नीरो (Nero)

नीरो क्लॉडियस सीज़र ड्रूसस जर्मेनिकस (54–68 ई.)

नीरो रोमन साम्राज्य के जूलियो-क्लाउडियन वंश का अंतिम सम्राट था। 54 ईस्वी में सम्राट क्लॉडियस की मृत्यु के बाद वह प्रेटोरियन गार्ड और सीनेट के समर्थन से रोमन सिंहासन पर बैठा। शासन के प्रारंभिक वर्षों में उसकी माता एग्रीपिना, गुरु सेनेका तथा प्रेटोरियन प्रीफेक्ट सेक्स्टस अफ्रानियस बुरस का उस पर गहरा प्रभाव था, किंतु शीघ्र ही उसने स्वतंत्र रूप से शासन करना प्रारंभ कर दिया। इस प्रक्रिया में उसकी माता के साथ सत्ता-संघर्ष उत्पन्न हुआ, जो अंततः उसकी हत्या पर समाप्त हुआ। रोमन परंपराओं के अनुसार उसकी पत्नी क्लॉडिया ऑक्टेविया और सौतेले भाई ब्रिटानिकस की मृत्यु के लिए भी नीरो को उत्तरदायी माना जाता है। उसके शासनकाल में कूटनीति, व्यापार, कला और सांस्कृतिक गतिविधियों को विशेष प्रोत्साहन मिला। वह स्वयं संगीत, काव्य, अभिनय और रथ-दौड़ में रुचि लेता था, जिससे सामान्य जनता में उसकी लोकप्रियता बढ़ी, यद्यपि रोमन अभिजात वर्ग उसके इस व्यवहार को सम्राट की गरिमा के प्रतिकूल मानता था।

नीरो के शासनकाल में रोमन साम्राज्य ने अनेक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक और सैन्य घटनाओं का सामना किया। सेनापति ग्नेयस डोमिटियस कोर्बुलो ने पार्थिया के साथ संघर्ष में सफलता प्राप्त कर शांति स्थापित की, जबकि ब्रिटेन में रानी बौडिका के विद्रोह का दमन किया गया। इसी काल में प्रथम यहूदी-रोमन युद्ध भी प्रारंभ हुआ। किंतु शासन के अंतिम वर्षों में उसके विरुद्ध असंतोष बढ़ता गया और 68 ईस्वी में विंडेक्स तथा गैल्बा के विद्रोह के बाद सीनेट ने उसे ‘सार्वजनिक शत्रु’ घोषित कर दिया। परिणामस्वरूप 9 जून 68 ईस्वी को उसने आत्महत्या कर ली।

प्राचीन रोमन स्रोतों में नीरो को प्रायः अत्याचारी, विलासी और क्रूर शासक के रूप में चित्रित किया गया है, विशेषकर रोम की भीषण आग तथा ईसाइयों पर हुए अत्याचारों के संदर्भ में। किंतु आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि इन विवरणों में राजनीतिक पूर्वाग्रहों का प्रभाव है, क्योंकि नीरो अपने समय में सामान्य जनता के एक बड़े वर्ग के बीच लोकप्रिय बना रहा।

प्रारंभिक जीवन

नीरो का जन्म 15 दिसंबर 37 ईस्वी को एंटियम (वर्तमान एन्ज़ियो, इटली) में हुआ था। वह प्रसिद्ध रोमन राजनीतिज्ञ ग्नियस डोमिटियस अहेनोबारबस और एग्रीपिना कनिष्ठ (एग्रीपिना द यंगर) की एकमात्र संतान था। उसके मामा तत्कालीन रोमन सम्राट कैलीगुला थे। इसके अतिरिक्त, वह रोमन साम्राज्य के प्रथम सम्राट ऑगस्टस का भी वंशज था, क्योंकि उसकी माता ऑगस्टस की पुत्री जूलिया की वंश-परंपरा से संबंधित थीं। इस प्रकार जन्म से ही नीरो का संबंध रोमन साम्राज्य के प्रतिष्ठित शाही परिवार से था। लगभग 39 ईस्वी में नीरो की माता एग्रीपिना, मार्कस एमिलियस लेपिडस द्वारा रचे गए एक षड्यंत्र में फँस गईं, जिसका उद्देश्य सम्राट कैलीगुला को अपदस्थ करना था। इसके परिणामस्वरूप कैलीगुला ने अपनी बहनों एग्रीपिना और लिविला को भूमध्य सागर के एक दूरस्थ द्वीप पर निर्वासित कर दिया। इसी दौरान लगभग 40 ईस्वी में नीरो के पिता डोमिटियस की मृत्यु हो गई। पिता की मृत्यु के बाद कैलीगुला ने नीरो की पैतृक संपत्ति जब्त कर ली और उसका पालन-पोषण उसकी बुआ डोमिटिया लेपिडा के संरक्षण में होने लगा। डोमिटिया लेपिडा बाद में सम्राट क्लॉडियस की तीसरी पत्नी मेसालिना की माता थीं।

कैलीगुला की मृत्यु के बाद क्लॉडियस रोमन सम्राट बना और एग्रीपिना का निर्वासन समाप्त हो गया। 49 ईस्वी में एग्रीपिना ने क्लॉडियस से विवाह कर उनकी चौथी पत्नी का स्थान प्राप्त किया। इसके बाद उसने अपने पुत्र के उत्तराधिकार को सुरक्षित बनाने के लिए निरंतर प्रयास किया। फलतः 25 फरवरी 50 ईस्वी को क्लॉडियस ने नीरो को विधिवत गोद लिया और उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। इस अवसर पर उसका नया नाम “नीरो क्लॉडियस सीज़र ड्रूसस जर्मेनिकस” रखा गया। इसके साथ ही नीरो का राजनीतिक महत्त्व तेजी से बढ़ने लगा।

51 ईस्वी में मात्र तेरह वर्ष की आयु में नीरो ने औपचारिक रूप से सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया। सोलह वर्ष की आयु में उसका विवाह क्लॉडियस की पुत्री तथा सौतेली बहन क्लॉडिया ऑक्टेविया से कर दिया गया, जिससे उसका उत्तराधिकार और अधिक सुदृढ़ हो गया। 51 से 53 ईस्वी के बीच उसने विभिन्न नगरों और समुदायों की ओर से सीनेट में कई महत्त्वपूर्ण भाषण दिए। इनमें इलियन, अपामिया तथा उत्तरी इटली के नगर बोलोग्ना की ओर से दिए गए भाषण विशेष रूप से उल्लेखनीय थे। इन भाषणों ने उसे एक सक्षम और भावी शासक के रूप में प्रतिष्ठित करने में विशेष भूमिका निभाई।

54 ईस्वी में सम्राट क्लॉडियस की मृत्यु हो गई। अनेक प्राचीन इतिहासकारों, विशेषकर टैसिटस, सुएटोनियस और कैसियस डियो का दावा है कि एग्रीपिना ने उसे विष देकर मरवाया था, क्योंकि क्लॉडियस अपने पुत्र ब्रिटानिकस के प्रति पुनः स्नेह प्रदर्शित करने लगे थे और इससे नीरो के उत्तराधिकार को खतरा उत्पन्न हो सकता था। टैसिटस के अनुसार लोकुस्टा नामक विष-विशेषज्ञ ने विष तैयार किया था, जिसे हैलोटस नामक सेवक ने क्लॉडियस को दिया। सुएटोनियस और कैसियस डियो भी एग्रीपिना को इस षड्यंत्र के लिए उत्तरदायी ठहराते हैं, यद्यपि उनके विवरणों में कुछ भिन्नताएँ हैं। दूसरी ओर, यहूदी-रोमन इतिहासकार जोसेफस ने विषप्रयोग की कथा को केवल एक अफवाह बताया है, जबकि सेनेका की रचना अपोकोलोसिंटोसिस में भी इस घटना का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। आधुनिक इतिहासकार क्लॉडियस की मृत्यु में एग्रीपिना की भूमिका को लेकर एक मत नहीं है।

क्लॉडियस की मृत्यु से पूर्व एग्रीपिना ने नीरो के उत्तराधिकार को सुनिश्चित करने के लिए कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए। उसने क्लॉडियस के पुत्रों के शिक्षकों को हटवाकर उनकी जगह अपने विश्वस्त व्यक्तियों को नियुक्त कराया। साथ ही, प्रेटोरियन गार्ड के उन अधिकारियों को भी पदच्युत कराया जिन पर ब्रिटानिकस का समर्थन करने का संदेह था। उनके स्थान पर अफ्रानियस बुरस को नियुक्त किया गया, जो आगे चलकर नीरो के प्रमुख सलाहकार और संरक्षक बने। प्रेटोरियन गार्ड तथा दरबार के प्रमुख पदों पर अपने समर्थकों की नियुक्ति कर एग्रीपिना ने यह सुनिश्चित कर दिया कि क्लॉडियस की मृत्यु के बाद सत्ता का हस्तांतरण बिना किसी गंभीर विरोध के नीरो के पक्ष में हो। इस प्रकार 54 ईस्वी में केवल सोलह वर्ष की आयु में नीरो रोमन साम्राज्य का सम्राट बन गया।

शासनकाल (54–68 ई.)

क्लॉडियस की मृत्यु के बाद प्रेटोरियन गार्ड और सीनेट के समर्थन से नीरो 54 ईस्वी में मात्र 16 वर्ष की आयु में रोमन साम्राज्य का सम्राट बना। सीनेट के समक्ष दिए गए अपने पहले भाषण में नीरो ने पूर्ववर्ती शासन की कमियों को दूर करने तथा सुशासन स्थापित करने का आश्वासन दिया। इतिहासकार एच. एच. स्कुलार्ड के अनुसार उसने ऑगस्टस की शासन-परंपरा का अनुसरण करने, गुप्त न्यायिक प्रक्रियाओं को समाप्त करने, दरबारी चहेतों एवं मुक्तदासों के भ्रष्टाचार पर नियंत्रण लगाने तथा सीनेट और सीनेटरों के विशेषाधिकारों का सम्मान करने का वचन दिया।

शासन के प्रारंभिक वर्षों में उसकी माता एग्रीपिना का प्रभाव अत्यधिक था। एग्रीपिना अपने पुत्र के माध्यम से शासन करना चाहती थी, इसलिए  उसने अपने राजनीतिक विरोधियों को हटाने का प्रयास किया। उसके आदेश पर डोमिटिया लेपिडा कनिष्ठ, मार्कस जूनियस सिलानस तथा नार्सिसस जैसे व्यक्तियों का अंत कर दिया गया। इस काल में जारी कुछ सिक्कों पर एग्रीपिना का चित्र भी अंकित किया गया, जो सामान्यतः सम्राट के लिए सुरक्षित रहता था। सीनेट ने उसे सार्वजनिक समारोहों में दो लिक्टर रखने का विशेष अधिकार भी प्रदान किया, जो प्रायः उच्च अधिकारियों और वेस्टालिस मैक्सिमा को ही प्राप्त होता था।

55 ईस्वी में नीरो ने एग्रीपिना के समर्थक मार्कस एंटोनियस पल्लास को राजकोषीय पद से हटा दिया। इसके बाद माँ और पुत्र के संबंधों में तनाव उत्पन्न हो गया। इतिहासकार डेविड शॉटर के अनुसार सेनेका और बुरस जिन गतिविधियों को नीरो के लिए सामान्य मानते थे, जैसे उसकी सांस्कृतिक रुचियाँ और दासी क्लाउडिया एक्टे के साथ उसका प्रेम संबंध, उन्हें एग्रीपिना अपने प्रभाव के क्षीण होने के संकेत के रूप में देखती थी। जब एग्रीपिना ने ब्रिटानिकस का समर्थन करने की धमकी दी, तब ब्रिटानिकस को विष देकर मार दिया गया। बाद में नीरो ने एग्रीपिना को राजमहल से दूर कर दिया और वह अपनी पत्नी ऑक्टेविया तथा क्लाउडिया एक्टे के साथ रहने लगा।

प्रारंभिक वर्षों में प्रशासनिक निर्णयों में नीरो की व्यक्तिगत भूमिका कितनी थी, इसका स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इस काल की अधिकांश सफलताओं का श्रेय सामान्यतया उसके प्रमुख सलाहकारों सेनेका और अफ्रानियस बुरस को दिया जाता है। फिर भी, नीरो का प्रारंभिक शासन इतना सफल था कि बाद की पीढ़ियों ने उसे आदर्श प्रशासन का उदाहरण बताया। सम्राट ट्राजन ने इस अवधि को ‘क्विनक्वेनियम नीरोनिस’ (नीरो का पाँच वर्षीय स्वर्णकाल) कहा था।

इस काल में कई महत्त्वपूर्ण वित्तीय सुधार किए गए। कर-संग्रहकर्ताओं पर नियंत्रण स्थापित करने हेतु स्थानीय कार्यालयों की स्थापना की गई और प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक उत्तरदायी बनाया गया। रोम के नगर-प्रिफेक्ट लुसियस पेडानियस सेकुंडस की हत्या (61 ई.) उसके ही एक दास द्वारा कर दी गई। रोमन परंपरा के अनुसार सीनेट ने उसके घर के सभी दासों को सामूहिक रूप से मृत्युदंड का निर्णय लिया। इस निर्णय का कुछ जन-विरोध हुआ, परंतु अंततः परंपरागत कानून के अनुसार लगभग 400 दासों को दंडित किया गया।

रोम के बाहर भी नीरो ने अनेक भव्य निर्माण कराए। एंटियम स्थित अपने जन्मस्थान पर उसने एक विशाल राजप्रासाद का निर्माण करवाया, जिसमें रंगमंच भी सम्मिलित था। रोम के निकट लाज़ियो के सुबियाको में उसने विशाल तीन कृत्रिम झीलों का निर्माण कराया, जिनके चारों ओर पुल, झरने और विलासपूर्ण भवन बनाए गए। यूनान की यात्रा के दौरान वह ओलंपिया स्थित अपने राजप्रासाद में भी ठहरा था।

एग्रीपिना की हत्या

59 ईस्वी में नीरो और उसकी माता एग्रीपिना के संबंध पूरी तरह बिगड़ गए। प्राचीन स्रोतों के अनुसार नीरो ने अपने विश्वस्त पूर्व मुक्तदास तथा नौसैनिक बेड़े के अधिकारी एनिकेटस की सहायता से एक जहाज़ दुर्घटना की योजना बनाई, जिसका उद्देश्य एग्रीपिना की हत्या करना था। यद्यपि वह दुर्घटना से बचकर तैरते हुए किनारे तक पहुँच गई, परंतु बाद में एनिकेटस ने उसकी हत्या कर दी। एग्रीपिना की हत्या को आत्महत्या का रूप देने का प्रयास किया गया।

एग्रीपिना की हत्या के कारणों को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। टैसिटस के अनुसार इसका प्रमुख कारण पोपेया सबीना के साथ नीरो का प्रेम संबंध था, जिसका एग्रीपिना विरोध करती थी। किंतु आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि एग्रीपिना की मृत्यु से पहले तक नीरो का शासन अपेक्षाकृत सफल था। इसी काल में नील नदी के उद्गम की खोज के लिए एक अभियान भेजा गया। एग्रीपिना के हटने के बाद साम्राज्य का वास्तविक प्रशासन मुख्यतः सेनेका और बुरस के हाथों में रहा। परंतु अनेक इतिहासकारों के अनुसार अपनी माता की मृत्यु के बाद नीरो के व्यवहार में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देने लगा।

इतिहासकार मिरियम टी. ग्रिफिन का मत है कि नीरो का नैतिक पतन वास्तव में 55 ईस्वी में ब्रिटानिकस की हत्या से प्रारंभ हो चुका था, किंतु एग्रीपिना की मृत्यु के बाद यह प्रवृत्ति और अधिक तीव्र हो गई। टैसिटस के विवरण से भी संकेत मिलता है कि एग्रीपिना के प्रभाव के समाप्त होने के बाद नीरो ने चापलूसों और स्वार्थी दरबारियों पर अधिक विश्वास करना प्रारंभ कर दिया।

बौडिका का विद्रोह

59 ईस्वी के आसपास ब्रिटानिया (ब्रिटेन) में इकेनी जनजाति के शासक तथा रोम के आश्रित राजा प्रसुतागस की मृत्यु हो गई। अपनी वसीयत में उसने अपने राज्य का उत्तराधिकार अपनी पुत्रियों को सौंपा था, किंतु रोमन प्रशासन ने इसे स्वीकार नहीं किया। इसके बाद रोमन रोमन प्रोक्यूरेटर कैटस डेसियनस ने प्रसुतागस की पत्नी बौडिका तथा उसकी पुत्रियों के साथ दुर्व्यवहार किया। इस घटना से आक्रोशित होकर इकेनी जनजाति ने विद्रोह कर दिया।

इस विद्रोह में ट्रिनोवेंट्स नामक सेल्टिक जनजाति भी सम्मिलित हो गई। परिणामस्वरूप यह प्रथम शताब्दी ईस्वी का ब्रिटेन में रोमन शासन के विरुद्ध सबसे बड़ा प्रांतीय विद्रोह बन गया। रानी बौडिका के नेतृत्व में विद्रोहियों ने कैमुलोडुनम (कोलचेस्टर), लोंडिनियम (लंदन) और वेरुलामियम (सेंट एल्बंस) जैसे प्रमुख नगरों को जला दिया। इस संघर्ष में रोमन सेना की एक बड़ी टुकड़ी भी नष्ट हो गई।

ब्रिटानिया के गवर्नर सुएटोनियस पॉलिनस ने अपनी शेष सेनाओं को संगठित कर विद्रोहियों को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। यद्यपि व्यवस्था पुनः स्थापित हो गई, फिर भी बौडिका के विद्रोह की भीषणता को देखते हुए नीरो ने कुछ समय के लिए ब्रिटानिया प्रांत को त्याग देने तक पर विचार किया था। बाद में जूलियस क्लासिकियानस ने प्रोक्यूरेटर कैटस डेसियनस का स्थान लिया और नीरो को सलाह दी कि पॉलिनस को पद से हटाया जाए, क्योंकि वह विद्रोह समाप्त होने के बाद भी स्थानीय जनता के प्रति कठोर नीति अपनाए हुए था। परिणामस्वरूप नीरो ने अधिक उदार नीति अपनाते हुए पेट्रोनियस टर्पिलियनस को नया गवर्नर नियुक्त किया।

लगभग 60 ईस्वी में नीरो ने अपने नए संयोजक राजप्रासाद (डोमस ट्रांजिटोरिया) के निर्माण का कार्य आरंभ कराया, जिसका उद्देश्य पैलेटाइन पहाड़ी पर स्थित शाही भवनों को विभिन्न उद्यानों और राजकीय संपत्तियों से जोड़ना था।

62 ईस्वी में उसके प्रमुख सलाहकार सेक्स्टस अफ्रानियस बुरस की मृत्यु हो गई। इसी वर्ष नीरो ने अपने शासनकाल का पहला राजद्रोह मुकदमा चलाया तथा अपने प्रतिद्वंद्वियों कॉर्नेलियस सुल्ला तथा रुबेलियस प्लॉटस को मृत्युदंड दिलवाया। यह घटना सीनेट और नीरो के संबंधों में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ थी। इसके बाद नीरो ने वह संयम छोड़ दिया, जो उसने शासन के प्रारंभिक वर्षों में प्रदर्शित किया था।

बुरस की मृत्यु के बाद फेनियस रूफस और ओफोनियस टिगेलिनस को प्रेटोरियन गार्ड का नया प्रीफेक्ट नियुक्त किया गया। इसी समय सेनेका भी सक्रिय राजनीति से अलग हो गया। टैसिटस के अनुसार नीरो ने अपनी पत्नी ऑक्टेविया को बाँझपन के आरोप में तलाक देकर निर्वासित कर दिया। जब जनता ने इसका विरोध किया, तब उस पर व्यभिचार का आरोप लगाकर उसे मृत्युदंड दे दिया गया। इसके पश्चात नीरो ने पोपेया सबीना से विवाह कर लिया। कुछ प्राचीन स्रोतों के अनुसार 64 ईस्वी में सैटर्नेलिया उत्सव के दौरान नीरो ने पाइथागोरस नामक मुक्तदास के साथ प्रतीकात्मक विवाह समारोह भी संपन्न किया था।

पार्थिया के साथ शांति

नीरो के शासनकाल के प्रारंभिक वर्षों में ही रोम और पार्थिया के बीच अर्मेनिया को लेकर संघर्ष आरंभ हो गया था। पार्थिया के राजा वोलोगेसेस प्रथम (51-78 ई.) ने अपने भाई तिरिदातेस को अर्मेनिया के सिंहासन पर बैठा दिया था, जिसे रोम ने स्वीकार नहीं किया। 57–58 ईस्वी में रोमन सेनापति ग्नियस डोमिटियस कोरबुलो ने अर्मेनिया पर आक्रमण किया और उसकी राजधानी आर्टाक्साटा पर अधिकार कर लिया। इसके बाद तिरिदातेस को हटाकर टाइग्रेन्स को अर्मेनिया का शासक बनाया गया। किंतु जब अर्मेनिया के राजा टाइग्रेन्स ने आदिआबेने राज्य पर आक्रमण किया, तब पार्थिया ने पुनः हस्तक्षेप किया और संघर्ष फिर से आरंभ हो गया।

आरंभ में रोमन सेनाओं को सफलता मिली, किंतु बाद में लुसियस केसैनियस पेटस के नेतृत्व वाली रोमन सेना को अपमानजनक परिस्थितियों में आत्मसमर्पण करना पड़ा। अंततः दोनों पक्षों ने समझौते का मार्ग अपनाया। 63 ईस्वी में बातचीत के परिणामस्वरूप यह तय हुआ कि तिरिदातेस अर्मेनिया का राजा रहेगा, परंतु उसे अपना राजमुकुट रोमन सम्राट नीरो से प्राप्त करना होगा।

66 ईस्वी में रोम में तिरिदातेस का भव्य राज्याभिषेक संपन्न हुआ, जहाँ उसने सम्राट नीरो से अर्मेनिया का मुकुट ग्रहण किया। कैसियस डियो के अनुसार तिरिदातेस ने नीरो को संबोधित करते हुए कहा : ‘हे प्रभु! मैं आपके समक्ष उपस्थित हुआ हूँ और आपकी पूजा मिथ्रास के समान करता हूँ।’ इतिहासकार डेविड शॉटर के अनुसार यह सम्मान उन उपाधियों के समान था, जो पूर्वी प्रांतों में नीरो को ‘नया अपोलो’ तथा ‘नया सूर्य’ कहकर प्रदान की जाती थी।

रोमन–पार्थियन समझौते के बाद रोम, पार्थिया और अर्मेनिया के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित हो गए। अर्मेनिया की राजधानी आर्टाक्साटा का नाम नगर का नाम कुछ समय के लिए बदलकर ‘नेरोनिया’ रख दिया गया था, जो सम्राट नीरो के सम्मान में दिया गया नाम था।

रोम की भीषण आग (64 ई.)

18–19 जुलाई 64 ईस्वी की रात रोम में एक भीषण अग्निकांड हो गया। इसकी शुरुआत एवेंटाइन पहाड़ी की ढलान पर स्थित सर्कस मैक्सिमस के सामने किसी व्यापारी की दुकान अथवा सर्कस की लकड़ी की बाहरी दर्शक-दीर्घा से हुई थी। तेज़ हवाओं के कारण यह आग ने शीघ्र ही विकराल रूप धारण कर लिया।

इस अग्निकांड में रोम की एवेंटाइन, पैलेटाइन तथा कैलियन पहाड़ियों पर स्थित अनेक भवन, मंदिर, सार्वजनिक संरचनाएँ तथा आवासीय क्षेत्र नष्ट हो गए। आग सात दिनों तक लगातार जलती रही। उसके शांत होने के बाद पुनः भड़क उठी और तीन दिनों तक और फैलती रही। परिणामस्वरूप रोम के चौदह प्रशासनिक क्षेत्रों में से तीन पूर्णतः नष्ट हो गए, जबकि सात अन्य क्षेत्र गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए।

कुछ लोगों का मानना था कि यह आग एक दुर्घटना थी, क्योंकि व्यापारिक दुकानों और सर्कस की अधिकांश संरचनाएँ लकड़ी की बनी हुई थीं तथा उनमें ज्वलनशील वस्तुएँ रखी जाती थीं। दूसरी ओर, अनेक लोगों का आरोप है कि सम्राट नीरो ने स्वयं यह आग लगवाई थी। प्लिनी ज्येष्ठ, सुएटोनियस तथा कैसियस डियो जैसे लेखकों के अनुसार नीरो संभवतः ट्रॉय के विनाश पर आधारित अपने नाटकीय प्रदर्शन के लिए वास्तविक पृष्ठभूमि तैयार करना चाहता था अथवा अपने भव्य ‘स्वर्ण महल’ (डोमस ऑरिया) के निर्माण हेतु भूमि खाली कराना चाहता था।

सुएटोनियस के अनुसार नीरो ने अपने नियोजित स्वर्ण महल के लिए स्थान बनाने के उद्देश्य से आग लगवाई थी। सुएटोनियस और कैसियस डियो का यह भी दावा है कि नगर में आग लगने के समय नीरो मंचीय वेशभूषा धारण कर ट्रॉय (इलियम) की लूट का गीत गा रहा था। किंतु आधुनिक इतिहासकार इस कथा को साहित्यिक कल्पना का परिणाम मानते हैं।

टैसिटस ने आग के लिए नीरो को सीधे दोषी नहीं ठहराया है। उनके अनुसार आग लगने के समय नीरो एंटियम ((एन्ज़ियो) में था और घटना की सूचना मिलते ही वह रोम लौट आया। उसने राहत कार्यों का संचालन किया, मलबा हटाने की व्यवस्था की तथा प्रभावित लोगों की सहायता के लिए अपने निजी संसाधनों का उपयोग किया। उसने बेघर लोगों के लिए अपने महलों के द्वार खोल दिए और खाद्यान्न की आपूर्ति सुनिश्चित की ताकि अकाल जैसी स्थिति उत्पन्न न हो।

टैसिटस के अनुसार अपने ऊपर लगे संदेह को दूर करने के लिए नीरो ने ईसाइयों को आगजनी के लिए उत्तरदायी ठहराया। इसके परिणामस्वरूप अनेक ईसाइयों को गिरफ्तार किया गया तथा उन्हें सूली पर चढ़ाने, जंगली पशुओं के सामने फेंकने और जीवित जलाने जैसी कठोर सजाएँ दी गईं। टैसिटस का मत है कि इन दंडों के पीछे न्याय की भावना नहीं, बल्कि नीरो की क्रूर प्रवृत्ति अधिक प्रभावी थी।

अग्निकांड के बाद रोम के पुनर्निर्माण का कार्य आरंभ किया गया। नए भवनों को अधिक दूरी पर ईंटों से और अग्निरोधक मानकों के अनुसार निर्मित किया गया। चौड़ी सड़कों और बरामदों का निर्माण कराया गया। इसी काल में नीरो ने ‘स्वर्ण महल’ (डोमस ऑरिया) नामक विशाल राजप्रासाद का निर्माण भी करवाया।

रोम के पुनर्निर्माण पर अत्यधिक व्यय हुआ, जिसके लिए अतिरिक्त धन की आवश्यकता पड़ी। इस उद्देश्य से करों में वृद्धि की गई और विशेष रूप से प्रांतों पर अधिक आर्थिक भार डाला गया। साथ ही, राजकोषीय संकट से निपटने के लिए रोमन मुद्रा का अवमूल्यन भी किया गया, जिसके परिणामस्वरूप साम्राज्य के इतिहास में पहली बार मुद्रास्फीति का दबाव दिखाई दिया।

शासनकाल के अंतिम वर्ष

65 ईस्वी में रोमन राजनेता गायस कैलपुर्नियस पिसो ने प्रेटोरियन गार्ड के कुछ अधिकारियों और सैन्य अधिकारियों के सहयोग से नीरो के विरुद्ध एक षड्यंत्र रचा, जो ‘पिसोनियन षड्यंत्र’ के नाम से प्रसिद्ध है । टैसिटस के अनुसार अनेक षड्यंत्रकारी रोमन गणतंत्र की पुनर्स्थापना करना चाहते थे। किंतु मिलिखुस नामक एक मुक्तदास ने षड्यंत्र का भंडाफोड़ कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप षड्यंत्र विफल हो गया और अनेक षड्यंत्रकारियों को मृत्युदंड दिया गया, जिनमें प्रसिद्ध कवि ल्यूकन भी था। इसी प्रसंग में नीरो के पूर्व गुरु सेनेका भी आत्महत्या करने के लिए बाध्य हुए।

65 ईस्वी में ही सम्राज्ञी पोपेया सबीना की मृत्यु हो गई। प्राचीन स्रोतों के अनुसार नीरो ने क्रोध में आकर उसे लात मार दी, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। किंतु आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि उसकी मृत्यु गर्भावस्था या प्रसव संबंधी जटिलताओं के कारण हुई थी। पोपेया की मृत्यु से नीरो अत्यंत दुखी हुआ और उसने उसका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करवाया।

उसी काल में नीरो ने स्पोरस नामक एक युवक का बधियाकरण करवाया और पारंपरिक विवाह-समारोह की रीति के अनुसार उससे विवाह किया। कुछ इतिहासकारों का मत है कि यह कार्य उसने पोपेया की मृत्यु के पश्चात उत्पन्न मानसिक शोक के प्रभाव में किया था।

प्रथम यहूदी-रोमन युद्ध

66 ईस्वी में यूनानियों और यहूदियों के बीच बढ़ते धार्मिक एवं सामाजिक तनाव के कारण यहूदिया में व्यापक विद्रोह भड़क उठा। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए नीरो ने 67 ईस्वी में अपने अनुभवी सेनापति वेस्पासियन को विद्रोह दबाने के लिए भेजा। नीरो की मृत्यु के बाद भी यह संघर्ष जारी रहा और अंततः 70 ईस्वी में रोमन सेनाओं ने इसे कुचल दिया। इस युद्ध की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना यरूशलेम की घेराबंदी थी, जिसके दौरान रोमन सेना ने नगर की दीवारों को तोड़ दिया और यहूदियों के द्वितीय मंदिर को नष्ट कर दिया। इस घटना का यहूदी इतिहास पर अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ा।

विंडेक्स और गैल्बा का विद्रोह तथा नीरो की मृत्यु

68 ईस्वी में गॉलिया लुगडुनेन्सिस के गवर्नर गायस जूलियस विंडेक्स ने नीरो की कर-नीतियों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। उसने हिस्पानिया के गवर्नर सर्वियस सुल्पिसियस गैल्बा को भी अपने साथ मिला लिया। यद्यपि विंडेक्स ने युद्ध में पराजित होकर आत्महत्या कर लिया, फिर भी गैल्बा का विरोध जारी रहा और धीरे-धीरे नीरो का समर्थन कम होने लगा।

प्रेटोरियन गार्ड के प्रीफेक्ट गायस निम्फिडियस सबिनस ने भी नीरो का साथ छोड़कर गैल्बा का समर्थन किया। परिस्थिति की गंभीरता को देखते हुए नीरो रोम से भाग गया। उसने पूर्वी प्रांतों में शरण लेने की योजना बनाई, किंतु वह ऐसा नहीं कर सका। जब उसे ज्ञात हुआ कि सीनेट ने उसे ‘सार्वजनिक शत्रु’ घोषित कर दिया है, तब उसने आत्महत्या का निश्चय कर लिया। अपने कुछ विश्वस्त मुक्तदासों के साथ वह फाओन नामक व्यक्ति के ग्रामीण निवास पर पहुँचा। वहीं उसने अपने लिए कब्र खोदने का आदेश दिया और अंततः अपने सचिव एपाफ्रोदितुस की सहायता से खंजर द्वारा 9 जून 68 ईस्वी को आत्महत्या कर ली। कहा जाता है कि मृत्यु से पूर्व उसके मुख से निकले अंतिम शब्द थे : ‘ मेरे साथ कैसा महान कलाकार मेरे साथ नष्ट हो रहा है!’ (क्वालिस आर्टिफ़ेक्स पेरेओ)। नीरो की आत्महत्या के साथ ही जूलियो-क्लाउडियन राजवंश का अंत हो गया और रोमन साम्राज्य ‘चार सम्राटों के वर्ष’ नामक राजनीतिक अराजकता के दौर में प्रवेश कर गया।

नीरो की मृत्यु पर रोमन समाज की प्रतिक्रिया मिली-जुली थी। सीनेट और अभिजात वर्ग ने उसका स्वागत किया, जबकि निम्न वर्ग, दास, कलाकार तथा रंगमंच प्रेमी जनता का एक बड़ा भाग उसकी मृत्यु से दुखी था। पूर्वी प्रांतों में तो यह विश्वास भी फैल गया कि नीरो वास्तव में मरा नहीं है और एक दिन वापस लौटेगा। इसी विश्वास को इतिहास में ‘नीरो रेडिविवस किंवदंती’ के नाम से जाना जाता है। बाद के वर्षों में कई व्यक्तियों ने स्वयं को ‘पुनर्जीवित नीरो’ बताकर विद्रोह करने का प्रयास भी किया, किंतु वे सभी असफल रहे।

सांस्कृतिक गतिविधियाँ

नीरो को साहित्य, कविता, संगीत, चित्रकला और मूर्तिकला में विशेष रुचि थी। वह स्वयं गायन करता था तथा सितारा (वीणा जैसा एक तारवाद्य) भी बजाता था। यद्यपि इन विषयों का अध्ययन रोमन अभिजात वर्ग की शिक्षा का सामान्य भाग था, किंतु संगीत और रंगमंच के प्रति नीरो का समर्पण उस समय के सामाजिक मानकों की दृष्टि से असामान्य माना जाता था।

प्राचीन लेखकों ने कला, रथ-दौड़ और खेल प्रतियोगिताओं के प्रति उसके अत्यधिक उत्साह की आलोचना की है। प्लिनी ने उसे “अभिनेता-सम्राट” कहा, जबकि सुएटोनियस के अनुसार वह लोकप्रियता प्राप्त करने के जुनून से प्रेरित था और स्वयं को संगीत में अपोलो तथा रथ-संचालन में सूर्य देव के समकक्ष समझता था।

67 ईस्वी में नीरो ने यूनान में आयोजित ओलंपिक खेलों में भाग लिया। अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए उसने प्रतियोगिताओं को एक वर्ष के लिए स्थगित करवा दिया तथा कलात्मक प्रतियोगिताओं को भी खेलों में शामिल कराया। उसने गायन, वीणा-वादन, नाट्य-अभिनय तथा रथ-दौड़ जैसी अनेक प्रतियोगिताओं में भाग लिया और प्रत्येक में विजेता घोषित किया गया।

एक प्रसिद्ध घटना में वह दस घोड़ों वाली रथ-दौड़ के दौरान रथ से गिर पड़ा और प्रतियोगिता पूरी नहीं कर सका, फिर भी उसे विजेता घोषित कर दिया गया। उसकी मृत्यु के बाद उसका नाम विजेताओं की सूची से हटा दिया गया। इतिहासकार एडवर्ड चैम्पलिन के अनुसार, नीरो की उपस्थिति ने वास्तविक प्रतिस्पर्धा की भावना को लगभग समाप्त कर दिया था, किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि वह स्वयं इस वास्तविकता से अनभिज्ञ था।

54–55 ईस्वी के आसपास नीरो ने ‘नीरोनियन खेलों’ की स्थापना की। सुएटोनियस के अनुसार इन खेलों की जिम्नास्टिक प्रतियोगिताएँ कैम्पस मार्टियस के सेप्टा क्षेत्र में आयोजित की जाती थीं। इन प्रतियोगिताओं में संगीत, साहित्य और खेलकूद से संबंधित विभिन्न स्पर्धाएँ सम्मिलित थीं।

नीरो का मूल्यांकन

नीरो के समकालीन मूल ऐतिहासिक स्रोत उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए उसके संबंध में अधिकांश जानकारी परवर्ती इतिहासकारों, जैसे टैसिटस, सुएटोनियस और कैसियस डियोकी रचनाओं से प्राप्त होती है, जिन्होंने प्रायः उसे अत्याचारी और स्वेच्छाचारी शासक के रूप में चित्रित किया है। यद्यपि डियो क्रिसोस्टोम, ल्यूकन, सेनेका और जोसेफस जैसे कुछ लेखकों ने उसके शासन के सकारात्मक पक्षों तथा प्राचीन स्रोतों के संभावित पक्षपात की ओर भी संकेत किया है। यही कारण है कि आधुनिक इतिहासकार नीरो को केवल एक क्रूर शासक नहीं, बल्कि एक जटिल व्यक्तित्व वाला सम्राट मानते हैं।

यहूदी परंपरा में तालमुद के अनुसार नीरो ने यरूशलेम के विनाश की भविष्यवाणी से भयभीत होकर कथित रूप से यहूदी धर्म अपना लिया था और प्रसिद्ध यहूदी विद्वान रब्बी मीर को उसका वंशज बताया गया है, यद्यपि इस कथा की ऐतिहासिक पुष्टि नहीं होती। दूसरी ओर, ईसाई परंपरा में नीरो को ईसाइयों का पहला प्रमुख उत्पीड़क बताया गया है। 64 ईस्वी में रोम की भीषण आग के बाद उसने ईसाइयों पर अत्याचार किए तथा संभवतः इसी काल में प्रेरित पतरस और पौलुस शहीद हुए। प्रारंभिक ईसाई साहित्य में उसे कभी-कभी ‘मसीह-विरोधी’ (एंटीक्राइस्ट) के रूप में भी चित्रित किया गया है और कुछ आधुनिक विद्वान ‘प्रकाशितवाक्य’ में वर्णित ‘पशु की संख्या’ को भी नीरो से जोड़ते हैं।

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