अफ्रीका का बँटवारा
अफ्रीका का बँटवारा नवीन साम्राज्यवाद के इतिहास की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और असाधारण घटना है। इसकी अनेक ऐसी विशेषताएँ हैं, जो इसे अन्य साम्राज्यवादी विस्तारों से भिन्न बनाती हैं। सबसे पहली विशेषता यह थी कि अफ्रीका का अधिकांश बँटवारा यूरोपीय शक्तियों के बीच प्रत्यक्ष युद्ध के बिना ही संपन्न हो गया। यद्यपि विभिन्न यूरोपीय राष्ट्रों के बीच अफ्रीका के क्षेत्रों को लेकर अनेक बार तनाव उत्पन्न हुआ और युद्ध की संभावना भी दिखाई दी, फिर भी अधिकांश विवाद कूटनीतिक समझौतों तथा सम्मेलनों के माध्यम से सुलझा लिए गए। इस प्रकार यूरोपीय शक्तियाँ आपसी युद्ध से बचते हुए अफ्रीका के विशाल भूभाग का विभाजन करने में सफल रहीं।
अफ्रीका के बँटवारे की दूसरी प्रमुख विशेषता उसकी अत्यंत तीव्र गति थी। लगभग पच्चीस से तीस वर्षों की अल्प अवधि में ही इस विशाल महाद्वीप का अधिकांश भाग यूरोपीय साम्राज्यों के अधीन चला गया। इसका प्रमुख कारण यह था कि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जर्मनी और इटली जैसे नव-एकीकृत राष्ट्र भी साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा में उतर चुके थे। ये दोनों देश शीघ्र-से-शीघ्र अपने उपनिवेश स्थापित करना चाहते थे। इनके आगमन से पहले से उपनिवेशवादी दौड़ में शामिल ब्रिटेन और फ्रांस भी अधिकाधिक प्रदेशों पर अधिकार करने के लिए सक्रिय हो गए। परिणामस्वरूप अफ्रीका के विभिन्न भागों पर अधिकार स्थापित करने की होड़ अत्यंत तीव्र हो गई और कुछ ही वर्षों में लगभग संपूर्ण महाद्वीप यूरोपीय शक्तियों के बीच बाँट लिया गया।
अफ्रीका के बँटवारे की एक अन्य उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि अधिकांश स्थानीय शासक और जनजातीय सरदार यूरोपीय शक्तियों का प्रभावी प्रतिरोध नहीं कर सके। इसका कारण उनकी राजनीतिक असंगठितता, आधुनिक शिक्षा का अभाव तथा यूरोपीय कूटनीति से अपरिचित होना था। अनेक अवसरों पर यूरोपीय अधिकारी स्थानीय सरदारों से ऐसी संधियों पर हस्ताक्षर करा लेते थे, जिनका वास्तविक अर्थ वे स्वयं भी नहीं समझते थे। कभी शराब की कुछ बोतलों, चमकदार उपहारों अथवा तात्कालिक लाभ के बदले वे अपने विशाल भूभागों पर अधिकार संबंधी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर देते थे। दूसरी ओर यूरोप की राजधानियों—लंदन, पेरिस, ब्रुसेल्स और बर्लिन में बैठे साम्राज्यवादी राजनेता नक्शों पर रेखाएँ खींचकर अफ्रीका के प्रदेशों का विभाजन कर देते थे और स्थानीय जनता को इसकी कोई जानकारी तक नहीं होती थी।
नवीन साम्राज्यवाद का सबसे बड़ा शिकार अफ्रीका ही बना। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक यूरोपीय देशों को इस विशाल महाद्वीप के आंतरिक भागों का बहुत कम ज्ञान था। वे केवल उत्तरी अफ्रीका के कुछ क्षेत्रों—जैसे मिस्र, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया और मोरक्को तथा समुद्री तटों से परिचित थे। इसके अतिरिक्त अफ्रीका का अधिकांश भाग उनके लिए रहस्यमय, अपरिचित और अज्ञात भूभाग था। वहाँ के घने वन, विशाल नदियाँ, दुर्गम पर्वत, मरुस्थल, प्राकृतिक परिस्थितियाँ तथा विविध जनजातियाँ यूरोप के लोगों के लिए कौतूहल का विषय थीं। लंबे समय तक यूरोपीय राष्ट्रों ने इन आंतरिक प्रदेशों की खोज के लिए कोई विशेष प्रयास भी नहीं किया, क्योंकि वहाँ तक पहुँचना अत्यंत कठिन और जोखिमपूर्ण था।
1875 ई. के पूर्व अफ्रीका का केवल सीमित भाग ही यूरोपीय शक्तियों के अधिकार में था। उत्तरी अफ्रीका में 1830 ई. में फ्रांस ने अल्जीरिया पर अधिकार कर लिया था और धीरे-धीरे उसके आसपास के क्षेत्रों को भी अपने साम्राज्य में मिला लिया। दक्षिणी अफ्रीका में 1806 ई. में ब्रिटेन ने केप कॉलोनी को नीदरलैंड (हॉलैंड) से छीन लिया तथा 1843 ई. में नेटाल पर अधिकार स्थापित कर लिया। पुर्तगाल के अधिकार में पूर्वी तट पर मोजाम्बिक तथा पश्चिमी तट पर अंगोला के तटीय प्रदेश थे, यद्यपि उनके भीतरी क्षेत्रों की सीमाएँ स्पष्ट नहीं थीं। इनके अतिरिक्त पश्चिमी अफ्रीका में फ्रांस के अधिकार में सेनेगल, गैबॉन तथा आइवरी कोस्ट, ब्रिटेन के अधिकार में गाम्बिया, सिएरा लियोन, गोल्ड कोस्ट (घाना), लागोस तथा नाइजर नदी का मुहाना, जबकि स्पेन के अधिकार में रियो डी ओरो तथा स्पेनिश गिनी जैसे क्षेत्र थे। फिर भी अफ्रीका का अधिकांश आंतरिक भाग किसी भी यूरोपीय शक्ति के प्रत्यक्ष नियंत्रण से बाहर था।
अफ्रीका के इस अज्ञात भूभाग का अन्वेषण प्रारंभ में किसी यूरोपीय सरकार ने नहीं किया। यह कार्य मुख्यतः ईसाई धर्म-प्रचारकों, भूगोलविदों तथा खोजयात्रियों ने किया, जो धार्मिक, मानवीय अथवा वैज्ञानिक उद्देश्यों से वहाँ पहुँचे थे। इन खोजयात्रियों में डॉ. डेविड लिविंगस्टोन का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे स्कॉटलैंड के प्रसिद्ध धर्म-प्रचारक, चिकित्सक और अन्वेषक थे। उन्होंने लगभग पाँच वर्षों तक मध्य अफ्रीका के दुर्गम प्रदेशों की यात्रा की और वहाँ के भौगोलिक, सामाजिक तथा प्राकृतिक स्वरूप का विस्तृत अध्ययन किया। जब उन्होंने अपनी यात्राओं का विवरण प्रकाशित किया, तो पूरे यूरोप में अफ्रीका के प्रति अभूतपूर्व उत्सुकता उत्पन्न हो गई। इस विशाल महाद्वीप के प्राकृतिक संसाधनों, नदियों, खनिज संपदा तथा व्यापारिक संभावनाओं की जानकारी मिलने पर यूरोपीय शक्तियों का ध्यान तेजी से अफ्रीका की ओर आकर्षित हुआ।
इसके बाद अफ्रीका का इतिहास शोषण, संघर्ष और उपनिवेशवाद की पीड़ादायक कथा बन गया। यूरोप की लगभग सभी प्रमुख शक्तियाँ इस महाद्वीप पर ऐसे टूट पड़ीं मानो गिद्ध किसी शिकार पर झपटते हों। अफ्रीका के विभिन्न भागों पर अधिकार स्थापित करने की होड़ प्रारंभ हो गई। प्रत्येक राष्ट्र इस महाद्वीप की भूमि, प्राकृतिक संपदा और व्यापारिक मार्गों में अपना अधिक-से-अधिक हिस्सा प्राप्त करना चाहता था। जो अफ्रीका कुछ वर्षों पूर्व तक यूरोप के लिए एक अज्ञात महाद्वीप था, वही अब साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा का प्रमुख केंद्र बन गया। 1890 ई. के आसपास तक यूरोप की तथाकथित सभ्य शक्तियाँ अफ्रीका को छोटे-छोटे भागों में बाँटकर अपने-अपने साम्राज्यों में सम्मिलित करने के लिए कटिबद्ध हो चुकी थीं। इस प्रकार विश्व राजनीति के मंच पर नवीन साम्राज्यवाद अपने सबसे स्पष्ट और नग्न रूप में प्रकट हुआ।
अफ्रीका की लूट
अफ्रीका में संगठित रूप से प्रवेश करने का प्रथम महत्त्वपूर्ण प्रयास बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड द्वितीय ने किया। वह डॉ. लिविंगस्टोन तथा हेनरी मॉर्टन स्टैनली की खोज यात्राओं से अत्यंत प्रभावित था। 1876 ई. में उसने ब्रुसेल्स में एक अंतरराष्ट्रीय भौगोलिक सम्मेलन आयोजित किया, जिसका घोषित उद्देश्य मध्य अफ्रीका के अज्ञात प्रदेशों की खोज तथा वहाँ मानवतावादी कार्यों को प्रोत्साहित करना था। इसी सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय अफ्रीका संघ की स्थापना की गई और विभिन्न देशों में इसकी शाखाएँ खोलने का निर्णय लिया गया। किंतु शीघ्र ही इस संस्था का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप समाप्त हो गया और उसकी शाखाएँ अपने-अपने राष्ट्रों के साम्राज्यवादी हितों की पूर्ति का साधन बन गईं।
1878 ई. में जब स्टैनली अपनी अफ्रीका यात्रा समाप्त कर यूरोप लौटा, तब बेल्जियम के राजा के प्रतिनिधियों ने उससे पुनः अफ्रीका जाने का अनुरोध किया। स्टैनली ब्रिटिश नागरिक था और प्रारंभ में चाहता था कि उसकी खोजों का लाभ ब्रिटेन को मिले, किंतु तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उसके प्रस्तावों में विशेष रुचि नहीं दिखाई। परिणामस्वरूप उसने लियोपोल्ड द्वितीय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और उसके संरक्षण में पुनः अफ्रीका की यात्रा पर निकल पड़ा।
अफ्रीका पहुँचकर स्टैनली ने विशेष रूप से कांगो क्षेत्र में कार्य प्रारंभ किया। उसने स्थानीय अफ्रीकी सरदारों से अनेक संधियाँ कराईं। इन संधियों में अधिकांश सरदार वास्तविक परिस्थितियों और कानूनी परिणामों से अनभिज्ञ थे। भय, दबाव, प्रलोभन तथा छल के माध्यम से उनसे ऐसे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करा लिए गए, जिनके द्वारा विशाल भूभागों पर यूरोपीय अधिकार स्थापित कर लिया गया। लगभग चार वर्षों के भीतर स्टैनली ने सैकड़ों संधियाँ संपन्न कर लीं और कांगो का विशाल प्रदेश बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड द्वितीय के प्रभाव क्षेत्र में आ गया।
लियोपोल्ड की इस सफलता से अन्य यूरोपीय शक्तियाँ भी चिंतित हो उठीं। विशेष रूप से ब्रिटेन और पुर्तगाल ने उसके बढ़ते प्रभाव का विरोध किया। पुर्तगाल ने कांगो क्षेत्र के व्यापक भाग पर अपना दावा प्रस्तुत किया और वहाँ अपना अधिकार स्थापित करने का प्रयास किया। इसी समय फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन तथा अन्य यूरोपीय देशों के प्रतिनिधि भी मध्य अफ्रीका में सक्रिय होकर स्थानीय सरदारों से संधियाँ कर रहे थे, अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र निर्धारित कर रहे थे तथा नए प्रदेशों पर अधिकार स्थापित करने की होड़ में लगे हुए थे।
फलस्वरूप लियोपोल्ड, पुर्तगाल, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के बीच गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए। अफ्रीका में उपनिवेशों की यह प्रतिस्पर्धा इतनी जटिल होती जा रही थी कि यूरोप में व्यापक संघर्ष की आशंका उत्पन्न होने लगी। इसलिए यह आवश्यक समझा गया कि सभी प्रमुख यूरोपीय शक्तियाँ एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में एकत्र होकर अफ्रीका के विभाजन तथा उपनिवेशों की स्थापना के संबंध में कुछ सामान्य सिद्धांत निर्धारित करें, जिससे उनके परस्पर विवादों का शांतिपूर्ण समाधान किया जा सके।
बर्लिन सम्मेलन (1884-1885 ई.)
अफ्रीका में यूरोपीय शक्तियों की तीव्र साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा के कारण उन्नीसवीं शताब्दी के आठवें दशक तक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी कि किसी भी समय उनके बीच युद्ध छिड़ सकता था। बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड द्वितीय की कांगो क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियाँ, पुर्तगाल के क्षेत्रीय दावे, फ्रांस और ब्रिटेन की विस्तारवादी नीतियाँ तथा जर्मनी के औपनिवेशिक क्षेत्र में प्रवेश ने परिस्थितियों को अत्यंत जटिल बना दिया। ऐसी स्थिति में अफ्रीका के विभाजन के संबंध में सामान्य सिद्धांत निर्धारित करना आवश्यक हो गया। इसी उद्देश्य से 15 नवंबर 1884 से 26 फरवरी 1885 ई. तक जर्मनी की राजधानी बर्लिन में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन की अध्यक्षता जर्मनी के चांसलर ओट्टो फ़ॉन बिस्मार्क ने की।
इस सम्मेलन में स्विट्ज़रलैंड को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख यूरोपीय राष्ट्र तथा संयुक्त राज्य अमेरिका सम्मिलित हुए। लगभग तीन महीने तक चली विस्तृत विचार-विमर्श की प्रक्रिया के बाद एक सामान्य अधिनियम तैयार किया गया, जिस पर सभी प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए। बर्लिन सम्मेलन आधुनिक साम्राज्यवाद के इतिहास की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना सिद्ध हुआ, क्योंकि इसी सम्मेलन ने अफ्रीका के औपनिवेशिक विभाजन के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों और सिद्धांतों का निर्धारण किया।
सम्मेलन के समक्ष मुख्यतः तीन महत्त्वपूर्ण प्रश्न थे। पहला, कांगो प्रदेश की राजनीतिक स्थिति का निर्धारण करना; दूसरा, नाइजर नदी क्षेत्र के व्यापार तथा प्रशासन के संबंध में व्यवस्था करना तथा तीसरा, भविष्य में अफ्रीका के अन्य प्रदेशों पर यूरोपीय शक्तियों द्वारा अधिकार स्थापित करने के लिए समान नियम निर्धारित करना।
कांगो प्रदेश के संबंध में सम्मेलन ने यह निर्णय दिया कि अंतरराष्ट्रीय अफ्रीका संघ के अधीन कांगो नदी के विस्तृत प्रवाह क्षेत्र को ‘कांगो फ्री स्टेट’ के रूप में मान्यता प्रदान की जाए। यद्यपि नाम के अनुसार यह एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय राज्य था, परंतु व्यवहार में इसका नियंत्रण पूर्णतः बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड द्वितीय के हाथों में रहा। साथ ही यह भी निर्धारित किया गया कि कांगो क्षेत्र का व्यापार सभी राष्ट्रों के लिए समान रूप से खुला रहेगा और कांगो नदी में नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय आयोग उसकी देखरेख करेगा।
नाइजर नदी के संबंध में भी लगभग इसी प्रकार की व्यवस्था की गई। नाइजर नदी के जलमार्ग को सभी देशों के लिए व्यापार हेतु खुला रखा गया। इस क्षेत्र में ब्रिटेन और फ्रांस के विशेष हितों को स्वीकार किया गया तथा नदी के नौवहन और व्यापारिक व्यवस्था के संचालन में ब्रिटेन को महत्त्वपूर्ण अधिकार प्राप्त हुए।
सम्मेलन का सबसे महत्त्वपूर्ण निर्णय उपनिवेशों की स्थापना के सिद्धांत से संबंधित था। यह निश्चित किया गया कि भविष्य में किसी भी यूरोपीय राष्ट्र का किसी प्रदेश पर अधिकार तभी मान्य माना जाएगा, जब वह वहाँ वास्तविक और प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर चुका हो। केवल कागज़ी दावा अथवा नाममात्र का अधिकार पर्याप्त नहीं होगा। साथ ही यह भी आवश्यक कर दिया गया कि यदि कोई राष्ट्र किसी नए प्रदेश को अपने अधिकार में लेना चाहता है, तो वह इसकी सूचना अन्य यूरोपीय शक्तियों को देगा, जिससे भविष्य में विवाद की संभावना कम हो सके। यही सिद्धांत आगे चलकर अफ्रीका के औपनिवेशिक विभाजन का आधार बना।
यद्यपि कांगो फ्री स्टेट को औपचारिक रूप से एक अंतरराष्ट्रीय राज्य घोषित किया गया था, किंतु वास्तविकता यह थी कि 1908 ई. तक यह बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड द्वितीय की निजी संपत्ति के समान संचालित होता रहा। उसके शासनकाल में कांगो के निवासियों पर अत्यंत अमानवीय अत्याचार किए गए। रबर उत्पादन बढ़ाने के लिए स्थानीय लोगों से जबरन श्रम कराया गया, विरोध करने वालों को कठोर दंड दिए गए और व्यापक स्तर पर हिंसा तथा शोषण हुआ। जब इन अत्याचारों की जानकारी यूरोप और अमेरिका में फैलने लगी तथा विश्वव्यापी आलोचना होने लगी, तब लियोपोल्ड द्वितीय को विवश होकर 1908 ई. में कांगो फ्री स्टेट बेल्जियम की सरकार को सौंपना पड़ा। इसके बाद यह क्षेत्र बेल्जियन कांगो के रूप में बेल्जियम का औपनिवेशिक प्रदेश बन गया। उल्लेखनीय है कि यह प्रदेश स्वयं बेल्जियम के क्षेत्रफल से लगभग दस गुना बड़ा था तथा रबर और अन्य प्राकृतिक संसाधनों से अत्यंत समृद्ध था।
अफ्रीका के विभाजन की प्रक्रिया
बर्लिन सम्मेलन के बाद अफ्रीका के विभाजन की प्रक्रिया अत्यंत तीव्र गति से आगे बढ़ी। लियोपोल्ड द्वितीय द्वारा कांगो में स्थापित उदाहरण का अनुसरण करते हुए अन्य यूरोपीय शक्तियाँ भी अधिकाधिक क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित करने के लिए सक्रिय हो गईं। प्रत्येक राष्ट्र इस बात के लिए उत्सुक था कि अफ्रीका के जितने अधिक प्रदेश संभव हों, उन्हें अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया जाए।
पुर्तगाल ने बेल्जियम के कांगो प्रदेश के दक्षिण में स्थित विशाल अंगोला क्षेत्र पर अपना अधिकार सुदृढ़ किया। उसके अतिरिक्त पूर्वी अफ्रीका में मोजाम्बिक पहले से ही उसके नियंत्रण में था। इस प्रकार पुर्तगाल ने अफ्रीका के पश्चिमी और पूर्वी तटों पर अपने उपनिवेशों को बनाए रखा।
इटली, जो साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा में अपेक्षाकृत देर से सम्मिलित हुआ था, भी अफ्रीका में अपना उपनिवेश स्थापित करने के लिए उत्सुक था। भूमध्यसागर के पार स्थित ट्यूनीशिया पर उसकी विशेष दृष्टि थी, किंतु 1881 ई. में फ्रांस ने उस पर अधिकार स्थापित कर लिया। इससे इटली को गहरा आघात पहुँचा। इसके पश्चात उसने पूर्वी अफ्रीका की ओर ध्यान दिया। 1885 ई. के बाद उसने लाल सागर के तटवर्ती क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाना प्रारंभ किया। एरिट्रिया तथा इतालवी सोमालीलैंड पर उसका अधिकार स्थापित हुआ। 1896 ई. में उसने अबीसीनिया (इथियोपिया) पर आक्रमण किया, किंतु अदवा के युद्ध में उसे पराजय का सामना करना पड़ा। बाद में 1911–12 ई. के इटली-तुर्की युद्ध के परिणामस्वरूप उसने त्रिपोली (लीबिया) पर अधिकार स्थापित कर लिया।
स्पेन ने भी इस औपनिवेशिक प्रतिस्पर्धा में भाग लिया। उसने उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका में रियो डी ओरो, स्पेनिश सहारा तथा स्पेनिश गिनी जैसे क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित किया।
जर्मनी, जिसने प्रारंभ में उपनिवेशवाद में विशेष रुचि नहीं दिखाई थी, 1884 ई. के बाद बिस्मार्क की नीति में परिवर्तन आने पर औपनिवेशिक विस्तार के क्षेत्र में उतर आया। शीघ्र ही उसने टोगोलैंड, कैमरून, जर्मन दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका (नामीबिया) तथा जर्मन पूर्वी अफ्रीका (तंज़ानिया के अधिकांश भाग) पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इस प्रकार जर्मनी भी अफ्रीका की साम्राज्यवादी दौड़ में एक महत्त्वपूर्ण शक्ति बन गया।
अफ्रीका के विभाजन में सबसे अधिक लाभ फ्रांस और ब्रिटेन को प्राप्त हुआ। फ्रांस ने 1830 ई. में अल्जीरिया पर अधिकार स्थापित कर अपने अफ्रीकी साम्राज्य की नींव रखी थी। इसके बाद उसने क्रमशः ट्यूनीशिया (1881 ई.), पश्चिमी अफ्रीका के विशाल प्रदेश, टिंबकटू (1894 ई.), मेडागास्कर (1896 ई.) तथा अंततः मोरक्को (1912 ई.) पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। फ्रांस का उद्देश्य पश्चिमी और उत्तरी अफ्रीका में एक विशाल तथा निरंतर फैला हुआ साम्राज्य स्थापित करना था।
ब्रिटेन का औपनिवेशिक साम्राज्य भी तीव्र गति से विस्तारित हुआ। उसका लक्ष्य केप कॉलोनी से काहिरा तक एक अखंड ब्रिटिश साम्राज्य स्थापित करना था। इस योजना के अंतर्गत उसने मिस्र, सूडान, पूर्वी अफ्रीका तथा दक्षिणी अफ्रीका में अपना प्रभाव बढ़ाया। किंतु दक्षिणी अफ्रीका में उसे डच मूल के बसने वालों, जिन्हें बोअर कहा जाता था, के तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा।
बोअर समस्या
1814 ई. में ब्रिटेन ने केप कॉलोनी को नीदरलैंड (हॉलैंड) से प्राप्त कर लिया। उस समय वहाँ बड़ी संख्या में डच मूल के किसान निवास करते थे, जिन्हें बोअर कहा जाता था। बोअर अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म और परंपराओं के प्रति अत्यंत निष्ठावान थे। वे दास-प्रथा के समर्थक थे तथा अपनी कृषि व्यवस्था में अफ्रीकी दासों का उपयोग करते थे। ब्रिटिश शासन ने अंग्रेज़ी प्रशासन, अंग्रेज़ी भाषा तथा दास-प्रथा के उन्मूलन की नीति अपनाई, जिससे बोअर समुदाय असंतुष्ट हो गया।
ब्रिटिश शासन से असंतुष्ट होकर 1836 ई. में हजारों बोअर परिवारों ने उत्तर की ओर पलायन किया। इस घटना को ‘ग्रेट ट्रेक’ कहा जाता है। उन्होंने आगे चलकर नेटाल, ऑरेंज फ्री स्टेट तथा ट्रांसवाल जैसे नए बोअर गणराज्यों की स्थापना की। किंतु ब्रिटेन ने सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण नेटाल पर पुनः अधिकार कर लिया। बाद में 1852 ई. की सैंड रिवर संधि तथा 1854 ई. की ब्लोमफोंटेन संधि द्वारा ट्रांसवाल और ऑरेंज फ्री स्टेट की स्वतंत्रता को स्वीकार कर लिया गया।
कुछ वर्षों तक दक्षिणी अफ्रीका में दो ब्रिटिश और दो बोअर राज्य साथ-साथ अस्तित्व में रहे। किंतु यह व्यवस्था स्थायी सिद्ध नहीं हुई। 1877 ई. में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बेंजामिन डिज़रायली ने साम्राज्यवादी नीति अपनाते हुए ट्रांसवाल का विलय करने का प्रयास किया। जूलू आक्रमण के खतरे को बहाना बनाकर ब्रिटेन ने ट्रांसवाल पर अधिकार कर लिया। बोअरों ने इसका तीव्र विरोध किया और संघर्ष प्रारंभ हुआ। अंततः 1881–84 ई. के समझौतों के बाद ट्रांसवाल को पुनः सीमित स्वतंत्रता प्राप्त हुई।
स्थिति तब बदल गई जब ट्रांसवाल में विशाल स्वर्ण-खानों की खोज हुई। सोने के आकर्षण से बड़ी संख्या में अंग्रेज वहाँ बसने लगे। उन्होंने मतदान और नागरिक अधिकारों की माँग की। बोअर नेताओं को आशंका थी कि यदि इन नवागंतुकों को राजनीतिक अधिकार दे दिए गए, तो वे अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक बन जाएँगे। इसलिए उन्होंने नागरिकता संबंधी कठोर कानून बनाए। इससे अंग्रेजों और बोअरों के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया।
इस समय दक्षिणी अफ्रीका में ब्रिटिश साम्राज्यवाद का सबसे बड़ा समर्थक सेसिल रोड्स था। वह बोअर गणराज्यों का अस्तित्व समाप्त कर संपूर्ण दक्षिणी अफ्रीका को ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन लाना चाहता था। दूसरी ओर ट्रांसवाल के राष्ट्रपति पॉल क्रूगर किसी भी परिस्थिति में ब्रिटिश हस्तक्षेप स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। दोनों पक्षों ने युद्ध की तैयारी प्रारंभ कर दी।
अंततः 1899 ई. में द्वितीय बोअर युद्ध प्रारंभ हुआ, जो 1902 ई. तक चला। प्रारंभिक चरण में बोअरों ने असाधारण साहस और युद्ध-कौशल का परिचय दिया, किंतु ब्रिटेन की विशाल सेना तथा आधुनिक संसाधनों के सामने वे अधिक समय तक टिक नहीं सके। लॉर्ड रॉबर्ट्स और लॉर्ड किचनर के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने अंततः बोअरों को पराजित कर दिया। 1902 ई. की वेरिनिगिंग संधि के अनुसार ट्रांसवाल और ऑरेंज फ्री स्टेट दोनों ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन आ गए।
बोअर युद्ध का प्रभाव केवल दक्षिणी अफ्रीका तक सीमित नहीं रहा। इस युद्ध ने यूरोप की राजनीति को भी गहराई से प्रभावित किया। युद्ध के दौरान जर्मनी के सम्राट ने राष्ट्रपति पॉल क्रूगर को समर्थन और बधाई का संदेश भेजा, जिससे ब्रिटेन और जर्मनी के संबंधों में कटुता बढ़ गई। ब्रिटेन को यह संदेह होने लगा कि जर्मनी बोअरों के माध्यम से उसके साम्राज्यवादी हितों को चुनौती देना चाहता है। परिणामस्वरूप दोनों देशों के बीच अविश्वास और प्रतिस्पर्धा तीव्र हो गई।
बोअर युद्ध के समय अधिकांश यूरोपीय राष्ट्रों की सहानुभूति बोअरों के साथ थी। ब्रिटेन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगभग अकेला पड़ गया। इस अनुभव से उसे यह स्पष्ट हो गया कि उसकी ‘शानदार पृथकता’ की नीति अब व्यावहारिक नहीं रही। अपनी अंतरराष्ट्रीय स्थिति को सुदृढ़ बनाने के लिए उसे अन्य शक्तियों के साथ समझौते करने पड़े। परिणामस्वरूप 1902 ई. में ब्रिटेन-जापान संधि तथा 1904 ई. में फ्रांस के साथ एन्तान्त कॉर्डियल संपन्न हुई। इस प्रकार कहा जा सकता है कि बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में विश्व राजनीति में जो महत्त्वपूर्ण कूटनीतिक परिवर्तन हुए, उनमें बोअर युद्ध का भी अप्रत्यक्ष किंतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान था।
मिस्र में ब्रिटेन
अफ्रीका में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के मार्ग में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक फ्रांस था। विशेष रूप से मिस्र और सूडान के क्षेत्रों में दोनों देशों के साम्राज्यवादी हित परस्पर टकरा रहे थे। ब्रिटेन की मिस्र में विशेष रुचि का प्रमुख कारण स्वेज नहर थी। इस नहर का निर्माण 1869 ई. में फ्रांसीसी अभियंता फ़र्डिनांड डी लेसेप्स के प्रयासों से पूरा हुआ। स्वेज नहर के संचालन के लिए एक कंपनी की स्थापना की गई, जिसमें मुख्य भागीदारी फ्रांसीसी पूँजीपतियों तथा मिस्र के शासक (खदीव) की थी। नहर के निर्माण के बाद ब्रिटेन को उसके वास्तविक सामरिक और आर्थिक महत्त्व का पूर्णतः आभास हुआ। स्वेज नहर ने यूरोप से भारत तथा पूर्वी एशिया तक समुद्री मार्ग को अत्यधिक छोटा और सुविधाजनक बना दिया। इस जलमार्ग पर नियंत्रण का अर्थ था एशिया के साथ व्यापार तथा ब्रिटिश साम्राज्य के पूर्वी उपनिवेशों, विशेषकर भारत, पर प्रभावी नियंत्रण। इसलिए ब्रिटेन के लिए यह आवश्यक हो गया कि वह किसी भी प्रकार इस महत्त्वपूर्ण जलमार्ग पर अपना प्रभाव स्थापित करे।
ब्रिटेन को अपनी इस नीति को कार्यान्वित करने का अवसर शीघ्र ही मिल गया। 1875 ई. में मिस्र के शासक खदीव इस्माइल अत्यधिक अपव्ययी नीतियों और निरंतर बढ़ते विदेशी ऋणों के कारण गंभीर आर्थिक संकट में फँस गए। उन्होंने अनेक यूरोपीय देशों से भारी ऋण लिया था, किंतु उससे भी आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं हुआ। अंततः विवश होकर उन्होंने स्वेज नहर कंपनी में अपने हिस्से के शेयर बेचने का निर्णय लिया। उस समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बेंजामिन डिज़रायली थे, जो कट्टर साम्राज्यवादी विचारों के समर्थक थे। जैसे ही उन्हें इन शेयरों की बिक्री का समाचार मिला, उन्होंने तत्काल आवश्यक धन की व्यवस्था कर मिस्र के सभी शेयर खरीद लिए। परिणामस्वरूप स्वेज नहर पर ब्रिटेन का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया और अब इस महत्त्वपूर्ण जलमार्ग में ब्रिटेन तथा फ्रांस दोनों की साझेदारी स्थापित हो गई।
यद्यपि स्वेज नहर के शेयर बेचने से मिस्र को तत्काल कुछ धन प्राप्त हुआ, फिर भी उसकी आर्थिक स्थिति में कोई स्थायी सुधार नहीं हुआ। 1876 ई. तक मिस्र लगभग दिवालिया हो चुका था। उसने अनेक यूरोपीय देशों से ऋण लिया था और अब उनके भुगतान में असमर्थ था। ऐसी स्थिति में खदीव ने ऋणों के पुनर्गठन और भुगतान स्थगित करने का प्रयास किया। इससे सबसे अधिक चिंतित ब्रिटेन और फ्रांस हुए, क्योंकि उन्होंने मिस्र को सबसे अधिक ऋण दिया था। दोनों देशों ने संयुक्त रूप से मिस्र की आर्थिक व्यवस्था की जाँच कराई और उसके बाद मिस्र की आय-व्यय व्यवस्था तथा राजस्व पर आंग्ल-फ्रांसीसी संयुक्त नियंत्रण स्थापित कर दिया। इस प्रकार मिस्र की आर्थिक स्वतंत्रता लगभग समाप्त हो गई।
यह द्वैध नियंत्रण अधिक समय तक सफल नहीं रह सका। मिस्र की जनता विदेशी हस्तक्षेप से अत्यंत असंतुष्ट थी। 1879 ई. में यूरोपीय शक्तियों के दबाव में खदीव इस्माइल को पदच्युत कर उनके पुत्र तौफीक को मिस्र का नया खदीव बनाया गया, किंतु इससे भी जनता का असंतोष समाप्त नहीं हुआ। विदेशी अधिकारियों का प्रभाव निरंतर बढ़ता गया और मिस्रवासियों में राष्ट्रीय चेतना का विकास होने लगा। इसी पृष्ठभूमि में अहमद अरबी (अरबी पाशा) के नेतृत्व में एक शक्तिशाली राष्ट्रीय आंदोलन प्रारंभ हुआ। आंदोलन का प्रमुख नारा था— ‘मिस्र, मिस्रवासियों के लिए।’ इस आंदोलन का उद्देश्य विदेशी हस्तक्षेप का अंत करना तथा राष्ट्रीय स्वाधीनता की रक्षा करना था।
अरबी पाशा के नेतृत्व में बढ़ते आंदोलन से ब्रिटेन और फ्रांस दोनों चिंतित हो गए। प्रारंभ में उन्होंने संयुक्त रूप से इस विद्रोह को दबाने की योजना बनाई, किंतु अंतिम समय में फ्रांस ने सैन्य हस्तक्षेप से स्वयं को अलग कर लिया। परिणामस्वरूप ब्रिटेन ने अकेले ही कार्रवाई करने का निर्णय लिया। ब्रिटिश सेना ने सितंबर 1882 ई. में तेल-एल-कबीर के युद्ध में अरबी पाशा की सेना को पराजित कर दिया। इसके साथ ही मिस्र पर ब्रिटेन के वास्तविक नियंत्रण का मार्ग प्रशस्त हो गया। यद्यपि औपचारिक रूप से मिस्र अब भी उस्मानी साम्राज्य के अधीन खदीव के शासन में था, किंतु उसकी वास्तविक सत्ता ब्रिटेन के हाथों में चली गई।
अरबी पाशा की पराजय के बाद ब्रिटेन ने मिस्र की प्रशासनिक, आर्थिक और वित्तीय व्यवस्था का पुनर्गठन अपने साम्राज्यवादी हितों के अनुरूप करना प्रारंभ किया। 1883 ई. में लॉर्ड क्रोमर (एवलिन बेरिंग) को मिस्र में ब्रिटिश महावाणिज्यदूत नियुक्त किया गया। उन्होंने लगभग एक चौथाई शताब्दी तक मिस्र के प्रशासन पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखा। उनके शासनकाल में वित्तीय सुधार, सिंचाई व्यवस्था का विस्तार तथा प्रशासनिक पुनर्गठन तो हुआ, किंतु इन सबका प्रमुख उद्देश्य ब्रिटिश हितों की रक्षा करना था। नाममात्र के लिए शासन खदीव के हाथों में था, परंतु वास्तविक निर्णय ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा लिए जाते थे। अंततः 1914 ई. में प्रथम विश्वयुद्ध के प्रारंभ होने पर ब्रिटेन ने मिस्र को औपचारिक रूप से अपना संरक्षित राज्य घोषित कर दिया और उस्मानी साम्राज्य से उसका संबंध समाप्त कर दिया।
सामान्यतः यह स्वीकार किया जाता है कि मिस्र में ब्रिटेन की सफलता के पीछे जर्मनी के चांसलर ओट्टो फ़ॉन बिस्मार्क की सहानुभूतिपूर्ण नीति का भी महत्त्वपूर्ण योगदान था। बिस्मार्क उस समय यूरोप में शक्ति-संतुलन बनाए रखने की नीति का समर्थक था और वह ब्रिटेन के मिस्र संबंधी प्रयासों में बाधा उत्पन्न नहीं करना चाहता था। ब्रिटिश विदेश मंत्री लॉर्ड ग्रेनविल ने भी बिस्मार्क के इस सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया था। उनका मत था कि यदि बिस्मार्क उस समय ब्रिटेन की योजनाओं का विरोध करता, तो मिस्र में ब्रिटिश नीति को सफल बनाना अत्यंत कठिन हो जाता।
बिस्मार्क भली-भाँति जानता था कि मिस्र में ब्रिटेन की कार्रवाई से फ्रांस और रूस दोनों असंतुष्ट हैं तथा इस परिस्थिति में ब्रिटेन को जर्मनी की सद्भावना की आवश्यकता है। उसने इस स्थिति का लाभ उठाने का प्रयास किया। प्रारंभ में वह जर्मनी के औपनिवेशिक विस्तार का विरोधी था, किंतु अब उसने औपनिवेशिक नीति का समर्थन करना आरंभ कर दिया। उसे विश्वास था कि ब्रिटेन, जर्मनी के औपनिवेशिक प्रयासों का विरोध नहीं करेगा। फलस्वरूप 1884 ई. के बाद जर्मनी ने भी अफ्रीका और प्रशांत क्षेत्र में उपनिवेश स्थापित करने प्रारंभ कर दिए।
बिस्मार्क केवल औपनिवेशिक क्षेत्रों में ब्रिटिश सहानुभूति प्राप्त करके संतुष्ट नहीं था। वह ब्रिटेन से यह आश्वासन भी चाहता था कि यदि भविष्य में फ्रांस जर्मनी पर आक्रमण करे, तो ब्रिटेन जर्मनी का समर्थन करेगा। किंतु ब्रिटेन ने ऐसा कोई राजनीतिक वचन देने से स्पष्ट इनकार कर दिया। इससे बिस्मार्क अत्यंत असंतुष्ट हुआ। इसके बाद उसने औपनिवेशिक विवादों में फ्रांस के प्रति अपेक्षाकृत सहानुभूतिपूर्ण नीति अपनानी प्रारंभ की। इससे एक ओर फ्रांस की सद्भावना प्राप्त करने की संभावना बनी, तो दूसरी ओर ब्रिटेन की साम्राज्यवादी योजनाओं पर अप्रत्यक्ष दबाव भी बनाया जा सकता था।
सूडान और फशोदा कांड
उधर सूडान के प्रश्न को लेकर ब्रिटेन और फ्रांस के बीच प्रतिस्पर्धा तीव्र होती जा रही थी। फ्रांस मिस्र में ब्रिटेन के बढ़ते प्रभाव से पहले ही असंतुष्ट था। स्वेज नहर में ब्रिटेन की भागीदारी तथा मिस्र में ब्रिटिश सेना की स्थायी उपस्थिति फ्रांस को अत्यंत आपत्तिजनक लगती थी। दूसरी ओर ब्रिटेन फ्रांसीसी हितों की परवाह किए बिना अपनी साम्राज्यवादी नीति को आगे बढ़ा रहा था। फ्रांस का उद्देश्य पश्चिम से पूर्व की ओर उत्तरी अफ्रीका में एक विशाल साम्राज्य स्थापित करना था, जबकि ब्रिटेन केप से काहिरा तक उत्तर-दक्षिण दिशा में अखंड साम्राज्य का स्वप्न देख रहा था। परिणामस्वरूप सूडान, विशेषकर नील नदी के दक्षिणी क्षेत्र, दोनों शक्तियों की प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गया।
सूडान पहले मिस्र के अधिकार में था, किंतु 1881 ई. में वहाँ मुहम्मद अहमद के नेतृत्व में एक शक्तिशाली धार्मिक और राजनीतिक विद्रोह प्रारंभ हुआ। उन्होंने स्वयं को महदी घोषित किया और विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान किया। 1885 ई. में महदी के अनुयायियों ने खार्तूम पर अधिकार कर लिया तथा ब्रिटिश सेनापति जनरल चार्ल्स गॉर्डन की हत्या कर दी। गॉर्डन की मृत्यु ने ब्रिटेन को गहरे स्तर पर झकझोर दिया और सूडान का प्रश्न ब्रिटिश प्रतिष्ठा से जुड़ गया।
महदी आंदोलन को समाप्त करने के लिए ब्रिटेन ने बाद में लॉर्ड किचनर के नेतृत्व में एक सुसंगठित और आधुनिक सेना सूडान भेजी। दूसरी ओर फ्रांस इस सिद्धांत को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था कि सूडान केवल ब्रिटेन का प्रभाव क्षेत्र है। उस समय साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच यह प्रथा चल पड़ी थी कि जो यूरोपीय शक्ति किसी क्षेत्र में पहले पहुँचकर अपना ध्वज स्थापित कर दे, वह उस क्षेत्र पर अपना दावा प्रस्तुत कर सकती है।
इसी नीति के अंतर्गत फ्रांसीसी अधिकारी मेजर जां-बाप्तिस्त मार्शां के नेतृत्व में एक अभियान 1898 ई. में सूडान पहुँचा और फशोदा नामक स्थान पर फ्रांस का ध्वज फहरा दिया। उसी समय लॉर्ड किचनर महदी विद्रोह को कुचलते हुए उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ रहे थे। जब वे फशोदा पहुँचे, तो वहाँ ब्रिटिश और फ्रांसीसी सेनाएँ आमने-सामने आ गईं। किचनर ने मार्चाँ से फ्रांसीसी ध्वज हटाने और वहाँ से वापस जाने की माँग की। स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण हो गई और ऐसा प्रतीत होने लगा कि दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ जाएगा।
यद्यपि राष्ट्रीय सम्मान का प्रश्न दोनों पक्षों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण था, फिर भी अंततः युद्ध टल गया। फ्रांसीसी सरकार ने व्यापक राजनीतिक परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए अपनी सेना को वापस बुलाने का निर्णय लिया। परिणामस्वरूप सूडान पर ब्रिटेन का प्रभुत्व स्थापित हो गया और फशोदा का संकट समाप्त हो गया।
फशोदा कांड के बाद दोनों देशों के बीच वार्ता हुई। 1899 ई. के समझौते में फ्रांस ने मिस्र और सूडान पर अपने दावों का परित्याग कर दिया, जबकि ब्रिटेन ने मोरक्को में फ्रांस के विशेष हितों को स्वीकार करने की दिशा में सहमति व्यक्त की। यह समझौता आगे चलकर दोनों देशों के संबंधों में सुधार का आधार बना।
फशोदा संकट के समय फ्रांस के विदेश मंत्री थियोफ़िल डेलकासे की नीति अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई। वे जर्मनी को फ्रांस का मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानते थे और ब्रिटेन के साथ संघर्ष बढ़ाने के पक्ष में नहीं थे। उनका विचार था कि जर्मनी की बढ़ती शक्ति का सामना करने के लिए ब्रिटेन के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करना फ्रांस के हित में है। इसी कारण फ्रांस ने फशोदा के प्रश्न पर समझौते का मार्ग अपनाया और युद्ध टल गया।
1899 ई. का आंग्ल-फ्रांसीसी समझौता फ्रांस के लिए भी लाभदायक सिद्ध हुआ। इससे उसे उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका में अपने साम्राज्य के विस्तार का मार्ग अधिक स्पष्ट मिला और कांगो से लेकर अल्जीरिया तक उसके प्रभाव क्षेत्र को सुदृढ़ता प्राप्त हुई। साथ ही यह समझौता भविष्य में दोनों देशों के बीच व्यापक सहयोग की नींव बना, जिसका परिणाम 1904 ई. की एन्तान्त कॉर्डियल के रूप में सामने आया।
फशोदा कांड ने ब्रिटेन की विदेश नीति पर भी गहरा प्रभाव डाला। संकट के समय ब्रिटेन ने अनुभव किया कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में वह लगभग अकेला पड़ गया है और उसकी ‘शानदार पृथकता’ की नीति अब व्यावहारिक नहीं रह गई है। दूसरी ओर जर्मन सम्राट कैसर विलियम द्वितीय इस आशा में था कि ब्रिटेन और फ्रांस के बीच युद्ध छिड़ जाएगा, जिससे जर्मनी को राजनीतिक लाभ मिल सके। यद्यपि ऐसा नहीं हुआ, किंतु इस संकट ने ब्रिटेन को अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य कर दिया। परिणामस्वरूप उसने धीरे-धीरे पृथकता की नीति का परित्याग किया और यूरोपीय शक्तियों के साथ मैत्रीपूर्ण समझौतों की दिशा में कदम बढ़ाए।
इस प्रकार यूरोपीय शक्तियों ने बिना किसी व्यापक युद्ध के अफ्रीका का विभाजन तो कर लिया, किंतु इसका अर्थ यह नहीं था कि उनके बीच मतभेद या तनाव उत्पन्न नहीं हुए। अफ्रीका में साम्राज्यवादी विस्तार की प्रतिस्पर्धा ने यूरोप की प्रमुख शक्तियों के बीच अविश्वास और प्रतिद्वंद्विता को निरंतर बढ़ाया। फशोदा कांड इसका सर्वाधिक स्पष्ट उदाहरण था। यद्यपि यह संकट युद्ध में परिवर्तित नहीं हुआ, फिर भी इसके बाद भी साम्राज्यवादी विवाद समाप्त नहीं हुए। आगे चलकर 1905–06 ई. का प्रथम मोरक्को संकट, 1908 ई. का बोस्निया संकट तथा 1911 ई. का अगादीर संकट (द्वितीय मोरक्को संकट) यूरोपीय राजनीति को पुनः संकटग्रस्त करने वाले प्रमुख अंतरराष्ट्रीय विवाद सिद्ध हुए। इन संकटों ने महाशक्तियों के बीच अविश्वास, प्रतिस्पर्धा और सैन्य तनाव को अत्यधिक बढ़ा दिया, जिसके परिणामस्वरूप प्रथम विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हुई।
अफ्रीका का बँटवारा



