संयुक्त राज्य अमेरिका की विदेश नीति (1919–1939 ई.)
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक संयुक्त राज्य अमेरिका एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभर चुका था। विश्व में उसकी प्रतिष्ठा बढ़ने लगी थी और इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस, इटली, रूस तथा स्पेन जैसे राष्ट्र उसकी शक्ति को स्वीकार करने लगे थे। साथ ही, अमेरिकी प्रभाव निरंतर बढ़ता जा रहा था। इस प्रकार अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध का संरक्षक बन गया था। क्यूबा, फिलीपींस आदि क्षेत्रों में उसने अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था। चीन और जापान से भी उसके संबंध विकसित हो चुके थे, औद्योगिक तथा व्यापारिक क्षेत्र में भी अमेरिका तीव्र गति से प्रगति कर रहा था।
विश्व राजनीति में अमेरिका के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की शुरुआत सर्वप्रथम थियोडोर रूजवेल्ट के शासनकाल में हुई। बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक के महत्त्वपूर्ण रूस-जापान युद्ध (1904–05 ई.) में अमेरिका ने हस्तक्षेप किया। रूजवेल्ट के प्रयासों से रूस जापान के साथ संधि करने के लिए बाध्य हुआ, जिसके परिणामस्वरूप 1905 ई. में पोर्ट्समाउथ की संधि संपन्न हुई।
1914 ई. में एक छोटे-से विवाद से प्रारंभ हुआ संघर्ष आगे चलकर प्रथम विश्व युद्ध में परिवर्तित हो गया। यह युद्ध ऑस्ट्रिया और सर्बिया के बीच आरंभ हुआ था। सर्बिया के समर्थन में रूस के आने पर जर्मनी ने ऑस्ट्रिया का साथ दिया। दूसरी ओर, ब्रिटेन और फ्रांस भी युद्ध में सम्मिलित हो गए, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका प्रारंभ में कुछ समय तक अपनी तटस्थता की नीति पर चलता रहा।
1914 से 1917 ई. तक राष्ट्रपति वुडरो विल्सन के नेतृत्व में अमेरिका निरंतर इस प्रयास में लगा रहा कि किसी प्रकार इस महायुद्ध का शांतिपूर्ण समाधान हो जाए। इस युद्ध के संबंध में अमेरिका के भीतर दो मत थे। एक वर्ग ब्रिटेन का समर्थक था, जबकि दूसरा जर्मनी के पक्ष में था। दोनों पक्षों के बीच निरंतर मतभेद बने रहे।
विश्व युद्ध प्रारंभ होने के बाद अमेरिकी जनरलों और एडमिरलों ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने की माँग की, किंतु राष्ट्रपति विल्सन का मत था कि यदि अमेरिका युद्ध की तैयारी करेगा, तो शांति स्थापित कराने की उसकी क्षमता कम हो जाएगी। परंतु जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ता गया, विल्सन के विचारों में परिवर्तन आने लगा। तटस्थ राज्य के रूप में अपने अधिकारों की रक्षा करना अमेरिका के लिए कठिन होता जा रहा था। समुद्री व्यापार और यात्रा संबंधी अधिकारों की सुरक्षा के लिए उसे युद्धरत दोनों पक्षों से विवाद करना पड़ा।
राष्ट्रपति विल्सन ने ब्रिटेन, जर्मनी तथा अन्य यूरोपीय देशों से आग्रह किया कि वे बिना किसी हार-जीत का निर्णय किए समानता के आधार पर युद्ध समाप्त कर दें। किंतु इस अपील का किसी भी यूरोपीय शक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। जर्मनी के कैसर विलियम द्वितीय ने भी इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।
परिस्थितियाँ लगातार बदलती रहीं और अंततः अमेरिका को 6 अप्रैल 1917 ई. को जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करनी पड़ी। इस प्रकार वह अप्रत्यक्ष रूप से ग्रेट ब्रिटेन तथा मित्र राष्ट्रों के पक्ष में युद्ध में शामिल हो गया। अमेरिकी सेनाओं ने पूर्ण तैयारी के साथ युद्ध में भाग लिया और अनेक महत्त्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त कीं।
जर्मनी का अंतिम आक्रमण विफल होने के बाद मित्र राष्ट्रों की सेनाओं ने उसे पीछे धकेलना प्रारंभ कर दिया। जर्मनी की आरक्षित सेनाएँ समाप्त हो चुकी थीं, उसकी रेजिमेंटें कमजोर पड़ गई थीं तथा परिवहन व्यवस्था भी चरमरा गई थी। ऐसी स्थिति में जर्मन सेनापतियों ने राष्ट्रपति विल्सन के समक्ष शांति प्रस्ताव रखा। कई दिनों तक विभिन्न शर्तों पर वार्ता चलती रही, किंतु अंततः जर्मनी को अपनी अधिकांश माँगें छोड़नी पड़ीं और बिना शर्त आत्मसमर्पण करना पड़ा। 11 नवंबर 1918 ई. को युद्धविराम पर जर्मन प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए और प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हो गया।
1920 ई. तक संयुक्त राज्य अमेरिका युद्ध पर लगभग 32 अरब डॉलर व्यय कर चुका था, जो किसी भी अन्य राष्ट्र की तुलना में अधिक था। युद्धकाल में अमेरिका ने लगभग 7 अरब डॉलर का ऋण यूरोपीय देशों को दिया। युद्ध समाप्त होने के बाद भी उसने लगभग 33 अरब डॉलर मूल्य की सहायता-सामग्री पीड़ित देशों को भेजी। यह सहायता ‘शांति ऋण’ (पीस लोन) के नाम से प्रसिद्ध हुई।
वुडरो विल्सन के 14 सूत्र
युद्ध के दौरान ही एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह था कि युद्ध की समाप्ति के बाद शांति की स्थापना किस आधार पर की जाए। यह स्पष्ट था कि युद्ध-पूर्व की स्थिति में लौटना संभव नहीं था। युद्ध में सम्मिलित होने के कुछ समय पूर्व राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने ऐसी शांति-व्यवस्था की रूपरेखा प्रस्तुत की, जिससे अमेरिका तथा मित्र राष्ट्रों के उदारवादी वर्ग को पर्याप्त संतोष हुआ। विल्सन के 14 सूत्रों ने उस समय मित्र राष्ट्रों का उत्साह बढ़ाया, जब उनका मनोबल गिरा हुआ था। इन सूत्रों ने मित्र राष्ट्रों के उद्देश्यों को नैतिक आधार प्रदान किया।
विल्सन के 14 सूत्र पूर्णतः उनकी मौलिक कल्पना नहीं थे। इनमें से अनेक विचार कुछ समय पूर्व ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के भाषण में प्रस्तुत किए जा चुके थे तथा कुछ विचार बोल्शेविक नेताओं द्वारा युद्ध संबंधी उद्देश्यों में सम्मिलित किए गए थे।
सर्वप्रथम उन्होंने यह प्रस्ताव रखा कि सभी अंतरराष्ट्रीय समझौते खुले रूप में किए जाएँ। इसके बाद उन्होंने कुछ सामान्य सिद्धांतों की चर्चा की, जैसे— समुद्री स्वतंत्रता, शस्त्रों में कटौती, आर्थिक प्रतिबंधों की समाप्ति तथा सभी उपनिवेशों के दावों का स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्णय। इसके पश्चात उन्होंने विभिन्न भौगोलिक विवादों के समाधान के आधार प्रस्तुत किए।

विल्सन के अनुसार अल्सास-लॉरेन के संबंध में फ्रांस के साथ जो अन्याय हुआ था, उसका प्रतिकार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इटली की सीमाओं का निर्धारण राष्ट्रीयता के सिद्धांत के आधार पर पुनः किया जाना चाहिए। उन्होंने एक स्वतंत्र पोलैंड की स्थापना का समर्थन किया तथा ऑस्ट्रिया-हंगरी के लोगों को स्वायत्तता प्रदान करने की बात कही। बोल्शेविक सरकार को ध्यान में रखते हुए उन्होंने कहा कि रूस की जनता को अपने जीवन का स्वरूप स्वयं निर्धारित करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। अंत में, उन्होंने बड़े और छोटे सभी राज्यों की राजनीतिक स्वतंत्रता तथा क्षेत्रीय अखंडता की पारस्परिक गारंटी के लिए राष्ट्र संघ की स्थापना की आवश्यकता पर बल दिया।
विल्सन का इन 14 सूत्रों में सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने इन्हें अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया और समस्त विश्व का ध्यान उनकी ओर आकर्षित किया। इन सूत्रों के कारण उनकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा में भी वृद्धि हुई। जर्मनी और ऑस्ट्रिया के शांति प्रस्तावों का उत्तर देने के लिए वे प्रधान मित्र एवं संबद्ध राष्ट्रों के अधिकृत प्रवक्ता बन गए। विल्सन ने अपने अंतिम सूत्र पर विशेष बल दिया, जिसका आशय राष्ट्र संघ की स्थापना से था।
वर्साय की संधि और अमेरिका
12 जनवरी 1919 ई. को पेरिस में पहली बार प्रमुख शक्तियों की बैठक हुई। संधि की शर्तों के निर्माण में चार प्रमुख राष्ट्राध्यक्षों की मुख्य भूमिका थी। ये थे— वुडरो विल्सन (अमेरिका), जॉर्ज क्लेमेंसो (फ्रांस), डेविड लॉयड जॉर्ज (ब्रिटेन) तथा विट्टोरियो ऑरलैंडो (इटली)।
अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के अध्यक्ष स्वयं राष्ट्रपति विल्सन थे। उन्होंने न तो सीनेट के किसी प्रभावशाली सदस्य को और न ही रिपब्लिकन दल के किसी प्रमुख नेता को अपने साथ लिया। उन्हें अपने आदर्शों पर इतना विश्वास था कि वे मतभेदों को स्वीकार करने के इच्छुक नहीं थे।
संधि-निर्माण का कार्य प्रारंभ में सर्वोच्च परिषद (सुप्रीम काउंसिल) को सौंपा गया था, जिसमें पाँच प्रमुख शक्तियों—संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली तथा जापानके दो-दो प्रतिनिधियों सहित कुल दस सदस्य सम्मिलित थे। किंतु शीघ्र ही इटली और जापान की भूमिका सीमित हो गई और वे निर्णय-निर्माण की मुख्य प्रक्रिया से अलग हो गए। परिणामस्वरूप संधि-निर्माण का वास्तविक दायित्व मुख्यतः संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन के प्रतिनिधियों के हाथों में केंद्रित हो गया।
संधि की शर्तें तैयार होने के बाद उन्हें जर्मनी के समक्ष प्रस्तुत किया गया। शर्तों को देखकर जर्मन प्रतिनिधि अत्यंत आक्रोशित हुए। लंबे वाद-विवाद के बाद अंततः उन्हें संधि पर हस्ताक्षर करने पड़े। इस संधि की शर्तें विजेता राष्ट्रों ने निर्धारित कीं और पराजित राष्ट्रों से उन्हें स्वीकार कराया गया। जर्मनी की किसी भी आपत्ति पर ध्यान नहीं दिया गया। इसके बाद ऑस्ट्रिया, हंगरी, बुल्गारिया तथा तुर्की के साथ भी अलग-अलग संधियाँ संपन्न की गईं।
वर्साय संधि अत्यंत विस्तृत और जटिल दस्तावेज़ थी। केवल जर्मनी से संबंधित संधि में ही लगभग 80,000 शब्द सम्मिलित थे। इसके प्रावधानों को मुख्यतः पाँच भागों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम, यूरोप की क्षेत्रीय व्यवस्था का पुनर्गठन किया गया, जिसके अंतर्गत अनेक सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया गया। द्वितीय, जर्मनी की सैन्य शक्ति को कठोर रूप से सीमित एवं कमजोर करने के उपाय किए गए। तृतीय, जर्मनी तथा उसके सहयोगी राष्ट्रों पर युद्ध से हुई क्षति की भरपाई के लिए क्षतिपूर्ति का दायित्व आरोपित किया गया। चतुर्थ, जर्मनी के उपनिवेशों और अधीनस्थ प्रदेशों का विजयी शक्तियों के मध्य विभाजन किया गया। अंततः, अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सहयोग को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से राष्ट्र संघ की स्थापना का प्रावधान किया गया था।
फ्रांस को अल्सास-लॉरेन पुनः लौटा दिया गया तथा सार का कोयला-क्षेत्र 15 वर्षों के लिए उसके प्रशासन में दे दिया गया। रूस, प्रशा और ऑस्ट्रिया के कुछ क्षेत्रों को मिलाकर स्वतंत्र पोलैंड का गठन किया गया। डांज़िग को मुक्त बंदरगाह घोषित कर पोलैंड के अधिकार में दिया गया। श्लेसविग-होल्स्टीन का कुछ भाग पुनः डेनमार्क को लौटा दिया गया। ऑस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य का विभाजन कर अनेक नए स्वतंत्र राज्यों का गठन किया गया। बोहेमिया और मोराविया को मिलाकर चेकोस्लोवाकिया बनाया गया तथा बोस्निया, हर्जेगोविना, क्रोएशिया और सर्बिया को मिलाकर यूगोस्लाविया का गठन किया गया।
जर्मनी की सैनिक शक्ति को समाप्त करने तथा उसके पुनरुत्थान को रोकने के लिए अनेक कठोर प्रावधान किए गए। उसे अनिवार्य सैनिक सेवा समाप्त करने, युद्ध सामग्री बनाने वाले कारखानों पर नियंत्रण छोड़ने तथा अपनी सैन्य शक्ति सीमित करने के लिए बाध्य किया गया। साथ ही, जर्मनी को युद्ध के लिए पूर्णतः उत्तरदायी ठहराकर उससे युद्ध-क्षतिपूर्ति की राशि वसूलने का निर्णय लिया गया। इस संधि से जर्मनी की शक्ति तो कमजोर हुई, किंतु जिन राष्ट्रों को अपेक्षित लाभ नहीं मिला, वे असंतुष्ट रहे।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका की विदेश नीति में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। अब अमेरिका एक ऋणी राष्ट्र से बदलकर विश्व का प्रमुख ऋणदाता बन गया। प्रथम विश्व युद्ध ने अमेरिका की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बनाया। जो अमेरिका पहले अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपेक्षाकृत पीछे था, वह अब विश्व की अग्रणी शक्तियों में सम्मिलित हो गया।
उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन थे। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि राष्ट्र संघ की स्थापना का प्रयास था, जिसने विश्व राजनीति में अमेरिका की प्रतिष्ठा को नई ऊँचाई प्रदान की। विल्सन ने राष्ट्र संघ की प्रसंविदा का प्रारूप तैयार किया। इसका मूल सिद्धांत यह था कि विश्व के सभी राष्ट्र अपने विवादों का समाधान शांतिपूर्ण ढंग से करें तथा सामूहिक सुरक्षा के आधार पर एक-दूसरे की रक्षा करें।
धारा 10 के अंतर्गत प्रत्येक सदस्य राष्ट्र को उसकी क्षेत्रीय अखंडता तथा राजनीतिक स्वतंत्रता की सुरक्षा का आश्वासन दिया गया। धारा 12 में विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की व्यवस्था की गई तथा धारा 16 में यह प्रावधान था कि यदि कोई राष्ट्र प्रसंविदा का उल्लंघन कर युद्ध प्रारंभ करे, तो पहले उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाएँ और आवश्यकता पड़ने पर उसके विरुद्ध सामूहिक सैनिक कार्रवाई की जाए।
इतिहासकार डल्स के अनुसार वर्साय की संधि में राष्ट्र संघ के प्रस्ताव को सम्मिलित कराने का प्रमुख कारण यह था कि राष्ट्रपति वुडरो विल्सन स्वयं पेरिस गए और उन्होंने इस प्रस्ताव का दृढ़तापूर्वक समर्थन किया।
1920 के दशक में अमेरिका की विदेश नीति
प्रथम विश्व युद्ध के बाद अमेरिका की विदेश नीति पुनः जार्ज वाशिंगटन की परंपरागत पृथकतावादी नीति की ओर लौट गई। 1920 से 1932 ई. तक अमेरिका ने विदेश नीति के क्षेत्र में वही मार्ग अपनाया, जिसे छोड़ने में राष्ट्रपति वुडरो विल्सन को लगभग तीन वर्ष लगे थे।
राष्ट्रपति विल्सन चाहते थे कि 1920 ई. के राष्ट्रपति चुनाव राष्ट्र संघ के पक्ष या विपक्ष में जनमत का रूप ले लें, किंतु घरेलू समस्याओं ने मतदाताओं का अधिक ध्यान आकर्षित किया। परिणामस्वरूप रिपब्लिकन दल के उम्मीदवार वॉरेन जी. हार्डिंग विजयी हुए। उनकी विदेश नीति का आधार पृथकतावाद था।
यद्यपि अमेरिका पृथकतावादी नीति का समर्थक था, फिर भी उसके लिए विश्व के राजनीतिक और आर्थिक मामलों से पूर्णतः अलग रहना संभव नहीं था। थियोडोर रूजवेल्ट का यह कथन कि ‘यह अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है कि विश्व में हमारी भूमिका क्या है, बल्कि यह अधिक महत्त्वपूर्ण है कि हम अपनी भूमिका का निर्वहन सही ढंग से करते हैं या नहीं’, 1920 के दशक की अमेरिकी स्थिति पर पूरी तरह लागू होता था।
समय के साथ अमेरिका धीरे-धीरे राजनीतिक पृथकतावाद से दूर होने लगा। 1920 के दशक का प्रारंभ यद्यपि विश्व राजनीति से दूरी बनाए रखने की नीति के साथ हुआ, किंतु दशक के अंत तक अमेरिका अनिच्छा के बावजूद विश्व मामलों में सक्रिय भूमिका निभाने की दिशा में अग्रसर हो गया।
राष्ट्र संघ से संबंध
राष्ट्रपति हार्डिंग ने 12 अप्रैल 1921 ई. को कांग्रेस को दिए अपने प्रथम संदेश में स्पष्ट घोषणा की कि राष्ट्र संघ के नियम अमेरिका पर लागू नहीं होंगे तथा अमेरिकी जनता की राष्ट्र संघ संबंधी भावना की उपेक्षा नहीं की जाएगी।
इतिहासकार वीच के अनुसार यह नीति विश्व के लिए लाभदायक सिद्ध नहीं हुई। धीरे-धीरे विदेश मंत्री चार्ल्स इवांस ह्यूजेस को यह अनुभव हुआ कि अमेरिका के लिए राष्ट्र संघ की गतिविधियों से पूर्णतः अलग रहना संभव नहीं है।
कई वर्षों तक अमेरिकी सरकार पर्यवेक्षक के रूप में राष्ट्र संघ के कार्यों से जुड़ी रही। अमेरिका ने राष्ट्र संघ के अनेक मानवीय तथा सामाजिक कार्यक्रमों में सदस्य देशों के समान भाग लिया और उन पर हस्ताक्षर भी किए। किंतु उसने स्पष्ट कर दिया कि सामूहिक सुरक्षा संबंधी दायित्वों में वह किसी प्रकार की भागीदारी स्वीकार नहीं करेगा।
अप्रवास की समस्या
युद्ध के बाद अमेरिकी समाज में यूरोप से दूरी बनाए रखने की भावना और अधिक प्रबल हो गई। साथ ही, साम्यवाद के भय (रेड स्केयर) के कारण यह धारणा भी विकसित हुई कि अधिकांश अप्रवासी उग्रवादी या क्रांतिकारी विचारों वाले होते हैं। अमेरिकावासियों का मत था कि केवल उतने ही अप्रवासियों को अमेरिका में प्रवेश दिया जाए, जिन्हें अमेरिकी समाज आसानी से आत्मसात कर सके।
इसी नीति के अंतर्गत मई 1921 ई. में आपातकालीन आरक्षण अधिनियम (इमरजेंसी कोटा एक्ट) पारित किया गया। इस अधिनियम के अनुसार किसी भी देश से आने वाले अप्रवासियों की संख्या 1910 ई. की जनगणना में उस देश में जन्मे अमेरिकी निवासियों की कुल संख्या के 3 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती थी।
1924 ई. में इस अधिनियम में संशोधन किए गए तथा 1927 ई. में पुनः इसे और अधिक कठोर बनाया गया। यूरोप, अफ्रीका तथा ऑस्ट्रेलिया से आने वाले अप्रवासियों की संख्या सीमित कर दी गई, जबकि पश्चिमी गोलार्ध के देशों से आने वाले लोगों पर अपेक्षाकृत कम प्रतिबंध लगाए गए।
1924 ई. में जापानी अप्रवासियों के संबंध में भी एक विशेष कानून पारित किया गया, जिसके अनुसार जो व्यक्ति अमेरिकी नागरिकता प्राप्त करने के योग्य नहीं थे, उन्हें अमेरिका में अप्रवासी के रूप में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाएगी।
सोवियत रूस और अमेरिका
1920 के दशक में अमेरिकी विदेश नीति का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष सोवियत रूस के प्रति उसका दृष्टिकोण था। 1918 ई. में रूस के युद्ध से हटने, बोल्शेविक क्रांति तथा लेनिन द्वारा साम्यवादी शासन की स्थापना ने अमेरिकी जनता को चिंतित कर दिया।
अमेरिका ने सोवियत सरकार को कूटनीतिक मान्यता देने से इनकार कर दिया। उसका तर्क था कि जिस सरकार की नीतियों से वह सहमत नहीं है, उसके साथ औपचारिक संबंध स्थापित नहीं किए जा सकते।
यद्यपि कुछ अमेरिकी सीनेटरों का मत था कि रूस की समस्या का समाधान किए बिना यूरोप में स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकती, फिर भी अमेरिकी सरकार ने सोवियत शासन को मान्यता देने से इंकार कर दिया। यह भी कहा गया कि मान्यता न देने का कारण केवल रूस की साम्यवादी व्यवस्था नहीं थी, बल्कि उसकी अंतरराष्ट्रीय नीतियाँ भी थीं।
वास्तव में, बीसवीं शताब्दी के दूसरे और तीसरे दशक में अमेरिकी विदेश विभाग ऐसी कोई नीति अपनाने के पक्ष में नहीं था, जिससे रूस में साम्यवादी शासन को वैधता मिल सके।
अमेरिकी सरकार सोवियत रूस के साथ औपचारिक व्यापारिक संबंध स्थापित करने के भी पक्ष में नहीं थी। यद्यपि 1921 ई. के भीषण अकाल के समय उसने मानवीय आधार पर निजी राहत कार्यों का विरोध नहीं किया। अमेरिकी सरकार ने किसी व्यापारी को सोवियत रूस के साथ व्यापार करने से नहीं रोका, किंतु सोवियत सरकार की आर्थिक सहायता तथा व्यापारिक सहयोग संबंधी सभी सरकारी प्रार्थनाएँ अस्वीकार कर दीं।
विदेश मंत्री चार्ल्स इवांस ह्यूजेस ने स्पष्ट कहा कि जब तक सोवियत सरकार अंतरराष्ट्रीय समझौतों और दायित्वों का सम्मान नहीं करेगी, तब तक अमेरिका उसके साथ राजनयिक संबंध स्थापित नहीं करेगा। परिणामस्वरूप 1933 ई. तक सोवियत संघ को अमेरिकी मान्यता नहीं मिली। इतिहासकार डल्स के शब्दों में, ‘समय के साथ अनेक लोगों ने इस नीति को पूर्णतः अव्यावहारिक माना।’
वाशिंगटन नौसेना सम्मेलन (1921–1922 ई.)
संयुक्त राज्य अमेरिका प्रारंभ से ही विश्व में शांति और स्थिरता बनाए रखने का समर्थक था। 1919 ई. में अमेरिका ने प्रशांत महासागर में अपने नौसैनिक बेड़े का एक बड़ा भाग स्थायी रूप से तैनात कर दिया। इसके उत्तर में जापान ने 8 युद्धपोत और 8 क्रूज़र बनाने की योजना बनाई। दूसरी ओर, ब्रिटेन अपनी पारंपरिक नौसैनिक श्रेष्ठता बनाए रखना चाहता था और न तो जापान तथा न ही अमेरिका को अपने से आगे बढ़ने देना चाहता था। साथ ही, अमेरिका ब्रिटेन का प्रमुख व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी बन रहा था, जिससे दोनों देशों के आर्थिक हितों में टकराव की संभावना बढ़ गई। जापान और ब्रिटेन की मित्रता भी अमेरिका के लिए चिंता का विषय थी।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड लॉयड जॉर्ज इस जटिल परिस्थिति का समाधान चाहते थे, किंतु जापान के साथ अपने संबंध भी बिगाड़ना नहीं चाहते थे। इसलिए सुदूर पूर्व की स्थिति तथा नौसैनिक शस्त्रों की समस्या पर विचार करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आवश्यक समझा गया। अंततः राष्ट्रपति हार्डिंग ने यूरोप और एशिया के देशों को निरस्त्रीकरण तथा सुदूर पूर्व की समस्याओं पर विचार-विमर्श के लिए 11 नवंबर 1921 ई. को प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति की वर्षगाँठ पर विश्व की सबसे बड़ी नौसैनिक शक्तियों का वाशिंगटन में एक सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन के दो प्रमुख उद्देश्य थे—एक तो सुदूर पूर्व की समस्याओं का समाधान करना और दूसरा नौसैनिक हथियारों में कटौती कर अमेरिका, ब्रिटेन और जापान के बीच बढ़ती नौसैनिक प्रतिस्पर्धा को रोकना।
यद्यपि प्रथम विश्व युद्ध में अमेरिका और जापान मित्र राष्ट्र थे, फिर भी सुदूर पूर्व में दोनों के राष्ट्रीय हितों में टकराव था। इसके प्रमुख कारण थे— चीन में जापान की बढ़ती रुचि, याप तथा जापानी संरक्षण में आए अन्य द्वीपों पर उसका अधिकार, साइबेरिया और शान्तुंग में उसकी साम्राज्यवादी गतिविधियाँ तथा मुक्त द्वार नीति (ओपन डोर पॉलिसी) के प्रति उसकी उदासीनता। सीनेटर विलियम ई. बोराह (रिपब्लिकन-इदाहो) ने कांग्रेस में एक पहल का नेतृत्व किया। उन्होंने माँग की कि संयुक्त राज्य अमेरिका नौसैनिक हथियारों की होड़ में अपने दो मुख्य प्रतिस्पर्धियों- जापान और यूनाइटेड किंगडम के साथ हथियारों में कटौती के लिए बातचीत करे।
वाशिंगटन नौसेना सम्मेलन राष्ट्रपति हार्डिंग के शासनकाल की यह सबसे महत्त्वपूर्ण विदेश नीति संबंधी उपलब्धि थी क्योंकि इस सम्मेलन में रूस को छोड़कर प्रमुख देशों को आमंत्रित किया गया था। यूनाइटेड किंगडम, जापान, फ्रांस और इटली को नौसैनिक क्षमता कम करने पर बातचीत में हिस्सा लेने के लिए बुलाया गया था। वहीं, बेल्जियम, चीन, पुर्तगाल और नीदरलैंड को सुदूर पूर्व की स्थिति पर चर्चा में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था। वाशिंगटन नौसेना सम्मेलन में दीर्घकालीन विचार-विमर्श एवं गहन कूटनीतिक वार्ताओं के उपरांत केवल नौसैनिक शस्त्र-सीमा निर्धारण ही नहीं हुआ, बल्कि तीन महत्त्वपूर्ण समझौते संपन्न हुए : पाँच-शक्ति समझौता (फाइव-पावर ट्रीट), चार-शक्ति समझौता (फोर-पावर ट्रीटी) और नौ-शक्ति समझौता (नाइन-पावर ट्रीटी)।
पाँच-शक्ति समझौता (फाइव-पावर ट्रीटी)
वाशिंगटन सम्मेलन में पाँच प्रमुख शक्तियों- संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, जापान, फ्रांस और इटली के मध्य पाँच-शक्ति नौसैनिक संधि (फाइव-पावर नेवल ट्रीटी) संपन्न हुई। इस संधि का मुख्य उद्देश्य नौसैनिक शस्त्रास्त्रों की प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित करना तथा प्रशांत क्षेत्र में शक्ति-संतुलन स्थापित करना था। इसके अंतर्गत युद्धपोतों की नौसैनिक क्षमता का अनुपात संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन के लिए 5-5, जापान के लिए 3 तथा फ्रांस और इटली के लिए 1.75-1.75 टन निर्धारित किया गया। जापान चाहता था कि टनेज का आवंटन 10:10:7 के अनुपात में हो, जबकि अमेरिकी नौसेना 10:10:5 का अनुपात चाहती थी। अंततः सम्मेलन में 5:5:3 अनुपात की सीमाएँ अपनाई गईं। चूंकि संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम अपने औपनिवेशिक क्षेत्रों को सहारा देने के लिए प्रशांत और अटलांटिक दोनों महासागरों में नौसेना बनाए रखते थे, इसलिए फाइव-पावर ट्रीटी के तहत दोनों देशों को सबसे अधिक टनेज की अनुमति दी गई थी। इस संधि में सभी पाँच हस्ताक्षर करने वाले देशों से बड़े युद्धपोत (कैपिटल शिप) बनाना बंद करने और पुराने जहाजों को हटाकर अपनी नौसेना का आकार कम करने के लिए भी कहा गया।
इस व्यवस्था द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन की नौसैनिक श्रेष्ठता को समान स्तर पर स्वीकार किया गया, जबकि जापान को एक अधीनस्थ किंतु महत्त्वपूर्ण नौसैनिक शक्ति के रूप में तृतीय स्थान पर रखा गया। फ्रांस और इटली को अपेक्षाकृत निम्न अनुपात प्रदान कर यूरोपीय महाद्वीप की सामरिक आवश्यकताओं और वैश्विक समुद्री शक्ति-संतुलन के मध्य सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया गया।
यद्यपि तत्कालीन परिस्थितियों में यह समझौता अंतरराष्ट्रीय शांति एवं निरस्त्रीकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था, किंतु इसके दूरगामी परिणाम अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए। बाद में जापान को यह अनुपात असंगत एवं भेदभावपूर्ण लगा, जिसके परिणामस्वरूप 1934 में जापान ने इस संधि को मानने से इनकार कर दिया। इस प्रकार जिस व्यवस्था का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्थिरता और सहयोग को सुदृढ़ करना था, वही आगे चलकर प्रशांत क्षेत्र में शक्ति-संघर्ष और तनाव की पृष्ठभूमि तैयार करने वाले कारकों में से एक सिद्ध हुई। इतिहासकार डल्स के अनुसार ‘फिर भी, वाशिंगटन सम्मेलन शांतिपूर्ण वार्ता तथा निरस्त्रीकरण के उद्देश्य की दिशा में अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि और उल्लेखनीय विजय था।’
चार-शक्ति संधि (फोर-पावर ट्रीटी)
प्रथम विश्व युद्ध का लाभ उठाकर जापान ने सुदूर पूर्व में न केवल जर्मनी के कई द्वीपों पर अधिकार कर लिया था, बल्कि एशिया में अपना प्रभाव भी बढ़ाना प्रारंभ कर दिया था। उसकी बढ़ती महत्वाकांक्षाओं को सीमित करने के उद्देश्य से 13 दिसंबर 1921 ई. को अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस और जापान के बीच चार-शक्ति संधि (फोर-पावर ट्रीटी) संपन्न हुई।
इसके अनुसार चारों राष्ट्रों ने आश्वासन दिया कि पूर्वी एशिया में भविष्य में किसी संकट की स्थिति में कोई भी कदम उठाने से पहले वे आपस में सलाह-मशविरा करेंगे और प्रशांत महासागर के अपने-अपने अधिकार-क्षेत्रों में एक-दूसरे के हितों का सम्मान करेंगे। इस संधि की अवधि 10 वर्ष निर्धारित की गई। इस संधि ने 1902 की ‘एंग्लो-जापानी संधि’ की जगह ली, जो अमेरिका के लिए चिंता का विषय रही थी। प्रथम विश्व युद्ध के बाद के वर्षों में अमेरिकी नीति-निर्माता जापान को सबसे बड़े उभरते हुए सैन्य खतरे के रूप में देखते थे। भारी सैन्यीकरण और अपने प्रभाव व क्षेत्र का विस्तार करने की चाहत रखने वाले जापान में एशिया में अमेरिकी उपनिवेशों और चीन के साथ लाभदायक व्यापार के लिए खतरा पैदा करने की क्षमता थी। यद्यपि यूनाइटेड किंगडम और जापान के बीच 1902 के समझौते के कारण यदि अमेरिका और जापान के बीच संघर्ष होता, तो यूनाइटेड किंगडम को जापान का साथ देते हुए अमेरिका के खिलाफ उतरना पड़ सकता था। उस संधि को खत्म करके और ‘फोर-पावर एग्रीमेंट’ (चार-शक्ति समझौता) बनाकर शामिल देशों ने यह सुनिश्चित किया कि किसी भी देश को संघर्ष में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा, किंतु यदि कोई संघर्ष पैदा होता है, तो बातचीत के लिए एक व्यवस्था मौजूद रहेगी।
नौ-शक्ति संधि (नाइन-पावर ट्रीटी)
वॉशिंगटन नौसेना सम्मेलन में 6 फरवरी 1922 ई. को अंतिम बहुपक्षीय समझौता नौ राष्ट्रों के बीच नौ-शक्ति संधि (नाइन-पावर ट्रीटी) था। इस संधि ने अमेरिका की मुक्त द्वार नीति को अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्रदान की। संधि के अनुसार सभी राष्ट्रों ने चीन की संप्रभुता, स्वतंत्रता तथा क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने का वचन दिया। संधि में मंचूरिया पर जापान के दबदबे को तो माना गया, किंतु साथ ही यह भी स्वीकार किया गया कि चीन में व्यापार और उद्योग के अवसर सभी देशों के लिए समान रूप से खुले रहेंगे। चीन ने भी सहमति जताई कि वह वहां व्यापार करने के इच्छुक किसी भी देश के साथ भेदभाव नहीं करेगा। सम्मेलन में भाग लेने वाले राष्ट्रों ने यह भी आश्वासन दिया कि वे चीन के किसी भी भाग में अपना विशेष प्रभाव-क्षेत्र स्थापित करने का प्रयास नहीं करेंगे। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के अनुसार इस सम्मेलन ने चीन में मुक्त द्वार नीति को सफलतापूर्वक स्थापित किया।
अन्य संधियाँ
शान्तुंग समझौता (1922 ई. )
वाशिंगटन नौसैनिक सम्मेलन में बहुपक्षीय समझौतों के अलावा, कई देशों ने द्विपक्षीय संधियाँ भी कीं। इस सम्मेलन में जापान और चीन के बीच एक द्विपक्षीय संधि ‘शान्तुंग समझौता’ पर हस्ताक्षर हुए, जिसके तहत जापान ने शांडोंग प्रांत और उसके रेलमार्ग का नियंत्रण चीन को वापस सौंप दिया। वास्तव में,1898 में चीन को एक ‘असमान संधि’ के तहत अपने शांडोंग प्रांत के जियाओझोउ (किआओचो) खाड़ी क्षेत्र को 99 वर्षों के लिए जर्मनी को पट्टे पर देना पड़ा था। जर्मनी ने वहाँ रेलवे और खनन जैसे अधिकार स्थापित कर लिए थे। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान (1914 में) मित्र राष्ट्रों के एक हिस्से के रूप में जापान ने शांडोंग में जर्मन ठिकानों पर कब्जा कर लिया था और पेरिस शांति सम्मेलन ((1919) में मित्र राष्ट्रों ने शांडोंग पर जापान के नियंत्रण को वैध बना दिया था, जिससे चीन में भारी आक्रोश था। शांगतुंग संधि और ‘नाइन-पावर संधि’ (नौ-शक्ति संधि) का उद्देश्य चीन को यह भरोसा दिलाना था कि जापानी विस्तारवाद से उसके क्षेत्रों को और कोई नुकसान नहीं पहुँचेगा।
अमेरिका-जापान संधि (11 फरवरी 1922 ई.)
11 फरवरी 1922 ई. को अमेरिका और जापान के बीच भी एक संधि संपन्न हुई। इसके अंतर्गत अमेरिका को जापान के नियंत्रण वाले याप द्वीप पर रेडियो एवं संचार सुविधाएँ स्थापित करने तथा अमेरिकी नागरिकों को वहाँ निजी संपत्ति रखने का अधिकार प्राप्त हुआ। इसके बदले अमेरिका ने कैरोलिन, मार्शल तथा मरियाना द्वीपों पर जापान के संरक्षण को स्वीकार कर लिया। साथ ही अमेरिकी मिशनरियों को वहाँ धर्म-प्रचार की स्वतंत्रता भी प्रदान की गई।
इस प्रकार वॉशिंगटन नौसेना सम्मेलन में संपन्न इन संधियों ने मिलकर प्रशांत क्षेत्र में यथास्थिति बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन संधियों ने विभिन्न देशों के मौजूदा हितों और अधिकारों को मान्यता प्रदान की तथा उनमें किसी प्रकार का मूलभूत परिवर्तन नहीं किया। साथ ही, संयुक्त राज्य अमेरिका ने ऐसे समझौते प्राप्त किए, जिनसे प्रशांत क्षेत्र में उसकी स्थापित नीतियों को सुदृढ़ता मिली। इनमें विशेष रूप से चीन में ‘खुले द्वार की नीति’ (ओपन डोर पॉलिसी) तथा फिलीपींस की सुरक्षा से संबंधित अमेरिकी हित शामिल थे। दूसरी ओर, इन व्यवस्थाओं के माध्यम से जापान के साम्राज्यवादी विस्तार की संभावनाओं को यथासंभव सीमित करने का प्रयास किया गया।
पेरिस संधि (27 अगस्त 1928 ई.)
अंतरराष्ट्रीय समझौतों और संधियों के माध्यम से विश्व शांति स्थापित करने की अमेरिकी नीति की सबसे महत्त्वपूर्ण, किंतु व्यवहारिक दृष्टि से सबसे कमजोर उपलब्धि पेरिस संधि थी, जिसे केलॉग–ब्रियां पैक्ट भी कहा जाता है। इसमें हस्ताक्षरकर्ता देशों ने राष्ट्रीय नीति के साधन के रूप में युद्ध का त्याग करने और आपसी विवादों को केवल शांतिपूर्ण तरीकों से सुलझाने का वादा किया था
पेरिस संधि कूलिज प्रशासन की विदेश नीति की प्रमुख उपलब्धियों में गिनी जाती है। वास्तव में न तो अमेरिकी सरकार और न ही फ्रांस की सरकार इस प्रकार की संधि के पक्ष में थी। किंतु विशेष रूप से पृथकतावादी अमेरिकी नागरिकों के दबाव के कारण अमेरिका के विदेश मंत्री फ्रैंक बी. केलॉग ने फ्रांस के विदेश मंत्री एरिस्टाइड ब्रियां के साथ मिलकर विश्व के सभी राष्ट्रों के समक्ष युद्ध को अवैध घोषित करने का प्रस्ताव रखा। ब्रियां ने इसे अमेरिका को पृथकतावादी नीति से बाहर लाने तथा उसे यूरोपीय राजनीति के निकट लाने का अवसर माना। उनका उद्देश्य जर्मनी की संभावित आक्रामकता के विरुद्ध एक नैतिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था स्थापित करना था।
फ्रांस की सहमति के बाद केलॉग ने ब्रिटेन, इटली, जापान तथा जर्मनी सहित अनेक देशों को वार्ता के लिए आमंत्रित किया। अंततः 27 अगस्त 1928 ई. को पेरिस अनुबंध पर हस्ताक्षर किए गए। प्रारंभ में इस पर 15 देशों- फ्रांस, अमेरिका, जर्मनी, इटली, जापान, भारत सहित ने हस्ताक्षर किए थे, बाद में 47 अन्य देश भी इसमें शामिल हो गए इस अनुबंध की दो प्रमुख धाराएँ थीं—पहली हस्ताक्षरकर्ता राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए युद्ध का त्याग करेंगे तथा युद्ध को राष्ट्रीय नीति के साधन के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे और दूसरी सभी राष्ट्र अपने पारस्परिक विवादों का समाधान केवल शांतिपूर्ण उपायों से करेंगे।
यह पहला ऐसा बहुपक्षीय समझौता था, जिसने युद्ध को कानूनन गैर-कानूनी घोषित करने का एक बड़ा प्रयास किया किंतु इस संधि की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि इसमें यह नहीं बताया गया था कि यदि कोई राष्ट्र इन प्रावधानों का उल्लंघन करे तो उसके विरुद्ध क्या कार्रवाई की जाएगी। फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने इस संधि के विषय में लिखा : ‘यह अंतरराष्ट्रीय विवादों के निपटारे अथवा समाधान की प्रक्रिया में किसी प्रकार की प्रभावी भूमिका निभाने में असमर्थ था।’ इस संधि की वास्तविक कमजोरी सबसे पहले 1931 ई. में जापान द्वारा मंचूरिया पर आक्रमण के समय स्पष्ट हुई। 1930 के दशक में यूरोप में बढ़ते अंतरराष्ट्रीय संकटों के दौरान इस संधि की लगभग उपेक्षा कर दी गई। समनर वेल्स का भी मत था कि यह संधि व्यवहारिक दृष्टि से प्रभावी नहीं थी। यद्यपि सैद्धांतिक रूप से यह अंतरराष्ट्रीय नैतिकता को बढ़ावा देने का एक सराहनीय प्रयास था, किंतु प्रत्येक राष्ट्र द्वारा इसकी अपनी-अपनी व्याख्या किए जाने के कारण यह संधि लगभग निष्प्रभावी सिद्ध हुई।
लंदन नौसैनिक सम्मेलन (21 जनवरी 1930 ई.)
मार्च 1929 ई. में संयुक्त राज्य अमेरिका में हर्बर्ट हूवर के राष्ट्रपति तथा जून 1929 ई. में ब्रिटेन में रैम्ज़े मैकडोनाल्ड के नेतृत्व में लेबर सरकार के गठन के बाद दोनों देशों के संबंधों में सुधार हुआ। दोनों देशों ने यह स्वीकार किया कि उनके मध्य चल रही नौसैनिक प्रतिस्पर्धा अनावश्यक तथा आर्थिक दृष्टि से निरर्थक है। इसी पृष्ठभूमि में नौसैनिक शस्त्रों की होड़ को नियंत्रित करने और वाशिंगटन नौसैनिक संधि (1922 ई.) की समीक्षा करने के उद्देश्य से 21 जनवरी 1930 ई. को लंदन नौसैनिक सम्मेलन का आयोजन किया गया।
इस सम्मेलन में आंग्ल-अमेरिकी सहयोग को पुनः सुदृढ़ किया गया। सम्मेलन में दोनों देशों के मध्य नौसैनिक शस्त्रों की सीमा-निर्धारण के संबंध में समझौता हुआ। ब्रिटेन ने 8 इंच की तोपों से सुसज्जित भारी क्रूज़रों के संबंध में अमेरिकी माँग स्वीकार कर ली, जबकि अमेरिका ने ब्रिटेन की साम्राज्यिक सुरक्षा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उसे अपेक्षाकृत अधिक संख्या में छोटे क्रूज़र और अन्य हल्के युद्धपोत रखने की अनुमति देने पर सहमति व्यक्त की। इस प्रकार दोनों देशों ने पारस्परिक समझौते के माध्यम से नौसैनिक प्रतिस्पर्धा को सीमित करने तथा शस्त्र नियंत्रण को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया।
लैटिन अमेरिकी देशों के प्रति नीति
1920 के दशक की अमेरिकी विदेश नीति की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि लैटिन अमेरिकी देशों से संबंध स्थापित करना थी। लैटिन अमेरिका विश्व का एक ऐसा क्षेत्र था जहाँ अमेरिका ने अलगाववादी नीति का पालन करने का आडंबर नहीं किया था। किंतु 1920 ई. के पश्चात् अमेरिका की लैटिन अमेरिकी देशों के प्रति नीति में परिवर्तन आया। अपनी इस नई नीति को अपनाने से पूर्व विभिन्न अवसरों पर अमेरिका ने छोटे लैटिन अमेरिकी देशों पर दबाव डालने का प्रयास किया, जिसे स्वीकार करना उनकी स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा के लिए अत्यंत कठिन था। जैसे ही यूरोपीय हस्तक्षेप की संभावना प्रायः समाप्त हो गई, अमेरिका लैटिन देशों की सुरक्षा के प्रति निश्चिंत हो गया। किंतु संयुक्त राज्य अमेरिका ने धीरे-धीरे, अनिच्छापूर्वक ही सही, यह स्वीकार किया कि हस्तक्षेप की नीति अब अनावश्यक थी। राष्ट्रपति कूलिज का सिद्धांत था कि संयुक्त राज्य का कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों के जान-माल की सुरक्षा स्वयं करे, चाहे वे कहीं भी हों।
हार्डिंग के प्रशासन संभालने तक अथवा प्रथम विश्व युद्ध के अंत तक स्थिति यह थी कि चार कैरेबियाई देश—क्यूबा, हायती, डोमिनिकन गणतंत्र तथा निकारागुआ अमेरिकी सेनाओं के प्रभाव में थे। अमेरिकी सेना की उपस्थिति के कारण ही निकारागुआ में अल्पसंख्यक सरकार बनी हुई थी तथा अमेरिकी नौसेना ने सैंटो डोमिंगो और हायती का प्रशासन संभाल रखा था। 1924 ई. तक संयुक्त राज्य अमेरिका 10 लैटिन अमेरिकी देशों की अर्थव्यवस्था का संचालन कर रहा था। इधर अमेरिकी व्यापारियों में व्यापार के विस्तार तथा अधिक धन निवेश करने की आकांक्षा बढ़ रही थी। जर्मनी की पराजय के पश्चात् कैरेबियन क्षेत्र में सतर्कता की आवश्यकता भी नहीं रह गई थी। अतः क्रमशः सेना हटाने की नीति अपनाई गई। क्यूबा से 1922 ई. में, डोमिनिकन रिपब्लिक से 1924 ई. में तथा निकारागुआ से 1925 ई. में सेना हटा ली गई। परंतु अगले ही वर्ष वहाँ पुनः विद्रोह भड़क उठा, तो सेनाओं को वापस भेज दिया गया। संयुक्त राज्य अमेरिका ने उस दल को मान्यता देने से इंकार कर दिया जिसने देश की राजनीति पर अधिकार कर लिया था, जबकि उसे अन्य लैटिन अमेरिकी देशों की भी मान्यता प्राप्त थी। कूलिज का मत था कि ‘हम निकारागुआ से युद्ध नहीं कर रहे हैं।’ परंतु अन्य लैटिन अमेरिकी देशों ने अमेरिका के इस कार्य पर भिन्न मत व्यक्त किए। विभिन्न दलों के मध्य संधि होने के बाद निकारागुआ में पुनः प्रशासन की स्थापना की गई। राष्ट्रपति रूजवेल्ट के सत्ता में आते ही 1934 ई. तक सभी क्षेत्रों से अमेरिकी सेनाएँ वापस बुला ली गईं।
मैक्सिको से संबंध
मैक्सिको का मामला लैटिन अमेरिकी देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रतिष्ठा की परीक्षा सिद्ध हुआ। 1920 ई. में मैक्सिको में अल्वारो ओब्रेगॉन ने विद्रोह के माध्यम से सत्ता प्राप्त की, जो गणतंत्रवाद, राजनीतिक स्थिरता तथा आर्थिक सुधारों की दिशा में एक नई शुरुआत थी। ओब्रेगॉन और उसके सहयोगी 1917 ई. के क्रांतिकारी संविधान को भूमि एवं श्रमिक सुधारों के साथ लागू करना चाहते थे, परंतु उनकी नीतियाँ मैक्सिको में रह रहे अमेरिकी नागरिकों के हित में नहीं थीं। ओब्रेगॉन को 1923 ई. में तब तक मान्यता नहीं दी गई, जब तक उसने यह विश्वास नहीं दिलाया कि मैक्सिको में अमेरिकी संपत्तिधारकों, विशेषकर तेल कंपनियों, को परेशान नहीं किया जाएगा।
1926 ई. में पुनः गंभीर स्थिति उत्पन्न हुई, जब राष्ट्रपति प्लूटार्को एलियास काल्स ने तेल कंपनियों को आदेश दिया कि वे 50 वर्षों के पट्टे पर अपने अधिकारों के शीर्षकों को परिवर्तित करें। कंपनियों ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। उन्हें कूलिज प्रशासन का समर्थन प्राप्त था। इसी समय केलॉग ने बिना किसी ठोस प्रमाण के मैक्सिकन सरकार को साम्यवादी होने का दोषी ठहराया था। इस विवाद के समाधान के लिए कूलिज ने मोरो को विशेष निर्देशों के साथ मैक्सिको भेजा। तेल संबंधी विवाद का समाधान 1927 ई. में इस समझौते के साथ हुआ कि कंपनियाँ उस भूमि को, जहाँ 1917 ई. से पूर्व से खुदाई चल रही थी, पट्टे पर बनाए रखेंगी। 1927 ई. के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके दक्षिणी पड़ोसी मैक्सिको के मध्य संबंध और अधिक सुदृढ़ हो गए।
युद्धकालीन ऋणों की पूर्ति
1920 के पूरे दशक में अमेरिकी सरकार ने यूरोप में स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए अपने प्रभाव का प्रयोग किया। 1923 ई. में, जब वर्साय की संधि द्वारा निर्धारित क्षतिपूर्ति के भुगतान में जर्मनी ने असमर्थता दिखाई, तो फ्रांसीसी सेना ने रूहर घाटी स्थित जर्मनी के औद्योगिक क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया। ऐसी स्थिति में राष्ट्र सचिव ह्यूजेस ने मध्यस्थता के लिए अपनी सेवाएँ प्रस्तुत कीं तथा जर्मनी की आर्थिक क्षमता को ध्यान में रखते हुए क्षतिपूर्ति के भुगतान का एक नया मापदंड निर्धारित किया। 1925 ई. में लोकार्नो संधि के द्वारा जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए वचनबद्ध हुए।
वास्तव में क्षतिपूर्ति का प्रश्न युद्धकालीन ऋणों से भी संबंधित था। युद्ध के दौरान तथा उसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका ने लगभग 5% ब्याज की दर पर यूरोपीय देशों को 10,350,000,000 डॉलर का ऋण दिया था। इसे सामान्यतः जनता ने सहयोग माना था, परंतु बाद में अमेरिकी नीति पुनः अलगाववादी हो जाने के कारण कांग्रेस ने ऋण की वापसी की माँग की। 1923 ई. से 1930 ई. के मध्य सोवियत संघ को छोड़कर अन्य सभी ऋणग्रस्त देशों से समझौते किए गए। ब्याज की दर कम की गई तथा ऋण चुकाने की अवधि 60 वर्ष निर्धारित की गई।
मंचूरिया संकट
1911 ई. में चीन में मंचू राजवंश के पतन के पश्चात् डॉ. सन यात-सेन के नेतृत्व में गणतंत्र की स्थापना हुई। उन्होंने कुओमिन्तांग नामक एक नई राजनीतिक संस्था का गठन किया। इसी समय रूस की सरकार ने भी चीन में साम्यवादी शासन स्थापित करने के उद्देश्य से अपने कुछ प्रतिनिधि वहाँ भेज दिए। 1925 ई. में सन यात-सेन की मृत्यु के बाद च्यांग काई-शेक के नेतृत्व में कुओमिन्तांग के अधीन चीन का एकीकरण प्रारंभ हुआ। संयुक्त राज्य अमेरिका, जो अपनी पारंपरिक ‘मुक्त द्वार नीति’ के लिए एक स्वतंत्र और सुदृढ़ चीन चाहता था, ने तुरंत च्यांग काई-शेक के नेतृत्व को स्वीकार करते हुए उसे मान्यता प्रदान की।
चीनी राष्ट्रवाद के उभार से जापान अत्यधिक चिंतित था। वह लंबे समय से निर्बल चीन पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता था, किंतु जब चीन सुदृढ़ होने लगा और जापान की योजनाओं में बाधाएँ आने लगीं, तब उसने चीन के सीमावर्ती प्रदेशों पर अधिकार करने की योजना बनाई। मंचूरिया वैधानिक रूप से चीन का भाग था, किंतु उसकी प्रशासनिक एवं आर्थिक व्यवस्था जापानियों के प्रभाव में थी। 21 सितंबर 1931 ई. को जापान ने मंचूरिया पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।
यद्यपि जापान को मंचूरिया के संबंध में कुछ शिकायतें थीं, परंतु उन्हें दूर करने का उसका तरीका पूर्णतः अनुचित था। जापान की सैन्य कार्रवाई राष्ट्र संघ के अधिकार-पत्र, 1922 ई. की नौ-राष्ट्र संधि, जिसमें चीन की अखंडता का समर्थन किया गया था तथा केलॉग-ब्रियां संधि के विरुद्ध थी। यदि राष्ट्र संघ अपने अधिकार-पत्र तथा अंतरराष्ट्रीय समझौतों के आधार पर जापान को रोक पाता, तो विश्व शांति की रक्षा संभव हो सकती थी। राष्ट्र संघ की विफलता से यह आशंका उत्पन्न हुई कि अन्य राष्ट्र भी जापान का अनुसरण करेंगे।
राष्ट्र संघ में यह विषय उठाया गया, किंतु ब्रिटेन के प्रभाव के कारण कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया जा सका। ब्रिटेन चीनी राष्ट्रवाद को पसंद नहीं करता था, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्र सचिव स्टिम्सन को जापान की उद्दंडता अत्यंत खतरनाक प्रतीत हो रही थी। उनका मत था कि यदि इस समय जापान को नहीं रोका गया, तो प्रशांत महासागर में शक्ति-संतुलन बिगड़ जाएगा। यहाँ तक कि स्टिम्सन का विचार था कि यदि राष्ट्र संघ जापान के विरुद्ध कार्रवाई करे, तो अमेरिका उसका समर्थन करेगा। परंतु अमेरिका के लिए यह कठिन था, क्योंकि वह स्वयं राष्ट्र संघ का सदस्य बनने से पहले ही इंकार कर चुका था।
7 जनवरी 1932 ई. को स्टिम्सन ने चीन और जापान दोनों को लगभग समान पत्र भेजे, जिनमें यह स्पष्ट किया गया कि अमेरिका किसी भी ऐसी संधि अथवा क्षेत्रीय परिवर्तन को मान्यता नहीं देगा, जिसमें चीन की ‘मुक्त द्वार नीति’ तथा केलॉग-ब्रियां संधि की अवहेलना की गई हो। यदि उस समय विश्व की अन्य शक्तियों ने जापान की निंदा में अमेरिका का साथ दिया होता, तो जापान को यह आभास हो जाता कि विश्व जनमत उसकी कार्रवाई के विरुद्ध है। स्टिम्सन ने अन्य राष्ट्रों का समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया, किंतु ब्रिटेन का विदेश कार्यालय जापान पर अधिक दबाव डालने के पक्ष में नहीं था। ब्रिटेन जापान के साथ अपने व्यापारिक हितों को अधिक महत्त्व देता था और उसे यह भी विश्वास था कि अमेरिका केवल शब्दों तक ही सीमित रहेगा। 18 फरवरी 1932 ई. को ब्रिटेन ने मंचूरिया को स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता प्रदान कर दी।
जब स्टिम्सन अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सके, तब उन्होंने घोषणा की कि बलपूर्वक अधिग्रहित क्षेत्रों को संयुक्त राज्य अमेरिका मान्यता नहीं देगा। उस समय तक लिटन आयोग की रिपोर्ट भी प्रकाशित नहीं हुई थी। लंबे विवाद के पश्चात् राष्ट्र संघ की महासभा ने 24 फरवरी 1933 ई. को मतदान द्वारा आयोग की रिपोर्ट स्वीकार कर ली। राष्ट्र संघ ने मंचूकुओ को मान्यता नहीं दी। इसके उत्तर में जापान ने राष्ट्र संघ के निर्णय को अस्वीकार करते हुए 27 मार्च 1933 ई. को संगठन से अलग होने की घोषणा कर दी।
1919-20 ई. के दौरान यद्यपि विल्सन की नीतियों का परित्याग कर दिया गया था, फिर भी अमेरिकी विदेश नीति पूर्णतः अलगाववादी नहीं बन सकी। वास्तविकता यह थी कि हार्डिंग, हूवर और कूलिज के प्रशासन ने निरस्त्रीकरण को बढ़ावा देने, अंतरराष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण समाधान करने तथा आर्थिक स्थिरता स्थापित करने के लिए विश्व में नेतृत्वकारी भूमिका निभाई। यहाँ तक कि कुछ गैर-राजनीतिक विषयों पर अमेरिका ने राष्ट्र संघ के साथ भी सहयोग किया। यद्यपि संयुक्त राज्य अमेरिका ने राष्ट्र संघ की सदस्यता स्वीकार नहीं की थी, फिर भी, 1924 ई. से 1930 ई. के मध्य उसने राष्ट्र संघ की 40 से अधिक बैठकों में अपने प्रतिनिधि भेजे। विश्व के मामलों में अमेरिका की रुचि केवल शांति स्थापना तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसके विदेशी व्यापार और निवेश से भी जुड़ी हुई थी। दुर्भाग्यवश, 1920 के दशक में अंतरराष्ट्रीय सहयोग स्थापित करने के लिए अमेरिका द्वारा किए गए प्रयास केवल आंशिक रूप से ही सफल हो सके।
रूजवेल्ट प्रशासन और अमेरिका की विदेश नीति
मार्च 1933 ई. में जब फ्रैंकलिन डेलानो रूजवेल्ट ने पहली बार राष्ट्रपति पद की शपथ ली, तब अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक अत्यंत खतरनाक मोड़ पर पहुँच चुकी थी। 1930 का दशक विश्व राजनीति में अमेरिका की महत्ता और उत्तरदायित्व की परीक्षा का महत्त्वपूर्ण काल सिद्ध हुआ। कहा जा सकता है कि अमेरिकी नागरिक न तो विश्व के मामलों में अपने देश की भूमिका को पूरी तरह समझ सके और न ही उसके अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व को पूर्ण रूप से स्वीकार कर पाए।
प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् घटित घटनाओं के कारण अमेरिकी जनता की मानसिकता विदेश नीति के क्षेत्र में अलगाववाद के पक्ष में थी। आर्थिक मंदी के कारण भी अमेरिकी जनता विदेशी मामलों में अधिक रुचि लेने की स्थिति में नहीं थी। अमेरिकी जनता का विश्वास था कि 1919 ई. की पेरिस शांति वार्ता में राष्ट्रपति विल्सन के आदर्शवाद को यूरोपीय गुटबंदी तथा निहित स्वार्थों के सामने असफल होना पड़ा था।
अमेरिका ने यूरोपीय राष्ट्रों की खुलकर आर्थिक सहायता की थी, परंतु यूरोपीय राष्ट्रों ने इस क्षेत्र में अमेरिका के प्रति कृतज्ञता का रुख नहीं अपनाया तथा ऋण चुकाने में भी विलम्ब तथा आनाकानी की नीति अपनाई। इतिहासकार बेनन का मानना है कि इसका प्रभाव अलगाववादियों पर काफी पड़ा। इन अनुभवों के आधार पर यह सामान्य विश्वास था कि अमेरिका को यूरोप की स्वार्थपूर्ण गुटबंदी से दूर रहकर अपनी समस्याओं के समाधान में ही रत रहना चाहिए।
यह स्वाभाविक था कि रूजवेल्ट प्रशासन की वैदेशिक नीति पर अमेरिकी जनता की मनोदशा का प्रभाव पड़ता। अपने प्रशासन के प्रारंभिक वर्षों में रूजवेल्ट आंतरिक परेशानियों में अधिक व्यस्त रहे तथा यह प्रतीत होता था कि उन्होंने अपने प्रारंभिक दौर के विल्सन के अंतर्राष्ट्रीयता के विश्वास को त्याग दिया है। वास्तव में कुछ अर्थों में वे रिपब्लिकनों से भी अधिक अलगाववादी थे। निःशस्त्रीकरण के लिए रूजवेल्ट प्रशासन ने प्रारंभ से ही प्रयत्न करना शुरू किया, परंतु 1934 ई. में जब से हिटलर सत्ता में आया, शांति के सभी प्रयास विफल होते गए। अतः अक्टूबर 1933 ई. में जर्मनी जेनेवा सम्मेलन तथा लीग ऑफ नेशन्स, दोनों से अलग हो गया। जर्मनी का यह रुख इस बात की ओर संकेत करता था कि अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में शस्त्रों की एक भयानक होड़ शुरू होने वाली है।
सोवियत संघ को मान्यता
नवंबर 1933 ई. में वैदेशिक व्यापार के विकास एवं प्रसार के उद्देश्य से प्रेरित होकर रूजवेल्ट प्रशासन ने सोवियत संघ को मान्यता प्रदान की। 1917 ई. की रूसी क्रांति के 16 वर्षों के पश्चात् यह मान्यता दी गई। इसके बदले में सोवियत विदेश मंत्री ने वाशिंगटन में राष्ट्रपति रूजवेल्ट को यह आश्वासन दिया कि रूस, अमेरिका में साम्यवादी विचारों का प्रचार बंद करेगा, रूस में रहने वाले अमेरिकी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता तथा कानूनी संरक्षण प्रदान करेगा तथा अमेरिका से लिए गए ऋणों का निपटारा करेगा। इन बातों के अतिरिक्त यह भी आशा की जाती थी कि सोवियत संघ को मान्यता देने से जापान के सैन्यवाद पर अंकुश लगाया जा सकेगा।
अच्छे पड़ोसी की नीति
राष्ट्रपति बनने के पश्चात् अपने प्रथम उद्घाटन भाषण में रूजवेल्ट ने अपनी वैदेशिक नीति को ‘अच्छे पड़ोसी की नीति’ (गुड नेबर पॉलिसी) की संज्ञा दी। रूजवेल्ट ने इस शब्द का प्रयोग व्यापक संदर्भ में किया था, परंतु शीघ्र ही यह नीति पश्चिमी गोलार्द्ध तथा लैटिन अमेरिकी देशों के प्रति अमेरिकी नीति का पर्याय बन गई। क्यूबा के मामले में हस्तक्षेप करने संबंधी प्लैट संशोधन के पुराने अधिकार को समाप्त कर दिया गया। मध्य अमेरिका में जो सेनाएँ तैनात थीं, उन्हें पूरी तरह हटा लिया गया तथा मैक्सिको से संबंधित विवादों का समाधान किया गया। अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से परस्पर व्यापार के लिए किए गए समझौतों को प्रोत्साहित किया गया। अच्छे पड़ोसी की नीति बहुत हद तक सफल रही तथा द्वितीय विश्व युद्ध के समय रूजवेल्ट प्रशासन को लैटिन अमेरिकी राज्यों का व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ।
एशिया तथा यूरोप के प्रति नीति
एशिया तथा यूरोप के मामलों में रूजवेल्ट प्रशासन ने भी हूवर प्रशासन की भाँति सतर्कता की नीति अपनाई। संभवतः यह सतर्कता अमेरिकी जनता की मनःस्थिति का ही प्रतिबिंब थी। परंतु इसके कारण एशिया तथा यूरोप के विस्तारवादी देशों का हौसला बढ़ता गया तथा द्वितीय विश्व युद्ध क्रमशः अवश्यंभावी होता गया।
1937 ई. में जापान ने चीन पर बड़े पैमाने पर आक्रमण प्रारंभ किया। इस आक्रमण के प्रारंभिक चरण में अमेरिका ने युद्ध से अलग रहकर दोनों पक्षों से मित्रता बनाए रखने का प्रयास किया। परंतु अक्टूबर 1937 ई. से इस नीति में कुछ परिवर्तन हुआ। जब नाजी शक्ति ने जर्मन सीमाओं का विस्तार करते हुए ऑस्ट्रिया पर अधिकार कर लिया, तब रूजवेल्ट ने भी देश की सुरक्षात्मक नीति की ओर ध्यान दिया। साथ ही उन्होंने हिटलर और मुसोलिनी को उनके कार्यकलापों की निन्दा करते हुए कड़े शब्दों में पत्र लिखे, जो अंततः समय की बर्बादी ही सिद्ध हुए। अमेरिका ने राष्ट्र संघ के साथ मिलकर इस प्रस्ताव का औपचारिक समर्थन किया कि जापान संधियों का उल्लंघन करने वाला राष्ट्र है। परंतु अलगाववादी नीति से प्रभावित अमेरिकी जनता जापान के विरुद्ध किसी कठोर कदम के पक्ष में नहीं थी।
जुलाई 1938 ई. में अमेरिका ने जापान को अमेरिकी विमानों की बिक्री को अनैतिक घोषित किया तथा अमेरिकी विमान निर्माताओं से जापान को विमान न बेचने का अनुरोध किया।
तटस्थता की नीति
1939 ई. में यूरोप में युद्ध प्रारंभ होने की खबर अमेरिकी नागरिकों के लिए कोई चौंकाने वाली नहीं थी। प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् तथा द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारंभ के मध्य अमेरिकी जनता विश्व राजनीति के प्रति पहले की अपेक्षा अधिक जागरूक हो चुकी थी।
द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारंभ होने पर राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने 5 सितंबर 1939 ई. को परंपरागत रूप से अमेरिका की तटस्थता की नीति की घोषणा कर दी। 1937 ई. में कांग्रेस द्वारा पारित तटस्थता कानूनों को लागू करने के लिए भी वे बाध्य थे। 1934 ई. में एक समिति ने विस्तृत जाँच के पश्चात् यह निष्कर्ष निकाला कि प्रथम विश्व युद्ध में अमेरिका तटस्थ रह सकता था, परंतु ब्रिटिश प्रचार तथा अमेरिकी बैंकरों एवं युद्ध सामग्री बेचने वाले पूँजीपतियों के दबाव में वह युद्ध में सम्मिलित हो गया। अतः रूजवेल्ट प्रशासन के दौरान अमेरिकी कांग्रेस ने यह निश्चय कर लिया कि किसी भी परिस्थिति में अमेरिका को भविष्य के युद्धों में नहीं उलझना चाहिए।
इसी उद्देश्य से 1935 ई. तथा 1936 ई. में अस्थायी रूप से कुछ तटस्थता संबंधी कानून पारित किए गए। चूँकि ये कानून 1 मई 1937 ई. को समाप्त हो जाते थे, अतः कांग्रेस ने 1937 ई. में स्थायी रूप से तृतीय तटस्थता अधिनियम (थर्ड न्यूट्रैलिटी एक्ट) पारित किया।
तृतीय तटस्थता अधिनियम
तृतीय तटस्थता अधिनियम के अंतर्गत संयुक्त राज्य अमेरिका की तटस्थता बनाए रखने तथा उसे अंतरराष्ट्रीय संघर्षों से दूर रखने के उद्देश्य से राष्ट्रपति को अनेक प्रतिबंधात्मक उपाय लागू करने के लिए बाध्य किया गया। इसके अनुसार, यदि दो देशों के बीच युद्ध की स्थिति उत्पन्न होती, तो अमेरिकी नागरिकों को युद्धरत देशों के जहाजों पर यात्रा करने की अनुमति नहीं होती। इसी प्रकार, अमेरिकी व्यापारी जहाजों द्वारा युद्धरत राष्ट्रों को युद्ध सामग्री भेजने पर प्रतिबंध लगा दिया गया तथा अमेरिका से युद्धरत देशों को युद्ध सामग्री का निर्यात पूर्णतः बंद कर दिया गया। युद्ध सामग्री के अतिरिक्त यदि कोई युद्धरत राष्ट्र अमेरिका से अन्य वस्तुओं का आयात करना चाहता, तो राष्ट्रपति को अपने विवेकानुसार ऐसे निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार प्राप्त था। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रपति को युद्धरत देशों द्वारा अमेरिकी बंदरगाहों के उपयोग को सीमित अथवा प्रतिबंधित करने की शक्ति भी प्रदान की गई थी। इस प्रकार, इस अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य संयुक्त राज्य अमेरिका को विदेशी युद्धों और विवादों से दूर रखते हुए उसकी तटस्थता की नीति को सुदृढ़ बनाना था।
युद्ध की तैयारी
रूजवेल्ट ने इस कानून को कभी भी हृदय से स्वीकार नहीं किया, क्योंकि इस नीति के कारण वे उन देशों की सहायता भी नहीं कर सकते थे जो अमेरिका के मित्र होते हुए भी आक्रमण का शिकार हो जाते। वे किसी भी स्थिति में मित्र राष्ट्रों की पराजय रोकना चाहते थे, क्योंकि उनकी दृष्टि में धुरी राष्ट्रों की विजय अमेरिका के लिए एक गंभीर खतरा थी।
1940 ई. में फ्रांस की पराजय के पश्चात् रूजवेल्ट को नाजी युद्धतंत्र के खतरे का और अधिक स्पष्ट अनुभव हुआ। वे समझते थे कि यदि ब्रिटेन पराजित हो गया, तो अमेरिका को एशिया में जापान तथा यूरोप में जर्मनी और इटली के आर्थिक एवं सामरिक दबाव का सामना करना पड़ेगा। उनका मत था कि मित्र राष्ट्रों की ओर से लड़ना, उनकी पराजय के बाद अकेले लड़ने से अधिक उचित होगा।
1941 ई. तक रूजवेल्ट को यह विश्वास होने लगा था कि अमेरिकी हस्तक्षेप मित्र राष्ट्रों को पराजित होने से बचा सकता है। परंतु अमेरिकी जनता युद्ध के प्रश्न पर दो गुटों में विभाजित थी। इसलिए रूजवेल्ट प्रशासन ने जनता की भावनाओं का सम्मान करते हुए उन्हें धीरे-धीरे युद्ध के लिए मानसिक रूप से तैयार करना प्रारंभ किया।
सर्वप्रथम कांग्रेस को बुलाकर 21 सितंबर 1939 ई. को हथियारों की बिक्री पर लगे प्रतिबंध को हटाने का प्रस्ताव रखा गया, जिससे मित्र राष्ट्रों को हथियार तथा अन्य युद्ध सामग्री बेची जा सके। इसके साथ ही अमेरिकी सेना को सुदृढ़ बनाने, स्थल एवं नौसेना के विस्तार तथा 50,000 युद्धक विमानों के निर्माण की योजना प्रारंभ की गई। इतिहासकार कैरी ने इसे अमेरिका की समझौतावादी नीति कहा है।
अनिवार्य सैनिक सेवा अधिनियम
सितंबर 1940 ई. में अमेरिकी कांग्रेस ने पहली बार राष्ट्रपति रूजवेल्ट द्वारा समर्थित शांतिकाल में भी चयनात्मक प्रशिक्षण एवं सेवा अधिनियम (सेलेक्टिव ट्रेनिंग एंड सर्विस एक्ट) पारित किया। इस अधिनियम के अनुसार 21 से 65 वर्ष की आयु का प्रत्येक अमेरिकी पुरुष संयुक्त राज्य की स्थल सेना एवं नौसेना में सेवा के लिए पात्र माना गया। 1940 ई. में सरकार ने नई सामुद्रिक नीति के लिए 17,000,000,000 डॉलर से अधिक की राशि स्वीकृत की तथा अत्याधुनिक हथियारों के निर्माण पर भी भारी व्यय का प्रावधान किया।
द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका का प्रवेश
इटली के द्वितीय विश्व युद्ध में प्रवेश, यूरोप में जर्मन प्रभाव के तीव्र विस्तार तथा 1940 ई. के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के परिणामों ने संयुक्त राज्य अमेरिका को अपनी सुरक्षा और विदेश नीति के संबंध में नई रणनीतियाँ अपनाने के लिए प्रेरित किया। इस परिस्थिति में अमेरिका ने अपनी सैन्य शक्ति को सुदृढ़ बनाने, पश्चिमी गोलार्ध की सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अन्य अमेरिकी देशों के साथ सहयोग बढ़ाने तथा ब्रिटेन को युद्ध में हर संभव आर्थिक और सैन्य सहायता प्रदान करने की नीति अपनाई, जिससे धुरी राष्ट्रों के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सके। इन सुरक्षा उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए राष्ट्रपति, कांग्रेस और अमेरिकी जनता के सहयोग की आवश्यकता थी। इसी क्रम में ब्रिटेन को भी युद्ध सामग्री की सहायता दी जाने लगी। यद्यपि अमेरिकी विदेश नीति में आए ये परिवर्तन राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यक माने गए, तथापि अमेरिकी विदेश नीति के ये परिवर्तन अलगाववादियों के लिए स्वीकार्य नहीं थे।
6 दिसंबर 1941 ई. को राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने अपने एक भाषण में यूरोपीय शक्तियों से शांति बनाए रखने की अपील की। इसके अगले दिन श्री कुरुसु तथा टोक्यो के राजदूतों ने राष्ट्र सचिव हल से भेंट का अनुरोध किया, जिससे वे अमेरिकी प्रस्तावों का औपचारिक उत्तर दे सकें। परंतु इसी दौरान 7 दिसंबर 1941 ई. को सूचना मिली कि जापानी विमानों ने पर्ल हार्बर स्थित अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर आक्रमण कर दिया है, जहाँ अमेरिका का प्रमुख नौसैनिक बेड़ा तैनात था।
हमले के कुछ ही समय बाद जापान ने संयुक्त राज्य अमेरिका तथा ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। 8 दिसंबर को युद्ध की घोषणा सीनेट में 82–0 तथा प्रतिनिधि सभा में 388–1 मतों से पारित हुई।
9 दिसंबर 1941 ई. को राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने अमेरिकी जनता को अपना युद्ध-संदेश दिया, जिसमें उन्होंने घोषणा की कि यह युद्ध केवल अमेरिका की सुरक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व में लोकतंत्र की रक्षा के लिए भी लड़ा जा रहा है। अमेरिकी जनता ने उनके इस आह्वान का पूर्ण समर्थन किया। 11 दिसंबर को जर्मनी और इटली ने भी अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इसके उत्तर में कांग्रेस ने तत्काल युद्ध की घोषणा कर दी और इस प्रकार द्वितीय विश्व युद्ध वास्तव में विश्वव्यापी बन गया।
1933 ई. से 1941 ई. तक अमेरिकी वैदेशिक नीति मुख्यतः अलगाववाद पर आधारित रही, परंतु बदलती हुई अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों ने अंततः अमेरिका को द्वितीय विश्व युद्ध में सम्मिलित होने के लिए विवश कर दिया।




