असीरियन सभ्यता
असीरिया प्राचीन मेसोपोटामिया के उत्तरी भाग में दजला (टाइग्रिस) नदी के दोनों ओर स्थित एक महत्त्वपूर्ण प्रदेश था। यद्यपि भौगोलिक दृष्टि से यह दक्षिणी मेसोपोटामिया से कुछ भिन्न था, फिर भी दजला नदी द्वारा बेबिलोनिया से जुड़े होने तथा पूर्व में जगरोस पर्वतमाला और उत्तर में आर्मीनियाई पर्वतों से घिरा होने के कारण इसे मेसोपोटामिया की सांस्कृतिक और राजनीतिक परंपरा का अभिन्न अंग माना जाता है। पर्वतीय भूभाग होने के कारण यहाँ की जलवायु बेबिलोन की अपेक्षा अधिक शीतल और स्वास्थ्यवर्धक थी, जिसने यहाँ के निवासियों को शारीरिक रूप से सुदृढ़ और युद्ध के लिए सक्षम बनाया।
असीरिया में चूना-पत्थर, सेलखड़ी तथा अन्य कठोर पत्थर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध थे, जिनका उपयोग भवन निर्माण और मूर्तिकला में किया जाता था। दजला नदी तथा उसकी सहायक नदियों की घाटियों में उपजाऊ भूमि होने के कारण गेहूँ, जौ तथा अन्य कृषि उत्पादों की अच्छी खेती होती थी। परिवहन के लिए प्रारंभिक काल में गर्दभ (गधे) का उपयोग किया जाता था, जबकि बाद के समय में असीरियन लोग घोड़ों के पालन तथा उनके सैन्य उपयोग में भी दक्ष हो गए। इसी कारण उनकी सेना प्राचीन विश्व की सबसे संगठित और प्रभावशाली सेनाओं में गिनी जाती थी।
उत्पत्ति और जातीय स्वरूप
असीरियन लोग सेमिटिक जाति की एक शाखा थे। अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार वे तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के प्रारंभ में दजला नदी के तट पर स्थित अश्शूर नामक नगर में आकर बस गए। यही नगर आगे चलकर उनके राज्य का राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र बना। इसी नगर के नाम पर इस क्षेत्र का नाम असीरिया तथा इसके निवासियों को असीरियन कहा जाने लगा।
प्रारंभिक काल में असीरियन समाज व्यापार, पशुपालन और सीमावर्ती क्षेत्रों से संपर्क पर निर्भर था। समय के साथ उन्होंने एक सुदृढ़ सैन्य शक्ति का विकास किया। उत्तर और पूर्व के पर्वतीय क्षेत्रों तथा पश्चिम के व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए उन्होंने लगातार युद्ध किए। सीमित प्राकृतिक संसाधनों और सामरिक परिस्थितियों ने उनमें अनुशासन, संगठन तथा युद्धक कौशल का विकास किया। यही विशेषताएँ आगे चलकर उनके विशाल साम्राज्य की स्थापना का आधार बनीं।
असीरिया की राजधानी समय-समय पर अश्शूर, कल्हू (निमरुद), दुर-शरूकिन तथा निनेवेह जैसे नगरों में रही। असीरियन शासकों ने संगठित सेना, लौह अस्त्र-शस्त्र, घुड़सवार सेना, रथों तथा घेराबंदी की उन्नत तकनीकों का उपयोग करके एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। उन्होंने प्रांतीय प्रशासन, कर-व्यवस्था तथा राजमार्गों का सुव्यवस्थित विकास किया, जिससे साम्राज्य का प्रभावी संचालन संभव हुआ। असीरिया प्राचीन पश्चिमी एशिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य शक्तियों में से एक बन गया और उसके शासन का प्रभाव मिस्र से लेकर ईरान तक फैला।
ऐतिहासिक स्रोत
असीरियन सभ्यता के अध्ययन के लिए अनेक प्रकार के ऐतिहासिक स्रोत उपलब्ध हैं। बाइबिल तथा यूनानी लेखकों के विवरणों से कुछ जानकारी प्राप्त होती है, किंतु उनका ऐतिहासिक महत्त्व सीमित है। असीरिया के इतिहास का सबसे विश्वसनीय आधार उसके राजकीय अभिलेख, शिलालेख तथा मिट्टी की तख्तियों पर अंकित कीलाक्षर (क्यूनिफॉर्म) लेख हैं।
असीरियन शासक अपने प्रत्येक सैन्य अभियान, प्रशासनिक कार्य तथा महत्त्वपूर्ण घटनाओं का विवरण अभिलेखों में अंकित करवाते थे। इन अभिलेखों से शासकों के शासनकाल, युद्धों, विजयों तथा प्रशासनिक व्यवस्था का क्रमबद्ध ज्ञान प्राप्त होता है। विशेष रूप से सम्राट अशुरबनिपाल द्वारा निनेवेह में स्थापित विशाल राजकीय पुस्तकालय अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इस पुस्तकालय में असीरियन अभिलेखों के साथ-साथ बेबिलोनियन साहित्य, धार्मिक ग्रंथ, प्रशासनिक दस्तावेज, वैज्ञानिक लेख तथा ऐतिहासिक विवरण भी सुरक्षित किए गए थे। इन अभिलेखों और पुरातात्त्विक उत्खननों से असीरियन सभ्यता के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन की प्रामाणिक एवं विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है।
असीरियन सभ्यता का राजनीतिक इतिहास
प्रारंभिक राजनीतिक विकास
असीरियनों का प्रारंभिक इतिहास पूर्णतः स्पष्ट नहीं है, क्योंकि इस काल के स्रोत सीमित हैं। सामान्यतः माना जाता है कि तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के प्रारंभ में या उससे कुछ पहले सेमिटिक मूल के असीरियन लोग दजला (टाइग्रिस) नदी के तट पर स्थित अश्शूर नगर में आकर बस गए। यही नगर आगे चलकर उनके राज्य का प्रमुख राजनीतिक और धार्मिक केंद्र बना। समय के साथ उन्होंने अपनी शक्ति का विस्तार किया तथा आसपास के अनेक छोटे-छोटे नगरों और क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर लिया।
दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के प्रारंभ में असीरिया को बेबिलोन के महान शासक हम्मूराबी की सर्वोच्च सत्ता स्वीकार करनी पड़ी। इसके बाद कुछ समय तक असीरिया स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर नहीं सका, विशेषकर मितन्नी राज्य के प्रभुत्व के दौरान उसकी राजनीतिक शक्ति काफी सीमित हो गई। किंतु मितन्नी साम्राज्य के पतन के बाद असीरिया ने पुनः अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित की।
अश्शूर-उबल्लित प्रथम का उदय
मितन्नी शक्ति के पतन के पश्चात अश्शूर-उबल्लित प्रथम (लगभग 1365–1330 ई. पू.) के नेतृत्व में असीरिया का पुनः एक शक्तिशाली राज्य के रूप में उदय हुआ। उसने असीरिया की राजनीतिक स्वतंत्रता को सुदृढ़ किया तथा साम्राज्य के विस्तार की नींव रखी। उसके शासनकाल में असीरिया पश्चिमी एशिया की प्रमुख शक्तियों में सम्मिलित हो गया और मिस्र, हित्ती तथा बेबिलोन जैसे राज्यों के साथ राजनयिक संबंध स्थापित हुए।
अश्शूर-उबल्लित प्रथम के बाद टुकुल्ति-निनुर्त प्रथम (लगभग 1244–1208 ई. पू.) ने असीरिया की शक्ति को और अधिक बढ़ाया। उसने बेबिलोन पर विजय प्राप्त कर कुछ समय के लिए वहाँ अपना प्रभुत्व स्थापित किया। उसके पश्चात अशुर-नदिन-अप्ली, एनलिल-कुदुर-उसुर, निनुर्त-अपल-एकुर, अशुर-दान प्रथम तथा अशुर-रेश-इशी प्रथम जैसे शासकों ने लगभग 1114–ईसा पूर्व तक शासन किया। यद्यपि इन शासकों के विषय में सीमित जानकारी उपलब्ध है, फिर भी उन्होंने असीरिया की राजनीतिक परंपरा को बनाए रखा और राज्य की सुरक्षा के लिए निरंतर प्रयास किए।
तिग्लथ-पिलेसर प्रथम
अशुर-रेश-इशी प्रथम के बाद तिग्लथ-पिलेसर प्रथम (लगभग 1114–1076 ई. पू.) असीरिया का शासक बना। वह प्राचीन असीरिया के सबसे प्रतिभाशाली और विजयी शासकों में गिना जाता है। उसने एशिया माइनर, उत्तरी सीरिया तथा भूमध्यसागर के तटीय क्षेत्रों तक अपने अभियान चलाए। फीनीशिया के प्रमुख नगरों—गुब्ला (बाइब्लोस), सिडोन तथा अर्वद ने उसकी अधीनता स्वीकार की। मिस्र के शासक ने भी उसके साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखे और उसे बहुमूल्य उपहार भेजे।
तिग्लथ-पिलेसर प्रथम ने बेबिलोन के विरुद्ध भी सफल अभियान चलाया और अपनी विजयों के उपलक्ष्य में ‘सुमेर और अक्काद का राजा’ जैसी प्रतिष्ठित उपाधि धारण की। उसके शासनकाल में असीरिया की सीमाएँ अत्यधिक विस्तृत हुईं और उसका प्रभाव पश्चिमी एशिया के विशाल भूभाग तक फैल गया।
पतन और एरेमियों का प्रभाव
तिग्लथ-पिलेसर प्रथम की मृत्यु के बाद लगभग दो शताब्दियों तक असीरिया की राजनीतिक शक्ति कमजोर रही। इस काल में अरामी अरामी जनजातियों के लगातार आक्रमणों ने असीरिया के विस्तार को रोक दिया। अरामी लोगों की उत्पत्ति के विषय में विद्वानों में मतभेद है। अधिकांश इतिहासकार उन्हें सेमिटिक भाषा बोलने वाली जनजातियाँ मानते हैं, जिनका संबंध सीरिया तथा उर्वर अर्धचंद्र क्षेत्र से था।
इस अवधि में अशुर-बेल-केला (लगभग 1074–1057 ई. पू.), अश्शूर-नासिरपाल प्रथम (लगभग 1049–1031 ई. पू.), शाल्मनेसर द्वितीय (लगभग 1030–1019 ई. पू.), अश्शूर-रबी द्वितीय (लगभग 1010–970 ई. पू.), तिग्लथ-पिलेसर द्वितीय (लगभग 966–935 ई. पू.) तथा अशुर-दान द्वितीय (लगभग 934–912 ई. पू.) जैसे अनेक शासकों ने शासन किया, किंतु इनकी राजनीतिक उपलब्धियों के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। निरंतर बाह्य आक्रमणों और आंतरिक कठिनाइयों के कारण असीरिया इस समय अपेक्षाकृत कमजोर बना रहा।
अदद-निरारी द्वितीय और पुनरुत्थान
असीरिया का पुनरुत्थान अदद-निरारी द्वितीय (911–891 ई. पू.) के शासनकाल से आरंभ हुआ। उसने अरामी जनजातियों को पराजित किया, बेबिलोन की विस्तारवादी नीति पर अंकुश लगाया तथा असीरिया की सीमाओं को पुनः सुरक्षित बनाया। उसके शासनकाल में प्रशासन को सुदृढ़ किया गया और साम्राज्य विस्तार की नई नीति अपनाई गई। उसके प्रयासों से असीरिया पुनः पश्चिमी एशिया की एक प्रभावशाली शक्ति बन गया।
अदद-निरारी द्वितीय के पश्चात उसका पुत्र टुकुल्ति-निनुर्त द्वितीय (890–884 ई. पू.) शासक बना। यद्यपि उसका शासनकाल अल्पकालिक था, फिर भी उसने अपने पिता की नीतियों को आगे बढ़ाया और राज्य की सीमाओं को सुरक्षित रखा। टुकुल्ति-निनुर्त द्वितीय के बाद अशुर-नासिरपाल द्वितीय (883–859 ई. पू.) के शासन के साथ असीरियन साम्राज्य के उत्कर्ष का एक नया और शक्तिशाली चरण प्रारंभ हुआ।
अशुरनसिरपाल द्वितीय (883–859 ई. पू.)
असीरियन साम्राज्य के वास्तविक विस्तार का आरंभ अशुरनसिरपाल द्वितीय के शासनकाल से हुआ। वह असीरिया के सबसे शक्तिशाली और महत्त्वाकांक्षी शासकों में से एक था। उसके शासनकाल में असीरिया एक क्षेत्रीय राज्य से विकसित होकर पश्चिमी एशिया की प्रमुख साम्राज्यवादी शक्ति बन गया। उसने अपनी विजयों के माध्यम से साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार किया तथा प्रशासनिक व्यवस्था को भी सुदृढ़ बनाया।
अशुरनसिरपाल द्वितीय ने अपने सैन्य अभियानों की शुरुआत पूर्व और उत्तर की ओर की। उसने दक्षिणी आर्मीनिया, जगरोस पर्वतीय क्षेत्रों तथा एशिया माइनर के कुछ भागों पर अधिकार स्थापित किया। इसके बाद उसने फरात (यूफ्रेटीस) नदी पार कर उत्तरी सीरिया की ओर अभियान चलाया और भूमध्यसागर के तट तक पहुँच गया। फीनीशिया के अनेक नगरों ने उसकी शक्ति स्वीकार कर कर देना प्रारंभ किया। इन अभियानों से असीरिया को अत्यधिक धन, बहुमूल्य धातुएँ, लकड़ी, पशुधन तथा अन्य संसाधन प्राप्त हुए, जिससे राजकोष अत्यंत समृद्ध हुआ।
सैन्य संगठन और कठोर नीति
अशुरनसिरपाल द्वितीय ने असीरियन सेना को अधिक संगठित और प्रभावशाली बनाया। उसके समय में घुड़सवार सेना का महत्त्व बढ़ा तथा युद्ध में घोड़ों का व्यापक उपयोग होने लगा। उसने घेराबंदी की उन्नत तकनीकों, लौह अस्त्र-शस्त्र तथा प्रशिक्षित सैनिकों के बल पर अनेक राज्यों को पराजित किया।
अशुरनसिरपाल द्वितीय अपनी कठोर और आतंकपूर्ण सैन्य नीति के लिए भी प्रसिद्ध है। उसके राजकीय अभिलेखों में पराजित शत्रुओं के प्रति अत्यधिक कठोर व्यवहार का उल्लेख मिलता है। विद्रोही नगरों को नष्ट करना, दुर्गों को जलाना, शत्रुओं को बंदी बनाकर हत्या करना तथा विद्रोहियों को कठोर दंड देना उसकी नीति का अंग था। इन विवरणों का उद्देश्य केवल घटनाओं का वर्णन करना नहीं था, बल्कि अन्य राज्यों में भय उत्पन्न कर भविष्य के विद्रोहों को रोकना भी था। आधुनिक इतिहासकार इन अभिलेखों को उस समय के शाही प्रचार का भी एक माध्यम मानते हैं।
लोककल्याण और राजधानी का विकास
युद्धप्रिय होने के बावजूद अशुरनसिरपाल द्वितीय ने राज्य के विकास के लिए अनेक रचनात्मक कार्य भी किए। उसने कल्हू (निमरुद) को अपनी नई राजधानी बनाया और वहाँ भव्य राजमहलों, मंदिरों तथा प्रशासनिक भवनों का निर्माण कराया। नगर को सुंदर बनाने के लिए उद्यान लगाए गए तथा सिंचाई की सुविधा बढ़ाने हेतु नहरों का निर्माण कराया गया। उसके द्वारा निर्मित विशाल राजप्रासाद और पत्थरों पर उत्कीर्ण उत्कृष्ट मूर्तियाँ असीरियन कला और स्थापत्य के श्रेष्ठ उदाहरण मानी जाती हैं। उसने साम्राज्य के विभिन्न भागों में नई बस्तियाँ बसाईं और प्रशासन को अधिक संगठित बनाया।
शाल्मनेसर तृतीय (859–824 ई. पू.)
अशुरनसिरपाल द्वितीय के बाद उसका पुत्र शाल्मनेसर तृतीय असीरिया का शासक बना। वह भी अपने पिता की भाँति पराक्रमी और कुशल सेनानायक था। लगभग पैंतीस वर्षों के शासनकाल में उसने लगभग इकतीस वर्ष युद्ध अभियानों में बिताया। उसका मुख्य उद्देश्य अपने पिता द्वारा स्थापित विशाल साम्राज्य को सुरक्षित रखना तथा उसका और विस्तार करना था।
अपने शासन के प्रारंभिक वर्षों में उसने पश्चिमी एशिया में असीरिया की स्थिति को मजबूत किया। 853 ईसा पूर्व में सीरिया के हमात, दमिश्क तथा इज़राइल सहित अनेक राज्यों ने असीरिया के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा बनाया। इन राज्यों का सामना शाल्मनेसर तृतीय से करकर के युद्ध में हुआ। असीरियन अभिलेख इस युद्ध में अपनी विजय का दावा करते हैं, जबकि आधुनिक इतिहासकार इसे अनिर्णायक संघर्ष मानते हैं। फिर भी इस युद्ध ने असीरिया की सैन्य शक्ति का प्रभाव पूरे पश्चिमी एशिया में स्थापित कर दिया।

बेबिलोन और अन्य क्षेत्रों पर प्रभुत्व
जब शाल्मनेसर तृतीय पश्चिमी अभियानों में व्यस्त था, तब बेबिलोन में विद्रोह हो गया। दक्षिणी बेबिलोन में कैल्डियाई सरदारों ने भी स्वतंत्रता का प्रयास किया। शाल्मनेसर तृतीय ने इस विद्रोह का सफलतापूर्वक दमन किया और बेबिलोन को पुनः असीरिया की अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य होना पड़ा। इसके अतिरिक्त उसने जगरोस पर्वतों के क्षेत्रों, उरर्तु तथा अन्य सीमावर्ती राज्यों के विरुद्ध भी सफल अभियान चलाए। उसके शासनकाल में असीरिया का प्रभाव फारस की खाड़ी से लेकर भूमध्यसागर तक फैल गया। इसी कारण नौवीं शताब्दी ईसा पूर्व में असीरिया पश्चिमी एशिया की सबसे शक्तिशाली साम्राज्यवादी शक्ति बन गया।
उत्तराधिकार का संकट
शाल्मनेसर तृतीय के शासन के अंतिम वर्षों में उत्तराधिकार का विवाद उत्पन्न हुआ। उसने अपने पुत्र शम्शी-अदद पंचम को युवराज घोषित किया, जिससे उसका ज्येष्ठ पुत्र अश्शूर-दानिन-पाल असंतुष्ट हो गया। उसने विद्रोह कर निनेवेह, अश्शूर तथा अन्य क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। इससे असीरिया में गृहयुद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई।
किंतु शाल्मनेसर तृतीय की मृत्यु के बाद शम्शी-अदद पंचम (823–811 ई. पू.) ने सत्ता प्राप्त की। उसने अपने विरोधियों को पराजित किया तथा बेबिलोन, एलम और कैल्डियाई शक्तियों के विद्रोहों को भी दबा दिया। उसके शासनकाल में असीरिया की राजनीतिक एकता पुनः स्थापित हुई।
अदद-निरारी तृतीय और उत्तरवर्ती शासक
शम्शी-अदद पंचम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अदद-निरारी तृतीय (810–783 ई. पू.) शासक बना। प्रारंभिक वर्षों में उसकी माता सम्मुरामात ने शासन संचालन किया। यूनानी परंपरा में यही रानी बाद में प्रसिद्ध सेमिरामिस के रूप में विख्यात हुई।
अदद-निरारी तृतीय ने बेबिलोन, मादी तथा उरर्तु के विरुद्ध सफल अभियान चलाए और असीरिया की सीमाओं को सुरक्षित रखा। उसके पश्चात शाल्मनेसर चतुर्थ (782–772 ई. पू.), अशुर-दान तृतीय (771–754 ई. पू.) तथा अशुर-निरारी पंचम (753–746 ई. पू.) जैसे शासकों ने शासन किया, किंतु वे साम्राज्य को पहले जैसी शक्ति प्रदान नहीं कर सके। इस अवधि में आंतरिक संघर्ष, प्रांतीय विद्रोह तथा प्रशासनिक शिथिलता बढ़ती गई। अंततः अशुर-निरारी पंचम के शासनकाल में विद्रोह हुआ और वह परिवार सहित मार डाला गया।
तिग्लथ-पिलेसर तृतीय (745–727 ई. पू.)
लगातार गृहकलह और राजनीतिक अस्थिरता के बाद तिग्लथ-पिलेसर तृतीय ने 745 ईसा पूर्व में असीरिया का सिंहासन प्राप्त किया। उसका प्रारंभिक नाम पुलु था। राजा बनने के बाद उसने तिग्लथ-पिलेसर की राजकीय उपाधि धारण की। वह मूलतः एक असीरियन सेनापति था और उसने असीरिया की कमजोर पड़ चुकी स्थिति को पुनः सुदृढ़ बनाया।
सिंहासन पर बैठते ही उसने प्रशासन का पुनर्गठन किया तथा सेना में व्यापक सुधार किए। उसने प्रांतीय अधिकारियों की शक्ति सीमित की, स्थायी सेना का विकास किया और साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया। यही सुधार आगे चलकर असीरिया की दीर्घकालीन शक्ति का आधार बने।
सैन्य अभियान और साम्राज्य विस्तार
तिग्लथ-पिलेसर तृतीय ने सबसे पहले दक्षिण में सक्रिय अरामी जनजातियों और पुकुदु जैसे विद्रोही समूहों को पराजित किया। इसके बाद उसने असीरिया के पुराने प्रतिद्वंद्वी उरर्तु पर आक्रमण किया और उसके शासक सर्दुरी द्वितीय को पराजित किया। इसके पश्चात उसकी सेनाएँ ईरानी पठार पार कर मादी प्रदेशों तक पहुँच गईं। यह असीरियन इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण सैन्य अभियान था।
पूर्व में सफलता प्राप्त करने के बाद उसने पश्चिम की ओर ध्यान दिया। टायर, सिडोन, अश्केलोन, गाज़ा, अम्मोन, मोआब तथा एदोम जैसे राज्यों ने उसके विरुद्ध विद्रोह किया, किंतु उसने सभी विद्रोहों का कठोरता से दमन किया। इन राज्यों को पुनः असीरिया की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी और नियमित कर देना पड़ा।
बेबिलोन पर अधिकार
पश्चिमी अभियानों के बाद तिग्लथ-पिलेसर तृतीय ने बेबिलोन की ओर ध्यान दिया। कई वर्षों तक संघर्ष करने के बाद 729 ईसा पूर्व में उसने बेबिलोन पर पुनः अधिकार स्थापित किया और स्वयं ‘पुलु’ नाम से बेबिलोन के राजा का पद भी ग्रहण किया। इस प्रकार असीरिया और बेबिलोन दोनों पर उसका प्रत्यक्ष शासन स्थापित हो गया। उसके शासनकाल में असीरियन साम्राज्य दक्षिण में फारस की खाड़ी, उत्तर में आर्मीनिया, पूर्व में मादी प्रदेश तथा पश्चिम में भूमध्यसागर तक विस्तृत हो गया। इससे पहले किसी भी असीरियन शासक ने इतने विशाल भूभाग पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित नहीं किया था।
प्रशासनिक सुधार और निर्माण कार्य
तिग्लथ-पिलेसर तृतीय ने प्रशासनिक व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण सुधार किए। उसने विजित राज्यों को स्वतंत्र आश्रित राज्यों के स्थान पर सीधे असीरियन प्रांतों में परिवर्तित किया। प्रत्येक प्रांत में शाही अधिकारियों की नियुक्ति की गई, जिससे प्रशासन अधिक प्रभावी बना।
उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण नीति जनसंख्या स्थानांतरण थी। विद्रोह की संभावना कम करने के लिए उसने विजित क्षेत्रों की जनसंख्या के एक भाग को साम्राज्य के अन्य प्रांतों में भेज दिया। इस नीति से स्थानीय विद्रोह काम हो गए।
तिग्लथ-पिलेसर तृतीय ने अनेक मंदिरों, राजमहलों और सार्वजनिक भवनों का निर्माण कराया। उसने सड़कों, प्रशासनिक केंद्रों और सैन्य प्रतिष्ठानों का भी विकास किया। उसके द्वारा किए गए सैन्य और प्रशासनिक सुधारों ने असीरिया को प्राचीन विश्व का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बना दिया। 727 ईसा पूर्व में असीरिया के इस महान शासक की मृत्यु हो गई।
तिग्लथ-पिलेसर तृतीय के बाद उसके पुत्र शाल्मनेसर पंचम (726-722 ई. पू.) अल्पकालिक और कमजोर शासक सिद्ध हुआ। 722 ईसापूर्व में उसकी हत्या कर दी गई तथा सारगोन द्वितीय असीरिया के सिंहासन पर बैठा।
सारगोन द्वितीय (721–705 ई. पू.)
सारगोन द्वितीय असीरियन साम्राज्य के महानतम शासकों में से एक था। उसने ऐसे समय में सिंहासन ग्रहण किया जब असीरिया को अनेक आंतरिक और बाहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। अपनी सैन्य प्रतिभा, प्रशासनिक क्षमता और दृढ़ नेतृत्व के बल पर उसने साम्राज्य को पुनः सुदृढ़ किया तथा उसे पश्चिमी एशिया की सबसे प्रभावशाली शक्ति बना दिया।
सिंहासन पर बैठते ही सारगोन द्वितीय के सामने सबसे बड़ी चुनौती बेबिलोनिया में उत्पन्न विद्रोह थी। कैल्डियाई सरदार मर्दुक-अप्ला-इद्दिन द्वितीय ने एलम की सहायता से बेबिलोन पर अधिकार कर लिया और स्वयं को वहाँ का शासक घोषित कर दिया। सारगोन द्वितीय बेबिलोन के विरुद्ध अभियान की तैयारी ही कर रहा था कि पश्चिमी क्षेत्रों में भी विद्रोह फैल गया। ऐसी स्थिति में उसने पहले पश्चिमी प्रांतों को शांत करना आवश्यक समझा।
पश्चिमी अभियानों में सफलता
सारगोन द्वितीय ने सीरिया और फिलिस्तीन की ओर अपने अभियान प्रारंभ किए। उसने इज़राइल के उत्तरी राज्य (समारिया) पर पूर्ण अधिकार स्थापित किया। विद्रोह को समाप्त करने के लिए वहाँ के अनेक निवासियों को असीरियन साम्राज्य के दूरस्थ क्षेत्रों, विशेषकर मीडिया प्रदेशों में भेज दिया। यह असीरिया की प्रसिद्ध जनसंख्या स्थानांतरण नीति का भाग था, जिसका उद्देश्य स्थानीय विद्रोहों को समाप्त करना और साम्राज्य पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखना था।
उसने फीनीशिया और सीरिया के अनेक राज्यों को भी पुनः अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश किया। इन विजयों से असीरिया की पश्चिमी सीमा सुरक्षित हो गई तथा भूमध्यसागर के व्यापारिक मार्गों पर उसका प्रभाव बढ़ गया।
उरर्तु, मुश्की और मादी प्रदेशों में अभियान
पश्चिम में सफलता प्राप्त करने के बाद सारगोन द्वितीय ने उत्तर और उत्तर-पूर्व की ओर ध्यान दिया। 714 ईसा पूर्व में उसने उरर्तु के शक्तिशाली शासक रुसा प्रथम (लगभग 735–714 ई. पू.) को पराजित किया। यह विजय असीरिया के इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटनाओं में गिनी जाती है, क्योंकि उरर्तु लंबे समय से असीरिया का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी था।
इसके बाद उसने एशिया माइनर के दक्षिण-पूर्व में स्थित मुश्की (फ्रिजिया) राज्य के शासक मीता (मिदास) को भी अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। उरर्तु और मुश्की के प्रोत्साहन से उत्तर– पूरब के मन्नाई, मीडिया तथा कारकेमिश जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में भी विद्रोह भड़क उठे, किंतु सारगोन द्वितीय ने इन सभी विद्रोहों का सफलतापूर्वक दमन किया। मन्नाई तथा मादी क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया गया, दयाउक्कु को पदच्युत कर दिया गया तथा कारकेमिश का अधिग्रहण कर लिया गया।
बेबिलोन पर पुनः अधिकार
पश्चिम और उत्तर की स्थिति पूरी तरह नियंत्रित करने के बाद सारगोन द्वितीय ने पुनः बेबिलोन की ओर ध्यान दिया। उसने मर्दुक-अप्ला-इद्दिन द्वितीय (मेरोदक-बलादान) को निर्णायक रूप से पराजित किया और बेबिलोन पर पुनः असीरिया का अधिकार स्थापित कर दिया। इस विजय के बाद उसका साम्राज्य पश्चिम में सिलिसिया से लेकर दक्षिण में फारस की खाड़ी तक फैल गया। असीरिया का राजनीतिक प्रभाव अपने चरम पर पहुँच गया और वह पश्चिमी एशिया की सबसे शक्तिशाली साम्राज्यवादी शक्ति बन गया।
प्रशासन और निर्माण कार्य
सारगोन द्वितीय केवल विजेता ही नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक और निर्माणकर्ता भी था। उसने साम्राज्य के प्रशासन को अधिक संगठित किया तथा विभिन्न प्रांतों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया।
सारगोन द्वितीय की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि दुर-शरुकिन नामक नई राजधानी की स्थापना थी, जिसे आज खोरसाबाद के नाम से जाना जाता है। वहाँ उसने एक विशाल राजमहल, सुदृढ़ दुर्ग, मंदिर तथा प्रशासनिक भवनों का निर्माण कराया। राजमहल की दीवारों पर उत्कीर्ण विशाल पंखयुक्त बैलों (लमास्सु) और अन्य मूर्तियों को असीरियन कला की उत्कृष्ट कृतियाँ माना जाता है। उसने अभिलेखों और साहित्य के संरक्षण के लिए भी राजकीय संग्रह तैयार कराए।
705 ईसा पूर्व में अनातोलिया क्षेत्र के एक सैन्य अभियान के दौरान सारगोन द्वितीय की मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका पुत्र सेनैकेरिब (704–681 ई. पू.) असीरिया का शासक बना।
सेनैकेरिब (704–681 ई. पू.)
सेनैकेरिब अपने पिता के शासनकाल में ही एक सफल सेनापति के रूप में प्रसिद्ध हो चुका था। उत्तरी सीमाओं की सुरक्षा तथा सैन्य अभियानों के अनुभव के कारण वह प्रशासन और युद्ध दोनों में दक्ष था। सिंहासन ग्रहण करने के बाद उसके सामने विशाल असीरियन साम्राज्य की सुरक्षा, प्रशासन और विद्रोहों को नियंत्रित रखने की बड़ी चुनौती थी।
उसने सबसे पहले निनेवेह को अपनी राजधानी बनाया और उसके व्यापक पुनर्निर्माण का कार्य प्रारंभ किया। उसने नगर के चारों ओर विशाल प्राचीर, राजमार्ग, नहरें तथा जलापूर्ति की उन्नत व्यवस्था का निर्माण कराया। निनेवेह में भव्य राजप्रासादों, उद्यानों और मंदिरों का निर्माण करवाया गया, जिससे वह प्राचीन विश्व के सबसे सुंदर और समृद्ध नगरों में गिना जाने लगा।
बेबिलोनिया का विद्रोह
सेनैकेरिब ने प्रारंभ में बेबिलोन के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने का प्रयास किया, किंतु यह नीति अधिक समय तक सफल नहीं रही। सारगोन द्वितीय की मृत्यु के बाद कैल्डियाई नेता मुर्दुक-बल्दान मर्दुक-अप्ला-इद्दिन द्वितीय ने पुनः बेबिलोन पर स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का प्रयास किया। उसे कैल्डियाई, एलम तथा अरामी शक्तियों का समर्थन भी प्राप्त हुआ। किंतु सेनैकेरिब ने शीघ्र ही इस विद्रोह का दमन किया और बेबिलोन पर पुनः अधिकार स्थापित कर लिया। प्रारंभ में उसने स्थानीय शासकों के माध्यम से प्रशासन चलाने का प्रयास किया। उसने बेल-इब्नी (702-700 ई. पू.) को बेबिलोन का शासक नियुक्त किया, किंतु उसके अपेक्षित परिणाम न मिलने पर उसे पदच्युत कर अपने छोटे पुत्र अश्शूर-नादिन-शुमी (699-694 ई. पू.) को बेबिलोन का शासक बनाया।
पश्चिमी अभियानों की सफलता
सेनैकेरिब ने पश्चिमी एशिया में भी अनेक सफल अभियान चलाए। उसने फीनीशिया, फिलिस्तीन और यहूदा के अनेक नगरों को पराजित किया तथा असीरिया की सर्वोच्च सत्ता पुनः स्थापित की। मिस्र के प्रभाव को सीमित करने के लिए भी उसने सैन्य अभियान चलाए और कई विद्रोही राज्यों को पुनः कर देने के लिए बाध्य किया। उसके अभियानों से भूमध्यसागरीय क्षेत्र में असीरिया की राजनीतिक स्थिति और अधिक सुदृढ़ हो गई।
बेबिलोन का विनाश
बेबिलोन में विद्रोह बार-बार होते रहने से सेनैकेरिब अत्यंत क्रोधित हो गया। अंततः उसने यह निर्णय लिया कि इस समस्या का स्थायी समाधान केवल कठोर दंड से ही संभव है। 689 ईसा पूर्व में उसने बेबिलोन पर भीषण आक्रमण किया। असीरियन सेना ने नगर को चारों ओर से घेर लिया और लंबे संघर्ष के बाद उस पर अधिकार कर लिया। इसके बाद नगर को नष्ट कर दिया गया। राजमहल, मंदिर तथा सार्वजनिक भवन ध्वस्त कर दिए गए। अनेक धार्मिक प्रतिमाएँ असीरिया ले जाई गईं तथा बेबिलोन के प्रमुख देवता मार्दुक की प्रतिमा भी निनेवेह पहुँचा दी गई। प्राचीन स्रोतों में इस अभियान का अत्यंत कठोर और विनाशकारी स्वरूप वर्णित है।
निर्माण कार्य और प्रशासन
यद्यपि सेनैकेरिब अपने कठोर सैन्य अभियानों के लिए प्रसिद्ध है, फिर भी उसने असीरिया के विकास के लिए अनेक निर्माण कार्य कराए। निनेवेह में विशाल राजमहलों, जलाशयों, नहरों तथा उद्यानों का निर्माण उसी के शासनकाल की उपलब्धियाँ थीं। उसने दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों से जल लाने के लिए उन्नत जलसेतु और सिंचाई व्यवस्था विकसित कराई, जो तत्कालीन अभियंत्रिकी का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
एसरहद्दोन (680–669 ई. पू.)
असीरियन सम्राट सेनैकेरिब की मृत्यु के बाद उसका पुत्र एसरहद्दोन 680 ईसा पूर्व में असीरिया के सिंहासन पर बैठा। यद्यपि वह सेनैकेरिब का पुत्र था, फिर भी उसे राजगद्दी सहज रूप से प्राप्त नहीं हुई। वह सेनैकेरिब का चौथा पुत्र था, जबकि उससे बड़े तीन भाई भी उत्तराधिकार के दावेदार थे। जब एसरहद्दोन राजधानी से बाहर था, उसी समय उसके बड़े भाइयों ने षड्यंत्र करके सेनैकेरिब की हत्या कर दी और स्वयं सत्ता प्राप्त करने का प्रयास किया। इस घटना का समाचार मिलते ही एसरहद्दोन शीघ्रता से राजधानी पहुँचा। उसने अपने समर्थकों की सहायता से विद्रोहियों को पराजित किया और अपने भाइयों को सत्ता से हटाकर 680 ईसा पूर्व में असीरिया का सम्राट बन गया।
बेबिलोन का पुनर्निर्माण
एसरहद्दोन की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि बेबिलोन नगर का पुनर्निर्माण था। उसके पिता सेनैकेरिब ने 689 ईसा पूर्व में बेबिलोन को नष्ट कर दिया था, जिससे वहाँ की जनता असीरिया से असंतुष्ट थी। एसरहद्दोन ने इस स्थिति को समझते हुए मेल-मिलाप की नीति अपनाई। उसने बेबिलोन के मंदिरों, राजमार्गों, भवनों और नगर की प्राचीरों का पुनर्निर्माण कराया। धार्मिक स्थलों की मरम्मत कराई तथा नगर के सांस्कृतिक जीवन को पुनर्जीवित किया। कुछ ही वर्षों में बेबिलोन पुनः एक समृद्ध और प्रतिष्ठित नगर बन गया। इस नीति का राजनीतिक लाभ भी एसरहद्दोन को मिला। जब कैल्डियाई शासक के उत्तराधिकारी ने विद्रोह का प्रयास किया, तब बेबिलोन की जनता ने स्वयं विद्रोह को दबाने में सहयोग दिया। इसी प्रकार एलम द्वारा बेबिलोन को क्षति पहुँचाने के प्रयास भी असफल रहे।
उत्तरी सीमाओं की सुरक्षा
एसरहद्दोन के शासनकाल में असीरिया को उत्तर और उत्तर-पूर्व से सिम्मेरियनों तथा सीथियनों की चुनौती का सामना करना पड़ा। उसने सफल सैन्य अभियानों द्वारा इन आक्रमणों को विफल किया और साम्राज्य की सीमाओं को सुरक्षित रखा।
एसरहद्दोन केवल युद्धकुशल शासक ही नहीं था, बल्कि कुशल कूटनीतिज्ञ भी था। उसने सीथियनों के साथ स्थायी शांति स्थापित करने के उद्देश्य से अपनी एक राजकुमारी का विवाह उनके प्रमुख सरदार से कराया, जिससे दोनों राज्यों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित हुए और उत्तरी सीमा पर लंबे समय तक शांति बनी रही।
मिस्र विजय
एसरहद्दोन की सबसे प्रसिद्ध सैन्य उपलब्धि मिस्र की विजय थी। उस समय मिस्र के शासक सीरिया और फिलिस्तीन के राज्यों को असीरिया के विरुद्ध विद्रोह के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे, जिससे असीरिया की पश्चिमी सीमा निरंतर अस्थिर बनी रहती थी। एसरहद्दोन ने इस समस्या का स्थायी समाधान करने का निर्णय लिया और एक विशाल सेना के साथ मिस्र की ओर अभियान प्रारंभ किया। मार्ग में सिडोन, सिलिसिया तथा फीनीशिया के अनेक राज्यों ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। साइप्रस और फिलिस्तीन के शासकों ने भी उसके साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए। इसके बाद असीरियन सेना ने मिस्र पर आक्रमण किया और 671 ईसा पूर्व में वहाँ के फिरौन तहरका को पराजित कर मेम्फिस पर अधिकार कर लिया।
मिस्र में प्रशासनिक नीति
यद्यपि एसरहद्दोन ने मिस्र पर विजय प्राप्त कर ली, फिर भी वह वहाँ स्थायी शासन स्थापित करने में पूरी तरह सफल नहीं हो सका। उसने मिस्र की परंपरागत शाही उपाधियाँ धारण नहीं कीं और न ही स्थानीय जनता का विश्वास जीतने के लिए पर्याप्त राजनीतिक प्रयास किए। फलतः उसके असीरिया लौटते ही मिस्र में पुनः विद्रोह आरंभ हो गया। विद्रोह को दबाने के लिए एसरहद्दोन ने पुनः अभियान प्रारंभ किया, किंतु यात्रा के दौरान वह गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गया और 669 ईसा पूर्व में हर्रान के निकट उसकी मृत्यु हो गई।
साम्राज्य का विस्तार और उत्तराधिकार
एसरहद्दोन के शासनकाल में असीरियन साम्राज्य अपनी शक्ति के चरम पर पहुँच गया था। उसकी सीमाएँ पश्चिम में भूमध्यसागर, पूर्व में फारस की खाड़ी, उत्तर में अरारात पर्वतीय क्षेत्र तथा दक्षिण-पश्चिम में मिस्र के थीब्स तक विस्तृत थीं। इतना विशाल साम्राज्य उस समय प्राचीन विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक संगठनों में से एक था।
भविष्य में उत्तराधिकार को लेकर गृहयुद्ध की संभावना को समाप्त करने के लिए एसरहद्दोन ने अपने जीवनकाल में ही स्पष्ट व्यवस्था कर दी। उसने एक राजसभा में अपने ज्येष्ठ पुत्र अशुरबनिपाल को असीरिया का तथा कनिष्ठ पुत्र शमाश-शुम-उकिन को बेबिलोन का शासक घोषित कर दिया था। उसकी मृत्यु के बाद इसी व्यवस्था के अनुसार अशुरबनिपाल असीरिया का सम्राट बना, जबकि शमाश-शुम-उकिन ने बेबिलोन का शासन संभाला।
अशुरबनिपाल (669–लगभग 631 ई. पू.)
अशुरबनिपाल असीरियन साम्राज्य का अंतिम महान सम्राट था, जो एसरहद्दोन का ज्येष्ठ पुत्र था और अपने पिता की पूर्व घोषणा के अनुसार 669 ईसा पूर्व में असीरिया के सिंहासन पर असिन हुआ। उसके छोटे भाई शमाश-शुम-उकिन को बेबिलोन का शासक बनाया गया था। अशुरबनिपाल के शासनकाल में असीरियन साम्राज्य अपनी शक्ति, वैभव और सांस्कृतिक उन्नति के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच गया।
सिंहासन ग्रहण करने के समय मिस्र में विद्रोह की स्थिति थी। एसरहद्दोन ने मिस्र पर विजय तो प्राप्त कर ली थी, किंतु उसकी मृत्यु के कारण वहाँ स्थायी नियंत्रण स्थापित नहीं हो सका था। अशुरबनिपाल ने इस चुनौती का शीघ्र समाधान करने का निश्चय किया और एक विशाल सेना के साथ मिस्र की ओर अभियान चलाया।
मिस्र और फीनीशिया में अभियान
अशुरबनिपाल की सेना ने मिस्र में प्रवेश कर मेम्फिस और बाद में थीब्स पर अधिकार स्थापित किया। 663 ईसा पूर्व में थीब्स नगर पर असीरियन सेना ने विजय प्राप्त की और वहाँ के विशाल मंदिरों तथा राजकोष से अत्यधिक धन-संपत्ति प्राप्त हुई। इस विजय के बाद कुछ समय के लिए मिस्र पर असीरिया का प्रभाव पुनः स्थापित हो गया।
मिस्र अभियान के दौरान फीनीशिया के कुछ राज्यों ने असीरिया के विरुद्ध विद्रोह करने का प्रयास किया, किंतु अशुरबनिपाल ने उन्हें भी सफलतापूर्वक दबा दिया। पश्चिमी एशिया के अनेक छोटे राज्यों ने उसकी शक्ति स्वीकार कर ली। लीडिया के शासक ने भी उसके साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने के लिए दूत भेजे। इन सफलताओं से असीरिया की प्रतिष्ठा और अधिक बढ़ी तथा भूमध्यसागरीय क्षेत्र में उसका प्रभाव सुदृढ़ हुआ।
एलम के विरुद्ध अभियान
अशुरबनिपाल के शासनकाल में एलम असीरिया का सबसे बड़ा शत्रु बना रहा। एलम के शासक बार-बार बेबिलोन और अन्य राज्यों को असीरिया के विरुद्ध विद्रोह के लिए उकसाते रहते थे। इस कारण अशुरबनिपाल ने एलम के विरुद्ध अनेक सैन्य अभियान चलाए।
इन अभियानों में असीरियन सेना को निर्णायक सफलता मिली। एलम के शासक तेउम्मान को पराजित किया गया और उसकी सेना को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया। असीरियन अभिलेखों में इस युद्ध तथा विजित शत्रुओं के प्रति कठोर दंड का विस्तृत वर्णन मिलता है। इन विवरणों का उद्देश्य असीरियन शक्ति का प्रदर्शन करना और विरोधी राज्यों में भय उत्पन्न करना था। एलम की पराजय के बाद कुछ समय तक असीरिया की पूर्वी सीमाएँ सुरक्षित रहीं।
शमाश-शुम-उकिन का विद्रोह
अशुरबनिपाल के शासनकाल की सबसे गंभीर चुनौती उसके अपने भाई शमाश-शुम-उकिन का विद्रोह था। प्रारंभ में दोनों भाइयों के संबंध सौहार्दपूर्ण थे और लगभग सत्रह वर्षों तक उन्होंने सहयोगपूर्वक शासन किया। किंतु धीरे-धीरे शमाश-शुम-उकिन ने स्वतंत्र एवं शक्तिशाली बेबिलोनियन साम्राज्य स्थापित करने का विचार बनाया।
उसने बेबिलोन, सिप्पर और बोरसिप्पा जैसे प्रमुख नगरों को अपने नियंत्रण में लेकर असीरिया के विरुद्ध व्यापक गठबंधन तैयार किया। इस संघ में फीनीशिया के कुछ राज्य, यहूदा, अरब जनजातियाँ, दक्षिणी इराक के कैल्डियाई, एलम तथा अन्य विरोधी शक्तियाँ भी सम्मिलित हो गईं। उसका विश्वास था कि संयुक्त मोर्चे के सामने असीरिया टिक नहीं सकेगा।
अशुरबनिपाल ने पहले समझौते का प्रयास किया, किंतु जब उसका कोई परिणाम नहीं निकला, तब उसने बेबिलोन की घेराबंदी कर दी। लगभग तीन वर्षों तक भीषण संघर्ष चलता रहा। अंततः 648 ईसा पूर्व में असीरियन सेना ने बेबिलोन पर पुनः अधिकार कर लिया। पराजय निश्चित जानकर शमाश-शुम-उकिन ने अपने राजमहल में आग लगाकर आत्महत्या कर ली। इसके साथ ही बेबिलोन का विद्रोह समाप्त हो गया और असीरिया की सर्वोच्च सत्ता पुनः स्थापित हो गई।
अरबों और एलम का दमन
बेबिलोन के विद्रोह को समाप्त करने के बाद अशुरबनिपाल ने उन सभी शक्तियों के विरुद्ध अभियान चलाया, जिन्होंने विद्रोहियों का साथ दिया था। सबसे पहले उसने अरब जनजातियों को पराजित किया, जो पश्चिमी क्षेत्रों में निरंतर अशांति उत्पन्न करती थीं। इसके बाद उसने पुनः एलम पर आक्रमण किया।
असीरियन सेना ने एलम की राजधानी सूसा पर अधिकार कर लिया। नगर के राजमहलों, मंदिरों तथा धार्मिक स्थलों को नष्ट कर दिया गया और बड़ी संख्या में लोगों को साम्राज्य के अन्य भागों में बसाया गया। इस अभियान के बाद एलम का अस्तित्व एक स्वतंत्र राज्य के रूप में समाप्त हो गया। यह अशुरबनिपाल की अंतिम महान सैन्य विजय थी।
निर्माण कार्य और प्रशासन
अशुरबनिपाल केवल एक विजेता ही नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक और निर्माणकर्ता भी था। उसने साम्राज्य में शांति और सुव्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन को सुदृढ़ किया तथा अनेक सार्वजनिक निर्माण कार्य कराए। निनेवेह में राजमहलों, मंदिरों, उद्यानों और प्रशासनिक भवनों का विस्तार किया गया। उसने प्राचीन भवनों का पुनर्निर्माण कराया तथा नगर को उस समय के सबसे भव्य नगरों में विकसित किया। उसके शासनकाल में कला, मूर्तिकला और स्थापत्य का भी उल्लेखनीय विकास हुआ। निनेवेह के राजमहलों की दीवारों पर उत्कीर्ण शिल्पकृतियाँ, युद्ध-दृश्य, शिकार के चित्र तथा राजकीय जीवन के दृश्य असीरियन कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
साहित्य और पुस्तकालय
अशुरबनिपाल की सबसे महान उपलब्धि उसका निनेवेह का राजकीय पुस्तकालय था। वह प्राचीन विश्व के उन विरले शासकों में था, जो स्वयं पढ़-लिख सकते थे और साहित्य तथा विद्या में गहरी रुचि रखते थे। उसने सुमेरियन और बेबिलोनियन ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ तैयार कराने के लिए विद्वान लिपिकारों को नियुक्त किया था। इन प्रतिलिपियों को निनेवेह के विशाल पुस्तकालय में सुरक्षित रखा गया। इस पुस्तकालय में धर्म, इतिहास, चिकित्सा, गणित, ज्योतिष, प्रशासन, कानून और साहित्य से संबंधित लगभग 22,000 से अधिक मिट्टी की तख्तियाँ संग्रहीत थीं। इन्हीं तख्तियों के माध्यम से आधुनिक इतिहासकारों को गिलगामेश महाकाव्य, मेसोपोटामिया के धार्मिक ग्रंथों तथा अनेक ऐतिहासिक अभिलेखों की जानकारी प्राप्त हुई है। इस कारण अशुरबनिपाल का पुस्तकालय विश्व की प्राचीनतम और सबसे महत्त्वपूर्ण पुस्तक-संस्थाओं में से एक है।
शासन का अंतिम चरण
अशुरबनिपाल के शासन के अंतिम वर्षों के संबंध में ऐतिहासिक स्रोत सीमित हैं, किंतु सामान्यतः माना जाता है कि उसकी मृत्यु लगभग 626/631 ईसा पूर्व के आसपास हुई। उसके पश्चात असीरिया में उत्तराधिकार संघर्ष प्रारंभ हो गया, जिससे साम्राज्य की शक्ति तेजी से कमजोर होने लगी। उसके जीवनकाल में निर्मित विशाल साम्राज्य कुछ ही वर्षों बाद आंतरिक संघर्षों और बाहरी आक्रमणों के कारण विघटित होने लगा।
अशुरबनिपाल के उत्तराधिकारी
अशुरबनिपाल की मृत्यु के कुछ ही समय बाद असीरियन साम्राज्य राजनीतिक संकट में फंस गया। उसके उत्तराधिकारियों में वह नेतृत्व क्षमता नहीं थी जो इतने विशाल साम्राज्य को एकजुट रख सकती। परिणामस्वरूप साम्राज्य में आंतरिक संघर्ष, प्रांतीय विद्रोह तथा बाहरी आक्रमण तेजी से बढ़ने लगे।
अशुरबनिपाल के अंतिम वर्षों में ही पश्चिमी एशिया की राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलने लगी थीं। उत्तर-पूर्व में मादी शक्ति का उदय हुआ और मादी शासक उवक्षत्र ने एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना कर ली। प्रारंभ में मादियों को कुछ समय के लिए सीथियनों की प्रभुता स्वीकार करनी पड़ी, फिर भी उन्होंने शीघ्र ही अपनी शक्ति पुनः संगठित कर ली। दूसरी ओर सीथियन सेनाएँ असीरिया, सीरिया और फिलिस्तीन होते हुए मिस्र की सीमाओं तक पहुँच गईं। मिस्र के शासक सामतिक प्रथम ने कूटनीति के माध्यम से उनके आक्रमण से अपने राज्य की रक्षा कर ली। इन परिवर्तनों से असीरिया की सामरिक स्थिति अत्यंत कमजोर हो गई।
अशुरबनिपाल के बाद उसका पुत्र अश्शूर-एतिल-इलानीसिंहासन पर बैठा। उसका शासनकाल बहुत अल्प रहा और प्रारंभ से ही उसे सत्ता के लिए संघर्ष करना पड़ा। उसे सिंहासन प्राप्त करने के समय भी और शासनकाल के अंत में भी विद्रोह का सामना करना पड़ा। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि उस समय असीरिया की केंद्रीय सत्ता कमजोर हो चुकी थी और साम्राज्य के विभिन्न भागों में असंतोष बढ़ रहा था।
राजदरबार में उत्तराधिकार को लेकर षड्यंत्र, सामंतों की बढ़ती शक्ति तथा प्रांतों की स्वतंत्र प्रवृत्ति ने शासन को और अधिक अस्थिर बना दिया। इस कारण असीरियन साम्राज्य अपनी पूर्व शक्ति और प्रभाव बनाए रखने में असफल रहा।
सिन-शर-इश्कुन
अश्शूर-एतिल-इलानी के बाद लगभग 623 ईसा पूर्व में उसका भाई सिन-शर-इश्कुन असीरिया का शासक बना। उसके शासनकाल तक पहुँचते-पहुँचते साम्राज्य की स्थिति अत्यंत संकटपूर्ण हो चुकी थी। एक ओर साम्राज्य के भीतर विद्रोह बढ़ रहे थे, तो दूसरी ओर सीमावर्ती क्षेत्रों में असीरिया का नियंत्रण लगातार कमजोर पड़ रहा था। पश्चिम में फीनीशिया के अधिकांश नगर असीरिया की अधीनता से मुक्त हो चुके थे। फिलिस्तीन भी असीरिया के हाथ से निकल चुका था। पूर्व में मादी शक्ति निरंतर विस्तार कर रही थी और असीरिया के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी थी। इसी समय दक्षिण में बेबिलोन में भी असीरिया के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन तेज हो गया।
बेबिलोन का पुनरुत्थान
626 ईसा पूर्व में कैल्डियाई मूल के शासक नबोपोलास्सर (626-605 ई. पू.) ने बेबिलोन में स्वतंत्र शासन स्थापित किया। उसने असीरिया के विरुद्ध सफल विद्रोह किया और शीघ्र ही दक्षिणी मेसोपोटामिया के अधिकांश भाग पर अधिकार कर लिया। उसके अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि इस समय तक बेबिलोन एक स्वतंत्र और संगठित राज्य बन चुका था। नेबोपोलास्सर जानता था कि अकेले असीरिया को पराजित करना कठिन होगा। इसलिए उसने मादी शासक उवक्षत्र के साथ एक शक्तिशाली सैन्य गठबंधन स्थापित किया।
निनेवेह का पतन
मादी और बेबिलोन की संयुक्त सेनाओं ने असीरिया पर संयुक्त आक्रमण प्रारंभ किए। अनेक सीमावर्ती नगरों पर अधिकार करने के बाद उन्होंने असीरियन राजधानी निनेवेह को घेर लिया। लंबे संघर्ष के पश्चात 612 ईसा पूर्व में निनेवेह पर संयुक्त सेना का अधिकार हो गया। प्राचीन स्रोतों के अनुसार संयुक्त सेना ने निनेवेह को पूरी तरह नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। राजमहल, दुर्ग तथा सार्वजनिक भवन भस्मीभूत कर दिए गए। असीरियन शासक सिन-शर-इश्कुन युद्ध के दौरान मारे गए। कुछ परंपराओं के अनुसार उसने राजमहल में आग लगाकर अपने परिवार सहित प्राण त्याग दिए, यद्यपि इस संबंध में ऐतिहासिक प्रमाण सीमित हैं। निनेवेह के पतन के साथ ही असीरिया की राजनीतिक शक्ति को निर्णायक क्षति पहुँची।
अंतिम प्रयास और साम्राज्य का अंत
निनेवेह के पतन के बाद असीरियन साम्राज्य पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। शाही परिवार के एक सदस्य अश्शूर-उबल्लित द्वितीय ने हर्रान को अपनी राजधानी बनाकर असीरियन राज्य के शेष भाग को बचाने का प्रयास किया। उसे कुछ समय तक मिस्र का भी समर्थन प्राप्त हुआ, क्योंकि मिस्र नहीं चाहता था कि बेबिलोन और मादी शक्तिशाली बन जाएँ। किंतु संयुक्त मादी और बेबिलोनियन सेनाओं के सामने यह प्रयास सफल नहीं हो सका। 609 ईसा पूर्व में हर्रान पर भी उनका अधिकार हो गया और अश्शूर-उबल्लित द्वितीय को वहाँ से हटना पड़ा। इसके बाद 605 ईसा पूर्व में कारकेमिश के युद्ध में मिस्र और असीरिया की संयुक्त सेना को बेबिलोन के युवराज नेबूकदनेस्सर द्वितीय ने पराजित कर दिया। इस पराजय के साथ ही असीरिया का स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व सदैव के लिए समाप्त हो गया और प्राचीन पश्चिमी एशिया में बेबिलोन तथा मादी शक्तियों का प्रभुत्व स्थापित हो गया।
असीरियन साम्राज्य के पराभव के कारण
असीरियन साम्राज्य का पतन
प्राचीन विश्व का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य माने जाने वाले असीरिया का पतन अत्यंत तीव्र और व्यापक था। 612 ईसा पूर्व में मादी शासक उवक्षत्र और बेबिलोन के शासक नेबोपोलास्सर की संयुक्त सेनाओं ने असीरिया की राजधानी निनेवेह पर अधिकार कर लिया। इस युद्ध में नगर के राजमहलों, मंदिरों, दुर्गों और प्रशासनिक भवनों को भारी क्षति पहुँची। अशुरबनिपाल द्वारा निर्मित भव्य राजमहल नष्ट हो गए तथा अनेक धार्मिक स्थलों का विनाश हुआ। इसके साथ ही असीरियन साम्राज्य की राजनीतिक शक्ति लगभग समाप्त हो गई।
कुछ समय तक अश्शूर-उबल्लित द्वितीय ने हर्रान को राजधानी बनाकर साम्राज्य को बचाने का प्रयास किया, किंतु 609–605 ईसा पूर्व के बीच हुए युद्धों के बाद असीरिया का स्वतंत्र अस्तित्व पूर्णतः समाप्त हो गया। इतिहासकार आर्नोल्ड टॉयनबी ने असीरिया की पराजय को विश्व इतिहास की सबसे पूर्ण राजनीतिक और सैन्य पराजयों में से एक बताया है। इसी प्रकार इतिहासकार विल ड्यूरेंट ने लिखा है कि कुछ शताब्दियों बाद निनेवेह का वैभव इतना लुप्त हो चुका था कि वहाँ से गुजरने वाले यात्रियों को भी उसके गौरवशाली अतीत का अनुमान नहीं हो सका। असीरियन साम्राज्य का पतन केवल बाहरी आक्रमणों का परिणाम नहीं था, बल्कि इसके पीछे अनेक आंतरिक, प्रशासनिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण भी उत्तरदायी थे।
सैन्यवाद और अत्यधिक क्रूरता
असीरिया के पतन का सबसे प्रमुख कारण उसकी अत्यधिक सैन्यवादी और कठोर नीति थी। असीरियन शासकों ने साम्राज्य का विस्तार निरंतर युद्धों और विजय अभियानों के माध्यम से किया। वे प्राचीन विश्व के सबसे संगठित सैनिक शासकों में थे, किंतु उनकी विजय नीति अत्यधिक कठोर थी।
विजित राज्यों में विद्रोह रोकने के लिए वे नगरों को नष्ट कर देते थे, बड़ी संख्या में लोगों को बंदी बनाते थे और अनेक समुदायों का जबरन स्थानांतरण करते थे। उनके राजकीय अभिलेखों में इन दंडात्मक अभियानों का विस्तृत वर्णन मिलता है। इन नीतियों का तत्कालीन राजनीतिक दृष्टि से भय उत्पन्न करने में लाभ अवश्य मिला, किंतु इससे विजित प्रदेशों में असीरिया के प्रति गहरा असंतोष और घृणा भी उत्पन्न हुई।
जैसे ही असीरिया की शक्ति कमजोर हुई, उसके अधीन रहे अनेक राज्यों ने एकजुट होकर उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया। बेबिलोन, एलम, फीनीशिया, मादी और अन्य शक्तियाँ अवसर मिलते ही असीरिया के विरोध में संगठित हो गईं। जिस सैन्य शक्ति और आतंक के बल पर साम्राज्य का निर्माण हुआ था, वही आगे चलकर उसके विनाश का कारण बन गया।
दोषपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था
असीरियन साम्राज्य का प्रशासन अत्यधिक केंद्रीकृत और सैन्य नियंत्रण पर आधारित था। प्रारंभिक असीरियन शासकों का मुख्य उद्देश्य नए क्षेत्रों पर अधिकार करना और उनसे कर तथा धन प्राप्त करना था। उन्होंने विजित प्रदेशों को स्थायी रूप से प्रशासनिक और सांस्कृतिक रूप से साम्राज्य में समाहित करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
तिग्लथ-पिलेसर तृतीय ने प्रांतीय प्रशासन में कुछ महत्त्वपूर्ण सुधार अवश्य किए और अनेक आश्रित राज्यों को सीधे असीरियन प्रांतों में बदल दिया, किंतु इतने विशाल साम्राज्य के लिए यह व्यवस्था पर्याप्त नहीं थी। अनेक दूरस्थ प्रदेशों में स्थानीय असंतोष बना रहा और केंद्रीय सत्ता कमजोर पड़ते ही वहाँ विद्रोह होने लगे।
असीरिया का प्रशासन सेना और पुरोहित वर्ग के सहयोग पर आधारित था। जब केंद्रीय शासन कमजोर हुआ, तब यह प्रशासनिक संतुलन भी बिगड़ गया। परिणामस्वरूप साम्राज्य के विभिन्न भागों में नियंत्रण बनाए रखना कठिन होता गया।
विजित राज्यों की सहानुभूति का अभाव
किसी भी विशाल साम्राज्य की स्थिरता केवल सैन्य शक्ति पर निर्भर नहीं रहती, बल्कि विजित प्रदेशों की राजनीतिक स्वीकृति और सहयोग भी आवश्यक होता है। असीरियन शासक इस दिशा में सफल नहीं हो सके।
उन्होंने विजित राज्यों के साथ कठोर व्यवहार किया, भारी कर लगाए, लोगों का जबरन विस्थापन किया और स्थानीय शासकों को बार-बार अपमानित किया। इससे विजित प्रदेशों में असीरिया के प्रति स्थायी निष्ठा विकसित नहीं हो सकी। इसके विपरीत अधिकांश राज्यों ने अवसर मिलते ही असीरिया के विरुद्ध विद्रोह कर दिया या उसके शत्रुओं का साथ दिया।
बेबिलोन, एलम, फीनीशिया, यहूदा और अन्य क्षेत्रों में बार-बार होने वाले विद्रोह इसी असंतोष का परिणाम थे। अंततः यही राज्य मादी और बेबिलोन के साथ मिलकर असीरिया के पतन में सहायक बने।
आर्थिक दुर्बलता
असीरिया की आर्थिक व्यवस्था मुख्यतः कृषि और युद्ध से प्राप्त धन-संपत्ति पर आधारित थी। यद्यपि साम्राज्य में व्यापार भी होता था, फिर भी उसकी समृद्धि का बड़ा भाग युद्धों, करों और विजित प्रदेशों से प्राप्त संपत्ति पर निर्भर था।
लगातार युद्धों के कारण कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ। बड़ी संख्या में कृषक सैनिकों के रूप में युद्धों में भाग लेते थे, जिससे खेती का कार्य बाधित होता था। निरंतर सैन्य अभियानों पर अत्यधिक व्यय होने से राजकोष पर भी दबाव बढ़ा। विशाल सेना, राजमहलों, दुर्गों तथा प्रशासनिक तंत्र के संचालन के लिए भारी आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता थी।
जब साम्राज्य का विस्तार रुक गया और नए क्षेत्रों से धन प्राप्त होना कम हुआ, तब आर्थिक कठिनाइयाँ बढ़ने लगीं। इससे राज्य की वित्तीय स्थिति कमजोर होती गई और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
निरंतर युद्धों का प्रभाव
असीरिया का इतिहास लगभग निरंतर युद्धों का इतिहास है। साम्राज्य की सीमाओं की रक्षा, विद्रोहों का दमन और नए क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित करने के लिए सेना को लगातार अभियान चलाने पड़ते थे।
इन युद्धों में बड़ी संख्या में प्रशिक्षित सैनिक मारे जाते थे। सेना की भरपाई के लिए नए सैनिकों की भर्ती करनी पड़ती थी, जिससे कृषि और उत्पादन दोनों प्रभावित होते थे। लगातार युद्धों के कारण समाज पर भी भारी दबाव पड़ा। समय के साथ असीरिया के लिए इतने विशाल साम्राज्य की रक्षा करना कठिन होता गया।
अयोग्य उत्तराधिकारी
अशुरबनिपाल असीरिया का अंतिम महान शासक था। उसने अपने जीवनकाल में साम्राज्य को संगठित रखा और बाहरी शत्रुओं को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया। किंतु उसकी मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी उतने सक्षम सिद्ध नहीं हुए। अशुर-एतिल-इलानी, सिन-शर-इश्कुन तथा अन्य उत्तराधिकारियों को निरंतर गृहकलह, विद्रोह और बाहरी आक्रमणों का सामना करना पड़ा। वे साम्राज्य की राजनीतिक एकता बनाए रखने में असफल रहे। उत्तराधिकार संबंधी संघर्षों ने केंद्रीय सत्ता को और अधिक कमजोर कर दिया। जब नेतृत्व कमजोर होता है, तब विशाल साम्राज्यों में प्रशासनिक और सैन्य व्यवस्था शीघ्र ही शिथिल होने लगती है। असीरिया के साथ भी यही हुआ और उसके शत्रुओं को आक्रमण का अनुकूल अवसर मिल गया।
मादी और बेबिलोन का उदय
असीरिया के पतन का एक महत्त्वपूर्ण कारण उसके पड़ोसी राज्यों का शक्तिशाली बन जाना भी था। पूर्व में मादी साम्राज्य उवक्षत्र के नेतृत्व में संगठित हो चुका था। दक्षिण में नेबोपोलास्सर के नेतृत्व में बेबिलोन ने स्वतंत्रता प्राप्त कर अपनी सैन्य शक्ति बढ़ा ली थी। दोनों राज्य जानते थे कि असीरिया को अकेले पराजित करना कठिन होगा। इसलिए उन्होंने गठबंधन करके संयुक्त रूप से असीरिया पर आक्रमण किया, जो असीरियन साम्राज्य के लिए निर्णायक सिद्ध हुआ और अंततः उसके स्वतंत्र अस्तित्व का अंत हो गया।
परिवर्तित अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ
असीरिया के पतन के समय पश्चिमी एशिया की राजनीतिक परिस्थितियाँ भी तेजी से बदल रही थीं। मिस्र, मादी, बेबिलोन, स्किथियन और अन्य शक्तियाँ अपने-अपने प्रभाव का विस्तार कर रही थीं। अनेक छोटे राज्यों ने भी असीरिया के विरुद्ध अवसरवादी नीति अपनाई। असीरिया अब पहले की तरह सभी मोर्चों पर प्रभावी ढंग से युद्ध करने की स्थिति में नहीं था। एक साथ कई दिशाओं से होने वाले आक्रमणों, आंतरिक विद्रोहों और आर्थिक संकट ने उसकी शक्ति को समाप्त कर दिया। परिणामस्वरूप जो साम्राज्य लगभग ढाई शताब्दियों तक पश्चिमी एशिया की प्रमुख शक्ति रहा था, वह कुछ ही वर्षों में इतिहास का विषय बन गया।
असीरियन सभ्यता के प्रमुख तत्त्व
असीरियन क्रूर विजेता होते हुए भी संस्कृति के प्रति उदासीन नहीं थे?
असीरिया के राजनीतिक इतिहास से स्पष्ट है कि असीरियन मूलतः एक विजेता और सैन्यवादी जाति थे। उनका अधिकांश इतिहास युद्धों, विजय अभियानों तथा साम्राज्य-विस्तार से जुड़ा हुआ है। अपने विशाल साम्राज्य की स्थापना और सुरक्षा के लिए उन्होंने कठोर सैन्य अनुशासन तथा अत्यधिक क्रूर दंडनीति अपनाई। पराजित राज्यों के साथ उनका व्यवहार प्रायः अत्यंत कठोर होता था। इसी कारण इतिहासकार विल ड्यूरेंट ने लिखा है कि पश्चिमी एशिया में असीरिया को लंबे समय तक एक ऐसे राज्य के रूप में स्मरण किया गया जिसने अनेक राज्यों का निर्ममतापूर्वक दमन किया। हिब्रू परंपरा में भी निनेवेह को ‘रक्तरंजित नगर’ कहा गया है।
कुछ विद्वानों, विशेषकर थॉर्नडाइक ने यह मत व्यक्त किया कि असीरियनों और कैल्डियनों का सभ्यता के विकास में योगदान सीमित था तथा उन्होंने जितना निर्माण किया उससे अधिक विनाश किया। यद्यपि असीरियन विजय अभियानों में अत्यधिक कठोर थे, फिर भी यह निष्कर्ष पूर्णतः सही नहीं माना जा सकता है। वस्तुतः असीरियन केवल विजेता ही नहीं थे, बल्कि कुशल प्रशासक, संगठक तथा संस्कृति के संरक्षक भी थे।
असीरियनों ने प्रशासन, सैन्य संगठन, वास्तुकला, मूर्तिकला, प्रस्तरकला, धर्म, विज्ञान तथा साहित्य के संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान दिया। विशेष रूप से सुमेरियन और बेबिलोनियन साहित्य को सुरक्षित रखने का श्रेय असीरियनों को ही है। यदि अशुरबनिपाल के पुस्तकालय में इन ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ सुरक्षित न की गई होतीं, तो प्राचीन मेसोपोटामिया की अनेक महत्त्वपूर्ण रचनाएँ आज उपलब्ध न होतीं। इस दृष्टि से इतिहासकार डेविस का मत उचित लगता है कि ‘असीरियन निष्ठुर विजेता अवश्य थे, किंतु संस्कृति के प्रति उदासीन नहीं थे।’
राजनीतिक संगठन
असीरियनों की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में एक सुव्यवस्थित और विशाल साम्राज्य की स्थापना थी। उन्होंने यह अनुभव किया कि व्यापार, कानून-व्यवस्था, सुरक्षा तथा राजनीतिक स्थिरता के लिए छोटे-छोटे राज्यों को एक सुदृढ़ केंद्रीय शासन के अधीन संगठित करना आवश्यक है। इसी विचार के आधार पर उन्होंने पश्चिमी एशिया का पहला वास्तविक साम्राज्य स्थापित किया।
अशुरबनिपाल के समय असीरियन साम्राज्य अपने चरम विस्तार पर था। इसमें असीरिया के अतिरिक्त बेबिलोन, सुमेर, एलम, मीडिया, अर्मेनिया, सीरिया, फीनीशिया, फिलिस्तीन तथा मिस्र के विस्तृत प्रदेश सम्मिलित थे। इससे पूर्व केवल हम्मूराबी का बेबिलोनियन राज्य और मिस्र के थुत्मोस तृतीय का साम्राज्य ही कुछ सीमा तक इसकी तुलना कर सकते थे। बाद में पारसी साम्राज्य ने भी इसी प्रकार के विशाल साम्राज्य का निर्माण किया।
केंद्रीय शासन
असीरियन शासन-व्यवस्था का केंद्र सम्राट होता था। वही राज्य का सर्वोच्च शासक, प्रधान सेनापति, न्यायाधीश तथा प्रशासन का प्रमुख अधिकारी था। उसकी सत्ता लगभग निरंकुश मानी जाती थी और उसकी आज्ञा का पालन पूरे साम्राज्य में अनिवार्य था।
असीरियनों का विश्वास था कि उनका राज्य देवता अशुर की संपत्ति है और सम्राट उसका प्रतिनिधि है। इसलिए सम्राट की आज्ञा का पालन केवल राजनीतिक दायित्व नहीं, बल्कि धार्मिक कर्तव्य भी माना जाता था। युद्ध, कर-संग्रह, प्रशासन तथा न्याय—सभी कार्य देवता अशुर के नाम पर किए जाते थे।
यद्यपि सिद्धांततः सम्राट की शक्ति असीम थी, व्यवहार में उस पर धार्मिक परंपराओं और पुरोहित वर्ग का कुछ प्रभाव अवश्य रहता था। महत्त्वपूर्ण युद्धों, धार्मिक अनुष्ठानों तथा उच्च अधिकारियों की नियुक्ति से पूर्व देवताओं की इच्छा जानने के लिए पुरोहितों से परामर्श लिया जाता था। इस प्रकार धार्मिक संस्थाओं का शासन पर अप्रत्यक्ष प्रभाव बना रहता था।
असीरिया में आधुनिक अर्थों में मंत्रिपरिषद नहीं थी, फिर भी सम्राट की सहायता के लिए अनेक उच्च अधिकारी नियुक्त किए जाते थे। इनमें तर्तनु (प्रधान सेनापति) सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकारी था। इसके अतिरिक्त, रैब-शाकेह, नगिर-एकाली (राजप्रासाद का अधीक्षक), अबरक्कु तथा शक्नु जैसे अधिकारी प्रशासन के विभिन्न विभागों का संचालन करते थे। इन अधिकारियों को राज्य द्वारा भूमि प्रदान की जाती थी, जिससे उनका निर्वाह होता था।
प्रांतीय शासन व्यवस्था
असीरिया का प्रशासन प्रारंभ से ही प्रांतों में विभाजित था। प्रत्येक प्रांत का शासन सम्राट द्वारा नियुक्त गवर्नर या प्रांतपति के हाथों में होता था। साम्राज्य के विस्तार के साथ प्रांतों की संख्या बढ़ती गई और प्रशासन को अधिक संगठित रूप दिया गया। असीरियन प्रांतों को सामान्यतः तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता था।
प्रथम श्रेणी में वे करदाता प्रांत थे, जिन्हें प्रतिवर्ष निश्चित मात्रा में कर देना पड़ता था। ये राज्य आंतरिक मामलों में अपेक्षाकृत स्वतंत्र रहते थे, किंतु असीरिया की सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार करते थे। द्वितीय श्रेणी के प्रांत कर के अतिरिक्त बेगार अथवा श्रम-सेवा भी प्रदान करते थे। इन क्षेत्रों में असीरियन सम्राट का एक प्रतिनिधि नियुक्त रहता था, जो प्रशासन तथा कर-संग्रह की निगरानी करता था। तृतीय श्रेणी के प्रांत सीधे केंद्रीय शासन के अधीन होते थे। इनका प्रशासन शक्नु नामक अधिकारी संचालित करता था। इन क्षेत्रों में स्थानीय स्वायत्तता बहुत कम थी और सम्राट का प्रत्यक्ष नियंत्रण बना रहता था।
प्रांतपतियों के अधिकार एवं कर्तव्य
प्रांतपतियों की नियुक्ति प्रायः राजपरिवार के सदस्यों, विश्वसनीय सेनानायकों अथवा प्रभावशाली सामंतों में से की जाती थी। उनके उत्तरदायित्व अत्यंत व्यापक थे। उन्हें अपने प्रांत में कानून-व्यवस्था बनाए रखनी होती थी, कर एकत्र करके केंद्रीय शासन को भेजना होता था, सैनिकों की भर्ती करनी होती थी तथा आवश्यकता पड़ने पर सेना की सहायता करनी पड़ती थी। प्रांतों की आय, कर तथा सैनिक व्यवस्था का निर्धारण स्वयं प्रांतपति नहीं करते थे, बल्कि केंद्रीय शासन उसके लिए स्पष्ट निर्देश जारी करता था। इस प्रकार असीरियन प्रशासन में केंद्रीय नियंत्रण अत्यंत सुदृढ़ था और स्थानीय अधिकारियों को सीमित अधिकार प्राप्त थे।
गुप्तचर एवं निरीक्षण व्यवस्था
असीरियन साम्राज्य की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता उसकी विकसित गुप्तचर व्यवस्था थी। सम्राट प्रांतों की गतिविधियों पर निरंतर निगरानी रखता था। इसके लिए गुप्तचर समय-समय पर विभिन्न प्रांतों का भ्रमण करते और प्रशासन की वास्तविक स्थिति की सूचना राजधानी भेजते थे।
निनेवेह और कलह से प्राप्त अनेक अभिलेखों में प्रांतपतियों द्वारा सम्राट को भेजे गए पत्र प्राप्त हुए हैं। इनमें सीमावर्ती परिस्थितियों, विद्रोहों, कर-संग्रह तथा प्रशासनिक समस्याओं का उल्लेख मिलता है। उदाहरणस्वरूप, टायर और सिडोन के अधिकारियों ने समय-समय पर सम्राट को अपने प्रदेशों की स्थिति से अवगत कराया था। इसी प्रकार कुरदी-अशुर-लमुर नामक अधिकारी ने विजित प्रदेशों के प्रशासन के संबंध में सम्राट से निर्देश माँगे थे। एक अन्य अधिकारी अश्शूर-मत्-काशिर से अरामी लोगों को पुनः आश्रय देने के विषय में स्पष्टीकरण भी माँगा गया था। इससे स्पष्ट होता है कि सम्राट प्रांतीय अधिकारियों पर निरंतर नियंत्रण रखता था।
असीरियन प्रांतीय प्रशासन में महत्त्वपूर्ण सुधार तिग्लथ-पिलेसर तृतीय (745–727 ई. पू.) के शासनकाल में किए गए। उसने विशाल प्रांतों को छोटे-छोटे प्रशासनिक जिलों में विभाजित किया, जिससे शासन अधिक प्रभावी हो सका। इन जिलों को ‘पखती’ कहा जाता था तथा इनके अधिकारी ‘बेल-पखती’ कहलाते थे। प्रत्येक बेल-पखती अपने क्षेत्र की कानून-व्यवस्था, कर-संग्रह और प्रशासन के लिए उत्तरदायी होता था। इस व्यवस्था से प्रांतीय शासन अधिक संगठित और नियंत्रित बन गया।
राजकीय संचार व्यवस्था
असीरियन साम्राज्य में संचार व्यवस्था भी अत्यंत विकसित थी। सम्राट, प्रांतपतियों तथा जिला अधिकारियों के बीच नियमित संपर्क बनाए रखने के लिए राजकीय दूत नियुक्त किए जाते थे।
इन दूतों में मार-शिप्री विशेष रूप से उल्लेखनीय था। वह राजमार्गों के माध्यम से राजधानी और प्रांतों के बीच संदेश पहुँचाता था। उसके मार्ग में विश्राम-स्थलों की व्यवस्था भी रहती थी, जिससे संदेशों का शीघ्र आदान-प्रदान संभव हो सके। शासक के पास गोपनीय संदेशों को भेजने के लिए विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी, जिन्हें ‘कुरबुतु’ कहा जाता था। ये अधिकारी अत्यंत संवेदनशील सूचनाएँ सीधे सम्राट तक पहुँचाते थे। आवश्यकता पड़ने पर यही अधिकारी उच्च पदाधिकारियों के कार्यों की जाँच भी करते थे।
स्थानीय शासन
असीरिया के कुछ प्राचीन नगरों में स्थानीय प्रशासन के लिए नगर के प्रतिष्ठित वृद्धजनों की सभाएँ भी कार्य करती थीं। ये सभाएँ स्थानीय विवादों का निपटारा करती थीं तथा नगर के सामान्य प्रशासन में सहयोग देती थीं। यद्यपि इन सभाओं को कुछ अधिकार प्राप्त थे, फिर भी उन पर सम्राट द्वारा नियुक्त अधिकारियों की निगरानी रहती थी।
स्थानीय प्रशासन पर केंद्रीय नियंत्रण बनाए रखने के लिए समय-समय पर राजकीय निरीक्षण भी किए जाते थे। इससे प्रांतीय अधिकारियों की उत्तरदायित्व भावना बनी रहती थी और प्रशासनिक व्यवस्था अपेक्षाकृत सुव्यवस्थित रहती थी।
असीरिया की यह प्रांतीय और प्रशासनिक व्यवस्था अपने समय की अत्यंत विकसित व्यवस्थाओं में गिनी जाती है। बाद में पारसी साम्राज्य ने इसी प्रकार की प्रांतीय शासन-पद्धति को अपनाया और उसके माध्यम से यह परंपरा आगे चलकर यूनानी तथा रोमन प्रशासनिक व्यवस्था को भी प्रभावित करती दिखाई देती है।
कर व्यवस्था
असीरियन साम्राज्य की आर्थिक व्यवस्था का मुख्य आधार कर-संग्रह था। विशाल साम्राज्य, स्थायी सेना, प्रशासनिक तंत्र, राजप्रासादों तथा सार्वजनिक निर्माण कार्यों के संचालन के लिए नियमित और पर्याप्त राजस्व की आवश्यकता होती थी। इसी कारण असीरियन शासकों ने एक संगठित तथा कठोर कर-व्यवस्था विकसित की। करों के संग्रह की जिम्मेदारी प्रांतपतियों तथा अन्य प्रशासनिक अधिकारियों पर होती थी और यह उनके प्रमुख कर्तव्यों में सम्मिलित था।
साम्राज्य के प्रत्येक प्रांत से निर्धारित मात्रा में कर नियमित रूप से राजधानी भेजा जाता था। प्रत्येक प्रांतपति इस बात के लिए उत्तरदायी था कि उसके क्षेत्र से निर्धारित राजस्व समय पर केंद्रीय शासन तक पहुँचे। यदि किसी प्रांत से कर-संग्रह में कमी या विलम्ब होता था, तो उसके लिए संबंधित अधिकारी उत्तरदायी माना जाता था।
असीरिया की कर-व्यवस्था केवल अपने प्रत्यक्ष शासित प्रदेशों तक सीमित नहीं थी। साम्राज्य के अधीनस्थ राज्यों तथा विजित प्रदेशों के शासकों को भी नियमित रूप से कर अथवा उपहार भेजना पड़ता था। पराजित शासकों द्वारा दिए जाने वाले वार्षिक कर को ‘तमर्तु’ कहा जाता था। यह असीरियन प्रभुता की स्वीकृति का प्रतीक भी माना जाता था।
इसके अतिरिक्त मंदत्तु नामक एक अन्य प्रकार का कर भी प्रचलित था। यह अधीनस्थ या आश्रित राज्यों द्वारा नियमित रूप से असीरियन राजधानी को भेजा जाता था। इन करों के अतिरिक्त युद्धों में प्राप्त लूट, उपहार, विजित प्रदेशों से वसूले गए विशेष कर तथा बेगार भी राजस्व के महत्त्वपूर्ण स्रोत थे।
कर व्यवस्था की कठोरता का उद्देश्य केवल राजकोष को समृद्ध बनाना नहीं था, बल्कि साम्राज्य की राजनीतिक शक्ति को बनाए रखना भी था। करों से प्राप्त धन का उपयोग विशाल सेना के रख-रखाव, दुर्गों, सड़कों, राजप्रासादों, मंदिरों तथा सिंचाई संबंधी निर्माण कार्यों में किया जाता था। इस प्रकार असीरियन कर-व्यवस्था साम्राज्य की प्रशासनिक तथा सैन्य शक्ति का प्रमुख आधार थी।
विधि संहिता, न्याय तंत्र एवं दंड विधान
असीरिया की प्रशासनिक व्यवस्था में कानूनों का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान था। जिस प्रकार सुमेर में शुल्गी तथा बेबिलोन में हम्मूराबी की विधि संहिताएँ प्रसिद्ध थीं, उसी प्रकार असीरिया की भी अपनी विकसित विधि-व्यवस्था थी। असीरियन कानूनों से संबंधित महत्त्वपूर्ण अभिलेख कल-एट-शेरकात से प्राप्त हुए हैं, जिनका समय लगभग तेरहवीं से बारहवीं शताब्दी ईसा पूर्व माना जाता है। इन्हें सामान्यतः ‘मध्य असीरियन विधि संहिता’ कहा जाता है।
प्राप्त अभिलेखों में तीन मिट्टी की तख्तियों पर कुल निन्यानबे धाराएँ अंकित हैं। पहली तख्ती में स्त्रियों और पारिवारिक जीवन से संबंधित लगभग साठ धाराएँ हैं। दूसरी तख्ती भूमि तथा संपत्ति संबंधी नियमों से संबंधित है, जिसमें इकतीस धाराएँ हैं। तीसरी तख्ती विश्वासघात तथा अन्य अपराधों से संबंधित थी, किंतु वह खंडित अवस्था में है।
असीरियन विधि संहिता की विशेषताएँ
विद्वानों में इस बात पर मतभेद है कि असीरियन कानूनों का विकास पूर्णतः स्वतंत्र रूप से हुआ अथवा उन पर बेबिलोन की विधि संहिता का प्रभाव पड़ा। यह निश्चित है कि असीरिया के उदय से पूर्व पश्चिमी एशिया में हम्मूराबी की विधि संहिता अत्यंत प्रतिष्ठित थी। इसलिए असीरियन विधि-निर्माताओं पर उसका कुछ प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था।
फिर भी, दोनों विधि संहिताओं की भाषा, शैली, विषय-वस्तु और दंड व्यवस्था में पर्याप्त अंतर दिखाई देता है। इसलिए अधिकांश इतिहासकार असीरियन विधि संहिता को स्वतंत्र और मौलिक मानते हैं। इतिहासकार वांसिकिल का मत है कि असीरियन कानूनों पर बेबिलोनियन प्रभाव अवश्य दिखाई देता है, किंतु उनका निर्माण मुख्यतः स्थानीय परिस्थितियों और असीरियन समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप हुआ था।
असीरिया एक सैनिक राज्य था, जहाँ अनुशासन, कठोरता और राज्य की सुरक्षा को सर्वोच्च महत्त्व दिया जाता था। इसलिए उसके कानून भी सैन्यवादी समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाए गए थे।
बेबिलोनियन कानूनों से भिन्नता
असीरियन और बेबिलोनियन विधि संहिताओं के बीच अनेक महत्त्वपूर्ण अंतर थे। बेबिलोन में देशद्रोह जैसे अपराधों के लिए अत्यंत कठोर दंड निर्धारित थे, जबकि असीरिया में भ्रूणहत्या, व्यभिचार के कुछ रूपों तथा अप्राकृतिक यौन अपराधों के लिए भी कठोरतम दंड दिए जाते थे।
स्त्रियों की सामाजिक स्थिति के संबंध में भी दोनों राज्यों के कानूनों में स्पष्ट अंतर था। बेबिलोन की स्त्रियों को संपत्ति, व्यापार तथा पारिवारिक अधिकार अपेक्षाकृत अधिक प्राप्त थे। इसके विपरीत असीरिया में स्त्रियाँ परिवार के पुरुष प्रधान, विशेषकर पति, के अधिकार के अधीन मानी जाती थीं। पर्दा-प्रथा और पारिवारिक अनुशासन पर विशेष बल दिया जाता था।
इन भिन्नताओं का प्रमुख कारण दोनों राज्यों की सामाजिक और आर्थिक संरचना थी। बेबिलोन की अर्थव्यवस्था मुख्यतः व्यापार और वाणिज्य पर आधारित थी, जबकि असीरिया का आर्थिक जीवन कृषि तथा सैन्य संगठन पर निर्भर था। इसी कारण दोनों समाजों की आवश्यकताओं के अनुसार उनके कानूनों का स्वरूप भी अलग-अलग विकसित हुआ।
न्याय व्यवस्था
असीरिया में न्याय का सर्वोच्च अधिकारी सम्राट होता था, किंतु दैनिक न्यायिक कार्य स्थानीय अधिकारियों और न्यायाधीशों द्वारा संपन्न किए जाते थे। प्रांतीय अधिकारी अपने क्षेत्रों में न्यायिक अधिकार भी रखते थे। महत्त्वपूर्ण मामलों में राजदरबार का निर्णय अंतिम माना जाता था।
न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल अपराध का निर्णय करना नहीं था, बल्कि राज्य की शक्ति और अनुशासन बनाए रखना भी था। इसी कारण कानूनों का पालन अत्यंत कठोरता से कराया जाता था। अपराध और दंड के संबंध में किसी प्रकार की शिथिलता स्वीकार नहीं की जाती थी।
कठोर दंड व्यवस्था
असीरियन कानून अपनी कठोर दंड व्यवस्था के लिए विशेष प्रसिद्ध हैं। विभिन्न अपराधों के लिए अनेक प्रकार के दंड निर्धारित थे। इनमें कठोर श्रम, कोड़े लगाना, अंग-भंग करना, नाक, कान अथवा जीभ काट देना, बधिया करना, शूली पर चढ़ाना तथा मृत्युदंड प्रमुख थे।
राज्य के विरुद्ध गंभीर अपराधों तथा कुछ विशेष सामाजिक अपराधों के लिए अत्यंत कठोर दंड दिए जाते थे। सारगोन द्वितीय के समय विषपान द्वारा दंड देने तथा कुछ धार्मिक अवसरों पर मानव-बलि जैसी प्रथाओं के उल्लेख भी कुछ प्राचीन स्रोतों में मिलते हैं, यद्यपि इनका स्वरूप सीमित और विवादास्पद माना जाता है।
भ्रूणहत्या को असीरिया में अत्यंत गंभीर अपराध माना जाता था। यदि कोई स्त्री जानबूझकर गर्भपात कराती थी, तो उसे मृत्युदंड दिया जा सकता था। कुछ प्रावधानों के अनुसार गर्भपात के प्रयास में स्त्री की मृत्यु हो जाने पर भी उसके शव को सार्वजनिक दंड के रूप में शूली पर लटकाया जा सकता था, जो तत्कालीन कठोर सामाजिक और सैन्य मानसिकता का परिचायक है।
यदि कोई पत्नी अपने पति पर शारीरिक आक्रमण करती या उसे गंभीर चोट पहुँचाती, तो उसके लिए भी कठोर दंड निर्धारित था। इसी प्रकार व्यभिचार के मामलों में पति को कुछ परिस्थितियों में अपराधी पुरुष के विरुद्ध प्रतिशोध लेने का अधिकार प्राप्त था।
दूसरी ओर कानून केवल स्त्रियों के विरुद्ध ही कठोर नहीं थे। यदि कोई व्यक्ति बिना प्रमाण किसी स्त्री पर अनैतिक आचरण का झूठा आरोप लगाता था, तो उसे भी कठोर दंड दिया जाता था। ऐसे दोषारोपण करने वाले व्यक्ति को हाथ-पाँव बाँधकर नदी में फेंकने जैसी कठोर सजाओं का उल्लेख मिलता है। यदि वह जीवित बच भी जाता था, तब भी उसे अन्य दंडों से मुक्ति नहीं मिलती थी।
इस प्रकार असीरियन विधि संहिता में दंड का उद्देश्य केवल अपराधी को दंडित करना नहीं था, बल्कि समाज में भय, अनुशासन और राज्य की सर्वोच्च सत्ता को स्थापित करना भी था। यही कारण है कि असीरियन कानून प्राचीन विश्व की सबसे कठोर और अनुशासनप्रधान विधि व्यवस्थाओं में गिने जाते हैं।
सैन्य संगठन
असीरियन साम्राज्य का आधार उसकी सुदृढ़ सैन्य व्यवस्था थी। विशाल साम्राज्य की स्थापना, सीमाओं की रक्षा तथा विजित प्रदेशों पर नियंत्रण बनाए रखने का प्रमुख साधन उसकी संगठित सेना थी। असीरियन शासक सैन्य संगठन को शासन की सबसे महत्त्वपूर्ण शक्ति मानते थे। इसी कारण वे पश्चिमी एशिया के सबसे प्रभावशाली साम्राज्य निर्माताओं में गिने जाते हैं। उनकी सेना अनुशासन, संगठन, आधुनिक युद्ध-तकनीकों तथा प्रभावी नेतृत्व के कारण समकालीन राज्यों की अपेक्षा अधिक सक्षम थी। बाद के अनेक साम्राज्यों, विशेषकर नव-बेबिलोनियन, पारसी और अन्य पश्चिमी एशियाई शक्तियों ने भी असीरियन सैन्य संगठन से प्रेरणा ग्रहण की।
असीरियन सेना दो प्रमुख भागों में विभाजित थी। एक केंद्रीय सेना थी , जो सीधे सम्राट के नियंत्रण में रहती थी। यह साम्राज्य की मुख्य सैन्य शक्ति थी और बड़े अभियानों में भाग लेती थी। दूसरी प्रांतीय सेना थी, जो विभिन्न प्रांतपतियों के अधीन रहती थी। इन सेनाओं का मुख्य कार्य सीमाओं की रक्षा, स्थानीय व्यवस्था बनाए रखना तथा आवश्यकता पड़ने पर केंद्रीय सेना को सहायता प्रदान करना था।
सिद्धांतत: प्रत्येक योग्य नागरिक आवश्यकता पड़ने पर सैन्य सेवा का दायित्व निभाता था। किंतु व्यवहार में स्थायी सैनिकों के अतिरिक्त प्रांतों से भी सैनिक बुलाए जाते थे। कुछ संपन्न लोग अपने स्थान पर दास या प्रतिनिधि भेजकर सैन्य सेवा से बचने का प्रयास करते थे, फिर भी राज्य की सैन्य शक्ति निरंतर बनी रहती थी।
असीरियन सेना के तीन प्रमुख अंग थे—पदाति सेना, अश्वारोही सेना और रथारोही सेना। इन तीनों के अतिरिक्त अभियांत्रिक तथा श्रमिक दल भी सेना के साथ चलते थे, जो मार्ग निर्माण, पुल निर्माण, खाइयाँ खोदना, दुर्गों की घेराबंदी तथा युद्ध उपकरणों के संचालन का कार्य करते थे।
पदाति सेना सबसे बड़ी और सबसे महत्त्वपूर्ण शाखा थी। इसके सैनिक तलवार, भाला, धनुष-बाण तथा ढाल से सुसज्जित रहते थे। अश्वारोही सेना का विकास विशेष रूप से नव-असीरियन काल में हुआ और इसने युद्ध की गति तथा प्रभावशीलता को बढ़ाया। रथारोही सेना का उपयोग प्रारंभिक आक्रमण, शत्रु की पंक्तियों को तोड़ने तथा राजकीय नेतृत्व के प्रदर्शन के लिए किया जाता था। समय के साथ घुड़सवार सेना का महत्त्व रथों से अधिक हो गया।
असीरियन सेना का सर्वोच्च सेनापति सम्राट स्वयं होता था। युद्ध अभियानों में वह प्रायः सेना का नेतृत्व करता था। उसके अधीन उच्च सेनाधिकारी नियुक्त होते थे। प्रमुख सैन्य अधिकारी को ‘तर्तनु’ कहा जाता था, जो आधुनिक अर्थ में प्रधान सेनापति के समान था। इसके अधीन विभिन्न सैन्य टुकड़ियों के अधिकारी कार्य करते थे।
सेना को अनेक इकाइयों में विभाजित किया गया था, जिससे आदेशों का पालन शीघ्रता से हो सके। विभिन्न स्तरों पर सैनिक अधिकारियों की नियुक्ति होती थी, जो अपने अधीन सैनिकों के प्रशिक्षण, अनुशासन तथा युद्ध संचालन के लिए उत्तरदायी रहते थे। इस सुव्यवस्थित संगठन के कारण विशाल सेना का संचालन प्रभावी ढंग से सम्भव हो सका।
असीरियन सैनिक उस समय के अत्याधुनिक अस्त्र-शस्त्रों से लैस रहते थे। वे लोहे की तलवार, भाला, विशाल धनुष, तीर, ढाल, धातु के कवच तथा शिरस्त्राण का प्रयोग करते थे। लोहे के व्यापक उपयोग ने उनकी सेना को विशेष शक्ति प्रदान की। लोहे के अस्त्र अधिक मजबूत और टिकाऊ थे, जिससे उन्हें युद्ध में बढ़त मिलती थी।
दुर्गों पर आक्रमण करने के लिए असीरियनों ने अनेक विशेष युद्ध उपकरण विकसित किए। वे विशाल भित्ति-भेदी लट्ठों (बैटरिंग राम) का प्रयोग करते थे, जिनके अग्रभाग पर लोहे की नोक लगी होती थी। इनके माध्यम से दुर्गों के द्वार और प्राचीर तोड़े जाते थे। इसके अतिरिक्त, चलायमान घेराबंदी यंत्र, ऊँचे मचान तथा सुरक्षात्मक रथों का भी उपयोग किया जाता था। अभियांत्रिक कौशल के कारण असीरियन सेना कठिन से कठिन दुर्गों पर भी अधिकार करने में सफल रहती थी।
असीरियन सेना की सबसे बड़ी विशेषता उसका कठोर अनुशासन था। सैनिक निर्धारित पंक्तियों में संगठित होकर युद्ध करते थे और आदेशों का पूर्ण पालन करते थे। वे रक्षात्मक युद्ध की अपेक्षा आक्रामक युद्ध में अधिक दक्ष थे। शत्रु को चारों ओर से घेरना, उसकी रसद काट देना, दुर्गों की घेराबंदी करना तथा निरंतर दबाव बनाए रखना उनकी प्रमुख रणनीतियाँ थीं।
असीरियन शासक स्वयं राजकीय रथ पर बैठकर सेना का नेतृत्व करते थे, जिससे सैनिकों का उत्साह बढ़ता था। युद्ध से पहले मार्गों का सर्वेक्षण, रसद की व्यवस्था तथा सैनिकों का योजनाबद्ध संचालन किया जाता था। यही कारण था कि असीरियन सेना लंबे अभियानों में भी प्रभावी बनी रहती थी।
युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद असीरियन शासक विजित प्रदेशों के साथ अत्यंत कठोर व्यवहार करते थे। अनेक नगरों को नष्ट कर दिया जाता था, भवनों में आग लगा दी जाती थी और विरोध करने वालों को कठोर दंड दिया जाता था। बड़ी संख्या में लोगों को बंदी बनाकर असीरिया ले जाया जाता था या उन्हें साम्राज्य के अन्य भागों में बसाया जाता था। इस नीति का उद्देश्य भविष्य में विद्रोह की संभावना को कम करना और विजित क्षेत्रों पर स्थायी नियंत्रण स्थापित करना था।
असीरियन अभिलेखों में शत्रुओं के विरुद्ध कठोर दंडों का उल्लेख मिलता है। इनमें अंग-भंग, मृत्युदंड तथा सार्वजनिक दंड जैसी घटनाएँ वर्णित हैं। आधुनिक इतिहासकार इन विवरणों को असीरियन शासकों द्वारा अपनी शक्ति और आतंक का प्रचार करने का माध्यम भी मानते हैं। फिर भी यह स्पष्ट है कि भय उत्पन्न करना उनकी साम्राज्यवादी नीति का महत्त्वपूर्ण अंग था।
असीरियन सैन्य संगठन की प्रमुख विशेषताएँ थीं—स्थायी सेना की व्यवस्था, स्पष्ट सैन्य पदानुक्रम, लोहे के अस्त्र-शस्त्रों का व्यापक उपयोग, घुड़सवार सेना का विकास, अभियांत्रिक युद्ध-कौशल, कठोर अनुशासन, तीव्र गति से अभियान चलाने की क्षमता तथा विजित प्रदेशों पर प्रभावी नियंत्रण। इन विशेषताओं के कारण असीरिया अनेक शताब्दियों तक पश्चिमी एशिया की प्रमुख सैन्य शक्ति बना रहा। इसके साथ ही, सैन्यवाद और कठोर दमनकारी नीति ने विजित प्रदेशों में असीरिया के प्रति गहरा असंतोष भी उत्पन्न किया, जिन्होंने समय आने पर एकजुट होकर असीरियन साम्राज्य के पतन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रकार असीरियन सैन्य संगठन अपनी शक्ति, संगठन, अनुशासन और युद्ध-कौशल के लिए जितना प्रसिद्ध था, उतना ही अपनी कठोर और आतंकपूर्ण युद्ध-नीति के लिए भी इतिहास में याद किया जाता है।
सामाजिक संगठन
असीरियन समाज का निर्माण उसकी सैन्य, राजनीतिक तथा आर्थिक व्यवस्था के अनुरूप हुआ था। निरंतर युद्ध, साम्राज्य-विस्तार और विभिन्न प्रदेशों के लोगों के संपर्क ने उसके सामाजिक स्वरूप को बहुजातीय बना दिया था। असीरियन समाज में अनुशासन, पितृसत्ता और सामाजिक वर्गों का स्पष्ट विभाजन था। यद्यपि असीरियनों ने बेबिलोनिया की अनेक सामाजिक परंपराओं को अपनाया, फिर भी उनकी सामाजिक व्यवस्था अधिक कठोर और सैन्य प्रवृत्ति से प्रभावित थी। समाज में स्वतंत्र नागरिकों तथा दासों दोनों का महत्त्वपूर्ण स्थान था और प्रत्येक वर्ग के अधिकार एवं कर्तव्य निश्चित थे।
वर्गभेद
असीरियन समाज मुख्यतः दो बड़े वर्गों में विभाजित था—स्वतंत्र नागरिक तथा दास। निरंतर युद्धों के कारण विभिन्न प्रदेशों के युद्धबंदी, व्यापारी, शिल्पकार और प्रवासी असीरिया में आकर बसते गए। फलस्वरूप राजधानी निनेवेह एक अंतरराष्ट्रीय नगर बन गई, जहाँ एशिया माइनर, सीरिया, फीनिशिया, बेबिलोनिया, मीडिया और एलम सहित अनेक क्षेत्रों के लोग निवास करते थे। विदेशी लोग असीरियन स्त्रियों से विवाह करके अथवा दत्तक ग्रहण के माध्यम से असीरियन समाज में सम्मिलित हो जाते थे। इससे समाज का स्वरूप बहुजातीय बन गया।
उच्च वर्ग
स्वतंत्र नागरिकों की प्रथम श्रेणी में सम्राट, राजपरिवार के सदस्य, धर्माधिकारी, सामंत तथा उच्च प्रशासनिक अधिकारी सम्मिलित थे। इस वर्ग को ‘मारवनुति’ अथवा ‘श्रीमंत वर्ग’ कहा जाता था। इन्हें समाज में सर्वोच्च प्रतिष्ठा प्राप्त थी। शासन, सेना और धार्मिक संस्थाओं के प्रमुख पद प्रायः इसी वर्ग के लोगों के हाथों में रहते थे। इस वर्ग के सदस्यों को विशेष अधिकार और अनेक सुविधाएँ प्राप्त थीं। राज्य उनकी संपत्ति और प्रतिष्ठा की रक्षा करता था। उच्च वर्ग की संख्या अपेक्षाकृत कम थी। कभी-कभी योग्य पुरुषों के अभाव में इसी वर्ग की महिलाओं को भी प्रशासनिक उत्तरदायित्व सौंपे जाते थे। रानी सम्मुरामात (सेमिरामिस) इसका उल्लेखनीय उदाहरण मानी जाती हैं।
शिल्पी एवं व्यवसायी वर्ग
स्वतंत्र नागरिकों की दूसरी श्रेणी शिल्पकारों, व्यापारियों तथा शिक्षित वर्ग की थी, जिसे ‘उम्माने’ कहा जाता था। यह समाज का सबसे सक्रिय आर्थिक वर्ग था। इस वर्ग में श्रेष्ठी या व्यापारी (तामकरु), लिपिक (तुपशर्रु), कुम्हार (परवरु), बढ़ई (नग्गरु), धातु-शिल्पी, मूर्तिकार तथा अन्य कुशल कारीगर सम्मिलित थे। इनका व्यवसाय सामान्यतः वंशानुगत होता था। राज्य के निर्माण कार्यों, व्यापार, प्रशासन तथा अभिलेख-लेखन में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। असीरियन साम्राज्य की आर्थिक समृद्धि और प्रशासनिक व्यवस्था इस वर्ग के सहयोग पर काफी हद तक निर्भर थी।
श्रमिक वर्ग
स्वतंत्र नागरिकों की तीसरी श्रेणी श्रमिक वर्ग की थी, जिसे ‘खुब्शी’ कहा जाता था। इस वर्ग में कृषक, सामान्य श्रमिक तथा सैनिक सेवा करने वाले लोग सम्मिलित थे। असीरियन सेना का अधिकांश भाग इसी वर्ग से आता था। आवश्यकता पड़ने पर इस वर्ग के लोगों को साम्राज्य के दूरस्थ भागों में बसाकर नए उपनिवेश स्थापित किए जाते थे। वे कृषि, सिंचाई, सड़क निर्माण, दुर्ग निर्माण तथा अन्य सार्वजनिक कार्यों में भी भाग लेते थे। युद्ध के समय यही वर्ग राज्य की मुख्य सैन्य शक्ति बन जाता था।
दास प्रथा
असीरियन समाज में दास प्रथा विद्यमान थी, किंतु इसकी प्रकृति अन्य अनेक प्राचीन सभ्यताओं की तुलना में कुछ भिन्न थी। दास मुख्यतः दो प्रकार के होते थे- पहला वर्ग युद्धबंदियों का था, जिन्हें विजित प्रदेशों से पकड़कर असीरिया लाया जाता था; दूसरा वर्ग उन लोगों का था, जो ऋण न चुका पाने के कारण अपनी स्वतंत्रता खो देते थे। दासों का मुख्य कार्य कृषि, निर्माण, घरेलू सेवा तथा राजकीय परियोजनाओं में श्रम करना था। उनसे बेगार भी ली जाती थी। सेनैकेरिब के काल के एक प्रस्तरचित्र में दासों को विशाल मूर्तियाँ ढोते हुए तथा अधिकारियों की निगरानी में कार्य करते हुए दिखाया गया है।
दासों की पहचान के लिए उनके कान छेद दिए जाते थे तथा सिर मुंडवा दिया जाता था। फिर भी उनकी स्थिति बहुत दयनीय नहीं थी। उन्हें सीमित रूप से संपत्ति अर्जित करने, स्वतंत्र व्यवसाय करने तथा न्यायालय में साक्षी के रूप में उपस्थित होने का अधिकार प्राप्त था। कुछ दास स्वयं भी दास रख सकते थे और विशेष परिस्थितियों में प्रशासनिक सेवाओं में भी नियुक्त किए जाते थे।
परिवार की संरचना
असीरियन परिवार पूर्णतः पितृसत्तात्मक था। परिवार का प्रमुख पिता होता था और उसके निर्णय सभी सदस्यों के लिए बाध्यकारी माने जाते थे। परिवार की संपत्ति, उत्तराधिकार तथा सामाजिक प्रतिष्ठा का नियंत्रण पुरुष के हाथों में रहता था। इस व्यवस्था के पीछे असीरिया की सैन्य परंपरा का गहरा प्रभाव था। निरंतर युद्धों और सैनिक जीवन के कारण पुरुषों का महत्त्व बढ़ गया था। परिवार के अन्य सदस्य पिता अथवा परिवार के वरिष्ठ पुरुष की आज्ञा का पालन करने के लिए बाध्य थे।
विवाह व्यवस्था
असीरियन विवाह प्रणाली कई दृष्टियों से बेबिलोनियन परंपराओं से मिलती-जुलती थी, किंतु उसमें कुछ विशेषताएँ भी थीं। विवाह सामान्यतः परिवारों की सहमति से होते थे और कई बार कन्या के बदले मूल्य अथवा वधूमूल्य दिया जाता था। कुछ परिस्थितियों में विवाह की प्रारंभिक रस्मों के बाद यदि वर की मृत्यु हो जाती थी, तो कन्या का विवाह उसके छोटे भाई से कराया जा सकता था, बशर्ते उसकी आयु उपयुक्त हो। यदि वर का कोई भाई न हो, तो वर-पक्ष को विवाह के समय प्राप्त अधिकांश उपहार कन्या-पक्ष को लौटाने पड़ते थे। इस व्यवस्था का उद्देश्य पारिवारिक संबंधों को बनाए रखना तथा संपत्ति और उत्तराधिकार के विवादों को रोकना था।
स्त्रियों की स्थिति
असीरियन समाज में स्त्रियों की स्थिति बेबिलोनिया की तुलना में अपेक्षाकृत निम्न थी। असीरिया के कठोर सैन्य समाज में पुरुषों का प्रभुत्व अधिक था और स्त्रियों के अधिकार सीमित थे। वे सामान्यतः पति और परिवार के पुरुषों के अधीन रहती थीं। विवाहित स्त्रियों को पति की अनुमति के बिना घर से बाहर जाने अथवा स्वतंत्र व्यापार करने की अनुमति नहीं थी। उनसे पूर्ण पतिव्रता जीवन की अपेक्षा की जाती थी। व्यभिचार को गंभीर अपराध माना जाता था और इसके लिए कठोर दंड का प्रावधान था।
स्त्रियों से संबंधित अनेक अपराधों, जैसे चोरी, पति पर आक्रमण, भ्रूणहत्या तथा व्यभिचार के लिए कठोर दंड निर्धारित थे। भ्रूणहत्या को राज्य के विरुद्ध अपराध माना जाता था, क्योंकि इससे भविष्य के सैनिकों की संख्या घटने की आशंका रहती थी। इसी कारण इसके लिए मृत्युदंड तक का प्रावधान था।
पर्दा प्रथा
असीरियन समाज में पर्दा प्रथा का व्यवस्थित विकास हुआ। विवाहित तथा सम्मानित परिवारों की महिलाओं के लिए सार्वजनिक स्थानों पर घूँघट या आवरण धारण करना अनिवार्य था। यह उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। इसके विपरीत, अविवाहित स्त्रियाँ, दासियाँ, गणिकाएँ तथा कुछ पुजारिणियाँ पर्दा नहीं करती थीं। यदि कोई पुरुष किसी गणिका को सार्वजनिक रूप से अपनी पत्नी घोषित कर देता था, तो अनेक परिस्थितियों में उसे पत्नी का सामाजिक दर्जा प्राप्त हो सकता था।
स्त्रियों के अधिकार और अपवाद
यद्यपि सामान्य स्त्रियों के अधिकार सीमित थे, फिर भी उच्च वर्ग की कुछ महिलाओं को विशेष सम्मान प्राप्त था। राजपरिवार की महिलाएँ कभी-कभी प्रशासन और शासन में भी भाग लेती थीं। रानी सम्मुरामात इसका प्रमुख उदाहरण हैं, जिन्होंने अल्पायु उत्तराधिकारी के समय शासन का संचालन किया।
सैनिक परिवारों की महिलाओं के प्रति राज्य अपेक्षाकृत संवेदनशील था। यदि कोई सैनिक युद्ध में बंदी बना लिया जाता था और उसके परिवार के पास जीविका का साधन नहीं रहता था, तो राज्य उसकी पत्नी को भूमि और आवास उपलब्ध कराता था। यदि दो वर्षों तक सैनिक का कोई समाचार न मिलता, तो पत्नी को पुनर्विवाह की अनुमति दी जाती थी। किंतु यदि बाद में सैनिक जीवित लौट आता, तो उसे अपने प्रथम पति के पास लौटना पड़ता था। यदि सैनिक की मृत्यु की पुष्टि हो जाती, तो राज्य द्वारा दी गई भूमि और मकान वापस ले लिए जाते थे।
आर्थिक संगठन
कृषिकर्म
असीरियन साम्राज्य की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार कृषि थी। प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से असीरिया को लगभग वही सुविधाएँ प्राप्त थीं, जो सुमेर और बेबिलोनिया को मिली थीं। दजला (टिग्रिस) नदी के दोनों ओर फैले उपजाऊ मैदान कृषि के लिए अत्यंत अनुकूल थे। यहाँ मुख्य रूप से गेहूँ, जौ, बाजरा तथा तिल की खेती की जाती थी। इन फसलों से न केवल स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति होती थी, बल्कि राज्य की आर्थिक व्यवस्था को भी स्थिरता मिलती थी।
कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए सिंचाई व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया गया था। बेबिलोनिया की तरह असीरिया में भी बाँधों और नहरों का निर्माण कर नदी के जल का उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता था। खेतों तक पानी पहुँचाने के लिए मिस्र की भाँति शडूफ (ढेकुली) का प्रयोग किया जाता था, जिससे जल को ऊँचाई पर उठाकर खेतों तक पहुँचाया जाता था। इस विकसित सिंचाई प्रणाली के कारण कृषि उत्पादन अपेक्षाकृत अधिक होता था।
भूमि का स्वामित्व मुख्यतः उच्च वर्ग और बड़े भू-स्वामियों के हाथों में था। सामान्य कृषक या तो स्वयं भूमि जोतते थे अथवा बड़े भू-स्वामियों से भूमि लेकर खेती करते थे। उपलब्ध स्रोतों से यह स्पष्ट नहीं है कि सभी कृषक स्वतंत्र भूमिधर थे या अधिकांश लोग लगान पर भूमि लेकर खेती करते थे। इतना निश्चित है कि यदि कोई किसान भूमि पट्टे पर लेता था, तो उसे कठोर शर्तों के अनुसार लगान देना पड़ता था।
असीरिया में कृषि को अत्यधिक सम्मान प्राप्त था। जहाँ बेबिलोनिया की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार व्यापार था, वहीं असीरिया में कृषि को सर्वोच्च स्थान दिया गया था। असीरियन अभिजात वर्ग व्यापार करने की अपेक्षा भूमि का स्वामी बनना अधिक प्रतिष्ठाजनक मानता था। इसी कारण कृषि राज्य की आर्थिक संरचना का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार बनी रही।
उद्योग-धंधे
कृषि के बाद असीरिया की अर्थव्यवस्था का दूसरा प्रमुख आधार उद्योग-धंधे थे। यद्यपि असीरिया की भौगोलिक स्थिति समुद्री व्यापार के लिए विशेष अनुकूल नहीं थी, फिर भी साम्राज्य के निरंतर विस्तार और विजित प्रदेशों से प्राप्त धन-संपत्ति के कारण उद्योगों का पर्याप्त विकास हुआ।
असीरिया का सबसे महत्त्वपूर्ण उद्योग धातु उद्योग था। स्वर्ण, रजत, ताँबा, काँसा और लोहा जैसी धातुओं से अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र, औजार, आभूषण तथा उपयोगी वस्तुएँ बनाई जाती थीं। धातुएँ स्थानीय खानों से प्राप्त होती थीं अथवा अन्य क्षेत्रों से आयात की जाती थीं। असीरियन कारीगर धातुओं को गलाने, ढालने तथा शीशा तैयार करने की तकनीक से भी परिचित थे। विशेष रूप से लोहे के व्यापक उपयोग ने असीरियन सैन्य शक्ति को अत्यधिक सुदृढ़ बनाया।
धातु उद्योग के अतिरिक्त मृद्भांड उद्योग (मिट्टी के बर्तन) और वस्त्र उद्योग भी विकसित थे। मिट्टी के सुंदर और उपयोगी पात्र बड़ी मात्रा में बनाए जाते थे। वस्त्र निर्माण में ऊन के साथ-साथ कपास का भी प्रयोग होने लगा था। सेनैकेरिब के एक अभिलेख में वृक्षों से प्राप्त होने वाली ‘ऊन’ का उल्लेख मिलता है, जिसे अधिकांश इतिहासकार कपास मानते हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार जेम्स हेनरी ब्रेस्टेड के अनुसार पश्चिम एशिया में कपास का ज्ञान भारत से पहुँचा था।
अधिकांश उद्योग पारिवारिक और वंशानुगत थे। कारीगरों की संतानें सामान्यतः अपने पूर्वजों का ही व्यवसाय अपनाती थीं। इससे विभिन्न शिल्पों में दक्षता बनी रहती थी और उत्पादन की परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रहती थी।
व्यापार एवं वाणिज्य
यद्यपि असीरिया एक शक्तिशाली साम्राज्य था, फिर भी उसके उच्च वर्ग के लोग व्यापार को विशेष सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते थे। उनकी मान्यता थी कि कम मूल्य पर वस्तु खरीदकर अधिक मूल्य पर बेचना कोई प्रतिष्ठित कार्य नहीं है। परिणामस्वरूप व्यापार और वाणिज्य का अधिकांश नियंत्रण विदेशी अरामी व्यापारियों के हाथों में चला गया।
असीरिया का बाह्य व्यापार मुख्यतः व्यापारिक काफिलों के माध्यम से संचालित होता था। वस्तुओं का निर्माण करने वाले, उनमें पूँजी लगाने वाले तथा उन्हें दूर-दराज़ के क्षेत्रों तक पहुँचाने वाले अलग-अलग वर्ग थे। व्यापारी और साहूकार पूँजी उपलब्ध कराते थे, जबकि सौदागर माल लेकर विभिन्न प्रदेशों की यात्रा करते थे। व्यापार में निवेश करने वाले लोगों को लगभग 25 प्रतिशत तक ब्याज प्राप्त होता था, जिससे स्पष्ट है कि व्यापार पर्याप्त लाभदायक था।
उस समय विकसित मुद्रा प्रणाली का अभाव था। लेन-देन मुख्यतः सोने, चाँदी और ताँबे के निश्चित भार वाले टुकड़ों द्वारा किया जाता था। सेनैकेरिब के अभिलेखों में चाँदी के एक शेकेल भार का उल्लेख मिलता है, जिससे स्पष्ट है कि धातु के भार को ही विनिमय का आधार बनाया जाता था।
असीरिया का प्रमुख व्यापारिक केंद्र अशुर नगर था, जहाँ से दूर-दूर तक व्यापार संचालित होता था। वस्तुओं के मूल्य स्थिर नहीं रहते थे, बल्कि माँग और पूर्ति के अनुसार बदलते रहते थे। अशुरबनिपाल के समय ऊँटों की संख्या बढ़ जाने से उनके मूल्य लगभग डेढ़ शेकेल तक घट गए थे। इससे स्पष्ट है कि असीरियन व्यापार में बाज़ार की परिस्थितियों का प्रभाव स्वीकार किया जाता था।
व्यापार को व्यवस्थित रखने के लिए अनेक नियम बनाए गए थे। व्यापारिक अनुबंधों, ऋण, ब्याज तथा लेन-देन से संबंधित कानूनों का उल्लंघन करने वालों को कठोर दंड दिया जाता था। असीरिया के व्यापारिक संबंध सीरिया, फिलिस्तीन, साइप्रस तथा एजियन द्वीपों तक फैले हुए थे। मेसोपोटामिया के प्रमुख व्यापारिक मार्ग सीरिया से होकर गुजरते थे, इसलिए इस क्षेत्र का आर्थिक महत्त्व अत्यधिक था। यही कारण था कि असीरिया के अनेक युद्ध केवल राजनीतिक विस्तार के लिए नहीं, बल्कि व्यापारिक मार्गों और आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए भी लड़े गए। टायर, उरर्तु और सीरिया के साथ हुए संघर्ष इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
धार्मिक जीवन
देवमंडल
असीरियन सभ्यता का धार्मिक जीवन उसकी राजनीतिक और सैन्य प्रवृत्ति से गहराई से प्रभावित था। यद्यपि असीरियन समाज अत्यंत युद्धप्रिय और साम्राज्यवादी था, फिर भी उसके धार्मिक विश्वास सुव्यवस्थित थे। असीरियनों ने अनेक देवी-देवताओं को बेबिलोनियन परंपरा से ग्रहण किया, किंतु उन्होंने अपने राष्ट्रीय देवता अश्शूर (अशुर) को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया। इस प्रकार असीरियन धर्म में स्थानीय और बेबिलोनियन धार्मिक परंपराओं का समन्वय दिखाई देता है।
अश्शूर (अशुर)
प्रारंभ में अश्शूर को अन्य देवताओं के समान ही महत्त्व प्राप्त था और उसे मुख्यतः सूर्य अथवा प्रकाश से संबंधित देवता माना जाता था। उसका प्रमुख प्रतीक पंखों वाला सूर्यचक्र था। बाद में जब अश्शूर (अशुर) नगर असीरिया का प्रमुख राजनीतिक और धार्मिक केंद्र बना, तब अश्शूर को राष्ट्रीय देवता तथा युद्ध के देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। वह असीरियन राज्य का संरक्षक माना जाता था और यह विश्वास किया जाता था कि उसी की कृपा से सेना को विजय तथा राज्य को समृद्धि प्राप्त होती है। युद्ध और शांति दोनों परिस्थितियों में राष्ट्र की रक्षा करना उसका प्रमुख कार्य माना जाता था।
अश्शूर के व्यक्तिगत स्वरूप और चरित्र के विषय में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, किंतु उपलब्ध अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि उसे बलि अर्पित कर प्रसन्न किया जाता था। अश्शूरनासिरपाल द्वितीय के समय के प्रस्तरचित्रों में युद्धबंदियों को अश्शूर के समक्ष बलि चढ़ाते हुए दिखाया गया है। अशुरबनिपाल ने अपने एक अभिलेख में उल्लेख किया है कि उसने विद्रोहियों और षड्यंत्रकारियों को देवताओं के समक्ष बलि देकर उन्हें प्रसन्न किया। इससे स्पष्ट है कि धार्मिक अनुष्ठानों में बलि की परंपरा महत्त्वपूर्ण थी।
अश्शूर का प्रमुख मंदिर अश्शूर नगर में स्थित था, जो असीरिया का प्रमुख धार्मिक केंद्र था। उसकी पत्नी के रूप में निनलिल की पूजा की जाती थी। इसके अतिरिक्त असीरिया में अनेक अन्य देवी-देवताओं की भी उपासना होती थी, जिनमें इआ (एआ), अनु, एनलिल, सिन (चंद्र देव), शमाश (सूर्य देव), बेल-मार्दुक, नाबू, निनुर्ता तथा नर्गल प्रमुख थे। प्रेम और उर्वरता की अधिष्ठात्री देवी इश्तर को भी विशेष सम्मान प्राप्त था और उसके अनेक मंदिर स्थापित थे।
असीरियन धार्मिक जीवन में राजा का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। राजा को देवताओं का प्रतिनिधि माना जाता था और यह विश्वास किया जाता था कि वह देवताओं की इच्छा के अनुसार शासन करता है। इसलिए उसकी आज्ञा का पालन केवल राजनीतिक कर्तव्य ही नहीं, बल्कि धार्मिक दायित्व भी समझा जाता था। राजा स्वयं राष्ट्र का प्रधान पुरोहित भी था और प्रमुख धार्मिक अनुष्ठानों का संचालन करता था।
असीरियनों का विश्वास था कि जो राज्य या जातियाँ अश्शूर की सत्ता को स्वीकार नहीं करतीं अथवा उसके प्रति निष्ठा नहीं रखतीं, उन्हें दंडित करना उनका धार्मिक कर्तव्य है। इसी कारण अनेक सैन्य अभियानों को धार्मिक आधार भी प्रदान किया जाता था। विजय प्राप्त करने के बाद पराजित प्रदेशों में अश्शूर की प्रतिष्ठा स्थापित करना असीरियन शासकों का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य होता था।
अंधविश्वास एवं परलोकवाद
असीरियन धर्म में अंधविश्वास, जादू-टोना और अभिचार का अत्यधिक प्रभाव था। उनका विश्वास था कि संसार में अनेक अदृश्य और अशुभ शक्तियाँ सक्रिय हैं, जो मनुष्य के जीवन को प्रभावित करती हैं। इन शक्तियों से वे उतना ही भयभीत रहते थे जितना अपने शत्रुओं से। इसलिए धार्मिक अनुष्ठानों, मंत्रों और तांत्रिक उपायों का उनके जीवन में विशेष महत्त्व था।
इतिहासकार विल ड्यूरेंट के अनुसार असीरियन धर्म का प्रमुख उद्देश्य लोगों में राज्य के प्रति निष्ठा उत्पन्न करना तथा बलि, मंत्र और धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से देवताओं की कृपा प्राप्त करना था। इस कारण धार्मिक जीवन में कर्मकांडों का अत्यधिक विकास हुआ।
अशुभ शक्तियों से रक्षा का सबसे प्रभावी साधन मंत्र-तंत्र माना जाता था। इन मंत्रों का ज्ञान केवल पुजारियों के पास होता था और वे ही उन्हें प्रयोग करने के अधिकारी थे। अनेक बार इन मंत्रों को तावीज़ों पर अंकित किया जाता था। तावीज़ों पर मंत्रों के साथ देवताओं, पशुओं या शुभ प्रतीकों की आकृतियाँ भी बनाई जाती थीं। इन तावीज़ों को बच्चे, स्त्री, पुरुष तथा वृद्ध—सभी धारण करते थे और उन्हें सुरक्षा का साधन मानते थे।
अंधविश्वासों के कारण असीरिया में पुजारियों का प्रभाव निरंतर बढ़ता गया। धार्मिक कार्यों के लिए विभिन्न प्रकार के पुजारियों की व्यवस्था थी। कुछ पुजारी अभिचार और जादू-टोना से संबंधित अनुष्ठान करते थे, कुछ संगीत और स्तुतिगान द्वारा देवताओं को प्रसन्न करते थे, जबकि अन्य पुजारी देवमूर्तियों का अभिषेक तथा मंदिरों के धार्मिक अनुष्ठानों का संचालन करते थे। इस प्रकार धार्मिक व्यवस्था सुव्यवस्थित और विशिष्ट कार्य-विभाजन पर आधारित थी।
असीरियन लोग शकुन और अपशकुन में भी गहरा विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि संसार में घटने वाली प्रत्येक घटना किसी अन्य घटना का संकेत होती है। इसलिए पक्षियों की उड़ान, पशुओं के व्यवहार, स्वप्न, ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति तथा प्राकृतिक घटनाओं के आधार पर भविष्य का अनुमान लगाया जाता था। इस विश्वास के कारण ज्योतिष और शकुन-विज्ञान का पर्याप्त विकास हुआ। बाद के समय में इन परंपराओं का प्रभाव पश्चिमी एशिया और यूनानी जगत तक पहुँचा।
असीरियनों की परलोक संबंधी मान्यताओं के विषय में सीमित जानकारी उपलब्ध है। उनका विश्वास था कि मृत्यु के बाद आत्मा एक अंधकारमय लोक में जाती है, जहाँ उसके सांसारिक कर्मों का मूल्यांकन किया जाता है। जो व्यक्ति धर्मपरायण और सदाचारी होता था, उसे अपेक्षाकृत शांत अवस्था प्राप्त होती थी, जबकि दुष्कर्म करने वालों को कठोर यातनाएँ सहनी पड़ती थीं। इस प्रकार वे मृत्यु के बाद भी कर्मफल की अवधारणा में विश्वास रखते थे।
मृतकों के प्रति असीरियनों का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत गंभीर और उदासीन था। प्रारंभिक काल में मृतकों को सामान्यतः भूमि में दफनाया जाता था, किंतु बाद के समय में दाह-संस्कार की प्रथा का भी प्रचलन होने लगा। मृतकों के सम्मान में धार्मिक अनुष्ठान किए जाते थे और यह विश्वास किया जाता था कि उचित संस्कार से मृतात्मा को परलोक में शांति प्राप्त होती है।
कला एवं स्थापत्य
वास्तुकला
असीरियन सभ्यता ने कला और स्थापत्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की। उन्होंने बेबिलोनियाई परंपराओं को अपनाते हुए उन्हें अधिक विकसित रूप प्रदान किया तथा प्रस्तर उत्कीर्णन की कला में सुमेरियों के समकक्ष, बल्कि अनेक विद्वानों के अनुसार उनसे भी आगे बढ़ गए। असीरियन साम्राज्य द्वारा विजित प्रदेशों से प्राप्त धन-संपत्ति का उपयोग केवल सेना के विस्तार में ही नहीं, बल्कि राजधानी और प्रमुख नगरों के निर्माण तथा सौंदर्य-वृद्धि में भी किया गया। परिणामस्वरूप निनेवेह, अश्शूर, कल्हू और दुर-शारूकिन जैसे नगर विशाल राजप्रासादों, मंदिरों, दुर्गों, मूर्तियों और उत्कीर्ण शिलापट्टों से अलंकृत हो गए।
असीरियन वास्तुकला का विकास मुख्यतः राजकीय संरक्षण में हुआ। अधिकांश भवनों, मंदिरों और राजप्रासादों का निर्माण शासकों की प्रत्यक्ष देखरेख में कराया गया। इस दृष्टि से असीरियन वास्तुकला को मौर्य तथा पारसी साम्राज्यों की दरबारी कला के समान माना जाता है। प्रारंभिक काल में भवनों के निर्माण में पकी ईंटों का उपयोग होता था, किंतु बाद में उपयुक्त पत्थरों की उपलब्धता के कारण पत्थर प्रमुख निर्माण सामग्री बन गया। भवनों में मेहराब, स्तंभ, विशाल द्वार, लंबे प्रांगण, बड़े सभा-भवन तथा अनेक कक्ष बनाए जाते थे। अधिकांश राजकीय भवन दो या तीन मंजिल तक ऊँचे होते थे। उनकी दीवारों, छतों और फर्शों को रंगीन पत्थरों, धातुओं तथा उत्कीर्ण आकृतियों से सजाया जाता था। राजमहलों के प्रवेशद्वारों पर विशाल पंखयुक्त बैलों अथवा सिंहों की मूर्तियाँ स्थापित की जाती थीं, जिन्हें शक्ति और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता था।
तिग्लथ-पिलेसर प्रथम ने राष्ट्रीय देवता अश्शूर के लिए अनेक मंदिरों का निर्माण कराया। उसने अपने एक अभिलेख में उल्लेख किया है कि मंदिर के भीतरी भाग को आकाश के समान आकर्षक बनाया गया तथा उसकी दीवारों को तारों की आकृतियों से सजाया गया। अशुरनसिरपाल द्वितीय ने राजधानी को कल्हू स्थानांतरित कर वहाँ विशाल राजप्रासादों और मंदिरों का निर्माण कराया। उसने अनेक वास्तुकारों और शिल्पियों को इस कार्य में लगाया। उसके राजमहल की दीवारों पर युद्ध, आखेट और धार्मिक अनुष्ठानों के दृश्य अत्यंत जीवंत शैली में उत्कीर्ण किए गए।
शाल्मनेसर तृतीय के समय अश्शूर नगर में अनेक भवनों का निर्माण हुआ। नगर की सुरक्षा के लिए दोहरी प्राचीर और गहरी खाई बनाई गई तथा निश्चित दूरी पर सुदृढ़ द्वार और तोरण निर्मित किए गए। तिग्लथ-पिलेसर तृतीय के काल में वास्तुकला में एक नई विशेषता जुड़ी, जब राजमहलों में भव्य द्वारमंडप बनाए जाने लगे। इतिहासकार जेम्स हेनरी ब्रेस्टेड के अनुसार इस शैली पर हित्ती स्थापत्य का प्रभाव था।
सारगोन द्वितीय ने निनेवेह के निकट दुर-शारूकिन नामक नई राजधानी बसाई। यहाँ एक विशाल राजप्रासाद का निर्माण कराया गया, जिसके मुख्य द्वार पर पंखयुक्त मानव-मुखी वृषभों की विशाल मूर्तियाँ स्थापित थीं। महल की दीवारें उत्कीर्ण शिलाचित्रों से सजाई गईं और कक्षों को उत्कृष्ट कलाकृतियों तथा साज-सज्जा की वस्तुओं से अलंकृत किया गया।
सेनैकेरिब के समय निनेवेह का राजप्रासाद असीरियन वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण था। इसकी दीवारों और छतों को बहुमूल्य धातुओं, लकड़ियों और पत्थरों से सजाया गया था। इसकी चमकदार खपरैल दूर से ही आकर्षित करती थीं। धातु-शिल्पियों ने सिंहों और बैलों की ताँबे की मूर्तियाँ बनाई, जबकि पत्थर के शिल्पियों ने चूना-पत्थर और सेलखड़ी से विशाल पंखयुक्त वृषभ निर्मित किए। एसरहद्दोन ने भी भव्य भवनों के निर्माण में रुचि ली और नए प्रकार के अलंकृत स्तंभों का प्रयोग किया। बाद में सेनैकेरिब के महल के जीर्ण होने पर अशुरबनिपाल ने उसका पुनर्निर्माण कराया, जिसका उल्लेख उसके अभिलेखों में विस्तार से मिलता है।
मूर्तिकला
असीरियन मूर्तिकला का प्रारंभ देवताओं और शासकों की प्रतिमाओं के निर्माण से हुआ, किंतु समय के साथ कलाकारों ने पंखयुक्त मानव-मुखी वृषभ, सिंह तथा अन्य विशाल पशु-मूर्तियों का निर्माण भी आरंभ कर दिया। ये पूर्ण त्रि-आयामी मूर्तियाँ थीं, जिन्हें कला की भाषा में ‘पूर्णशिल्प’ कहा जाता है।
असीरियन मूर्तिकार विशेष रूप से पशु-मूर्तियों के निर्माण में अत्यंत सफल रहे। उनके द्वारा निर्मित सिंह, बैल और घोड़े अत्यंत स्वाभाविक, सजीव और प्रभावशाली प्रतीत होते हैं। इन मूर्तियों में शक्ति, साहस और गतिशीलता का उत्कृष्ट चित्रण मिलता है। इसके विपरीत देवताओं और मनुष्यों की अनेक मूर्तियाँ अपेक्षाकृत कठोर, औपचारिक और कम स्वाभाविक दिखाई देती हैं।
अशुरबनिपाल की विशाल प्रतिमा इस सामान्य प्रवृत्ति का अपवाद मानी जाती है। वर्तमान में ब्रिटिश संग्रहालय में सुरक्षित इस प्रतिमा में उसके प्रभावशाली व्यक्तित्व, आत्मविश्वास और राजसी गरिमा का अत्यंत प्रभावपूर्ण चित्रण दिखाई देता है।
उद्धृत कला (उत्कीर्ण शिल्प)
असीरियनों ने मूर्तिकला की अपेक्षा उत्कीर्ण शिल्प अथवा उद्धृत कला में अधिक उत्कृष्टता प्राप्त की। सारगोन द्वितीय, सेनैकेरिब, एसरहद्दोन और अशुरबनिपाल के शासनकाल में इस कला का विशेष विकास हुआ। राजमहलों की दीवारों पर युद्ध, आखेट, धार्मिक अनुष्ठान, विजय-यात्राएँ तथा राजकीय जीवन के विविध दृश्य बड़े कौशल से उत्कीर्ण किए गए।
अशुरनसिरपाल द्वितीय के काल के प्राचीन उत्कीर्ण चित्रों में पुण्य के देवता मार्दुक और पाप मे देवता तियामत के साथ युद्ध करते दिखाया गया है। अशुरबनिपाल के समय के एक प्रसिद्ध उत्कीर्ण चित्र में नदी के किनारे बसे शत्रु नगर पर असीरियन सेना का आक्रमण चित्रित है। इसमें किले की रक्षा करते सैनिक, नदी पार करने का प्रयास करते शत्रु तथा उन पर बाण चलाते असीरियन सैनिक यथार्थ रूप में अंकित हैं।
असीरियन कलाकारों ने विशाल मानवाकृतियों का भी निर्माण किया। कल्हू से प्राप्त शम्शी-अदद सप्तम की चूना-पत्थर की उत्कीर्ण प्रतिमा तथा ताड़-वृक्ष की पूजा करते व्यक्तियों के दृश्य इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं। यद्यपि मानव आकृतियों में सभी व्यक्तियों के सिर, दाढ़ी, मूँछ और वस्त्र लगभग समान शैली में बनाए गए हैं, फिर भी उनकी अभिव्यक्ति और घटनाओं के चित्रण में पर्याप्त जीवंतता है। इन उत्कीर्ण चित्रों के माध्यम से असीरियन सेना के हथियारों, युद्ध-नीतियों, रथों और सैनिक उपकरणों के क्रमिक विकास का भी स्पष्ट ज्ञान प्राप्त होता है।
असीरियन उत्कीर्ण कला की सबसे बड़ी विशेषता पशु-चित्रण है। युद्ध और आखेट से संबंधित शिलापट्टों पर अंकित पशु आकृतियाँ अत्यंत सजीव और प्रभावशाली हैं। दुर-शारूकिन से प्राप्त सारगोन द्वितीय के घोड़े, सेनैकेरिब के महल में उत्कीर्ण घायल शेरनी, अशुरबनिपाल के महल से प्राप्त मरणासन्न सिंह, शिकार के दृश्य, जाल से मुक्त होता सिंह तथा वृक्ष की छाया में विश्राम करते पशुओं के चित्र विश्वविख्यात हैं। इनमें गति, पीड़ा, भय, क्रोध और संघर्ष जैसे भाव अत्यंत स्वाभाविक ढंग से व्यक्त किए गए हैं।
इतिहासकार विल ड्युरैंट ने असीरियन पशु-चित्रण की अत्यधिक प्रशंसा करते हुए लिखा कि इतनी उत्कृष्ट पशु आकृतियाँ न पहले कभी बनीं और न बाद में। यद्यपि यह कथन असीरियन कला की महानता का परिचायक है, फिर भी इसे पूर्णतः स्वीकार नहीं किया जा सकता। भारतीय मौर्यकालीन अशोक स्तंभों पर उत्कीर्ण सिंह, वृषभ और अन्य पशु आकृतियाँ भी समान रूप से उच्चकोटि की कलात्मकता, स्वाभाविकता और भावाभिव्यक्ति का परिचय देती हैं।
चित्रकला एवं अन्य गौण कलाएँ
असीरिया में चित्रकला का स्वतंत्र विकास अपेक्षाकृत सीमित रहा और इसका उपयोग मुख्यतः वास्तुकला के सहायक रूप में किया गया। राजमहलों और मंदिरों की दीवारों को रंगीन चित्रों तथा टेम्परा शैली के चित्रांकन से सजाया जाता था। असीरियन चित्रकार रंगों के संतुलित प्रयोग तथा भित्ति-सज्जा में पर्याप्त दक्ष थे।
सुमेर और बेबिलोन की परंपरा का अनुसरण करते हुए असीरियनों ने मुद्राओं और मुहरों का भी निर्माण किया। यद्यपि कलात्मक दृष्टि से ये सुमेरियन मुद्राओं के समान उत्कृष्ट नहीं थीं, फिर भी प्रशासनिक और व्यापारिक कार्यों में उनका व्यापक उपयोग होता था।
असीरियन शिल्पकारों ने राजमहलों, मंदिरों और सार्वजनिक भवनों की सजावट के लिए अनेक प्रकार की कलात्मक वस्तुएँ तैयार कीं। इनमें धातु, पत्थर, काँच और मिट्टी से बने कलश, पात्र, सजावटी उपकरण तथा अलंकरण सामग्री विशेष उल्लेखनीय हैं। उनके द्वारा निर्मित काँच के पात्र, पत्थर के बर्तन, मिट्टी के कलश तथा धातु की कलाकृतियाँ उच्च कोटि की शिल्प-कुशलता का परिचय देती हैं और असीरियन कला की विकसित परंपरा को प्रमाणित करती हैं।
बौद्धिक उपलब्धियाँ
असीरियन सभ्यता का प्रमुख स्वरूप सैन्यवादी था। उसका अधिकांश इतिहास युद्धों, विजय अभियानों और विशाल साम्राज्य के संचालन से जुड़ा रहा। इसी कारण उन्हें दर्शन, काव्य और स्वतंत्र साहित्य-सृजन जैसे क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम अवसर मिला। फिर भी यह मानना उचित नहीं होगा कि असीरियनों ने बौद्धिक क्षेत्र में कोई योगदान नहीं दिया। वस्तुतः कैसाइट काल में मेसोपोटामिया की सांस्कृतिक एवं बौद्धिक परंपराओं को जो क्षति पहुँची थी, उसकी आंशिक भरपाई असीरियनों ने की। उन्होंने प्राचीन सुमेरियन और बेबिलोनियन ज्ञान को सुरक्षित रखा तथा उसे आगे की पीढ़ियों तक पहुँचाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। लिपि, साहित्य, अभिलेख-लेखन, पुस्तकालय व्यवस्था, ज्योतिष, चिकित्सा तथा अभियांत्रिकी के क्षेत्रों में उनकी उपलब्धियाँ उल्लेखनीय थीं।
लिपि एवं साहित्य
असीरियनों ने बेबिलोनियन कीलाक्षर (क्यूनिफॉर्म) लिपि को अपनाकर उसमें आवश्यक संशोधन और परिष्कार किए। इससे यह लिपि अधिक व्यवस्थित तथा व्यवहारिक बनी। असीरिया में अक्कादी भाषा के अतिरिक्त सुमेरियन तथा अरामी भाषा का भी व्यापक प्रयोग होता था। विशेष रूप से अरामी भाषा प्रशासन, व्यापार तथा सामान्य व्यवहार में धीरे-धीरे महत्त्वपूर्ण बनती गई। असीरियन नगरों से अरामी भाषा के अनेक अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जो उस समय की भाषायी विविधता का प्रमाण हैं।
असीरियन साहित्य का अधिकांश भाग धार्मिक और राजकीय स्वरूप का था। इसमें देववाणियाँ, प्रार्थनाएँ, मंत्र, शकुन-विचार तथा भविष्यवाणियाँ प्रमुख थीं। असीरियन पुरोहित इन देववाणियों के आधार पर शुभ-अशुभ घटनाओं का अनुमान लगाते थे और इन्हें अत्यंत गोपनीय रखते थे। समय के साथ यही धार्मिक सामग्री राजकीय अभिलेखों का आधार बनी।
प्रारंभिक असीरियन अभिलेखों में मुख्यतः मंदिरों और भवनों के निर्माण तथा उनके समर्पण का विवरण मिलता है। बाद के काल में इन अभिलेखों का स्वरूप अधिक ऐतिहासिक हो गया। इनमें शासकों की विजयों, युद्ध अभियानों, प्रशासनिक कार्यों तथा साम्राज्य के विस्तार का क्रमबद्ध वर्णन किया जाने लगा। अनेक अभिलेखों में घटनाओं को वर्षानुसार अथवा सैन्य अभियानों के क्रम में अंकित किया गया, जिससे वे इतिहास लेखन के महत्त्वपूर्ण स्रोत बन गए।
मौलिक साहित्य की दृष्टि से असीरियन विशेष प्रसिद्ध नहीं हैं। उन्होंने स्वयं बहुत कम नए ग्रंथों की रचना की। इसके स्थान पर उन्होंने सुमेरियन और बेबिलोनियन साहित्य का संरक्षण, प्रतिलिपि-निर्माण और संकलन किया। यही उनका सबसे बड़ा साहित्यिक योगदान माना जाता है। प्रसिद्ध गिलगामेश महाकाव्य, सृष्टि की उत्पत्ति से संबंधित कथाएँ तथा अनेक प्राचीन धार्मिक आख्यान आज जिस रूप में उपलब्ध हैं, उनमें असीरियन प्रतियों का विशेष महत्त्व है। यदि इन ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ असीरिया में सुरक्षित न रखी गई होतीं, तो प्राचीन मेसोपोटामिया का बहुत-सा साहित्य सदा के लिए नष्ट हो जाता।
अशुरबनिपाल का विशाल ग्रंथागार
असीरियन बौद्धिक इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धि अशुरबनिपाल द्वारा निनेवेह में स्थापित विशाल राजकीय ग्रंथागार था। यह प्राचीन विश्व के सबसे महत्त्वपूर्ण पुस्तकालयों में गिना जाता है। इसका उद्देश्य केवल राजकीय अभिलेखों का संग्रह करना नहीं था, बल्कि प्राचीन साहित्य, धार्मिक ग्रंथों, वैज्ञानिक ज्ञान और प्रशासनिक दस्तावेजों को सुरक्षित रखना भी था।
निनेवेह के इस ग्रंथागार से लगभग 22,000 मिट्टी की तख्तियाँ प्राप्त हुई हैं। इन तख्तियों पर कीलाक्षर लिपि में विविध विषयों का ज्ञान अंकित है। ग्रंथागार की व्यवस्था अत्यंत सुविचारित थी और प्रत्येक तख्ती का विषय निर्धारित था, उनका वर्गीकरण किया गया था तथा सूची तैयार की गई थी। अनेक तख्तियों पर शीर्षक अंकित रहता था, जिससे आवश्यक सामग्री को आसानी से खोजा जा सके। कुछ तख्तियों पर स्वयं अशुरबनिपाल की राजमुद्रा अंकित थी तथा यह चेतावनी भी लिखी रहती थी कि उन्हें चुराने या नष्ट करने वाले को कठोर दंड दिया जाएगा।
इस ग्रंथागार में साहित्यिक रचनाओं के साथ-साथ राजकीय अभिलेख, धार्मिक अनुष्ठानों का विवरण, भविष्यवाणियाँ, औषधियों की सूचियाँ, रोगों का वर्णन, प्रार्थनाएँ, मंत्र, ज्योतिष संबंधी ग्रंथ तथा प्रशासनिक अभिलेख सुरक्षित थे। इस प्रकार यह केवल पुस्तकालय नहीं, बल्कि प्राचीन ज्ञान का विशाल भंडार था।
विज्ञान एवं ज्ञान-विज्ञान
असीरियन सभ्यता में विज्ञान का विकास मुख्यतः व्यावहारिक आवश्यकताओं के आधार पर हुआ। निरंतर युद्धों और विशाल साम्राज्य के संचालन के कारण युद्ध-विज्ञान, अभियांत्रिकी तथा चिकित्सा को विशेष महत्त्व मिला। यद्यपि गणित और खगोल विज्ञान में उन्होंने बेबिलोनियनों की परंपराओं का अनुसरण किया, फिर भी इन विषयों के संरक्षण और विकास में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।
गणित के क्षेत्र में उन्होंने वृत्त को 360 अंशों में विभाजित करने की परंपरा को अपनाया तथा अक्षांश और देशांतर की अवधारणा का भी उपयोग किया। इस ज्ञान का प्रयोग ज्योतिषीय गणनाओं और समय निर्धारण में किया जाता था।
अंधविश्वास और शकुन-विचार की प्रबलता के कारण असीरिया में ज्योतिष का विशेष विकास हुआ। राजदरबार में ऐसे विद्वान नियुक्त किए जाते थे, जो ग्रहों, नक्षत्रों और आकाशीय घटनाओं का नियमित निरीक्षण करते थे। उन्होंने पाँच प्रमुख ग्रहों की पहचान की तथा सूर्य और चंद्र ग्रहण संबंधी प्रारंभिक जानकारी भी प्राप्त कर ली थी। अशुरबनिपाल स्वयं ज्योतिष और शकुन-विचार में रुचि रखता था तथा पुरोहितों के साथ बैठकर इनका अध्ययन करता था।
चिकित्सा एवं प्राकृतिक विज्ञान
विशाल सेना के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए चिकित्सा-विज्ञान का विकास आवश्यक था। असीरियनों ने औषधीय पौधों की विस्तृत सूचियाँ तैयार कीं तथा उनके औषधीय उपयोग का ज्ञान संकलित किया। इससे वनस्पति विज्ञान के प्रारंभिक विकास को प्रोत्साहन मिला। बाद में यूनानी विद्वानों ने भी इस ज्ञान का लाभ उठाया।
असीरियनों को मानव शरीर की संरचना तथा अनेक रोगों के लक्षणों का पर्याप्त ज्ञान था। वे अनेक रोगों को प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न मानते थे, जो उस समय के लिए एक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक दृष्टिकोण था। फिर भी वे रोगों के उपचार में औषधियों के साथ-साथ मंत्र, तंत्र, तावीज़ और धार्मिक अनुष्ठानों का भी सहारा लेते थे। उनका विश्वास था कि रोगों के पीछे दुष्ट आत्माओं या अदृश्य शक्तियों का प्रभाव हो सकता है और धार्मिक विधियों से उन्हें दूर किया जा सकता है।
रसायन संबंधी प्रारंभिक ज्ञान का उपयोग वे मुख्यतः चमड़ा उद्योग, धातु-कर्म तथा मीनाकारी जैसी कलाओं में करते थे। विभिन्न धातुओं और रंगों के निर्माण तथा संरक्षण में रासायनिक प्रक्रियाओं का प्रयोग किया जाता था।
अभियांत्रिकी एवं तकनीकी ज्ञान
असीरियनों की अभियांत्रिकी कला अत्यंत विकसित थी। उन्होंने दुर्गों, सड़कों, पुलों, सिंचाई नहरों तथा जल-प्रबंधन की प्रभावशाली योजनाएँ विकसित कीं। उनका सबसे उल्लेखनीय तकनीकी कार्य सेनैकेरिब के शासनकाल में निर्मित कृत्रिम जलमार्ग था। इस जल-प्रणाली द्वारा लगभग 48 किलोमीटर दूर से निनेवेह तक जल पहुँचाया जाता था। मार्ग में एक स्थान पर जल को नदी के ऊपर से ले जाने के लिए पत्थर का विशाल जलसेतु (एक्वाडक्ट) बनाया गया था। यह उस समय की अभियांत्रिकी दक्षता का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
असीरियनों ने सैन्य अभियांत्रिकी में भी उल्लेखनीय प्रगति की। उन्होंने दुर्ग-भेदन यंत्र, घेराबंदी उपकरण, सुदृढ़ रथ, पुल निर्माण की तकनीक तथा संगठित सैन्य परिवहन व्यवस्था विकसित की। इन तकनीकों ने उनके साम्राज्य विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और बाद की अनेक सभ्यताओं ने भी उनसे प्रेरणा प्राप्त की।
असीरियन सभ्यता की महत्ता एवं देन
असीरियन सभ्यता प्राचीन पश्चिमी एशिया की अत्यंत महत्त्वपूर्ण सभ्यताओं में से एक थी। जिस प्रकार सुमेरियन सभ्यता ने मेसोपोटामिया की सांस्कृतिक परंपरा की आधारशिला रखी और बेबिलोनियनों ने उसका विकास किया, उसी प्रकार असीरियनों ने इस परंपरा का संरक्षण, संवर्धन और विस्तार किया। कैसाइट शासन के बाद बेबिलोनियन संस्कृति को जो क्षति पहुँची थी, उसकी भरपाई असीरियनों ने की। उन्होंने बेबिलोन की लिपि, साहित्य, धर्म, प्रशासन और विधि-व्यवस्था को अपनाकर उन्हें सुरक्षित रखा तथा समयानुकूल सुधार भी किए। अशुरबनिपाल का निनेवेह स्थित विशाल ग्रंथागार इस सांस्कृतिक संरक्षण का सर्वोत्तम उदाहरण है। इसी कारण प्राचीन मेसोपोटामिया के अनेक साहित्यिक और ऐतिहासिक ग्रंथ आज उपलब्ध हैं।
असीरियनों की सबसे बड़ी उपलब्धि उनका संगठित सैन्य संगठन और विशाल साम्राज्य की स्थापना थी। उन्होंने स्थायी, अनुशासित और सुव्यवस्थित सेना का विकास किया तथा प्रांतों के माध्यम से साम्राज्य का प्रभावी प्रशासन स्थापित किया। उनकी सैन्य रणनीति, प्रांतीय शासन व्यवस्था, गुप्तचर तंत्र और प्रशासनिक संगठन ने बाद के पारसी (आकेमेनिड) तथा अन्य साम्राज्यों को गहराई से प्रभावित किया। इस प्रकार असीरिया ने प्राचीन विश्व में संगठित साम्राज्य की अवधारणा को व्यावहारिक रूप प्रदान किया।
असीरियनों ने लिपि, साहित्य, कानून, धर्म और प्रशासन के क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होंने प्राचीन ग्रंथों, अभिलेखों और धार्मिक साहित्य का संरक्षण कर मेसोपोटामिया की सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखा। कुछ इतिहासकारों का मत है कि असीरियन धार्मिक धारणाओं और राजनीतिक परंपराओं का प्रभाव बाद के हिब्रू समाज पर भी पड़ा। भारतीय साहित्य में प्रयुक्त ‘अश्शूर’ शब्द और असीरिया के ‘अशुर’ देवता के बीच संबंध का उल्लेख कुछ विद्वानों ने किया है, किंतु इस विषय में कोई सर्वमान्य ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे केवल एक विद्वत् मत के रूप में ही स्वीकार किया जाता है।
असीरियन वास्तुकला अपनी भव्यता, विशाल राजमहलों, दुर्गों, मंदिरों और अलंकृत प्रवेशद्वारों के लिए प्रसिद्ध थी। उनकी मूर्तिकला और उत्कीर्ण शिल्प, विशेषकर सिंह और पंखयुक्त वृषभ की विशाल प्रतिमाएँ, प्राचीन कला की उत्कृष्ट कृतियाँ मानी जाती हैं। उनकी स्थापत्य शैली का प्रभाव बाद की पारसी कला पर स्पष्ट दिखाई देता है। कुछ विद्वानों ने मौर्यकालीन कला में भी इसके अप्रत्यक्ष प्रभाव की संभावना व्यक्त की है, यद्यपि इस विषय में मतभेद हैं। इसके अतिरिक्त असीरियनों ने ज्योतिष, चिकित्सा, अभियांत्रिकी तथा प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण प्रगति की। उनके खगोलीय अध्ययन, औषधीय ज्ञान और अभिलेखों ने आगे चलकर यूनानी विद्वानों को भी प्रेरित किया तथा प्राचीन विश्व की वैज्ञानिक परंपरा को समृद्ध बनाया।




