कश्मीर का हर्ष (1089–1101 ई.)
हर्ष, जिसे हर्षदेव भी कहा जाता है, लोहार वंश का एक प्रमुख शासक था। उसने 1089 से 1101 ईस्वी तक कश्मीर पर शासन किया। वह राजा कलश (1063–1089 ई.) का पुत्र था। हर्ष के शासन का विस्तृत वर्णन कल्हण की राजतरंगिणी के सप्तम तरंग में मिलता है। कल्हण के पिता चंपक हर्ष के प्रशासन में उच्च पद पर कार्यरत थे, इसलिए हर्ष के शासन का विवरण अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय माना जाता है।
हर्ष 1089 ई. में उत्कर्ष को पदच्युत् कर कश्मीर के सिंहासन पर बैठा। उसकी गणना कश्मीर के इतिहास के सबसे प्रतिभाशाली, किंतु सर्वाधिक विवादास्पद शासकों में की जाती है। कल्हण ने उसके सौंदर्य, विद्वत्ता और कलाप्रियता की प्रशंसा की है, किंतु उसके व्यक्तित्व में कई परस्पर विरोधी गुण एक साथ विद्यमान थे। वह कभी उदार और दयालु दिखाई देता था, तो कभी अत्यंत क्रूर और स्वेच्छाचारी।
प्रारंभ में हर्ष के राज्य की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत अच्छी थी, जिसका प्रमाण उसके द्वारा जारी किए गए सोने और चाँदी के सिक्के हैं। कल्हण के अनुसार अपने शासन के उत्तरार्ध में उसकी नीतियों में परिवर्तन आया और वह भी अपने पूर्ववर्तियों की तरह ही कुछ विशेष लोगों के प्रभाव में आकर और भ्रष्ट, क्रूर और व्यभिचारी बन गया और अपने सगे-संबंधियों के साथ यौन संबंध बनाया।
हर्ष द्वारा सेना, दरबार तथा विलासिता पर अत्यधिक व्यय के कारण राजकोष खाली हो गया और राज्य गंभीर आर्थिक संकट से घिर गया। राजस्व बढ़ाने के लिए प्रजा पर मानव मल तक पर कर लगाए गए। लगभग 1099 ई. के आसपास जब कश्मीर राज्य प्लेग, बाढ़ और अकाल जैसी विपत्तियों के साथ-साथ बड़े पैमाने पर अराजकता से ग्रस्त था, तब भी हर्ष की कठोर नीतियाँ समाप्त नहीं हुईं और उसने कर-वसूली तथा संपत्ति की जब्ती जारी रखी, किंतु आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ती गई। अंततः आर्थिक संकट से निपटने के लिए हर्ष ने मंदिरों की संपत्ति पर अधिकार करना आरंभ किया। उसने मंदिरों की मूर्तियों को तुड़वाने के लिए ‘देवोत्पाटन-नायक’ नामक एक विशेष अधिकारी नियुक्त किया। इस अधिकारी के नेतृत्व में बुद्ध की दो प्रतिमाओं को छोड़कर बाकी सभी मूर्तियाँ तोड़ दी गईं और मंदिरों को लूटा गया कल्हण के अनुसार उसने अनेक मंदिरों की स्वर्ण एवं रजत प्रतिमाएँ तुड़वाकर राजकोष में जमा कराया। गाँव, कस्बे और नगरों में ऐसा कोई मंदिर नहीं बचा था जिसकी प्रतिमाएँ हर्ष द्वारा न तोड़ी गई हों—
ग्रामे पुरेऽथ नगरे प्रासादो न च कश्चन।
हर्षराजतुरुष्केण न यो निष्प्रतिमीकृतः॥ राजतरंगिणी, सप्तम तरंग, 165
संभवतः इसी कारण कल्हण ने कुछ स्थानों पर उसे ‘राजा-तुरुष्क’ कहकर संबोधित किया है।
हर्ष के शासनकाल में तुर्क मूल के भाड़े के सैनिक भी कश्मीर की सेना में नियुक्त थे। तथापि हर्ष स्वयं हिंदू परंपरा से संबद्ध था और उसने कुछ प्रमुख मंदिरों तथा धार्मिक प्रतिष्ठानों को संरक्षण भी दिया। इसलिए उसके व्यक्तित्व में विरोधाभास दिखाई देता है—एक ओर वह कला और धर्म का संरक्षक शासक था, तो दूसरी ओर आर्थिक संकट के कारण मंदिर-संपत्ति का दोहन करने वाला राजा।
हर्ष को अपने शासनकाल में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। सत्ता को सुरक्षित रखने के लिए उसने अपने कई संबंधियों की हत्या करवाई और पूर्वी कश्मीर के शक्तिशाली सामंती ज़मींदारों ‘डामरों’ से भूमि का नियंत्रण वापस लेने के लिए अभियान चलाया। उसकी इन नीतियों के कारण डामरों ने राजपरिवार के एक सदस्य उच्छल के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया। यद्यपि प्रारंभ में उच्छल को सफलता नहीं मिली, किंतु बाद में उसने अपने भाई सुस्सल के विद्रोह का लाभ उठाकर हर्ष की सेनाओं को पराजित कर दिया। इसके पश्चात हिरण्यपुर (रणीयल) में ब्राह्मणों ने उच्छल का विधिवत् राज्याभिषेक किया।
इस समय हर्ष के दरबार में अविश्वास, षड्यंत्र और भय का वातावरण व्याप्त था। उसके अत्याचारपूर्ण कार्यो से त्रस्त होकर उच्छल और सुस्सल ने विद्रोह कर क्रमशः उत्तर और दक्षिण दिशाओं से श्रीनगर पर आक्रमण किया। विद्रोहियों ने हर्ष के राजमहल को जला दिया और उसको अपना प्राण बचाने के लिए भागना पड़ा। अंततः 1101 ई. में विद्रोही डामरों ने हर्ष की हत्या कर दी।
इस प्रकार जिस हर्ष का शासन प्रारंभ में ‘सुदृढ़ और शांति का काल’ प्रतीत होता था, वही बाद में आत्मघाती प्रवृत्तियों का शिकार हो गया। यही कारण है कि हर्ष को ‘कश्मीर का नीरो’ भी कहा जाता है। हर्ष की मृत्यु के साथ प्रथम लोहर वंश का अंत हो गया और उच्छल तथा सुस्सल के नेतृत्व में द्वितीय लोहर वंश की स्थापना हुई।




