रोमन साम्राज्य में तीसरी शताब्दी का संकट (Crisis of the Third Century in the Roman Empire)

रोमन साम्राज्य में तीसरी शताब्दी का संकट (Crisis of the Third Century in the Roman Empire)

रोमन साम्राज्य में तीसरी शताब्दी का संकट (235-284 ई.)

सेवेरन राजवंश के पतन (235 ई.) के बाद रोमन साम्राज्य में व्यापक राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य उथल-पुथल का दौर शुरू हुआ। इन 50 वर्षों की अवधि में (235-284 ई.) विभिन्न सैन्य सेनापतियों और दावेदारों के बीच साम्राज्य पर नियंत्रण के लिए निरंतर गृहयुद्ध चलता रहा। इस सामाजिक अशांति, आर्थिक अस्थिरता तथा राजनीतिक विघटन के काल को रोमन इतिहास में ‘तीसरी शताब्दी का संकट’ कहा गया है।

238 ई. में अनेक शासकों के तीव्र उत्थान और पतन के बाद गॉर्डियन तृतीय (238-244 ई.) रोमन सम्राट बना। वह युवा था और शासन के प्रारंभिक वर्षों में उसका मार्गदर्शन उसके योग्य श्वसुर तथा प्रायटोरियन प्रीफेक्ट टाइमेसिथियस ने किया। दोनों ने मिलकर सासानी शासक शापुर प्रथम के विरुद्ध अभियान चलाया और रोमन प्रभाव को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया। किंतु 243 ई. में टाइमेसिथियस की मृत्यु के बाद स्थिति बदल गई और प्रेटोरियन प्रीफेक्ट फिलिप अरब ने प्रभाव स्थापित कर लिया।

244 ई. में गॉर्डियन तृतीय की मृत्यु के बाद फिलिप अरब (244-249 ई.) स्वयं सम्राट बन बैठा। फिलिप के शासनकाल में पारसियों के साथ शांति स्थापित हुई तथा 248 ईस्वी में रोम की स्थापना की एक हजारवीं वर्षगाँठ भव्य रूप से मनाई गई। किंतु 249 ई. में सेनापति डेसियस के विरुद्ध संघर्ष में उसकी मृत्यु हो गई।

डेसियस (249–251 ई.) के शासनकाल में ईसाइयों पर व्यापक अत्याचार हुए। उसने सम्राट-पूजा को अनिवार्य कर दिया और आदेश का उल्लंघन करने वालों को कठोर दंड दिया। किंतु 251 ई. में गोथों के विरुद्ध युद्ध में उसकी मृत्यु हो गई। उसके बाद ट्रेबोनियानुस गैलस (251-253 ई.) गद्दी पर बैठा, किंतु उसके समय भी महामारी और राजनीतिक अस्थिरता बनी रही। अंततः 253 ई. में उसके अपने सैनिकों ने ही उसकी हत्या कर दी।

253 ई. में पूर्व सीनेटर और सैन्य कमांडर वैलेरियन (253-260 ई.) रोमन सम्राट बना और उसने अपने पुत्र गैलियनस को सह-शासक नियुक्त किया। वैलेरियन ने साम्राज्य के स्वयं पूर्वी हिस्से में फारसी आक्रमणों का सामना किया, जबकि अपने पुत्र गैलियनस को पश्चिमी सीमाओं पर जर्मनिक जनजातियों से निपटने का कार्य सौंपा। 260 ई. में एडेसा के युद्ध में ससानी सम्राट शापुर प्रथम ने वैलेरियन को पराजित कर बंदी बना लिया और कैद में ही उसकी मृत्यु हो गई।। यह रोमन इतिहास की सबसे अपमानजनक घटनाओं में से एक थी, क्योंकि पहली बार कोई रोमन सम्राट शत्रु के हाथों बंदी बनाया गया था।

वैलेरियन के बाद उसके पुत्र गैलियनस (260-268 ई.) ने पूरे साम्राज्य का शासन सँभाला। उसके 15 वर्ष के शासनकाल में साम्राज्य के विभिन्न भागों में अनेक विद्रोह हुए, जिन्हें अकसर ‘तीस अत्याचारियों का काल’(थर्टी टायरेंट्स) कहा जाता है। यद्यपि गेलियनस ने कुछ महत्त्वपूर्ण सैन्य और प्रशासनिक सुधार किए, फिर भी 268 ईस्वी में उसकी हत्या कर दी गई।

गैलियनस की हत्या के बाद 268 ईस्वी में क्लाडियस द्वितीय (268-270 ई.) रोमन सम्राट बना। उसने उत्तरी इटली में एलेमानी को हराया और 269 ईस्वी में नैसस के युद्ध में गोथों को निर्णायक रूप से पराजित किया, जिसके कारण उसे ‘गोथिकस’ की उपाधि मिली। उसकी सफलता से साम्राज्य को तत्कालीन संकट से उबरने में सहायता मिली।

किंवदंतियों के अनुसार सम्राट क्लॉडियस द्वितीय ने ही संत वैलेंटाइन को मृत्युदंड की सजा दी थी। 270 ईस्वी में प्लेग से क्लाडियस द्वितीय की मृत्यु हो गई।

ऑरेलियन (270-275 ई.)

रोमन सेना ने 270 ईस्वी में ऑरेलियन को रोमन सम्राट घोषित किया। उस समय रोमन साम्राज्य ‘तीसरी शताब्दी के संकट’ से गुजर रहा था और लगभग विघटन के कगार पर था। ऑरेलियन ने रोमन साम्राज्य को बाहरी आक्रमणों से बचाया और उसको पुनर्संगठित कर ‘रेस्टिट्यूटर ऑर्बिस’ (विश्व का पुनर्स्थापक) की उपाधि प्राप्त की।

ऑरेलियन ने 270 ईस्वी में उत्तरी इटली पर आक्रमण करने वाली जुथुंगी जनजाति को हराया और बाद में वंडल्स, गोथ्स और एलमानी जैसी जनजातियों को भी पीछे खदेड़ दिया। उसने पूर्व में 272 ईस्वी में पल्मायरा की रानी जेनोबिया को एंटिओक एवं एमेसा के युद्धों में पराजित कर पल्मायरा पर अधिकार कर लिया और  पश्चिम में गॉलों को हराकर रोमन साम्राज्य को एकजुट किया। रोम शहर को बर्बर हमलों से बचाने के लिए उसने विशाल दीवारों का निर्माण कराया, जिनके अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। धर्म के क्षेत्र  में उसने ‘सोल इनविक्टस’ (अजेय सूर्य) नामक देवता को साम्राज्य में विशेष महत्त्व प्रदान दिया।

ऑरेलियन का शासनकाल केवल पाँच वर्ष (270-275 ई.) रहा, फिर भी उसने विघटन की ओर बढ़ते साम्राज्य को पुनः संगठित करने में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। 275 ई. में फारस के विरुद्ध अभियान की तैयारी के दौरान उसके ही कुछ अधिकारियों ने उसकी हत्या कर दी। इसके साथ एक ऐसे शासक का अंत हो गया, जिसने रोमन साम्राज्य को पतन के कगार से वापस शक्ति और एकता की ओर अग्रसर किया था।

रोमन साम्राज्य का पुनर्गठन

डायोक्लेटियन (284–305 ई.)

तीसरी शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध में रोमन साम्राज्य गहरे राजनीतिक, सैनिक और आर्थिक संकट से गुजर रहा था। सम्राटों की लगातार हत्याएँ, गृहयुद्ध, सीमाओं पर बर्बर जातियों के आक्रमण तथा प्रशासनिक अव्यवस्था ने साम्राज्य को कमजोर कर दिया था। ऐसी कठिन परिस्थितियों में 284 ई. में डायोक्लेटियन रोम का सम्राट बना।

वह इलिरिया के एक साधारण परिवार से था, किंतु अपनी योग्यता, परिश्रम और प्रशासनिक दक्षता के बल पर उसने रोमन इतिहास में विशिष्ट स्थान प्राप्त किया। उसके शासन के साथ ही सैनिक अराजकता का युग समाप्त हुआ और उत्तरकालीन रोमन साम्राज्य का आरंभ हुआ।

डायोक्लेटियन का उद्देश्य रोमन साम्राज्य की खोई हुई शक्ति, शांति और समृद्धि को पुनः स्थापित करना था। उसने आगस्टस की भाँति साम्राज्य को सुदृढ़ बनाने का प्रयास किया, किंतु शासन-पद्धति के क्षेत्र में उसने एक नया मार्ग अपनाया। उसने स्वयं को केवल ‘प्रथम नागरिक’ (प्रिंसेप्स) न मानकर ‘डोमिनस’ (स्वामी) की उपाधि धारण की और निरंकुश शासन की स्थापना की। उसने स्वयं को देवता जुपिटर का प्रतिनिधि तथा दैवी अधिकारों से युक्त शासक घोषित किया। उसके दरबार में पूर्वी देशों की भव्य और औपचारिक परंपराओं का पालन किया जाता था। सम्राट के सामने उपस्थित होने पर लोगों को साष्टांग प्रणाम करना पड़ता था और इस प्रकार राजदरबार को वैभवशाली बनाया गया।

धार्मिक क्षेत्र में डायोक्लेटियन ने पारंपरिक रोमन धर्म को राज्य का आधार बनाने का प्रयास किया। उसने जुपिटर की उपासना को विशेष महत्त्व दिया और सम्राट पूजा को प्रोत्साहित किया। उसने मनीखी धर्मावलंबियों और विशेष रूप से ईसाइयों के प्रति कठोर नीति अपनाई। ईसाइयों की संपत्तियाँ जब्त कर ली गईं, उनके धार्मिक ग्रंथ नष्ट किए गए और अनेक ईसाइयों को दंडित किया गया। किंतु उसके कठोर प्रयास ईसाई धर्म के प्रसार को रोकने में सफल नहीं हो सके।

प्रशासनिक दृष्टि से डायोक्लेटियन का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य साम्राज्य का पुनर्गठन था। उसने अनुभव किया कि इतने विशाल साम्राज्य का शासन एक व्यक्ति द्वारा प्रभावी ढंग से संचालित नहीं किया जा सकता। उसने संपूर्ण साम्राज्य में शासन व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए टेट्रार्की (चतुर्शासित शासन) की स्थापना की, जिसके अंतर्गत चार शासक मिलकर साम्राज्य का संचालन करते थे। किंतु साम्राज्य का आकार इतना विशाल था कि 285 ईस्वी में उसने इसे दो भागों—पश्चिमी रोमन साम्राज्य और पूर्वी रोमन साम्राज्य में विभाजित कर दिया। पूर्वी भाग आगे चलकर बाइज़ेंटाइन साम्राज्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस व्यवस्था से सीमाओं की सुरक्षा, प्रशासनिक नियंत्रण तथा विद्रोहों के दमन में सुविधा हुई।

डायोक्लेटियन ने प्रांतीय प्रशासन को भी संगठित किया। प्रांतों की संख्या बढ़ाकर उन्हें छोटी-छोटी इकाइयों में विभाजित किया गया। अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर निगरानी रखने के लिए गुप्तचर व्यवस्था स्थापित की गई। न्यायिक तथा प्रशासनिक कार्यों को स्पष्ट रूप से अलग किया गया, जिससे शासन अधिक प्रभावी और व्यवस्थित बन सका। इन सुधारों के कारण साम्राज्य में कानून और व्यवस्था की स्थिति मजबूत हुई तथा विद्रोहों को नियंत्रित करने में सहायता मिली।

सैनिक क्षेत्र में भी डायोक्लेटियन ने व्यापक सुधार किए। उसने सैनिक और असैनिक अधिकारियों के कार्यों को पृथक् कर दिया। सीमाओं की रक्षा के लिए स्थायी सैनिक चौकियाँ स्थापित की गईं तथा एक विशाल चलायमान सेना का गठन किया गया, जो आवश्यकता पड़ने पर किसी भी क्षेत्र में शीघ्र पहुँच सकती थी। सेना का पुनर्गठन कर उसे छोटे-छोटे दलों में विभाजित किया गया। घुड़सवार सेना को विशेष महत्त्व दिया गया और साम्राज्य की सुरक्षा के लिए लगभग पाँच लाख सैनिकों की विशाल सेना तैयार की गई।

आर्थिक क्षेत्र में डायोक्लेटियन ने राजस्व व्यवस्था को सुदृढ़ करने का प्रयास किया। 301 ई. में उसने प्रसिद्ध ‘मूल्य अधिनियम’ (एडिक्ट ऑन मैक्सिमम प्राइसेज़) जारी किया, जिसके द्वारा वस्तुओं की अधिकतम कीमतें निर्धारित की गईं। उद्देश्य यह था कि व्यापारी कृत्रिम अभाव उत्पन्न कर जनता का शोषण न कर सकें। यद्यपि यह योजना पूरी तरह सफल नहीं हुई, फिर भी यह आर्थिक संकट को नियंत्रित करने का एक महत्त्वपूर्ण प्रयास था। भूमि का सर्वेक्षण कर कराधान की नई व्यवस्था लागू की गई तथा राज्य की आय बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रकार के कर लगाए गए।

डायोक्लेटियन ने उद्योग, व्यापार और कृषि को भी नियंत्रित एवं संगठित करने का प्रयास किया। अनेक व्यवसायों को वंशानुगत बना दिया गया, जिससे आवश्यक सेवाओं की निरंतरता बनी रहे। राज्य के नियंत्रण में विभिन्न उद्योग स्थापित किए गए और खनिज, नमक तथा धातुओं जैसे महत्त्वपूर्ण संसाधनों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाया गया। गरीबों को सस्ता अथवा निःशुल्क अनाज उपलब्ध कराया गया तथा सार्वजनिक निर्माण कार्यों के माध्यम से रोजगार के अवसर प्रदान किए गए।

निर्माण कार्यों के क्षेत्र में डायोक्लेटियन ने निकोमीडिया को अपनी प्रमुख राजधानी के रूप में विकसित किया और वहाँ भव्य राजप्रासादों, स्नानागारों तथा सार्वजनिक भवनों का निर्माण कराया। कार्थेज, मिलान और अन्य नगरों में भी अनेक निर्माण-कार्य कराए गए। 303 ई. में निर्मित उसका विशाल स्नानागार रोमन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।

चूँकि साम्राज्य संकट का एक प्रमुख कारण उत्तराधिकार को लेकर अस्पष्टता थी, इसलिए डायोक्लेटियन ने यह व्यवस्था की कि प्रत्येक शासक अपने शासनकाल के प्रारंभ में ही अपने उत्तराधिकारी का चयन और अनुमोदन करेगा। इसी व्यवस्था के अंतर्गत दो प्रमुख सेनानायकों—मैक्सेन्टियस और कॉन्स्टेंटाइन का उदय हुआ।

यद्यपि डायोक्लेटियन के सुधारों ने रोमन साम्राज्य को पुनर्जीवित किया, फिर भी उनके कुछ दुष्परिणाम भी हुए। करों का बोझ बढ़ गया, किसानों और सामान्य जनता पर अनेक प्रतिबंध लगाए गए तथा शासन अधिक निरंकुश बन गया। फिर भी उस समय की अराजक परिस्थितियों को देखते हुए उसके सुधारों ने साम्राज्य को स्थिरता प्रदान की और उसके विघटन को काफी समय तक टाल दिया। इसी कारण इतिहासकार विल ड्यूरेंट ने कहा है :  ‘आगस्टस ने साम्राज्य की स्थापना की, ऑरेलियन ने उसकी रक्षा की और डायोक्लेटियन ने उसका पुनर्गठन किया।’

लगभग बीस वर्षों तक शासन करने के बाद डायोक्लेटियन ने 305 ई. में स्वेच्छा से राजत्याग कर दिया, जो रोमन इतिहास की एक असाधारण घटना थी। वह एड्रियाटिक सागर के तट पर स्थित अपने महल में रहने लगा और शेष जीवन वहीं व्यतीत किया। 316 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

डायोक्लेटियन के स्वेच्छा से सिंहासन त्यागने के बाद रोमन साम्राज्य के विभिन्न भागों के शासकों के बीच सत्ता-संघर्ष आरंभ हो गया और टेट्रार्की व्यवस्था धीरे-धीरे विघटित हो गई। इसी अशांत वातावरण में कॉन्स्टैन्टियस क्लोरस के पुत्र कॉन्स्टेंटाइन का उदय हुआ, जिसे इतिहास में ‘कॉन्स्टेंटाइन महान’ के नाम से जाना जाता है। रोमन इतिहास ही नहीं, विश्व इतिहास में भी उसका स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उसके शासनकाल में रोमन साम्राज्य को नई दिशा मिली और ईसाई धर्म को अभूतपूर्व संरक्षण प्राप्त हुआ।

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