्थापित करने की होड़ में शामिल हो गए। पुर्तगाल ने कांगो क्षेत्र के कुछ भागों पर अपना दावा प्रस्तुत किया, जबकि अन्य यूरोपीय देशों ने स्थानीय शासकों से संधियाँ करके अपने प्रभाव क्षेत्रों का विस्तार करना प्रारंभ कर दिया। इन शक्तियों ने यह प्रचार किया कि उनका उद्देश्य अफ्रीका में सभ्यता, शिक्षा और ईसाई धर्म का प्रसार करना है, किंतु वास्तव में उनका लक्ष्य राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना, प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार प्राप्त करना तथा आर्थिक शोषण करना था। इस प्रकार कांगो की घटनाओं ने अफ्रीका के विभाजन की प्रक्रिया को अत्यधिक तीव्र बना दिया।
इन परिस्थितियों में बेल्जियम, पुर्तगाल, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के बीच गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए। उपनिवेशों को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा से यूरोप में व्यापक संघर्ष की आशंका दिखाई देने लगी। इसलिए यह आवश्यक समझा गया कि सभी प्रमुख यूरोपीय शक्तियाँ एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में एकत्र होकर अफ्रीका के विभाजन तथा उपनिवेशों के अधिग्रहण के संबंध में सामान्य सिद्धांत निर्धारित करें। इसी उद्देश्य से 1884–85 ई. में बर्लिन सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसने अफ्रीका के विभाजन के लिए औपचारिक नियम निर्धारित किए।
1884–85 ई. का बर्लिन सम्मेलन
अफ्रीका में यूरोपीय शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा और सीमा-विवाद के कारण उन्नीसवीं शताब्दी के आठवें दशक तक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी कि किसी भी समय उनके बीच युद्ध छिड़ सकता था। बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड द्वितीय की कांगो क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों, पुर्तगाल के क्षेत्रीय दावे, फ्रांस और ब्रिटेन की विस्तारवादी नीतियों तथा जर्मनी के औपनिवेशिक क्षेत्र में प्रवेश से परिस्थिति अत्यंत जटिल हो गई। ऐसी स्थिति में अफ्रीका में उपनिवेशों के अधिग्रहण के नियम निर्धारित करने, सीमा संबंधी विवादों का समाधान करने तथा यूरोपीय शक्तियों के बीच टकराव को रोकने के उद्देश्य से 15 नवंबर 1884 से 26 फरवरी 1885 ई. तक जर्मनी की राजधानी बर्लिन में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता जर्मनी के चांसलर ओट्टो फ़ॉन बिस्मार्क ने की।

इस सम्मेलन में स्विट्ज़रलैंड को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख यूरोपीय देशों तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। लगभग तीन महीने तक चली विस्तृत विचार-विमर्श की प्रक्रिया के बाद एक सामान्य अधिनियम तैयार किया गया, जिस पर सभी प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए। बर्लिन सम्मेलन आधुनिक साम्राज्यवाद के इतिहास की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना सिद्ध हुआ, क्योंकि इसी सम्मेलन ने अफ्रीका के औपनिवेशिक विभाजन के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों और सिद्धांतों का निर्धारण किया।
सम्मेलन के समक्ष मुख्यतः तीन महत्त्वपूर्ण प्रश्न थे। पहला, कांगो प्रदेश की राजनीतिक स्थिति का निर्धारण करना; दूसरा, नाइजर नदी क्षेत्र के व्यापार तथा प्रशासन के संबंध में व्यवस्था करना तथा तीसरा, भविष्य में अफ्रीका के अन्य प्रदेशों पर यूरोपीय शक्तियों द्वारा अधिकार स्थापित करने के लिए समान नियम निर्धारित करना।
कांगो प्रदेश के संबंध में सम्मेलन ने यह निर्णय दिया कि अंतरराष्ट्रीय अफ्रीका संघ के अधीन कांगो नदी के विस्तृत प्रवाह क्षेत्र को ‘कांगो फ्री स्टेट’ के रूप में मान्यता प्रदान की जाए। यद्यपि नाम के अनुसार यह एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय राज्य था, परंतु व्यवहार में इसका नियंत्रण पूर्णतः बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड द्वितीय के हाथों में रहा। साथ ही यह भी निर्धारित किया गया कि कांगो क्षेत्र का व्यापार सभी राष्ट्रों के लिए समान रूप से खुला रहेगा और कांगो नदी में नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय आयोग उसकी देखरेख करेगा।
नाइजर नदी के संबंध में भी लगभग इसी प्रकार की व्यवस्था की गई। नाइजर नदी के जलमार्ग को सभी देशों के लिए व्यापार हेतु खुला रखा गया। इस क्षेत्र में ब्रिटेन और फ्रांस के विशेष हितों को स्वीकार किया गया तथा नदी के नौवहन और व्यापारिक व्यवस्था के संचालन में ब्रिटेन को महत्त्वपूर्ण अधिकार प्राप्त हुए।
सम्मेलन का सबसे महत्त्वपूर्ण निर्णय उपनिवेशों की स्थापना के सिद्धांत से संबंधित था। यह निश्चित किया गया कि भविष्य में किसी भी यूरोपीय राष्ट्र का किसी प्रदेश पर अधिकार तभी मान्य माना जाएगा, जब वह वहाँ वास्तविक और प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर चुका हो। साथ ही यह भी आवश्यक कर दिया गया कि यदि कोई राष्ट्र किसी नए प्रदेश को अपने अधिकार में लेना चाहता है, तो वह इसकी सूचना अन्य यूरोपीय शक्तियों को देगा, जिससे भविष्य में विवाद की संभावना कम हो सके। यही सिद्धांत आगे चलकर अफ्रीका के औपनिवेशिक विभाजन का आधार बना।
यद्यपि कांगो फ्री स्टेट को औपचारिक रूप से एक अंतरराष्ट्रीय राज्य घोषित किया गया था, किंतु वास्तविकता यह थी कि 1908 ई. तक यह बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड द्वितीय की निजी संपत्ति के समान संचालित होता रहा। उसके शासनकाल में कांगो के निवासियों पर अत्यंत अमानवीय अत्याचार किए गए। रबर उत्पादन बढ़ाने के लिए स्थानीय लोगों से जबरन श्रम कराया गया, विरोध करने वालों को कठोर दंड दिए गए और व्यापक स्तर पर हिंसा तथा शोषण हुआ। जब इन अत्याचारों की जानकारी यूरोप और अमेरिका में फैलने लगी तथा विश्वव्यापी आलोचना होने लगी, तब लियोपोल्ड द्वितीय को विवश होकर 1908 ई. में कांगो फ्री स्टेट बेल्जियम की सरकार को सौंपना पड़ा। इसके बाद यह क्षेत्र बेल्जियन कांगो के रूप में बेल्जियम का औपनिवेशिक प्रदेश बन गया।
अफ्रीका का विभाजन
बर्लिन सम्मेलन के बाद अफ्रीका के विभाजन की प्रक्रिया अत्यंत तीव्र गति से आगे बढ़ी। लियोपोल्ड द्वितीय द्वारा कांगो में स्थापित उदाहरण का अनुसरण करते हुए अन्य यूरोपीय शक्तियाँ भी अधिकाधिक क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित करने के लिए सक्रिय हो गईं। प्रत्येक राष्ट्र इस बात के लिए उत्सुक था कि अफ्रीका के जितने अधिक प्रदेश संभव हों, उन्हें अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया जाए।
पुर्तगाल
पुर्तगाल अफ्रीका में सबसे पुराने यूरोपीय औपनिवेशिक देशों में से एक था। उसने पश्चिमी अफ्रीका में अंगोला क्षेत्र पर अपना अधिकार सुदृढ़ किया। इसके अतिरिक्त पूर्वी अफ्रीका में मोजाम्बिक पहले से ही उसके नियंत्रण में था। पुर्तगाल की योजना अंगोला और मोजाम्बिक के मध्य स्थित भूभाग को जोड़कर एक विशाल साम्राज्य स्थापित करने की थी, किंतु इंग्लैंड के विरोध के कारण वह इस योजना को सफल नहीं बना सका। इसके बावजूद पुर्तगाल ने अफ्रीका के पश्चिमी और पूर्वी तटों पर अपने उपनिवेशों को बनाए रखा।
इटली
इटली, जो साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा में अपेक्षाकृत देर से सम्मिलित हुआ था, भी अन्य यूरोपीय शक्तियों की भाँति अफ्रीका में औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित करना चाहता था। उसकी प्रारंभिक रुचि भूमध्यसागर के पार स्थित ट्यूनीशिया पर अधिकार करने में थी, किंतु 1881 ई. में फ्रांस द्वारा ट्यूनीशिया पर संरक्षण स्थापित कर लेने से इटली को निराशा हुई। इसके बाद उसने अपना ध्यान पूर्वी अफ्रीका की ओर केंद्रित किया। 1885 ई. से इटली ने इरिट्रिया एरिट्रिया पर अधिकार स्थापित करना प्रारंभ किया और बाद में इतालवी सोमालीलैंड के बड़े भाग पर भी अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।
इटली ने 1896 ई. में अबीसीनिया (इथियोपिया) पर अधिकार करने के लिए आक्रमण किया, किंतु 1896 ई. के अडवा के युद्ध में उसे इथियोपिया के सम्राट मेनलिक द्वितीय के हाथों करारी पराजय का सामना करना पड़ा और इथियोपिया ने अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी। बाद में 1911–12 ई. के इटली-तुर्की युद्ध में उसने त्रिपोली और सिरेनाइका पर अधिकार कर लिया। इन दोनों क्षेत्रों को बाद में मिलाकर लीबिया नाम दिया गया।
स्पेन
अफ्रीका के विभाजन में स्पेन की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित थी। उसने उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका में कुछ तटीय क्षेत्रों तथा सहारा के कुछ भागों पर अधिकार स्थापित किया। इसके अतिरिक्त रियो डी ओरो और स्पेनिश सहारा (पश्चिमी सहारा का भाग) पर भी स्पेन ने अपना अधिकार स्थापित किया।
1906 ई. के अल्हेसीरास सम्मेलन तथा 1912 ई. की फ़ेज़ संधि के बाद स्पेन को उत्तरी मोरक्को के कुछ क्षेत्रों तथा इफ़नी पर संरक्षण प्राप्त हुआ। साथ ही उसके अधिकार में सीउटा और मेलिला जैसे क्षेत्र भी बने रहे, जो जिब्राल्टर जलडमरूमध्य के निकट स्थित थे।
जर्मनी
जर्मनी का प्रथम चांसलर बिस्मार्क अपने शासन के प्रारंभिक वर्षों में उपनिवेश-स्थापना के पक्ष में नहीं था क्योंकि उसका मानना था कि जर्मनी का प्रमुख लक्ष्य यूरोप में अपनी राजनीतिक स्थिति को सुदृढ़ करना होना चाहिए, न कि समुद्र पार उपनिवेशों के लिए अन्य शक्तियों से संघर्ष करना। वह विशेष रूप से इंग्लैंड के साथ टकराव से बचना चाहता था, क्योंकि इंग्लैंड विश्व की सबसे बड़ी समुद्री और औपनिवेशिक शक्ति था। बिस्मार्क जर्मनी को प्रायः ‘संतुष्ट राष्ट्र’ कहा करता था।
किंतु 1880 के दशक में परिस्थितियाँ बदलने लगीं क्योंकि जर्मनी में तीव्र औद्योगिक विकास के कारण कच्चे माल, नए बाज़ारों तथा निवेश के क्षेत्रों की आवश्यकता बढ़ गई। साथ ही जर्मनी की बढ़ती जनसंख्या के लिए नए क्षेत्रों की आवश्यकता महसूस की जाने लगी। इसके अतिरिक्त यूरोप में राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का एक महत्त्वपूर्ण आधार विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य भी माना जाने लगा। इन परिस्थितियों ने बिस्मार्क को अपनी पूर्व नीति बदलने के लिए प्रेरित किया। इतिहासकार जी. पी. गूच के अनुसार अफ्रीका की होड़ ने जर्मनी की उपनिवेश-स्थापना की आकांक्षा को अत्यधिक बढ़ा दिया और अंततः बिस्मार्क को भी इस दौड़ में सम्मिलित होना पड़ा।
यद्यपि जर्मनी ने औपनिवेशिक प्रतिस्पर्धा में अपेक्षाकृत देर से प्रवेश किया, फिर भी 1884–1890 ई. के बीच उसने अफ्रीका में अनेक महत्त्वपूर्ण उपनिवेश स्थापित किए। शीघ्र ही उसने टोगोलैंड, कैमरून, जर्मन दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका (नामीबिया) तथा जर्मन पूर्वी अफ्रीका (तंज़ानिया, रवांडा और बुरुंडी का अधिकांश भाग) पर अपना अधिकार कर लिया। इस प्रकार जर्मनी भी परिस्थितियों और राष्ट्रीय हितों के कारण अफ्रीका की साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा में सम्मिलित हो गया।
फ्रांस
अफ्रीका के विभाजन में फ्रांस ने मुख्यतः उत्तरी, पश्चिमी और मध्य अफ्रीका में अपना विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित किया। उसका उद्देश्य भूमध्यसागर के दक्षिणी तट, सहारा क्षेत्र तथा पश्चिमी अफ्रीका के महत्त्वपूर्ण व्यापारिक और सामरिक मार्गों पर प्रभुत्व स्थापित करना था।
फ्रांस ने 1830 ई. में अल्जीरिया पर आक्रमण किया और लंबे संघर्ष के बाद वहाँ अपना नियंत्रण स्थापित किया। इसके बाद उसकी दृष्टि ट्यूनीशिया पर गई। यद्यपि इटली भी इस क्षेत्र पर अधिकार करना चाहता था, किंतु जर्मनी के चांसलर ओटो फ़ॉन बिस्मार्क के अप्रत्यक्ष समर्थन से फ्रांस ने 1881 ई. में बार्डो की संधि के माध्यम से ट्यूनीशिया को अपना संरक्षित राज्य बना लिया।
इसके पश्चात् फ्रांस ने अपने साम्राज्य का तीव्र विस्तार करते हुए फ्रेंच पश्चिमी अफ्रीका, फ्रेंच कांगो, आइवरी कोस्ट (कोट द’ईवोआर), गिनी, दहोमी (वर्तमान बेनिन), टिंबकटू (1894 ई.), मेडागास्कर (1896 ई.) तथा सहारा क्षेत्र के अनेक भागों पर अधिकार स्थापित किया।
मोरक्को पर फ्रांस और जर्मनी के बीच तीव्र प्रतिस्पर्धा हुई, जिसके परिणामस्वरूप 1905–06 ई. का प्रथम मोरक्को संकट तथा 1911 ई. का अगादीर (द्वितीय मोरक्को) संकट उत्पन्न हुआ। अंततः 1904 ई. की एंतांत कॉर्डियल के अंतर्गत इंग्लैंड ने मोरक्को में फ्रांसीसी हितों को स्वीकार किया, जबकि फ्रांस ने मिस्र में ब्रिटिश प्रभुत्व को मान्यता दी। इसके बाद 1912 ई. में फ्रांस ने मोरक्को पर संरक्षण स्थापित कर उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका में अपना विशाल और सुदृढ़ औपनिवेशिक साम्राज्य पूर्ण किया।
ब्रिटेन
अफ्रीका की लूट में सबसे अधिक लाभ इंग्लैंड को हुआ। उसके अधीन केप कॉलोनी, नेटाल, ट्रांसवाल, ऑरेंज फ्री स्टेट, रोडेशिया, मिस्र, सूडान का बड़ा भाग, ब्रिटिश सोमालीलैंड, नाइजीरिया, गांबिया, गोल्ड कोस्ट (वर्तमान घाना) तथा सिएरा लियोन जैसे विशाल क्षेत्र आ गए। इंग्लैंड का उद्देश्य केवल प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार स्थापित करना ही नहीं था, बल्कि केप टाउन से काहिरा तक एक अखंड ब्रिटिश साम्राज्य स्थापित करना भी था। किंतु दक्षिणी अफ्रीका में उसे डच मूल के बसने वालों, जिन्हें ‘बोअर’ कहा जाता था, के तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा।
बोअर समस्या
दक्षिणी अफ्रीका में यूरोपीय उपनिवेशवाद का इतिहास 1652 ई. से प्रारंभ होता है, जब डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने केप कॉलोनी में अपनी पहली स्थायी बस्ती स्थापित की। धीरे-धीरे यहाँ बड़ी संख्या में डच मूल के किसान बस गए, जिन्हें बोअर कहा गया। बोअर अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म और परंपराओं के प्रति अत्यंत निष्ठावान थे। उनकी अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि और पशुपालन पर आधारित थी तथा वे अपनी खेती में अफ्रीकी दासों का व्यापक उपयोग करते थे।
1806 ई. में नेपोलियन युद्धों के दौरान ब्रिटेन ने केप कॉलोनी पर अधिकार कर लिया और 1815 ई. की वियना व्यवस्था के बाद उसका अधिकार स्थायी रूप से मान्य हो गया। ब्रिटिश शासन ने अंग्रेज़ी भाषा, अंग्रेज़ी कानून तथा प्रशासनिक सुधार लागू किए। इसके अतिरिक्त 1833 ई. में ब्रिटिश संसद द्वारा दास-प्रथा समाप्त किए जाने से बोअर किसानों में असंतोष और बढ़ गया, क्योंकि उनकी कृषि व्यवस्था दास श्रम पर आधारित थी।
ब्रिटिश नीतियों से असंतुष्ट होकर 1835–40 ई. के बीच हजारों बोअर परिवार उत्तर-पूर्व की ओर पलायन कर गए। इस ऐतिहासिक प्रवास को ‘ग्रेट ट्रेक’ कहा जाता है। इस प्रवास के परिणामस्वरूप बोअरों ने ट्रांसवाल और ऑरेंज फ्री स्टेट जैसे स्वतंत्र गणराज्यों की स्थापना की। यद्यपि ब्रिटेन ने सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण नेटाल पर पुनः अधिकार कर लिया, फिर भी उसने 1852 ई. की सैंड रिवर संधि द्वारा ट्रांसवाल तथा 1854 ई. की ब्लोमफोंटेन संधि द्वारा ऑरेंज फ्री स्टेट की स्वतंत्रता को स्वीकार कर लिया।
कुछ वर्षों तक दक्षिणी अफ्रीका में ब्रिटेन के अधीन केप कॉलोनी और नेटाल तथा स्वतंत्र ट्रांसवाल और ऑरेंज फ्री स्टेट शांतिपूर्वक साथ-साथ अस्तित्व में रहे। किंतु शीघ्र ही स्थिति बदल गई। 1867 ई. में किम्बरली क्षेत्र में हीरे तथा 1886 ई. में ट्रांसवाल के विटवाटरस्रैंड क्षेत्र में विशाल स्वर्ण भंडार की खोज हुई। इन खोजों ने दक्षिणी अफ्रीका के आर्थिक और राजनीतिक महत्त्व को अत्यधिक बढ़ा दिया। हजारों अंग्रेज व्यापारी, खनिक और निवेशक ट्रांसवाल पहुँचने लगे। इन प्रवासियों, जिन्हें आउटलैंडर कहा जाता था, ने नागरिकता और मतदान के अधिकार की माँग की।
ट्रांसवाल के राष्ट्रपति पॉल क्रूगर को आशंका थी कि यदि इन नवागंतुकों को राजनीतिक अधिकार दे दिए गए, तो बोअर अपने ही गणराज्य में अल्पसंख्यक बन जाएँगे। इसलिए उन्होंने नागरिकता संबंधी कठोर कानून लागू किए। इससे ब्रिटेन और बोअरों के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया।
इसी समय दक्षिणी अफ्रीका में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का सबसे प्रभावशाली समर्थक सेसिल रोड्स था। वह केप कॉलोनी का प्रधानमंत्री तथा ब्रिटिश दक्षिण अफ्रीका कंपनी का प्रमुख था। उसका उद्देश्य बोअर गणराज्यों का अस्तित्व समाप्त कर केप से काहिरा तक एक अखंड ब्रिटिश साम्राज्य स्थापित करना था। दूसरी ओर पॉल क्रूगर किसी भी प्रकार के ब्रिटिश हस्तक्षेप को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। परिणामस्वरूप दोनों पक्ष युद्ध की तैयारी करने लगे।
अंततः 1899 ई. में द्वितीय बोअर युद्ध प्रारंभ हुआ, जो 1902 ई. तक चला। प्रारंभिक चरण में बोअरों ने अपने गुरिल्ला युद्ध-कौशल और साहस का परिचय देते हुए ब्रिटिश सेना को अनेक स्थानों पर कठिन चुनौती दी। किंतु ब्रिटेन ने विशाल सेना, आधुनिक हथियारों और संसाधनों का प्रयोग किया। लॉर्ड रॉबर्ट्स और बाद में लॉर्ड किचनर के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने बोअर प्रतिरोध को धीरे-धीरे समाप्त कर दिया। किचनर ने ‘स्कॉर्च्ड अर्थ नीति’ अपनाई, जिसके अंतर्गत खेतों और गाँवों को नष्ट किया गया तथा महिलाओं और बच्चों को कंसन्ट्रेशन कैंपों में रखा गया। इन शिविरों में हजारों लोगों की मृत्यु हुई, जिससे ब्रिटेन की विश्वभर में आलोचना हुई। इसके बाद 1902 ई. में वेरिनिगिंग संधि संपन्न हुई। इसके अनुसार ट्रांसवाल और ऑरेंज फ्री स्टेट दोनों ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन आ गए, जबकि बोअरों को भविष्य में स्वशासन देने का आश्वासन दिया गया।
बोअर युद्ध का प्रभाव केवल दक्षिणी अफ्रीका तक सीमित नहीं रहा। इस युद्ध के दौरान जर्मन सम्राट कैसर विल्हेम द्वितीय ने राष्ट्रपति पॉल क्रूगर के प्रति सहानुभूति व्यक्त की और उन्हें बधाई संदेश भेजा। इससे ब्रिटेन और जर्मनी के संबंधों में कटुता बढ़ गई तथा दोनों देशों के बीच अविश्वास और साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा तीव्र हो गई। दूसरी ओर अधिकांश यूरोपीय देशों की सहानुभूति बोअरों के साथ थी, जिससे ब्रिटेन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगभग अकेला पड़ गया। इस अनुभव ने ब्रिटेन को यह महसूस कराया कि उसकी ‘शानदार पृथकता’ की नीति अब व्यावहारिक नहीं रही। परिणामस्वरूप उसने 1902 ई. में ब्रिटेन-जापान संधि तथा 1904 ई. में फ्रांस के साथ एन्तान्त कॉर्डियल संपन्न की।

युद्ध के बाद ब्रिटेन ने बोअरों के प्रति अपेक्षाकृत उदार नीति अपनाई। 1906 ई. में ट्रांसवाल तथा 1907 ई. में ऑरेंज फ्री स्टेट को स्वशासन प्रदान किया गया। अंततः 1910 ई. में केप कॉलोनी, नेटाल, ट्रांसवाल और ऑरेंज फ्री स्टेट को मिलाकर दक्षिण अफ्रीका संघ की स्थापना की गई, जो ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत एक स्वशासी उपनिवेश बना। इस प्रकार दक्षिणी अफ्रीका में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की स्थापना पूर्ण हुई, किंतु इसके साथ ही नस्लीय भेदभाव और श्वेत प्रभुत्व की वह व्यवस्था भी सुदृढ़ हुई।
मिस्र पर ब्रिटेन का नियंत्रण
मिस्र पर ब्रिटेन के नियंत्रण का इतिहास 1798 ई. में नेपोलियन बोनापार्ट के मिस्र अभियान से प्रारंभ होता है। नेपोलियन का उद्देश्य केवल मिस्र पर अधिकार करना नहीं था, बल्कि भारत से ब्रिटेन के व्यापारिक और सामरिक संपर्क को बाधित करना भी था। उसने मिस्र पर अधिकार स्थापित कर फ्रांसीसी प्रभाव को सुदृढ़ करने का प्रयास किया, किंतु 1798 ई. के नील नदी के युद्ध में एडमिरल होरेशियो नेल्सन के नेतृत्व में ब्रिटिश नौसेना ने फ्रांसीसी बेड़े को पराजित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप फ्रांस की स्थिति कमजोर होती गई और अंततः 1801 ई. में उसे मिस्र छोड़ना पड़ा। यद्यपि फ्रांसीसी शासन समाप्त हो गया, फिर भी इस अभियान ने यूरोपीय शक्तियों को मिस्र के असाधारण सामरिक महत्त्व का बोध करा दिया।
उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में मिस्र का महत्त्व और अधिक बढ़ गया। 1869 ई. में फ्रांसीसी अभियंता फ़र्डिनांड डी लेसेप्स के प्रयासों से स्वेज नहर का निर्माण पूरा हुआ और इसे यातायात के लिए खोल दिया गया। इस नहर ने भूमध्यसागर को लाल सागर से जोड़ दिया, जिससे यूरोप और एशिया के बीच समुद्री मार्ग अत्यंत छोटा हो गया। विशेष रूप से ब्रिटेन के लिए इसका महत्त्व असाधारण था, क्योंकि यही मार्ग उसके सबसे महत्त्वपूर्ण उपनिवेश भारत तक पहुँचने का सबसे तेज और सुरक्षित समुद्री मार्ग बन गया। अतः स्वेज नहर पर प्रभावी नियंत्रण ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा और पूर्वी व्यापार की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक माना जाने लगा।
ब्रिटेन को अपनी साम्राज्यवादी नीति को लागू करने का अवसर शीघ्र ही प्राप्त हो गया। मिस्र के शासक खदीव इस्माइल ने देश के आधुनिकीकरण तथा स्वेज नहर के निर्माण से संबंधित व्ययों के कारण यूरोपीय बैंकों से भारी ऋण लिया था। अत्यधिक ऋणभार के कारण 1875 ई. तक मिस्र गंभीर आर्थिक संकट में फँस गया। अंततः विवश होकर खदीव इस्माइल ने स्वेज नहर कंपनी में अपने स्वामित्व वाले शेयर बेचने का निर्णय लिया।
उस समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बेंजामिन डिज़रायली थे, जो प्रबल साम्राज्यवादी विचारों के समर्थक थे। जैसे ही उन्हें शेयरों की बिक्री का समाचार मिला, उन्होंने शीघ्रता से आवश्यक धन की व्यवस्था की और मिस्र के सभी उपलब्ध शेयर खरीद लिए। इसके परिणामस्वरूप स्वेज नहर में ब्रिटेन की भागीदारी अत्यधिक बढ़ गई। यद्यपि कंपनी में फ्रांस का प्रभाव बना रहा, फिर भी ब्रिटेन अब नहर के संचालन और भविष्य की राजनीति में निर्णायक शक्ति बन गया।
स्वेज नहर के शेयर बेचने से मिस्र को तत्काल आर्थिक सहायता तो मिली, किंतु उसकी वित्तीय स्थिति में कोई स्थायी सुधार नहीं हुआ। 1876 ई. तक मिस्र लगभग दिवालिया हो चुका था और वह विदेशी ऋणों का भुगतान करने में असमर्थ था। ऐसी परिस्थिति में ब्रिटेन और फ्रांस, जो मिस्र के सबसे बड़े ऋणदाता थे, चिंतित हो उठे। दोनों देशों ने संयुक्त रूप से मिस्र की वित्तीय व्यवस्था की जाँच कराई और उसके बाद मिस्र के राजस्व, आय-व्यय तथा वित्तीय प्रशासन पर आंग्ल-फ्रांसीसी द्वैध नियंत्रण (Dual Control) स्थापित कर दिया। इससे मिस्र की आर्थिक स्वतंत्रता लगभग समाप्त हो गई और उसके वित्तीय निर्णय विदेशी अधिकारियों के नियंत्रण में आ गए।
विदेशी हस्तक्षेप और आर्थिक नियंत्रण के कारण मिस्र की जनता में असंतोष तीव्र होता गया। 1879 ई. में यूरोपीय शक्तियों के दबाव पर खदीव इस्माइल को पदच्युत कर उनके पुत्र तौफीक पाशा को नया खदीव बनाया गया, किंतु इससे जनता का असंतोष कम नहीं हुआ। इसी वातावरण में अहमद अरबी (अरबी पाशा) के नेतृत्व में एक शक्तिशाली राष्ट्रीय आंदोलन प्रारंभ हुआ। इस आंदोलन का प्रमुख नारा था— “मिस्र, मिस्रवासियों के लिए।” इसका उद्देश्य विदेशी हस्तक्षेप समाप्त करना, राष्ट्रीय स्वाधीनता की रक्षा करना तथा प्रशासन पर मिस्रवासियों का नियंत्रण स्थापित करना था।
अरबी पाशा के बढ़ते प्रभाव से ब्रिटेन और फ्रांस दोनों चिंतित हो गए। प्रारंभ में दोनों ने संयुक्त सैन्य हस्तक्षेप की योजना बनाई, किंतु अंततः फ्रांस पीछे हट गया। परिणामस्वरूप ब्रिटेन ने अकेले सैन्य कार्रवाई का निर्णय लिया। ब्रिटिश सेना ने सितंबर 1882 ई. में तेल-एल-कबीर के युद्ध में अरबी पाशा की सेना को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। इस विजय के साथ ही मिस्र पर ब्रिटेन का वास्तविक नियंत्रण स्थापित हो गया। यद्यपि औपचारिक रूप से मिस्र अभी भी उस्मानी साम्राज्य के अधीन खदीव के शासन में था, किंतु उसकी वास्तविक सत्ता ब्रिटिश अधिकारियों के हाथों में चली गई।
अरबी पाशा की पराजय के बाद ब्रिटेन ने मिस्र की प्रशासनिक, आर्थिक और वित्तीय व्यवस्था का पुनर्गठन अपने साम्राज्यवादी हितों के अनुरूप किया। 1883 ई. में लॉर्ड क्रोमर (एवलिन बेरिंग) को मिस्र में ब्रिटिश महावाणिज्यदूत नियुक्त किया गया। उन्होंने लगभग पच्चीस वर्षों तक मिस्र के प्रशासन पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखा। उनके कार्यकाल में वित्तीय सुधार, सिंचाई परियोजनाओं का विस्तार, कृषि उत्पादन में वृद्धि तथा प्रशासनिक पुनर्गठन किए गए, किंतु इन सुधारों का मुख्य उद्देश्य मिस्र का विकास नहीं, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के आर्थिक और सामरिक हितों की रक्षा करना था। नाममात्र का शासन खदीव के हाथों में बना रहा, जबकि वास्तविक निर्णय ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा लिए जाते थे।
जर्मनी और बिस्मार्क की भूमिका
मिस्र में ब्रिटेन की सफलता के पीछे जर्मनी के चांसलर ओट्टो फ़ॉन बिस्मार्क की अप्रत्यक्ष भूमिका भी उल्लेखनीय थी। बिस्मार्क यूरोप में शक्ति-संतुलन बनाए रखने का समर्थक था और वह मिस्र के प्रश्न पर ब्रिटेन से टकराव नहीं चाहता था। ब्रिटिश विदेश मंत्री लॉर्ड ग्रेनविल ने भी स्वीकार किया था कि यदि बिस्मार्क ब्रिटेन का विरोध करता, तो मिस्र में ब्रिटिश नीति को सफल बनाना कठिन हो सकता था। बिस्मार्क यह भी समझता था कि मिस्र में ब्रिटिश हस्तक्षेप से फ्रांस और रूस असंतुष्ट हैं तथा इस परिस्थिति में ब्रिटेन को जर्मनी की सद्भावना की आवश्यकता होगी। उसने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए अपनी औपनिवेशिक नीति में परिवर्तन किया। प्रारंभ में वह उपनिवेशों का विरोधी था, किंतु 1884 ई. के बाद उसने अफ्रीका और प्रशांत क्षेत्र में जर्मन उपनिवेशों की स्थापना का समर्थन करना प्रारंभ कर दिया। उसे आशा थी कि मिस्र में ब्रिटेन को दिए गए सहयोग के बदले ब्रिटेन जर्मनी के औपनिवेशिक विस्तार का विरोध नहीं करेगा।
बिस्मार्क केवल औपनिवेशिक क्षेत्रों में ब्रिटिश सहानुभूति प्राप्त करके संतुष्ट नहीं था। वह यह भी चाहता था कि यदि भविष्य में फ्रांस जर्मनी पर आक्रमण करे, तो ब्रिटेन उसका समर्थन करे। किंतु ब्रिटेन ने ऐसा कोई राजनीतिक आश्वासन देने से स्पष्ट इनकार कर दिया। इससे बिस्मार्क निराश हुआ और उसने औपनिवेशिक विवादों में फ्रांस के प्रति अपेक्षाकृत सहानुभूतिपूर्ण नीति अपनानी प्रारंभ कर दी। इससे एक ओर फ्रांस के साथ उसके संबंधों में सुधार की संभावना बनी, तो दूसरी ओर ब्रिटेन पर अप्रत्यक्ष राजनीतिक दबाव भी पड़ा।
अंततः 1914 ई. में प्रथम विश्वयुद्ध के प्रारंभ होने पर ब्रिटेन ने मिस्र को औपचारिक रूप से ब्रिटिश संरक्षित राज्य घोषित कर दिया और उस्मानी साम्राज्य से उसके शेष संवैधानिक संबंध भी समाप्त कर दिए। इस प्रकार मिस्र पूर्णतः ब्रिटिश साम्राज्यवादी नियंत्रण के अधीन आ गया और स्वेज नहर पर ब्रिटेन की रणनीतिक पकड़ और अधिक सुदृढ़ हो गई।
सूडान का प्रश्न और फशोदा संकट (1898 ई.)
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अफ्रीका के विभाजन के दौरान सूडान का प्रश्न ब्रिटेन और फ्रांस के बीच तीव्र साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा का प्रमुख कारण बन गया। फ्रांस पहले से ही मिस्र में ब्रिटेन के बढ़ते प्रभाव से असंतुष्ट था। 1875 ई. में स्वेज नहर के शेयरों की ब्रिटिश खरीद तथा 1882 ई. में मिस्र पर ब्रिटिश नियंत्रण स्थापित होने के बाद फ्रांस को आशंका होने लगी कि ब्रिटेन उत्तर-पूर्वी अफ्रीका पर अपना स्थायी प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है। दूसरी ओर ब्रिटेन अपने साम्राज्यवादी हितों को प्राथमिकता देते हुए फ्रांसीसी आपत्तियों की उपेक्षा कर रहा था।
दोनों देशों की साम्राज्यवादी योजनाएँ भी परस्पर विरोधी थीं। फ्रांस का लक्ष्य अटलांटिक महासागर से लाल सागर तक पश्चिम से पूर्व दिशा में एक अखंड अफ्रीकी साम्राज्य स्थापित करना था, जबकि ब्रिटेन का उद्देश्य केप ऑफ गुड होप से काहिरा तक उत्तर से दक्षिण दिशा में निरंतर ब्रिटिश साम्राज्य का निर्माण करना था। इन दोनों योजनाओं के मार्ग में सूडान, विशेषकर नील नदी का मध्य क्षेत्र, सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान रखता था। परिणामस्वरूप यह क्षेत्र दोनों शक्तियों के बीच प्रतिद्वंद्विता का केंद्र बन गया।
सूडान पहले मिस्र के अधीन था, किंतु 1881 ई. में वहाँ मुहम्मद अहमद के नेतृत्व में एक शक्तिशाली धार्मिक और राजनीतिक आंदोलन प्रारंभ हुआ। उन्होंने स्वयं को महदी घोषित किया और विदेशी शासन तथा मिस्री प्रशासन के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान किया। महदी आंदोलन को शीघ्र ही व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हुआ। 1885 ई. में महदी के अनुयायियों ने खार्तूम पर अधिकार कर लिया तथा ब्रिटिश सेनापति जनरल चार्ल्स गॉर्डन की हत्या कर दी। गॉर्डन की मृत्यु ने ब्रिटिश जनमत को गहराई से प्रभावित किया और सूडान का प्रश्न ब्रिटिश राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जुड़ गया।
महदी की मृत्यु के बाद भी उनके अनुयायियों का शासन सूडान में बना रहा। अंततः ब्रिटेन ने सूडान पर पुनः अधिकार स्थापित करने का निर्णय लिया। 1896 ई. में लॉर्ड हर्बर्ट किचनर के नेतृत्व में एक आधुनिक एवं सुसंगठित सेना भेजी गई। किचनर ने क्रमिक रूप से आगे बढ़ते हुए 1898 ई. में ओमदुर्मन के युद्ध में महदी के उत्तराधिकारी की सेना को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। इसके बाद ब्रिटिश सेना दक्षिण की ओर बढ़ने लगी।
उधर फ्रांस भी सूडान को केवल ब्रिटेन का प्रभाव क्षेत्र मानने के लिए तैयार नहीं था। उस समय यूरोपीय साम्राज्यवादियों के बीच यह सिद्धांत प्रचलित था कि जो शक्ति किसी क्षेत्र में पहले पहुँचकर अपना ध्वज फहरा दे, वह उस क्षेत्र पर अपना दावा प्रस्तुत कर सकती है। इसी नीति के अंतर्गत फ्रांसीसी सरकार ने मेजर जाँ-बाप्तिस्त मार्चाँ के नेतृत्व में एक अभियान मध्य अफ्रीका से सूडान की ओर भेजा। लंबी और कठिन यात्रा के बाद मार्चाँ का दल 1898 ई. में फशोदा (वर्तमान कोडोक, दक्षिण सूडान) पहुँचा और वहाँ फ्रांस का ध्वज फहरा दिया।
इसी समय लॉर्ड किचनर भी अपनी सेना के साथ फशोदा पहुँच गए। परिणामस्वरूप ब्रिटिश और फ्रांसीसी सेनाएँ आमने-सामने आ गईं। किचनर ने मार्चाँ से फ्रांसीसी ध्वज हटाकर क्षेत्र खाली करने की माँग की, जबकि मार्चाँ ने अपने अधिकार का दावा किया। कुछ समय के लिए स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण हो गई और ऐसा प्रतीत होने लगा कि दोनों महाशक्तियों के बीच युद्ध अवश्य होगा।
किन्तु दोनों देशों की सरकारों ने अंततः संयम का परिचय दिया। फ्रांस उस समय यूरोप में जर्मनी की बढ़ती शक्ति को अपना सबसे बड़ा खतरा मानता था। फ्रांस के विदेश मंत्री थियोफ़िल डेलकासे का विचार था कि ब्रिटेन से युद्ध करने की अपेक्षा उसके साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करना अधिक लाभदायक होगा। इसलिए उन्होंने फशोदा के प्रश्न पर समझौते की नीति अपनाई। परिणामस्वरूप फ्रांसीसी सरकार ने मार्चाँ को अपनी सेना सहित वापस लौटने का आदेश दिया और संभावित युद्ध टल गया।
इसके बाद दोनों देशों के बीच वार्ताएँ प्रारंभ हुईं। 1899 ई. के आंग्ल-फ्रांसीसी समझौते के अंतर्गत फ्रांस ने मिस्र और सूडान पर अपने दावों का परित्याग कर दिया, जबकि ब्रिटेन ने मोरक्को में फ्रांस के विशेष हितों को स्वीकार करने की दिशा में सहमति व्यक्त की। इस समझौते से दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे औपनिवेशिक विवादों को शांत करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
फशोदा संकट का प्रभाव केवल अफ्रीका तक सीमित नहीं रहा। इस घटना ने यूरोप की शक्ति-संतुलन की राजनीति को भी प्रभावित किया। जर्मन सम्राट कैसर विल्हेम द्वितीय को आशा थी कि ब्रिटेन और फ्रांस के बीच युद्ध छिड़ जाएगा, जिससे जर्मनी को राजनीतिक लाभ प्राप्त होगा। किंतु फ्रांस की संयमपूर्ण नीति के कारण यह संभावना समाप्त हो गई।
फशोदा संकट ने ब्रिटेन को भी यह अनुभव कराया कि उसकी ‘शानदार पृथकता’ की नीति अब बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुरूप नहीं रही। उसने समझ लिया कि यूरोप में स्थायी मित्रों के बिना अपने साम्राज्य की रक्षा करना कठिन होगा। परिणामस्वरूप ब्रिटेन ने अपनी विदेश नीति में परिवर्तन करते हुए अन्य शक्तियों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने का प्रयास प्रारंभ किया।
इसी नीति का परिणाम था कि 1904 ई. में एन्तान्त कॉर्डियल संपन्न हुई, जिसके अंतर्गत ब्रिटेन ने मोरक्को में फ्रांस के विशेष हितों को स्वीकार किया, जबकि फ्रांस ने मिस्र में ब्रिटिश प्रभुत्व को मान्यता प्रदान की। इस प्रकार फशोदा संकट का शांतिपूर्ण समाधान न केवल अफ्रीका में ब्रिटेन और फ्रांस की प्रतिद्वंद्विता को समाप्त करने में सहायक सिद्ध हुआ, बल्कि उसने आगे चलकर यूरोप में नए कूटनीतिक समीकरणों और मित्र-गठबंधनों के निर्माण का मार्ग भी प्रशस्त किया।
अफ्रीका की लूट
अफ्रीका के विभाजन के पश्चात् यूरोपीय शक्तियों ने वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों, खनिज संपदा, कृषि उत्पादों तथा मानव श्रम का व्यापक और योजनाबद्ध शोषण किया। उपनिवेशों का मुख्य उद्देश्य स्थानीय जनता का विकास करना नहीं, बल्कि यूरोपीय देशों की आर्थिक समृद्धि, औद्योगिक आवश्यकताओं तथा साम्राज्यवादी हितों की पूर्ति करना था। प्रत्येक औपनिवेशिक शक्ति ने अपने-अपने अधिकार क्षेत्रों में ऐसी नीतियाँ अपनाईं, जिनसे अधिक-से-अधिक कच्चा माल, कृषि उपज और खनिज संपदा यूरोप भेजी जा सके। इसके लिए स्थानीय जनता पर भारी कर लगाए गए, उनसे बेगार कराई गई तथा उन्हें नकदी फसलों और खनिज उत्पादन के लिए बाध्य किया गया। जो लोग इन आदेशों का पालन नहीं करते थे, उन्हें कठोर दंड दिया जाता था। इस प्रकार अफ्रीका का विभाजन केवल राजनीतिक प्रभुत्व की स्थापना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह आर्थिक शोषण, सामाजिक उत्पीड़न और साम्राज्यवादी विस्तार का प्रमुख माध्यम बन गया।
अफ्रीका में सबसे क्रूर और अमानवीय औपनिवेशिक शासन बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड द्वितीय द्वारा स्थापित कांगो फ्री स्टेट में देखने को मिला। 1885 ई. के बर्लिन सम्मेलन के बाद कांगो को लियोपोल्ड द्वितीय की निजी संपत्ति के रूप में मान्यता मिली। यद्यपि उन्होंने दावा किया कि उनका उद्देश्य अफ्रीका में सभ्यता, ईसाई धर्म और मानव कल्याण का प्रसार करना है, किंतु वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत थी। कांगो को एक विशाल आर्थिक शोषण केंद्र में बदल दिया गया, जहाँ प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए स्थानीय जनता पर असहनीय अत्याचार किए गए।

उस समय विश्व बाज़ार में हाथी-दाँत और विशेष रूप से रबर की माँग तीव्र गति से बढ़ रही थी। लियोपोल्ड द्वितीय के अधिकारियों ने स्थानीय निवासियों को निश्चित मात्रा में रबर एकत्र करने के लिए विवश किया। प्रत्येक गाँव को निर्धारित कोटा पूरा करना पड़ता था। जो श्रमिक या गाँव इस कोटे को पूरा नहीं कर पाते थे, उन्हें अत्यंत कठोर दंड दिया जाता था। अनेक अवसरों पर उनके हाथ काट दिए जाते थे, पूरे गाँव जला दिए जाते थे तथा महिलाओं और बच्चों को बंधक बनाकर पुरुषों को अधिक श्रम करने के लिए विवश किया जाता था। औपनिवेशिक सैनिकों द्वारा व्यापक हिंसा, यातना और हत्या की घटनाएँ सामान्य बात बन गई थीं।
इन अमानवीय नीतियों के परिणामस्वरूप कांगो की जनसंख्या में भारी गिरावट आई। लाखों लोग हत्या, भुखमरी, बीमारियों, जबरन श्रम तथा अत्याचारों के कारण काल के ग्रास बन गए। यूरोप और अमेरिका के मानवाधिकार समर्थकों, मिशनरियों तथा पत्रकारों ने इन अत्याचारों का व्यापक रूप से पर्दाफाश किया। अंतरराष्ट्रीय जनमत के बढ़ते दबाव के कारण अंततः 1908 ई. में बेल्जियम की संसद ने कांगो फ्री स्टेट को लियोपोल्ड द्वितीय के निजी नियंत्रण से लेकर सीधे बेल्जियम सरकार के अधीन कर दिया। यद्यपि इसके बाद प्रशासन में कुछ सुधार किए गए, फिर भी औपनिवेशिक शोषण की मूल प्रवृत्ति लंबे समय तक बनी रही। कांगो का उदाहरण अफ्रीका में यूरोपीय साम्राज्यवाद के सबसे क्रूर और अमानवीय स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।
अफ्रीका के विभाजन के परिणाम
1884–85 ई. के बर्लिन सम्मेलन के बाद प्रारंभ हुई अफ्रीका के विभाजन (Scramble for Africa) की प्रक्रिया ने केवल अफ्रीका के राजनीतिक मानचित्र को ही नहीं बदला, बल्कि यूरोप की अर्थव्यवस्था, साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा तथा अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी दूरगामी प्रभाव डाला। यूरोपीय शक्तियों ने लगभग पूरे अफ्रीकी महाद्वीप को अपने-अपने उपनिवेशों में विभाजित कर लिया और वहाँ की प्राकृतिक संपदा, खनिज संसाधनों तथा मानव श्रम का व्यापक शोषण किया। इस विभाजन ने अफ्रीका के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास को गहराई से प्रभावित किया, वहीं यूरोप की औद्योगिक उन्नति और साम्राज्यवादी शक्ति को भी नई गति प्रदान की। इसके प्रभाव आज भी अनेक अफ्रीकी देशों की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों में स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं।
अफ्रीका पर प्रभाव
अफ्रीका के विभाजन का सबसे गहरा प्रभाव उसकी राजनीतिक एवं सामाजिक संरचना पर पड़ा। यूरोपीय शक्तियों ने सीमाओं का निर्धारण स्थानीय जातीय, भाषाई, धार्मिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों की उपेक्षा करते हुए केवल अपने साम्राज्यवादी हितों के आधार पर किया। परिणामस्वरूप एक ही जनजाति के लोग विभिन्न देशों में विभाजित हो गए, जबकि परस्पर विरोधी समुदायों को एक ही प्रशासनिक इकाई में सम्मिलित कर दिया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यही कृत्रिम सीमाएँ अनेक अफ्रीकी देशों में जातीय संघर्ष, गृहयुद्ध, अलगाववादी आंदोलनों तथा राजनीतिक अस्थिरता का प्रमुख कारण बनीं।
आर्थिक दृष्टि से अफ्रीका को यूरोपीय उद्योगों के लिए कच्चे माल के स्रोत और तैयार माल के बाज़ार में परिवर्तित कर दिया गया। रबर, सोना, हीरे, ताँबा, कपास, कोको, कॉफी, पाम तेल तथा अन्य बहुमूल्य संसाधनों का बड़े पैमाने पर दोहन किया गया। स्थानीय किसानों को खाद्यान्न के स्थान पर निर्यात योग्य नगदी फसलों की खेती करने के लिए बाध्य किया गया। पारंपरिक उद्योगों और हस्तशिल्पों का पतन हुआ तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था यूरोपीय व्यापारिक हितों पर निर्भर बन गई। इस प्रकार अफ्रीका की आर्थिक संरचना आत्मनिर्भर होने के स्थान पर औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में परिवर्तित हो गई।
सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में भी व्यापक परिवर्तन हुए। पारंपरिक शासन-व्यवस्थाओं को कमजोर कर यूरोपीय प्रशासन लागू किया गया। ईसाई मिशनरियों के माध्यम से पश्चिमी शिक्षा और धर्म का प्रसार हुआ। इससे आधुनिक शिक्षा, चिकित्सा तथा संचार के कुछ साधनों का विकास अवश्य हुआ, किंतु इसके साथ ही स्थानीय भाषाओं, सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक संस्थाओं को गंभीर क्षति पहुँची। अनेक क्षेत्रों में जबरन श्रम, नस्लीय भेदभाव और कठोर कर-व्यवस्था लागू की गई। विशेष रूप से बेल्जियम के अधीन कांगो में अमानवीय अत्याचारों ने लाखों लोगों का जीवन नष्ट कर दिया। यूरोपीय संपर्क के कारण चेचक तथा अन्य संक्रामक रोग भी फैले, जिनसे अफ्रीका की जनसंख्या को भारी हानि उठानी पड़ी।
यूरोप पर प्रभाव
अफ्रीका के विभाजन से यूरोप की औद्योगिक अर्थव्यवस्था को अत्यधिक लाभ हुआ। ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, जर्मनी तथा अन्य औद्योगिक देशों को अपने कारखानों के लिए सस्ता कच्चा माल तथा तैयार वस्तुओं के लिए विशाल बाज़ार प्राप्त हुआ। इसके परिणामस्वरूप औद्योगिक उत्पादन, विदेशी व्यापार, बैंकिंग, परिवहन तथा पूँजी निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। यूरोप की आर्थिक समृद्धि और औद्योगिक शक्ति को नया आधार मिला तथा साम्राज्यवाद पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग बन गया।
उपनिवेशों की प्राप्ति राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और शक्ति का प्रतीक मानी जाने लगी। प्रत्येक राष्ट्र अधिकाधिक उपनिवेश प्राप्त कर स्वयं को विश्व की महान शक्ति सिद्ध करना चाहता था। फलस्वरूप यूरोप में साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा, सैन्यवाद तथा उग्र राष्ट्रवाद को प्रोत्साहन मिला। विशेष रूप से जर्मनी और इटली जैसे नव-एकीकृत राष्ट्र भी औपनिवेशिक दौड़ में शामिल हो गए, जिससे यूरोपीय राजनीति में प्रतिस्पर्धा और तीव्र हो गई।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव
अफ्रीका के विभाजन का अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। उपनिवेशों को लेकर यूरोपीय शक्तियों के बीच अनेक विवाद उत्पन्न हुए। विशेष रूप से ब्रिटेन और फ्रांस, तथा बाद में ब्रिटेन और जर्मनी के बीच प्रतिद्वंद्विता बढ़ी। यद्यपि अधिकांश विवाद कूटनीतिक समझौतों के माध्यम से सुलझा लिए गए, फिर भी इन घटनाओं ने यूरोप में अविश्वास और शक्ति-संघर्ष को निरंतर बढ़ाया।
1898 ई. का फशोदा कांड इस प्रतिस्पर्धा का प्रमुख उदाहरण था, जिसमें ब्रिटेन और फ्रांस युद्ध के कगार तक पहुँच गए थे। यद्यपि अंततः समझौते के माध्यम से संकट टल गया, किंतु साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता समाप्त नहीं हुई। इसके बाद 1905–06 ई. का प्रथम मोरक्को संकट, 1908 ई. का बोस्निया संकट तथा 1911 ई. का अगादीर (द्वितीय मोरक्को) संकट ने यूरोप की राजनीति को पुनः तनावपूर्ण बना दिया। इन संकटों ने महाशक्तियों के बीच अविश्वास, गुटबंदी, सैन्य प्रतिस्पर्धा और हथियारों की दौड़ को तीव्र कर दिया।
अफ्रीका के विशाल क्षेत्रों और संसाधनों पर अधिकार स्थापित करने के कारण ब्रिटेन और फ्रांस जैसी शक्तियों का वैश्विक प्रभाव और अधिक बढ़ गया। दूसरी ओर जर्मनी स्वयं को उपनिवेशों के मामले में उपेक्षित अनुभव करता रहा, जिससे उसकी साम्राज्यवादी नीति अधिक आक्रामक होती गई। परिणामस्वरूप यूरोप दो प्रतिद्वंद्वी गुटों में विभाजित हो गया और अंतरराष्ट्रीय तनाव निरंतर बढ़ता गया।
इस प्रकार अफ्रीका का विभाजन केवल किसी महाद्वीप के राजनीतिक नियंत्रण का प्रश्न नहीं था, बल्कि आधुनिक विश्व इतिहास की दिशा बदल देने वाली एक निर्णायक घटना सिद्ध हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक यूरोप की महाशक्तियों ने लगभग पूरे अफ्रीका को अपने-अपने उपनिवेशों में बाँट लिया। यद्यपि इस विभाजन के अधिकांश विवादों का समाधान प्रत्यक्ष युद्ध के स्थान पर कूटनीति, संधियों तथा 1884–85 ई. के बर्लिन सम्मेलन जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों के माध्यम से किया गया, फिर भी इससे यूरोपीय शक्तियों के बीच साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा और अविश्वास निरंतर बढ़ता गया। यही प्रतिद्वंद्विता आगे चलकर प्रथम विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि तैयार करने वाले प्रमुख कारणों में सम्मिलित हुई।
दूसरी ओर, इस तथाकथित शांतिपूर्ण विभाजन की सबसे बड़ी कीमत अफ्रीकी जनता को चुकानी पड़ी। महाद्वीप के प्राकृतिक संसाधनों का निर्मम दोहन किया गया, स्थानीय उद्योगों और पारंपरिक शासन-व्यवस्थाओं को नष्ट कर दिया गया तथा कृत्रिम सीमाओं का निर्माण किया गया, जिनके कारण अनेक देशों में जातीय संघर्ष, राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक निर्भरता की समस्याएँ उत्पन्न हुईं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी औपनिवेशिक विरासत के ये दुष्परिणाम लंबे समय तक बने रहे। इसलिए अफ्रीका का विभाजन आधुनिक साम्राज्यवाद का सबसे स्पष्ट उदाहरण तथा विश्व इतिहास की सबसे दूरगामी और प्रभावशाली घटनाओं में से एक माना जाता है।




