यूरोप का औपनिवेशिक विस्तार (European Colonial Expansion)

यूरोप का औपनिवेशिक विस्तार (European Colonial Expansion)

यूरोप का औपनिवेशिक विस्तार

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में यूरोप के देशों द्वारा एशिया, अफ्रीका तथा प्रशान्त महासागर के अनेक क्षेत्रों में किए गए औपनिवेशिक विस्तार ने विश्व इतिहास की दिशा ही बदल दी। यह काल ‘नवीन साम्राज्यवाद’ का युग कहलाता है। इस युग में यूरोप की शक्तियों ने केवल व्यापार तक अपने संबंध सीमित नहीं रखे, बल्कि राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित कर विशाल साम्राज्यों का निर्माण किया। परिणामस्वरूप विश्व की राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक संरचना में व्यापक परिवर्तन हुए। यूरोप की महाशक्तियों के बीच उपनिवेश प्राप्त करने की तीव्र प्रतिस्पर्धा ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को नई दिशा प्रदान की तथा आगे चलकर विश्व युद्धों की पृष्ठभूमि भी तैयार की।

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम भाग को सामान्यतः ‘औपनिवेशिक उदासीनता’ का युग कहा जाता है। इस समय यूरोपीय देशों का ध्यान मुख्यतः अपने आंतरिक राजनीतिक पुनर्गठन, औद्योगिक विकास तथा राष्ट्रीय एकीकरण पर केंद्रित था। किंतु 1870 ई. के बाद परिस्थितियाँ तेजी से बदलने लगीं। औद्योगिक क्रांति के प्रभाव, राष्ट्रीयता की भावना, आर्थिक आवश्यकताओं, तकनीकी प्रगति तथा सामरिक हितों के कारण यूरोप की शक्तियों ने पुनः उपनिवेशों की स्थापना को अपनी राष्ट्रीय नीति का प्रमुख अंग बना लिया। 1880 के दशक तक यह प्रवृत्ति इतनी तीव्र हो गई कि अगले लगभग पच्चीस वर्षों में लगभग सम्पूर्ण अफ्रीका का विभाजन यूरोपीय शक्तियों के बीच हो गया तथा एशिया और प्रशान्त क्षेत्र के अनेक प्रदेश भी उनके अधिकार में आ गए।

ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी इस औपनिवेशिक प्रतिस्पर्धा के प्रमुख केंद्र थे, किंतु बेल्जियम, इटली, पुर्तगाल, स्पेन तथा नीदरलैंड जैसे अपेक्षाकृत छोटे यूरोपीय देशों ने भी इस दौड़ में सक्रिय भाग लिया। नवीन साम्राज्यवाद किसी एक कारण का परिणाम नहीं था, बल्कि अनेक आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा सामरिक कारणों के सम्मिलित प्रभाव से इसका विकास हुआ। इसलिए यूरोप के औपनिवेशिक विस्तार को समझने के लिए उसके विभिन्न कारणों का क्रमबद्ध अध्ययन आवश्यक है।

अतिरिक्त उत्पादन की समस्या

नवीन साम्राज्यवाद के विकास में आर्थिक कारणों की सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप यूरोप के देशों में उत्पादन की मात्रा अभूतपूर्व रूप से बढ़ गई। 1861 ई. के बाद फ्रांस, जर्मनी, इटली तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में भी तीव्र गति से औद्योगीकरण हुआ। इससे केवल ब्रिटेन का औद्योगिक एकाधिकार समाप्त नहीं हुआ, बल्कि विभिन्न देशों के बीच तीव्र औद्योगिक प्रतिस्पर्धा भी प्रारंभ हो गई।

उत्पादन बढ़ने के साथ सबसे बड़ी समस्या यह उत्पन्न हुई कि तैयार माल की खपत कहाँ की जाए। इसी समय यूरोप के अधिकांश देशों ने संरक्षणवादी नीति अपनाई और विदेशी वस्तुओं पर भारी आयात-शुल्क लगा दिए। परिणामस्वरूप प्रत्येक देश का घरेलू बाजार विदेशी वस्तुओं के लिए लगभग बंद हो गया। ऐसी स्थिति में औद्योगिक देशों को अपने अतिरिक्त उत्पादों के लिए नए बाजारों की आवश्यकता अनुभव हुई।

इस समस्या का सबसे सुविधाजनक समाधान उपनिवेशों की स्थापना माना गया। उपनिवेशों में साम्राज्यवादी देश बिना किसी विदेशी प्रतिस्पर्धा के अपने माल की बिक्री कर सकते थे। इसलिए उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में जब यूरोप में संरक्षणवाद बढ़ रहा था, उसी समय उपनिवेशों के लिए संघर्ष भी अत्यधिक तीव्र हो गया। इस प्रकार अतिरिक्त उत्पादन नवीन साम्राज्यवाद का एक प्रमुख आर्थिक आधार बन गया। इस संदर्भ में प्रसिद्ध अन्वेषक हेनरी स्टेनले का उदाहरण उल्लेखनीय है। उसने ब्रिटेन के वस्त्र व्यापारियों के समक्ष तर्क दिया कि यदि अफ्रीका के निवासी यूरोपीय शैली के वस्त्र पहनने लगें, तो वहाँ लाखों मीटर कपड़े की खपत हो सकती है। इस प्रकार व्यापारियों ने भी साम्राज्यवाद का उत्साहपूर्वक समर्थन करना प्रारंभ कर दिया, क्योंकि उन्हें इसमें अपने अतिरिक्त उत्पादन की खपत का स्थायी साधन दिखाई देता था।

अतिरिक्त पूँजी का निवेश

औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप यूरोप में केवल वस्तुओं का ही नहीं, बल्कि पूँजी का भी अत्यधिक संचय हुआ। बड़े-बड़े उद्योगपतियों और व्यापारियों के हाथों में विशाल धनराशि एकत्र हो गई। अब उनके सामने यह समस्या उत्पन्न हुई कि इस अतिरिक्त पूँजी का निवेश कहाँ किया जाए जिससे अधिक लाभ प्राप्त हो सके।

अपने देश में निवेश के अवसर सीमित थे, जबकि उपनिवेशों में रेलमार्गों, बंदरगाहों, खानों, वृक्षारोपणों तथा अन्य सार्वजनिक निर्माण कार्यों में निवेश की असीम संभावनाएँ थीं। पहले यूरोपीय पूँजीपति स्पेनिश अमेरिका तथा अन्य पिछड़े देशों को ऋण देते थे, किंतु अनेक बार ऋण वापस न मिलने के कारण उन्हें भारी हानि उठानी पड़ती थी। इसलिए उन्होंने यह उचित समझा कि ऐसे क्षेत्रों पर पहले राजनीतिक नियंत्रण स्थापित किया जाए और फिर वहाँ सुरक्षित रूप से पूँजी निवेश किया जाए।

यही कारण था कि बड़े-बड़े बैंक, वित्तीय संस्थाएँ और उद्योगपति अपनी सरकारों पर उपनिवेश स्थापित करने के लिए निरंतर दबाव डालते रहे। मोरक्को में फ्रांसीसी प्रभाव की स्थापना तथा अफ्रीका के अनेक क्षेत्रों में यूरोपीय निवेश इसी आर्थिक नीति का परिणाम थे।

यातायात और संचार के साधनों का विकास

औद्योगिक क्रांति के साथ-साथ यातायात और संचार के साधनों में भी अभूतपूर्व विकास हुआ। भाप से चलने वाले जहाजों ने समुद्री यात्रा को अधिक सुरक्षित, तेज और सस्ता बना दिया। इसी प्रकार तार तथा समुद्री तार के आविष्कार ने दूरस्थ क्षेत्रों से तत्काल संपर्क स्थापित करना संभव बना दिया। इन तकनीकी प्रगतियों के कारण दूर-दराज़ स्थित उपनिवेशों का प्रशासन पहले की तुलना में कहीं अधिक सरल हो गया। सैनिकों, अधिकारियों तथा व्यापारिक वस्तुओं का तीव्र गति से आवागमन संभव हुआ। अनेक बार रेलवे, बंदरगाह अथवा संचार व्यवस्था के निर्माण के बहाने यूरोपीय शक्तियाँ किसी क्षेत्र में प्रवेश करती थीं और बाद में उस पर अपना राजनीतिक नियंत्रण स्थापित कर लेती थीं। इस प्रकार यातायात और संचार के साधनों का विकास नवीन साम्राज्यवाद के विस्तार का एक महत्त्वपूर्ण साधन सिद्ध हुआ।

उष्ण कटिबंधीय वस्तुओं एवं कच्चे माल की आवश्यकता

औद्योगिक विकास के साथ यूरोपीय देशों को बड़ी मात्रा में कच्चे माल तथा उष्ण कटिबंधीय उत्पादों की आवश्यकता होने लगी। कपड़ा उद्योग के लिए कपास, रबर उद्योग के लिए प्राकृतिक रबर, चीनी उद्योग के लिए गन्ना, तथा अन्य उद्योगों के लिए खनिज, लकड़ी, ताड़ का तेल, कॉफी, चाय, कोको तथा मसालों की निरंतर बढ़ती मांग ने उपनिवेशों के आर्थिक महत्त्व को अत्यधिक बढ़ा दिया।

साइकिल और मोटरगाड़ी के आविष्कार के बाद रबर की माँग में तीव्र वृद्धि हुई। इसी प्रकार यूरोप की बढ़ती जनसंख्या और औद्योगिककरण के कारण खाद्यान्न उत्पादन अपेक्षाकृत कम पड़ने लगा। फलतः अनाज, मांस तथा अन्य खाद्य पदार्थों की आपूर्ति के लिए भी उपनिवेश आवश्यक समझे जाने लगे। इस प्रकार उपनिवेश केवल तैयार माल के बाजार ही नहीं रहे, बल्कि वे कच्चे माल और खाद्य पदार्थों के स्थायी स्रोत भी बन गए।

आर्थिक आत्मनिर्भरता की भावना

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में यूरोप के देशों में आर्थिक आत्मनिर्भरता की भावना भी प्रबल होने लगी। यह विचार विकसित हुआ कि यदि किसी राष्ट्र के पास पर्याप्त उपनिवेश होंगे, तो उसे आवश्यक वस्तुओं के लिए अन्य देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और इटली जैसे राष्ट्र अपने साम्राज्य के भीतर ही कच्चे माल की प्राप्ति, तैयार माल की बिक्री तथा खाद्यान्न की आपूर्ति सुनिश्चित करना चाहते थे। इस प्रकार आर्थिक आत्मनिर्भरता की नीति ने भी नवीन साम्राज्यवाद को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।

व्यवसायी वर्ग की भूमिका

साम्राज्यवाद के विस्तार में कुछ विशेष आर्थिक वर्गों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही। वस्त्र उद्योग, लौह-इस्पात उद्योग, जहाज निर्माण, बैंकिंग, बीमा तथा निर्यात-व्यापार से जुड़े व्यापारी उपनिवेशों के सबसे बड़े समर्थक थे। वे अपने उत्पादों के लिए नए बाजार चाहते थे और इस उद्देश्य की पूर्ति उपनिवेशों के माध्यम से सरलता से हो सकती थी।

बड़ी जहाज कंपनियों को समुद्री मार्गों पर सुरक्षित बंदरगाहों और कोयला भंडारण केंद्रों की आवश्यकता थी। इसलिए वे भी साम्राज्यवाद का समर्थन करती थीं। अस्त्र-शस्त्र तथा गोला-बारूद बनाने वाली कंपनियाँ भी औपनिवेशिक युद्धों से लाभ कमाती थीं, क्योंकि प्रत्येक युद्ध उनके उत्पादों की माँग बढ़ा देता था।

बैंकों की भूमिका भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। जर्मनी का डॉयचे बैंक निकट-पूर्व में जर्मन साम्राज्यवाद का प्रमुख समर्थक बना। इसी प्रकार ब्रिटेन के रॉथ्सचाइल्ड बैंक ने प्रधानमंत्री डिज़रायली को स्वेज नहर के शेयर खरीदने हेतु वित्तीय सहायता प्रदान की तथा बाद में मिस्र में ब्रिटिश प्रभाव स्थापित करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अन्य निहित स्वार्थ

व्यवसायी वर्ग के अतिरिक्त अनेक अन्य वर्ग भी साम्राज्यवाद के समर्थक थे। सेना के अधिकारियों के लिए औपनिवेशिक युद्ध प्रतिष्ठा, पदोन्नति तथा सम्मान प्राप्त करने का अवसर प्रदान करते थे। इसलिए वे विशाल सेना तथा नए सैन्य अभियानों के पक्षधर रहते थे। कूटनीतिज्ञों के लिए भी नए उपनिवेश प्राप्त करना राष्ट्रीय गौरव तथा व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का विषय था। जो राजनयिक किसी क्षेत्र को अपने देश के प्रभाव में ले आता था, उसकी प्रतिष्ठा तत्काल बढ़ जाती थी। इसी प्रकार औपनिवेशिक प्रशासन में नियुक्त अधिकारियों के लिए उपनिवेश रोजगार, उच्च पद तथा आर्थिक समृद्धि के नए अवसर प्रदान करते थे। ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों में हजारों शिक्षित युवक औपनिवेशिक सेवाओं में नियुक्त होकर उच्च प्रशासनिक पदों पर पहुँचे। उनके परिवारों का राष्ट्रीय राजनीति पर भी पर्याप्त प्रभाव था, इसलिए वे निरंतर उपनिवेशों के विस्तार का समर्थन करते रहे।

ईसाई मिशनरियाँ

एशिया और अफ्रीका की ‘पथभ्रष्ट’ पिछड़ी जातियों में ईसाई धर्म फैलाने के लिए यूरोप के ईसाई पादरियों ने भी साम्राज्यवाद को जबर्दस्त समर्थन दिया। पादरी लोग नए उपनिवेशों की स्थापना से बहुत खुश होते थे, क्योंकि उन्हें ईसाई धर्म फैलाने का नया क्षेत्र मिल जाता था। ईसाई पादरी साम्राज्य-विस्तार के एक अच्छे साधन बन जाते थे। धर्म-प्रचार के कार्य में बर्बर जातियों द्वारा पादरियों को मार दिए जाने पर साम्राज्यवादियों को एक अच्छा बहाना, ‘ईश्वर-प्रदत्त मौका’, मिल जाता था। धर्म-प्रचारक पादरियों के हितों के लिए उनके शासक चिंतित रहते थे और विदेशों में यदि पादरियों का किसी प्रकार अपमान होता था, तो राष्ट्रीय सरकार उस अपमान का बदला लेने के बहाने उन देशों पर आक्रमण करती थी या उनके आंतरिक शासन में हस्तक्षेप करती थी। उदाहरणार्थ, उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में चीन में दो जर्मन ईसाई पादरियों की हत्या हो गई और इसका बदला लेने के लिए जर्मनी ने उसके एक बंदरगाह पर कब्जा कर लिया।

मिशनरियों ने प्रत्यक्ष रूप से भी साम्राज्यवाद को प्रोत्साहित किया। डॉ. लिविंगस्टोन ने ब्रिटिश सरकार से आग्रह किया कि अफ्रीका पर ब्रिटिश साम्राज्य कायम हो, ताकि वहाँ ईसाई धर्म का प्रचार किया जा सके। जर्मन पादरी ईसाई धर्म की ओर झुकाने की अपेक्षा साम्राज्यवाद की ओर ही अधिक लोगों को झुका सके। ईसाई पादरियों ने आदिवासी लोगों में कपड़ा पहनने का प्रचार किया। उसके बाद स्वभावतः व्यापारी पहुँचे। व्यापारियों के बाद शासक पहुँच जाते, जो अपनी समस्त शक्ति के साथ किसी भी देश पर आक्रमण कर बैठते थे और पहले से आए हुए पादरियों से गुप्तचर का कार्य लेने लगते थे। इस प्रकार उपनिवेश की स्थापना हो जाती थी। ईसाई धर्म के प्रचारकों में कुछ लोग तो सच्चे धार्मिक तथा मानव-प्रेमी थे और उन्होंने मानवता की वास्तविक सेवाएँ भी कीं, परंतु उपनिवेशों के लोगों को व्यापारियों तथा सरकारी कर्मचारियों के अमानुषिक अत्याचार का शिकार बनना पड़ा। कुछ भी हो, साम्राज्यवाद के विस्तार में इन धार्मिक प्रयत्नों का बड़ा ही महत्त्वपूर्ण स्थान है।

भौगोलिक साहसिकों का वर्ग

 पुनर्जागरण के समय से यूरोप में भौगोलिक खोजों की जो प्रवृत्ति चल पड़ी थी, उसमें उन्नीसवीं शताब्दी में और विकास हुआ। इस काल में अनेक भौगोलिक साहसिक उत्पन्न हुए, जिन्होंने केवल साहसपूर्ण कार्यों के लिए ही नए-नए उपनिवेशों को ढूँढ़ निकाला। इनके द्वारा नए-नए देशों का पता लगा, जिससे साम्राज्य-विस्तार में काफी सहायता मिली। इन साहसिकों को भौगोलिकों से पूरी सहायता मिली। कुछ भौगोलिक सत्यों की घोषणा करके अज्ञात देशों की खोज के लिए इन भौगोलिकों ने साहसिकों को प्रोत्साहित किया। इसी आधार पर अनेक उत्साही व्यक्ति अज्ञात प्रदेशों की खोज में निकल पड़े और नए-नए भू-खंडों का पता लगाया। हेनरी मोर्टन स्टेनले, डॉ. डेविड लिविंगस्टोन तथा गुस्टाव नाख्टीगाल कुछ ऐसे ही उत्साही व्यक्ति थे। यूरोपीय साम्राज्य के विस्तार में उनका प्रत्यक्ष हाथ था। कांगो में बेल्जियम का उपनिवेश स्टेनले के कार्यों के फलस्वरूप ही संभव हो सका। कैमरून और टोगोलैंड को जर्मन उपनिवेश बनाने का श्रेय गुस्टाव नाख्टीगाल को दिया जाता है।

उग्र राष्ट्रीयता

नवीन साम्राज्यवाद की मुख्य प्रेरक शक्ति राष्ट्रीयता से प्राप्त हुई थी। इन दिनों प्रतिक्रिया के विरुद्ध संघर्ष करके राष्ट्रीयता की विजय हो चुकी थी और जर्मनी में तथा उसका अनुकरण करके अन्य देशों में भी यह उग्र रूप धारण करती जा रही थी। ब्रिटेन और हालैंड जैसे छोटे देशों के अधीन विशाल साम्राज्य देखकर अन्य देशों में, विशेषकर जर्मनी, इटली तथा हालैंड में भी साम्राज्य की इच्छा जागृत हुई। राष्ट्र के गौरव तथा राष्ट्रीय अभिमान की भावना की संतुष्टि के लिए यह आवश्यक मालूम होने लगा कि उनके पास भी साम्राज्य हों। यूरोप की महान शक्ति कहलाने के लिए उपनिवेशों का होना नितांत आवश्यक समझा जाने लगा। इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए उग्र सामरिक राष्ट्रीयता का अवलंबन किया गया। जर्मनी ने अपनी अद्वितीय सैन्य शक्ति से यूरोप के दो प्रमुख राज्यों—फ्रांस तथा ऑस्ट्रिया को परास्त करके यूरोप के राज्यों में प्रमुख स्थान प्राप्त कर लिया था। इस विजय से जर्मन राज्य का आत्माभिमान बहुत बढ़ गया। वह अपने-आपको सर्वश्रेष्ठ समझने लगा और संसार में अपनी शक्ति के अनुरूप स्थान प्राप्त करने के लिए कटिबद्ध हो गया। राष्ट्रीयता की यह उग्र चेतना जर्मनी से अन्य राष्ट्रों में पहुँची और अंतरराष्ट्रीय विद्वेष, शंका एवं अशांति साम्राज्यवाद के कारण बन गए।

साम्राज्यवादी प्रचार

साम्राज्यवाद के निहित स्वार्थ, जिन्होंने स्वार्थ-साधन के लिए साम्राज्यवाद का समर्थन किया और उसे प्रोत्साहित किया, उनकी संख्या बहुत कम थी। देश के अधिकांश निवासी न तो इसके प्रबल समर्थक थे और न ही साम्राज्यवाद से उन्हें प्रत्यक्ष लाभ था। यदि सच पूछा जाए, तो साम्राज्यवादी नीति से कुछ पूँजीपतियों को ही लाभ था। कर देने वाली जनता, छोटे-छोटे पूँजीपति तथा मजदूरों को इससे कोई लाभ नहीं था। उद्योग तथा व्यापार से जो मुनाफा होता था, उसे यदि अपने देश के औद्योगिक विकास में लगाया जाता, तो मजदूरों को कुछ लाभ भी होता; किंतु अतिरिक्त पूँजी पिछड़े हुए देशों में लगाई जाती थी, जहाँ बहुत ही कम मजदूरी पर मजदूर मिल जाते थे। फिर भी यूरोपीय देशों के सभी सामाजिक वर्गों ने साम्राज्यवाद के विस्तार में पूँजीपतियों का साथ दिया। इन पूँजीपतियों ने बड़ी आसानी से बहुमत को अपने पक्ष में कर लिया। यह एक आश्चर्य की बात है, किंतु एक तथ्य है। बहुमत को अपने पक्ष में करने के लिए पूँजीपतियों ने जबर्दस्त प्रचार किया। अपने देश में पूँजीपति लोग बहुत अधिक संगठित और शक्तिशाली थे। शासन पर उनका पूरा प्रभाव होता था। अपनी कार्यसिद्धि के लिए वे पानी की तरह धन बहाते थे। राजनीतिक दलों को पैसा देकर अपनी मुट्ठी में रखते थे। देश के समाचार-पत्रों और प्रचार के अन्य साधनों पर उनका एकाधिकार रहता था। इन साधनों के सहारे उन्होंने सर्वसाधारण की नैसर्गिक भावनाओं को बड़ी खूबी के साथ उभारा। इसके लिए उन्होंने निम्नलिखित उपायों का अवलंबन किया—

आत्म-रक्षा

मनुष्य सबसे पहले सुरक्षा चाहता है। विदेशी आक्रमण के भय से कोई भी व्यक्ति आतंकित हो सकता है। ऐसे आतंकित व्यक्ति को अपने पक्ष में करने के लिए जिस तर्क का सहारा लिया जाता था, वह इस प्रकार था—विदेशी आक्रमण से रक्षा के लिए तैयार रहना आवश्यक है। इसके लिए थलसेना और नौसेना में वृद्धि करना आवश्यक है। किंतु सामुद्रिक अड्डों के अभाव में नौसेना का क्या महत्त्व हो सकता था? अतः बाह्य देशों में जहाजी बेड़ों के अड्डों को आवश्यक बताया गया। इसी तर्क का सहारा लेकर बीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण तक ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका आदि देशों ने सारे संसार में अपने-अपने सामुद्रिक अड्डे स्थापित किए। फिर सामुद्रिक अड्डों की रक्षा के लिए उसके पास-पड़ोस के भू-भागों पर अधिकार जमाना भी आवश्यक हो गया।

आत्म-रक्षा की आवश्यकता के आधार पर यह तर्क दिया जाता था कि युद्ध के समय अबाध रूप से कच्चा माल प्राप्त करने के लिए उपनिवेशों का होना अत्यंत आवश्यक है। वे यह कहकर सर्वसाधारण को धोखा देते थे कि यदि पिछड़े देशों पर आधिपत्य कायम नहीं किया गया, तो युद्ध के समय कोयला और लोहा नहीं मिल सकेगा और इस कारण युद्धोपयोगी सामग्री तैयार नहीं हो सकेगी। तेल नहीं मिलने के कारण जहाजों का चलना बंद हो जाएगा। इसके बाद जब कुछ प्रदेशों पर अधिकार हो जाता था, तो साम्राज्यवाद के पोषक जनता को यह कहकर अपनी ओर कर लेते थे कि उन उपनिवेशों की रक्षा के लिए मजबूत जहाजी बेड़े का होना आवश्यक है और साथ ही बंदरगाहों पर आधिपत्य भी। इसी प्रकार की दलीलें देकर भोली-भाली जनता को साम्राज्यवाद के पक्ष में कर लिया जाता था।

आर्थिक राष्ट्रीयता और आर्थिक कल्याण

उद्योगों के विस्तार के साथ कच्चे माल को प्रचुर मात्रा में और सस्ते दामों में प्राप्त करने तथा तैयार माल को अधिक-से-अधिक लाभ पर बेचने के लिए उपयुक्त बाजार की आवश्यकता का अनुभव होने लगा था। इन आवश्यकताओं की पूर्ति का एकमात्र साधन यही था कि पिछड़े हुए उष्णकटिबंधीय प्रदेशों में, जहाँ सब प्रकार का कच्चा माल प्राप्त हो सकता है और तैयार माल बेचा जा सकता है, व्यापारिक क्षेत्र स्थापित किए जाएँ, ताकि किसी अन्य राष्ट्र को वहाँ माल खरीदने और बेचने की सुविधा न हो सके तथा कच्चे माल के क्रय और तैयार माल के विक्रय—दोनों की दृष्टि से देश स्वावलंबी हो सके। इस कारण उष्णकटिबंधीय प्रदेशों पर अधिकार जमाने के लिए विभिन्न राष्ट्रों में तीव्र प्रतियोगिता होने लगी। इस प्रकार आर्थिक राष्ट्रीयता का जन्म हुआ। अब साधारण जनता से यह कहा गया कि कच्चे माल और बाजार के लिए अन्य देशों पर आधिपत्य स्थापित करने में ही राष्ट्र का आर्थिक कल्याण है। इसके फलस्वरूप देश का व्यापार बढ़ेगा, आर्थिक उन्नति होगी और बेकारी की समस्या का अंत होगा।

राष्ट्रीय प्रतिष्ठा

साम्राज्यवादियों ने जनता की राष्ट्रीयता और देश-प्रेम की भावना को अच्छी तरह उभारा। राष्ट्र की प्रतिष्ठा बढ़े, यह आकांक्षा प्रत्येक व्यक्ति में रहती है। अतएव सर्वसाधारण जनता से यह कहा जाता था कि यदि उनके राष्ट्र का अधिकार पिछड़े हुए देशों पर होगा, तो उनके देश की प्रतिष्ठा बढ़ेगी और उनका राष्ट्र धन-धान्य से परिपूर्ण होगा। उस समय लोगों का यह विश्वास था कि प्रथम श्रेणी का राष्ट्र होने के लिए उपनिवेशों का होना अत्यन्त आवश्यक है। इसी भावना से प्रेरित होकर अफ्रीका के पूर्वी किनारे के एक अनुपजाऊ भू-भाग पर आधिपत्य बनाए रखने के लिए इटली की जनता ने करोड़ों डॉलर खर्च करने में तनिक भी आगा-पीछा नहीं किया। जिस समय एक ब्रिटिश नागरिक संसार के नक्शे पर ‘लाल रंग’ को देखता था, उस समय वह खुशी से पागल हो जाता था। ‘सूर्य के नीचे जगह’ पाने के लिए जर्मनी बहुत उत्सुक रहता था और इसके लिए जर्मन नागरिक सब कुछ बलिदान करने के लिए तैयार रहते थे। अफ्रीका में फ्रांस का साम्राज्य कायम हो, इसके लिए फ्रांस की जनता व्यग्र थी। यह राष्ट्र की प्रतिष्ठा का प्रश्न था। अतएव फ्रांस की जनता ने साम्राज्य की स्थापना के लिए हर तरह की सहायता की, क्योंकि वे जानते थे कि यदि इस प्रश्न पर सहायता नहीं दी जाएगी, तो फ्रांस तुरंत ही द्वितीय या तृतीय श्रेणी का राष्ट्र बन जाएगा।

राष्ट्र की प्रतिष्ठा को दूसरी तरह से भी धक्का पहुँच सकता था। यदि किसी गैर-यूरोपीय देश में साम्राज्यवादी देश के नागरिक या राष्ट्रीय झंडे का अपमान होता, तो इस अपमान का बदला लेना उस देश का कर्तव्य माना जाता था। चीन में जर्मनी के दो पादरियों की हत्या की गई, तो जर्मनी ने इसको अपमान माना और चीनियों की इस धृष्टता के लिए, साथ ही उन्हें सबक देने के लिए, उनके एक बंदरगाह पर अधिकार कर लिया। एक इटालियन लड़की को ट्रिपोली का एक मुसलमान भगाकर ले गया, तो इस अपमान का बदला लेने के लिए ट्रिपोली पर आधिपत्य करना आवश्यक हो गया। इस तरह राष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त करने की आकांक्षा भी नवीन साम्राज्यवाद का एक प्रेरक तत्त्व सिद्ध हुई।

अतिरिक्त जनसंख्या का प्रश्न

देश की बढ़ती हुई आबादी की समस्या को भी साम्राज्यवाद के प्रसार के लिए प्रचार का एक साधन बनाया गया। इसमें कोई शक नहीं कि उस समय यूरोपीय देशों की जनसंख्या में अपार वृद्धि हो रही थी। यूरोप के औद्योगिक देशों के समक्ष यह प्रमुख समस्या थी और इसके समाधान का एक ही उपाय था कि कुछ लोग बाहर जाकर उपनिवेशों में रहें। उपनिवेशों में रहने से मातृभूमि से उनका संबंध बना रहता था। अतएव जनता से यह कहा गया कि यदि बढ़ती हुई आबादी के लिए उपनिवेश नहीं कायम किए गए, तो देश के अंदर विकट आर्थिक संकट उत्पन्न हो जाएगा। बेकारी बढ़ जाएगी और खाद्यान्नों की कमी हो जाएगी। इस परिस्थिति में जनता सरकार को मदद देने से इंकार नहीं कर सकती थी।

किंतु बढ़ती हुई आबादी का यह तर्क सिर्फ एक हौवा के अतिरिक्त कुछ और नहीं था। आँकड़ों से पता चलता है कि 1864 ई. से 1914 ई. तक लगभग दो करोड़ यूरोपीय निवासी अपना देश छोड़कर बाहर गए, किंतु उनमें पाँच लाख ही ऐसे लोग थे, जो उपनिवेशों में जाकर बसे। उपनिवेशों की जलवायु उनके मनोनुकूल नहीं होती थी और इसलिए वे वहाँ बसना नहीं चाहते थे।

परोपकारिता और मानवता

यूरोपीय देशों के राष्ट्रीय अभियान की भावना में अपनी सभ्यता के उच्च होने का अभिमान भी शामिल था और उनमें यह भावना जोर पकड़ने लगी कि पृथ्वी के विभिन्न भागों में बसे हुए असभ्य, अर्द्धनग्न तथा अविकसित लोगों के बीच अपनी उत्कृष्ट सभ्यता तथा संस्कृति का प्रसार कर उनका उद्धार करना तथा उन्हें ऊँचा उठाना उनका कर्तव्य है। रुडयार्ड किपलिंग ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि काले लोगों को सभ्य बनाना गोरे लोगों का महान उत्तरदायित्व है। इस उत्तरदायित्व के प्रति अपने देशवासियों का ध्यान आकृष्ट करने के लिए यूरोपीय देशों में अनेक विद्वानों ने ग्रंथों की रचना की। फ्रांस के जुल्स फेरी, ब्रिटेन के शीले तथा जर्मनी के प्रोफेसर ट्राइट्श्के कुछ ऐसे ही व्यक्ति थे। इस भावना को प्रोफेसर मून ने आक्रामक परोपकारिता की संज्ञा दी है, क्योंकि श्रेष्ठ यूरोपीय सभ्यता को काले लोगों पर लादने के लिए शक्ति का प्रयोग करना आवश्यक था। इसमें कोई संदेह नहीं कि साम्राज्यवाद के विस्तार में इन ‘परोपकारी और मानवतावादी’ प्रयत्नों का बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है।

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