उड़ीसा का भौम-कर राजवंश
प्राचीन उड़ीसा (ओडिशा) का इतिहास भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के विकास का एक अत्यंत गौरवशाली अध्याय है। प्राचीन काल में यह प्रदेश कलिंग, उत्कल, ओड्र, ओड्रदेश, त्रिकलिंग तथा कोंगोद जैसे विभिन्न नामों से प्रसिद्ध था। अपनी अनुकूल भौगोलिक स्थिति, समुद्री व्यापार, सांस्कृतिक समृद्धि तथा धार्मिक बहुलता के कारण यह क्षेत्र प्राचीन भारत के प्रमुख राजनीतिक एवं सांस्कृतिक केंद्रों में सम्मिलित था। सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध के पश्चात यहाँ महामेघवाहन, शैलोद्भव, भौम-कर, सोमवंशी तथा पूर्वी गंग जैसे अनेक शक्तिशाली राजवंशों ने शासन किया।
भौम-कर राजवंश ने लगभग आठवीं से दसवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य पूर्वी भारत पर शासन किया। उनका राज्य तोशाल (तोशाली) कहलाता था, जिसमें वर्तमान ओडिशा का अधिकांश भाग सम्मिलित था। आठवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक भौम-कर शासकों ने शैलोद्भव वंश के पूर्ववर्ती राज्य पर भी अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। इस राजवंश की राजधानी गुहदेवपाटक अथवा गुहेश्वरपाटक थी, जिसकी पहचान वर्तमान जाजपुर के निकट की जाती है।
इस वंश के प्रारंभिक शासक मुख्यतः बौद्ध धर्म, विशेषकर महायान परंपरा के अनुयायी थे, जबकि बाद के शासकों ने शैव और वैष्णव धर्म को भी संरक्षण प्रदान किया। इसी काल में रत्नागिरि, ललितगिरि और उदयगिरि जैसे प्रसिद्ध बौद्ध केंद्रों का विकास हुआ, जिन्होंने पूर्वी भारत में बौद्ध शिक्षा एवं वज्रयान परंपरा के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भौम-कर राजवंश की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इस वंश में सात महिला शासिकाओं ने स्वतंत्र रूप से शासन किया, जो भारतीय इतिहास में अत्यंत विरल उदाहरण है। दसवीं शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्द्ध में भौम-कर राजवंश का पतन हो गया और इसके स्थान पर भंज तथा सोमवंशी शासकों ने ओडिशा में अपना प्रभुत्व स्थापित किया। फिर भी उड़ीसा की राजनीति, धर्म, समाज, कला और स्थापत्य पर इस वंश का प्रभाव बना रहा। इस प्रकार भौम-कर राजवंश केवल एक राजनीतिक शक्ति नहीं था, बल्कि उड़ीसा की सांस्कृतिक चेतना, धार्मिक समन्वय और स्थापत्य वैभव का एक स्थायी प्रतीक भी था।
ऐतिहासिक स्रोत
भौम-कर वंश के इतिहास के पुनर्निर्माण में अभिलेखीय, पुरातात्त्विक तथा मुद्राशास्त्रीय स्रोतों के साथ-साथ साहित्यिक स्रोतों से महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है। यद्यपि इस वंश से संबंधित समकालीन साहित्यिक सामग्री अपेक्षाकृत सीमित है, फिर भी उपलब्ध साक्ष्यों के समन्वित उपयोग से इस वंश के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक इतिहास की एक स्पष्ट और सुव्यवस्थित रूपरेखा तैयार की जा सकती है।
भौम-कर राजवंश के लेखन में अभिलेख सर्वाधिक विश्वसनीय स्रोत हैं। इस वंश के शासकों द्वारा जारी ताम्रपत्र एवं शिलालेख नेउलपुर, गणेशगुंफा, धौली, धराकोट, ढेंकनाल, तालचेर, अंगुल, अंबागाँव तथा अन्य अनेक स्थानों से प्राप्त हुए हैं। इन अभिलेखों से वंशावली, प्रशासनिक संरचना, भूमि-अनुदान व्यवस्था, धार्मिक नीति तथा सामाजिक जीवन की विस्तृत जानकारी मिलती है। गणेशगुंफा ताम्रपत्र से प्रारंभिक शासकों का परिचय मिलता है, जबकि तालचेर ताम्रपत्र से प्रशासनिक व्यवस्था एवं दान-नीति की जानकारी प्राप्त होती है। शिवकर द्वितीय के चौरासी ताम्रपत्र में भौम-कर शासकों को ‘उत्कल-परिवार के भौम’ कहा गया है। इन अभिलेखों की भाषा संस्कृत तथा लिपि सिद्धमात्रिका एवं प्रारंभिक ओड़िया रूपों में मिलती है।
पुरातात्त्विक अवशेष भी इस इतिहास के पुनर्निर्माण में अत्यंत उपयोगी हैं। रत्नागिरि, ललितगिरि और उदयगिरि से प्राप्त बौद्ध विहार, स्तूप, मूर्तियाँ और अवशेष भौम-कर काल की धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाते हैं। भुवनेश्वर का वैताल देउल मंदिर खाकरा शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो इस वंश की विशिष्ट स्थापत्य परंपरा का सूचक है। ललितगिरि से प्राप्त बुद्ध के अवशेष इस बात के साक्षी हैं कि यह क्षेत्र महायान एवं वज्रयान बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र था। जाजपुर और ढेंकनाल क्षेत्र से प्राप्त शैव, शाक्त और वैष्णव प्रतिमाओं से धार्मिक समन्वय की परंपरा पर प्रकाश पड़ता है।
मुद्राशास्त्रीय साक्ष्य यद्यपि सीमित हैं, फिर भी उपलब्ध सिक्कों एवं प्रतीकों से राजकीय चिह्नों, धार्मिक आस्थाओं और आर्थिक गतिविधियों की जानकारी प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त ‘विष्णु पुराण’, ‘ब्रह्मांड पुराण’, ‘दाठावंश’, ‘गंडव्यूह’, ‘हुदूद-अल-आलम’, सरला दास का ‘महाभारत’ तथा ‘मदलापांजी’ जैसे साहित्यिक स्रोत भी उपयोगी हैं, यद्यपि उनकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता सीमित है। फिर भी इन सभी स्रोतों के समन्वित उपयोग से भौम-कर वंश के इतिहास का पुनर्निर्माण किया जा सकता है।
भौम-कार वंश का नामकरण और उत्पत्ति
भौम-कर राजवंश के प्रारंभिक अभिलेखों में इनके परिवार का नाम केवल ‘भौम’ मिलता है, जबकि ‘कर’ शब्द का प्रयोग पहली बार इस वंश के छठे राजा शुभकर द्वितीय के एक अभिलेख में वंशगत उपनाम के रूप में प्रयुक्त हुआ है। इस वंश के सभी पुरुष शासकों के नाम ‘-कार’ अथवा ‘-कर’ पर समाप्त होते हैं, जिससे प्रतीत होता है कि ‘कर’ इस परिवार का वंशसूचक नाम था और संभवतः इसी आधार पर इस वंश को सामूहिक रूप से ‘भौम-कर’ राजवंश कहा गया है।
भौम-करों की उत्पत्ति के संबंध में इतिहासकारों ने विभिन्न मतों का प्रतिपादन किया है। कुछ इतिहासकार भौम-करों को प्राग्ज्योतिष (वर्तमान असम) के पौराणिक भौम वंश से संबंधित मानते हैं। प्राग्ज्योतिष के भौम शासक स्वयं को पौराणिक राजा नरकासुर (भौम) का वंशज मानते थे। नरकासुर को पृथ्वी (भूदेवी) का पुत्र माना गया है, इसलिए उन्हें ‘भौम’ कहा गया। इसी आधार पर कुछ विद्वानों ने उड़ीसा के भौमकरों की उत्पत्ति भी उसी परंपरा से जोड़ने का प्रयास किया है।
नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर के अभिलेख के अनुसार नेपाल के राजा जयदेव की रानी राज्यवती हर्षवर्मन की पुत्री थीं। अभिलेख में हर्षवर्मन को महाभारत के प्रसिद्ध राजा भगदत्त का वंशज बताया गया है, जिसने गौड़, ओड्र तथा कलिंग जैसे प्रदेशों पर विजय प्राप्त की थी। इसी आधार पर के. सी. पाणिग्राही का अनुमान है कि उड़ीसा के भौम-कर तथा असम के हर्षवर्मन दोनों ही भगदत्त के वंशज रहे होंगे। उनके अनुसार संभवतः ओड्र अथवा तटीय उड़ीसा पर अधिकार स्थापित करने के पश्चात् हर्षवर्मन ने अपने किसी संबंधी को वहाँ का शासक अथवा राज्यपाल नियुक्त किया होगा, जिसने बाद में स्वतंत्र भौम-कर राजवंश की स्थापना की।
पाणिग्राही के अनुसार आठवीं शताब्दी के प्रारंभ में बंगाल और उड़ीसा की तत्कालीन राजनीतिक स्थिति अत्यंत अस्थिर एवं अराजक थी। ऐसी परिस्थितियों में किसी बाहरी शक्ति के आक्रमण तथा उसके परिणामस्वरूप नए राजवंश के उदय की सँभावना अस्वाभाविक नहीं थी।
पाणिग्राही असमिया और ओड़िया भाषाओं की संरचनात्मक समानताओं को भी दोनों क्षेत्रों के प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों का प्रमाण मानते हैं। इसके अतिरिक्त, उड़ीसा और असम की कला में भी उल्लेखनीय समानताएँ दिखाई देती हैं। असम के तेजपुर जिले के दाह-पार्वतिया से प्राप्त गंगा प्रतिमाओं तथा उड़ीसा के जाजपुर जिले स्थित रत्नागिरि की गंगा प्रतिमाओं में अनेक प्रतिमाशास्त्रीय समानताएँ पाई जाती हैं। उड़ीसा की भौगोलिक स्थिति भी ऐसी थी कि यहाँ उत्तर-पूर्व, उत्तर-पश्चिम तथा दक्षिण-पश्चिम तीनों दिशाओं से प्रव्रजन अथवा आक्रमण संभव था। कुछ विद्वानों का मत है कि भौम उत्तर-पूर्व से आए, उनके पश्चात् सोमवंशी उत्तर-पश्चिम से तथा गंगवंशी दक्षिण-पश्चिम से उड़ीसा पहुँचे।
प्राग्ज्योतिष के पौराणिक भौम वंश अथवा नरकासुर के वंशज होने का यह सिद्धांत मुख्यतः पौराणिक परंपराओं पर आधारित है। आधुनिक इतिहास-लेखन में इसे ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित मत नहीं माना जाता है, क्योंकि इसके समर्थन में कोई समकालीन अभिलेखीय अथवा पुरातात्त्विक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।
इतिहासकार बिनायक मिश्र तथा आर. सी. मजूमदार के अनुसार भौम-कर मूलतः महेंद्र पर्वत क्षेत्र के ‘भौम’ नामक स्थानीय समुदाय अथवा जनजाति से संबंधित थे। इस मत का आधार विष्णु पुराण की एक पांडुलिपि है, जिसमें ‘महेंद्र-भौम’ पद का उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण में भौमगुह नामक एक राजा का भी उल्लेख मिलता है, जिसके अधीन कलिंग, महिष्य (वर्तमान मिदनापुर क्षेत्र) तथा महेंद्र प्रदेश थे। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि भौमगुह भौम-कर शासकों का आदिपुरुष रहा होगा तथा भौमकरों की राजधानी गुहदेवपाटक (गुहेश्वरपाटक) का नाम भी महेंद्र क्षेत्र के प्रसिद्ध राजा गुहा से संबंधित हो सकता है। यह सिद्धांत इस दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण माना जाता है कि प्रारंभिक मध्यकाल में उड़ीसा के अनेक शक्तिशाली राजवंश स्थानीय जनजातीय नेतृत्व से विकसित हुए थे।
किंतु अधिकांश आधुनिक इतिहासकार इस मत को भी नहीं मानते हैं। वायु पुराण के अनुसार राजा गुहा का काल लगभग चौथी शताब्दी ईस्वी माना जाता है, जबकि भौम-कर वंश का उदय आठवीं शताब्दी ईस्वी में हुआ। इन दोनों के मध्य लगभग चार शताब्दियों का अंतर है। अतः भौमगुह और भौमकरों के बीच प्रत्यक्ष वंशगत संबंध स्थापित करना ऐतिहासिक दृष्टि से संभव नहीं है।
बिनायक मिश्र का यह भी मत था कि भौम-कर प्राचीन ‘उत्कल वंश’ से संबंधित थे, क्योंकि शिवकार द्वितीय के चौरासी ताम्रपत्र अभिलेख में शासक को ‘उत्कल-परिवार के भौम वंश’ से संबंधित बताया गया है। किंतु कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस अभिलेख में प्रयुक्त ‘उत्कल’ शब्द को वंशगत पहचान के रूप में नहीं, बल्कि भौगोलिक पदनाम के रूप में समझना अधिक उचित है, जो उस समय शासक-परिवार के निवास अथवा शासन-क्षेत्र का संकेत देता है।
एन. के. साहू तथा कुछ अन्य इतिहासकार ‘भुइयाँ’ और ‘भौम’ शब्दों की ध्वन्यात्मक समानता के आधार पर भौमकरों का संबंध उत्तरी उड़ीसा के भुइयाँ अथवा भूमिज समुदायों से जोड़ते हैं। किंतु यह तर्क निर्णायक नहीं माना जाता, क्योंकि ऐसे अनेक शब्द संस्कृत की ‘भू’ धातु से व्युत्पन्न हैं। इसके अतिरिक्त, ऐसा कोई ठोस अभिलेखीय अथवा ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, जिससे यह सिद्ध हो सके कि भुइयाँ समुदाय के पूर्वजों ने दसवीं शताब्दी से पूर्व किसी संगठित राज्य पर शासन किया था। इसलिए भुइयाँ अथवा भूमिज समुदाय से भौमकरों की उत्पत्ति का यह मत भी ऐतिहासिक दृष्टि से स्वीकृति नहीं है।
पंद्रहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध ओड़िया कवि सरला दास ने अपने ओड़िया महाभारत में ‘विष्णुकर’ को कर परिवार का आदिपुरुष तथा इस वंश का संस्थापक बताया है। इस आधार पर कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि भौम-कर संभवतः म्लेच्छ शासक हर्ष के सामंत रहे होंगे, जिन्होंने बाद में उड़ीसा के एक भाग पर अधिकार स्थापित कर स्वतंत्र सत्ता की स्थापना की। किंतु इस सिद्धांत के समर्थन में भी कोई ठोस ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि कलिंग के बौद्ध राजा गुहसीव, जिनका उल्लेख सिंहली ग्रंथ ‘दाठावंश’ में मिलता है, ने संभवतः उड़ीसा में भौम शासन की आधारशिला रखी होगी। किंतु यह मत भी मात्र अनुमान पर आधारित है तथा इसे प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त अभिलेखीय अथवा पुरातात्त्विक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।
अभिलेखीय तथा साहित्यिक साक्ष्यों के आधार पर हरमन कुल्के, के. सी. पाणिग्राही तथा आर. डी. बनर्जी जैसे आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि भौम-कर किसी बाहरी शासक वर्ग के प्रतिनिधि न होकर उड़ीसा के स्थानीय अभिजात वर्ग से विकसित एक क्षेत्रीय शक्ति थे। उनके अनुसार भौमकरों ने स्थानीय प्रशासनिक परंपराओं को अपनाते हुए क्रमशः संपूर्ण तटीय उड़ीसा को एक राजनीतिक इकाई के रूप में संगठित किया। यही कारण है कि उनके शासनकाल में ओड्र, उत्कल, कोंगोड तथा तोशल जैसे क्षेत्रों का क्रमिक राजनीतिक एकीकरण संभव हो सका। वर्तमान इतिहास-लेखन में यही मत सर्वाधिक संतुलित एवं व्यापक रूप से स्वीकार्य है।
भौम-कर संवत् का प्रारंभ
भौम-कर शासकों ने अपने ताम्रपत्रों और अभिलेखों में एक विशिष्ट कालगणना (संवत्) के आधार पर अंकित हैं, जिसका नाम केवल ‘संवत्’ दिया गया है, किंतु उसके प्रारंभ का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। इस कारण इस संवत् के प्रवर्तन तथा प्रारंभ-वर्ष के संबंध में इतिहासकारों में मतभेद है। कुछ इतिहासकारों का मत है इस संवत् का प्रवर्तन क्षेमंकरदेव ने किया था, जबकि दूसरी ओर कुछ विद्वानों का तर्क है कि इसका प्रारंभ उनके उत्तराधिकारी शिवकरदेव प्रथम के राज्यारोहण के अवसर पर हुआ था। दिनेशचंद्र सरकार ने भौम-कर सामंत शत्रुभंज द्वितीय के दशपल्ला अभिलेख में प्राप्त खगोलीय विवरणों के विश्लेषण के आधार पर इस संवत् का प्रारंभ 831 ईस्वी में माना है, जबकि अभिलेखीय साक्ष्यों के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर के. सी. पाणिग्राही इस संवत् का प्रारंभ 736 ईस्वी से मानते हैं। सत्य नारायण राजगुरु तथा बिश्वरूप दास सहित अनेक विद्वानों ने 736 ईस्वी को ही भौम संवत् का प्रारंभ-वर्ष स्वीकार किया है। इस प्रकार सामान्यतः 736 ईस्वी को ही भौम संवत् का प्रारंभ-वर्ष माना जाता है।
भौम-कर राज्य की स्थापना और राजधानी
भौम-कर वंश का उदय उस समय हुआ जब पूर्वी भारत की राजनीतिक स्थिति अत्यंत जटिल और संघर्षपूर्ण थी। उत्तर में पाल, पश्चिम में गुर्जर-प्रतिहार तथा दक्षिण में राष्ट्रकूट अपनी-अपनी शक्ति का विस्तार कर रहे थे। इन तीनों महाशक्तियों के पारस्परिक संघर्ष का प्रभाव उड़ीसा पर भी पड़ा, जहाँ ओड्र, तोशल, कोंगोडा और उत्कल जैसे अनेक छोटे-छोटे राज्यों तथा स्थानीय सामंतों का प्रभुत्व था। इन्हीं परिस्थितियों में एक सशक्त क्षेत्रीय शक्ति के रूप में भौम-कर वंश का उदय हुआ।
अभिलेखीय साक्ष्यों के अनुसार भौम-कर राजवंश की स्थापना लगभग 736 ईस्वी में क्षेमंकरदेव (लक्ष्मीकर) ने कलिंग (उड़ीसा) में की। इसी वर्ष से संभवतः भौम-कर शासकों ने अपने स्वतंत्र राजकीय संवत् का प्रयोग प्रारंभ किया। प्रारंभिक भौम-कर शासकों ने स्थानीय सामंतों को अपने अधीन संगठित कर राज्य की राजनीतिक एकता को सुदृढ़ किया।
भौम-कर वंश की राजधानी गुहेश्वरपाटक (गुहदेवपाटक) थी, जिसकी पहचान वर्तमान उड़ीसा के जाजपुर जिले के निकट स्थित गोहिराटिकरा क्षेत्र से की जाती है। अनेक इतिहासकार इसे प्राचीन विरजा नगर का विकसित रूप मानते हैं। ताम्रपत्रों, शिलालेखों तथा पुरातात्त्विक अवशेषों से स्पष्ट होता है कि यह नगर तत्कालीन समय में एक प्रमुख राजनीतिक, प्रशासनिक और धार्मिक केंद्र था। यहीं से भौम शासकों ने अपने राज्य का विस्तार किया तथा भूमि-अनुदानों, मंदिरों और बौद्ध विहारों के संरक्षण के माध्यम से उड़ीसा में एक सुदृढ़ एवं समृद्ध राज्य की स्थापना की।
भौम-कर राजवंश के प्रमुख शासक
भौम-कर राजवंश का इतिहास उसके कुशल, दूरदर्शी और धार्मिक रूप से उदार शासकों के कारण विशेष महत्त्वपूर्ण है। इस वंश ने लगभग दो शताब्दियों तक ओडिशा के विस्तृत भूभाग पर शासन किया। प्रारंभिक शासकों ने राज्य की स्थापना और विस्तार किया, जबकि बाद के शासकों ने प्रशासन को मजबूत बनाकर राज्य की स्थिरता बनाए रखी। राजनीतिक संकट के समय इस वंश की महिला शासिकाओं ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और राज्य को विघटन से बचाने का प्रयास किया। भौम-कर राजवंश की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें सात रानियों ने क्रमशः शासन किया, जो भारतीय इतिहास में अत्यंत दुर्लभ उदाहरण है। यह राजवंश अपनी सुदृढ़ शासन व्यवस्था, धार्मिक सहिष्णुता और महिला नेतृत्व के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

भौम-कर राजवंश का महत्त्व केवल एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि ओडिशा के राजनीतिक एकीकरण, धार्मिक सहिष्णुता, महिला नेतृत्व, बौद्ध एवं ब्राह्मण धर्म के समन्वय तथा कलिंग स्थापत्य के विकास में उसके स्थायी योगदान के कारण भी है। इस वंश के शासकों ने प्रशासनिक संगठन, सांस्कृतिक संरक्षण और धार्मिक उदारता के माध्यम से ओडिशा के इतिहास को नई दिशा प्रदान की। यही कारण है कि भौम-कर काल को ओडिशा के प्रारंभिक मध्यकालीन इतिहास का ‘स्वर्णिम संक्रमण काल’ माना जाता है। इस राजवंश के शासकों का विवरण निम्नलिखित है-
क्षेमंकरदेव (लगभग 736–756 ई.)
क्षेमंकरदेव भौम-कर राजवंश के संस्थापक और इसके प्रथम प्रमुख शासक थे। उनके समय में ओडिशा अनेक छोटे-छोटे राज्यों और स्थानीय शासकों में विभाजित था। ऐसी परिस्थिति में उन्होंने तोशाल क्षेत्र को संगठित कर एक सुदृढ़ राज्य की स्थापना की। ताम्रपत्रों और अभिलेखों से ज्ञात होता है कि उन्होंने प्रशासन को सुव्यवस्थित किया, अनेक सामंतों को अपने अधीन किया तथा राज्य की शासन व्यवस्था को मजबूत आधार प्रदान किया। शुभकरदेव द्वितीय के नयालपुर (नेउलपुर) ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि उन्होंने साम्राज्य की अखंडता को सुरक्षित रखने के लिए समुचित कदम उठाए और समाज में प्रचलित चातुर्वर्ण्य व्यवस्था की पुनः स्थापना की। एक ओर उन्होंने अपनी ‘लौह एवं रक्त’ की नीति के माध्यम से राज्य में कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ किया, तो दूसरी ओर सामाजिक शांति और सौहार्द को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अपनी प्रजा के प्रति उदार एवं समन्वयवादी नीति अपनाई, जिसके परिणामस्वरूप भौम सत्ता को सुदृढ़ आधार प्राप्त हुआ।
सामनगढ़ अभिलेख तथा दशावतार अभिलेख से ज्ञात होता है कि राष्ट्रकूट शासक दंतिदुर्ग (735-756 ई.) ने कलिंग और कोसल पर विजय प्राप्त की थी, किंतु उसने ओड्र और उत्कल पर आक्रमण नहीं किया। इससे प्रतीत होता है कि क्षेमंकरदेव की शक्ति और वीरता के कारण राष्ट्रकूट शासक उड़ीसा के इस भाग पर अधिकार करने का साहस नहीं कर सके।
क्षेमंकरदेव बौद्ध धर्म के अनन्य अनुयायी थे और भौम-कर अभिलेखों में उन्हें ‘परमोपासक’ की उपाधि से विभूषित किया गया है। किंतु उन्होंने ब्राह्मणों और बौद्ध विहारों दोनों को संरक्षण दिया, जिससे उन्हें समाज के विभिन्न वर्गों का समर्थन प्राप्त हुआ।
शिवकरदेव प्रथम (लगभग 756–780 ई.)
क्षेमंकरदेव के पश्चात् उनके योग्य पुत्र शिवकरदेव प्रथम ने भौम-कर राजवंश की सत्ता सँभाली, जिन्हें ‘उन्मत्तसिंह’ अथवा ‘उन्मत्तकेसरी’ के नाम से भी जाना जाता है। उन्हें इस वंश का वास्तविक निर्माता माना जाता है, क्योंकि उन्होंने अपने पिता द्वारा स्थापित राज्य का विस्तार कर उसे एक शक्तिशाली साम्राज्य का रूप दिया।
शिवकरदेव तृतीय के तालचेर ताम्रपत्र में शिवकरदेव प्रथम की तुलना भारतीय राजा पुरु (पोरस) से की गई है, जिन्होंने सिकंदर और उसकी मकदूनियाई सेना का साहसपूर्वक सामना किया था। इसी अभिलेख से ज्ञात होता है कि उन्होंने अपनी विशाल सेना के साथ दक्षिण-पश्चिम बंगाल की ओर अभियान किया और राढ़ के शासक को पराजित कर उसकी पुत्री तथा राजलक्ष्मी को विजय-चिह्न के रूप में अपने साथ ले आए। इतिहासकारों के अनुसार यह राजकुमारी संभवतः जयवल्लीदेवी थी, जिसे शिवकरदेव द्वितीय के चौरासी ताम्रपत्र में शिवकरदेव प्रथम की रानी बताया गया है।
शिवकरदेव तृतीय के तालचेर ताम्रपत्र से यह भी ज्ञात होता है कि शिवकरदेव प्रथम के शासनकाल में भौम सेना ने संपूर्ण कलिंग क्षेत्र पर अधिकार स्थापित कर लिया। यह क्षेत्र उत्तर में वंशधारा नदी से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी तक विस्तृत था। इस अभियान में उसकी सेनाओं ने गंग शक्ति को पराजित कर कोंगोद और श्वेतक पर भी अपना प्रभुत्व स्थापित किया। श्वेतक के शासक जयवर्मनदेव के गंजाम ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि उन्होंने कोंगोद मंडल के वर्त्तिनी विषय में स्थित वलारीश्रंग गाँव को भट्ट नन्नट को दान दिया था। यह दान उन्होंने विरजा के उन्मत्तकेसरी (शिवकरदेव प्रथम) की अनुमति प्राप्त करने के पश्चात् दिया था। यह अनुमति संभवतः विश्ववर्णदेव के माध्यम से प्राप्त की गई थी, जो संभवतः कोंगोद का राज्यपाल था। इससे स्पष्ट होता है कि जयवर्मनदेव शिवकरदेव प्रथम के अधीनस्थ सामंत थे तथा शिवकरदेव कोंगोद और श्वेतक के अधिपति थे। इस प्रकार शिवकरदेव प्रथम ने अपने राज्य का विस्तार कलिंग, कोंगोद, श्वेतक और राढ़ तक किया।
शिवकरदेव प्रथम केवल विजेता ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी दूरदर्शी शासक थे। उन्होंने सांस्कृतिक संबंध स्थापित करने के उद्देश्य से बौद्ध ग्रंथ ‘गंडव्यूह’ की एक प्रति बौद्ध विद्वान् प्रज्ञा के माध्यम से चीन के सम्राट ते-त्सोंग को भेंटस्वरूप भेजा तथा प्रज्ञा को इस ग्रंथ का चीनी भाषा में अनुवाद करने का दायित्व सौंपा। कुछ विद्वान मानते हैं कि गंडव्यूह की यह प्रति वास्तव में शिवकरदेव प्रथम के उत्तराधिकारी शुभकरदेव प्रथम के काल में भेंट की गई थी, किंतु अधिकांश इतिहासकारों का मत है कि यह कार्य शिवकरदेव प्रथम के शासनकाल में ही संपन्न हुआ होगा, न कि उसके पुत्र शुभकरदेव प्रथम के काल में। जो भी हो, यह घटना भारत और चीन के मध्य सांस्कृतिक संबंधों के के विकास का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।
शुभकरदेव प्रथम (लगभग 780–800 ई.)
शिवकरदेव प्रथम के पश्चात् उनके पुत्र और उत्तराधिकारी शुभकरदेव प्रथम भौम-कर गद्दी पर बैठे। युवराज के रूप में उन्होंने अपने पिता के अभियानों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और भौम-कर साम्राज्य का विस्तार कलिंग, कोंगोद तथा श्वेतक तक करने में सहयोग दिया था।
यद्यपि शुभकरदेव प्रथम का उद्देश्य साम्राज्य को और अधिक विस्तृत तथा शक्तिशाली बनाना था, परंतु वह अपने इस उद्देश्य को पूर्णतः साकार नहीं कर सके, क्योंकि लगभग 790 ई. के नेउलपुर शिलालेख से ज्ञात होता है कि उन्हें अपने ही वंश के विद्रोही सामंतों और संबंधियों के विरोध का सफलतापूर्वक दमन किया था, जिन्होंने राजसत्ता पर दावा किया था। इससे संकेत मिलता है कि उस समय भौम-कर राज्य के भीतर ही उत्तराधिकार संघर्ष और सत्ता-संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो चुकी थी। इसी आंतरिक अस्थिरता ने बाहरी शक्तियों के हस्तक्षेप का मार्ग प्रशस्त किया।
शुभकरदेव प्रथम को राष्ट्रकूट शासक गोविंद तृतीय (793-814 ई.) के आक्रमण का सामना करना पड़ा। राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष के संजन ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि उसके पूर्वज गोविंद तृतीय ने ओड्र, कोसल, कलिंग, वंग तथा दाहल पर विजय प्राप्त की थी। इस तथ्य की अप्रत्यक्ष पुष्टि शुभकरदेव प्रथम के हिंदोल ताम्रपत्र से भी होती है, जिसमें कहा गया है कि ‘यद्यपि उनके सैनिकों ने उनका साथ छोड़ दिया था, फिर भी उनके शत्रु उनकी कीर्ति को क्षीण नहीं कर सके और वह पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ बना रहे।’ इससे स्पष्ट होता है कि राष्ट्रकूटों के आक्रमण के समय शुभकरदेव प्रथम को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, किंतु उन्होंने अपने साहस और आत्मबल को बनाए रखा।
मदलापांजी में वर्णित एक कथा के अनुसार रक्तवाहु नामक एक आक्रमणकारी ने उड़ीसा पर आक्रमण किया, जिसके परिणामस्वरूप उड़ीसा के राजा सुभानदेव को भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों को लेकर राज्य छोड़ना पड़ा। के. सी. पाणिग्राही जैसे कुछ इतिहासकार रक्तवाहु की पहचान राष्ट्रकूटों से तथा सुभानदेव की पहचान शुभकरदेव प्रथम से करते हैं। परंतु इस मत के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि राष्ट्रकूट बौद्ध प्रतिमाओं अथवा धार्मिक प्रतीकों के विनाशक थे, जबकि भगवान जगन्नाथ उस समय बौद्ध परंपरा से संबद्ध माने जाते थे। अतः इस घटना को राष्ट्रकूटों से जोड़ना उचित प्रतीत नहीं होता है।
यद्यपि यह निश्चित है कि राष्ट्रकूटों का आक्रमण हुआ था, फिर भी उपलब्ध साक्ष्यों से स्पष्ट है कि शुभकरदेव प्रथम ने उनकी अधीनता स्वीकार नहीं की, क्योंकि उन्होंने ‘परमभट्टारक’ तथा ‘परमेश्वर’ जैसी सार्वभौम उपाधियाँ धारण की थीं। इससे प्रतीत होता है कि राष्ट्रकूटों का आक्रमण अस्थायी था और उसका भौम-कर राज्य की स्वतंत्रता पर कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ा।
शुभकरदेव प्रथम एक उदार, धर्मनिरपेक्ष तथा लोकहितैषी शासक थे। वह बौद्ध धर्म के अनुयायी थे और उन्होंने ‘परमसौगत’ की उपाधि धारण की थी। उन्होंने विशेष रूप से वज्रयान बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया और संभवतः रत्नागिरि, ललितगिरि और उदयगिरि जैसे प्रसिद्ध बौद्ध केंद्रों के पत्थर-निर्मित बौद्ध विहारों और स्तूपों का निर्माण आरंभ हुआ। बौद्ध धर्म के अनुयायी शुभकरदेव प्रथम अन्य धर्मों के प्रति भी सहिष्णु थे। उन्होंने दो सौ ब्राह्मणों को पंचाल विषय का कोंपारक गाँव तथा वाभ्युदयार विषय के दोंडकी और योक नामक गाँव दान दिए थे। जाजपुर के हंसेश्वर मंदिर के शिलालेख से ज्ञात होता है कि उनकी रानी माधवदेवी ने विरजा में माधवेश्वर शिव मंदिर का निर्माण कराया तथा भगवान की पूजा-अर्चना की व्यवस्था के लिए एक शैवाचार्य की नियुक्ति की। इसके अतिरिक्त, उन्होंने मंदिर के समीप एक जलाशय खुदवाया और वहीं एक हाट (बाज़ार) की स्थापना भी की।
शुभकरदेव प्रथम एक सर्वगुणसंपन्न, वीर और उदार शासक था। हंसेश्वर मंदिर के अभिलेख में उन्हें भौम-कर कुल का एक महान और शक्तिशाली राजा बताया गया है। भौम-कर अभिलेखों में उनकी प्रशंसा करते हुए उन्हें ‘सदाचार और सद्गुणों की खान’ कहा गया है। इस प्रकार शुभकरदेव प्रथम ने न केवल भौम-कर राज्य की राजनीतिक प्रतिष्ठा को बनाए रखा, बल्कि धार्मिक सहिष्णुता, सांस्कृतिक समन्वय तथा लोककल्याण के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
शिवकरदेव द्वितीय (लगभग 800–820 ई.)
शिवकरदेव द्वितीय के राज्यारोहण के साथ ही भौम-कर वंश के इतिहास में अपेक्षाकृत दुर्बल और संघर्षपूर्ण अध्याय का प्रारंभ हुआ। उनके शासनकाल में बंगाल के पाल शासकों ने उड़ीसा पर आक्रमण किया, जिसके परिणामस्वरूप भौम साम्राज्य को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
पाल नरेश नारायणपाल (लगभग 855-908 ई.) के बादल स्तंभ अभिलेख में उल्लेख है कि ‘गौड़ाधिपति (देवपाल) ने उत्कलों के वंश का उन्मूलन कर दिया।’ इस आधार पर कुछ विद्वानों का मत है कि शिवकरदेव द्वितीय पाल शासक देवपाल से पराजित हुआ था। इस मत की पुष्टि तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के विवरण से भी होती है, जिसमें देवपाल को उत्कल-विजय का श्रेय दिया गया है।
शिवकरदेव द्वितीय बौद्ध धर्म के अनुयायी थे और ‘सौगताश्रय’ की उपाधि धारण करते थे। इसके विपरीत, उनकी रानी मोहिनीदेवी शैव धर्म की अनुयायी थीं, जिन्होंने भुवनेश्वर में मोहिनी मंदिर का निर्माण कराया।
राजनीतिक दृष्टि से शिवकरदेव द्वितीय का शासनकाल विशेष सफल नहीं रहा। कहा जाता है कि भौम सामंतों और उच्च अधिकारियों में उसके प्रति अपेक्षित सम्मान और निष्ठा नहीं थी तथा राज्य की स्थिति ‘व्याकुल हृदयवाली स्त्री’ के समान संकटग्रस्त हो गई थी। ऐसी परिस्थिति में शिवकरदेव द्वितीय ने स्वेच्छा से अपने छोटे भाई शांतिकरदेव प्रथम के पक्ष में सिंहासन त्याग दिया।
शांतिकरदेव प्रथम (लगभग 820–835 ई.)
शिवकरदेव द्वितीय के सिंहासन-त्याग के पश्चात् उनके छोटे भाई शांतिकरदेव प्रथम भौम-कर वंश के शासक बने। उन्होंने भौम सत्ता को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से पश्चिमी गंग राजवंश के शासक राजमल्ल प्रथम (816–843 ई.) की पुत्री त्रिभुवन महादेवी प्रथम से विवाह किया। इस वैवाहिक गठबंधन के फलस्वरूप वह पालों को पराजित करने में सफल हुए, जिसके परिणामस्वरूप उड़ीसा पुनः एक स्वतंत्र और शक्तिशाली राज्य बन गया। इस तथ्य की अप्रत्यक्ष पुष्टि शुभकरदेव तृतीय के हिंदोल ताम्रपत्र से होती है। त्रिभुवन-महादेवी प्रथम के ढेंकानाल अभिलेख (लगभग 846 ई.) से भी संकेत मिलता है कि उनके पिता राजमल्ल ने राष्ट्रकूट और पाल प्रभाव को सीमित करने में भूमिका निभाई, जिससे भौम-कर राज्य की स्थिति में कुछ सुधार हुआ।
शांतिकरदेव प्रथम एक शक्तिशाली और कठोर शासक थे, जिनका अपने सामंतों पर पूर्ण नियंत्रण था। शिवकरदेव तृतीय के तालचेर ताम्रपत्र में कहा गया है कि ‘उनके (शांतिकरदेव प्रथम) मनोहर कमल-सदृश चरण पराजित शासकों के मुकुटविहीन मस्तकों से शोभायमान रहते थे।’ इसकी पुष्टि शुभकरदेव चतुर्थ के तालचेर ताम्रपत्र से भी होती है।
अपने पूर्वजों की भाँति शांतिकरदेव प्रथम में भी अनेक श्रेष्ठ गुण विद्यमान थे। शुभकरदेव तृतीय के हिंदोल ताम्रपत्र में कहा गया है कि ‘वह अत्यंत शक्तिशाली था और उनकी कीर्ति समस्त संसार में फैली हुई थी।’ वह सुसंस्कृत, शांतिप्रिय, मिलनसार तथा अनुपम गुणों से युक्त थे। समकालीन अभिलेखों में उसके शासनकाल को भौम साम्राज्य की शक्ति, समृद्धि और यश का स्वर्णकाल बताया गया है।
शुभकरदेव द्वितीय (लगभग 835–838 ई.)
शुभकरदेव द्वितीय का शासनकाल अत्यंत अल्पकालिक तथा अपेक्षाकृत घटनाविहीन था। उनके शासनकाल की किसी विशेष राजनीतिक उपलब्धि अथवा सैन्य विजय का उल्लेख नहीं मिलता। उनके तेरुंडिया ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि वह बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। उन्होंने दक्षिण तोशाली के सुलंतरकुर्भ विषय में स्थित लवंगा नामक गाँव भारद्वाज गोत्र के छह ब्राह्मणों को दान दिया था।
शुभकरदेव तृतीय (लगभग 838–845 ई.)
शुभकरदेव द्वितीय के उत्तराधिकारी उनके चचेरे भाई शुभकरदेव तृतीय हुए। यद्यपि उनका शासनकाल संक्षिप्त था, फिर भी उनका शासन भौम-कर राजवंश के इतिहास में एक परिवर्तनकारी चरण सिद्ध हुआ। संभवतः वह भौम-कर राजवंश की एक कनिष्ठ शाखा से संबंधित थे। संभवतः यही कारण है कि उनके अभिलेखों में पूर्ववर्ती शाखा के शासक शुभकरदेव द्वितीय का उल्लेख नहीं मिलता है।
शुभकरदेव तृतीय एक धार्मिक एवं दानशील शासक थे। हिंदोल ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि उन्होंने पुलिंदराज के अनुरोध पर युवांगुलपाटक में पुलिंदेश्वर मंदिर का निर्माण कराया और वहाँ वैद्यनाथ भट्टारक नामक देवता की प्रतिमा स्थापित कराई। मंदिर के निर्वाह तथा पूजा-अर्चना की व्यवस्था के लिए उन्होंने उत्तरी तोशाली मंडल के कंकवीर विषय में स्थित नड्डिलो नामक गाँव दान में दिया। धराकोट ताम्रपत्र के अनुसार उन्होंने कोंगोद मंडल के जयंतिका विषय में स्थित गुंडजा गाँव मौद्गल्य गोत्र के नारायण और कौशिक गोत्र के देवकंठ को दान दिया था।
त्रिभुवन महादेवी प्रथम (लगभग 843/846–850 ई.)
शुभकरदेव तृतीय की निःसंतान मृत्यु के पश्चात भौम-कर वंश में उत्तराधिकार का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया। इस संकटपूर्ण परिस्थिति में उनकी माता तथा शांतिकरदेव प्रथम की विधवा रानी त्रिभुवन महादेवी प्रथम (गोस्वामिनी देवी) लगभग 843–846 ईस्वी के मध्य तोशाली (उत्कल) के सिंहासन पर आसीन हुईं। उनके राज्यारोहण के साथ ही भौम-कर राजवंश के इतिहास में एक नए युग का आरंभ हुआ, क्योंकि पहली बार किसी महिला ने स्वतंत्र रूप से राज्य की बागडोर सँभाली और आगे चलकर भौम-कर वंश की अन्य महिला शासिकाओं के लिए आदर्श प्रस्तुत किया।
त्रिभुवन महादेवी प्रथम का राज्यारोहण अत्यंत विषम राजनीतिक परिस्थितियों में हुआ। उनके शासन से पूर्व पाल सम्राट देवपाल ने भौम-कर शासक शिवकरदेव द्वितीय को पराजित कर राज्य पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था, जिससे अनेक सामंत स्वायत्त होने लगे थे। इसके पश्चात शांतिकरदेव प्रथम तथा शुभकरदेव तृतीय की मृत्यु से उत्तराधिकार का संकट और गहरा हो गया था। ऐसी परिस्थिति में त्रिभुवन महादेवी ने शासन की बागडोर सँभालते हुए असाधारण राजनीतिक दूरदर्शिता, साहस और प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया।

अनेक इतिहासकारों का मत है कि प्रारंभ में उन्हें सभी सामंतों का समर्थन प्राप्त नहीं था तथा उन्हें विद्रोह और विरोध का सामना करना पड़ा। किंतु उन्होंने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति, सैन्य कौशल और राजनीतिक दक्षता के बल पर इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया। ढेंकनाल ताम्रपत्र में उल्लेख है कि गुहेश्वरपाटक में सिंहासन ग्रहण करते समय उन्होंने स्वयं की तुलना देवी कात्यायनी से की थी। कात्यायनी देवी दुर्गा का वीर एवं उग्र स्वरूप हैं; अतः यह उपमा उनकी राजनीतिक दृढ़ता, प्रशासनिक क्षमता तथा संकटों से संघर्ष करने के साहस का प्रतीक है। इसी ताम्रपत्र में अलंकारिक शैली में वर्णित है कि सामंतों एवं अधीनस्थ राजाओं के मुकुट उनके चरणकमलों का स्पर्श करते थे। यद्यपि यह वर्णन काव्यात्मक है, तथापि इससे यह संकेत मिलता है कि उन्होंने विद्रोही सामंतों को पुनः केंद्रीय सत्ता के अधीन कर लिया था। शुभकरदेव चतुर्थ के तालचेर ताम्रपत्र में उनकी प्रशंसा करते हुए कहा गया है कि उन्होंने समस्त राज्य का भार उसी प्रकार धारण किया, जैसे शेषनाग अपने फणों पर पृथ्वी को धारण करते हैं।
त्रिभुवन महादेवी प्रथम एक कुशल एवं दूरदर्शी प्रशासिका थीं। उन्होंने राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ किया तथा ‘निर्मल चरित्र और स्वच्छ हाथों वाले अधिकारियों’ की नियुक्ति कर सुशासन स्थापित किया। वह अपने सामंतों पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखने में सफल रहीं और सामंतों ने उनके प्रति ‘भक्तिपूर्ण निष्ठा’ प्रदर्शित की। शुभकरदेव चतुर्थ के तालचेर ताम्रपत्र में उनकी प्रशंसा करते हुए कहा गया है कि ‘उनके शासनकाल में राज्य के सभी प्रशासनिक अंग उन्नति करते रहे, शत्रुओं का दमन हुआ, राज्य की कीर्ति दूर-दूर तक फैली तथा प्रजा के मध्य शांति और सद्भाव बना रहा।’
अभिलेखों से यह भी ज्ञात होता है कि उन्होंने प्रजा के हितों का ध्यान रखते हुए न्यायपूर्ण शासन स्थापित किया। भौम-कर शासकों की परंपरा का अनुसरण करते हुए उन्होंने मंदिरों, मठों तथा अन्य धार्मिक संस्थाओं को भूमि-अनुदान प्रदान किए। उनके शासनकाल में राज्य की राजनीतिक स्थिरता ने कृषि, व्यापार तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था के विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं।
समकालीन अरबी ग्रंथ हुदूद-अल-आलम में उल्लेख है कि राज्य की सर्वोच्च सत्ता एक महिला ‘रायिना’ (रानी) के हाथों में थी तथा ‘दहुमा’ (भौम) का शासक स्वयं को किसी अन्य शासक से कम नहीं मानता था। यह विवरण उस समय भौम-कर राज्य की राजनीतिक प्रतिष्ठा तथा त्रिभुवन महादेवी की सुदृढ़ सत्ता का द्योतक है।
त्रिभुवन महादेवी की सफलता में उनके पितृवंश का भी महत्त्वपूर्ण योगदान था। हिंदोल तथा ढेंकनाल ताम्रपत्रों के आधार पर कुछ इतिहासकार उन्हें नागोद्भव कुल के श्री राजमलदेव की पुत्री बताते हैं, जबकि कुछ विद्वान उन्हें शैलोद्भव वंश से संबंधित मानते हैं। के. सी. पाणिग्राही के अनुसार वह पश्चिमी गंग राजवंश के राजा राजमल्ल की पुत्री थीं और उन्होंने अपने शक्तिशाली पितृवंश के सहयोग से त्रिकलिंग के तटीय एवं मध्य क्षेत्रों में विद्रोही सामंतों का दमन कर राज्य में पुनः शांति एवं राजनीतिक स्थिरता स्थापित की।
त्रिभुवन महादेवी प्रथम कला एवं स्थापत्य की संरक्षिका भी थीं। अनेक विद्वान भुवनेश्वर स्थित प्रसिद्ध बैताल देउल मंदिर के निर्माण को उनके शासनकाल से संबद्ध मानते हैं। यह मंदिर उड़ीसा की विशिष्ट खाखरा शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है तथा भुवनेश्वर के प्राचीनतम मंदिरों में गिना जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि उनके शासनकाल में स्थापत्य कला एवं धार्मिक वास्तुकला का उल्लेखनीय विकास हुआ।
यद्यपि वह भगवान विष्णु की अनन्य उपासिका थीं और ढेंकनाल ताम्रपत्र में उन्हें ‘परमवैष्णवी गोस्वामिनी देवी’ की उपाधि से विभूषित किया गया है, फिर भी उनकी धार्मिक नीति उदार एवं सहिष्णु थी। उनके शासनकाल में वैष्णव, शैव तथा शाक्त संप्रदायों को समान संरक्षण प्राप्त था। साथ ही बौद्ध एवं जैन धर्मावलंबी भी बिना किसी उत्पीड़न के अपने धार्मिक कार्यों का निर्वाह करते रहे।
त्रिभुवन महादेवी प्रथम के शासनकाल की अवधि के संबंध में इतिहासकारों में मतभेद है। अधिकांश इतिहासकार उनका शासन लगभग 850 ईस्वी तक मानते हैं, जबकि के. सी. पाणिग्राही के अनुसार उन्होंने संभवतः 863 ईस्वी तक शासन किया। उनके मतानुसार जब उनका पौत्र शांतिकरदेव द्वितीय शासन करने योग्य हो गया, तब उन्होंने स्वेच्छा से राजसिंहासन उसे सौंप दिया।
इस प्रकार त्रिभुवन महादेवी प्रथम का शासन भारतीय इतिहास में महिला नेतृत्व का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने राजनीतिक संकट के समय न केवल भौम-कर राज्य को विघटन से बचाया, बल्कि उसे पुनः संगठित एवं सुदृढ़ भी किया। उनकी उपलब्धियों ने भौम-कर राजवंश में महिला शासन की एक सुदृढ़ परंपरा का सूत्रपात किया। उनके पश्चात इस वंश की अनेक रानियाँ सिंहासन पर आसीन हुईं, जिनमें दो ने ‘त्रिभुवन महादेवी’ की राजकीय उपाधि धारण की।
शांतिकरदेव द्वितीय (लगभग 850–865 ई.)
त्रिभुवन महादेवी प्रथम के पश्चात् उनके पौत्र शांतिकरदेव द्वितीय भौम-कर सिंहासन पर आसीन हुए। शुभकरदेव चतुर्थ के तालचेर ताम्रपत्र में उल्लेख है कि जब शांतिकरदेव द्वितीय शासन का दायित्व सँभालने योग्य हो गए, तब त्रिभुवन महादेवी प्रथम ने स्वेच्छा से राजसिंहासन उन्हें सौंप दिया। यद्यपि शांतिकरदेव द्वितीय का अब तक कोई स्वतंत्र अभिलेख प्राप्त नहीं हुआ है, तथापि उत्तरवर्ती अभिलेखों में उनका उल्लेख मिलता है। इन अभिलेखों के अनुसार वह लोणाभर (लवणाभर प्रथम) तथा गयाद द्वितीय नामों से भी प्रसिद्ध थे।
शांतिकरदेव द्वितीय की पत्नी हीरा महादेवी थीं। उनके पुत्र शुभकरदेव चतुर्थ के अभिलेखों में हीरा महादेवी को ‘महाराजाधिराज परमेश्वरी’ की उपाधि से विभूषित किया गया है। इस उपाधि के आधार पर इतिहासकारों का अनुमान है कि शांतिकरदेव द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् जब उनका पुत्र शुभकरदेव चतुर्थ अल्पवयस्क था, तब हीरा महादेवी ने कुछ समय तक संरक्षिका (राजप्रतिनिधि) के रूप में राज्य-प्रशासन का संचालन किया।
शुभकरदेव चतुर्थ (लगभग 865–882 ई.)
शांतिकरदेव द्वितीय के पश्चात् उनके ज्येष्ठ पुत्र शुभकरदेव चतुर्थ भौम-कर सिंहासन पर आसीन हुए, जिन्हें ‘कुसुमहर द्वितीय’ के नाम से भी जाना जाता है। उनके अभिलेखों से ज्ञात होता है कि वह बाल्यावस्था से ही अत्यंत प्रतिभाशाली और विद्वान् थे। कहा जाता है कि पूर्णतः युवा होने से पूर्व ही उन्होंने शास्त्रों में वर्णित स्तोत्रों और दार्शनिक सिद्धांतों के गूढ़ अर्थों का गहन अध्ययन कर लिया था।
समकालीन अभिलेखों में उनकी प्रशंसा एक ऐसे शासक के रूप में की गई है, जो उदारता, सौम्यता, राजसी आचरण तथा सत्यनिष्ठा जैसे महान मानवीय गुणों से युक्त था। वह विनम्र, धर्मपरायण तथा प्रजा के कल्याण के प्रति सजग रहते थे, किंतु वह एक प्रभावशाली और दृढ़ राजनीतिज्ञ सिद्ध नहीं हो सके।
शुभकरदेव चतुर्थ के शासनकाल में भौम-कर राज्य को सोमवंशी आक्रमणों का सामना करना पड़ा। सोमवंशी शासक जनमेजय प्रथम ने भौम साम्राज्य पर आक्रमण किया। भौमों के सामंत तथा खिंजली मंडल के शासक रणभंजदेव ने सोमवंशियों का प्रतिरोध करने का प्रयास किया, किंतु वह जनमेजय प्रथम की शक्ति का सामना नहीं कर सके। अंततः रणभंजदेव की पराजय और मृत्यु के बाद जनमेजय प्रथम ने खिंजली मंडल को सोमवंशी राज्य में मिला लिया। यह भौम-कर शक्ति के पतन का पहला स्पष्ट संकेत था।
इसके पश्चात् जनमेजय प्रथम ने अपनी पुत्री पृथ्वी महादेवी का विवाह शुभकरदेव चतुर्थ के साथ करके भौमों से वैवाहिक संबंध स्थापित किया। कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह भौमों की एक बड़ी राजनीतिक भूल थी, जिसने आगे चलकर सोमवंशियों को भौम-कर राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान किया और भौम सत्ता के पतन की गति को तेज हो गई।
इस प्रकार यद्यपि शुभकरदेव चतुर्थ अनेक श्रेष्ठ गुणों से युक्त थे, फिर भी वह एक दुर्बल शासक सिद्ध हुए। उनके शासनकाल में भौम साम्राज्य की शक्ति में गिरावट आरंभ हुई, जो कालांतर में उसके पतन का कारण बनी।
शिवकरदेव तृतीय (लगभग 882–890 ई.)
शुभकरदेव चतुर्थ की मृत्यु निःसंतान हुई। इसलिए उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके भाई शिवकरदेव तृतीय, जिसे ‘ललितहर’ भी कहा जाता था, भौम-कर सिंहासन पर आसीन हुए। उनके शासनकाल की किसी विशेष राजनीतिक अथवा सैन्य उपलब्धि का ज्ञान नहीं है।
शिवकरदेव तृतीय के अभिलेखों में उन्हें ‘परममहेश्वर’ तथा ‘परमभट्टारक’ कहा गया है, जिससे स्पष्ट होता है कि वह भगवान शिव के परम भक्त थे। दूसरी ओर, वह बौद्ध धर्म के भी संरक्षक थे। इसकी पुष्टि उनके तालचेर ताम्रपत्रों से होती है, जिनमें पूर्वराष्ट्र विषय के कामी गाँव तथा मध्यमखंड विषय के सुरधीपुर गाँव को ‘बुद्ध भट्टारक’ नामक एक बौद्ध देवालय के लिए दान दिए जाने का उल्लेख है। इस देवालय का निर्माण अंबुभट्टारक ने कराया था।
त्रिभुवन महादेवी द्वितीय (लगभग 890–896 ई.)
शिवकरदेव तृतीय के पश्चात् त्रिभुवन महादेवी द्वितीय, जिन्हें ‘पृथ्वी महादेवी’ के नाम से भी जाना जाता है, भौम-कर सिंहासन पर बैठीं। उन्होंने कलिंग के तोशल (तोषला) राज्य पर लगभग 890 ईस्वी से 896 ईस्वी तक शासन किया। उनका शासनकाल भौम-कर साम्राज्य के उत्तरकालीन इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण चरण माना जाता है, क्योंकि इस समय राज्य की राजनीति पर सोमवंशी राजवंश का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
त्रिभुवन महादेवी द्वितीय सोमवंशी शासक जनमेजय प्रथम की पुत्री थीं और उनका विवाह शुभकरदेव चतुर्थ (कुसुमहार द्वितीय) से हुआ था। शुभकरदेव चतुर्थ (865–882 ईस्वी) की कोई जीवित संतान नहीं थी। इसलिए उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके छोटे भाई शिवकरदेव तृतीय (882–890 ईस्वी) सिंहासन पर आसीन हुए। 890 ईस्वी में शिवकरदेव तृतीय की मृत्यु के उपरांत त्रिभुवन महादेवी द्वितीय ने तोशल के सिंहासन पर अधिकार कर लिया। इतिहासकारों के अनुसार उनके पिता जनमेजय प्रथम ने अपनी पुत्री को भौम-कर सिंहासन पर स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यही कारण है कि उन्होंने अपने ताम्रपत्रों और अभिलेखों में अपने पिता की अत्यधिक प्रशंसा की है। सोमवंशी राजा उद्योतकेसरी महाभवगुप्त के काल के ब्रह्मेश्वर शिलालेख के अनुसार जनमेजय ने अपने भाले (कुंत) से युद्ध में ओड्र देश के राजा का वध कर उसकी राजलक्ष्मी को अपने अधिकार में कर लिया था। इस विवरण के आधार पर भी अनुमान किया जाता है कि जनमेजय प्रथम ने ओड्र के राजा को पराजित कर भौम-कर राजनीति में हस्तक्षेप किया और पृथ्वी महादेवी को भौम-कर सिंहासन पर स्थापित किए, यद्यपि इसका कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

त्रिभुवन महादेवी द्वितीय का शासन प्रारंभ में उनके पिता के संरक्षण में संचालित हुआ। इसी समय कलचुरी शासक शंकरगण द्वितीय ‘मुग्धतुंग’ (890-910 ई.) ने दक्षिण कोसल पर आक्रमण किया और जनमेजय प्रथम कलचुरियों के विरुद्ध युद्ध में व्यस्त हो गए। इस स्थिति का लाभ उठाते हुए भौम-कर वंश के निष्ठावान अधिकारियों ने शिवकरदेव तृतीय की विधवा रानी के समर्थन से राजमहल में सत्ता परिवर्तन का षड्यंत्र रचा, जिसके परिणामस्वरूप त्रिभुवन महादेवी द्वितीय को सिंहासन से पदच्युत कर शिवकरदेव तृतीय की विधवा त्रिभुवन महादेवी तृतीय को भौम-कर सिंहासन पर बैठा दिया। इस समय तक जनमेजय प्रथम और कलचुरियों के बीच समझौता हो चुका था, किंतु जनमेजय ने तोशाली के प्रशासन में कोई हस्तक्षेप नहीं किया, क्योंकि त्रिभुवन महादेवी तृतीय ने संभवतः अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली थी। सिंहासन से पदच्युत होने के पश्चात् त्रिभुवन महादेवी द्वितीय (पृथ्वी महादेवी) अपने पिता जनमेजय प्रथम के राज्य दक्षिण कोसल लौट गईं और अपना शेष जीवन वहीं व्यतीत किया।
त्रिभुवन महादेवी तृतीय (लगभग 896–905 ई.)
त्रिभुवन महादेवी तृतीय ने भौम साम्राज्य की शासिका के रूप में ‘परमभट्टारिका’, ‘महाराजाधिराज’ तथा ‘परमेश्वरी’ जैसी उपाधियाँ धारण की। उनके अभिलेखों में उनकी उदारता, शिष्टाचार, सौम्यता, सौंदर्य तथा वीरता की अत्यधिक प्रशंसा की गई है।
वह वैष्णव धर्म की अनुयायी थी और भगवान विष्णु के प्रति उसकी गहरी आस्था थी। उनके ढेंकनाल ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि उन्होंने वर्षा कराने तथा अकाल मृत्यु जैसी आपदाओं को दूर करने के उद्देश्य से भट्ट जगधर नामक एक ज्योतिषी को कोन्तास्पर नामक गाँव दान में दिया था। त्रिभुवन महादेवी तृतीय ने लगभग नौ वर्षों तक शासन किया।
शांतिकरदेव तृतीय और शुभकरदेव पंचम (लगभग 905–910 ई.)
त्रिभुवन महादेवी तृतीय के पश्चात् शिवकरदेव तृतीय के पुत्र शांतिकरदेव तृतीय तथा उनके बाद शुभकरदेव पंचम क्रमशः भौम-कर सिंहासन पर आसीन हुए। इन दोनों शासकों के शासनकाल में भौम साम्राज्य में सामान्यतः शांति और स्थिरता बनी रही। यद्यपि इनके शासनकाल की कोई बड़ी सैन्य विजय अथवा राजनीतिक उपलब्धि ज्ञात नहीं है, तथापि उपलब्ध अभिलेखों से उनके शासन की सुव्यवस्था और समृद्धि का संकेत मिलता है।
शांतिकरदेव तृतीय के संबंध में धर्म महादेवी के अंगुल ताम्रपत्र में कहा गया है कि ‘उन्होंने अपने सभी शत्रुओं का विनाश कर निर्भय होकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया।’ इसी प्रकार दंडी महादेवी के कुमुरंग ताम्रपत्र में शुभकरदेव पंचम को ‘हर प्रकार की समृद्धि का एकमात्र भंडार’ बताया गया है।’
भौम-कर राजवंश का अवसान (लगभग 910–950 ई.)
शुभकरदेव पंचम भौम-कर वंश के अंतिम पुरुष शासक थे। उनकी मृत्यु के पश्चात् भौम-कर राजवंश के इतिहास का अंतिम चरण आरंभ हुआ। इस काल में चार महिला शासिकाएँ क्रमशः भौम-कर सिंहासन पर आसीन हुईं। यद्यपि उन्होंने राज्य को सुदृढ़ बनाए रखने का प्रयास किया, किंतु अंततः सोमवंशियों ने भौम राज्य पर अधिकार कर लिया और भौम-कर सत्ता का पतन हो गया।
गौरी महादेवी
शुभकरदेव पंचम की रानी गौरी महादेवी के शासनकाल का कोई स्वतंत्र अभिलेख उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण उनकी राजनीतिक उपलब्धियों के संबंध में अधिक जानकारी नहीं है। फिर भी, उपलब्ध स्रोतों से ज्ञात होता है कि उन्होंने राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने का सफल प्रयास किया। दंडी महादेवी के कुमुरंग ताम्रपत्र में उनकी प्रशंसा करते हुए कहा गया है कि ‘उनके कमल के समान चरणों में समस्त प्रजा नतमस्तक थी।’ यह कथन उसकी लोकप्रियता तथा प्रजा की उसके प्रति निष्ठा का परिचायक है।

दंडी महादेवी
गौरी महादेवी के पश्चात् उनकी पुत्री दंडी महादेवी सिंहासन पर बैठीं। वह भौम-कर वंश की अंतिम शक्तिशाली शासिकाओं में से एक थी। उनके अनेक ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं, जिनमें कुमुरंग, सन्तरीगाँव, अरुआल, अंबागाँव तथा गंजाम के दो ताम्रपत्र विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन ताम्रपत्रों से ज्ञात होता है कि उन्होंने अनेक गाँवों का दान दिया तथा धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं को संरक्षण प्रदान किया।
दंडी महादेवी केवल रूपवती और आकर्षक व्यक्तित्व की धनी ही नहीं थी, बल्कि एक सक्षम और दृढ़ शासिका भी थी। उन्होंने संपूर्ण भौम साम्राज्य पर अपना अधिकार बनाए रखा तथा अपने राज्य की सीमाओं की रक्षा की। अभिलेखों के अनुसार उन्होंने अपने पराक्रम से उन शक्तिशाली और शत्रुतापूर्ण राजाओं को भी पराजित किया, जो उसके राज्य के लिए चुनौती बने हुए थे। उन्होंने ‘परममाहेश्वरी’, ‘परमभट्टारिका’ तथा ‘महाराजाधिराज परमेश्वरी’ जैसी उपाधियाँ धारण कीं, जिससे स्पष्ट है कि वह एक स्वतंत्र और शक्तिशाली शासिका थी। उनके द्वारा उत्तर तथा दक्षिण तोशाली में किए गए भूमिदान एवं ग्रामदान इस बात के प्रमाण हैं कि उस समय तक इन क्षेत्रों पर भौमकरों का अधिकार बना हुआ था। उनके अभिलेखों में मोतियों, रत्नों तथा अन्य बहुमूल्य वस्तुओं का वर्णन मिलता है, जिससे अनुमान किया जाता है कि उनके शासनकाल में भौम राज्य आर्थिक रूप से समृद्ध था।
वकुल महादेवी
दंडी महादेवी की मृत्यु प्रसव के दौरान हो गई। उसके पश्चात् उनकी सौतेली माता वकुल महादेवी ने सिंहासन सँभाला, जो भंज राजवंश से संबंधित थीं। उनके शासनकाल के विषय में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। केवल इतना ज्ञात है कि उन्होंने उत्तरी तोशाली में एक गाँव दान में दिया था। वकुल महादेवी के शासनकाल में भंज भौम-कर राज्य के आंतरिक प्रशासन में प्रभावी भूमिका निभाने लगे थे।

धर्म महादेवी
वकुल महादेवी के पश्चात् धर्म महादेवी, जो शांतिकरदेव तृतीय की पत्नी थीं, भौम-कर राजवंश की अंतिम ज्ञात शासिका थीं। उनके दो ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं—एक अंगुल ताम्रपत्र और दूसरा तालताली ताम्रपत्र। तालताली ताम्रपत्र में उन्हें ‘परमभट्टारिका महाराजाधिराज परमेश्वरी’ कहा गया है।
धर्म महादेवी भी भंज राजवंश की राजकुमारी थीं, इसलिए उनके शासनकाल में भंजों का भौम राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप पूर्णतः स्पष्ट हो गया। उनका शासनकाल विशेष प्रभावशाली नहीं था और इसी अवधि में भौम साम्राज्य के पतन का मार्ग प्रशस्त हुआ।
इसी समय सोमवंशी शासक ययाति प्रथम ने पहले भंजों को बौध–सोनपुर क्षेत्र से पराजित कर बाहर कर दिया और संभवतः भौम-कर राजवंश की अंतिम शासिका धर्म महादेवी की हत्या कर भौम साम्राज्य पर अधिकार कर लिया। एक ताम्रपत्र में उनके द्वारा दक्षिण तोशाली के मरद विषय में स्थित चंद्रगाँव नामक गाँव के दान का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार भौम-कर राजवंश के अंत के साथ सोमवंशियों का उदय हुआ।
लगभग दो शताब्दियों तक उड़ीसा की राजनीति, संस्कृति और धर्म को दिशा देने वाला भौम-कर राजवंश इतिहास का हिस्सा बन गया, फिर भी उसकी प्रशासनिक व्यवस्था, धार्मिक सहिष्णुता तथा महिला शासन की परंपरा भारतीय इतिहास में सदैव स्मरणीय है।
भौम-कर साम्राज्य का विस्तार
अपने चरमोत्कर्ष काल में भौम-कर साम्राज्य मुख्यतः वर्तमान उड़ीसा के अधिकांश भाग तक विस्तृत था। इसकी उत्तरी सीमा गंगा के तटीय क्षेत्रों के समीप, अर्थात वर्तमान पश्चिम बंगाल के दक्षिणी भाग (विशेषतः मिदनापुर क्षेत्र) तक मानी जाती है, जबकि दक्षिण में इसका विस्तार उत्तरी कलिंग से लेकर गंजाम क्षेत्र तक था। पूर्व दिशा में इसकी प्राकृतिक सीमा बंगाल की खाड़ी थी, जो इसके समुद्री व्यापार और संपर्क का प्रमुख माध्यम भी थी। पश्चिमी सीमा वर्तमान अंगुल, ढेंकानाल तथा सोनपुर के कुछ क्षेत्रों तक फैली हुई थी।
राजनीतिक संबंध
भौम-कर शासकों के राजनीतिक संबंध उनके समय के प्रमुख राजवंशों—पाल, राष्ट्रकूट, पश्चिमी गंग, भंज तथा सोमवंशी—के साथ संघर्ष और सहयोग दोनों प्रकार के रहे। उन्होंने अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता और क्षेत्रीय प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए इन शक्तिशाली राजवंशों से समय-समय पर युद्ध किए। साथ ही, कूटनीतिक संतुलन और राजनीतिक स्थिरता स्थापित करने के उद्देश्य से वैवाहिक संबंधों का भी सहारा लिया गया। विशेष रूप से पश्चिमी गंग और सोमवंशी राजवंशों के साथ वैवाहिक संबंधों ने भौम-कर राज्य की राजनीतिक स्थिति को सुदृढ़ किया। इन संबंधों ने न केवल बाहरी आक्रमणों का सामना करने में सहायता की, बल्कि आंतरिक स्थिरता बनाए रखने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भौमकरों की प्रशासनिक व्यवस्था
केंद्रीय शासन
भौम-कर शासकों ने उड़ीसा में एक सुदृढ़, सुव्यवस्थित और स्थिर शासन-व्यवस्था की स्थापना की। उनके शासनकाल में राज्य की प्रशासनिक संरचना सुविकसित थी तथा शासन का स्वरूप स्पष्ट रूप से राजतांत्रिक था। राज्य में राजा शासन का सर्वोच्च अधिकारी होता था। वह प्रशासन, न्याय, सैन्य व्यवस्था, कर-संग्रह तथा विदेश नीति का प्रमुख नियंत्रक था। भौम-कर शासक ‘परमभट्टारक’, ‘महाराजाधिराज’,‘परमेश्वर’ और परम-माहेश्वर जैसी सार्वभौम उपाधियाँ धारण करते थे, जिनसे उनकी सर्वोच्च सत्ता तथा स्वतंत्र राजनीतिक स्थिति का बोध होता है। महिला शासिकाओं ने भी इन उपाधिययों को धरण किया, जिससे स्पष्ट होता है कि उन्हें पुरुष शासकों के समान राजनीतिक और प्रशासनिक अधिकार प्राप्त थे। राजा को धर्म का संरक्षक माना जाता था, किंतु उसका शासन किसी एक धर्म तक सीमित नहीं था। इतिहासकार हरमन कुल्के ने भौम-कर प्रशासन को ‘प्रारंभिक मध्यकालीन उड़ीसा के राज्य-निर्माण की सबसे संगठित व्यवस्था’ कहा है।
भौम-कर राजवंश में सामान्यतः उत्तराधिकार का सिद्धांत ज्येष्ठाधिकार पर आधारित था, अर्थात् राजा का ज्येष्ठ पुत्र ही सिंहासन का उत्तराधिकारी होता था। फिर भी, इस परंपरा के कुछ अपवाद भी मिलते हैं, विशेषकर उस समय जब भौम-कर राजवंश की अनेक रानियों ने स्वयं राज्य की बागडोर सँभाली और सफलतापूर्वक शासन किया।
मंत्रिपरिषद्
भौम-कर शासकों को शासन-कार्य के संचालन में सहयोग करने के लिए मंत्रियों की एक परिषद् होती थी, जिनमें महासंधिविग्रहक, महादंडनायक, महाप्रतिहार, महाक्षपटलिक महासामंत प्रमुख थे। महासंधिविग्रहक कूटनीति और विदेश नीति का प्रमुख अधिकारी था, महादंडनायक सेना और न्याय व्यवस्था का संचालन करता था, महाप्रतिहार राजमहल की सुरक्षा का उत्तरदायी था, महाक्षपटलिक राजकीय अभिलेखों और दस्तावेजों का संरक्षक था तथा महासामंत अधीनस्थ सामंतों का प्रमुख अधिकारी था। इन अधिकारियों की नियुक्ति राजा द्वारा की जाती थी और अपने-अपने विभागों के माध्यम से शासन संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
प्रशासनिक अधिकारी
भौम-कर शासकों को शासन-कार्य के संचालन में सहयोग करने के लिए अनेक उच्चाधिकारी नियुक्त किए जाते थे, जिनमें महाराज, रणक, राजपुत्र तथा अंतरंग प्रमुख थे। इन अधिकारियों के कार्यों का स्पष्ट विवरण उपलब्ध नहीं है, किंतु उनके पदनामों से अनुमान लगाया जाता है कि वे प्रशासन, राजस्व, सैन्य व्यवस्था, न्याय, कूटनीति तथा अभिलेख-लेखन जैसे विभिन्न विभागों का संचालन करते थे। इनके अतिरिक्त, कुमारामात्य, उपरिक, विषयपति, आयुक्तक, दंडपाशिक, स्थानांतरिक, वल्लभ, चाट, भाट, प्रतिहार, कुटकोल तथा दूतक जैसे अधिकारी और कर्मचारी भी प्रशासन के महत्त्वपूर्ण अंग थे।
प्रशासनिक इकाइयाँ
भौम-कर साम्राज्य को प्रशासनिक सुविधा के लिए विभिन्न इकाइयों में विभाजित किया गया था। सबसे बड़ी इकाई मंडल थी, जिसका प्रशासन किसी राजकीय अधिकारी या सामंत के अधीन होता था। प्रत्येक मंडल के अंतर्गत कई विषय (जिले) होते थे, जिनका प्रमुख विषयपति होता था। विषयपति राजस्व संग्रह, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यों का संचालन करता था। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम (गाँव) थी, जहाँ ग्रामप्रधान और स्थानीय पंचायत मिलकर शासन का कार्य देखते थे। अधिकांश स्थानीय कार्य, जैसे कृषि, सिंचाई, भूमि मापन, कर संग्रह और छोटे विवादों का निपटारा ग्राम स्तर पर ही किया जाता था। इससे स्पष्ट होता है कि भौम-कर प्रशासन में स्थानीय स्वशासन को पर्याप्त महत्त्व दिया गया था।
सामंत व्यवस्था
भौम-कर शासन में सामन्तीय प्रणाली अत्यंत विकसित थी, जो काफी हद तक गुप्त शासकों के समान थी। उनके अपने अधीनस्थ सामंतों के साथ सामान्यतः मैत्रीपूर्ण और सहयोगपूर्ण संबंध थे। भौम-कर शासक सामान्यतः विजित राज्यों का प्रत्यक्ष विलय करने के स्थान पर उन्हें सामंत राज्यों के रूप में बनाए रखते थे। सामंतों का दायित्व राजा को सैन्य सहायता देना, कर और उपहार अर्पित करना, राजकीय आदेशों का पालन करना तथा अपने क्षेत्रों की सुरक्षा करना था। यदि कोई सामंत विद्रोह करता था, तो उसके विरुद्ध सैन्य कार्रवाई कर नियंत्रण स्थापित किया जाता था। सुल्की, भंज तथा नंदोद्भव राजवंश भौमकरों के प्रमुख सामंत थे।
न्याय व्यवस्था
न्याय व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी राजा स्वयं था। उसके अधीन विभिन्न स्तरों पर न्यायालय कार्य करते थे। धर्मशास्त्र, स्थानीय परंपराएँ और राजाज्ञा न्याय के प्रमुख आधार थे। ग्राम स्तर पर पंचायतें छोटे विवादों का निपटारा करती थीं, जबकि गंभीर मामलों का निर्णय उच्च अधिकारियों द्वारा किया जाता था।
राजस्व व्यवस्था
राज्य की आर्थिक व्यवस्था का मुख्य आधार कृषि से प्राप्त राजस्व था। आय के प्रमुख स्रोत भूमि कर, व्यापार कर, बंदरगाह शुल्क, वन कर, पशु कर, खनिज कर तथा सामंतों से प्राप्त कर एवं उपहार थे। इनमें भूमि कर सबसे महत्त्वपूर्ण था, जो कृषि उत्पादन के एक भाग के रूप में लिया जाता था। व्यापार और समुद्री गतिविधियों से प्राप्त आय भी राजकोष को सुदृढ़ बनाती थी।
भूमि दान की परंपरा
भौम-कर काल में भूमि-अनुदान व्यवस्था आर्थिक प्रशासन का प्रमुख आधार थी। राजकीय अधिकारियों को अनेक अवसरों पर नकद वेतन के स्थान पर कर-मुक्त अथवा राजस्वाधिकार सहित भूमि प्रदान की जाती थी। इसी प्रकार ब्राह्मणों, बौद्ध विहारों, मंदिरों तथा अन्य संस्थानों को भी भूमि दान दिए जाते थे। दानग्रहीताओं को भूमि से प्राप्त कर एवं राजस्व वसूलने का अधिकार प्राप्त था। इसकी पुष्टि जाजपुर, ढेंकानाल और अंगुल से प्राप्त ताम्रपत्रों से होती है। भूमि दान की व्यवस्था ने प्रशासन को सुगम बनाया, किंतु साथ ही सामंतवादी प्रवृत्तियों के विकास को भी प्रोत्साहन दिया।
भौम-कर काल की अर्थव्यवस्था
कृषि एवं पशुपालन
भौम-कर काल में उड़ीसा की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि थी, जबकि उद्योग, शिल्प और व्यापार भी पर्याप्त रूप से विकसित थे। अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर थी और धान प्रमुख फसल के रूप में उगाया जाता था। इसके अतिरिक्त तिल, गन्ना, नारियल, सुपारी, कपास तथा विभिन्न प्रकार की दालों का भी व्यापक उत्पादन होता था। नदियों, तालाबों और अन्य जलस्रोतों पर आधारित सिंचाई व्यवस्था के कारण कृषि उत्पादन स्थिर एवं पर्याप्त बना रहता था। भूमि-कर राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था। भौम शासकों ने अपेक्षाकृत संतुलित कर-व्यवस्था अपनाई, जिससे कृषकों पर अत्यधिक आर्थिक बोझ नहीं पड़ता था और कृषि उत्पादन में निरंतर वृद्धि होती रही। कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग था। गाय, भैंस, हाथी और घोड़ों का पालन व्यापक स्तर पर किया जाता था। हाथियों का उपयोग युद्ध तथा राजकीय कार्यों में, जबकि घोड़ों का प्रयोग सेना, संचार और परिवहन के लिए किया जाता था।
शिल्प एवं उद्योग
भौम-कर काल में शिल्प एवं उद्योगों का उल्लेखनीय विकास हुआ, जिसने उड़ीसा की आर्थिक और सांस्कृतिक समृद्धि को सुदृढ़ आधार प्रदान किया। वस्त्र निर्माण, धातु-शिल्प, कांस्य प्रतिमा-निर्माण, पत्थर की मूर्तिकला, बढ़ईगिरी, हाथीदाँत की कलाकृतियाँ, आभूषण निर्माण तथा सुगंधित पदार्थों का उत्पादन इस काल के प्रमुख उद्योग थे। धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को राजकीय संरक्षण मिलने से मूर्तिकला और धातुकला को विशेष प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। ताम्रपत्रों, कांस्य प्रतिमाओं तथा अन्य धातु-निर्मित अवशेषों से स्पष्ट होता है कि धातु-विज्ञान अत्यंत विकसित अवस्था में था। ताँबे और कांस्य पर उत्कृष्ट उत्कीर्णन, अभिलेख-लेखन तथा प्रतिमा-निर्माण उस समय के शिल्पियों की उच्च तकनीकी दक्षता और कलात्मक परिपक्वता के परिचायक हैं। रत्नागिरि और ललितगिरि से प्राप्त कांस्य बुद्ध प्रतिमाएँ इस युग की उत्कृष्ट शिल्पकला का श्रेष्ठ प्रमाण हैं।
व्यापार-वाणिज्य एवं समुद्री संपर्क
भौम-कर काल में उड़ीसा का आंतरिक तथा समुद्री व्यापार अत्यंत विकसित था। अभिलेखीय, साहित्यिक तथा विदेशी स्रोतों से ज्ञात होता है कि उस समय उड़ीसा पूर्वी भारत का एक प्रमुख समुद्री व्यापारिक केंद्र था। इसके व्यापारिक संबंध श्रीलंका, म्यांमार, जावा, सुमात्रा, बाली तथा चीन जैसे देशों से स्थापित थे। समुद्री मार्गों के माध्यम से वस्त्र, हाथीदाँत की कलाकृतियाँ, धातु-निर्मित वस्तुएँ, मसाले, रत्न तथा अन्य उत्पादों का निर्यात किया जाता था, जबकि रेशम, चीनी मिट्टी के पात्र तथा अन्य विलासिता की वस्तुओं का आयात होता था। पालुर जैसे तटीय बंदरगाह इस समुद्री व्यापार के प्रमुख केंद्र थे और इनके माध्यम से व्यापारिक गतिविधियों का व्यापक विस्तार हुआ। इससे राज्य की आर्थिक समृद्धि में वृद्धि हुई तथा भारतीय संस्कृति और बौद्ध धर्म के दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रसार को भी प्रोत्साहन मिला। पुरातात्त्विक उत्खननों से प्राप्त विदेशी चीनी मिट्टी के पात्र और अन्य अवशेष इस अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संपर्क की पुष्टि करते हैं।
भौम-करकालीन धर्म
बौद्ध धर्म का विकास
भौमकरों के उदय से पूर्व उड़ीसा में हीनयान और महायान दोनों शाखाएँ प्रचलित थीं। भौम शासन के प्रारंभिक चरण में बौद्ध परंपरा, विशेषकर महायान तथा वज्रयान (तांत्रिक) बौद्ध धर्म का विशेष विकास हुआ। भौम-कर वंश के प्रारंभिक शासक क्षेमंकरदेव, शिवकरदेव प्रथम तथा शुभकरदेव प्रथम क्रमशः परमोपासक, परमतथागत तथा परमसौगत जैसी उपाधियाँ धारण करते थे, जो उनके बौद्ध धर्म के प्रति गहरे अनुराग का सूचक है। धौली अभिलेख से ज्ञात होता है कि भौम संवत् 93 (लगभग 829 ई.) में शांतिकरदेव प्रथम के शासनकाल में भीमट तथा भट्ट लोयमक ने अर्घ्यक वराटिका विहार का निर्माण कराया। त्रिभुवन महादेवी द्वितीय के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि शुभकरदेव प्रथम ने विशाल पाषाण-विहारों का निर्माण कराया था। इन साक्ष्यों से स्पष्ट है कि भौम शासकों ने बौद्ध संस्थाओं को निरंतर संरक्षण प्रदान किया। शिवकरदेव तृतीय, यद्यपि परममहेश्वर थे, फिर भी उन्होंने जयश्रम-विहार स्थित एक बौद्ध विहार को दो गाँव दानस्वरूप प्रदान किए। इससे स्पष्ट होता है कि भौम शासकों ने व्यक्तिगत धार्मिक आस्था से ऊपर उठकर सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान का व्यवहार किया।
भौम-कर शासनकाल में रत्नागिरि, ललितगिरि और उदयगिरि जैसे बौद्ध केन्द्रों का तीव्र विकास हुआ, जो आगे चलकर “पुष्पगिरि परंपरा” का हिस्सा माने जाते हैं, केवल धार्मिक साधना के केंद्र नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा, दर्शन, तर्कशास्त्र और तांत्रिक साधना के प्रमुख संस्थान भी थे। इन तीनों स्थलों को सामूहिक रूप से ‘डायमंड ट्रायंगल’ के नाम से जाना जाता है। इन स्थलों से प्राप्त बुद्ध, बोधिसत्त्व, तारा, मंजुश्री तथा अन्य वज्रयान देवताओं की असंख्य बौद्ध प्रतिमाएँ, विशाल स्तूप, अनेक विहार तथा अन्य पुरावशेषों से स्पष्ट होता है कि यहाँ महायान से वज्रयान बौद्ध धर्म की ओर एक क्रमिक परिवर्तन हुआ, जिसमें तांत्रिक बौद्ध परंपराओं का प्रभाव बढ़ता गया उड़ीसा क्षेत्र से प्राप्त मूर्तियाँ, विशेषकर तारा, अवलोकितेश्वर, वज्रपाणि और अन्य बोधिसत्त्व प्रतिमाएँ इसकी पुष्टि करती हैं कि वज्रयान और कालचक्रयान परंपराएँ यहाँ अत्यंत सक्रिय थीं।

परंपरागत स्रोतों के अनुसार शुभकरदेव प्रथम के शासनकाल में ओड्र क्षेत्र के बौद्ध संपर्क तांग साम्राज्य (चीन) से स्थापित थे। अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार लगभग 795 ईस्वी में ओड्र (उत्कल) के शासक द्वारा तांग सम्राट के दरबार में अवतंसक सूत्र तथा गंडव्यूह सूत्र के अंतिम भाग की एक हस्तलिखित पांडुलिपि भेजी गई यह घटना भारत और चीन के मध्य बौद्ध सांस्कृतिक तथा बौद्धिक संबंधों की सुदृढ़ता का महत्त्वपूर्ण प्रमाण मानी जाती है। इसी काल में बौद्ध भिक्षु प्रज्ञा को चीन भेजा गया, जहाँ उन्होंने अन्य विद्वानों के सहयोग से संस्कृत गंडव्यूह सूत्र का चीनी भाषा में अनुवाद किया। इस प्रकार भौम-कर शासकों के संरक्षण में भारत और चीन के मध्य बौद्ध धर्म तथा ज्ञान-परंपरा का उल्लेखनीय आदान-प्रदान हुआ।
ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान
भौम-कर शासकों की सबसे उल्लेखनीय विशेषता उनकी धार्मिक सहिष्णुता तथा समन्वयवादी नीति थी। यद्यपि इस वंश के प्रारंभिक शासक मुख्यतः बौद्ध धर्म के अनुयायी थे, तथापि उन्होंने अन्य धार्मिक परंपराओं को भी समान संरक्षण प्रदान किया। उन्होंने बौद्ध विहारों के साथ-साथ ब्राह्मणों को उदारतापूर्वक भूमिदान (अग्रहार) दिए तथा मंदिरों, मठों और विहारों के निर्माण एवं उनके अनुरक्षण को प्रोत्साहित किया। शुभकरदेव प्रथम स्वयं बौद्ध धर्म के अनुयायी थे, जबकि उनकी रानी माधवदेवी शैव मत की अनुयायी थीं। माधवदेवी ने विरजा में माधवेश्वर शिव मंदिर का निर्माण कराया, उसके निर्वाह के लिए भूमि का दान दिया तथा एक शैवाचार्य की नियुक्ति की। इसी प्रकार शुभकरदेव तृतीय ने पुलिंदेश्वर शिव मंदिर के पोषणार्थ नड्डिलो ग्राम का दान प्रदान किया। त्रिभुवन महादेवी प्रथम के ढेंकनाल ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि शिवकरदेव प्रथम तथा शांतिकरदेव प्रथम ने धर्मार्थ कार्यों पर उदारतापूर्वक व्यय किया तथा अनेक मठों, मंदिरों और विहारों का निर्माण एवं अनुरक्षण कराया। भुवनेश्वर के शिशिरेश्वर, मार्कंडेश्वर तथा तालेश्वर मंदिर उनके धार्मिक संरक्षण के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इसके अतिरिक्त, भौम-कर ताम्रपत्रों की अधिकांश राजमुद्राओं पर अंकित नंदी (आसनस्थ वृषभ) की आकृति शैव धर्म के प्रति उनके संरक्षण का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।
भौम-कर शासन के उत्तरार्ध में धार्मिक स्वरूप में उल्लेखनीय परिवर्तन परिलक्षित होता है। विशेषकर महिला शासिकाओं के शासनकाल में हिंदू धर्म की शैव, वैष्णव तथा शाक्त परंपराओं को अधिक संरक्षण प्राप्त हुआ। त्रिभुवन महादेवी प्रथम ने ‘परमवैष्णवी’ की उपाधि धारण की, जबकि शांतिकरदेव द्वितीय, शुभकरदेव चतुर्थ तथा पृथ्वी महादेवी भी वैष्णव धर्म के अनुयायी थे। भौमकरों के अधीनस्थ भंज तथा नंदोद्भव वंश के सामंत भी वैष्णव धर्म के प्रमुख समर्थक थे। इसी काल में मंदिर निर्माण की परंपरा का तीव्र विकास हुआ तथा राजधानी गुहदेवपाटक (आधुनिक जाजपुर क्षेत्र) और भुवनेश्वर में अनेक धार्मिक संरचनाओं का निर्माण हुआ।
शाक्त एवं तांत्रिक परंपरा
भौम-कर शासकों के शासनकाल में उड़ीसा में शाक्त धर्म तथा तांत्रिक साधना का उल्लेखनीय विकास हुआ। उनकी राजधानी गुहदेवपाटक (विरजा/आधुनिक जाजपुर) शाक्त उपासना का एक प्रमुख केंद्र था। विशेष रूप से जाजपुर का विरजा मंदिर देवी-उपासना और शक्ति-साधना का महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थल था। त्रिभुवन महादेवी प्रथम ने अपने ढेंकनाल ताम्रपत्र में राज्यारोहण के अवसर पर अपनी तुलना देवी कात्यायनी से की है, जो उनकी शक्ति, साहस तथा राजकीय अधिकार का प्रतीक है। भौम-कर काल में भुवनेश्वर स्थित प्रसिद्ध वैताल देउल शाक्त स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। खाखरा शैली में निर्मित यह मंदिर देवी चामुंडा को समर्पित है। इसी प्रकार मोहिनी तथा उत्तरेश्वर मंदिरों से प्राप्त चामुंडा की प्रतिमाएँ भी तत्कालीन शाक्त उपासना तथा भौम-कर शासकों के संरक्षण का महत्त्वपूर्ण प्रमाण हैं। वैताल देउल की स्थापत्य योजना, मूर्तिकला तथा चामुंडा की उग्र प्रतिमाएँ इस काल में तांत्रिक साधना के उत्कर्ष के द्योतक हैं।

भौम-कर काल धार्मिक दृष्टि से संक्रमण, समन्वय तथा सांस्कृतिक बहुलता का युग था। इस काल में महायान एवं वज्रयान बौद्ध धर्म तथा शाक्त तांत्रिक परंपराओं के मध्य पारस्परिक प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है, जिसके प्रमाण समकालीन मूर्तिकला, प्रतिमा-विज्ञान तथा धार्मिक प्रतीकों में मिलते हैं। इस प्रकार भौम-कर शासकों ने बौद्ध, शैव, वैष्णव तथा शाक्त चारों प्रमुख धार्मिक परंपराओं को संरक्षण प्रदान कर धार्मिक सहिष्णुता और समन्वय की ऐसी परंपरा विकसित की, जिससे एक बहुधार्मिक और समन्वित सांस्कृतिक संरचना का विकास हुआ।
भौम-कर कालीन समाज
वर्णाश्रम व्यवस्था एवं सामाजिक संरचना
प्राचीन तथा प्रारंभिक मध्यकालीन उड़ीसा का समाज निरंतर परिवर्तनशील था। यद्यपि भौम-कर शासक स्वयं बौद्ध धर्म के अनुयायी थे, तथापि उन्होंने ब्राह्मणीय सामाजिक एवं धार्मिक व्यवस्था को स्वीकार किया और समाज में वर्णाश्रम व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने का प्रयास किया। इस व्यवस्था के अंतर्गत समाज को चार वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र में विभाजित किया गया था। शुभकरदेव द्वितीय के नयालपुर (नेउलपुर) ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि क्षेमंकरदेव ने वर्णों को उनके निर्धारित स्थानों पर प्रतिष्ठित किया। इसी प्रकार शुभकरदेव द्वितीय के तेरुंडिया ताम्रपत्र में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने शास्त्रों के अनुसार वर्णाश्रम व्यवस्था को सुव्यवस्थित किया। इस व्यवस्था को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से भौम-कर शासकों ने ब्राह्मणों को विशेष संरक्षण प्रदान किया तथा उन्हें भूमिदान एवं अग्रहार प्रदान कर सामाजिक और धार्मिक जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया।
भौमकालीन समाज बहुवर्णीय तथा बहुजातीय था। वर्ण-व्यवस्था के अतिरिक्त समाज अनेक जातियों एवं उपजातियों में विभाजित था, जिनके बीच पारस्परिक सहयोग एवं सामाजिक समन्वय के कारण समाज में सामान्यतः शांति एवं स्थिरता बनी रही। वर्ण-व्यवस्था में ब्राह्मणों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था, जो ज्ञान, विद्वता, धार्मिक आस्था तथा सदाचार के कारण अत्यंत सम्मानित थे। भौम अभिलेखों से ज्ञात होता है कि मध्यदेश तथा बंगाल से भारद्वाज, कौशिक, विश्वामित्र, शांडिल्य, काश्यप तथा आत्रेय आदि गोत्रों के ब्राह्मणों को उड़ीसा में बसने के लिए प्रोत्साहित किया गया तथा उन्हें अग्रहार ग्राम प्रदान किए गए। ब्राह्मण केवल धार्मिक कार्यों तक सीमित नहीं थे, बल्कि शिक्षा के प्रसार, अग्रहारों की स्थापना, जलाशयों के निर्माण तथा सामाजिक कल्याण के अन्य कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाते थे।
क्षत्रिय समाज का दूसरा प्रमुख वर्ण था, जिसमें राजा, राजपरिवार के सदस्य, सामंत, सेनापति, सैनिक तथा उच्च प्रशासनिक अधिकारी सम्मिलित थे। उनका प्रमुख दायित्व राज्य की सुरक्षा, प्रशासन का संचालन तथा प्रजा के हितों की रक्षा करना था। समाज का तीसरा प्रमुख वर्ण वैश्य था, जिसका मुख्य व्यवसाय कृषि, पशुपालन, व्यापार तथा वाणिज्य था। उड़ीसा की आर्थिक समृद्धि में वैश्य समुदाय की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी, जो स्थानीय हाटों एवं बाजारों का संचालन करने के साथ-साथ स्थल और समुद्री दोनों मार्गों से व्यापार करते थे। उड़ीसा के व्यापारियों के संबंध सिंहल (श्रीलंका), स्याम (थाईलैंड), बर्मा (म्यांमार) तथा सुवर्णद्वीप सहित दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक क्षेत्रों से थे, जिससे राज्य की आर्थिक समृद्धि बढ़ी तथा उड़ीसा की संस्कृति का विदेशों में भी प्रसार हुआ। भौम-कर शासकों ने वैश्य समुदाय के विकास के लिए विशेष ग्राम प्रदान किए, जिन्हें ‘वैश्य अग्रहार’ कहा जाता था।
वर्ण-व्यवस्था में शूद्र चौथा वर्ण था, जिसमें कारीगर, शिल्पकार, छोटे कृषक, सेवक तथा अन्य श्रमिक समुदाय सम्मिलित थे। मंदिरों के निर्माण, रख-रखाव तथा धार्मिक अनुष्ठानों में भी शूद्र समुदाय की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। समाज में कुछ शूद्र जातियों को अस्पृश्य माना जाता था, फिर भी वे आर्थिक एवं सामाजिक जीवन के अनिवार्य अंग थे। इनमें रजक (धोबी), कैवर्त (मछुआरा), चर्मकार (मोची) तथा डोम (टोकरी बनाने वाला) प्रमुख थे। इनके अतिरिक्त सौंडिक (मद्य निर्माता), तंतुवाय (बुनकर), कुंभकार (कुम्हार), मालाकार (माली), नापित (नाई), ताम्रकार तथा कमार (लोहार) जैसी अनेक व्यवसायिक जातियाँ भी समाज का अभिन्न अंग थीं, जिनके श्रम पर तत्कालीन अर्थव्यवस्था आधारित थी।
महिलाओं की स्थिति
भौम-कर काल में महिलाओं की सामाजिक स्थिति अपेक्षाकृत सम्मानजनक थी। यद्यपि वे सामान्यतः परिवार पर आश्रित रहती थीं, फिर भी उन्हें समाज में प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त था। इस काल की सबसे विशिष्ट विशेषता थी कि अनेक रानियों ने संप्रभु शासिका के रूप में राज्य का संचालन किया। त्रिभुवन महादेवी प्रथम ने अपने पुत्र की मृत्यु के पश्चात् स्वतंत्र शासिका के रूप में शासन किया, जबकि त्रिभुवन महादेवी द्वितीय ने अपने पति की मृत्यु के बाद शासन सँभाला। भौम-कर वंश में कुल छह महिला शासिकाएँ हुईं, जिनमें पाँच विधवा रानियाँ तथा एक राजा की पुत्री थीं। भारतीय इतिहास में महिलाओं द्वारा इतने व्यापक स्तर पर स्वतंत्र शासन का उदाहरण अत्यंत दुर्लभ है।

उच्चवर्गीय एवं संपन्न परिवारों की महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ संगीत और नृत्य का भी प्रशिक्षण दिया जाता था। भौम-कर रानियाँ विभिन्न धार्मिक संप्रदायों की अनुयायी थीं तथा उन्होंने मंदिर-निर्माण, भूमि-दान और देव-पूजा की व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। समकालीन साहित्य से ज्ञात होता है कि समाज में सामान्यतः एकपत्नी प्रथा प्रचलित थी, यद्यपि राजपरिवारों तथा उच्च वर्गों में बहुविवाह के उदाहरण भी मिलते हैं। इस काल में सती तथा पर्दा प्रथा का व्यापक प्रचलन नहीं था, जिससे महिलाओं की अपेक्षाकृत स्वतंत्र एवं सम्मानजनक सामाजिक स्थिति का संकेत मिलता है।
वेशभूषा एवं आभूषण
भौमकालीन महिलाओं को केश-सज्जा, सौन्दर्य-प्रसाधनों, सुगंधित द्रव्यों तथा आभूषणों का विशेष शौक था। समकालीन मूर्तियों से ज्ञात होता है कि वे कुंडल, कर्णफूल, रत्नहार, चंद्रहार, मेखला, केयूर, कंकण तथा मंजीरा जैसे विविध आभूषण धारण करती थीं। विशेष रूप से रानियाँ स्वर्ण एवं रजत से निर्मित, मोतियों और बहुमूल्य रत्नों से जड़े हार तथा पैरों के आभूषण धारण करती थीं। इन आभूषणों से तत्कालीन समाज की आर्थिक समृद्धि, कलात्मक अभिरुचि तथा शिल्पकला की उन्नत अवस्था का परिचय मिलता है।
इस प्रकार भौमकालीन समाज बहुवर्णीय, बहुजातीय तथा व्यवसाय-आधारित सामाजिक व्यवस्था पर आधारित था। यद्यपि समाज में वर्णगत एवं जातिगत असमानताएँ विद्यमान थीं, फिर भी विभिन्न वर्गों एवं समुदायों के मध्य पारस्परिक सहयोग और सामाजिक समन्वय के कारण समाज में सामान्यतः शांति, स्थिरता तथा आर्थिक समृद्धि बनी रही। ब्राह्मणीय सामाजिक व्यवस्था को राजकीय संरक्षण, व्यापार एवं शिल्प का विकास तथा महिलाओं की अपेक्षाकृत सशक्त स्थिति भौम-कर कालीन समाज की प्रमुख विशेषताएँ थीं, जिन्होंने प्रारंभिक मध्यकालीन उड़ीसा के सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
भौम-कर काल की कला एवं स्थापत्य
भौम-कर राजवंश का शासनकाल उड़ीसा के सांस्कृतिक इतिहास में कला, स्थापत्य तथा धार्मिक समन्वय के उत्कर्ष का स्वर्णिम युग माना जाता है। इस काल में उड़ीसा की वास्तुकला ने एक स्वतंत्र पहचान विकसित की, जिसे आगे चलकर सोमवंशी तथा पूर्वी गंग शासकों ने और अधिक परिष्कृत एवं भव्य स्वरूप प्रदान किया। इस समय मंदिरों, बौद्ध विहारों, स्तूपों तथा तांत्रिक उपासना केन्द्रों का व्यापक निर्माण हुआ। कला एवं स्थापत्य में धार्मिक सहिष्णुता, तकनीकी नवाचार तथा स्थानीय शिल्प परंपराओं का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। इतिहासकारों का मत है कि भौम-कर शासकों के संरक्षण के बिना उड़ीसा की स्वतंत्र मंदिर स्थापत्य परंपरा का इतना तीव्र विकास संभव नहीं था।

कलिंग स्थापत्य का प्रारंभिक विकास
भौम-कर काल उड़ीसा की स्वतंत्र स्थापत्य शैली के विकास का प्रारंभिक चरण था। इस समय मंदिर निर्माण में ईंट तथा पत्थर दोनों का व्यापक उपयोग किया गया। मंदिरों की योजना में गर्भगृह, शिखर, मंडप, अलंकृत द्वार तथा सूक्ष्म पत्थर-नक्काशी जैसी विशेषताओं का क्रमिक विकास हुआ। इसी काल में रेखा देउल तथा खाखरा देउल शैली के प्रारंभिक रूप विकसित हुए, जो आगे चलकर उड़ीसा की मंदिर वास्तुकला की प्रमुख पहचान बने। भुवनेश्वर, जाजपुर तथा उसके आसपास के क्षेत्र इस स्थापत्य विकास के प्रमुख केंद्र थे। भौम-कर काल में विकसित यह स्थापत्य परंपरा बाद में मुक्तेश्वर, राजारानी, लिंगराज तथा कोणार्क के सूर्य मंदिर जैसी विख्यात स्थापत्य कृतियों की आधारभूमि सिद्ध हुई।
खाखरा देउल शैली का विकास
भौम-कर काल की सबसे विशिष्ट स्थापत्य उपलब्धि खाखरा देउल शैली का विकास था। इस शैली का नाम इसकी लंबी बैरलाकार छत के कारण पड़ा, जो खाखरा (कद्दू) के आकार से मिलती-जुलती प्रतीत होती है। सामान्य नागर शैली के मंदिरों की अपेक्षा इसका शिखर अपेक्षाकृत नीचा तथा गर्भगृह आयताकार होता था। विशाल प्रवेशद्वार, मोटी दीवारें, देवी-उपासना की प्रधानता तथा तांत्रिक प्रतीकों का व्यापक प्रयोग इसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं। यह शैली मुख्यतः चामुंडा, दुर्गा, वाराही तथा अन्य शक्तिदेवियों के मंदिरों में प्रयुक्त हुई। बाद के काल में भी यह शैली उड़ीसा की शाक्त परंपरा की विशिष्ट पहचान बनी रही।

वैताल देउल, वाराही मंदिर और चौंसठ योगिनी मंदिर
भुवनेश्वर स्थित वैताल देउल खाखरा देउल शैली का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है। इसे ‘तिनी-मुण्डिया देउल’ भी कहा जाता है। यह मंदिर देवी चामुंडा को समर्पित है तथा इसकी स्थापत्य योजना में तांत्रिक शाक्त परंपरा का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर चामुंडा, भैरव, अप्सराओं, नर्तकियों तथा विभिन्न देवी-देवताओं की अत्यंत सूक्ष्म नक्काशी अंकित है, जो उस समय की विकसित मूर्तिकला और स्थापत्य-कौशल का परिचय देती है।
इसी प्रकार पुरी क्षेत्र का वाराही मंदिर भौम-कर स्थापत्य का एक अन्य महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। यह देवी वाराही की उपासना का प्रमुख केंद्र था और इसकी स्थापत्य योजना में खाखरा शैली तथा तांत्रिक प्रतीकवाद का सुंदर समन्वय परिलक्षित होता है। इससे स्पष्ट है कि भौम-कर शासकों ने शक्ति-उपासना और तांत्रिक साधना को भी संरक्षण प्रदान किया।
भुवनेश्वर के समीप हीरापुर स्थित चौंसठ योगिनी मंदिर भौम-कर काल की तांत्रिक स्थापत्य परंपरा की अद्वितीय कृति है। यह भारत के दुर्लभ वृत्ताकार तथा खुले मंदिरों में से एक है। इसके चारों ओर बने कोष्ठकों में 64 योगिनियों की मूर्तियाँ स्थापित हैं। यह मंदिर शक्ति-साधना, योगिनी उपासना तथा तांत्रिक अनुष्ठानों का प्रमुख केंद्र था और भारतीय तांत्रिक स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण है।
बौद्ध स्थापत्य और डायमंड ट्रायंगल
भौम-कर काल में बौद्ध धर्म, विशेषकर महायान और वज्रयान परंपरा, अत्यधिक विकसित हुई। इस काल के तीन प्रमुख बौद्ध केंद्र रत्नागिरि, ललितगिरि और उदयगिरि को सामूहिक रूप से ‘डायमंड ट्रायंगल’ कहा जाता है, जो केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर के शिक्षा एवं साधना केंद्र भी थे।
ललितगिरि को उड़ीसा का सबसे प्राचीन बौद्ध केंद्र माना जाता है। यहाँ विशाल स्तूप, विहार तथा बुद्ध के पवित्र अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिससे इसकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक प्रतिष्ठा सिद्ध होती है। यह स्थल प्राचीन पुष्पगिरि विश्वविद्यालय से भी संबंधित माना जाता है।

रत्नागिरि वज्रयान बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र था, जहाँ से विशाल महाविहार, स्तूप तथा बुद्ध, अवलोकितेश्वर, तारा, मंजुश्री और वज्रपाणि की उत्कृष्ट प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं। तिब्बती परंपराओं के अनुसार नरोपा तथा बोधिश्री जैसे प्रसिद्ध बौद्ध आचार्यों ने यहाँ अध्ययन एवं साधना की थी। उत्खननों से प्राप्त विशाल मठ, अलंकृत प्रवेशद्वार तथा उत्कृष्ट मूर्तियाँ इस क्षेत्र की उच्च कलात्मक एवं स्थापत्य परंपरा के प्रमाण हैं।
उदयगिरि भी शिक्षा, ध्यान तथा बौद्ध दर्शन का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था। यहाँ से प्राप्त विहारों, स्तूपों तथा अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि यह धार्मिक स्थल एक सुव्यवस्थित शैक्षणिक परिसर था। चीनी तथा तिब्बती स्रोतों से ज्ञात होता है कि इन बौद्ध केन्द्रों के सांस्कृतिक संबंध चीन, तिब्बत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया से स्थापित थे।
भौम-कर काल की मूर्तिकला
भौम-कर काल की मूर्तिकला अपनी जीवंतता, संतुलित अनुपात, सूक्ष्म अलंकरण तथा आध्यात्मिक अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध है। इस समय पत्थर तथा कांस्य दोनों माध्यमों में उच्चकोटि की प्रतिमाओं का निर्माण हुआ। बुद्ध, अवलोकितेश्वर, तारा, शिव, विष्णु, चामुंडा, महिषासुरमर्दिनी तथा वाराही जैसी मूर्तियाँ धार्मिक विविधता और कलात्मक उत्कृष्टता का प्रमाण हैं। मूर्तियों में तांत्रिक प्रतीकों, आभूषणों, वस्त्रों तथा मुखाभिव्यक्ति का अत्यंत सूक्ष्म अंकन मिलता है। रत्नागिरि से प्राप्त कांस्य बुद्ध प्रतिमाएँ उस समय की विकसित धातु-शिल्प परंपरा का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। मूर्तिकला में आध्यात्मिक भावों के साथ-साथ सौंदर्य और तकनीकी दक्षता का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।

भौम-कर कला एवं स्थापत्य की विशेषताएँ
भौम-कर कला एवं स्थापत्य की सबसे बड़ी विशेषता धार्मिक समन्वय थी। यद्यपि अनेक भौम शासक बौद्ध धर्म के अनुयायी थे, फिर भी उन्होंने शैव, वैष्णव, शाक्त तथा जैन परंपराओं को समान संरक्षण प्रदान किया। परिणामस्वरूप बौद्ध विहारों के साथ-साथ शिव, विष्णु तथा शक्तिदेवियों के मंदिरों का भी व्यापक निर्माण हुआ। इस धार्मिक सहिष्णुता ने उड़ीसा में सांस्कृतिक एकता और धार्मिक सह-अस्तित्व की भावना को सुदृढ़ किया। मंदिरों और विहारों की स्थापत्य योजना तथा मूर्तिकला में स्थानीय कलिंग शैली, तांत्रिक प्रभाव और भारतीय शिल्प परंपरा का सुंदर समन्वय दृष्टिगत होता है।
भौम-कर काल की कला एवं स्थापत्य की समृद्ध परंपरा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा किए गए उत्खननों से प्रमाणित है। ललितगिरि से बुद्ध के पवित्र अवशेष, रत्नागिरि के विशाल कांस्य बुद्ध, अलंकृत महाविहार तथा उदयगिरि के विहार और स्तूप यह सिद्ध करते हैं कि ये स्थल अंतरराष्ट्रीय स्तर के बौद्ध शिक्षा एवं साधना केंद्र थे। जाजपुर क्षेत्र से प्राप्त ताम्रपत्रों से यह भी ज्ञात होता है कि भौम-कर शासक मंदिरों और बौद्ध विहारों को नियमित रूप से भूमि-अनुदान प्रदान करते थे।

इतिहासकार के. सी. पाणिग्राही ने भौम-कर काल को उड़ीसा की स्वतंत्र स्थापत्य परंपरा का प्रारंभिक स्वर्णयुग कहा है। हरमन कुल्के के अनुसार यह राज्य-निर्माण तथा सांस्कृतिक एकीकरण का निर्णायक चरण था, जबकि थॉमस ई. डोनाल्डसन ने वैताल देउल और खाखरा शैली को भारतीय मंदिर स्थापत्य का मौलिक एवं विशिष्ट विकास बताया है।
इस प्रकार भौम-कर शासकों ने केवल भव्य मंदिरों और विहारों का निर्माण कराया, बल्कि ऐसी स्थापत्य एवं सांस्कृतिक परंपरा की नींव रखी जिसने आगे चलकर सोमवंशी तथा पूर्वी गंग शासकों के अधीन लिंगराज, जगन्नाथ तथा कोणार्क जैसे विश्वविख्यात मंदिरों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।
भाषा एवं शिक्षा
भौम-कर काल उड़ीसा के सांस्कृतिक इतिहास का स्वर्णिम युग माना जाता है। इस समय भाषा, शिक्षा तथा दर्शन के क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास हुआ। भौम शासकों की धार्मिक सहिष्णुता, विद्वानों के संरक्षण तथा मठों, विहारों और मंदिरों को दिए गए राजकीय अनुदानों ने उड़ीसा को पूर्वी भारत के प्रमुख सांस्कृतिक एवं बौद्धिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित किया। अभिलेखीय और पुरातात्त्विक साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि ज्ञान और शिक्षा को पर्याप्त राजकीय संरक्षण प्राप्त था।
भौम-कर काल में संस्कृत राजकीय, धार्मिक और विद्वानों की प्रमुख भाषा थी। ताम्रपत्रों, शिलालेखों और दानपत्रों की रचना संस्कृत में की गई तथा इनमें सिद्धमात्रिका अथवा प्रारंभिक ओड़िया लिपि का प्रयोग हुआ। बौद्ध विद्वानों ने भी अपने दार्शनिक एवं धार्मिक ग्रंथ संस्कृत में ही लिखे। शिक्षा के प्रमुख केंद्र मठ, विहार और मंदिर थे, जहाँ धर्म के साथ-साथ व्याकरण, दर्शन, तर्कशास्त्र, चिकित्सा, ज्योतिष और तंत्रशास्त्र का अध्ययन कराया जाता था।
रत्नागिरि महाविहार इस काल का सबसे प्रतिष्ठित बौद्ध शिक्षण केंद्र था। तिब्बती परंपराओं के अनुसार बोधिश्री, नरोपा तथा अन्य प्रसिद्ध आचार्यों ने यहाँ अध्ययन और साधना की। इससे स्पष्ट है कि भौम-कर काल में उड़ीसा भारतीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बौद्ध शिक्षा और दर्शन का महत्त्वपूर्ण केंद्र था।
भौम-कर शासन का महत्त्व
भौम-कर राजवंश का शासनकाल उड़ीसा के इतिहास का एक गौरवपूर्ण एवं बहुआयामी युग था। इस काल में राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक समृद्धि, सामाजिक समन्वय तथा सांस्कृतिक उत्कर्ष का उल्लेखनीय विकास हुआ। भौम शासकों ने सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित कर कृषि, व्यापार, शिल्प, कला और स्थापत्य को संरक्षण प्रदान किया, जिससे राज्य की समृद्धि में निरंतर वृद्धि हुई। भूमि-अनुदान व्यवस्था, विकसित समुद्री व्यापार तथा उन्नत शिल्पकला इस युग की आर्थिक सुदृढ़ता के प्रमुख आधार थे।
धार्मिक दृष्टि से भौम-कर शासकों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी उदार एवं सहिष्णु नीति थी। यद्यपि अनेक शासक बौद्ध धर्म के अनुयायी थे, फिर भी उन्होंने शैव, वैष्णव, शाक्त तथा जैन परंपराओं को समान संरक्षण प्रदान किया। इस धार्मिक समन्वय ने उड़ीसा की सांस्कृतिक पहचान को व्यापक और समृद्ध बनाया। रत्नागिरि, उदयगिरि और ललितगिरि जैसे बौद्ध केंद्रों के साथ-साथ गुहेश्वरपाटक (वर्तमान जाजपुर) धार्मिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा। इसी काल में कलिंग स्थापत्य शैली, मूर्तिकला तथा शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई।
भौम-कर शासन की एक विशिष्ट उपलब्धि महिला शासन की परंपरा थी, जिसने भारतीय इतिहास में इस राजवंश को विशेष स्थान प्रदान किया। यद्यपि दसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सोमवंशियों के उदय के साथ भौम-कर सत्ता का अंत हो गया, फिर भी उनकी प्रशासनिक व्यवस्था, धार्मिक सहिष्णुता, सांस्कृतिक समन्वय तथा कला एवं स्थापत्य की समृद्ध विरासत ने उड़ीसा के भावी इतिहास को गहराई से प्रभावित किया। इस प्रकार भौम-कर काल उड़ीसा के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास का एक स्वर्णिम एवं प्रेरणादायक अध्याय है।
भौमकार (भौम-कर) शासकों की सूची
| क्रम | शासक/शासिका का नाम | अनुमानित शासनकाल | टिप्पणी |
| 1 | क्षेमंकरदेव (लक्ष्मीकर) | लगभग 736 ई. | भौमकार वंश के संस्थापक |
| 2 | शिवकरदेव प्रथम (उन्मत्तसिंह/उन्मत्तकेशरी) | लगभग 756–786 ई. | क्षेमंकरदेव के पुत्र |
| 3 | शुभकरदेव प्रथम | लगभग 790–809 ई. | शिवकरदेव प्रथम के पुत्र |
| 4 | शिवकरदेव द्वितीय | लगभग 809–810 ई. | शुभकरदेव प्रथम के पुत्र |
| 5 | शांतिकरदेव प्रथम (ललितहार प्रथम/गयाड प्रथम) | लगभग 810–835 ई. | शुभकरदेव प्रथम के पुत्र |
| 6 | शुभकरदेव द्वितीय | लगभग 835–839 ई. | शिवकरदेव द्वितीय के पुत्र |
| 7 | शुभकरदेव तृतीय (कुसुमहार प्रथम/सिंहकेतु) | लगभग 839–846 ई. | शांतिकरदेव प्रथम एवं त्रिभुवन महादेवी प्रथम के पुत्र |
| 8 | त्रिभुवन महादेवी प्रथम | लगभग 846–850 ई. | पश्चिमी गंग राजा राजमल्ल की पुत्री और शुभकरदेव तृतीय की माता |
| 9 | शांतिकरदेव द्वितीय (लवणाभार प्रथम/गयाड द्वितीय) | लगभग 850–880 ई. | शुभकरदेव तृतीय के पुत्र |
| 10 | शुभकरदेव चतुर्थ (कुसुमहार द्वितीय) | लगभग 881–884 ई. | शांतिकरदेव द्वितीय के पुत्र |
| 11 | शिवकरदेव तृतीय (ललितहार द्वितीय) | लगभग 884–885 ई. | शांतिकरदेव द्वितीय के पुत्र |
| 12 | त्रिभुवन महादेवी द्वितीय (पृथ्वी महादेवी) | लगभग 885–890 ई. | सोमवंशी राजा जनमेजय प्रथम की पुत्री |
| 13 | त्रिभुवन महादेवी तृतीय | लगभग 890–896 ई. | शिवकरदेव तृतीय की पत्नी एवं उत्तराधिकारी |
| 14 | शांतिकरदेव तृतीय (लवणाभार द्वितीय) | लगभग 896–910 ई. | शिवकरदेव तृतीय के पुत्र और पृथ्वी महादेवी के भतीजे |
| 15 | शुभकरदेव पंचम | लगभग 910–920 ई. | शिवकरदेव तृतीय के पुत्र |
| 16 | गौरी महादेवी | लगभग 920–923 ई. | सम्भवतः अपनी पुत्री दंडीमहादेवी की संरक्षिका के रूप में शासन किया |
| 17 | दंडी महादेवी | लगभग 923–935 ई. | शुभकरदेव पंचम एवं गौरी महादेवी की पुत्री; भौमकार वंश की सबसे शक्तिशाली महिला शासकों में से एक |
| 18 | वकुला महादेवी | लगभग 935–940 ई. | किसी भांज (भञ्ज) राजा की पुत्री; दंडीमहादेवी की सौतेली माता। |
| 19 | धर्ममहादेवी | लगभग 940–950 ई. | भौमकार वंश की अंतिम ज्ञात शासिका |




