चंद्रगुप्त मौर्य की शासन-व्यवस्था (Chandragupta Maurya’s Administration)

चंद्रगुप्त मौर्य की शासन-व्यवस्था (Chandragupta Maurya's Administration)
चंद्रगुप्त मौर्य की शासन-व्यवस्था मुख्य लेख : चंद्रगुप्त मौर्य  प्रस्तावना चंद्रगुप्त मौर्य की शासन-व्यवस्था अत्यंत […]

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चंद्रगुप्त मौर्य की शासन-व्यवस्था

मुख्य लेख : चंद्रगुप्त मौर्य 

प्रस्तावना

चंद्रगुप्त मौर्य की शासन-व्यवस्था अत्यंत केंद्रीकृत, संगठित और व्यापक थी। वह महान् विजेता और साम्राज्य-निर्माता ही नहीं, अपितु एक योग्य प्रशासक भी था। उसने अपने मंत्री कौटिल्य की सहायता से एक ऐसी शासन-व्यवस्था का निर्माण किया, जो उस समय की परिस्थितियों के लिए पूर्णतः अनुकूल थी और कालांतर में भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था का आधार बनी। शासन का सर्वोच्च केंद्र सम्राट था, जिसके अधीन कार्यपालिका, न्याय और सेना की प्रमुख शक्तियाँ निहित थीं तथा उसकी सहायता के लिए मंत्रिपरिषद् और विभिन्न विभागों के अधिकारी नियुक्त किए जाते थे। विशाल साम्राज्य को प्रांतों, जिलों और ग्रामों में विभाजित किया गया था; प्रांतों का प्रशासन राजकुमारों या उच्च अधिकारियों द्वारा तथा ग्रामों का संचालन ग्रामिक द्वारा किया जाता था। साम्राज्य की सुरक्षा के लिए सुदृढ़ सेना और प्रभावी गुप्तचर तंत्र विकसित किया गया था। राज्य की आय का प्रमुख स्रोत भू-राजस्व था, इसके अतिरिक्त व्यापार, खनिज और अन्य आर्थिक गतिविधियों से भी राजस्व प्राप्त होता था।

विद्वानों का विचार है कि संभवतः मौर्य शासन-व्यवस्था पर तत्कालीन यूनानी तथा हखामनी (ईरानी) शासन-प्रणाली का भी कुछ प्रभाव पड़ा था, विशेषकर राजकीय गुप्तचर तंत्र और प्रांतीय क्षत्रप-प्रणाली की समानताओं के कारण यह मत प्रचलित हुआ। यद्यपि यह शासन-व्यवस्था एक सीमा तक मगध के पूर्वगामी शासकों, विशेषकर नंदवंशीय शासकों द्वारा विकसित शासन-तंत्र पर आधारित थी, किंतु इसका अधिक श्रेय चंद्रगुप्त और कौटिल्य की सृजनात्मक क्षमता को ही दिया जाना चाहिए। मौर्यकाल में राजा की शक्ति में अत्यधिक वृद्धि हुई। परंपरागत राजशास्त्र सिद्धांत के अनुसार राजा धर्म का रक्षक है, धर्म का प्रतिपादक नहीं। राजशासन की वैधता इस बात पर निर्भर थी कि वह धर्म के अनुकूल हो, किंतु कौटिल्य ने इस दिशा में एक नया प्रतिमान प्रस्तुत किया कि “राजशासन धर्म, व्यवहार और चरित्र (लोकाचार) से ऊपर है।” चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में भारत ने पहली बार व्यापक राजनीतिक एकता का साक्षात्कार किया।

चंद्रगुप्त मौर्य (Chandragupta Maurya)
चंद्रगुप्त मौर्य

प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत

चंद्रगुप्त मौर्य के प्रशासन की जानकारी के लिए कौटिल्य का अर्थशास्त्र, मेगस्थनीज की इंडिका के अवशिष्ट अंश तथा अशोक के अभिलेख महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं, जो एक-दूसरे के पूरक हैं। परंपरागत धारणा के आधार पर अर्थशास्त्र को चंद्रगुप्त मौर्य के मंत्री चाणक्य (कौटिल्य) द्वारा रचित मानकर ईसा पूर्व चौथी शताब्दी का बताया जाता है। इस ग्रंथ की खोई हुई पांडुलिपि को आर. शामशास्त्री ने 1905 ईस्वी में पुनः खोजा और 1909 में प्रकाशित किया, जिसके बाद ही मौर्यकालीन प्रशासन के अध्ययन को नई दिशा मिली। मेगस्थनीज सेल्यूकस निकेटर का राजदूत बनकर चंद्रगुप्त के दरबार में आया था और उसकी मूल रचना ‘इंडिका’ आज उपलब्ध नहीं है। इसके अंश स्ट्रैबो, एरियन, डियोडोरस तथा प्लिनी जैसे परवर्ती यूनानी-रोमन लेखकों के उद्धरणों के माध्यम से ही ज्ञात होते हैं। रुद्रदामन के जूनागढ़ शिलालेख से भी मौर्यों के प्रांतीय प्रशासन के संबंध में बहुमूल्य सूचनाएँ मिलती हैं। इसके साथ ही सोहगौरा (गोरखपुर, उ.प्र.) तथा महास्थान (बोगरा, बांग्लादेश) के लेखों से भी मौर्यकालीन प्रशासन पर कुछ प्रकाश पड़ता है। चंद्रगुप्त मौर्य के प्रशासन का विस्तृत विवरण आगे प्रस्तुत है।

केंद्रीय प्रशासन

सम्राट

चंद्रगुप्त की शासन-व्यवस्था का स्वरूप राजतंत्रात्मक था। कौटिल्य के अनुसार राज्य सात प्रकृतियों (सप्तांग) की समष्टि है, जिसमें राजा की स्थिति कूटस्थानीय होती थी। राजा शासन के विभिन्न अंगों का प्रधान था- वह सैनिक, न्यायिक, वैधानिक एवं कार्यकारी मामलों का सर्वोच्च पदाधिकारी होता था। वह सेना का सबसे बड़ा अधिकारी, न्याय का प्रधान न्यायाधीश, कानूनों का प्रवर्तक एवं धर्म-प्रवर्तक माना जाता था। साम्राज्य के सभी महत्त्वपूर्ण अधिकारियों की नियुक्ति वह स्वयं करता था और वही प्रशासन का प्रमुख स्रोत था। कौटिल्य ने इसीलिए राज्य के सप्तांगों में सम्राट (स्वामी) को ही प्रथम स्थान दिया है। शेष अंग- अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, बल तथा मित्र सम्राट के द्वारा ही संचालित होते हैं तथा अपने अस्तित्व के लिए सम्राट पर ही निर्भर करते हैं।

अर्थशास्त्र में राजा की दैनिक चर्या का आदर्श काल-विभाजन दिया गया है। मेगस्थनीज के अनुसार राजा दिन में नहीं सोता, वरन् दिनभर न्याय और शासन के अन्य कार्यों के लिए दरबार में ही रहता है- मालिश कराते समय भी इन कार्यों में व्यवधान नहीं होता, केश-प्रसाधन के समय वह दूतों से मिलता है। कौटिल्य का भी स्पष्ट मत है कि राजा को प्रजा की शिकायतों को सुनने के लिए सदैव सुलभ रहना चाहिए तथा प्रजा से अधिक देर तक प्रतीक्षा नहीं करवानी चाहिए। राजा को चेतावनी देते हुए उन्होंने स्पष्ट कहा है कि जिस राजा का दर्शन प्रजा के लिए दुर्लभ है, उसके अधिकारी प्रजा के कामों को अव्यवस्थित कर देते हैं, जिससे राजा या तो प्रजा का कोपभाजन बनता है या शत्रुओं का शिकार होता है:

दुर्दर्शनो हि राजा कार्याकार्यविपर्यासमासन्नैः कार्यते।

तेन प्रकृतिकोपमरिवशं वा गच्छति।।

स्मृतियों की परंपरा के विरुद्ध अर्थशास्त्र में राजाज्ञा को धर्म, व्यवहार और चरित्र से अधिक महत्त्व दिया गया है। चंद्रगुप्त की राजधानी पाटलिपुत्र थी, जिसके विषय में यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने विस्तृत विवरण दिया है। सम्राट मुख्यतः राजधानी के विशाल राजप्रासाद में निवास करता था और उनकी राज्यसभा ऐश्वर्य तथा शान-ओ-शौकत से परिपूर्ण होती थी। मेगस्थनीज और कौटिल्य दोनों से ही ज्ञात होता है कि सम्राट की व्यक्तिगत सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाता था। राजा के शरीर की रक्षा अस्त्रधारी स्त्रियाँ करती थीं। मेगस्थनीज का कथन है कि राजा को निरंतर प्राणभय बना रहता था, जिससे वह हर रात अपना शयनकक्ष बदलता था। राजा केवल युद्धयात्रा, यज्ञानुष्ठान, न्याय और आखेट के लिए ही अपने प्रासाद से बाहर आता था। आखेट के समय राजा का मार्ग रस्सियों से घिरा होता था, जिन्हें लाँघने पर प्राणदंड मिलता था। इस प्रकार राजनीतिक और सामाजिक जीवन के सभी क्षेत्रों पर सम्राट का पूर्ण नियंत्रण रहता था।

अमात्य, मंत्री और मंत्रिपरिषद्

सम्राट अपने शासकीय कार्यों को अमात्यों, मंत्रियों और अधिकारियों की सहायता से करता था। मेगस्थनीज ने दो प्रकार के अधिकारियों का उल्लेख किया है- ‘मंत्री’ और ‘सचिव’; इनकी संख्या अधिक नहीं थी। ‘अमात्य’ या ‘सचिव’ एक सामान्य संज्ञा थी, जिससे राज्य के सभी प्रमुख पदाधिकारियों का बोध होता था। यूनानी लेखकों ने इन्हें ‘सभासद’ या ‘निर्धारक’ कहा है। यद्यपि इनकी संख्या कम होती थी, किंतु ये बहुत महत्त्वपूर्ण थे और राज्य के उच्च पदों पर नियुक्त होते थे। अमात्यों में से, जो सभी प्रकार के आकर्षणों (उपधाओं) से मुक्त सिद्ध होते थे, उन्हें मंत्री नियुक्त किया जाता था। ये मंत्री ‘मंत्रिणः’ नामक छोटी उपसमिति के सदस्य होते थे, जिसमें कुल तीन या चार सदस्य होते थे। संभवतः इसमें युवराज, प्रधानमंत्री, सेनापति तथा सन्निधाता सम्मिलित होते थे। आवश्यक विषयों पर मंत्रिणः से परामर्श किया जाता था।

राजा प्रायः मंत्रिणः और मंत्रिपरिषद् के परामर्श से ही कार्य करता था। अर्थशास्त्र के अनुसार राजा की सहायता के लिए एक मंत्रिपरिषद् भी होती थी, जिसके सदस्यों की संख्या निश्चित रूप से बड़ी होती थी। अर्थशास्त्र में मंत्रिपरिषद् को वैधानिक आवश्यकता बताते हुए कहा गया है कि ‘राजत्व केवल सबकी सहायता से ही संभव है, मात्र एक पहिया नहीं चल सकता। इसलिए राजा को सचिवों की नियुक्ति करनी चाहिए और उनसे मंत्रणा लेनी चाहिए’:

सहायसाध्यं राजत्वं चक्रमेकं न वर्तति।

कुर्वीत सचिवांस्तस्मात्तेषां च शृणुयान्मतम्।।

कौटिल्य के अनुसार राजा को बहुमत मानना चाहिए और आवश्यक प्रश्नों पर अनुपस्थित मंत्रियों का विचार जानने का उपाय करना चाहिए। बड़ी मंत्रिपरिषद् रखना राजा के हित में होता है और इससे उनकी मंत्र-शक्ति बढ़ती है। सभी महत्त्वपूर्ण विषयों पर मंत्रिपरिषद् में विचार-विमर्श किया जाता था और प्रायः बहुमत से निर्णय लिया जाता था, किंतु कभी-कभी राजा राज्यहित में बहुमत की उपेक्षा भी कर सकता था। मंत्रिपरिषद् की मंत्रणा को गुप्त रखने का विशेष ध्यान रखा जाता था। मंत्रिपरिषद् के सदस्यों को 12,000 पण वेतन मिलता था, जबकि मंत्रिणः के सदस्यों को 48,000 पण वेतन मिलता था। इससे लगता है कि मंत्रिणः के सदस्य मंत्रिपरिषद् से श्रेष्ठ होते थे।

अठारह ‘तीर्थ’ (प्रधान पदाधिकारी)

प्रशासनिक सुविधा के लिए मौर्य केंद्रीय प्रशासन अनेक विभागों में विभक्त था। अर्थशास्त्र में इन विभागों के अधिकारियों को ‘तीर्थ’ कहा गया है और अठारह तीर्थों (प्रधान पदाधिकारियों) का उल्लेख मिलता है: (1) मंत्री और पुरोहित, (2) समाहर्ता, (3) सन्निधाता, (4) सेनापति, (5) युवराज, (6) प्रदेष्टा, (7) नायक, (8) कर्मांतिक, (9) व्यावहारिक, (10) मंत्रिपरिषदाध्यक्ष, (11) दंडपाल, (12) अंतपाल, (13) दुर्गपाल, (14) नागरक, (15) प्रशास्ता, (16) दौवारिक, (17) अंतर्वैशिक, तथा (18) आटविक।

इनमें मंत्री और पुरोहित प्रधानमंत्री तथा प्रमुख धर्माधिकारी होता था- चंद्रगुप्त के समय में दोनों विभाग चाणक्य के पास थे। समाहर्ता राजस्व विभाग का प्रधान अधिकारी होता था; सन्निधाता राजकीय कोषाधिकरण का प्रमुख अधिकारी था; सेनापति युद्ध विभाग का मंत्री होता था; युवराज राजा का उत्तराधिकारी होता था, जो अपने पिता के शासनकाल में प्रशासनिक कार्यों में उनकी सहायता करता था। प्रदेष्टा फौजदारी न्यायालय का न्यायाधीश था; नायक सेना का संचालक; कर्मांतिक देश के उद्योग-धंधों का प्रधान निरीक्षक; व्यावहारिक दीवानी न्यायालय का न्यायाधीश; मंत्रिपरिषदाध्यक्ष मंत्रिपरिषद् का अध्यक्ष; दंडपाल सेना की सामग्रियों की व्यवस्था करने वाला प्रधान अधिकारी; अंतपाल सीमावर्ती दुर्गों का रक्षक; दुर्गपाल देश के भीतर दुर्गों का प्रबंधक; नागरक नगर का प्रमुख अधिकारी; प्रशास्ता राजकीय कागजातों को सुरक्षित रखने वाला तथा राजकीय आज्ञाओं को लिपिबद्ध करने वाला प्रधान अधिकारी; दौवारिक राजमहलों की देखरेख करने वाला प्रधान अधिकारी; अंतर्वैशिक सम्राट की अंगरक्षक सेना का प्रधान अधिकारी तथा आटविक वन विभाग का प्रधान अधिकारी होता था। ये सभी अधिकारी उच्च श्रेणी के प्रधान पदाधिकारी थे।

अध्यक्ष व्यवस्था (मजिस्ट्रेट)

मौर्य राज्य ने व्यापार तथा उद्योग को अनेक अध्यक्षों के माध्यम से नियमित किया था। संभवतः इन्हीं अध्यक्षों को यूनानी ग्रंथों में ‘मजिस्ट्रेट’ कहा गया है। अर्थशास्त्र में विभागीय अध्यक्षों तथा उनके कार्यों की एक लंबी सूची मिलती है, जिनमें प्रमुख हैं- सीताध्यक्ष (कृषि-अधीक्षक), पण्याध्यक्ष (वाणिज्य-अध्यक्ष), पौतवाध्यक्ष (माप-तौल का अधीक्षक), सुराध्यक्ष, सूनाध्यक्ष, गणिकाध्यक्ष, आकाराध्यक्ष, कोष्ठागाराध्यक्ष, कुप्याध्यक्ष, आयुधागाराध्यक्ष, शुल्काध्यक्ष (पथकर-अधीक्षक), सूत्राध्यक्ष (बुनाई-अधीक्षक), लोहाध्यक्ष, लक्षणाध्यक्ष, सुवर्णाध्यक्ष, गोअध्यक्ष, विवीताध्यक्ष, मुद्राध्यक्ष, नवाध्यक्ष, पत्तनाध्यक्ष, संस्थाध्यक्ष तथा देवताध्यक्ष आदि। इन अध्यक्षों को 1,000 पण वार्षिक वेतन मिलता था।

मजिस्ट्रेटों के कार्यों के संबंध में मेगस्थनीज ने लिखा है कि इनमें से कुछ बाजार, कुछ नगर, कुछ सेना के अधिकारी थे। कुछ नदियों की देखभाल करते थे तथा जल-संग्रहों का निरीक्षण करते थे ताकि सभी को उचित मात्रा में जल उपलब्ध हो सके। वे आखेटकों के भी अधिकारी थे और आवश्यकतानुसार उन्हें दंडित और पुरस्कृत करते थे। यही मजिस्ट्रेट कर संग्रह करते थे और भूमि-संबंधी व्यवसायों का निरीक्षण करते थे। वे सार्वजनिक मार्गों का निरीक्षण कर प्रत्येक दस स्टेडिया पर स्तंभ स्थापित करते थे। जो नगरों के अधिकारी थे, वे पाँच-पाँच सदस्यों की छह परिषदों में विभक्त थे, जिन्हें मेगस्थनीज ने ‘एस्टिनोमोई’ कहा है।

प्रांतीय प्रशासन

अनुमान किया जाता है कि चंद्रगुप्त का विशाल साम्राज्य प्रांतों में विभाजित रहा होगा, यद्यपि उनके समय इन प्रांतों की सही संख्या बता पाना कठिन है। उनके पौत्र अशोक के अभिलेखों से पाँच प्रांतों के संबंध में सूचनाएँ मिलती हैं:

1. उदीच्य (उत्तरापथ): इसमें पश्चिमोत्तर प्रदेश सम्मिलित था। इसकी राजधानी तक्षशिला थी।

2. अवंतिरट्ठ (अवंतिराष्ट्र): इस प्रदेश की राजधानी अवंति (उज्जयिनी) थी।

3. दक्षिणापथ: इसमें दक्षिण भारत के प्रदेश सम्मिलित थे, जिसकी राजधानी सुवर्णगिरि थी। के.एस. आयंगर इस स्थान की पहचान रायचूर जिले के ‘कनकगिरि’ से करते हैं।

4. प्राच्य या प्रासी: इससे तात्पर्य पूर्वी भारत से है। इसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी।

5. कलिंग प्रांत: इसकी राजधानी तोसली थी।

इन प्रांतों में से उत्तरापथ, अवंतिरट्ठ तथा प्राच्य निश्चित रूप से चंद्रगुप्त के साम्राज्य में विद्यमान थे। दक्षिणापथ भी संभवतः उनके साम्राज्य का अंग था। इन प्रांतों के राज्यपाल प्रायः राजकुल से संबंधित कुमार होते थे, किंतु कभी-कभी अन्य योग्य व्यक्तियों को भी इस पद पर नियुक्त कर दिया जाता था। अर्थशास्त्र के अनुसार राज्यपाल का वेतन 12,000 पण वार्षिक होता था। वे अनेक अमात्यों एवं अध्यक्षों की सहायता से प्रांतों का प्रशासन चलाते थे तथा उनकी अपनी मंत्रिपरिषद् भी होती थी। इतिहासकारों के अनुसार सौराष्ट्र की स्थिति अर्द्ध-स्वतंत्र राज्य की थी और चंद्रगुप्त के समय पुष्यगुप्त वैश्य तथा अशोक के समय तुषास्प की स्थिति अर्द्ध-स्वशासन प्राप्त सामंत की थी, तथापि उनके कार्य-कलाप सम्राट के अधिकार-क्षेत्र के अंतर्गत ही आते थे। यही पुष्यगुप्त सौराष्ट्र में सुदर्शन झील के निर्माता के रूप में रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में उल्लिखित हैं, जो चंद्रगुप्त-कालीन जल-प्रबंधन तथा सिंचाई-व्यवस्था के महत्त्वपूर्ण प्रमाण हैं।

प्रदेष्टा और प्रादेशिक

प्रत्येक प्रांत कई मंडलों में विभक्त होता था, जो आधुनिक कमिश्नरियों की भाँति थे। अर्थशास्त्र में उल्लिखित ‘प्रदेष्टा’ नामक अधिकारी मंडल का प्रधान होता था, जिसे अशोक के लेखों में ‘प्रादेशिक’ कहा गया है। वह अपने मंडल के विभिन्न विभागों के अधिकारियों के कार्यों का निरीक्षण करता था तथा समाहर्ता के प्रति उत्तरदायी होता था।

आहार या विषय (जिला-प्रशासन)

मंडल का विभाजन जिलों में किया गया था, जिन्हें ‘आहार’ या ‘विषय’ कहा जाता था और जो संभवतः विषयपति के अधीन होते थे। मेगस्थनीज ने जिले के अधिकारियों को ‘एग्रोनोमोई’ कहा है। जिले से नीचे ‘स्थानीय’ होता था, जिसमें आठ सौ ग्राम होते थे। स्थानीय के अंतर्गत दो ‘द्रोणमुख’ होते थे, और प्रत्येक में चार सौ ग्राम होते थे। द्रोणमुख के नीचे ‘खार्वटिक’ होता था, जिसके अंतर्गत बीस ‘संग्रहण’ होते थे। प्रत्येक खार्वटिक में दो सौ ग्राम तथा प्रत्येक संग्रहण में दस ग्राम थे। इन संस्थाओं के प्रधान न्यायिक, कार्यकारी तथा राजस्व-संबंधी सभी प्रकार के अधिकारों का उपभोग करते थे तथा ‘युक्त’ नामक पदाधिकारियों की सहायता से अपना कार्य करते थे। संग्रहण का प्रधान अधिकारी ‘गोप’ कहलाता था। भूमि तथा सिंचाई, कृषि, वन, काष्ठ-उद्योग, धातुशालाओं, खानों तथा सड़कों आदि का प्रबंध करने के लिए अलग-अलग पदाधिकारी नियुक्त होते थे।

ग्राम-शासन

शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम (गाँव) थे, जिनका शासन ‘ग्रामिक’ (ग्रामणी) ग्राम-वृद्धों की सहायता से करता था। ग्राम-वृद्ध परिषद् में ग्राम के प्रमुख व्यक्ति सम्मिलित होते थे और ग्रामिक ग्रामवासियों द्वारा निर्वाचित होता था। ग्राम की भूमि का प्रबंध और सिंचाई की व्यवस्था करना ग्रामणी का प्रधान कर्तव्य था। ग्राम-वृद्धों की परिषद् न्याय का भी कार्य करती थी। ग्रामणी गाँव से भूमिकर एकत्रित करके राजकीय कोषागार में जमा करता था। ग्रामिक के ऊपर क्रमशः गोप और स्थानीय होते थे।

चंद्रगुप्त मौर्यकालीन ग्राम-शासन के संबंध में सोहगौरा (गोरखपुर, उ.प्र.) तथा महास्थान (बोगरा, बांग्लादेश) के लेखों से भी कुछ सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। इन ताम्रपत्र तथा शिलालेखों से पता चलता है कि जनता की सुरक्षा के लिए बड़े-बड़े कोष्ठागार बनवाए गए थे। अर्थशास्त्र में भी कोष्ठागार-निर्माण की चर्चा है। इससे लगता है कि कर की वसूली अनाज के रूप में की जाती थी और उसे कोष्ठागारों में संचित किया जाता था। इस संचित अनाज का उपयोग अकाल या सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय किया जाता था, जिससे मौर्य राज्य की आपदा-प्रबंधन व्यवस्था की झलक भी मिलती है।

नगर-प्रशासन

मौर्यकालीन नगरों का प्रशासन नगरपालिकाओं के माध्यम से चलाया जाता था। मेगस्थनीज ने पाटलिपुत्र के नगर-प्रशासन का विशेष रूप से वर्णन किया है, जो संभवतः किसी न किसी रूप में अन्य नगरों में भी प्रचलित रहा होगा। अर्थशास्त्र के अनुसार नगर का शासक ‘नागरक’ कहलाता था और उसके अधीन ‘स्थानीय’ तथा ‘गोप’ होते थे। नगर-शासन के लिए एक सभा होती थी, जिसका नागरक प्रमुख होता था। मेगस्थनीज के अनुसार पाटलिपुत्र नगर की नगर-परिषद् में पाँच-पाँच सदस्यों की छह समितियाँ होती थीं, जिन्हें यूनानी लेखकों ने ‘एस्टिनोमोई’ कहा है:

1. प्रथम समिति विभिन्न प्रकार की औद्योगिक कलाओं का निरीक्षण करती थी और कारीगरों तथा कलाकारों के हितों की देखभाल करती थी।

2. द्वितीय समिति विदेशी यात्रियों के भोजन, निवास तथा चिकित्सा का प्रबंध करती थी। यदि वे देश से बाहर जाते थे, तो उनकी अगुआई करती थी तथा उनकी मृत्यु हो जाने पर अंत्येष्टि का प्रबंध करती थी। राज्य की सुरक्षा के लिए विदेशियों के आचरण तथा उनकी गतिविधियों पर दृष्टि रखना भी इस समिति का कार्य था।

3. तृतीय समिति जनगणना का हिसाब रखती थी। यह प्राचीन विश्व की सबसे प्रारंभिक व्यवस्थित जनगणना-प्रणालियों में से एक मानी जाती है।

4. चतुर्थ समिति नगर के व्यापार-वाणिज्य की देखभाल करती थी। यह समिति वस्तुओं की बिक्री और उनकी माप-तौल पर नियंत्रण रखती थी; कोई भी व्यक्ति वस्तुओं की बिक्री तब तक नहीं कर सकता था, जब तक वह निर्धारित शुल्क न चुका दे।

5. पंचम समिति (उद्योग समिति) बाजारों में बिकने वाली वस्तुओं में मिलावट की रोकथाम करती थी और मिलावटखोर व्यापारियों को दंड दिलवाती थी। नई तथा पुरानी दोनों प्रकार की वस्तुओं की बिक्री के लिए अलग-अलग प्रबंध था।

6. षष्ठ समिति क्रय-विक्रय की वस्तुओं पर कर वसूल करती थी, जो बिक्री के मूल्य का दसवाँ भाग होता था। कर की चोरी करने वालों को मृत्युदंड दिया जाता था।

गुप्तचर विभाग

चंद्रगुप्त के सुदृढ़ प्रशासनिक तंत्र में गुप्तचरों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। गुप्तचर विभाग ‘महामात्यापसर्प’ नामक अमात्य के अधीन होता था। अर्थशास्त्र में गुप्तचरों को ‘गूढ़पुरुष’ कहा गया है तथा उनकी नियुक्ति और कार्यों को विशेष महत्त्व दिया गया है। यूनानी लेखकों ने इन्हें ‘निरीक्षक’ तथा ‘ओवरसियर्स’ कहा है। स्ट्रैबो के अनुसार इन पदों पर योग्य एवं विश्वसनीय व्यक्तियों की ही नियुक्ति होती थी। इस विभाग में वही व्यक्ति नियुक्त किए जाते थे, जिनके चरित्र की शुद्धता और निष्ठा की सभी प्रकार से परीक्षा कर ली जाती थी। अर्थशास्त्र में कहा गया है कि शत्रु, मित्र, मध्यम तथा उदासीन सभी प्रकार के राजाओं एवं अठारह तीर्थों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए गुप्तचरों की नियुक्ति की जानी चाहिए :

एवं शत्रौ च मित्रे च मध्यमे चोदासीने च।

तीर्थेष्वष्टादशस्वपि चरान् संनियोजयेत्।।

मेगस्थनीज के अनुसार राजा की सेवा में गुप्तचरों की एक बड़ी सेना होती थी, जो सभी पदाधिकारियों तथा कर्मचारियों पर कड़ी दृष्टि रखती थी और राजा को प्रत्येक बात की सूचना देती रहती थी।

अर्थशास्त्र में दो प्रकार के गुप्तचरों का उल्लेख मिलता है- ‘संस्था’ और ‘संचरा’। एक ही स्थान पर रहने वाले गुप्तचर ‘संस्था’ कहलाते थे, जो कापटिकछात्र, उदास्थित, गृहपतिक, वैदेहक (व्यापारी) एवं तापस के वेश में कार्य करते थे। ‘संचरा’ ऐसे गुप्तचर थे, जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करते रहते थे और सूचना एकत्रित कर राजा तक पहुँचाते थे। पुरुषों के अलावा चतुर स्त्रियाँ भी गुप्तचर के कार्य में लगाई जाती थीं। अर्थशास्त्र से पता चलता है कि वेश्याएँ भी गुप्तचरों के पदों पर नियुक्त की जाती थीं। गलत सूचना देने वाले गुप्तचर को दंडित किया जाता था और उसे उसके पद से मुक्त कर दिया जाता था।

गुप्तचरों के अलावा साम्राज्य में शांति-व्यवस्था बनाए रखने और अपराधों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए पुलिस की भी व्यवस्था थी, जिन्हें अर्थशास्त्र में ‘रक्षिणः’ कहा गया है।

न्याय-व्यवस्था

राजतंत्रात्मक व्यवस्था में सम्राट ही सर्वोच्च न्यायाधीश होता था और उसका न्यायालय अंतिम था। इसके अलावा संपूर्ण साम्राज्य में न्याय के लिए अनेक न्यायालय थे। सबसे निचले स्तर पर ग्राम-न्यायालय थे, जहाँ ग्रामणी तथा ग्राम-वृद्ध कतिपय मामलों में अपना निर्णय देते थे और अपराधियों से जुर्माना वसूल करते थे। ग्राम-न्यायालय से ऊपर संग्रहण, द्रोणमुख, स्थानीय और जनपद स्तर के न्यायालय होते थे तथा इन सबसे ऊपर पाटलिपुत्र का केंद्रीय न्यायालय था। यूनानी लेखकों ने ऐसे न्यायाधीशों का भी उल्लेख किया है, जो भारत में रहने वाले विदेशियों के मामलों पर विचार करते थे।

धर्मस्थीय और कंटक-शोधन न्यायालय

अर्थशास्त्र में दो प्रकार की न्यायसभाओं- धर्मस्थीय और कंटक-शोधन की कार्यविधि तथा अधिकार-क्षेत्र का विवरण मिलता है, किंतु इनका अंतर बहुत स्पष्ट नहीं है। धर्मस्थीय न्यायालयों का निर्णय धर्मशास्त्र में निपुण तीन धर्मस्थ या व्यावहारिक तथा तीन अमात्य करते थे, जिन्हें एक प्रकार से ‘दीवानी अदालत’ कहा जा सकता है। कुछ विद्वानों के अनुसार धर्मस्थ न्यायालय वे न्यायालय थे, जो व्यक्तियों के पारस्परिक विवादों के संबंध में निर्णय देते थे। कंटक-शोधन न्यायालय के तीन प्रदेष्टा तथा तीन अमात्य न्यायाधीश होते थे, और राज्य तथा व्यक्ति के बीच विवाद इनके न्याय के विषय थे। इन्हें एक तरह से ‘फौजदारी अदालत’ कहा जा सकता है।

संभवतः धर्मस्थीय अदालतों में अधिकांश वाद-विषय विवाह, स्त्रीधन, तलाक, दाय, घर, खेत, सेतु-बंध, जलाशय-संबंधी, ऋण-संबंधी विवाद, भृत्य, कर्मकर और स्वामी के बीच विवाद, क्रय-विक्रय संबंधी झगड़े से संबंधित होते थे, किंतु चोरी, डकैती और लूट के मामले (‘साहस’) भी धर्मस्थीय अदालत के सामने प्रस्तुत किए जाते थे। इसी प्रकार कुवचन बोलना, मानहानि और मारपीट के मामले (‘वाक्पारुष्य’ तथा ‘दंडपारुष्य’) भी धर्मस्थीय अदालत में रखे जाते थे। समाज-विरोधी तत्त्वों को दंड देने का कार्य मुख्यतः कंटक-शोधन न्यायालयों का था। नीलकंठ शास्त्री के अनुसार कंटक-शोधन न्यायालय संगठित शासन-तंत्र के विविध विषयों से संबद्ध निर्णयों को कार्यान्वित करने के लिए स्थापित किए गए थे। वस्तुतः ये आधुनिक फास्ट-ट्रैक अदालतों की तरह थे, जहाँ अभियोगों पर तुरंत विचार किया जाता था। विदेशियों से संबंधित मामलों के लिए भी विशेष न्यायालयों का गठन किया जाता था।

अर्थशास्त्र से पता चलता है कि जो अमात्य ‘धर्मोपधाशुद्ध’ अर्थात् धार्मिक प्रलोभनों द्वारा शुद्ध चरित्र वाले सिद्ध होते थे, उन्हें ही न्यायाधीश बनाया जाता था। न्यायाधीशों को धर्म, व्यवहार, चरित्र तथा राजशासन का अध्ययन करके ही दंड का निर्णय करना पड़ता था और इन चारों में राजशासन (राजाज्ञा) को ही सर्वश्रेष्ठ माना जाता था। न्यायालयों के कर्मचारियों के लिए भी दंड की व्यवस्था थी- गलत बयान लिखने, निर्दोष व्यक्ति को कारावास देने, अपराधी को छोड़ देने के अपराध में न्यायाधीशों एवं न्यायालय के कर्मचारियों को दंडित किया जाता था।

दंड-विधान

दंड-विधान कठोर था। सामान्य अपराधों में अर्थदंड दिया जाता था। अर्थशास्त्र में तीन प्रकार के अर्थदंड का उल्लेख है- पूर्व साहस दंड 48 से 96 पण, मध्यम साहस दंड 200 से 500 पण, तथा उत्तम साहस दंड 500 से 1,000 पण तक होता था। इसके अतिरिक्त जानबूझकर शिल्पियों का अंग-भंग करने और बिक्रीकर न देने पर प्राणदंड का विधान था। विश्वासघात और व्यभिचार के लिए अंगच्छेद का दंड दिया जाता था। ब्राह्मण विद्रोहियों को जल में डुबोकर मृत्युदंड दिया जाता था। प्रमाण न मिलने वाले अपराधों में जल, अग्नि तथा विष द्वारा दिव्य-परीक्षा (शपथ-परीक्षा) ली जाती थी। मेगस्थनीज के विवरण से पता चलता है कि दंडों की कठोरता के कारण अपराध प्रायः नहीं होते थे।

भूमि एवं राजस्व-व्यवस्था

चंद्रगुप्त की सुदृढ़ राजस्व-व्यवस्था उनके कुशल प्रशासनिक तंत्र का प्रमुख आधार थी। साम्राज्य की समस्त आर्थिक गतिविधियों पर केंद्रीय सरकार का कठोर नियंत्रण था। इस समय कृषि के विकास पर पर्याप्त जोर दिया गया और अधिकाधिक भूमि को कृषि-योग्य बनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। भूमि पर राज्य और कृषक दोनों का अधिकार होता था। मेगस्थनीज ने राजा को भूमि का स्वामी कहा है।

सीताध्यक्ष और राजकीय कृषि

राजकीय भूमि की व्यवस्था करने वाला प्रधान अधिकारी ‘सीताध्यक्ष’ था, जो दासों, कर्मकारों और बंदियों की सहायता से कृषि-कार्य करवाता था। परती जमीन को खेती के तहत लाने के लिए किसानों को कर में छूट दी जाती थी, तथा पशु, बीज और धन से उनकी सहायता की जाती थी। राज्य को आशा थी कि उसने जो कुछ दिया है, वह उसे वापस मिल जाएगा।

भू-राजस्व की दरें

राजकीय आय का प्रमुख स्रोत भू-राजस्व था। राजकीय भूमि से प्राप्त होने वाली आय को ‘सीता’ और शेष भूमि से प्राप्त भू-राजस्व को ‘भाग’ कहते थे। अर्थशास्त्र तथा यूनानी प्रमाणों से पता चलता है कि मौर्य शासन में लोगों को कृषि पर एक चौथाई तक कर देना पड़ता था, किंतु अधिकांश संस्कृत ग्रंथों में इसकी दर कुल उत्पादन का 1/6 निर्धारित की गई है,  इसीलिए राजा को ‘षड्भागी’ कहा जाता था। यदि कोई कृषक अपने हल, बैल, उपकरण, बीज आदि लगाकर राजकीय भूमि पर खेती करता था, तो उसे उपज का आधा भाग प्राप्त होता था। अशोक के रुम्मिनदेई शिलालेख से पता चलता है कि लुम्बिनी (बुद्ध की जन्मस्थली) के निवासियों के लिए कर की राशि घटाकर कुल उत्पादन का 1/8 कर दी गई थी, तथा बलि को माफ कर दिया गया था, जो मौर्य शासकों की धार्मिक स्थलों के प्रति विशेष उदारता का सूचक है। किसानों की अपनी भूमि पर ‘भाग’ नामक भूमिकर लगता था, और नियमित आय के अलावा किसानों को ग्राम-समूहों पर लगने वाला एकमुश्त कर ‘पिंडकर’ भी देना पड़ता था।

अन्य कर और आय के साधन

अर्थशास्त्र में भाग के साथ-साथ ‘बलि’ तथा ‘कर’ का भी उल्लेख मिलता है। ‘बलि’ संभवतः धार्मिक कर था और ‘कर’ संभवतः फल-फूल के बगीचों की उपज का एक अंश था, जो राज्य को दिया जाता था। रुम्मिनदेई अभिलेख में ‘बलि’ का उल्लेख मिलता है। राज्य की सेना जब गाँवों से होकर गुजरती थी, तो ग्रामवासियों को उनकी रसद का प्रबंध करना पड़ता था, जिसे संभवतः ‘सेनाभक्त’ कहा जाता था। ‘हिरण्य’ संभवतः नकद भुगतान को कहते थे।

अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि कर की मात्रा सिंचाई की सुविधा पर भी निर्भर करती थी, जो उपज के पाँचवें भाग से एक तिहाई तक होती थी। अपने कुएँ से सिंचाई करने वाला किसान फसल का पाँचवाँ हिस्सा, स्वयं कंधे पर रखकर घड़े द्वारा सिंचाई करने वाला चतुर्थांश और नहर आदि के जल से सिंचाई करने वाला तृतीयांश देता था। भूमिकर और सिंचाई कर को मिलाकर किसान को उपज का करीब आधा भाग देना पड़ता था। नगरों में जल एवं भवन-कर भी लगाए जाते थे।

राजकीय आय के अन्य प्रमुख साधनों में सीमा-शुल्क, चुंगी, तटकर, विक्रयकर, व्यापारिक मार्गों, सड़कों तथा घाटों पर लगने वाले कर तथा अनुज्ञा शुल्क शामिल थे। दुर्गवाले नगरों में बिक्री की जाने वाली सभी वस्तुओं (अन्न एवं पशु को छोड़कर) को द्वार के पास स्थित चुंगीघर में ले जाकर उन पर राजकीय मुद्रा अंकित की जाती थी और विक्रय के बाद मूल्य के अनुसार उन पर कर लिया जाता था। यह संभवतः 10 से 15 प्रतिशत तक होता था। शराब पर चुंगी भी आय का एक साधन थी, जिसके लिए अधिकार-पत्र (लाइसेंस) रखना होता था; विदेशी शराब के विक्रय के लिए विशेष अधिकार-पत्र आवश्यक था। इसके अलावा तौल-माप के साधनों पर कर, द्यूतकर, वेश्याओं, उद्योगों तथा शिल्पों पर भी कर लगाया जाता था। वन से भी राज्य को पर्याप्त आय होती थी। लक्षणाध्यक्ष सिक्के जारी करता था, और जब लोग सिक्के बनवाते थे, तो उन्हें राज्य को धन देना पड़ता था। विविध प्रकार के दंड तथा संपत्ति की जब्ती से भी राज्य को आय होती थी। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में अनेक ऐसी परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है, जिनमें राज्य संपत्ति जब्त कर लेता था।

संकटकाल में राज्य अनेक अनुचित उपायों से भी धन संचय करता था, जैसे- प्रणय कर, अद्भुत-प्रदर्शन, और मेलों को संगठित करके। ‘प्रणय’ का शब्दिक अर्थ है प्रेमवश दिया जाने वाला उपहार, किंतु व्यवहार में यह एक विशेष आपातकालीन कर था। संभवतः यह केवल एक बार वसूल किया जा सकता था और भूमि के स्वरूप के अनुसार यह उपज का एक-तिहाई अथवा एक-चौथाई भाग हो सकता था। पतंजलि के अनुसार मौर्यकाल में धन-संग्रह के लिए देवताओं की प्रतिमाएँ भी बनाकर बेची जाती थीं।

समाहर्ता नामक पदाधिकारी करों को एकत्र करने एवं आय-व्यय का लेखा-जोखा रखने के लिए उत्तरदायी था। प्रांतों में स्थानीय तथा गोप नामक पदाधिकारी कर एकत्र करते थे। इस प्रकार पहली बार मौर्यकाल में करों की एक विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की गई और यह प्रयास किया गया कि जनता से अधिक से अधिक अतिरिक्त उत्पाद वसूल किया जा सके।

राजकीय व्यय के मद

राजकीय आय का व्यय विभिन्न मदों पर किया जाता था- एक भाग सम्राट और उनके परिवार के भरण-पोषण में, दूसरा भाग विविध पदाधिकारियों के वेतन आदि में, तीसरा भाग सैनिक कार्यों में, चौथा भाग कल्याणकारी कार्यों (जैसे सड़क, नहर, झील, जलाशय एवं अस्पताल के निर्माण) में तथा पाँचवाँ भाग धार्मिक एवं शैक्षणिक संस्थाओं को दान देने में व्यय किया जाता था।

राज्य की आय का एक बड़ा भाग वेतन देने पर खर्च होता था। सबसे अधिक वेतन 48,000 पण मंत्रियों का था और सबसे कम वेतन 60 पण था। आचार्य, पुरोहित और क्षत्रियों को देय भूमि दान में दी जाती थी, जो कर-मुक्त होती थी। खान, जंगल तथा राजकीय भूमि पर कृषि आदि के विकास के लिए भी राज्य की ओर से धन व्यय किया जाता था। सेना पर भी काफी धन व्यय होता था- अर्थशास्त्र के अनुसार प्रशिक्षित पदाति का वेतन 500 पण, रथिक का 200 पण, और आरोहिक (हाथी और घोड़े पर चढ़कर युद्ध करने वाले) का वेतन 500 से 1,000 पण वार्षिक रखा गया था। उच्च सेनाधिकारियों का वेतन 4,000 पण से लेकर 12,000 पण वार्षिक तक था। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि राजकीय आय का बहुत बड़ा भाग सेना पर खर्च किया जाता था। कर्मचारियों के नकद भुगतान तथा लक्षणाध्यक्ष (टकसाल-अधीक्षक) के कर्तव्यों से लगता है कि मुद्रा-अर्थव्यवस्था की दिशा में काफी प्रगति हो चुकी थी। चाँदी के आहत सिक्कों (पंच-मार्क्ड सिक्कों) के मिले अनेक भंडार इसी ओर संकेत करते हैं।

यद्यपि मौर्य साम्राज्य में सैनिकों पर अत्यधिक खर्च किया जाता था, तथापि इस शासन-व्यवस्था में कल्याणकारी राज्य की कई विशेषताएँ भी पाई जाती हैं, जैसे- राजमार्गों का निर्माण, सिंचाई का प्रबंध, पेयजल की व्यवस्था, सड़कों के किनारे छायादार वृक्षों का लगाना, मनुष्य और पशुओं के लिए चिकित्सालय, मृत सैनिकों तथा राज-कर्मचारियों के परिवारों का भरण-पोषण, तथा दीनों-अनाथों का भरण-पोषण। अशोक के समय इन परोपकारी कार्यों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई।

सैन्य-संगठन

मेगस्थनीज ने चंद्रगुप्त के सैन्य-संगठन का भी विस्तृत वर्णन किया है। चंद्रगुप्त की विशाल सेना में छह लाख पैदल, तीस हजार अश्वारोही, नौ हजार हाथी तथा संभवतः आठ सौ रथ थे। मेगस्थनीज के अनुसार समाज में कृषकों के बाद सबसे अधिक संख्या सैनिकों की थी। सेना का प्रबंध युद्ध-परिषद् करती थी, जिसमें पाँच-पाँच सदस्यों की छह समितियाँ थीं। इनमें से पाँच समितियाँ क्रमशः नौ (जल-सेना), पदाति, अश्व, रथ और गज सेना की व्यवस्था करती थीं, जबकि छठी समिति सेना के यातायात और आवश्यक युद्ध-सामग्री का प्रबंध करती थी। सैनिकों को वेतन के अतिरिक्त राज्य से अस्त्र-शस्त्र और अन्य आवश्यक सामग्री मिलती थी। सैनिकों को इतना वेतन मिलता था कि वे अपने परिवार के साथ सुखी जीवन व्यतीत कर सकें।

इस प्रकार स्पष्ट है कि चंद्रगुप्त मौर्य की शासन-व्यवस्था लोकोपकारी थी। निरंकुश होते हुए भी सम्राट धर्म, लोकाचार तथा न्याय के अनुसार शासन करता था। चंद्रगुप्त के शासन का आदर्श अर्थशास्त्र में इस प्रकार वर्णित है- “प्रजा के सुख और कल्याण में ही राजा का सुख और कल्याण है। अपना प्रिय करने में राजा का हित नहीं होता, अपितु जो प्रजा के लिए हो, उसे करने में राजा का हित होता है”:

प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हितं हितम्।

नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्।।

चंद्रगुप्त मौर्य की शासन-व्यवस्था की प्रमुख विशेषता एक सुसंगठित नौकरशाही थी, जो शासन की सुविधा के लिए राज्य में विभिन्न प्रकार के आँकड़ों को एकत्र करती थी। केंद्र का शासन के विभिन्न विभागों और राज्य के विभिन्न प्रदेशों पर कड़ा नियंत्रण था। आर्थिक और सामाजिक जीवन की विभिन्न दिशाओं में राज्य का इतना गहन और कठोर नियंत्रण प्राचीन भारतीय इतिहास के किसी अन्य काल में नहीं मिलता। कुछ इतिहासकारों के अनुसार “चंद्रगुप्त ने सुरक्षा की वेदी पर नागरिक स्वतंत्रता की बलि चढ़ा दी तथा साम्राज्य को एक पुलिस राज्य में परिवर्तित कर दिया।” कुछ विद्वान इस व्यवस्था की उत्पत्ति के संबंध में हेलेनिस्टिक राज्यों के माध्यम से हखामनी ईरान का प्रभाव देखते हैं, किंतु इस व्यवस्था के निर्माण में कौटिल्य और चंद्रगुप्त की मौलिकता को भी महत्त्व दिया जाना चाहिए। यह व्यवस्था नितांत नई नहीं थी। संभवतः पूर्ववर्ती मगध के शासकों, विशेषकर नंदवंशीय शासकों, ने ही इस व्यवस्था की नींव डाली थी और चंद्रगुप्त तथा कौटिल्य ने उसे एक सुव्यवस्थित, विस्तृत तथा सुसंगत रूप प्रदान किया। यही प्रशासनिक ढाँचा आगे चलकर अशोक के शासनकाल में और भी अधिक कल्याणकारी स्वरूप ग्रहण करता है, तथा परवर्ती भारतीय राजवंशों के लिए भी एक आदर्श प्रतिमान बना रहा।

चंद्रगुप्त मौर्य की शासन-व्यवस्था से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. चंद्रगुप्त मौर्य की शासन-व्यवस्था की प्रमुख विशेषता क्या थी?

उसकी शासन-व्यवस्था केंद्रीकृत, संगठित और मजबूत प्रशासनिक तंत्र पर आधारित थी, जिसमें सम्राट सर्वोच्च सत्ता का केंद्र था।

2. केंद्रीय प्रशासन में सम्राट की क्या भूमिका थी?

सम्राट के पास कार्यपालिका, न्याय और सैन्य शक्तियों का प्रमुख अधिकार था। उसकी सहायता के लिए मंत्रिपरिषद् तथा विभिन्न विभागों के अधिकारी कार्य करते थे।

3. मौर्य साम्राज्य का प्रांतीय और स्थानीय प्रशासन कैसा था?

विशाल साम्राज्य को प्रांत, जिले और ग्राम में विभाजित किया गया था। प्रांतों का प्रशासन उच्च अधिकारियों या राजकुमारों तथा ग्रामों का प्रशासन ग्रामिक द्वारा किया जाता था।

4. चंद्रगुप्त मौर्य की सैन्य और गुप्तचर व्यवस्था कैसी थी?

मौर्य शासन में विशाल सेना और प्रभावी गुप्तचर तंत्र था। सेना में पैदल, घुड़सवार, रथ और हाथी प्रमुख अंग थे, तथा गुप्तचर राज्य की सुरक्षा और प्रशासनिक निगरानी में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

5. मौर्य शासन की आय और न्याय-व्यवस्था का आधार क्या था?

राज्य की आय का प्रमुख स्रोत भू-राजस्व था; इसके अलावा व्यापार, खनिज आदि से भी कर प्राप्त किए जाते थे। न्याय व्यवस्था में सम्राट सर्वोच्च न्यायाधीश था और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कठोर प्रशासनिक व्यवस्था लागू थी।

6. चंद्रगुप्त मौर्य के प्रशासन की जानकारी के मुख्य स्रोत कौन-से हैं?

कौटिल्य का अर्थशास्त्र, मेगस्थनीज की इंडिका के अवशिष्ट अंश, अशोक के अभिलेख, तथा जूनागढ़, सोहगौरा और महास्थान के लेख मौर्यकालीन प्रशासन को समझने के प्रमुख स्रोत हैं।
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