रोमन साम्राज्य के महान और सर्वाधिक प्रसिद्ध सेनानायक
रोमन साम्राज्य विश्व इतिहास के सबसे महान साम्राज्यों में से एक था। इसकी महानता केवल इसके विशाल भू-भाग के कारण नहीं थी, बल्कि मानव सभ्यता के विकास में इसके बहुमूल्य योगदान के कारण भी थी। अपने उत्कर्ष काल में यह आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और सैन्य दृष्टि से विश्व का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था। सम्राट ट्राजन के शासनकाल में रोमन साम्राज्य अपने सबसे बड़े क्षेत्रीय विस्तार पर पहुँचा और लगभग 50 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैल गया, जो आज के लगभग 48 देशों के संयुक्त क्षेत्रफल के बराबर माना जाता है।
रोमन सभ्यता विश्व की पहली प्रमुख सभ्यताओं में से थी जिसने गणतांत्रिक शासन-व्यवस्था (रिपब्लिकन सिस्टम) को विकसित किया। यही व्यवस्था आगे चलकर आधुनिक लोकतंत्र की आधारशिला बनी। संस्कृति, धर्म, स्थापत्य कला, दर्शन, विधि, अभियांत्रिकी, आविष्कार तथा प्रशासन के क्षेत्रों में रोमन सभ्यता का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा। इसके अतिरिक्त, लैटिन और यूनानी भाषाओं के विकास एवं प्रसार पर भी रोमन सभ्यता का गहरा प्रभाव पड़ा। समय-समय पर इस सभ्यता ने अनेक महान शासकों, सेनानायकों, समाज-सुधारकों और दार्शनिकों को जन्म दिया, जिनका प्रभाव आज भी विश्व इतिहास में देखा जा सकता है।
प्रारंभ में रोम एक गणराज्य था, किंतु जूलियस सीज़र की तानाशाही के पश्चात उसके दत्तक पुत्र ऑगस्टस के शासनकाल में रोमन गणराज्य का अंत हुआ और रोमन साम्राज्य की स्थापना हुई। विशाल साम्राज्य का सफलतापूर्वक संचालन और उसकी सीमाओं की सुरक्षा के लिए अत्यंत कुशल सैनिकों और प्रतिभाशाली सेनानायकों की आवश्यकता थी। रोमन साम्राज्य को इतिहास के कुछ सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रसिद्ध सैन्य सेनानायक प्राप्त हुए। इन सेनानायकों ने न केवल साम्राज्य की एकता और स्थिरता बनाए रखी, बल्कि अपने सैन्य कौशल, रणनीति और प्रशासनिक क्षमता के बल पर उसके क्षेत्र का निरंतर विस्तार भी किया। रोमन इतिहास में अनेक ऐसे प्रसिद्ध सेनानायक हुए जिन्होंने युद्धभूमि में असाधारण साहस, वीरता और नेतृत्व का परिचय दिया। उनकी विजयों ने रोमन साम्राज्य को विश्व की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में स्थापित किया। उन्हें उनके अद्वितीय सैन्य योगदान के लिए अनेक सम्मान और उपाधियाँ भी प्राप्त हुईं।

रोमन इतिहास के प्रमुख काल
रोमन सभ्यता का इतिहास परंपरागत रूप से 509 ईसा पूर्व से 1453 ईस्वी तक माना जाता है। सत्ता के हस्तांतरण और राजनीतिक परिवर्तनों के आधार पर इसे मुख्यतः चार प्रमुख कालों में विभाजित किया जाता है।
राजनीतिक और प्रशासनिक परिवर्तनों के आधार पर रोमन इतिहास को सामान्यतः निम्नलिखित चार प्रमुख कालों में विभाजित किया जाता है—
रोमन गणराज्य काल (509 ई. पू.–27 ई. पू.)
इस अवधि में रोम का शासन निर्वाचित अधिकारियों और सीनेट के माध्यम से संचालित होता था। इसी काल में रोम ने इटली से बाहर अपना विस्तार प्रारंभ किया और भूमध्यसागर की प्रमुख शक्ति बन गया।
रोमन साम्राज्य काल (27 ई. पू.–395 ई.)
ऑगस्टस के शासन से प्रारंभ इस काल में रोम सम्राटों के अधीन रहा। यही रोमन साम्राज्य का स्वर्णकाल माना जाता है, जिसमें साम्राज्य ने अपने सर्वोच्च वैभव और क्षेत्रीय विस्तार को प्राप्त किया।
पश्चिमी रोमन साम्राज्य (395 ई.–476 ई.)
सम्राट थियोडोसियस प्रथम की मृत्यु के बाद साम्राज्य का विभाजन हुआ। पश्चिमी भाग की राजधानी पहले मिलान और बाद में रावेन्ना बनी। 476 ईस्वी में जर्मनिक सेनानायक ओडोएकर द्वारा अंतिम पश्चिमी रोमन सम्राट रोमुलस ऑगस्टुलस को पदच्युत किए जाने के साथ इसका अंत हो गया।
पूर्वी रोमन साम्राज्य (बीजान्टिन साम्राज्य) (395 ई.–1453 ई.)
साम्राज्य का पूर्वी भाग कॉन्स्टैन्टिनोपल को राजधानी बनाकर लगभग एक हजार वर्षों तक अस्तित्व में रहा। 1453 ईस्वी में उस्मानी सुल्तान मेहमद द्वितीय द्वारा कॉन्स्टैन्टिनोपल पर विजय प्राप्त करने के साथ बीजान्टिन साम्राज्य का अंत हुआ।
प्रसिद्ध सेनानायकों का विवरण
गायस जूलियस सीज़र (13 जुलाई 100 ई. पू.–15 मार्च 44 ई. पू.)
गायस जूलियस सीज़र प्राचीन रोम के महानतम सेनानायकों, राजनीतिज्ञों और राजनेताओं में से एक थे। उन्होंने अपने असाधारण सैन्य कौशल, राजनीतिक दूरदर्शिता तथा प्रशासनिक क्षमता के बल पर रोमन इतिहास की दिशा बदल दी। इतिहासकार उन्हें विश्व के सर्वश्रेष्ठ सैन्य कमांडरों में गिनते हैं। उनकी विजयों ने न केवल रोमन गणराज्य की सीमाओं का अभूतपूर्व विस्तार किया, बल्कि उन राजनीतिक घटनाओं को भी जन्म दिया, जिन्होंने अंततः रोमन गणराज्य के पतन और रोमन साम्राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
प्रारंभिक जीवन और राजनीतिक उदय
जूलियस सीज़र का जन्म 13 जुलाई 100 ईसा पूर्व को रोम के एक प्रतिष्ठित पैट्रिशियन (कुलीन) परिवार जूलिया (जूलियन) वंश में हुआ था। यह वंश अपनी उत्पत्ति देवी वीनस के पुत्र ऐनियस के पुत्र इयूलस (जूलस) से जोड़ता था। यद्यपि उनका परिवार अत्यधिक समृद्ध नहीं था, फिर भी उसका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव पर्याप्त था। सीज़र ने युवावस्था से ही राजनीति और सैन्य जीवन में रुचि दिखाई। अपनी बुद्धिमत्ता, प्रभावशाली वक्तृत्व-कला तथा जनसमर्थन के बल पर उन्होंने रोम की राजनीति में शीघ्र ही महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया। बाद में उन्होंने पॉम्पियस मैग्नस (पॉम्पी) और मार्कस लिसिनियस क्रासस के साथ प्रथम त्रिमूर्व (फ़र्स्ट ट्रायम्विरेट) का गठन किया, जिसने रोमन राजनीति पर कई वर्षों तक प्रभुत्व बनाए रखा।

महान सैन्य अभियानों का नेतृत्व
जूलियस सीज़र की सबसे बड़ी पहचान उनके अद्वितीय सैन्य नेतृत्व के कारण है। उन्होंने अनेक अभियानों का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया और अपने समय के लगभग सभी प्रमुख युद्धों में विजय प्राप्त की। उनका सबसे प्रसिद्ध अभियान गॉल (वर्तमान फ्रांस, बेल्जियम तथा आसपास के क्षेत्रों) की विजय था। 58 से 50 ईसा पूर्व के बीच उन्होंने गॉल की अनेक शक्तिशाली जनजातियों को पराजित कर इस विशाल क्षेत्र को रोमन गणराज्य के अधीन कर लिया। इस विजय ने रोम की सीमाओं का अत्यधिक विस्तार किया और जूलियस सीज़र की प्रतिष्ठा को अभूतपूर्व ऊँचाई प्रदान की। गृहयुद्ध के दौरान उन्होंने फार्सलस (48 ईसा पूर्व) के युद्ध में अपने प्रतिद्वंद्वी पॉम्पी को निर्णायक रूप से पराजित किया। इसके बाद थैप्सस (46 ईसा पूर्व) और मुंडा (45 ईसा पूर्व) के युद्धों में भी उन्होंने अपने विरोधियों को हराकर अपनी सर्वोच्च सैन्य क्षमता का परिचय दिया। इन युद्धों में कई बार उनकी सेना संख्या में शत्रु से कम थी, फिर भी उनकी युद्धनीति, अनुशासन और नेतृत्व के कारण विजय अंततः सीज़र की ही हुई।
रोमन साम्राज्य के विस्तार में योगदान
जूलियस सीज़र के नेतृत्व में रोम का क्षेत्रीय विस्तार अभूतपूर्व रूप से बढ़ा। उन्होंने रोमन प्रभाव को उत्तर-पश्चिमी यूरोप तक पहुँचा दिया। उनके अभियानों के परिणामस्वरूप रोमन सीमा इंग्लिश चैनल (ला मांश) और राइन नदी तक विस्तृत हो गई। सीज़र राइन नदी को पार करने वाले पहले रोमन सेनानायक थे। उन्होंने राइन पर लकड़ी का विशाल पुल बनवाकर अपनी सेना को नदी के पार पहुँचाया और जर्मनिक जनजातियों को रोमन शक्ति का परिचय कराया। यह अभियान केवल सैन्य विजय ही नहीं, बल्कि रोमन अभियांत्रिकी और संगठन क्षमता का भी उत्कृष्ट उदाहरण था। उन्होंने 55 ईसा पूर्व और 54 ईसा पूर्व में ब्रिटेन पर दो सैन्य अभियान भी चलाए। यद्यपि उस समय ब्रिटेन पर स्थायी रोमन शासन स्थापित नहीं हो सका, फिर भी वे ब्रिटेन में प्रवेश करने वाले प्रथम रोमन सेनानायक बने। इन अभियानों ने भविष्य में ब्रिटेन पर रोमन विजय का मार्ग प्रशस्त किया।
प्रशासनिक सुधार और राजनीतिक परिवर्तन
लगातार सैन्य सफलताओं के बाद जूलियस सीज़र रोम के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति बन गए। उन्होंने रोमन प्रशासन में अनेक सुधार किए और शासन व्यवस्था को अधिक संगठित एवं केंद्रीकृत बनाया। उन्होंने प्रांतीय प्रशासन में सुधार किए, कर व्यवस्था को व्यवस्थित किया, अनेक उपनिवेशों की स्थापना की तथा भूमिहीन सैनिकों और नागरिकों के पुनर्वास की योजनाएँ लागू कीं। उन्होंने जूलियन पंचांग (जूलियन कैलेंडर) लागू किया, जो बाद में यूरोप के अधिकांश देशों में प्रचलित हुआ और आधुनिक ग्रेगोरियन कैलेंडर का आधार बना। 44 ईसा पूर्व में रोमन सीनेट ने उन्हें ‘आजीवन तानाशाह’ (डिक्टेटर परपेचुओ) घोषित कर दिया। यह पद उनके राजनीतिक प्रभुत्व का प्रतीक था, किंतु इसी कारण अनेक सीनेटरों को यह भय होने लगा कि वे रोम में राजतंत्र स्थापित करना चाहते हैं।
सीज़र की हत्या
जूलियस सीज़र की बढ़ती शक्ति से चिंतित अनेक सीनेटरों ने उनके विरुद्ध षड्यंत्र रचा। 15 मार्च 44 ईसा पूर्व, जिसे रोमन इतिहास में ‘आइड्स ऑफ मार्च’ के नाम से जाना जाता है, उन्हें पॉम्पी के रंगमंच (थिएटर ऑफ पॉम्पी) में सीनेट की बैठक के दौरान घेर लिया गया। मार्कस जूनियस ब्रूटस और गायस कैसियस लोंगिनस के नेतृत्व में लगभग साठ षड्यंत्रकारियों ने उन पर हमला किया। सीज़र को कुल 23 बार छुरा घोंपा गया, जिसके परिणामस्वरूप उनकी मृत्यु हो गई। उनकी हत्या का उद्देश्य रोमन गणराज्य की पुनर्स्थापना था, किंतु इसके विपरीत इससे एक और भीषण गृहयुद्ध आरंभ हो गया, जिसका अंत ऑक्टेवियन (ऑगस्टस) की विजय और रोमन साम्राज्य की स्थापना के रूप में हुआ।
सीज़र की प्रसिद्ध उक्ति
जूलियस सीज़र की सबसे प्रसिद्ध लैटिन उक्ति है—‘वेनी, वीदी, वीची’, जिसका हिंदी अर्थ है—‘मैं आया, मैंने देखा और मैंने विजय प्राप्त की।’ उन्होंने यह वाक्य 47 ईसा पूर्व में ज़ेला के युद्ध में त्वरित विजय प्राप्त करने के बाद रोमन सीनेट को भेजे गए संदेश में लिखा था। यह उक्ति आज भी तीव्र, निर्णायक और पूर्ण सफलता का प्रतीक मानी जाती है।
सीज़र का ऐतिहासिक मूल्यांकन
जूलियस सीज़र केवल एक महान विजेता ही नहीं, बल्कि असाधारण प्रशासक, दूरदर्शी राजनीतिज्ञ और कुशल लेखक भी थे। उनकी सैन्य रणनीतियाँ आज भी विश्व की सैन्य अकादमियों में अध्ययन का विषय हैं। उनकी कृतियाँ ‘कॉमेंटारी डी बेलो गैलिको’ (गॉल के युद्धों पर टिप्पणियाँ) तथा ‘कॉमेंटारी डी बेलो सिविली’ (गृहयुद्ध पर टिप्पणियाँ) प्राचीन रोमन इतिहास के अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत मानी जाती हैं। यद्यपि उनके विरोधियों ने उन्हें गणराज्य का विनाशक माना, फिर भी अधिकांश आधुनिक इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि उन्होंने रोमन राज्य को नई प्रशासनिक दिशा प्रदान की और उनके द्वारा किए गए राजनीतिक एवं सैन्य परिवर्तन ही आगे चलकर रोमन साम्राज्य की स्थापना का आधार बने।
स्किपियो अफ्रीकानस (236 ईसा पूर्व – 183 ईसा पूर्व)
स्किपियो अफ्रीकानस, जिन्हें पब्लियस कॉर्नेलियस स्किपियो अफ्रीकानस के नाम से भी जाना जाता है, प्राचीन रोम के सबसे महान सेनानायकों और सैन्य रणनीतिकारों में से एक थे। उन्हें ‘स्किपियो द ग्रेट’ तथा ‘अफ्रीकानस’ की उपाधियों से भी सम्मानित किया गया। इतिहासकार उन्हें विश्व इतिहास के सर्वश्रेष्ठ सैन्य रणनीतिकारों की श्रेणी में रखते हैं। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि द्वितीय प्यूनिक युद्ध (218–201 ईसा पूर्व) के दौरान कार्थेज के महान सेनानायक हैनिबल बार्का को निर्णायक रूप से पराजित करना थी। इस विजय ने न केवल रोम को विनाश से बचाया, बल्कि भूमध्यसागरीय क्षेत्र में उसकी सर्वोच्चता स्थापित करने का मार्ग भी प्रशस्त किया।
स्किपियो का प्रारंभिक जीवन
स्किपियो अफ्रीकानस का जन्म लगभग 236 ईसा पूर्व रोम के प्रतिष्ठित कॉर्नेलिया कुल में हुआ था। उनके पिता पब्लियस कॉर्नेलियस स्किपियो भी एक प्रसिद्ध रोमन सेनानायक और राजनेता थे। बचपन से ही स्किपियो ने सैन्य शिक्षा, नेतृत्व और युद्ध-कौशल का प्रशिक्षण प्राप्त किया। वे साहसी, दूरदर्शी और असाधारण नेतृत्व क्षमता वाले युवक थे, जिसके कारण कम आयु में ही उन्हें सैन्य अभियानों में महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ मिलने लगीं।

टिसिनस के युद्ध में अद्भुत साहस
स्किपियो की वीरता का पहला उल्लेखनीय उदाहरण टिसिनस के युद्ध (218 ई. पू.) में मिलता है। इस युद्ध में उनके पिता गंभीर संकट में घिर गए थे। प्राचीन इतिहासकारों के अनुसार युवा स्किपियो ने बिना अपनी जान की परवाह किए शत्रु सेना के बीच अकेले घुसकर अपने पिता को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। इस साहसिक कार्य ने उन्हें रोमन सैनिकों और नागरिकों के बीच अत्यधिक सम्मान दिलाया तथा वे एक निर्भीक योद्धा के रूप में प्रसिद्ध हो गए।
स्किपियो और द्वितीय प्यूनिक युद्ध
द्वितीय प्यूनिक युद्ध रोम और कार्थेज के बीच लड़ा गया इतिहास का एक निर्णायक संघर्ष था। इस युद्ध में कार्थेज के महान सेनानायक हैनिबल बार्का ने आल्प्स पर्वत पार कर इटली पर आक्रमण किया और रोम को अनेक भीषण पराजयों का सामना करना पड़ा। उस समय रोमन गणराज्य का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया था।
ऐसी कठिन परिस्थितियों में स्किपियो अफ्रीकानस ने नेतृत्व सँभाला। उन्होंने पहले स्पेन (हिस्पानिया) में कार्थेज की शक्ति को कमजोर किया और वहाँ के महत्त्वपूर्ण नगरों तथा सैन्य अड्डों पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने एक साहसिक योजना के अंतर्गत सीधे उत्तरी अफ्रीका पर आक्रमण किया। इस रणनीति के कारण हैनिबल को इटली छोड़कर अपने देश कार्थेज लौटना पड़ा, जहाँ निर्णायक युद्ध होना था।
स्किपियो और ज़ामा का ऐतिहासिक युद्ध
202 ईसा पूर्व में ज़ामा के मैदान में स्किपियो अफ्रीकानस और हैनिबल बार्का के बीच इतिहास का एक अत्यंत प्रसिद्ध युद्ध लड़ा गया। यह द्वितीय प्यूनिक युद्ध का अंतिम और निर्णायक संघर्ष था। स्किपियो ने अपनी नवीन युद्ध-रणनीति, अनुशासित सेना और उत्कृष्ट नेतृत्व का परिचय देते हुए हैनिबल की सेना को पराजित कर दिया। उन्होंने विशेष रूप से हैनिबल के युद्ध हाथियों का प्रभाव निष्प्रभावी करने के लिए अपनी सेना की पंक्तियों में मार्ग बनवाए, जिससे हाथी बिना अधिक क्षति पहुँचाए आगे निकल गए। इसके बाद रोमन घुड़सवार सेना ने पीछे से आक्रमण कर कार्थेज की सेना को चारों ओर से घेर लिया। इस निर्णायक विजय के साथ कार्थेज की सैन्य शक्ति समाप्त हो गई और रोम भूमध्यसागर की सबसे शक्तिशाली शक्ति बन गया।
ज़ामा की इस महान विजय के बाद स्किपियो को ‘अफ्रीकानस’ (अफ्रीका का विजेता) की सम्मानसूचक उपाधि प्रदान की गई। उनकी युद्ध-कुशलता के कारण कई इतिहासकार उन्हें ‘रोमन हैनिबल’ भी कहते हैं, क्योंकि उन्होंने उसी स्तर की प्रतिभा और रणनीतिक क्षमता का प्रदर्शन किया था।
स्किपियो और रोमन गणराज्य की रक्षा
स्किपियो अफ्रीकानस की विजय ने रोमन गणराज्य को विनाश से बचा लिया। यदि ज़ामा के युद्ध में रोम पराजित हो जाता, तो संभवतः कार्थेज भूमध्यसागरीय क्षेत्र की प्रमुख शक्ति बन जाता। स्किपियो की सफलता के परिणामस्वरूप रोम की राजनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठा अत्यधिक बढ़ी तथा आगे चलकर स्पेन, यूनान, एशिया माइनर और उत्तरी अफ्रीका सहित संपूर्ण भूमध्यसागरीय क्षेत्र पर उसके प्रभुत्व की नींव मजबूत हुई।
स्किपियो का राजनीतिक जीवन और आरोप
युद्ध में अपार सफलता प्राप्त करने के बाद स्किपियो ने राजनीतिक जीवन में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कौंसल सहित अनेक उच्च पदों पर कार्य किया। किंतु जीवन के उत्तरार्ध में उनके राजनीतिक विरोधियों ने उन पर रिश्वत लेने तथा देशद्रोह जैसे गंभीर आरोप लगाए। इन आरोपों का उद्देश्य उनकी लोकप्रियता को कम करना और उनकी प्रतिष्ठा को धूमिल करना था।
यद्यपि स्किपियो जनता के बीच अत्यंत लोकप्रिय थे। अधिकांश रोमन नागरिक उन्हें गणराज्य का रक्षक मानते थे। परिणामस्वरूप उनके विरुद्ध लगाए गए आरोप कभी सिद्ध नहीं हो सके और उनके राजनीतिक विरोधियों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली।
स्किपियो की मृत्यु
स्किपियो अफ्रीकानस की मृत्यु लगभग 183 ईसा पूर्व में लगभग 53 वर्ष की आयु में हुई। उनकी मृत्यु के संबंध में विभिन्न मत प्रचलित हैं और कुछ इतिहासकार इसे संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मृत्यु मानते हैं। कहा जाता है कि अपने अंतिम दिनों में वे रोम की राजनीति से निराश हो गए थे। उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि उनकी मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार रोम में न किया जाए। परंपरा के अनुसार उन्होंने कहा था कि जिस मातृभूमि ने उनके जीवनकाल में उनका उचित सम्मान नहीं किया, वहाँ उनकी समाधि भी नहीं बनाई जानी चाहिए। इसी कारण उनका अंतिम संस्कार उनके पारिवारिक निवास लिटेर्नम में किया गया।
स्किपियो का ऐतिहासिक मूल्यांकन
स्किपियो अफ्रीकानस की गणना प्राचीन रोम के सबसे प्रतिभाशाली सेनानायकों में की जाती है। उन्होंने साहस, अनुशासन, रणनीतिक कौशल और दूरदर्शिता का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जिसने रोमन सैन्य परंपरा को नई दिशा दी। ज़ामा के युद्ध में हैनिबल जैसी महान सैन्य प्रतिभा को पराजित करना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि यदि स्किपियो अफ्रीकानस न होते, तो रोमन गणराज्य का अस्तित्व गंभीर संकट में पड़ सकता था। उनकी विजयों ने रोम को भूमध्यसागर की प्रमुख शक्ति बनने का अवसर प्रदान किया और आगे चलकर रोमन साम्राज्य की स्थापना के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार कीं। इसलिए स्किपियो अफ्रीकानस को न केवल रोम, बल्कि संपूर्ण विश्व इतिहास के महानतम सैन्य रणनीतिकारों में स्थान प्राप्त है।
गायस मारियस (157 ई. पू.–13 जनवरी 86 ई. पू.)
गायस मारियस प्राचीन रोम के महान सेनानायकों, सैन्य सुधारकों और प्रभावशाली राजनेताओं में से एक थे। वे रोमन गणराज्य के इतिहास में ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध हैं जिन्होंने रोमन सेना की संरचना, भर्ती प्रणाली और संगठन में व्यापक सुधार किए। उनके द्वारा किए गए सैन्य सुधारों ने रोमन सेना को एक पेशेवर, अनुशासित और स्थायी सैन्य शक्ति में परिवर्तित कर दिया, जिसका प्रभाव कई शताब्दियों तक बना रहा। मारियस अपने समय के अत्यंत सफल सेनानायक थे। उन्होंने उत्तरी अफ्रीका के न्यूमिडियनों तथा यूरोप से आक्रमण करने वाली जर्मनिक जनजातियों—ट्यूटोन्स, एम्ब्रोन्स और किम्ब्री को पराजित कर रोमन गणराज्य को एक बड़े संकट से बचाया। उनके अद्वितीय सैन्य योगदान के कारण उन्हें ‘रोम का तृतीय संस्थापक’ की सम्मानसूचक उपाधि प्रदान की गई।
मारियस का प्रारंभिक जीवन
गायस मारियस का जन्म 157 ईसा पूर्व में इटली के आर्पिनम नगर में एक सामान्य कृषक परिवार में हुआ था। वे रोमन कुलीन वर्ग (पैट्रिशियन) से नहीं थे, बल्कि सामान्य नागरिक वर्ग से संबंधित थे। अपनी प्रतिभा, कठोर परिश्रम और सैन्य क्षमता के बल पर उन्होंने धीरे-धीरे रोमन राजनीति और सेना में उच्च स्थान प्राप्त किया। मारियस का परिवार बाद में जूलियस सीज़र के परिवार से वैवाहिक संबंधों के माध्यम से जुड़ गया। उनकी बहन जूलिया का विवाह गायस जूलियस सीज़र के पिता से हुआ था। इस प्रकार मारियस, जूलियस सीज़र के मामा थे।
मारियस के सैन्य जीवन की शुरुआत
गायस मारियस ने अपने सैन्य जीवन का प्रारंभ एक साधारण सैनिक के रूप में किया। उन्होंने स्पेन और उत्तरी अफ्रीका के अभियानों में भाग लेकर अपनी वीरता और नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। उनकी योग्यता से प्रभावित होकर वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें महत्त्वपूर्ण सैन्य दायित्व सौंपने प्रारंभ किए। उनकी सबसे पहली बड़ी सफलता न्यूमिडिया (वर्तमान अल्जीरिया और उसके आसपास का क्षेत्र) के राजा जुगुर्था के विरुद्ध चलाए गए युद्ध में मिली। इस अभियान में उन्होंने उत्कृष्ट सैन्य नेतृत्व का परिचय दिया, जिससे उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी।

रोमन सेना में क्रांतिकारी सुधार
गायस मारियस का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान रोमन सेना में किए गए व्यापक सुधार थे, जिन्हें इतिहास में ‘मारियन सुधार’ कहा जाता है। इन सुधारों ने रोमन सैन्य व्यवस्था की प्रकृति ही बदल दी। उनसे पहले सेना में सामान्यतः केवल भूमि-स्वामी नागरिकों की भर्ती की जाती थी। मारियस ने इस परंपरा को समाप्त करते हुए भूमिहीन एवं निर्धन नागरिकों को भी सेना में भर्ती होने की अनुमति दी। इससे सेना के लिए योग्य सैनिकों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई और गरीब नागरिकों को रोजगार तथा सम्मानजनक जीवन का अवसर मिला। उन्होंने सेना के संगठन में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए। पुरानी सैन्य संरचनाओं को समाप्त कर उन्होंने लीजन को छोटे-छोटे कोहॉर्ट में संगठित किया। इससे सेना अधिक लचीली, गतिशील और युद्ध के लिए प्रभावी बन गई। प्रत्येक कोहॉर्ट स्वतंत्र रूप से युद्ध करने में सक्षम थी, जिससे युद्धभूमि में सेनापतियों को रणनीति बनाने में अधिक सुविधा मिली।
गायस मारियस ने सैनिकों के प्रशिक्षण, हथियारों की एकरूपता, अनुशासन, रसद व्यवस्था तथा सैन्य उपकरणों में भी सुधार किए। उन्होंने सैनिकों को अपना अधिकांश सामान स्वयं ढोने का प्रशिक्षण दिया, जिसके कारण उन्हें व्यंग्यात्मक रूप से ‘मारियस के खच्चर’ कहा जाने लगा। इससे सेना की गति और आत्मनिर्भरता दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इन सुधारों के कारण रोमन सेना एक स्थायी, प्रशिक्षित और अत्यंत शक्तिशाली पेशेवर सेना बन गई, जिसने आगे चलकर रोमन साम्राज्य के विस्तार में निर्णायक भूमिका निभाई।
मारियस का न्यूमिडिया अभियान
गायस मारियस ने न्यूमिडिया के राजा जुगुर्था के विरुद्ध युद्ध में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस संघर्ष में उन्होंने अनेक सैन्य सफलताएँ प्राप्त कीं। यद्यपि अंततः जुगुर्था को पकड़ने का श्रेय उनके अधीनस्थ अधिकारी लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला को मिला, फिर भी इस युद्ध ने मारियस की सैन्य प्रतिष्ठा को अत्यधिक बढ़ा दिया और उन्हें रोम का लोकप्रिय सेनानायक बना दिया।
मारियस और जर्मनिक आक्रमण
गायस मारियस के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि जर्मनिक जनजातियों के विरुद्ध उनकी विजय थी। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के अंतिम वर्षों में ट्यूटोन्स, एम्ब्रोन्स और किम्ब्री जैसी शक्तिशाली जर्मनिक जनजातियाँ रोमन सीमाओं की ओर बढ़ रही थीं। इन जनजातियों ने पहले ही कई रोमन सेनाओं को पराजित कर दिया था और रोम पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया था। ऐसी परिस्थितियों में गायस मारियस को रोमन सेना का सर्वोच्च नेतृत्व सौंपा गया। उन्होंने अपनी नई सैन्य व्यवस्था, अनुशासन और उत्कृष्ट युद्धनीति के बल पर इन आक्रमणकारियों को निर्णायक रूप से पराजित किया।

एक्वाए सेक्स्टिए और वर्सेली के युद्ध
102 ईसा पूर्व में एक्वाए सेक्स्टिए के युद्ध में गायस मारियस ने ट्यूटोन्स और एम्ब्रोन्स को करारी पराजय दी। इस विजय से दक्षिणी गॉल पर मंडरा रहा खतरा समाप्त हो गया। इसके अगले वर्ष, 101 ईसा पूर्व में वर्सेली के युद्ध में उन्होंने किम्ब्री जनजाति को भी निर्णायक रूप से पराजित किया। इन दोनों विजयों ने रोम को संभावित विनाश से बचा लिया और जर्मनिक आक्रमणों का खतरा लंबे समय के लिए समाप्त हो गया। इन ऐतिहासिक विजयों के कारण रोमन जनता ने मारियस को राष्ट्ररक्षक के रूप में सम्मानित किया और उन्हें “रोम का तृतीय संस्थापक” कहा जाने लगा।
मारियस का राजनीतिक जीवन
गायस मारियस केवल महान सेनानायक ही नहीं, बल्कि प्रभावशाली राजनीतिज्ञ भी थे। वे रोमन गणराज्य के इतिहास में सात बार कौंसल चुने गए, जो उस समय एक अभूतपूर्व उपलब्धि थी। सामान्यतः किसी व्यक्ति को एक से अधिक बार कौंसल बनने का अवसर बहुत कम मिलता था, किंतु जनता और सेना में उनकी लोकप्रियता के कारण उन्हें बार-बार इस सर्वोच्च पद पर निर्वाचित किया गया। उन्होंने सामान्य नागरिकों और सैनिकों के हितों का समर्थन किया, जबकि रोमन कुलीन वर्ग (ऑप्टिमेट्स) उनकी नीतियों का विरोध करता था। इसी कारण उनका राजनीतिक जीवन निरंतर संघर्षों से भरा रहा।
मारियस का सुल्ला से संघर्ष
गायस मारियस के जीवन के अंतिम वर्षों में उनका अपने पूर्व सहयोगी लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला के साथ गंभीर राजनीतिक और सैन्य संघर्ष हुआ। दोनों नेताओं के बीच सत्ता प्राप्त करने की प्रतिस्पर्धा ने रोमन गणराज्य को गृहयुद्ध की ओर धकेल दिया। यद्यपि मारियस अपने अंतिम वर्षों में पुनः सत्ता प्राप्त करने में सफल रहे, किंतु यह संघर्ष रोमन राजनीति में हिंसा और सैन्य हस्तक्षेप की परंपरा की शुरुआत बन गया। बाद में इसी प्रकार के संघर्षों ने जूलियस सीज़र, पॉम्पी और ऑक्टेवियन के युग का मार्ग प्रशस्त किया तथा अंततः रोमन गणराज्य के पतन और रोमन साम्राज्य की स्थापना का कारण बने।
मारियस का व्यक्तित्व
गायस मारियस अत्यंत साहसी, अनुशासित और महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति थे। वे कठोर स्वभाव के थे तथा रोमन कुलीन वर्ग के प्रति विशेष सम्मान नहीं रखते थे। उनकी स्पष्टवादिता और दृढ़ निश्चय ने उन्हें जनता और सैनिकों के बीच लोकप्रिय बनाया, जबकि अनेक कुलीन राजनेता उन्हें अपना राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानते थे। उनकी नेतृत्व क्षमता, संगठन कौशल और युद्धनीति ने उन्हें अपने युग का सर्वश्रेष्ठ सेनानायक बना दिया।

मारियस का ऐतिहासिक मूल्यांकन
गायस मारियस का स्थान रोमन इतिहास के सबसे प्रभावशाली सैन्य सुधारकों में है। उनके द्वारा किए गए सैन्य सुधारों ने रोमन सेना को आधुनिक स्वरूप प्रदान किया और उसे एक पेशेवर सैन्य संगठन में बदल दिया। उनके संगठनात्मक सुधारों के कारण रोमन सेना आने वाली कई शताब्दियों तक यूरोप, एशिया और अफ्रीका में विजय प्राप्त करती रही। इतिहासकारों का मत है कि यदि मारियस ने सेना का पुनर्गठन न किया होता, तो संभवतः रोम जर्मनिक आक्रमणों का सामना नहीं कर पाता। उनकी विजयों ने रोमन गणराज्य को विनाश से बचाया, जबकि उनके सैन्य सुधारों ने भविष्य के रोमन साम्राज्य की नींव को सुदृढ़ किया। इसलिए गायस मारियस को प्राचीन रोम के महानतम सेनानायकों और सैन्य सुधारकों में सम्मानपूर्वक स्थान दिया जाता है।
ग्नेयस पॉम्पियस मैग्नस (29 सितंबर 106 ई. पू.–28 सितंबर 48 ई. पू.)
ग्नेयस पॉम्पियस मैग्नस , जिन्हें सामान्यतः पॉम्पी अथवा ‘पॉम्पी महान’ के नाम से जाना जाता है, प्राचीन रोम के सर्वश्रेष्ठ सेनानायकों और प्रभावशाली राजनेताओं में से एक थे। वे रोमन गणराज्य के अंतिम चरण के प्रमुख राजनीतिक एवं सैन्य व्यक्तित्व थे और जूलियस सीज़र के सबसे शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वियों में गिने जाते हैं। अपनी असाधारण सैन्य प्रतिभा, संगठन क्षमता और राजनीतिक प्रभाव के कारण उन्होंने भूमध्यसागरीय विश्व में रोमन प्रभुत्व स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पॉम्पी ने अनेक सफल सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया, समुद्री डाकुओं का प्रभाव समाप्त किया, एशिया माइनर और सीरिया में रोमन शक्ति का विस्तार किया तथा पूर्वी भूमध्यसागर में रोम की सर्वोच्चता स्थापित की। यद्यपि अपने जीवन के अंतिम चरण में वे जूलियस सीज़र से गृहयुद्ध में पराजित हुए, फिर भी रोमन इतिहास में उनका स्थान महान विजेता, कुशल सेनापति और दूरदर्शी प्रशासक के रूप में सुरक्षित है।
पॉम्पी का प्रारंभिक जीवन
पॉम्पी का जन्म 29 सितंबर 106 ईसा पूर्व को इटली के पिकेनम क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित रोमन परिवार में हुआ था। उनके पिता ग्नेयस पॉम्पियस स्ट्राबो रोमन सेना के प्रसिद्ध सेनानायक और कौंसल थे। बाल्यावस्था से ही पॉम्पी ने सैन्य जीवन का वातावरण देखा और युद्धकला, नेतृत्व तथा प्रशासन का प्रशिक्षण प्राप्त किया। युवा अवस्था में ही उन्होंने अपनी असाधारण प्रतिभा और नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। लगभग 24 वर्ष की आयु तक वे एक सफल सेनानायक के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे। उनकी प्रारंभिक सफलताओं ने उन्हें रोम के सबसे प्रभावशाली सैन्य नेताओं की श्रेणी में ला खड़ा किया।

सुल्ला के साथ सैन्य जीवन
रोमन गणराज्य के गृहयुद्धों के दौरान पॉम्पी ने प्रसिद्ध सेनानायक लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला का समर्थन किया और उनके पक्ष में द्वितीय गृहयुद्ध में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने अपनी निजी सेना संगठित कर सुल्ला की विजय में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। सुल्ला उनकी सैन्य प्रतिभा, अनुशासन और नेतृत्व से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने पॉम्पी को ‘मैग्नस’ अर्थात् ‘महान’ की सम्मानसूचक उपाधि प्रदान की। यह उपाधि उनके जीवन भर उनके नाम के साथ जुड़ी रही और वे इतिहास में पॉम्पी महान के नाम से प्रसिद्ध हुए।
पॉम्पी की राजनीतिक उन्नति
पॉम्पी की लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि उन्हें रोमन परंपरा के अनेक नियमों को शिथिल करते हुए कम आयु में ही सर्वोच्च राजनीतिक पद प्राप्त हुए। वे सामान्य संवैधानिक योग्यताओं को पूर्ण किए बिना ही कौंसल के पद पर नियुक्त हुए, जो उस समय अत्यंत असाधारण घटना थी। उनकी लोकप्रियता का आधार केवल सैन्य सफलताएँ ही नहीं थीं, बल्कि उनकी संगठन क्षमता, प्रशासनिक दक्षता तथा जनता के बीच उनकी प्रतिष्ठा भी थी।
महान सेनानायक और रणनीतिकार
पॉम्पी अपनी अद्भुत वीरता और युद्ध-कौशल के लिए प्रसिद्ध थे। वे युद्धभूमि में सदैव अग्रिम पंक्ति में रहकर अपने सैनिकों का नेतृत्व करते थे। उनका साहस सैनिकों के लिए प्रेरणा का स्रोत था और उनकी सेना उन पर पूर्ण विश्वास करती थी। वे केवल साहसी योद्धा ही नहीं, बल्कि उत्कृष्ट रणनीतिकार और संगठनकर्ता भी थे। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे अनेक बार बिना बड़े निर्णायक युद्ध के ही अपनी योजनाओं, रसद व्यवस्था और रणनीतिक चालों के माध्यम से शत्रु को पराजित कर देते थे। वे विरोधियों की गतिविधियों का सूक्ष्म अध्ययन कर उन्हें लगातार रणनीतिक रूप से मात देते थे।
सिसिली और अफ्रीका में विजय
सुल्ला के समर्थन में युद्ध करते हुए पॉम्पी ने पहले सिसिली और फिर उत्तरी अफ्रीका में विद्रोहियों को पराजित किया। इन अभियानों में उनकी उल्लेखनीय सफलताओं ने उनकी प्रतिष्ठा को अत्यधिक बढ़ाया और वे रोम के सबसे विश्वसनीय सेनानायकों में गिने जाने लगे।
भूमध्यसागर के समुद्री डाकुओं का दमन
प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में भूमध्यसागर समुद्री डाकुओं के आतंक से ग्रस्त था। ये समुद्री डाकू व्यापारिक जहाजों को लूटते थे और रोम की खाद्यान्न आपूर्ति को बाधित करते थे। 67 ईसा पूर्व में रोमन सीनेट ने पॉम्पी को समुद्री डाकुओं के विरुद्ध असाधारण अधिकार प्रदान किए। उन्होंने अत्यंत सुव्यवस्थित योजना बनाकर पूरे भूमध्यसागर को विभिन्न क्षेत्रों में विभाजित किया और कुछ ही महीनों में समुद्री डाकुओं का लगभग पूर्णतः दमन कर दिया। इस सफलता से रोम का समुद्री व्यापार पुनः सुरक्षित हो गया और उनकी प्रतिष्ठा अभूतपूर्व रूप से बढ़ गई।
मिथ्रिडेटीस षष्ठम पर विजय
समुद्री डाकुओं के दमन के बाद पॉम्पी को पॉन्टस के शक्तिशाली शासक मिथ्रिडेटीस षष्ठम के विरुद्ध अभियान का नेतृत्व सौंपा गया। उन्होंने मिथ्रिडेटीस को पराजित कर तृतीय मिथ्रिडेटीय युद्ध का अंत किया। इस विजय के परिणामस्वरूप रोम का प्रभाव एशिया माइनर में और अधिक सुदृढ़ हुआ तथा अनेक नए प्रदेश रोमन गणराज्य के अधीन आ गए।
पूर्वी अभियानों और रोमन विस्तार में योगदान
मिथ्रिडेटीस की पराजय के बाद पॉम्पी ने सीरिया, लेवांत और यहूदिया (जूडिया) में अभियान चलाए। उन्होंने सीरिया को रोमन प्रांत बनाया तथा 63 ईसा पूर्व में यरूशलेम पर अधिकार कर यहूदिया को भी रोमन प्रभाव क्षेत्र में सम्मिलित कर लिया।
इन अभियानों के फलस्वरूप रोम को अनेक नए प्रांत प्राप्त हुए और पूर्वी भूमध्यसागर में उसकी सर्वोच्चता स्थापित हो गई। पॉम्पी की विजयों ने रोमन गणराज्य के क्षेत्रीय विस्तार में अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
प्रथम त्रिमूर्व का गठन
राजनीतिक प्रभाव को सुदृढ़ बनाने के लिए पॉम्पी ने जूलियस सीज़र और मार्कस लिसिनियस क्रासस के साथ एक अनौपचारिक राजनीतिक-सैन्य गठबंधन बनाया, जिसे इतिहास में प्रथम त्रिमूर्व कहा जाता है। इस गठबंधन को मजबूत बनाने के उद्देश्य से पॉम्पी ने जूलियस सीज़र की पुत्री जूलिया से विवाह किया। कुछ वर्षों तक यह गठबंधन रोमन राजनीति पर प्रभावी रहा और तीनों नेताओं ने मिलकर राज्य के महत्त्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित किया।
पॉम्पी का सीज़र से संघर्ष
54 ईसा पूर्व में जूलिया की मृत्यु और 53 ईसा पूर्व में क्रासस की मृत्यु के बाद प्रथम त्रिमूर्व व्यावहारिक रूप से समाप्त हो गया। इसके बाद पॉम्पी और जूलियस सीज़र के बीच राजनीतिक मतभेद तेजी से बढ़ने लगे। रोमन सीनेट के अधिकांश सदस्य पॉम्पी के पक्ष में थे, जबकि सीज़र को उनकी सेना का समर्थन प्राप्त था। अंततः दोनों के बीच सत्ता के लिए गृहयुद्ध आरंभ हो गया।
पॉम्पी और फार्सलस का युद्ध
48 ईसा पूर्व में फार्सलस के मैदान में पॉम्पी और जूलियस सीज़र की सेनाओं के बीच निर्णायक युद्ध हुआ। यद्यपि पॉम्पी की सेना संख्या में अधिक थी, फिर भी वे प्रारंभ में आक्रमण करने के पक्ष में नहीं थे। उनका विचार था कि सीज़र को स्वयं आक्रमण करने दिया जाए और फिर उसे थका कर पराजित किया जाए।
किंतु उनके अनेक वरिष्ठ सेनानायकों ने तत्काल आक्रमण करने का आग्रह किया। अंततः पॉम्पी ने उनकी सलाह स्वीकार की। युद्ध में सीज़र की उत्कृष्ट रणनीति और अनुभवी सैनिकों के सामने पॉम्पी की सेना पराजित हो गई। इस युद्ध ने रोमन इतिहास की दिशा बदल दी और सीज़र निर्विवाद रूप से सबसे शक्तिशाली नेता बनकर उभरे।
मिस्र में हत्या
फार्सलस की पराजय के बाद पॉम्पी मिस्र के युवा राजा टॉलेमी तेरहवें से शरण की आशा लेकर वहाँ पहुँचे। किंतु मिस्र के शासकों ने सीज़र को प्रसन्न करने के उद्देश्य से विश्वासघात किया। 28 सितंबर 48 ईसा पूर्व को जैसे ही पॉम्पी मिस्र के तट पर उतरे, उनकी हत्या कर दी गई। उनका सिर काटकर जूलियस सीज़र को भेंट स्वरूप भेजा गया।
प्राचीन इतिहासकारों के अनुसार जब सीज़र को पॉम्पी की मुद्रिका और उनका कटा हुआ सिर प्रस्तुत किया गया, तो वे अत्यंत व्यथित हो उठे और उनकी आँखों से आँसू निकल आए। यद्यपि दोनों कट्टर प्रतिद्वंद्वी बन चुके थे, फिर भी सीज़र पॉम्पी की प्रतिभा और पूर्व मित्रता का सम्मान करते थे।
पॉम्पी का ऐतिहासिक मूल्यांकन
ग्नेयस पॉम्पियस मैग्नस रोमन इतिहास के सबसे महान सेनानायकों में से एक थे। उन्होंने अपने साहस, संगठन क्षमता और दूरदर्शी रणनीति के बल पर रोम की सीमाओं का अभूतपूर्व विस्तार किया तथा भूमध्यसागर को रोमन प्रभाव क्षेत्र में परिवर्तित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
समुद्री डाकुओं का दमन, मिथ्रिडेटीस षष्ठम की पराजय, सीरिया और यहूदिया की विजय तथा पूर्वी प्रांतों का पुनर्गठन उनकी प्रमुख उपलब्धियाँ थीं। उन्होंने अपनी योग्यता और परिश्रम के बल पर असाधारण सम्मान और लोकप्रियता प्राप्त की।
यद्यपि अपने जीवन के अंतिम चरण में वे जूलियस सीज़र की रणनीति के सामने पराजित हुए और विश्वासघात का शिकार बनकर मारे गए, फिर भी उनका नाम प्राचीन रोम के महानतम विजेताओं और सेनानायकों में सदैव सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि असाधारण सैन्य प्रतिभा और राजनीतिक सफलता के बावजूद सत्ता संघर्ष और विश्वासघात इतिहास की दिशा बदल सकते हैं।
सम्राट ट्राजन (18 सितंबर 53 ई.–8 अगस्त 117 ई.)
मार्कस उल्पियस ट्राजन, जिन्हें सामान्यतः ट्राजन के नाम से जाना जाता है, प्राचीन रोम के महानतम सम्राटों, सेनानायकों और प्रशासकों में से एक थे। उन्होंने 98 ईस्वी से 117 ईस्वी तक रोमन साम्राज्य पर शासन किया। उनके शासनकाल में रोमन साम्राज्य ने अपने इतिहास का सर्वाधिक क्षेत्रीय विस्तार प्राप्त किया और वह राजनीतिक, सैन्य तथा आर्थिक दृष्टि से अपने चरम वैभव पर पहुँचा।
ट्राजन केवल एक विजेता सम्राट ही नहीं थे, बल्कि न्यायप्रिय शासक, कुशल प्रशासक तथा जनकल्याणकारी नीतियों के समर्थक भी थे। उन्होंने व्यापक सार्वजनिक निर्माण कार्यों, सामाजिक कल्याण योजनाओं और प्रभावी प्रशासन के माध्यम से रोमन साम्राज्य को अभूतपूर्व समृद्धि प्रदान की। उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के सम्मान में रोमन सीनेट ने उन्हें ‘ऑप्टिमस प्रिन्सेप्स’ अर्थात् ‘सर्वश्रेष्ठ शासक’ की उपाधि प्रदान की। वे इतिहास में रोमन साम्राज्य के ‘पाँच श्रेष्ठ सम्राटों’ में दूसरे स्थान पर गिने जाते हैं।
ट्राजन का प्रारंभिक जीवन
ट्राजन का जन्म 18 सितंबर 53 ईस्वी को हिस्पानिया बैटिका (वर्तमान स्पेन) के इटालिका नगर में हुआ था। वे रोमन साम्राज्य के पहले ऐसे सम्राट थे जिनका जन्म इटली के बाहर किसी प्रांत में हुआ था। उनके पिता मार्कस उल्पियस ट्राजनस एक प्रतिष्ठित सेनानायक और उच्च अधिकारी थे, जिनके प्रभाव से ट्राजन को प्रारंभ से ही सैन्य जीवन का प्रशिक्षण प्राप्त हुआ। युवावस्था में उन्होंने रोमन सेना में प्रवेश किया और साम्राज्य की विभिन्न सीमाओं पर सेवा करते हुए अपनी वीरता, अनुशासन और नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। जर्मानिया, सीरिया तथा डेन्यूब सीमा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में कार्य करते हुए उन्होंने अनुभवी सेनानायक के रूप में प्रतिष्ठा अर्जित की।

सम्राट बनने का मार्ग
सम्राट मार्कस कोक्केयस नर्वा का शासन राजनीतिक अस्थिरता और सैन्य असंतोष से घिरा हुआ था। नर्वा के पास कोई उत्तराधिकारी नहीं था और उन्हें साम्राज्य की स्थिरता के लिए एक सक्षम सैन्य नेता की आवश्यकता थी। 97 ईस्वी में नर्वा ने ट्राजन को अपना दत्तक पुत्र और उत्तराधिकारी घोषित किया। 98 ईस्वी में नर्वा की मृत्यु के बाद ट्राजन रोमन सम्राट बने। सेना और सीनेट दोनों का उन्हें पूर्ण समर्थन प्राप्त था, जिसके कारण उनका शासन अत्यंत स्थिर और सफल सिद्ध हुआ।
महान सेनानायक के रूप में ट्राजन
ट्राजन को रोमन इतिहास का सबसे सफल विजेता सम्राट माना जाता है। उनके नेतृत्व में रोमन साम्राज्य ने अपने इतिहास का सबसे बड़ा क्षेत्रीय विस्तार प्राप्त किया। उन्होंने सीमावर्ती क्षेत्रों में अनेक सफल सैन्य अभियान चलाए और रोम की शक्ति को यूरोप, पश्चिमी एशिया तथा मध्य पूर्व तक विस्तारित किया। उनकी विजय-नीति केवल नए प्रदेशों को जीतने तक सीमित नहीं थी, बल्कि विजित क्षेत्रों को प्रभावी प्रशासन के माध्यम से रोमन साम्राज्य में सम्मिलित करना भी उनकी प्रमुख विशेषता थी।
डेशिया की विजय
ट्राजन की सबसे प्रसिद्ध सैन्य उपलब्धियों में डेशिया की विजय सर्वोपरि मानी जाती है। डेशिया (वर्तमान रोमानिया का अधिकांश भाग) का शासक डेसीबालस रोम के लिए लंबे समय से चुनौती बना हुआ था। 101–102 ईस्वी तथा 105–106 ईस्वी के दो अभियानों में ट्राजन ने डेशिया पर निर्णायक विजय प्राप्त की। डेसीबालस ने अंततः आत्महत्या कर ली और डेशिया को रोमन साम्राज्य का एक नया प्रांत बना दिया गया। डेशिया की विजय केवल सैन्य दृष्टि से ही महत्त्वपूर्ण नहीं थी, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत लाभदायक सिद्ध हुई। इस प्रदेश में प्रचुर मात्रा में स्वर्ण एवं रजत की खदानें थीं, जिनसे रोमन राजकोष अत्यधिक समृद्ध हुआ और साम्राज्य की आर्थिक स्थिति पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ बन गई।
अरबिया पेट्राया का विलय
106 ईस्वी में ट्राजन ने नबाटी राज्य को रोमन साम्राज्य में मिला लिया। इस क्षेत्र को संगठित करके अरबिया पेट्राया नामक नया रोमन प्रांत बनाया गया। इस विजय से लाल सागर और अरब क्षेत्र के व्यापारिक मार्गों पर रोम का नियंत्रण स्थापित हो गया, जिससे साम्राज्य की व्यापारिक आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
पार्थियन साम्राज्य के विरुद्ध अभियान
ट्राजन की सबसे महत्त्वाकांक्षी सैन्य योजना पूर्व में स्थित पार्थियन साम्राज्य के विरुद्ध अभियान थी। 114 से 117 ईस्वी के बीच उन्होंने आर्मेनिया, मेसोपोटामिया और पार्थिया के विरुद्ध सफल अभियान चलाए। उन्होंने पहले आर्मेनिया को रोमन साम्राज्य का प्रांत बनाया। इसके बाद उन्होंने मेसोपोटामिया पर अधिकार कर लिया और पार्थियन साम्राज्य की राजधानी क्टेसीफ़ोन पर विजय प्राप्त की। ट्राजन फ़ारस की खाड़ी तक पहुँचने वाले पहले रोमन सम्राट और सेनानायक बने। इस विजय के साथ रोमन साम्राज्य अपने इतिहास के सबसे बड़े भौगोलिक विस्तार पर पहुँच गया। यद्यपि उनके उत्तराधिकारी हैड्रियन ने बाद में मेसोपोटामिया के कुछ क्षेत्रों को छोड़ दिया, फिर भी ट्राजन की विजय रोमन सैन्य इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जाती है।
जनकल्याणकारी और न्यायप्रिय शासक
ट्राजन केवल विजेता सम्राट ही नहीं थे, बल्कि एक आदर्श प्रशासक भी थे। उन्होंने राज्य के निर्धन नागरिकों, विशेषकर अनाथ और गरीब बच्चों के लिए ‘एलिमेंटा’ नामक सामाजिक सहायता योजना को बढ़ावा दिया। इसके अंतर्गत गरीब परिवारों के बच्चों के पालन-पोषण और शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जाती थी। उन्होंने प्रांतीय प्रशासन में सुधार किए, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण लगाया तथा न्यायिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया। उनकी प्रशासनिक नीतियों के कारण पूरे साम्राज्य में शांति, समृद्धि और स्थिरता स्थापित हुई।
ट्राजन के सार्वजनिक निर्माण कार्य
सम्राट ट्राजन ने रोम तथा साम्राज्य के विभिन्न प्रांतों में व्यापक सार्वजनिक निर्माण कार्य कराए, जिनके कारण उनका शासनकाल रोमन स्थापत्य और नगर नियोजन के स्वर्णिम युग के रूप में जाना जाता है। उन्होंने राजधानी रोम को अधिक भव्य, सुव्यवस्थित और आधुनिक बनाने के उद्देश्य से अनेक महत्त्वपूर्ण परियोजनाएँ प्रारम्भ कीं। उनके संरक्षण में निर्मित ट्राजन का फोरम प्राचीन रोम का सबसे विशाल सार्वजनिक परिसर था, जबकि ट्राजन का बाजार विश्व के प्रारम्भिक बहुमंजिला वाणिज्यिक परिसरों में गिना जाता है। इसी प्रकार ट्राजन का स्तंभ डेशिया पर उनकी विजय की स्मृति में स्थापित किया गया, जिस पर उनके सैन्य अभियानों का अत्यंत सूक्ष्म और कलात्मक चित्रण उत्कीर्ण है।
ट्राजन ने केवल स्मारकों के निर्माण तक ही अपने कार्यों को सीमित नहीं रखा, बल्कि साम्राज्य के विकास के लिए अनेक सड़कें, पुल, जलसेतु (एक्वाडक्ट), बंदरगाह तथा सार्वजनिक भवन भी बनवाए। इन परियोजनाओं से व्यापार, परिवहन, जलापूर्ति और प्रशासनिक व्यवस्था को उल्लेखनीय लाभ मिला। उनके निर्माण कार्यों ने न केवल रोम की आर्थिक समृद्धि और नागरिक सुविधाओं में वृद्धि की, बल्कि रोमन स्थापत्य कला को भी नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। इसी कारण ट्राजन को प्राचीन रोम के महान विजेता के साथ-साथ एक दूरदर्शी निर्माता और लोकहितैषी शासक के रूप में भी स्मरण किया जाता है।
ट्राजन का व्यक्तित्व
ट्राजन साहसी, न्यायप्रिय, सरल तथा अनुशासनप्रिय शासक थे। वे अपने सैनिकों के बीच रहना पसंद करते थे और युद्ध अभियानों में स्वयं सेना का नेतृत्व करते थे। उनकी विनम्रता और व्यवहार-कुशलता के कारण सेना, सीनेट और सामान्य जनता सभी उनका सम्मान करते थे। उनका शासनकाल रोमन इतिहास के सबसे शांतिपूर्ण और समृद्ध कालों में गिना जाता है।
ट्राजन की मृत्यु
117 ईस्वी में पार्थिया अभियान से लौटते समय ट्राजन अस्वस्थ हो गए। रोम वापस लौटने के दौरान एशिया माइनर के सेलिनुस नगर में उन्हें आघात (स्ट्रोक) हुआ और 8 अगस्त 117 ईस्वी को उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद रोमन सीनेट ने उन्हें देवतुल्य (Deified) घोषित किया, जो केवल महान सम्राटों को दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान था। उनकी अस्थियों को रोम लाकर ट्राजन के स्तंभ के आधार में स्थापित किया गया, जहाँ आज भी उनका स्मारक रोमन वैभव का प्रतीक माना जाता है। उनके दत्तक पुत्र हैड्रियन ने उनके उत्तराधिकारी के रूप में सिंहासन सँभाला।
ट्राजन का ऐतिहासिक मूल्यांकन
ट्राजन को रोमन इतिहास के सर्वश्रेष्ठ सम्राटों में स्थान प्राप्त है। उन्होंने अपनी अद्वितीय सैन्य प्रतिभा, कुशल प्रशासन और जनकल्याणकारी नीतियों के माध्यम से रोमन साम्राज्य को उसके सर्वोच्च वैभव तक पहुँचाया। उनके शासनकाल में रोम ने अपने इतिहास का सबसे बड़ा क्षेत्रीय विस्तार प्राप्त किया और आर्थिक समृद्धि के नए आयाम स्थापित किए।
डेशिया, अरबिया पेट्राया, आर्मेनिया और मेसोपोटामिया की विजय ने उन्हें विश्व इतिहास के महान विजेता सम्राटों की श्रेणी में स्थापित किया, जबकि उनके सार्वजनिक निर्माण कार्य, सामाजिक कल्याण योजनाएँ और न्यायप्रिय शासन उन्हें एक आदर्श प्रशासक के रूप में अमर बनाते हैं। इसी कारण रोमन इतिहास में ट्राजन का नाम महान सेनानायक, दूरदर्शी शासक और उत्कृष्ट प्रशासक के रूप में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है।
लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला फ़ेलिक्स (138 ई. पू.–78 ई. पू.)
लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला फ़ेलिक्स, जिन्हें सामान्यतः सुल्ला के नाम से जाना जाता है, प्राचीन रोम के सबसे प्रतिभाशाली सेनानायकों, राजनीतिज्ञों और राजनेताओं में से एक थे। वे रोमन गणराज्य के अंतिम चरण के ऐसे प्रभावशाली व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी असाधारण सैन्य क्षमता, राजनीतिक दृढ़ता और कठोर निर्णयों के माध्यम से रोम के इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला। वे जितने महान सेनापति थे, उतने ही विवादास्पद शासक भी थे। सुल्ला को विशेष रूप से रोमन गणराज्य में तानाशाह (डिक्टेटर) के पद को पुनर्जीवित करने, अपनी सेना के साथ रोम पर चढ़ाई करने तथा व्यापक संवैधानिक सुधार लागू करने के लिए जाना जाता है। वे रोमन इतिहास के उन विरले व्यक्तियों में थे जिन्होंने दो बार कौंसल का पद सँभाला और बाद में स्वयं को तानाशाह घोषित कर गणराज्य की राजनीतिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन किए।

सुल्ला का प्रारंभिक जीवन
सुल्ला का जन्म 138 ईसा पूर्व रोम के प्रतिष्ठित कॉर्नेलियस कुल में हुआ था। उनका परिवार प्राचीन कुलीन (पैट्रिशियन) वर्ग से संबंधित था, किंतु उनके जन्म के समय उसकी आर्थिक स्थिति अत्यधिक सुदृढ़ नहीं थी। युवावस्था में उन्होंने साहित्य, दर्शन और सैन्य शिक्षा प्राप्त की। वे बुद्धिमान, महत्वाकांक्षी तथा असाधारण नेतृत्व क्षमता वाले व्यक्ति थे। प्रारंभ में उन्होंने सेना में एक अधिकारी के रूप में सेवा की और शीघ्र ही अपनी युद्धकुशलता के कारण वरिष्ठ अधिकारियों का विश्वास अर्जित कर लिया। सुल्ला का सैन्य जीवन जुगुर्था युद्ध के दौरान विशेष रूप से चर्चित हुआ। उस समय वे महान सेनानायक गायस मारियस के अधीन कार्य कर रहे थे। युद्ध के अंतिम चरण में सुल्ला ने कूटनीति और सैन्य कौशल का परिचय देते हुए न्यूमिडिया के राजा जुगुर्था को पकड़वाने में निर्णायक भूमिका निभाई। यद्यपि इस विजय का अधिकांश श्रेय मारियस को मिला, फिर भी रोम के अनेक लोगों ने माना कि जुगुर्था की गिरफ्तारी वास्तव में सुल्ला की रणनीति का परिणाम थी। यही घटना आगे चलकर मारियस और सुल्ला के बीच गहरी प्रतिद्वंद्विता का कारण बनी।
सुल्ला की सोशल युद्ध में भूमिका
91 से 88 ईसा पूर्व के बीच रोम और उसके इतालवी सहयोगी राज्यों के बीच सोशल युद्ध हुआ। इस युद्ध का मुख्य कारण रोमन नागरिकता की माँग थी। सुल्ला ने इस युद्ध में असाधारण सैन्य नेतृत्व का परिचय दिया। उन्होंने अनेक विद्रोही सेनाओं को पराजित किया और युद्ध को रोम के पक्ष में समाप्त कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस युद्ध में उनकी अद्वितीय वीरता और नेतृत्व के लिए उन्हें कोरोना ग्रामिनिया अथवा ग्रास क्राउन से सम्मानित किया गया।
कोरोना ग्रामिनिया : रोम का सर्वोच्च सैन्य सम्मान
कोरोना ग्रामिनिया प्राचीन रोम का सर्वोच्च सैन्य सम्मान था। यह किसी सेनानायक को तब प्रदान किया जाता था जब वह युद्धभूमि में किसी रोमन सेना या लीजन को पूर्ण विनाश से बचा लेता था। अन्य सभी सैन्य सम्मानों के विपरीत यह पुरस्कार सम्राट या सीनेट द्वारा नहीं, बल्कि उन सैनिकों द्वारा प्रदान किया जाता था जिनका जीवन संबंधित सेनानायक ने बचाया होता था। यही कारण है कि रोमन इतिहास में यह सम्मान बहुत कम व्यक्तियों को प्राप्त हुआ। सुल्ला उन गिने-चुने सेनानायकों में थे जिन्हें यह सर्वोच्च सम्मान मिला।
मिथ्रिडेटीस के विरुद्ध अभियान
सोशल युद्ध के बाद सुल्ला को एशिया माइनर में पॉन्टस के राजा मिथ्रिडेटीस षष्ठम के विरुद्ध अभियान का नेतृत्व सौंपा गया। उन्होंने यूनान में मिथ्रिडेटीस के सेनापतियों को पराजित किया तथा 86 ईसा पूर्व में एथेंस का घेराव कर उस पर अधिकार कर लिया। इसके बाद चेरोनिया और ऑर्कोमेनस के युद्धों में उन्होंने मिथ्रिडेटीस की सेनाओं को निर्णायक रूप से परास्त किया। इन विजयों के परिणामस्वरूप रोमन प्रभुत्व पुनः स्थापित हुआ और पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में रोम की स्थिति मजबूत हुई।
रोम पर प्रथम चढ़ाई
जब सुल्ला पूर्वी अभियान की तैयारी कर रहे थे, तब रोमन राजनीति में उनके प्रतिद्वंद्वी गायस मारियस और उनके समर्थकों ने मिथ्रिडेटीस के विरुद्ध अभियान का नेतृत्व सुल्ला से छीनकर मारियस को सौंपने का प्रयास किया। इस निर्णय से क्रोधित होकर सुल्ला ने अभूतपूर्व कदम उठाया। उन्होंने अपनी सेना के साथ 88 ईसा पूर्व में रोम पर चढ़ाई कर दी।
रोमन इतिहास में यह पहली बार था जब किसी रोमन सेनानायक ने अपनी ही सेना के साथ राजधानी पर आक्रमण किया। उन्होंने मारियस के समर्थकों को पराजित कर नगर पर अधिकार कर लिया। इस घटना ने रोमन राजनीति में सेना के हस्तक्षेप की परंपरा की शुरुआत कर दी, जिसका परिणाम आगे चलकर अनेक गृहयुद्धों के रूप में सामने आया।
गृहयुद्ध और दूसरी बार रोम पर अधिकार
पूर्वी अभियान से लौटने के बाद सुल्ला ने 83 ईसा पूर्व में पुनः इटली में प्रवेश किया। उस समय मारियस की मृत्यु हो चुकी थी, किंतु उनके समर्थक अभी भी सत्ता में थे। सुल्ला ने गायस कार्बो, युवा मारियस तथा उनके सहयोगियों को एक-एक कर पराजित किया। 82 ईसा पूर्व में कोलाइन द्वार के निकट उन्होंने साम्नाइट सेना और अपने राजनीतिक विरोधियों को निर्णायक रूप से हराया। इस विजय के साथ उन्होंने पूरे रोमन गणराज्य पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।
सुल्ला का तानाशाह के रूप में शासन
सत्ता प्राप्त करने के बाद सुल्ला को तानाशाह (डिक्टेटर) नियुक्त किया गया। यद्यपि रोमन गणराज्य में तानाशाह का पद पहले भी अस्तित्व में था, किंतु वह केवल सीमित अवधि और विशेष परिस्थितियों के लिए होता था। सुल्ला ने इस पद को पुनर्जीवित किया और व्यापक संवैधानिक सुधार लागू किए। उन्होंने सीनेट की शक्तियों में वृद्धि की, जनप्रतिनिधियों (ट्रिब्यून) के अधिकार सीमित किए तथा न्यायिक व्यवस्था का पुनर्गठन किया। उन्होंने अपने विरोधियों के विरुद्ध प्रोस्क्रिप्शन्स नामक सूची जारी की, जिसमें शामिल व्यक्तियों को राज्य का शत्रु घोषित कर उनकी हत्या और संपत्ति जब्त करने की अनुमति दी गई। इस नीति के कारण हजारों लोग मारे गए और रोमन राजनीति में भय तथा हिंसा का वातावरण उत्पन्न हो गया।
सुल्ला का व्यक्तित्व
सुल्ला अत्यंत साहसी, बुद्धिमान और उत्कृष्ट सैन्य रणनीतिकार थे। युद्धभूमि में उनकी योजना, अनुशासन और नेतृत्व क्षमता असाधारण थी। वे अपने निर्णयों में कठोर तथा राजनीतिक मामलों में अत्यंत व्यावहारिक थे। उनकी सफलता का एक कारण उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और कठिन परिस्थितियों में भी शांत रहकर निर्णय लेने की क्षमता थी। दूसरी ओर, उनके विरोधी उन्हें निर्दयी, प्रतिशोधी और सत्ता-लोलुप व्यक्ति मानते थे।
सुल्ला का त्यागपत्र और मृत्यु
रोमन इतिहास में सुल्ला की एक विशेषता यह भी थी कि उन्होंने स्वेच्छा से तानाशाह का पद छोड़ दिया। 79 ईसा पूर्व में उन्होंने सार्वजनिक जीवन से संन्यास लेकर निजी जीवन व्यतीत करना आरंभ किया। 78 ईसा पूर्व में उनका निधन हो गया। अपनी मृत्यु तक वे रोम के सबसे प्रभावशाली तथा विवादास्पद राजनीतिक व्यक्तियों में गिने जाते रहे।
सुल्ला का ऐतिहासिक मूल्यांकन
लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला निस्संदेह प्राचीन रोम के महानतम सेनानायकों में से एक थे। जुगुर्था युद्ध, सोशल युद्ध, मिथ्रिडेटीस के विरुद्ध अभियान तथा रोमन गृहयुद्धों में उनकी विजयों ने उनकी असाधारण सैन्य प्रतिभा को सिद्ध किया। उन्हें प्राप्त कोरोना ग्रामिनिया उनके अद्वितीय साहस और नेतृत्व का प्रमाण है।
किंतु उनका ऐतिहासिक महत्त्व केवल सैन्य सफलताओं तक सीमित नहीं है। रोम पर सेना के साथ चढ़ाई करना, तानाशाही शासन की पुनर्स्थापना तथा राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध हिंसक दमन जैसी घटनाओं ने रोमन गणराज्य की पारंपरिक व्यवस्था को गम्भीर रूप से कमजोर कर दिया। इतिहासकारों का मत है कि सुल्ला द्वारा स्थापित राजनीतिक परंपराओं ने आगे चलकर पॉम्पी, जूलियस सीज़र और ऑक्टेवियन जैसे सेनानायकों के उदय का मार्ग प्रशस्त किया तथा अंततः रोमन गणराज्य के पतन और रोमन साम्राज्य की स्थापना में अप्रत्यक्ष रूप से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रकार सुल्ला को एक ओर अद्वितीय सैन्य प्रतिभा और सफल सेनानायक के रूप में स्मरण किया जाता है, तो दूसरी ओर वे ऐसे शासक भी माने जाते हैं जिनकी राजनीतिक नीतियों ने रोमन गणराज्य के इतिहास को स्थायी रूप से बदल दिया।
लूसियस डोमिटियस ऑरेलियानुस ऑगस्टस (214 ई.–275 ई.)
लूसियस डोमिटियस ऑरेलियानुस ऑगस्टस, जिन्हें सामान्यतः ऑरेलियन के नाम से जाना जाता है, प्राचीन रोम के सबसे महान योद्धा सम्राटों और सफल सेनानायकों में से एक थे। उन्होंने 270 ईस्वी से 275 ईस्वी तक रोमन साम्राज्य पर शासन किया। यद्यपि उनका शासनकाल केवल पाँच वर्षों का था, फिर भी इस अल्प अवधि में उन्होंने जितनी सैन्य सफलताएँ प्राप्त कीं, उतनी उपलब्धियाँ बहुत कम रोमन सम्राटों को प्राप्त हुईं।
जब ऑरेलियन सत्ता में आए, उस समय रोमन साम्राज्य राजनीतिक अराजकता, गृहयुद्धों, आर्थिक संकट, महामारी और निरंतर बर्बर आक्रमणों से जूझ रहा था। साम्राज्य तीन भागों में विभाजित हो चुका था और उसके अस्तित्व पर गंभीर संकट मंडरा रहा था। अपनी अद्वितीय सैन्य प्रतिभा, साहस और दृढ़ नेतृत्व के बल पर ऑरेलियन ने न केवल इस संकट से साम्राज्य को बाहर निकाला, बल्कि उसे पुनः एकजुट भी किया। इसी महान उपलब्धि के कारण उन्हें ‘रेस्टिट्यूटर ऑर्बिस’ अर्थात् ‘विश्व का पुनर्स्थापक’ या ‘साम्राज्य का पुनर्निर्माता’ की सम्मानसूचक उपाधि प्रदान की गई।
ऑरेलियन का प्रारंभिक जीवन
ऑरेलियन का जन्म लगभग 214 ईस्वी में डेन्यूब सीमा के निकट एक साधारण परिवार में हुआ था। अधिकांश प्राचीन स्रोतों के अनुसार उनका परिवार आर्थिक दृष्टि से समृद्ध नहीं था और उनका प्रारंभिक जीवन अत्यंत सामान्य परिस्थितियों में बीता। उन्होंने युवावस्था में रोमन सेना में प्रवेश किया और अपने साहस, अनुशासन तथा असाधारण युद्ध-कौशल के कारण शीघ्र ही उच्च सैन्य पदों तक पहुँच गए। सीमावर्ती क्षेत्रों में लंबे समय तक सेवा करने के कारण उन्हें बर्बर जनजातियों की युद्ध-शैली तथा सीमाओं की सुरक्षा का व्यापक अनुभव प्राप्त हुआ।
संकटग्रस्त साम्राज्य का उत्तराधिकार
270 ईस्वी में सम्राट क्लॉडियस द्वितीय गोथिकस की मृत्यु के बाद ऑरेलियन रोमन सम्राट बने। उस समय रोमन साम्राज्य अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर, जिसे ‘तीसरी शताब्दी का संकट’ (क्राइसिस ऑफ़ द थर्ड सेंचुरी) कहा जाता है, से गुजर रहा था। साम्राज्य तीन भागों में विभाजित था—पश्चिम में गैलिक साम्राज्य स्वतंत्र हो चुका था। पूर्व में पाल्माइरीन साम्राज्य ने रोम से अलग होकर अपना स्वतंत्र शासन स्थापित कर लिया था। शेष रोमन साम्राज्य पर निरंतर गोथ, वैंडल, अलामानी, जुथुंगी, कार्पी और अन्य बर्बर जनजातियों के आक्रमण हो रहे थे। ऐसी परिस्थितियों में ऑरेलियन ने सत्ता संभाली और बिना समय गँवाए सैन्य अभियानों की शुरुआत की।
बर्बर जनजातियों पर विजय
ऑरेलियन का पहला उद्देश्य रोमन सीमाओं की रक्षा करना था। उन्होंने लगातार सैन्य अभियान चलाकर अनेक बर्बर जनजातियों को पराजित किया। सबसे पहले उन्होंने अलामानी के विरुद्ध निर्णायक युद्ध लड़ा और उन्हें इटली से बाहर खदेड़ दिया। इसके बाद उन्होंने क्रमशः गोथ, वैंडल, जुथुंगी, सार्माटी तथा कार्पी जैसी जनजातियों को पराजित किया। इन विजयों के परिणामस्वरूप डेन्यूब तथा उत्तरी सीमाएँ पुनः सुरक्षित हुईं और रोम पर मंडरा रहा तत्कालीन बाहरी खतरा काफी हद तक समाप्त हो गया।
पाल्माइरीन साम्राज्य की विजय
ऑरेलियन की सबसे महत्त्वपूर्ण सैन्य उपलब्धियों में पाल्माइरीन साम्राज्य की पुनर्विजय प्रमुख थी। तीसरी शताब्दी के संकट के दौरान पूर्वी प्रांतों पर रानी ज़ेनोबिया ने नियंत्रण स्थापित कर लिया था और पाल्माइरा (वर्तमान सीरिया) को स्वतंत्र साम्राज्य घोषित कर दिया था। उनके अधीन मिस्र, सीरिया तथा एशिया माइनर के अनेक प्रदेश आ गए थे। 272–273 ईस्वी के अभियानों में ऑरेलियन ने एशिया माइनर, सीरिया और मिस्र पर पुनः अधिकार कर लिया। इमेसा के युद्ध में उन्होंने ज़ेनोबिया की सेना को निर्णायक रूप से पराजित किया। अंततः पाल्माइरा नगर भी रोमन सेना के अधीन आ गया और रानी ज़ेनोबिया बंदी बना ली गईं। इस विजय के साथ रोमन साम्राज्य के सभी पूर्वी प्रांत पुनः रोम के अधीन आ गए।
गैलिक साम्राज्य का पुनः विलय
पूर्वी क्षेत्रों को सुरक्षित करने के बाद ऑरेलियन ने अपना ध्यान पश्चिम की ओर केंद्रित किया। उस समय गॉल, ब्रिटेन तथा हिस्पानिया के कुछ भागों में गैलिक साम्राज्य स्वतंत्र रूप से शासन कर रहा था। 274 ईस्वी में ऑरेलियन ने शालों के युद्ध में गैलिक सम्राट टेट्रिकस प्रथम को पराजित कर दिया। इस विजय के बाद गैलिक साम्राज्य का अंत हो गया और रोमन साम्राज्य एक बार फिर पूर्ण रूप से एकीकृत हो गया।
रोमन साम्राज्य का पुनः एकीकरण
ऑरेलियन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने कुछ ही वर्षों में उस विशाल साम्राज्य को पुनः एक कर दिया, जो अनेक भागों में विभाजित हो चुका था। उन्होंने पूर्व और पश्चिम दोनों के विद्रोही राज्यों को समाप्त किया, सीमाओं को सुरक्षित बनाया तथा केंद्रीय सत्ता को पुनः स्थापित किया। यदि ऑरेलियन समय पर यह कार्य न कर पाते, तो संभवतः रोमन साम्राज्य स्थायी रूप से टूट जाता। इसी महान कार्य के लिए उन्हें ‘रेस्टिट्यूटर ऑर्बिस’ (विश्व का पुनर्स्थापक) की उपाधि प्रदान की गई।
ऑरेलियन के प्रशासनिक और आर्थिक सुधार
ऑरेलियन केवल महान सेनानायक ही नहीं, बल्कि प्रभावशाली प्रशासक भी थे। उन्होंने साम्राज्य की मुद्रा प्रणाली में सुधार करने का प्रयास किया तथा प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक सुदृढ़ बनाया। उन्होंने रोम नगर की सुरक्षा के लिए विशाल ऑरेलियन प्राचीर का निर्माण प्रारंभ कराया। लगभग 19 किलोमीटर लंबी यह विशाल रक्षा-दीवार उस समय की सबसे महत्त्वपूर्ण सैन्य निर्माण परियोजनाओं में से एक थी। इसने आने वाली कई शताब्दियों तक रोम की रक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने सोल इन्विक्टस (अजेय सूर्य) के राज्य-पूजा पंथ को भी प्रोत्साहित किया, जिससे पूरे साम्राज्य में धार्मिक एकता स्थापित करने का प्रयास किया गया।
ऑरेलियन का व्यक्तित्व
ऑरेलियन अत्यंत अनुशासनप्रिय, कठोर, परिश्रमी और साहसी शासक थे। वे स्वयं युद्धभूमि में सैनिकों का नेतृत्व करते थे और कठिन परिस्थितियों में भी निर्णायक निर्णय लेने के लिए प्रसिद्ध थे। उनका सैन्य जीवन इस बात का उदाहरण है कि साधारण परिवार में जन्म लेने वाला व्यक्ति अपनी प्रतिभा, परिश्रम और साहस के बल पर विश्व के सबसे बड़े साम्राज्य का शासक बन सकता है।
ऑरेलियन की मृत्यु
275 ईस्वी में ऑरेलियन सासानी (सस्सानिद) साम्राज्य के विरुद्ध एक नए अभियान की तैयारी कर रहे थे। वे एशिया माइनर की ओर प्रस्थान कर चुके थे और थ्रेस में एशिया माइनर जाने के लिए उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे। इसी दौरान उनके निजी सचिव द्वारा फैलाए गए षड्यंत्र के कारण कुछ अधिकारियों को यह विश्वास हो गया कि सम्राट उन्हें दंडित करने वाले हैं। भय और भ्रम की स्थिति में उन्होंने षड्यंत्र रचकर ऑरेलियन की हत्या कर दी।
इस प्रकार 275 ईस्वी में रोमन इतिहास के सबसे सफल योद्धा सम्राटों में से एक का जीवन विश्वासघात के कारण समाप्त हो गया।
ऑरेलियन की स्मृति
ऑरेलियन की स्मृति आज भी अनेक रूपों में जीवित है। फ्रांस का प्रसिद्ध नगर ऑर्लियॉं अपने प्राचीन नाम से विकसित हुआ है, जिसका नामकरण ऑरेलियन के सम्मान में किया गया था। इसके अतिरिक्त, रोम की ऑरेलियन प्राचीर आज भी उनके महान निर्माण कार्यों और सैन्य दूरदर्शिता की साक्षी है।
ऑरेलियन का ऐतिहासिक मूल्यांकन
ऑरेलियन को रोमन इतिहास के सबसे महान संकटमोचक सम्राटों में स्थान प्राप्त है। उन्होंने केवल पाँच वर्षों के शासनकाल में बर्बर जनजातियों को पराजित किया, पाल्माइरीन और गैलिक साम्राज्यों का अंत किया तथा रोमन साम्राज्य को पुनः एकजुट कर दिया। उनकी विजयों ने तीसरी शताब्दी के भीषण संकट को समाप्त करने में निर्णायक भूमिका निभाई और रोमन साम्राज्य को विघटन से बचा लिया। इतिहासकारों का मत है कि यदि ऑरेलियन जैसा सक्षम सेनानायक उस समय रोम को न मिला होता, तो संभवतः रोमन साम्राज्य तीसरी शताब्दी में ही समाप्त हो जाता। उनकी सैन्य प्रतिभा, दृढ़ नेतृत्व, प्रशासनिक सुधार और साम्राज्य के पुनर्एकीकरण के कारण उन्हें प्राचीन रोम के सर्वश्रेष्ठ सम्राटों और महानतम सेनानायकों में अत्यंत सम्मान के साथ स्मरण किया जाता है।
सम्राट कॉन्स्टेंटाइन महान महान (27 फ़रवरी 272 ई.–22 मई 337 ई.)
फ्लावियस वैलेरियस कॉन्स्टैन्टिनस, जिन्हें इतिहास में कॉन्स्टेंटाइन महान प्रथम अथवा कॉन्स्टेंटाइन महान महान के नाम से जाना जाता है, प्राचीन रोम के महानतम सम्राटों, सेनानायकों और प्रशासकों में से एक थे। उन्होंने 306 ईस्वी से 337 ईस्वी तक रोमन साम्राज्य पर शासन किया। ऑगस्टस के बाद वे सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले प्रमुख रोमन सम्राटों में गिने जाते हैं। लगभग 31 वर्षों तक चले उनके शासनकाल ने रोमन इतिहास की दिशा ही बदल दी। कॉन्स्टेंटाइन महान न केवल एक सफल विजेता और कुशल सेनानायक थे, बल्कि वे प्रशासनिक सुधारों, सैन्य पुनर्गठन, नई राजधानी की स्थापना तथा ईसाई धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान करने के लिए भी प्रसिद्ध हैं। उनके शासनकाल में रोमन साम्राज्य राजनीतिक रूप से पुनः एकीकृत हुआ, प्रशासन अधिक सुदृढ़ बना और ईसाई धर्म को पहली बार वैधानिक मान्यता प्राप्त हुई। इसी कारण उन्हें विश्व इतिहास के सबसे प्रभावशाली शासकों में गिना जाता है।
कॉन्स्टेंटाइन महान का प्रारंभिक जीवन
कॉन्स्टेंटाइन महान का जन्म 27 फ़रवरी 272 ईस्वी को नैसस नगर में हुआ था, जो वर्तमान सर्बिया में स्थित है। उनके पिता कॉन्स्टैन्टियस क्लोरस रोमन साम्राज्य के वरिष्ठ सेनानायक और बाद में पश्चिमी रोमन सम्राट बने। उनकी माता हेलेना अत्यंत धार्मिक और प्रभावशाली महिला थीं, जिन्हें बाद में ईसाई परंपरा में संत का दर्जा दिया गया। कॉन्स्टेंटाइन महान ने युवावस्था में सम्राट डायोक्लेटियन और गैलेरियस के दरबार में रहकर सैन्य और प्रशासनिक प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्होंने डेन्यूब तथा पूर्वी सीमाओं पर अनेक अभियानों में भाग लिया और कम आयु में ही एक कुशल सैनिक तथा सेनानायक के रूप में प्रसिद्ध हो गए।

सम्राट बनने का संघर्ष
306 ईस्वी में उनके पिता कॉन्स्टैन्टियस क्लोरस की मृत्यु इंग्लैंड के एबोराकम (वर्तमान यॉर्क) में हुई। इसके तुरंत बाद रोमन सेना ने कॉन्स्टेंटाइन महान को सम्राट घोषित कर दिया। किंतु उस समय रोमन साम्राज्य में अनेक शासक सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे थे। अगले लगभग अठारह वर्षों तक कॉन्स्टेंटाइन महान को अपने प्रतिद्वंद्वियों, विशेषकर मैक्सेंटियस और लिसिनियस के विरुद्ध कई गृहयुद्ध लड़ने पड़े।
मिल्वियन पुल का युद्ध
312 ईस्वी में मिल्वियन पुल का युद्ध कॉन्स्टेंटाइन महान के जीवन का सबसे निर्णायक संघर्ष सिद्ध हुआ। इस युद्ध में उन्होंने मैक्सेंटियस को पराजित कर पश्चिमी रोमन साम्राज्य पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। ईसाई परंपरा के अनुसार युद्ध से पूर्व उन्हें आकाश में क्रूस का चिन्ह दिखाई दिया तथा यह संदेश प्राप्त हुआ—‘इस चिन्ह के द्वारा विजय प्राप्त करो’ (इन होक सिग्नो विंकेस)। इसके बाद उन्होंने अपने सैनिकों के ढालों पर ईसाई प्रतीक अंकित करवाए और युद्ध में विजय प्राप्त की। यह घटना ईसाई इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक मानी जाती है।
संपूर्ण रोमन साम्राज्य का एकमात्र शासक
313 ईस्वी में कॉन्स्टेंटाइन महान और लिसिनियस ने मिलकर मिलान की उद्घोषणा जारी की, जिसके द्वारा रोमन साम्राज्य में सभी धर्मों, विशेषकर ईसाई धर्म, को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की गई। किंतु दोनों शासकों के बीच शीघ्र ही संघर्ष आरंभ हो गया। अनेक युद्धों के बाद 324 ईस्वी में कॉन्स्टेंटाइन महान ने लिसिनियस को पराजित कर दिया और पूरे रोमन साम्राज्य—पूर्वी तथा पश्चिमी दोनों भागों के एकमात्र सम्राट बन गए। इस प्रकार लगभग चार दशकों के बाद संपूर्ण रोमन साम्राज्य पुनः एक शासक के अधीन आ गया।
कॉन्स्टेंटाइन महान की सेनानायक के रूप में उपलब्धियाँ
कॉन्स्टेंटाइन महान केवल सफल राजनीतिज्ञ ही नहीं, बल्कि उत्कृष्ट सेनानायक भी थे। उन्होंने रोमन सीमाओं पर लगातार अभियान चलाकर अनेक बर्बर जनजातियों को पराजित किया। उन्होंने फ्रैंक, अलामानी, गोथ तथा सार्माटी जैसी शक्तिशाली जनजातियों के विरुद्ध सफल सैन्य अभियान चलाए। इन विजयों के परिणामस्वरूप राइन और डेन्यूब की सीमाएँ पुनः सुरक्षित हुईं तथा साम्राज्य की उत्तरी रक्षा सुदृढ़ हुई। उनकी सैन्य सफलताओं ने रोमन साम्राज्य को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रखा और राजनीतिक स्थिरता स्थापित की।
रोमन सेना का पुनर्गठन
कॉन्स्टेंटाइन महान ने रोमन सेना में महत्त्वपूर्ण सुधार किए। उन्होंने सेना को दो प्रमुख भागों में विभाजित किया—पहला चलायमान क्षेत्रीय सेना, जो साम्राज्य के किसी भी भाग में शीघ्र पहुँचकर विद्रोहों तथा बाहरी आक्रमणों का सामना कर सके और दूसरी सीमांत छावनी सेना, जिसका कार्य सीमाओं की स्थायी रक्षा करना था। इस नई व्यवस्था ने रोमन सेना को अधिक प्रभावी, लचीला और संगठित बनाया। यह सैन्य प्रणाली आने वाली कई शताब्दियों तक पूर्वी रोमन (बीजान्टिन) साम्राज्य की शक्ति का आधार बनी रही।
कॉन्स्टैन्टिनोपल की स्थापना
कॉन्स्टेंटाइन महान की सबसे महान उपलब्धियों में से एक नई राजधानी की स्थापना थी। उन्होंने प्राचीन यूनानी नगर बाइजेंटियम का पुनर्निर्माण कर उसे नई राजधानी बनाया और अपने नाम पर उसका नाम कॉन्स्टैन्टिनोपल रखा। 330 ईस्वी में यह नगर आधिकारिक रूप से रोमन साम्राज्य की नई राजधानी बना। अपनी उत्कृष्ट भौगोलिक स्थिति, विशाल किलाबंदी, व्यापारिक मार्गों और प्रशासनिक सुविधाओं के कारण कॉन्स्टैन्टिनोपल अगले एक हजार वर्षों तक पूर्वी रोमन (बीजान्टिन) साम्राज्य की राजधानी बना रहा।

ईसाई धर्म के संरक्षण में योगदान
कॉन्स्टेंटाइन महान का नाम ईसाई धर्म के इतिहास में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। यद्यपि ईसाई धर्म को कानूनी मान्यता 313 ईस्वी की मिलान उद्घोषणा के माध्यम से मिली, फिर भी कॉन्स्टेंटाइन महान पहले रोमन सम्राट थे जिन्होंने ईसाई धर्म को खुला संरक्षण प्रदान किया। उन्होंने ईसाइयों पर होने वाले अत्याचारों को समाप्त किया और चर्चों के निर्माण के लिए राजकीय सहायता उपलब्ध कराई। 325 ईस्वी में उन्होंने नाइसिया की प्रथम महासभा का आयोजन कराया, जिसमें ईसाई धर्म के मूल सिद्धांतों को व्यवस्थित किया गया। यह सभा ईसाई इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण धार्मिक परिषदों में से एक मानी जाती है।
चर्च ऑफ द होली सेपल्कर का निर्माण
कॉन्स्टेंटाइन महान के आदेश पर यरूशलेम में चर्च ऑफ द होली सेपल्कर का निर्माण कराया गया। ईसाई परंपरा के अनुसार यही वह स्थान है जहाँ ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया, दफनाया गया और पुनर्जीवित हुए। यह चर्च आज भी संपूर्ण ईसाई जगत के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में से एक माना जाता है।
कॉन्स्टेंटाइन महान के प्रशासनिक सुधार
कॉन्स्टेंटाइन महान ने प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक संगठित बनाया। उन्होंने प्रांतों का पुनर्गठन किया, कर-व्यवस्था में सुधार किए तथा केंद्रीय शासन को सुदृढ़ किया। उन्होंने स्वर्ण मुद्रा ‘सोलिडस’ का प्रचलन प्रारंभ किया, जो कई शताब्दियों तक यूरोप और भूमध्यसागरीय क्षेत्र की सबसे स्थिर मुद्राओं में से एक बनी रही।
कॉन्स्टेंटाइन महान का अंतिम अभियान और मृत्यु
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में कॉन्स्टेंटाइन महान पूर्वी सीमा पर सासानी (सस्सानिद) फ़ारसी साम्राज्य के विरुद्ध एक विशाल सैन्य अभियान की तैयारी कर रहे थे। उनका उद्देश्य पूर्वी प्रांतों पर होने वाले फ़ारसी आक्रमणों का स्थायी समाधान करना था। किंतु अभियान प्रारंभ होने से पहले ही वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। 22 मई 337 ईस्वी को निकोमीडिया के निकट उनका निधन हो गया। मृत्यु से कुछ समय पूर्व उन्होंने ईसाई परंपरा के अनुसार बपतिस्मा ग्रहण किया। उनके पश्चात उनके पुत्रों ने रोमन साम्राज्य का शासन सँभाला।
कॉन्स्टेंटाइन महान का ऐतिहासिक मूल्यांकन
कॉन्स्टेंटाइन महान महान प्राचीन विश्व के सबसे प्रभावशाली सम्राटों में गिने जाते हैं। उन्होंने गृहयुद्धों का अंत कर संपूर्ण रोमन साम्राज्य को पुनः एकीकृत किया, सेना और प्रशासन में व्यापक सुधार किए तथा नई राजधानी कॉन्स्टैन्टिनोपल की स्थापना कर साम्राज्य को नई दिशा प्रदान की। ईसाई धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान करना, मिलान उद्घोषणा जारी करना, नाइसिया की महासभा आयोजित करना तथा चर्च ऑफ द होली सेपल्कर का निर्माण कराना उनकी सबसे स्थायी उपलब्धियों में सम्मिलित है। उनकी नीतियों ने यूरोप के धार्मिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास को गहराई से प्रभावित किया। इसी कारण इतिहासकार कॉन्स्टेंटाइन महान महान को केवल एक सफल सेनानायक और विजेता सम्राट ही नहीं, बल्कि ऐसे दूरदर्शी शासक के रूप में भी स्मरण करते हैं, जिसने रोमन साम्राज्य और ईसाई जगत—दोनों के इतिहास को स्थायी रूप से बदल दिया।
सम्राट सेप्टिमियस सेवेरस (11 अप्रैल 145 ई.–4 फ़रवरी 211 ई.)
लूसियस सेप्टिमियस सेवेरस पर्टिनैक्स को सामान्यतः सेप्टिमियस सेवेरस के नाम से जाना जाता है। उन्होंने 193 ईस्वी से 211 ईस्वी तक रोमन साम्राज्य पर शासन किया। उनके शासनकाल ने रोमन इतिहास में सेवेरन राजवंश की स्थापना की, जिसने लगभग चार दशकों तक साम्राज्य पर शासन किया। सेप्टिमियस सेवेरस एक प्रतिभाशाली सैनिक, कठोर प्रशासक और महत्वाकांक्षी विजेता थे। उन्होंने गृहयुद्धों में अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों को पराजित कर सत्ता प्राप्त की, पूर्व और पश्चिम दोनों दिशाओं में रोमन साम्राज्य का विस्तार किया तथा सेना को इतना शक्तिशाली बना दिया कि आगे चलकर रोमन राजनीति पर सेना का प्रभाव पहले से कहीं अधिक बढ़ गया। यद्यपि उनकी सैन्य नीतियों ने साम्राज्य के वित्त पर भारी बोझ डाला, फिर भी वे जनता और सेना दोनों के बीच अत्यंत लोकप्रिय रहे।
सेप्टिमियस सेवेरस का प्रारंभिक जीवन
सेप्टिमियस सेवेरस का जन्म 11 अप्रैल 145 ईस्वी को उत्तरी अफ्रीका के लेप्टिस मैग्ना नगर में हुआ था, जो वर्तमान लीबिया में स्थित है। उनका परिवार समृद्ध तथा प्रतिष्ठित था और रोमन नागरिकता प्राप्त कर चुका था। उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद रोमन प्रशासनिक सेवा में प्रवेश किया। परंपरागत कुर्सुस होनोरुम अर्थात् सार्वजनिक पदों की क्रमिक व्यवस्था के अनुसार उन्होंने विभिन्न प्रशासनिक और सैन्य पदों पर कार्य किया। अपनी योग्यता, अनुशासन और प्रशासनिक दक्षता के कारण वे शीघ्र ही रोमन साम्राज्य के प्रमुख अधिकारियों में सम्मिलित हो गए।

पाँच सम्राटों का वर्ष और सत्ता प्राप्ति
193 ईस्वी रोमन इतिहास में ‘पाँच सम्राटों का वर्ष’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसी वर्ष सम्राट पर्टिनैक्स की हत्या कर दी गई और उसके बाद राजनीतिक अराजकता फैल गई। पर्टिनैक्स की मृत्यु के बाद डिडियस जूलियनस ने धन देकर सम्राट का पद प्राप्त कर लिया, जिससे सेना और जनता दोनों में व्यापक असंतोष उत्पन्न हुआ। उस समय सेप्टिमियस सेवेरस पैनोनिया में सेना के सेनापति थे। उनकी सेना ने उन्हें सम्राट घोषित कर दिया। वे शीघ्र ही रोम की ओर बढ़े। डिडियस जूलियनस को पदच्युत कर मृत्युदंड दिया गया और सेवेरस ने बिना अधिक प्रतिरोध के राजधानी पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार उन्होंने गृहयुद्ध में विजय प्राप्त कर रोमन साम्राज्य की सत्ता अपने हाथों में ले ली।
पेसेन्नियस नाइजर के विरुद्ध अभियान
सत्ता प्राप्त करने के बाद सेवेरस को पूर्वी प्रांतों के शक्तिशाली दावेदार पेसेन्नियस नाइजर का सामना करना पड़ा, जिसे पूर्वी सेना का समर्थन प्राप्त था। 194 ईस्वी में किलिकिया के इस्सुस में दोनों सेनाओं के बीच निर्णायक युद्ध हुआ। सेवेरस ने नाइजर को पराजित कर पूर्वी रोमन प्रांतों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इस विजय ने उनके शासन को स्थायित्व प्रदान किया।
ओस्रोएने का विलय
पेसेन्नियस नाइजर की पराजय के बाद सेवेरस ने रोमन साम्राज्य की पूर्वी सीमा के पार अभियान चलाया। उन्होंने ओस्रोएने राज्य को रोमन साम्राज्य में मिला लिया और उसे एक नए रोमन प्रांत के रूप में संगठित किया। इस विजय से रोम की पूर्वी सीमाएँ अधिक सुरक्षित हुईं तथा मेसोपोटामिया क्षेत्र में उसका प्रभाव बढ़ा।
क्लोडियस अल्बिनुस पर विजय
सेवेरस का तीसरा प्रमुख प्रतिद्वंद्वी क्लोडियस अल्बिनुस ) था, जिसे पश्चिमी प्रांतों का समर्थन प्राप्त था। 197 ईस्वी में गॉल के लुगडूनम के निकट दोनों सेनाओं के बीच रोमन इतिहास का सबसे बड़ा गृहयुद्ध लड़ा गया। इस निर्णायक युद्ध में सेवेरस ने अल्बिनुस को पराजित कर दिया। इस विजय के बाद वे संपूर्ण रोमन साम्राज्य के निर्विवाद शासक बन गए।
पार्थियन साम्राज्य के विरुद्ध अभियान
पश्चिमी क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत करने के बाद सेवेरस ने पूर्व की ओर ध्यान दिया। उन्होंने पार्थियन साम्राज्य के विरुद्ध सफल सैन्य अभियान चलाया। 197–198 ईस्वी के अभियानों में उन्होंने पार्थिया की राजधानी क्टेसीफ़ोन पर अधिकार कर लिया और रोमन साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार टिग्रिस नदी तक कर दिया। इन विजयों ने पूर्वी सीमा पर रोम की शक्ति को पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ बना दिया।
सेप्टिमियस सेवेरस का सेना में सुधार
सेप्टिमियस सेवेरस का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान रोमन सेना के पुनर्गठन में था। उन्होंने रोमन सेना की शक्ति बढ़ाने के लिए अनेक सुधार किए। उनके शासनकाल में लीजनों की संख्या 30 से बढ़ाकर 33 कर दी गई। उन्होंने तीन नई लीजन—प्रथम पार्थिका, द्वितीय पार्थिका तथा तृतीय पार्थिका का गठन किया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने सैनिकों का वार्षिक वेतन 300 डेनारियस से बढ़ाकर 400 डेनारियस कर दिया। उन्होंने सैनिकों को विवाह करने की अनुमति भी प्रदान की, जिससे सेना में स्थिरता और निष्ठा बढ़ी। इन सुधारों से सेना अत्यंत शक्तिशाली बनी, किंतु साम्राज्य के वित्त पर भारी आर्थिक बोझ भी पड़ा।
सेप्टिमियस सेवेरस का प्रशासन और सीनेट से संबंध
सेप्टिमियस सेवेरस का सीनेट के साथ संबंध कभी मधुर नहीं रहा। सत्ता प्राप्त करने के बाद उन्होंने अनेक सीनेटरों पर भ्रष्टाचार तथा षड्यंत्र के आरोप लगाए और उनमें से कई को मृत्युदंड दिलवाया। उनके स्थान पर उन्होंने अपने विश्वसनीय अधिकारियों और समर्थकों को नियुक्त किया। इससे सीनेट की राजनीतिक शक्ति कमजोर हुई और सम्राट तथा सेना की शक्ति पहले से अधिक बढ़ गई। उनके शासनकाल में रोमन प्रशासन अधिक केंद्रीकृत हो गया तथा सम्राट की व्यक्तिगत सत्ता अत्यधिक सुदृढ़ हुई।
सैन्य शासन की प्रवृत्ति
सेप्टिमियस सेवेरस की नीतियों ने रोमन शासन व्यवस्था में सेना की भूमिका को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया। सेना के वेतन, विशेषाधिकार और राजनीतिक प्रभाव में वृद्धि के कारण सम्राट का शासन सैन्य शक्ति पर अधिक निर्भर हो गया। अनेक इतिहासकारों का मत है कि उनके शासनकाल में रोमन साम्राज्य का स्वरूप एक प्रकार के सैन्य राजतंत्र अथवा सैन्य प्रभुत्व वाले शासन में परिवर्तित होने लगा। यद्यपि इससे साम्राज्य की सुरक्षा मजबूत हुई, किंतु भविष्य में सेना का राजनीतिक हस्तक्षेप भी बढ़ गया।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रयास
यद्यपि सेवेरस कठोर शासक थे, फिर भी उन्होंने प्रशासनिक भ्रष्टाचार को कम करने के लिए अनेक उपाय किए। उन्होंने प्रांतीय प्रशासन को अधिक अनुशासित बनाया तथा सरकारी अधिकारियों पर कड़ी निगरानी रखी। इसी कारण सामान्य नागरिकों के बीच उनकी लोकप्रियता बनी रही और उन्हें एक न्यायप्रिय तथा सक्षम शासक के रूप में देखा गया।
सेप्टिमियस सेवेरस का ब्रिटेन अभियान और मृत्यु
अपने शासन के अंतिम वर्षों में सेप्टिमियस सेवेरस ने ब्रिटेन में विद्रोही जनजातियों के विरुद्ध अभियान चलाया। उन्होंने उत्तरी ब्रिटेन में रोमन नियंत्रण को सुदृढ़ करने का प्रयास किया और सम्राट होने के बावजूद स्वयं सेना का नेतृत्व किया। किंतु 210 ईस्वी के उत्तरार्ध में वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। लंबी बीमारी के बाद 4 फ़रवरी 211 ईस्वी को एबोराकम (वर्तमान यॉर्क, इंग्लैंड) में उनका निधन हो गया। मृत्यु से पूर्व उन्होंने अपने पुत्रों काराकल्ला और गेटा को परस्पर सहयोग बनाए रखने तथा सैनिकों का सम्मान करने की सलाह दी। उनके निधन के बाद दोनों पुत्र संयुक्त रूप से सम्राट बने, यद्यपि शीघ्र ही उनके बीच संघर्ष आरंभ हो गया।
सेप्टिमियस सेवेरस का ऐतिहासिक मूल्यांकन
सेप्टिमियस सेवेरस रोमन इतिहास के सबसे प्रभावशाली सैनिक सम्राटों में गिने जाते हैं। उन्होंने गृहयुद्धों में विजय प्राप्त कर रोमन साम्राज्य को पुनः स्थिर किया, पूर्वी सीमाओं का विस्तार किया, पार्थियन साम्राज्य को पराजित किया तथा सेना को अभूतपूर्व रूप से सशक्त बनाया। उनके सैन्य सुधारों ने रोमन सेना की क्षमता को बढ़ाया, किंतु साथ ही साम्राज्य की राजनीति में सेना के प्रभुत्व को भी स्थायी रूप से स्थापित कर दिया। इतिहासकारों का मत है कि सेवेरस ने एक ओर रोमन साम्राज्य को नई शक्ति प्रदान की, जबकि दूसरी ओर उनकी नीतियों ने भविष्य में सैनिक सम्राटों के युग और राजनीतिक अस्थिरता की पृष्ठभूमि भी तैयार की। फिर भी उनकी प्रशासनिक दक्षता, सैन्य प्रतिभा, सीमाओं के विस्तार और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के प्रयासों के कारण उन्हें प्राचीन रोम के महान सम्राटों और सफल सेनानायकों में सम्मानपूर्वक स्थान प्राप्त है।
लूसियस एमिलियस पॉलुस मैसिडोनिकस (229 ई. पू.–160 ई. पू.)
लूसियस एमिलियस पॉलुस मैसिडोनिकस रोमन गणराज्य के सर्वश्रेष्ठ सेनानायकों, राजनेताओं और प्रशासकों में से एक थे। वे विशेष रूप से तृतीय मैसिडोनियन युद्ध में अपनी निर्णायक विजय के लिए प्रसिद्ध हैं। पाइडना के युद्ध में उन्होंने मैसिडोनिया के राजा पर्सियस की सेना को पराजित कर प्राचीन एंटिगोनिड राजवंश का अंत कर दिया। इस विजय के साथ मैसिडोनिया पर रोमन प्रभुत्व स्थापित हुआ और यूनानी जगत में रोम की सर्वोच्चता निर्विवाद हो गई। पॉलुस दो बार रोमन गणराज्य के कौंसल निर्वाचित हुए। वे अपनी उत्कृष्ट सैन्य रणनीति, अनुशासनप्रिय नेतृत्व तथा प्रशासनिक दक्षता के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी विजयों ने रोमन गणराज्य को भूमध्यसागरीय क्षेत्र की प्रमुख शक्ति बनने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
मैसिडोनिकस का प्रारंभिक जीवन
पॉलुस का जन्म लगभग 229 ईसा पूर्व रोम के प्रतिष्ठित ऐमिलियस कुल में हुआ था, जो रोमन गणराज्य के सबसे पुराने और प्रभावशाली कुलों में से एक था। उनके पिता लूसियस एमिलियस पॉलुस द्वितीय पुनिक युद्ध के प्रसिद्ध सेनानायक थे, जो 216 ईसा पूर्व में कैनी के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे। पारिवारिक परंपरा के अनुसार पॉलुस ने कम आयु से ही सैन्य एवं प्रशासनिक शिक्षा प्राप्त की। वे अनुशासनप्रिय, न्यायप्रिय और गंभीर स्वभाव के व्यक्ति थे तथा शीघ्र ही रोमन सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित हो गए।

राजनीतिक जीवन और प्रथम कौंसल पद
रोमन परंपरा के अनुसार उन्होंने क्रमशः विभिन्न सार्वजनिक पदों पर कार्य किया और अपनी योग्यता के बल पर उच्च पदों तक पहुँचे। 182 ईसा पूर्व में वे पहली बार कौंसल निर्वाचित हुए। कौंसल बनने के बाद उन्हें उत्तरी इटली के लिगूरिया क्षेत्र में रहने वाली इंगाउनी जनजाति के विरुद्ध सैन्य अभियान का दायित्व सौंपा गया। उन्होंने इस अभियान में सफलता प्राप्त कर विद्रोही जनजातियों को पराजित किया तथा रोमन अधिकार को सुदृढ़ किया। इस अभियान ने उन्हें एक सक्षम सेनानायक के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।
तृतीय मैसिडोनियन युद्ध की पृष्ठभूमि
द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में मैसिडोनिया का राजा पर्सियस रोम के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया था। उसने यूनान के अनेक राज्यों को अपने पक्ष में संगठित करने का प्रयास किया और रोमन प्रभाव को चुनौती दी। 171 ईसा पूर्व में रोमन सेना और मैसिडोनिया के बीच तृतीय मैसिडोनियन युद्ध आरंभ हुआ। युद्ध के प्रारंभिक चरण में रोमन सेनाओं को अपेक्षित सफलता नहीं मिली और कई अभियानों में उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इन परिस्थितियों में रोमन सीनेट ने अनुभवी सेनानायक पॉलुस को पुनः कौंसल नियुक्त किया और मैसिडोनिया के विरुद्ध अभियान का सर्वोच्च नेतृत्व उन्हें सौंपा।
पाइडना का निर्णायक युद्ध
पॉलुस की सबसे महान सैन्य उपलब्धि 22 जून 168 ईसा पूर्व को लड़ा गया पाइडना का युद्ध था। इस युद्ध में उनका सामना मैसिडोनिया के राजा पर्सियस की विशाल सेना से हुआ, जिसकी सबसे बड़ी शक्ति उसकी प्रसिद्ध मैसिडोनियन फैलेंक्स (Phalanx) थी। यह उस समय की सबसे प्रभावशाली युद्ध संरचनाओं में मानी जाती थी। पॉलुस ने युद्धभूमि की परिस्थितियों का कुशलतापूर्वक लाभ उठाया। जैसे-जैसे मैसिडोनियन फैलेंक्स असमतल भूमि पर आगे बढ़ी, उसकी पंक्तियाँ टूटने लगीं। पॉलुस ने उसी अवसर का लाभ उठाते हुए अपनी लचीली रोमन लीजन को छोटे-छोटे दलों में विभाजित कर फैलेंक्स के बीच उत्पन्न रिक्त स्थानों पर आक्रमण कराया। रोमन सैनिकों ने निकट युद्ध में मैसिडोनियन सेना को भारी क्षति पहुँचाई। परिणामस्वरूप पर्सियस की सेना पूर्णतः पराजित हो गई और युद्ध रोमन गणराज्य की निर्णायक विजय के साथ समाप्त हुआ।
मैसिडोनिया पर रोमन प्रभुत्व
पाइडना की विजय के बाद राजा पर्सियस बंदी बना लिया गया। इसके साथ ही लगभग डेढ़ शताब्दी तक शासन करने वाले एंटिगोनिड राजवंश का अंत हो गया। रोम ने मैसिडोनिया के स्वतंत्र राज्य को समाप्त कर उसे अपने प्रभाव क्षेत्र में सम्मिलित कर लिया। बाद के वर्षों में मैसिडोनिया को रोमन प्रांत के रूप में संगठित किया गया। इस विजय के बाद यूनान के अधिकांश राज्यों ने भी रोमन प्रभुत्व स्वीकार कर लिया और पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में रोम की शक्ति अत्यधिक बढ़ गई।
रोम में भव्य विजय समारोह
मैसिडोनिया से विजयी लौटने पर पॉलुस का रोम में अत्यंत भव्य स्वागत किया गया। उनके सम्मान में शानदार विजय जुलूस (ट्रायम्फ़) निकाला गया, जिसमें युद्ध में प्राप्त धन-संपत्ति, कलाकृतियाँ और बंदी बनाए गए राजा पर्सियस को भी प्रदर्शित किया गया। उनकी महान विजय के सम्मान में रोमन सीनेट ने उन्हें ‘मैसिडोनिकस’की उपाधि प्रदान की, जिसका अर्थ है—‘मैसिडोनिया का विजेता’। यह उपाधि रोमन परंपरा में केवल उन सेनानायकों को दी जाती थी जिन्होंने किसी महत्त्वपूर्ण विदेशी शक्ति को निर्णायक रूप से पराजित किया हो।
मैसिडोनिकस की प्रशासनिक क्षमता और व्यक्तित्व
पॉलुस केवल महान सेनानायक ही नहीं, बल्कि न्यायप्रिय और दूरदर्शी प्रशासक भी थे। उन्होंने विजित प्रदेशों में अनावश्यक अत्याचार के स्थान पर सुव्यवस्थित प्रशासन स्थापित करने का प्रयास किया। वे अनुशासन, सादगी और नैतिक मूल्यों के पालन के लिए प्रसिद्ध थे। सैनिकों के बीच वे एक कठोर किंतु न्यायपूर्ण सेनापति के रूप में सम्मानित थे। वे युद्ध में साहस के साथ-साथ धैर्य और रणनीतिक सोच को सबसे अधिक महत्त्व देते थे।
मैसिडोनिकस का रोमन गणराज्य में योगदान
पॉलुस की विजय ने रोमन गणराज्य के इतिहास में एक नया युग आरंभ किया। पाइडना के युद्ध के बाद यूनानी विश्व में मैसिडोनिया की शक्ति समाप्त हो गई और रोम भूमध्यसागरीय क्षेत्र की निर्विवाद महाशक्ति बन गया। उनकी विजय के परिणामस्वरूप यूनानी कला, साहित्य, दर्शन और संस्कृति का प्रभाव रोम में तीव्र गति से बढ़ा। इससे रोमन सभ्यता के सांस्कृतिक विकास को भी नई दिशा मिली।
मैसिडोनिकस की मृत्यु
लगभग 160 ईसा पूर्व में पॉलुस गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। उसी वर्ष उनका निधन हो गया। उनके निधन पर रोम ने एक महान सेनानायक, आदर्श प्रशासक और राष्ट्रनायक को खो दिया। उनकी मृत्यु के समय तक वे रोमन गणराज्य के सबसे सम्मानित व्यक्तियों में गिने जाते थे और उनकी सैन्य उपलब्धियाँ आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श बन चुकी थीं।
मैसिडोनिकस का ऐतिहासिक मूल्यांकन
लूसियस एमिलियस पॉलुस मैसिडोनिकस को रोमन इतिहास के महानतम सेनानायकों में स्थान प्राप्त है। पाइडना के युद्ध में उनकी विजय ने न केवल मैसिडोनिया की शक्ति का अंत किया, बल्कि यूनानी विश्व में रोमन प्रभुत्व की स्थायी स्थापना भी की। उनकी उत्कृष्ट सैन्य रणनीति ने यह सिद्ध कर दिया कि रोमन लीजन की लचीली युद्ध प्रणाली पारंपरिक मैसिडोनियन फैलेंक्स से अधिक प्रभावी थी। इतिहासकारों के अनुसार पॉलुस की विजय ने भूमध्यसागरीय क्षेत्र के राजनीतिक संतुलन को स्थायी रूप से बदल दिया और रोम के विश्वव्यापी साम्राज्य बनने की प्रक्रिया को निर्णायक गति प्रदान की। अपनी सैन्य प्रतिभा, अनुशासित नेतृत्व, न्यायप्रिय प्रशासन और दूरदर्शिता के कारण वे रोमन गणराज्य के सबसे सम्मानित सेनानायकों और राष्ट्रनिर्माताओं में गिने जाते हैं।
क्विंटस सर्टोरियस (123 ई. पू.–72 ई. पू.)
क्विंटस सर्टोरियस रोमन गणराज्य के सर्वाधिक प्रतिभाशाली सेनानायकों, रणनीतिकारों और राजनेताओं में से एक थे। वे विशेष रूप से हिस्पानिया (स्पेन और पुर्तगाल) में रोमन गृहयुद्धों तथा सर्टोरियन युद्ध के दौरान अपने असाधारण सैन्य नेतृत्व के लिए प्रसिद्ध हैं। सीमित संसाधनों और अपेक्षाकृत छोटी सेना के बावजूद उन्होंने वर्षों तक रोमन गणराज्य की शक्तिशाली सेनाओं का सफलतापूर्वक सामना किया। सर्टोरियस को गुरिल्ला युद्ध-कौशल, स्थानीय जनजातियों का विश्वास जीतने की क्षमता तथा दूरदर्शी सैन्य रणनीति के कारण इतिहास के महानतम सेनानायकों में गिना जाता है। अनेक इतिहासकार उन्हें प्राचीन विश्व का सर्वश्रेष्ठ गुरिल्ला सेनापति भी मानते हैं।
सर्टोरियस का प्रारंभिक जीवन
क्विंटस सर्टोरियस का जन्म लगभग 123 ईसा पूर्व इटली के नूर्सिया नगर में एक साधारण किंतु सम्मानित रोमन परिवार में हुआ था। बचपन में ही उनके पिता का निधन हो गया, जिसके बाद उनकी माता ने उनका पालन-पोषण किया। युवावस्था में उन्होंने विधि (कानून) का अध्ययन किया और कुछ समय तक विधिवेत्ता (Jurist) के रूप में कार्य किया। उनकी वाक्पटुता और न्यायिक ज्ञान के कारण वे सार्वजनिक जीवन में लोकप्रिय हो रहे थे, किंतु उनकी वास्तविक रुचि सैन्य सेवा में थी। शीघ्र ही उन्होंने रोमन सेना में प्रवेश किया और युद्धभूमि में अपनी असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया।

आराउसियो के युद्ध में वीरता
सर्टोरियस का प्रारंभिक सैन्य जीवन 105 ईसा पूर्व में लड़े गए आराउसियो के युद्ध से जुड़ा था। इस युद्ध में रोमन सेना को जर्मनिक जनजातियों के हाथों भीषण पराजय का सामना करना पड़ा। यद्यपि युद्ध रोम के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ, फिर भी सर्टोरियस ने असाधारण साहस का परिचय दिया। प्राचीन स्रोतों के अनुसार उन्होंने घायल होने के बावजूद युद्धभूमि से सुरक्षित निकलकर अपनी वीरता और धैर्य का परिचय दिया। इस घटना के बाद वे रोमन सेना के उभरते हुए प्रतिभाशाली अधिकारियों में गिने जाने लगे।
गायस मारियस के अधीन सैन्य सेवा
102 ईसा पूर्व में सर्टोरियस ने महान रोमन सेनानायक गायस मारियस के अधीन सेवा की। इसी वर्ष उन्होंने आक्वाए सेक्स्टियाए के प्रसिद्ध युद्ध में भाग लिया, जिसमें रोमन सेना ने ट्यूटोनेस जनजाति को निर्णायक रूप से पराजित किया। इस अभियान के दौरान सर्टोरियस ने साहस, अनुशासन और उत्कृष्ट नेतृत्व का परिचय दिया। मारियस उनकी योग्यता से अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने उन्हें महत्त्वपूर्ण सैन्य दायित्व सौंपने प्रारंभ किए।
रोमन गृहयुद्ध में भूमिका
प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व के आरंभ में रोमन गणराज्य दो प्रमुख राजनीतिक गुटों में विभाजित हो गया—ऑप्टिमेट्स, जो सीनेट और कुलीन वर्ग के हितों का समर्थन करते थे और पोपुलेरेस, जो सामान्य जनता के अधिकारों और सुधारवादी नीतियों के पक्षधर थे। सर्टोरियस ने पोपुलेरेस का समर्थन किया और अपने गुरु गायस मारियस तथा बाद में लूसियस कॉर्नेलियस सिन्ना के पक्ष में युद्ध किया। जब लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला ने गृहयुद्ध में विजय प्राप्त की, तब पोपुलेरेस के अधिकांश नेताओं को या तो मार दिया गया अथवा उन्हें निर्वासन में जाना पड़ा। सर्टोरियस भी रोम छोड़कर हिस्पानिया चले गए।
हिस्पानिया में शासन
पोपुलेरेस के प्रतिनिधि के रूप में सर्टोरियस को हिस्पानिया का प्रोकौंसल नियुक्त किया गया। यद्यपि रोम द्वारा नियुक्त कई अधिकारियों ने उनके अधिकार को स्वीकार नहीं किया, फिर भी सर्टोरियस ने अपनी सेना तथा स्थानीय जनजातियों के सहयोग से पूरे क्षेत्र पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर लिया। उन्होंने स्थानीय सेल्ट-आइबेरियाई जनजातियों के साथ मित्रता स्थापित की तथा उनके साथ समान व्यवहार किया। उन्होंने स्थानीय युवाओं की शिक्षा के लिए विद्यालय स्थापित किए और प्रशासन में उन्हें भी भागीदारी प्रदान की। इन नीतियों के कारण वे हिस्पानिया की जनता के बीच अत्यंत लोकप्रिय हो गए।
सर्टोरियन युद्ध
सर्टोरियस की बढ़ती शक्ति से चिंतित होकर रोम ने उनके विरुद्ध विशाल सेना भेजी। इस संघर्ष को इतिहास में सर्टोरियन युद्ध (80–72 ईसा पूर्व) के नाम से जाना जाता है। सर्टोरियस ने सीधे युद्ध के स्थान पर गुरिल्ला युद्धनीति अपनाई। उन्होंने पर्वतीय क्षेत्रों, जंगलों और दुर्गम मार्गों का कुशल उपयोग करते हुए रोमन सेनाओं को बार-बार पराजित किया। उनकी सेना छोटी होने के बावजूद उनकी रणनीति इतनी प्रभावी थी कि रोम को कई वर्षों तक निर्णायक सफलता नहीं मिल सकी। उन्होंने स्थानीय योद्धाओं को रोमन सैन्य अनुशासन का प्रशिक्षण दिया और एक संगठित सेना का निर्माण किया।
पिरेनीज़ पर्वतमाला की रक्षा
सर्टोरियस ने हिस्पानिया की सुरक्षा के लिए पिरेनीज़ पर्वतमाला के दर्रों को सुदृढ़ करने की योजना बनाई। उन्होंने अपने विश्वसनीय सेनानायक जूलियस सालिनेटर को इन मार्गों की रक्षा का दायित्व सौंपा। किंतु सुल्ला के समर्थक सेनापति गायस एन्नियस ने इन रक्षा पंक्तियों को भेद दिया और धीरे-धीरे रोमन सेनाएँ हिस्पानिया में प्रवेश करने लगीं। इसके बाद सर्टोरियस को दीर्घकाल तक लगातार संघर्ष करना पड़ा।
सैन्य नेतृत्व और रणनीति
सर्टोरियस की सबसे बड़ी विशेषता उनकी असाधारण रणनीतिक क्षमता थी। वे युद्धभूमि की परिस्थितियों का अत्यंत कुशलतापूर्वक उपयोग करते थे और शत्रु की शक्ति के स्थान पर उसकी कमजोरियों पर प्रहार करते थे। उन्होंने स्थानीय जनजातियों को अपने साथ जोड़कर एक ऐसी मिश्रित सेना तैयार की, जो रोमन अनुशासन और स्थानीय युद्ध-कौशल दोनों का उत्कृष्ट उदाहरण थी। वे सैनिकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय थे और उनकी निष्ठा बनाए रखने में सफल रहे। इतिहासकारों का मत है कि यदि उन्हें पर्याप्त संसाधन और राजनीतिक समर्थन प्राप्त होता, तो वे संभवतः सुल्ला के शासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिद्ध हो सकते थे।
सर्टोरियस के साथ विश्वासघात और मृत्यु
लगातार सैन्य सफलताओं के बावजूद सर्टोरियस अपने ही कुछ अधिकारियों की ईर्ष्या और असंतोष का शिकार बन गए। 72 ईसा पूर्व में उनके सहयोगी मार्कस पेरपेर्ना और उसके साथियों ने एक भोज के दौरान षड्यंत्र रचकर उनकी हत्या कर दी। इस प्रकार रोम के सबसे प्रतिभाशाली सेनानायकों में से एक का अंत युद्धभूमि में नहीं, बल्कि विश्वासघात के कारण हुआ। सर्टोरियस की मृत्यु के बाद उनका संगठन शीघ्र ही बिखर गया और रोमन सेना ने हिस्पानिया पर पुनः अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।
सर्टोरियस का ऐतिहासिक मूल्यांकन
क्विंटस सर्टोरियस को रोमन गणराज्य के महानतम सैन्य रणनीतिकारों में स्थान प्राप्त है। उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद वर्षों तक रोमन साम्राज्य की विशाल सेनाओं को चुनौती दी और अपनी गुरिल्ला युद्धनीति, संगठन क्षमता तथा नेतृत्व कौशल से असाधारण सफलता प्राप्त की। उन्होंने हिस्पानिया में स्थानीय जनता का विश्वास जीतकर एक प्रभावी प्रशासन स्थापित किया तथा यह सिद्ध किया कि केवल विशाल सेना ही विजय का आधार नहीं होती, बल्कि दूरदर्शी नेतृत्व, रणनीतिक बुद्धिमत्ता और जनसमर्थन भी उतने ही महत्त्वपूर्ण होते हैं। इतिहासकारों के अनुसार सर्टोरियस का जीवन इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि एक प्रतिभाशाली सेनानायक अपनी सैन्य क्षमता, राजनीतिक सूझ-बूझ और जनसमर्थन के बल पर अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी लंबे समय तक शक्तिशाली साम्राज्य का सफलतापूर्वक सामना कर सकता है। इसी कारण उनका नाम प्राचीन रोम के सर्वश्रेष्ठ सेनानायकों और गुरिल्ला युद्ध के महान रणनीतिकारों में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है।
गायस ऑरेलियस वैलेरियस डायोक्लेटियानुस ऑगस्टस (लगभग 244 ई.– 312/313 ई.)
गायस ऑरेलियस वैलेरियस डायोक्लेटियानुस ऑगस्टस, जिन्हें सामान्यतः डायोक्लेटियन के नाम से जाना जाता है, प्राचीन रोम के सबसे प्रभावशाली सम्राटों, महान सेनानायकों और प्रशासनिक सुधारकों में से एक थे। उन्होंने 284 ईस्वी से 305 ईस्वी तक रोमन साम्राज्य पर शासन किया। उनके शासनकाल ने रोमन इतिहास में एक नए युग की शुरुआत की। जब डायोक्लेटियन सत्ता में आए, उस समय रोमन साम्राज्य लगभग आधी शताब्दी से राजनीतिक अस्थिरता, गृहयुद्धों, आर्थिक संकट, मुद्रा अवमूल्यन, बर्बर आक्रमणों तथा प्रशासनिक अव्यवस्था से जूझ रहा था। इस काल को इतिहास में ‘तीसरी शताब्दी का संकट’ कहा जाता है। डायोक्लेटियन ने अपनी असाधारण सैन्य क्षमता, दूरदर्शी प्रशासनिक सुधारों और सुदृढ़ नेतृत्व के माध्यम से इस संकट का अंत किया तथा रोमन साम्राज्य को पुनः स्थिर और शक्तिशाली बनाया।
डायोक्लेटियन का प्रारंभिक जीवन
डायोक्लेटियन का जन्म लगभग 244 ईस्वी में रोमन प्रांत डाल्मेशिया के निकट एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके प्रारंभिक जीवन के विषय में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है, किंतु अधिकांश इतिहासकारों का मत है कि वे विनम्र सामाजिक पृष्ठभूमि से थे। युवावस्था में उन्होंने रोमन सेना में प्रवेश किया और अपनी योग्यता, अनुशासन तथा युद्ध-कौशल के कारण क्रमशः उच्च सैन्य पदों तक पहुँचे। उन्होंने विभिन्न सीमांत क्षेत्रों में सेवा करते हुए सैनिकों और अधिकारियों के बीच सम्मान अर्जित किया। 284 ईस्वी में सम्राट न्यूमेरियन की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। इसके बाद रोमन सेना ने डायोक्लेटियन को सम्राट घोषित कर दिया। किंतु उन्हें तुरंत सत्ता नहीं मिली। उन्हें अपने प्रतिद्वंद्वी कारिनुस के विरुद्ध गृहयुद्ध लड़ना पड़ा। 285 ईस्वी में मार्गुस के युद्ध में कारिनुस पर विजय प्राप्त करने के बाद डायोक्लेटियन संपूर्ण रोमन साम्राज्य के निर्विवाद सम्राट बन गए।

तीसरी शताब्दी के संकट का अंत
डायोक्लेटियन का सबसे बड़ा योगदान रोमन साम्राज्य को तीसरी शताब्दी के गहरे संकट से बाहर निकालना था। उनके शासनकाल में लगातार चल रहे गृहयुद्ध समाप्त हुए, सीमाओं की सुरक्षा मजबूत हुई, प्रशासनिक व्यवस्था का पुनर्गठन किया गया तथा आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई। उनके नेतृत्व में साम्राज्य में राजनीतिक स्थिरता लौटी और सम्राट की सत्ता पुनः सुदृढ़ हुई। इतिहासकारों का मत है कि यदि डायोक्लेटियन जैसे सक्षम शासक उस समय न मिले होते, तो संभवतः रोमन साम्राज्य चौथी शताब्दी के आरंभ तक ही विघटित हो जाता।
डायोक्लेटियन की सेनानायक के रूप में उपलब्धियाँ
डायोक्लेटियन एक अत्यंत सफल सेनानायक थे। उन्होंने साम्राज्य की सीमाओं पर निरंतर अभियान चलाकर अनेक शत्रु जनजातियों और विद्रोहियों को पराजित किया। 285 से 299 ईस्वी के बीच उन्होंने सार्माटी तथा कार्पी जनजातियों के विरुद्ध सफल सैन्य अभियान चलाए। इन विजयों से डेन्यूब सीमा पुनः सुरक्षित हो गई। इसके अतिरिक्त, उन्होंने अलामानी जैसी शक्तिशाली जर्मनिक जनजातियों को भी पराजित किया और राइन सीमा की सुरक्षा को मजबूत बनाया।
मिस्र के विद्रोह का दमन
297–298 ईस्वी में मिस्र में विद्रोह भड़क उठा। यह विद्रोह साम्राज्य की स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बन गया था। डायोक्लेटियन ने स्वयं मिस्र अभियान का नेतृत्व किया। उन्होंने विद्रोहियों को निर्णायक रूप से पराजित किया और अलेक्ज़ान्द्रिया सहित पूरे मिस्र पर पुनः रोमन नियंत्रण स्थापित कर दिया। इस अभियान के बाद मिस्र की प्रशासनिक व्यवस्था में भी व्यापक सुधार किए गए, जिससे भविष्य में विद्रोहों की संभावना कम हो गई।
डायोक्लेटियन के प्रशासनिक सुधार
डायोक्लेटियन को रोमन इतिहास का सबसे बड़ा प्रशासनिक सुधारक माना जाता है। उन्होंने विशाल रोमन साम्राज्य का अधिक प्रभावी ढंग से संचालन करने के लिए प्रांतों की संख्या बढ़ाई तथा उन्हें छोटे-छोटे प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया। इन प्रांतों को बड़े प्रशासनिक समूहों के अधीन रखा गया, जिससे शासन अधिक संगठित और उत्तरदायी बना। उन्होंने एक विशाल नौकरशाही का विकास किया, जिसके माध्यम से कर-वसूली, न्याय, सेना और प्रशासन पर केंद्रीय नियंत्रण मजबूत हुआ। इतिहासकारों के अनुसार उनके शासनकाल में रोमन साम्राज्य का प्रशासन अपने इतिहास का सबसे व्यापक और संगठित स्वरूप प्राप्त कर सका।
डायोक्लेटियन की चतुर्शासन व्यवस्था (टेट्रार्की)
डायोक्लेटियन का सबसे प्रसिद्ध राजनीतिक सुधार टेट्रार्की अर्थात् ‘चतुर्शासन व्यवस्था’ था। उन्हें यह अनुभव हो चुका था कि इतना विशाल साम्राज्य एक ही सम्राट के लिए प्रभावी रूप से संचालित करना अत्यंत कठिन है। इसलिए उन्होंने 293 ईस्वी में शासन की एक नई व्यवस्था लागू की। इस व्यवस्था के अंतर्गत साम्राज्य का शासन चार शासकों में विभाजित किया गया—दो वरिष्ठ सम्राट, जिन्हें ऑगस्टस (Augustus) कहा गया। दो कनिष्ठ सम्राट, जिन्हें सीज़र (Caesar) कहा गया। प्रत्येक शासक साम्राज्य के एक भाग का प्रशासन और उसकी सुरक्षा का उत्तरदायी था, जबकि संपूर्ण व्यवस्था सामूहिक रूप से संचालित होती थी।
इस प्रणाली का उद्देश्य सीमाओं की सुरक्षा को मजबूत करना, विद्रोहों का शीघ्र दमन करना तथा उत्तराधिकार संबंधी संघर्षों को रोकना था। यद्यपि बाद में यह व्यवस्था स्थायी रूप से सफल नहीं रही, फिर भी तत्कालीन परिस्थितियों में इसने साम्राज्य को स्थिरता प्रदान की।
डायोक्लेटियन के आर्थिक सुधार
डायोक्लेटियन ने आर्थिक संकट को दूर करने के लिए भी अनेक प्रयास किए। उन्होंने कर-व्यवस्था का पुनर्गठन किया तथा मुद्रा प्रणाली में सुधार करने का प्रयास किया। 301 ईस्वी में उन्होंने अधिकतम मूल्य अध्यादेश जारी किया, जिसके माध्यम से आवश्यक वस्तुओं की अधिकतम कीमतें निर्धारित की गईं। यद्यपि यह नीति पूरी तरह सफल नहीं रही, फिर भी यह बढ़ती महँगाई पर नियंत्रण पाने का गंभीर प्रयास था।
सेना का पुनर्गठन
डायोक्लेटियन ने रोमन सेना का पुनर्गठन कर उसकी संख्या और क्षमता दोनों में वृद्धि की। सीमावर्ती क्षेत्रों में सैनिकों की संख्या बढ़ाई गई तथा किलों और रक्षा चौकियों को सुदृढ़ किया गया। उन्होंने सेना और प्रशासन के बीच स्पष्ट विभाजन स्थापित किया, जिससे प्रांतीय अधिकारियों द्वारा सैन्य शक्ति के दुरुपयोग की संभावना कम हो गई। इन सुधारों ने रोमन सीमाओं को अधिक सुरक्षित बनाया और बाहरी आक्रमणों का प्रभावी ढंग से सामना करने में सहायता की।
शासन का त्याग
डायोक्लेटियन का एक अत्यंत असाधारण निर्णय 305 ईस्वी में स्वेच्छा से सिंहासन त्यागना था। प्राचीन रोमन इतिहास में ऐसा बहुत कम हुआ था कि कोई सम्राट स्वयं सत्ता छोड़ दे। उन्होंने अपने उत्तराधिकारी नियुक्त किए और डाल्मेशिया स्थित अपने महल में सेवानिवृत्त जीवन व्यतीत करने लगे। यह निर्णय उनके व्यावहारिक दृष्टिकोण और सुविचारित उत्तराधिकार नीति का परिचायक माना जाता है।
डायोक्लेटियन की मृत्यु
सेवानिवृत्ति के पश्चात डायोक्लेटियन ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष शांतिपूर्वक बिताए। लगभग 312 या 313 ईस्वी में उनका निधन हो गया। उनका विशाल महल, जिसे आज स्प्लिट में डायोक्लेटियन का महल कहा जाता है, आज भी रोमन स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
डायोक्लेटियन का ऐतिहासिक मूल्यांकन
डायोक्लेटियन को रोमन इतिहास के महानतम सुधारक सम्राटों में स्थान प्राप्त है। उन्होंने तीसरी शताब्दी के संकट का सफलतापूर्वक अंत किया, सीमाओं को सुरक्षित बनाया, प्रशासन का पुनर्गठन किया तथा साम्राज्य को स्थिरता प्रदान की। उनकी चतुर्शासन व्यवस्था (टेट्रार्की) ने विशाल साम्राज्य के शासन के लिए एक नई राजनीतिक संरचना प्रस्तुत की, जबकि उनके प्रशासनिक और सैन्य सुधारों ने आने वाले कई दशकों तक रोमन साम्राज्य को मजबूत बनाए रखा।
यद्यपि उनके कुछ आर्थिक उपाय पूर्णतः सफल नहीं हुए और ईसाइयों के विरुद्ध उनके कठोर दमन की आलोचना भी की जाती है, फिर भी अधिकांश इतिहासकार इस बात पर सहमत हैं कि डायोक्लेटियन के सुधारों ने रोमन साम्राज्य को विघटन से बचाया और कॉन्स्टेंटाइन महान महान सहित बाद के सम्राटों के लिए एक सुदृढ़ प्रशासनिक आधार तैयार किया। इसी कारण उन्हें प्राचीन रोम के सबसे महान सेनानायकों, प्रशासकों और राष्ट्रनिर्माता सम्राटों में सम्मानपूर्वक स्मरण किया जाता है।
मार्कस विप्सानियस अग्रिप्पा (62 ई. पू.–12 ई. पू.)
मार्कस विप्सानियस अग्रिप्पा रोमन गणराज्य के अंतिम चरण और प्रारंभिक रोमन साम्राज्य के सबसे महान सेनानायकों, राजनेताओं, प्रशासकों तथा वास्तुकारों में से एक थे। यद्यपि वे स्वयं कभी सम्राट नहीं बने, फिर भी रोमन साम्राज्य की स्थापना में उनकी भूमिका अत्यंत निर्णायक थी। वे सम्राट ऑगस्टस (ऑक्टेवियन) के सबसे विश्वसनीय मित्र, प्रमुख सेनापति और निकटतम सहयोगी थे। अग्रिप्पा ने अनेक महत्त्वपूर्ण युद्धों में विजय प्राप्त कर ऑक्टेवियन की सत्ता को सुदृढ़ किया। विशेष रूप से एक्टियम के युद्ध (31 ईसा पूर्व) में मार्क एंटनी और क्लियोपेट्रा पर उनकी विजय ने रोमन इतिहास की दिशा बदल दी। इसी विजय के परिणामस्वरूप ऑक्टेवियन रोम के निर्विवाद शासक बने और आगे चलकर सम्राट ऑगस्टस के रूप में रोमन साम्राज्य की स्थापना हुई। सैन्य उपलब्धियों के अतिरिक्त, अग्रिप्पा ने रोम के विकास, सार्वजनिक निर्माण, जलापूर्ति व्यवस्था, स्थापत्य कला तथा प्रशासनिक सुधारों में भी अमूल्य योगदान दिया।
विप्सानियस अग्रिप्पा का प्रारंभिक जीवन
मार्कस विप्सानियस अग्रिप्पा का जन्म 62 ईसा पूर्व में एक साधारण रोमन परिवार में हुआ था। उनका परिवार कुलीन वर्ग से नहीं था, किंतु उनकी प्रतिभा, परिश्रम और सैन्य योग्यता ने उन्हें शीघ्र ही रोमन राजनीति और सेना के उच्च पदों तक पहुँचा दिया। युवावस्था में उनकी शिक्षा ऑक्टेवियन (भविष्य के सम्राट ऑगस्टस) के साथ हुई। दोनों लगभग समान आयु के थे और अध्ययन काल से ही घनिष्ठ मित्र बन गए। यह मित्रता जीवनभर बनी रही और रोमन इतिहास की सबसे सफल राजनीतिक साझेदारियों में से एक सिद्ध हुई।

जूलियस सीज़र की हत्या के बाद की भूमिका
44 ईसा पूर्व में जूलियस सीज़र की हत्या के बाद रोमन गणराज्य पुनः गृहयुद्ध में फँस गया। उस समय अग्रिप्पा ने ऑक्टेवियन का पूर्ण समर्थन किया और उन्हें राजनीतिक तथा सैन्य रूप से सशक्त बनने की सलाह दी। उन्होंने ऑक्टेवियन के साथ मिलकर सीज़र के हत्यारों और अन्य प्रतिद्वंद्वियों के विरुद्ध अभियान चलाया। उनकी रणनीति और नेतृत्व के कारण ऑक्टेवियन धीरे-धीरे रोमन राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेता बन गए।
फिलिप्पी के युद्ध में योगदान
42 ईसा पूर्व में फिलिप्पी का युद्ध रोमन इतिहास का एक निर्णायक संघर्ष था। इस युद्ध में ऑक्टेवियन और मार्क एंटनी की संयुक्त सेना ने जूलियस सीज़र के हत्यारों मार्कस जूनियस ब्रूटस और गायस कैसियस लॉन्गिनस को पराजित किया। यद्यपि इस अभियान का औपचारिक नेतृत्व दोनों त्रिमूर्व शासकों के हाथ में था, फिर भी अग्रिप्पा ने सैन्य तैयारियों, संगठन तथा रणनीतिक संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस विजय ने सीज़र के हत्यारों के प्रतिरोध का अंत कर दिया।
सेक्स्टस पोम्पियस के विरुद्ध नौसैनिक अभियान
अग्रिप्पा की सबसे बड़ी विशेषता उनकी असाधारण नौसैनिक प्रतिभा थी। उस समय सेक्स्टस पोम्पियस ने भूमध्यसागर के पश्चिमी भाग पर नियंत्रण स्थापित कर लिया था और रोम की अन्न-आपूर्ति को बाधित कर रहा था। इस संकट से निपटने के लिए अग्रिप्पा ने एक नई नौसेना का गठन किया तथा सैनिकों को आधुनिक नौसैनिक युद्ध का प्रशिक्षण दिया। उन्होंने नौलोकस सहित कई नौसैनिक युद्धों में सेक्स्टस पोम्पियस को पराजित किया। इन विजयों के परिणामस्वरूप भूमध्यसागर पुनः रोमन नियंत्रण में आ गया और रोम की खाद्यान्न आपूर्ति सुरक्षित हो गई।
एक्टियम का निर्णायक युद्ध
31 ईसा पूर्व में लड़ा गया एक्टियम का युद्ध अग्रिप्पा के सैन्य जीवन की सबसे महान उपलब्धि माना जाता है। इस युद्ध में ऑक्टेवियन की सेना का सामना मार्क एंटनी और मिस्र की रानी क्लियोपेट्रा सप्तम की संयुक्त नौसेना से हुआ। अग्रिप्पा ने अपनी उत्कृष्ट नौसैनिक रणनीति, तेज़ गति वाले युद्धपोतों तथा प्रभावी घेराबंदी की नीति अपनाकर शत्रु की विशाल नौसेना को पराजित कर दिया। युद्ध के दौरान मार्क एंटनी और क्लियोपेट्रा युद्धक्षेत्र छोड़कर भाग निकले, जिससे उनकी सेना का मनोबल टूट गया। इस विजय के परिणामस्वरूप ऑक्टेवियन रोमन संसार के एकमात्र शक्तिशाली शासक बन गए और कुछ वर्षों बाद 27 ईसा पूर्व में उन्हें ऑगस्टस की उपाधि प्रदान की गई। इस प्रकार रोमन गणराज्य का अंत हुआ और रोमन साम्राज्य की स्थापना हुई।

जर्मनिक अभियानों में सफलता
अग्रिप्पा ने राइन सीमा पर रहने वाली जर्मनिक जनजातियों के विरुद्ध भी अनेक सफल सैन्य अभियान चलाए। वे जूलियस सीज़र के बाद दूसरे प्रमुख रोमन सेनानायक थे जिन्होंने राइन नदी को पार कर जर्मनिक क्षेत्रों में अभियान चलाया। इन अभियानों के माध्यम से उन्होंने रोमन सीमाओं को सुरक्षित किया तथा उत्तरी क्षेत्रों में रोम का प्रभाव बढ़ाया।
महान सेनानायक
अग्रिप्पा की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक यह थी कि वे स्थल और समुद्र—दोनों प्रकार के युद्धों में समान रूप से निपुण थे। उन्होंने रोमन इतिहास में अनेक ऐसी विजयों का नेतृत्व किया जो स्थल सेना और नौसेना, दोनों की संयुक्त रणनीति पर आधारित थीं। उनकी युद्ध-कुशलता के कारण उन्हें रोमन इतिहास के सर्वश्रेष्ठ सैन्य रणनीतिकारों में स्थान प्राप्त है।
प्रशासनिक और राजनीतिक योगदान
अग्रिप्पा केवल महान सेनानायक ही नहीं, बल्कि अत्यंत सक्षम प्रशासक और राजनेता भी थे। जब सम्राट ऑक्टेवियन किसी सैन्य अभियान या अन्य कार्यों में व्यस्त रहते थे, तब अग्रिप्पा साम्राज्य के प्रशासन का संचालन करते थे। उन्हें सम्राट के समान व्यापक अधिकार प्राप्त थे और वे शासन के लगभग प्रत्येक महत्त्वपूर्ण निर्णय में सहभागी होते थे। ऑगस्टस को स्थायी और सुदृढ़ शासन स्थापित करने में अग्रिप्पा का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
स्थापत्य और सार्वजनिक निर्माण
अग्रिप्पा ने रोम के विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया। उनके निर्देशन में अनेक सार्वजनिक स्नानागार, स्तंभयुक्त प्रांगण, उद्यान तथा अन्य सार्वजनिक भवनों का निर्माण कराया गया। उनकी सबसे प्रसिद्ध स्थापत्य उपलब्धि पैंथियॉन का मूल निर्माण था। यद्यपि वर्तमान भवन बाद में सम्राट हैड्रियन के समय पुनर्निर्मित हुआ, फिर भी उसके निर्माण का श्रेय मूल रूप से अग्रिप्पा को ही दिया जाता है। उन्होंने रोम की जलापूर्ति व्यवस्था को भी सुदृढ़ किया तथा अनेक जलसेतुओं का निर्माण और मरम्मत कराई, जिससे राजधानी की स्वच्छता और सार्वजनिक जीवन में उल्लेखनीय सुधार हुआ।
भूगोल और मानचित्रण में योगदान
अग्रिप्पा को भूगोल में भी विशेष रुचि थी। उनके निर्देशन में संपूर्ण रोमन साम्राज्य का व्यापक सर्वेक्षण कराया गया। इस सर्वेक्षण के आधार पर साम्राज्य के विस्तृत मानचित्र तैयार किए गए, जिनका उपयोग प्रशासन, कर-व्यवस्था, सड़क निर्माण तथा सैन्य अभियानों में किया गया। यह कार्य प्राचीन विश्व की सबसे महत्त्वपूर्ण भौगोलिक परियोजनाओं में से एक माना जाता है।
विप्सानियस अग्रिप्पा की मृत्यु
12 ईसा पूर्व में लगभग 51 वर्ष की आयु में अग्रिप्पा का निधन हो गया। उनकी मृत्यु सम्राट ऑगस्टस के लिए व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत बड़ी क्षति थी। ऑगस्टस ने उनके सम्मान में राजकीय अंतिम संस्कार आयोजित कराया और उन्हें अत्यंत सम्मान के साथ विदाई दी। इसके अतिरिक्त उन्होंने अग्रिप्पा के सभी बच्चों के पालन-पोषण और शिक्षा का उत्तरदायित्व स्वयं ग्रहण किया। बाद में अग्रिप्पा के अनेक वंशज रोमन शाही परिवार के प्रमुख सदस्य बने।
विप्सानियस अग्रिप्पा का ऐतिहासिक मूल्यांकन
मार्कस विप्सानियस अग्रिप्पा को रोमन इतिहास के सबसे महान सेनानायकों और राष्ट्रनिर्माताओं में स्थान प्राप्त है। यदि उनकी सैन्य प्रतिभा, रणनीतिक दूरदर्शिता और प्रशासनिक क्षमता न होती, तो संभवतः ऑक्टेवियन कभी भी रोमन साम्राज्य का प्रथम सम्राट नहीं बन पाते। एक्टियम के युद्ध में उनकी निर्णायक विजय ने रोमन इतिहास की दिशा बदल दी और रोमन साम्राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने सार्वजनिक निर्माण, जलापूर्ति, स्थापत्य कला, प्रशासन और भूगोल के क्षेत्र में भी अमूल्य योगदान दिया। इतिहासकारों का मत है कि अग्रिप्पा ऐसे विरले व्यक्तित्व थे जिन्होंने एक साथ महान सेनानायक, कुशल प्रशासक, दूरदर्शी राजनेता, उत्कृष्ट अभियंता और वास्तुकार के रूप में असाधारण सफलता प्राप्त की। इसी कारण उनका नाम प्राचीन रोम के सबसे सम्मानित और प्रभावशाली व्यक्तियों में अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है।
मार्कस क्लॉडियस मार्सेलस (268 ई. पू.–208 ई. पू.)
मार्कस क्लॉडियस मार्सेलस रोमन गणराज्य के सबसे प्रसिद्ध सेनानायकों और वीर योद्धाओं में से एक थे। जहाँ महान सेनानायक क्विंटस फेबियस मैक्सिमस को उनकी सतर्क रणनीति के कारण ‘रोम की ढाल’कहा जाता था, वहीं मार्सेलस अपनी आक्रामक युद्धनीति और युद्धभूमि में व्यक्तिगत साहस के कारण ‘रोम की तलवार’ के रूप में प्रसिद्ध हुए। उन्होंने विशेष रूप से 225 ईसा पूर्व के गैलिक युद्ध तथा द्वितीय पुनिक युद्ध के दौरान असाधारण सैन्य नेतृत्व का परिचय दिया। कार्थेज के महान सेनानायक हैनीबल के विरुद्ध रोम की रक्षा करने वाले प्रमुख सेनापतियों में उनका नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है।
मार्सेलस का प्रारंभिक जीवन
मार्सेलस का जन्म लगभग 268 ईसा पूर्व रोम के प्रतिष्ठित क्लॉडियस कुल में हुआ था। बचपन से ही उन्हें सैनिक जीवन के अनुरूप शिक्षा और प्रशिक्षण दिया गया। उन्होंने कम आयु में ही घुड़सवारी, शस्त्र संचालन तथा निकट युद्ध की कला में असाधारण दक्षता प्राप्त कर ली थी। युवावस्था में ही वे अपनी शारीरिक शक्ति, साहस और युद्ध कौशल के कारण प्रसिद्ध हो गए। प्राचीन स्रोतों के अनुसार एक युद्ध के दौरान उन्होंने अपने भाई का जीवन बचाया, जब दोनों शत्रुओं से घिर गए थे। इस घटना ने उन्हें एक निर्भीक और साहसी योद्धा के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।

मार्सेलस की गैलिक युद्ध में भूमिका
225 ईसा पूर्व में उत्तरी इटली की गैलिक (सेल्टिक) जनजातियों ने रोमन गणराज्य के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इस संघर्ष में मार्सेलस ने रोमन सेना के प्रमुख अधिकारियों में से एक के रूप में भाग लिया। इसके कुछ वर्षों बाद 222 ईसा पूर्व में क्लास्टिडियम के युद्ध में उन्होंने अपनी सबसे प्रसिद्ध सैन्य उपलब्धि प्राप्त की। इस युद्ध के दौरान उन्होंने गैलिक राजा और सेनानायक विरिडोमारुस को युद्धभूमि में आमने-सामने के द्वंद्व में स्वयं मार गिराया। यह विजय उनकी व्यक्तिगत वीरता का सर्वोच्च उदाहरण मानी जाती है।
स्पोलिया ओपिमा की सर्वोच्च सैन्य उपाधि
विरिडोमारुस को व्यक्तिगत द्वंद्व में पराजित करने के बाद मार्सेलस को रोमन गणराज्य का सर्वोच्च सैन्य सम्मान ‘स्पोलिया ओपिमा’ प्रदान किया गया। रोमन परंपरा के अनुसार यह सम्मान केवल उसी सेनानायक को दिया जाता था जो युद्धभूमि में स्वयं शत्रु सेना के सर्वोच्च सेनापति या राजा का वध करे और उसके शस्त्र तथा कवच को विजय-चिह्न के रूप में प्राप्त करे। रोमन इतिहास में यह अत्यंत दुर्लभ सम्मान केवल तीन बार प्रदान किया गया था, और मार्सेलस इसके अंतिम प्राप्तकर्ता थे। इस उपलब्धि ने उन्हें रोमन इतिहास के महानतम वीर योद्धाओं की श्रेणी में स्थापित कर दिया।
मार्सेलस का द्वितीय पुनिक युद्ध में योगदान
218 ईसा पूर्व में कार्थेज और रोम के बीच द्वितीय पुनिक युद्ध आरंभ हुआ। कार्थेज के महान सेनानायक हैनीबल ने आल्प्स पर्वत पार कर इटली पर आक्रमण किया और रोमन सेनाओं को अनेक भीषण पराजयों का सामना करना पड़ा। ऐसी कठिन परिस्थितियों में मार्सेलस ने रोमन प्रतिरोध को संगठित रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि वे हैनीबल को निर्णायक रूप से पराजित नहीं कर सके, फिर भी उन्होंने अनेक रणनीतिक नगरों की रक्षा की और कार्थेज की प्रगति को धीमा कर दिया। उनकी आक्रामक नीति ने रोमन सैनिकों का मनोबल बनाए रखा और हैनीबल को निरंतर चुनौती दी।
मार्सेलस का सिसिली अभियान
द्वितीय पुनिक युद्ध के दौरान मार्सेलस को सिसिली में रोमन सेना का नेतृत्व सौंपा गया। उन्होंने लंबे और कठिन अभियान के बाद सिराक्यूज़ (Syracuse) नगर पर अधिकार कर लिया। यह विजय रोमन इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण सैन्य सफलताओं में से एक मानी जाती है। सिराक्यूज़ उस समय यूनानी संस्कृति, विज्ञान और व्यापार का प्रमुख केंद्र था। इसके विजय प्राप्त करने से रोम का सिसिली पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया और कार्थेज का प्रभाव काफी कमज़ोर पड़ गया। इसी अभियान के दौरान महान यूनानी वैज्ञानिक आर्किमिडीज़ की मृत्यु भी हुई, जिसने इस विजय को इतिहास में विशेष रूप से प्रसिद्ध बना दिया।
मार्सेलस का हैनीबल के विरुद्ध अभियान
सिसिली में सफलता के बाद मार्सेलस पुनः इटली लौटे और हैनीबल के विरुद्ध अभियानों का नेतृत्व किया। उन्होंने कई रणनीतिक नगरों को पुनः रोमन नियंत्रण में लिया तथा हैनीबल की सेना की गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखा। यद्यपि हैनीबल एक अत्यंत प्रतिभाशाली सेनानायक था, फिर भी मार्सेलस ने कई अवसरों पर उसे अपनी रणनीति से उलझाए रखा और उसके अभियानों को सीमित करने में सफलता प्राप्त की। उनकी युद्ध शैली तेज़, साहसपूर्ण और आक्रामक थी, जिसके कारण रोमन सैनिकों में उनका अत्यधिक सम्मान था।
युद्ध-कौशल और नेतृत्व
मार्सेलस की सबसे बड़ी विशेषता उनका व्यक्तिगत साहस था। वे युद्धभूमि में अपने सैनिकों के साथ अग्रिम पंक्ति में लड़ते थे और स्वयं जोखिम उठाने से कभी पीछे नहीं हटते थे। वे विशेष रूप से निकट युद्ध में अद्वितीय माने जाते थे। उनकी व्यक्तिगत वीरता ने सैनिकों का मनोबल बढ़ाया और उन्हें एक प्रेरणादायक सेनापति बना दिया। इतिहासकारों का मत है कि मार्सेलस की युद्ध शैली ने रोमन सेना में आक्रामक नेतृत्व की परंपरा को और अधिक सुदृढ़ किया।
मार्सेलस की मृत्यु
208 ईसा पूर्व में दक्षिणी इटली में हैनीबल के विरुद्ध अभियान के दौरान मार्सेलस अपने एक सहयोगी अधिकारी के साथ युद्ध क्षेत्र का निरीक्षण कर रहे थे। इसी समय हैनीबल की सेना ने घात लगाकर उन पर आक्रमण कर दिया। इस आकस्मिक हमले में मार्सेलस वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी मृत्यु रोमन गणराज्य के लिए अत्यंत बड़ी क्षति थी, क्योंकि उस समय वे रोम के सबसे अनुभवी और साहसी सेनानायकों में गिने जाते थे। कहा जाता है कि हैनीबल ने भी उनके साहस का सम्मान किया और उनके अंतिम संस्कार के लिए सम्मानजनक व्यवस्था कराई।
मार्सेलस का ऐतिहासिक मूल्यांकन
मार्कस क्लॉडियस मार्सेलस को रोमन इतिहास के सबसे वीर सेनानायकों में गिना जाता है। उन्होंने गैलिक युद्धों में असाधारण व्यक्तिगत साहस का परिचय दिया, स्पोलिया ओपिमा जैसा सर्वोच्च रोमन सैन्य सम्मान प्राप्त किया तथा द्वितीय पुनिक युद्ध के कठिन समय में रोमन गणराज्य की रक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इतिहासकारों के अनुसार यदि फेबियस मैक्सिमस ने अपनी धैर्यपूर्ण रणनीति से रोम को समय दिया, तो मार्सेलस ने अपनी वीरता और आक्रामक नेतृत्व से उस समय रोमन सैनिकों के आत्मविश्वास और युद्ध क्षमता को जीवित रखा। इसी कारण उनका नाम रोमन गणराज्य के महानतम योद्धाओं और सेनानायकों में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है।
क्विंटस फेबियस मैक्सिमस (280 ई. पू.–203 ई. पू.)
क्विंटस फेबियस मैक्सिमस वेरुकोसस रोमन गणराज्य के महानतम सेनानायकों, राजनेताओं और रणनीतिकारों में से एक थे। वे विशेष रूप से द्वितीय पुनिक युद्ध के दौरान कार्थेज के महान सेनानायक हैनीबल का सफलतापूर्वक सामना करने के लिए प्रसिद्ध हैं। अपनी धैर्यपूर्ण, सावधानीपूर्ण और दूरदर्शी युद्धनीति के कारण उन्हें इतिहास में ‘कंक्टेटर’ अर्थात् ‘विलंब करने वाला’ की उपाधि प्राप्त हुई। फेबियस मैक्सिमस पाँच बार रोमन कौंसल चुने गए और दो बार उन्हें तानाशाह (डिक्टेटर) नियुक्त किया गया। जब हैनीबल ने रोम को लगातार भीषण पराजय दी और पूरा रोमन गणराज्य संकट में पड़ गया, तब फेबियस मैक्सिमस ने अपनी अनूठी सैन्य रणनीति से रोम को विनाश से बचाया। आधुनिक सैन्य इतिहास में उन्हें गुरिल्ला युद्ध तथा क्षयकारी युद्धनीति के प्रारंभिक और सबसे प्रभावशाली रणनीतिकारों में गिना जाता है।
क्सिमस का प्रारंभिक जीवन
फेबियस मैक्सिमस का जन्म लगभग 280 ईसा पूर्व रोम के प्रतिष्ठित फेबिया कुल में हुआ था। उनका परिवार रोमन गणराज्य के सबसे प्रभावशाली और सम्मानित कुलों में से एक था। उन्होंने बचपन से ही सैन्य और प्रशासनिक शिक्षा प्राप्त की। वे गंभीर, अनुशासित, धैर्यवान और दूरदर्शी स्वभाव के थे। जहाँ अनेक रोमन सेनानायक शीघ्र आक्रमण में विश्वास रखते थे, वहीं फेबियस परिस्थितियों का गहराई से अध्ययन कर सोच-समझकर निर्णय लेने के लिए प्रसिद्ध थे। फेबियस मैक्सिमस ने अपने सार्वजनिक जीवन में अनेक महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वे कुल पाँच बार रोमन कौंसल चुने गए, जो उस समय अत्यंत सम्मानजनक उपलब्धि मानी जाती थी। उन्होंने कई बार धार्मिक और प्रशासनिक दायित्व भी निभाए तथा अपनी ईमानदारी, न्यायप्रियता और राजनीतिक अनुभव के कारण सीनेट के सबसे सम्मानित नेताओं में गिने जाने लगे।

क्सिमस की प्रारंभिक सैन्य सफलताएँ
अपने प्रथम कौंसल कार्यकाल के दौरान फेबियस मैक्सिमस ने उत्तरी इटली की गैलिक (सेल्टिक) जनजातियों के विरुद्ध सफल अभियान चलाया। उन्होंने विद्रोही गॉलों को पराजित कर उन्हें आल्प्स पर्वत के पार खदेड़ दिया। इस विजय ने उत्तरी इटली में रोमन प्रभाव को सुदृढ़ किया और उन्हें एक सक्षम सैन्य नेता के रूप में प्रतिष्ठा दिलाई।
द्वितीय पुनिक युद्ध और रोमन संकट
218 ईसा पूर्व में कार्थेज के महान सेनानायक हैनीबल ने आल्प्स पर्वत पार कर इटली पर आक्रमण किया। उसने क्रमशः ट्रेबिया, ट्रासिमीन झील तथा बाद में कैनी जैसे युद्धों में रोमन सेनाओं को भीषण पराजय दी। विशेष रूप से 217 ईसा पूर्व में ट्रासिमीन झील के युद्ध में रोमन कौंसल गायस फ्लामिनियस मारे गए और रोमन सेना लगभग नष्ट हो गई। इस पराजय से पूरे रोमन गणराज्य में भय और अराजकता फैल गई।
ऐसी संकटपूर्ण स्थिति में रोमन सीनेट ने फेबियस मैक्सिमस को तानाशाह (डिक्टेटर) नियुक्त किया, ताकि वे असाधारण अधिकारों के साथ राज्य की रक्षा कर सकें।
फेबियन रणनीति
फेबियस मैक्सिमस की सबसे बड़ी उपलब्धि उनकी प्रसिद्ध ‘फेबियन रणनीति’ थी। उन्होंने यह समझ लिया था कि हैनीबल की सेना खुले मैदान में रोमन सेना से अधिक अनुभवी और कुशल थी। इसलिए उन्होंने सीधे निर्णायक युद्ध करने के स्थान पर एक नई रणनीति अपनाई। फेबियस मैक्सिमस की इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य हैनीबल को खुले मैदान में निर्णायक युद्ध का अवसर न देना था। इसके अंतर्गत वे उसकी सेना का लगातार पीछा करते थे, उसकी रसद एवं आपूर्ति मार्गों को बाधित करते थे और छोटी-छोटी झड़पों के माध्यम से उसकी सैन्य शक्ति को धीरे-धीरे कमजोर करते थे। साथ ही, वे समय को अपने पक्ष में रखते हुए शत्रु को संसाधनों के अभाव में थकाने की नीति अपनाते थे। इस दूरदर्शी रणनीति के परिणामस्वरूप हैनीबल लंबे समय तक इटली में रहने के बावजूद रोम के विरुद्ध कोई निर्णायक विजय प्राप्त नहीं कर सका।
गुरिल्ला युद्ध का अग्रदूत
फेबियस मैक्सिमस की युद्धनीति आधुनिक गुरिल्ला युद्ध और क्षयकारी युद्ध की आधारशिला मानी जाती है। जब उनकी सेना संख्या या शक्ति में कम होती थी, तब वे प्रत्यक्ष संघर्ष के बजाय शत्रु की आपूर्ति व्यवस्था, संचार मार्गों और छोटे सैन्य दलों पर आक्रमण करते थे। उनकी इस रणनीति ने सिद्ध किया कि किसी शक्तिशाली शत्रु को केवल बड़े युद्धों में नहीं, बल्कि उसकी युद्ध क्षमता को धीरे-धीरे समाप्त करके भी पराजित किया जा सकता है।
हैनीबल के विरुद्ध योगदान
यद्यपि फेबियस मैक्सिमस ने हैनीबल के विरुद्ध कोई बड़ी निर्णायक विजय प्राप्त नहीं की, फिर भी उनका योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। उनकी सावधानीपूर्ण नीति के कारण हैनीबल रोम की राजधानी पर अधिकार नहीं कर सका। उन्होंने रोमन सेना को पुनर्गठित होने का समय दिया और सैनिकों का मनोबल बनाए रखा। यदि वे तत्काल निर्णायक युद्ध लड़ते, तो संभव था कि रोम को एक और विनाशकारी पराजय का सामना करना पड़ता। उनकी दूरदर्शिता ने रोमन गणराज्य को पूर्ण विनाश से बचा लिया।
क्सिमस का नेतृत्व और व्यक्तित्व
फेबियस मैक्सिमस धैर्य, आत्मसंयम और विवेक के प्रतीक माने जाते थे। वे परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने में विश्वास रखते थे और अनावश्यक जोखिम से बचते थे। यद्यपि उनके समकालीन अनेक रोमन नागरिक उनकी धीमी युद्धनीति की आलोचना करते थे और उन्हें कायर तक कह देते थे, किंतु समय ने सिद्ध कर दिया कि उनकी नीति ही रोम के लिए सबसे उपयुक्त थी। बाद में रोमन जनता और सीनेट ने उनकी दूरदर्शिता को स्वीकार किया और उन्हें राष्ट्ररक्षक के रूप में सम्मानित किया।
क्सिमस के अंतिम वर्ष और मृत्यु
द्वितीय पुनिक युद्ध के अंतिम चरण तक फेबियस मैक्सिमस रोमन राजनीति और सेना के सबसे सम्मानित नेताओं में बने रहे। उन्होंने युवा सेनानायकों को अपने अनुभव का लाभ दिया और रोम की रक्षा में निरंतर योगदान देते रहे। 203 ईसा पूर्व में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के समय तक वे रोमन गणराज्य के सबसे प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्तियों में गिने जाते थे।
क्सिमस का ऐतिहासिक मूल्यांकन
क्विंटस फेबियस मैक्सिमस को रोमन इतिहास के सबसे महान सैन्य रणनीतिकारों में स्थान प्राप्त है। उन्होंने ऐसे समय में रोम का नेतृत्व किया, जब पूरा गणराज्य अस्तित्व के संकट से जूझ रहा था। उनकी फेबियन रणनीति ने हैनीबल जैसे महान सेनानायक की गति को रोक दिया और रोम को अपनी सैन्य शक्ति पुनः संगठित करने का अमूल्य अवसर प्रदान किया। यद्यपि उन्होंने जूलियस सीज़र, स्किपियो अफ्रीकानुस या ट्राजन की तरह अनेक शानदार विजयों का नेतृत्व नहीं किया, फिर भी उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने रोम को उसके इतिहास के सबसे अंधकारमय काल में विनाश से बचाए रखा। इतिहासकारों के अनुसार यदि स्किपियो अफ्रीकानुस ने अंततः हैनीबल को पराजित किया, तो उसकी पृष्ठभूमि तैयार करने का श्रेय बहुत हद तक फेबियस मैक्सिमस की धैर्यपूर्ण और दूरदर्शी रणनीति को जाता है। इसी कारण उन्हें केवल एक महान सेनानायक ही नहीं, बल्कि प्राचीन विश्व के सर्वश्रेष्ठ सैन्य रणनीतिकारों में भी सम्मानपूर्वक स्थान दिया जाता है। उनकी फेबियन रणनीति आज भी विश्व की सैन्य अकादमियों में अध्ययन का महत्त्वपूर्ण विषय है।
जूलियन (332 ई.–363 ई.)
जूलियन, जिन्हें इतिहास में ‘जूलियन द एपोस्टेट’ अर्थात् ‘धर्मत्यागी जूलियन’ के नाम से भी जाना जाता है, रोमन साम्राज्य के अंतिम महान सैनिक सम्राटों में से एक थे। उन्होंने 361 ईस्वी से 363 ईस्वी तक रोमन सम्राट के रूप में शासन किया। वे कॉन्स्टैन्टिनियन राजवंश के सदस्य थे और अपनी असाधारण सैन्य प्रतिभा, विद्वता, प्रशासनिक सुधारों तथा धार्मिक नीतियों के कारण रोमन इतिहास में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। जूलियन एक कुशल सेनानायक, दार्शनिक, साहित्यकार और सुधारवादी शासक थे। उन्होंने जर्मनिक जनजातियों के विरुद्ध उल्लेखनीय विजय प्राप्त की तथा बाद में सासानी (सस्सानिद) फ़ारसी साम्राज्य के विरुद्ध एक महत्त्वाकांक्षी अभियान का नेतृत्व किया। वे रोमन साम्राज्य के अंतिम गैर-ईसाई (पारंपरिक रोमन बहुदेववादी धर्म का पालन करने वाले) सम्राट थे और उन्होंने प्राचीन रोमन धार्मिक एवं सांस्कृतिक परम्पराओं को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया।

जूलियन का प्रारंभिक जीवन
जूलियन का जन्म 332 ईस्वी में कॉन्स्टैन्टिनोपल अथवा उसके निकट एक शाही परिवार में हुआ था। वे सम्राट कॉन्स्टेंटाइन महान महान के भतीजे थे और कॉन्स्टैन्टिनियन राजवंश से संबंध रखते थे। 337 ईस्वी में कॉन्स्टेंटाइन महान महान की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार संघर्ष प्रारंभ हुआ, जिसमें शाही परिवार के अनेक सदस्यों की हत्या कर दी गई। जूलियन भी इस राजनीतिक हिंसा से बाल-बाल बचे। इसके बाद उनका अधिकांश बचपन निगरानी और एक प्रकार के राजनीतिक निर्वासन में बीता। उन्होंने यूनानी साहित्य, दर्शन, वक्तृत्व, इतिहास तथा धर्म का गहन अध्ययन किया। इसी कारण वे अपने समय के सबसे विद्वान रोमन सम्राटों में गिने जाते हैं। 355 ईस्वी में सम्राट कॉन्स्टैन्टियस द्वितीय ने जूलियन को सीज़र नियुक्त किया और गॉल (वर्तमान फ्रांस और बेल्जियम के अधिकांश भाग) का प्रशासन तथा सैन्य नेतृत्व सौंपा। यद्यपि जूलियन के पास पहले कोई बड़ा सैन्य अनुभव नहीं था, फिर भी उन्होंने शीघ्र ही अपनी असाधारण नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। उन्होंने सेना का पुनर्गठन किया, सैनिकों का मनोबल बढ़ाया और सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा को सुदृढ़ किया।
अर्जेन्टोराटम का महान युद्ध
जूलियन की सबसे प्रसिद्ध सैन्य उपलब्धि 357 ईस्वी में लड़ा गया अर्जेन्टोराटम का युद्ध था, जिसे वर्तमान स्ट्रासबुर्ग के युद्ध के नाम से भी जाना जाता है। इस युद्ध में उनकी सेना की संख्या जर्मनिक अलामानी जनजातियों की सेना की तुलना में बहुत कम थी। अनेक इतिहासकारों के अनुसार शत्रु सेना रोमन सेना से लगभग तीन गुना बड़ी थी।
इसके बावजूद जूलियन ने उत्कृष्ट युद्धनीति, अनुशासित सैनिकों और प्रभावी नेतृत्व के बल पर अलामानी सेना को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। इस विजय से राइन सीमा पुनः सुरक्षित हो गई और गॉल में रोमन शासन मजबूत हो गया। यह युद्ध जूलियन की सैन्य प्रतिभा का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है और इसी विजय ने उन्हें रोमन साम्राज्य के महान सेनानायकों की श्रेणी में स्थापित कर दिया।
जूलियन का सम्राट के रूप में अभ्युदय
जूलियन की बढ़ती लोकप्रियता से सम्राट कॉन्स्टैन्टियस द्वितीय चिंतित हो गए। दोनों के बीच राजनीतिक तनाव बढ़ने लगा और गृहयुद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई। किंतु संघर्ष निर्णायक रूप लेने से पहले ही 361 ईस्वी में कॉन्स्टैन्टियस द्वितीय की मृत्यु हो गई। इसके बाद जूलियन निर्विरोध रूप से संपूर्ण रोमन साम्राज्य के सम्राट बन गए, क्योंकि उनके अधिकार को चुनौती देने वाला कोई प्रभावशाली दावेदार शेष नहीं था।
जूलियन के प्रशासनिक सुधार
सम्राट बनने के बाद जूलियन ने शासन व्यवस्था में अनेक सुधार किए। उन्होंने राजकोषीय अपव्यय को कम किया, शाही दरबार के अनावश्यक खर्चों में कटौती की तथा प्रशासन में भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने का प्रयास किया। उन्होंने योग्य अधिकारियों की नियुक्ति को प्रोत्साहित किया और न्याय व्यवस्था को अधिक निष्पक्ष बनाने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य एक सुदृढ़, अनुशासित और उत्तरदायी शासन की स्थापना करना था।
जूलियन की धार्मिक नीति
जूलियन का नाम विशेष रूप से उनकी धार्मिक नीति के कारण प्रसिद्ध है। वे रोमन साम्राज्य के अंतिम गैर-ईसाई सम्राट थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती सम्राटों द्वारा अपनाई गई ईसाई समर्थक नीतियों के स्थान पर प्राचीन रोमन बहुदेववादी धर्म को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। उन्होंने प्राचीन मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया, पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों को पुनः आरंभ किया तथा प्राचीन यूनानी-रोमन संस्कृति को प्रोत्साहन दिया। यद्यपि उन्होंने ईसाइयों के विरुद्ध व्यापक हिंसा नहीं की, फिर भी उन्होंने चर्च को प्राप्त अनेक विशेषाधिकार समाप्त कर दिए और राज्य को किसी एक धर्म के प्रभाव से मुक्त रखने का प्रयास किया। उनका विश्वास था कि यदि रोमन साम्राज्य को पुनः शक्तिशाली बनाना है, तो उसे अपनी प्राचीन सांस्कृतिक और धार्मिक परम्पराओं की ओर लौटना होगा।
जूलियन का सासानी साम्राज्य के विरुद्ध अभियान
362 ईस्वी के अंत में जूलियन ने रोमन साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी सासानी (सस्सानिद) फ़ारसी साम्राज्य के विरुद्ध एक विशाल सैन्य अभियान प्रारंभ किया। उन्होंने बड़ी सेना के साथ मेसोपोटामिया की ओर प्रस्थान किया और प्रारंभिक चरण में उल्लेखनीय सफलताएँ प्राप्त कीं। रोमन सेना ने अनेक किलों और नगरों पर अधिकार कर लिया तथा फ़ारसी राजधानी क्टेसीफ़ोन के निकट तक पहुँच गई। किंतु फ़ारसी सेना ने सीधे निर्णायक युद्ध करने के बजाय रोमन सेना की रसद व्यवस्था को बाधित करना आरंभ कर दिया। भोजन और आपूर्ति की कमी के कारण रोमन सेना कठिन परिस्थितियों में फँस गई और जूलियन को पीछे हटने का निर्णय लेना पड़ा।
जूलियन की मृत्यु
363 ईस्वी में वापसी के दौरान एक भीषण युद्ध में जूलियन गंभीर रूप से घायल हो गए। युद्ध के दौरान उन्हें भाले का घाव लगा, जिससे उनकी स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई। कुछ समय बाद, लगभग 32 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के साथ ही फ़ारसी अभियान समाप्त हो गया और उनके उत्तराधिकारी जोवियन को फ़ारस के साथ अपेक्षाकृत प्रतिकूल शांति-संधि करनी पड़ी। जूलियन की मृत्यु ने रोमन साम्राज्य को एक प्रतिभाशाली सेनानायक और विद्वान शासक से वंचित कर दिया।
जूलियन का व्यक्तित्व और बौद्धिक योगदान
जूलियन केवल एक महान सेनानायक ही नहीं, बल्कि एक विद्वान दार्शनिक, लेखक और विचारक भी थे। उन्होंने दर्शन, धर्म, राजनीति और नैतिकता पर अनेक ग्रंथ लिखे। वे यूनानी दर्शन, विशेषकर नव-प्लेटोनिक विचारधारा से अत्यधिक प्रभावित थे। इतिहासकार उन्हें एक ऐसे शासक के रूप में देखते हैं, जिसमें सैनिक, दार्शनिक, समाज-सुधारक और साहित्यकार—चारों गुण एक साथ विद्यमान थे।
जूलियन का ऐतिहासिक मूल्यांकन
जूलियन को रोमन इतिहास के सबसे प्रतिभाशाली सैनिक सम्राटों में स्थान प्राप्त है। उन्होंने गॉल में जर्मनिक जनजातियों को पराजित कर साम्राज्य की सीमाओं को सुरक्षित बनाया, प्रशासनिक सुधार किए तथा रोमन साम्राज्य को पुनः उसकी प्राचीन सांस्कृतिक और नैतिक परम्पराओं की ओर लौटाने का प्रयास किया। यद्यपि उनका शासनकाल केवल लगभग दो वर्ष का था, फिर भी उनकी सैन्य सफलताओं, विद्वता और सुधारवादी दृष्टिकोण ने उन्हें रोमन इतिहास का एक विशिष्ट शासक बना दिया। उनकी फ़ारसी अभियान के दौरान हुई असामयिक मृत्यु ने उनकी अनेक योजनाओं को अधूरा छोड़ दिया। अधिकांश इतिहासकारों का मत है कि यदि जूलियन अधिक समय तक जीवित रहते, तो संभवतः रोमन साम्राज्य की राजनीतिक, सैन्य और धार्मिक दिशा कुछ भिन्न होती। उनकी सैन्य प्रतिभा, बौद्धिक क्षमता और प्रशासनिक दृष्टि के कारण उनका नाम प्राचीन रोम के सबसे उल्लेखनीय सम्राटों और महान सेनानायकों में सम्मानपूर्वक लिया जाता है।

रोमन इतिहास से स्पष्ट है कि किसी भी साम्राज्य की शक्ति केवल उसके सम्राटों पर निर्भर नहीं होती, बल्कि उन कुशल सेनानायकों पर भी आधारित होती है, जो अपने साहस, नेतृत्व, रणनीति और दूरदर्शिता से उसकी सीमाओं की रक्षा करते हैं तथा उसके विस्तार का मार्ग प्रशस्त करते हैं। रोमन गणराज्य और रोमन साम्राज्य के इतिहास में अनेक ऐसे महान जनरल हुए, जिन्होंने अपने असाधारण सैन्य कौशल और प्रशासनिक क्षमता के बल पर रोम को प्राचीन विश्व की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति बनने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
स्किपियो अफ्रीकानुस ने हैनीबल जैसे महान प्रतिद्वंद्वी को पराजित कर रोम की सर्वोच्चता स्थापित की, जबकि क्विंटस फेबियस मैक्सिमस ने अपनी धैर्यपूर्ण और दूरदर्शी रणनीति से संकट की घड़ी में रोम को विनाश से बचाया। जूलियस सीज़र ने अपने सैन्य अभियानों के माध्यम से रोम की सीमाओं का अभूतपूर्व विस्तार किया और रोमन राजनीति की दिशा बदल दी। मार्कस विप्सानियस अग्रिप्पा ने ऑगस्टस को साम्राज्य की स्थापना में निर्णायक सहायता प्रदान की, जबकि ट्राजन ने रोमन साम्राज्य को उसके इतिहास की सबसे बड़ी भौगोलिक सीमा तक पहुँचाया।
इसी प्रकार गायस मारियस, लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला, पोम्पियस महान, मार्कस क्लॉडियस मार्सेलस, एमिलियस पॉलस, ऑरेलियन, कॉन्स्टेंटाइन महान महान, डायोक्लेटियन, सेप्टिमियस सेवेरस, जूलियन तथा अन्य अनेक सेनानायकों ने विभिन्न कालों में आंतरिक विद्रोहों, गृहयुद्धों और विदेशी आक्रमणों का सफलतापूर्वक सामना किया। इन सेनानायकों ने केवल युद्धों में विजय ही प्राप्त नहीं की, बल्कि प्रशासनिक सुधारों, सैन्य संगठन, सीमाओं की सुरक्षा तथा साम्राज्य की स्थिरता में भी उल्लेखनीय योगदान दिया।
रोमन जनरलों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे परिस्थितियों के अनुसार अपनी युद्धनीति बदलने में सक्षम थे। किसी ने तीव्र आक्रमण की नीति अपनाई, तो किसी ने धैर्य, गुरिल्ला युद्ध, रसद नियंत्रण और दीर्घकालीन रणनीति के माध्यम से सफलता प्राप्त की। उनकी सैन्य दूरदर्शिता, अनुशासन, संगठन क्षमता तथा नेतृत्व शैली आज भी विश्व की सैन्य अकादमियों और इतिहास के विद्यार्थियों के लिए अध्ययन का महत्त्वपूर्ण विषय है।
यद्यपि इन महान सेनानायकों में से अनेक ने असाधारण सफलताएँ प्राप्त कीं, फिर भी उनके जीवन से यह भी स्पष्ट होता है कि सत्ता, महत्वाकांक्षा और राजनीतिक संघर्ष किसी भी महान व्यक्तित्व के जीवन को गहराई से प्रभावित कर सकते हैं। अनेक सेनानायक युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए, जबकि कुछ राजनीतिक षड्यंत्रों और विश्वासघात का शिकार बने। इसके बावजूद उनकी उपलब्धियों ने उन्हें इतिहास में अमर बना दिया।
निस्संदेह, रोमन जनरलों की वीरता, संगठन क्षमता, रणनीतिक बुद्धिमत्ता और राष्ट्र के प्रति समर्पण ने रोमन गणराज्य और रोमन साम्राज्य को लगभग एक सहस्राब्दी तक विश्व की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाई। उनका सैन्य कौशल, नेतृत्व और राष्ट्रनिर्माण में योगदान आज भी इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में सुरक्षित है तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा और अध्ययन का महत्त्वपूर्ण स्रोत बना रहेगा।




