सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement)

सविनय अवज्ञा आंदोलन : नमक सत्याग्रह
सविनय अवज्ञा आंदोलन : नमक सत्याग्रह मुख्य लेख : भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन सविनय अवज्ञा आंदोलन […]

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सविनय अवज्ञा आंदोलन : नमक सत्याग्रह

मुख्य लेख : भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन

सविनय अवज्ञा आंदोलन गांधीजी के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्तर पर चलाया गया दूसरा प्रमुख जनआंदोलन था, जिसकी शुरुआत 12 मार्च 1930 ईस्वी को साबरमती आश्रम से दांडी तक ऐतिहासिक नमक यात्रा (दांडी मार्च) के साथ हुई। गांधीजी ने अपने 78 साथियों के साथ लगभग 385 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर 6 अप्रैल 1930 ईस्वी को दांडी पहुँचकर नमक बनाकर ब्रिटिश सरकार के नमक कानून का उल्लंघन किया। आंदोलन का उद्देश्य अन्यायपूर्ण औपनिवेशिक कानूनों का अहिंसक ढंग से उल्लंघन कर ब्रिटिश शासन को चुनौती देना था। इसके अंतर्गत नमक कानून तोड़ने के साथ-साथ वन कानूनों का उल्लंघन, करों का बहिष्कार, विदेशी वस्त्रों एवं शराब की दुकानों का बहिष्कार, खादी और स्वदेशी वस्तुओं का प्रचार तथा सरकारी संस्थाओं से असहयोग जैसे कार्यक्रम चलाए गए। इस आंदोलन में किसानों, मजदूरों, विद्यार्थियों, आदिवासियों और विशेष रूप से महिलाओं ने व्यापक भागीदारी की। इसकी पृष्ठभूमि में 1929 की आर्थिक महामंदी, विश्वभर में बढ़ती समाजवादी विचारधारा और भारत में पूर्ण स्वराज्य की बढ़ती मांग जैसे कारक भी महत्त्वपूर्ण थे।

नमक सत्याग्रह की पृष्ठभूमि

1928 ईस्वी में गांधीजी सक्रिय राजनीति में वापस लौट आए और दिसंबर 1928 ईस्वी में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में सम्मिलित हुए। इस समय कांग्रेस का पहला काम जुझारू वामपंथ से तालमेल स्थापित करना था। गांधीजी ने एक समझौता-प्रस्ताव सामने रखा, जिसमें नेहरू रिपोर्ट को स्वीकार किया गया था और यह कहा गया था कि यदि सरकार 31 दिसंबर 1930 ईस्वी तक उसे स्वीकार नहीं करती, तो कांग्रेस पूर्ण स्वाधीनता पाने के लिए एक असहयोग आंदोलन चलाएगी। किंतु जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस के दबाव में इस समय-सीमा को घटाकर 1929 ईस्वी तक कर दिया गया। इसमें महत्त्वपूर्ण बात यह हुई कि कांग्रेस ने प्रतिबद्धता जाहिर की कि डोमिनियन स्टेट्स पर आधारित संविधान को यदि सरकार ने एक साल के अंदर तक स्वीकार नहीं किया, तो कांग्रेस न सिर्फ ‘पूर्ण स्वराज्य’ को अपना लक्ष्य घोषित करेगी, बल्कि इस लक्ष्य के लिए वह सविनय अवज्ञा आंदोलन भी चलाएगी। इस आशय का एक प्रस्ताव रखा गया, जिसका सदस्यों के बहुमत ने समर्थन किया और पूर्ण स्वराज्य के पक्ष में पेश किए गए संशोधन के प्रस्ताव स्वीकार नहीं किए गए। इसके साथ ही गांधीजी ने एक विस्तृत रचनात्मक कार्यक्रम का प्रस्ताव भी पारित कराया, जिसमें संगठन-कार्य का दोबारा आरंभ, छुआछूत का अंत, विदेशी कपड़ों का बहिष्कार, खादी का प्रचार-प्रसार, निग्रह, ग्राम-पुनर्निर्माण और स्त्रियों की निर्योग्यताओं की समाप्ति शामिल थे, किंतु इसमें हिंदू-मुस्लिम एकता जैसे अहम मुद्दे का कोई उल्लेख नहीं था।

गांधीजी की यात्राएँ

गांधीजी जेल से छूटने के बाद से ही देश में यात्राएँ कर जनता को संघर्ष के लिए तैयार करते आ रहे थे। 1929 ईस्वी के शुरू तक वह काठियावाड़, मध्य भारत, बंगाल, मलाबार, त्रावणकोर, बिहार, संयुक्त प्रांत, कच्छ, असम, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और उड़ीसा आदि की यात्राएँ कर चुके थे। 1929 ईस्वी में उन्होंने सिंध, दिल्ली, कलकत्ता, बर्मा, संयुक्त प्रांत के पहाड़ी और मैदानी इलाकों का दौरा किया और साल के अंत में लाहौर के ऐतिहासिक कांग्रेस सम्मेलन में हिस्सा लिया।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में गांधीजी का आगमन (Gandhiji's Arrival in the Indian National Movement)
गांधीजी

विदेशी कपड़ों का बहिष्कार

1929 ईस्वी के पूर्व की यात्राओं में गांधीजी रचनात्मक कार्यों पर जोर देते आ रहे थे, किंतु अब वे जनता को सीधी कार्रवाई के लिए तैयार करने लगे। उन्होंने सिंध में नौजवानों को ‘अग्नि परीक्षा’ के लिए तैयार रहने को कहा। गांधीजी के कहने पर ही कांग्रेस कार्यसमिति ने एक ‘विदेशी कपड़ा बहिष्कार समिति’ का गठन किया। कलकत्ता में 4 मार्च 1929 ईस्वी को हजारों की भीड़ के सामने विदेशी कपड़ों में आग लगाकर विदेशी कपड़ों के बहिष्कार का श्रीगणेश किया गया।

मजदूर नेताओं की गिरफ्तारी

कांग्रेस की इन तैयारियों के अतिरिक्त कुछ दूसरी घटनाओं ने भी 1929 ईस्वी में राजनीतिक सरगर्मी को बनाए रखा। 20 मार्च 1929 ईस्वी को एक ही झटके में सरकार ने प्रसिद्ध मीरट षड्यंत्र केस के अंतर्गत 31 मजदूर नेताओं को गिरफ्तार कर लिया, जिसमें अधिकतर कम्युनिस्ट थे। इस गिरफ्तारी की सभी ने निंदा की, जिसमें कांग्रेस के अनेक नेता और गांधीजी स्वयं शामिल थे। हिसप्रस (हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन) के भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त 8 अप्रैल 1929 ईस्वी को केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकने के बाद गिरफ्तार कर लिए गए थे। जेल में हिस्प्रस के सदस्यों ने बेहतर सलूक किए जाने को लेकर भूख हड़ताल की। इस भूख हड़ताल के 63वें दिन 13 सितंबर 1929 ईस्वी को कैदी जतीन दास (जतीन्द्रनाथ दास) की लाहौर जेल में मौत हो गई, जिसके कारण पूरे देश में अभूतपूर्व प्रदर्शन हुए।

इंग्लैंड में मजदूर दल की सरकार

इस दौरान मई 1929 ईस्वी में इंग्लैंड में रैम्जे मैकडोनाल्ड के नेतृत्व में मजदूर दल की सरकार सत्ता में आई। सरकार से विचार-विमर्श के बाद वायसरॉय लॉर्ड इरविन ने वादा किया कि जैसे ही साइमन आयोग की रिपोर्ट आएगी, डोमिनियन स्टेट्स जैसे मुद्दों पर विचार के लिए एक गोलमेज सम्मेलन बुलाया जाएगा। भारत के राष्ट्रीय नेताओं ने एक घोषणा-पत्र (दिल्ली घोषणा-पत्र) जारी किया, जिसमें माँग की गई कि यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि गोलमेज सम्मेलन में इस बात पर विचार-विमर्श नहीं होगा कि किस समय डोमिनियन स्टेट्स दिया जाए, बल्कि इस बैठक में इसे लागू करने की योजना बनाई जानी चाहिए। 5 नवंबर 1929 ईस्वी को हाउस ऑफ लॉर्ड्स में इस पर बहस हो चुकी थी, जिसके कारण अंग्रेजों की नियत पर पहले से ही संदेह था। अंततः 23 दिसंबर को इरविन ने स्वयं गांधीजी और उनके सहयोगियों को बता दिया कि वह उनकी मांगों के संबंध में कोई आश्वासन देने की स्थिति में नहीं हैं। इससे बातचीत का दौर समाप्त हो गया और संघर्ष का दौर आरंभ हो गया।

विश्वव्यापी आर्थिक मंदी

1920 के दशक के अंत में निर्यातमुखी उपनिवेशी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा संकट आर्थिक मंदी के रूप में सामने आया। इस विश्वव्यापी आर्थिक संकट का मुख्य कारण अमेरिका के शेयर बाजार में 24 अक्टूबर 1929 ईस्वी (‘ब्लैक थर्सडे’) से आने वाली मंदी थी, जो आगे चलकर विश्वव्यापी महामंदी में परिवर्तित हो गई। इस मंदी ने उद्योगों के साथ-साथ कृषि को भी अपनी चपेट में ले लिया। अमेरिकी पूँजीपतियों ने अनाज और तैयार मालों को नष्ट कर मूल्यों को स्थिर रखने का प्रयास किया, जबकि अमेरिका के नागरिक भूख की यातनाएँ झेल रहे थे। ब्रिटेन, फ्रांस, डेनमार्क, नीदरलैंड और जापान की सरकारों ने भी यही नीति अपनाई; साथ ही, उन्होंने अपने आर्थिक संकट का बोझ अपने-अपने उपनिवेशों पर भी लाद दिया।

इस विश्व आर्थिक संकट का प्रभाव भारत पर भी पड़ा, जिससे बहुत से पूँजीपति बर्बाद हो गए और किसानों का दिवाला निकल गया। कृषि-उत्पादन, अनाजों, पटसन, कपास, चाय और कॉफी के दामों में तेजी से गिरावट आई, लेकिन ब्रिटिश पूँजीपतियों ने अपने तैयार मालों के दामों में कमी नहीं आने दी। भारतीय उद्योगों के अनेक मालिक, विशेष रूप से पश्चिमी भारत के सूती कपड़ा मिल-मालिक थे, जिनकी सहनशक्ति मंदी और सस्ते जापानी कपड़ों की प्रतियोगिता के कारण जवाब देने लगी थी। 1930 ईस्वी की गर्मियों तक बंबई के मिल-मालिकों के पास अनबिका माल रिकॉर्ड मात्रा में मौजूद था- 1,20,000 गट्ठर कपड़े और 19,000 गट्ठर धागे। अब अनेक पूँजीपति चाहते थे कि वे अपनी लड़ाई लड़ने के लिए कांग्रेस के साथ खड़े हों। पूँजीपति वर्ग को अपनी ओर खींचने के लिए कांग्रेस भी उनकी अनेक मांगों का समर्थन करने लगी थी। यद्यपि साम्यवादियों के प्रभाव से औद्योगिक मजदूर वर्ग भी एकजुट और जागरूक हो रहा था और 1928-29 ईस्वी भारत में श्रमिक असंतोष का चरमकाल था, किंतु सरकार के दमनात्मक हमलों (जैसे मीरट षड्यंत्र केस की गिरफ्तारियों) के कारण 1930 ईस्वी तक कम्युनिस्टों का प्रभाव घटने लगा था।

भारतीय किसानों की दयनीय दशा

भारतीय किसानों की दशा भी बहुत दयनीय हो गई थी, लेकिन उनके लगान-करों और टैक्सों में कोई कमी नहीं की गई। ऐसी विवशता में कर्जों की अदायगी एक समस्या बन गई, क्योंकि सूदखोर अपनी पूँजी वापस पाने के लिए अधिक उत्सुक थे। अनेक क्षेत्रों में ग्रामीण ऋणों का प्रवाह बंद हो गया और खेती जारी रखने के लिए किसानों को विवश होकर अपनी जमीनों के कुछ टुकड़े बेचने पड़े। इसलिए कांग्रेस के अंदर और बाहर भी बार-बार की तबाही और खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट के कारण लगान में कमी, बेदखली से सुरक्षा और कर्ज में राहत के लिए किसान आंदोलन उठ खड़े हो गए थे।

नाजीवाद और फासीवाद का उदय

इसी वैश्विक मंदी के कारण ही जर्मनी में नाजीवादी तानाशाह हिटलर और इटली में फासीवादी तानाशाह मुसोलिनी का उदय हुआ। इसी दौर में जर्मनी ने चेकोस्लोवाकिया पर, इटली ने अबीसीनिया (इथियोपिया) पर और जापान ने चीन पर आक्रमण कर अपने-अपने साम्राज्यवाद का विस्तार करना प्रारंभ कर दिया। इसी के साथ-साथ यूरोप के उपनिवेशों में या पराधीन देशों- चीन, इंडोनेशिया, हिंद-चीन, बर्मा और फिलीपींस के साथ-साथ भारत में भी साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष तेज हो गया। भारत में इस साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष की अभिव्यक्ति कांग्रेस द्वारा महात्मा गांधीजी के नेतृत्व में चलाए गए नागरिक अवज्ञा आंदोलन के रूप में हुई।

लाहौर अधिवेशन और प्रथम स्वतंत्रता दिवस

1929 ईस्वी में दिसंबर के अंत में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लाहौर में हुआ और वामपंथी रुझान वाले जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। जवाहरलाल नेहरू ने 1912 ईस्वी में पहली बार कांग्रेस के बांकीपुर अधिवेशन में भाग लिया था। वे पहली बार 1921 ईस्वी में असहयोग आंदोलन के दौरान जेल गए थे। ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू ने घोषणा की : “हम भारत की पूर्ण स्वाधीनता के पक्ष में हैं, आज हमारा सिर्फ एक लक्ष्य है- ‘पूर्ण स्वराज्य’।” 31 दिसंबर 1929 ईस्वी को रात के बारह बजे पंडाल से बाहर निकलकर पूर्ण स्वाधीनता का नया-नया स्वीकृत तिरंगा झंडा लहराया गया और 26 जनवरी 1930 ईस्वी को ‘प्रथम स्वतंत्रता दिवस’ घोषित किया गया। उसके बाद हर साल 26 जनवरी को ‘स्वाधीनता दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा, जब लोग यह शपथ लेते थे : “ब्रिटिश शासन की अधीनता अब और आगे स्वीकार करना मानवता और ईश्वर के प्रति अपराध होगा।” इस अधिवेशन में एक नागरिक अवज्ञा आंदोलन छेड़ने की घोषणा भी की गई, लेकिन संघर्ष का कोई कार्यक्रम नहीं तैयार किया गया। यह काम गांधीजी पर छोड़ दिया गया और पूरे कांग्रेस संगठन को गांधी के अधीन कर दिया गया। गांधीजी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन एक बार फिर सरकार के मुकाबले खड़ा हुआ। देश अब एक बार फिर आशा, उल्लास और मुक्त होने की दृढ़ भावना से भर उठा।

कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन

इस प्रकार साइमन आयोग की नियुक्ति, नेहरू रिपोर्ट की असफलता, वैश्विक मंदी और लाहौर कांग्रेस में स्वाधीनता के प्रस्ताव जैसे अनेक कारणों से नागरिक अवज्ञा आंदोलन-संबंधी घटनाएँ तेज हो गई थीं। कांग्रेस की कार्यकारिणी ने 1929 ईस्वी के लाहौर कांग्रेस में गांधीजी को यह अधिकार दिया था कि वे देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करेंगे। आंदोलन शुरू करने से पहले गांधीजी ने वायसरॉय लॉर्ड इरविन से बात की, किंतु उसने उनकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। इसके बाद गांधीजी ने ‘यंग इंडिया’ में एक लेख प्रकाशित कर इरविन और रैम्जे मैकडोनाल्ड के समक्ष एक चेतावनी भरा ग्यारह सूत्री माँग-पत्र प्रस्तुत किया। यह एक समझौता सूत्र था जिसमें वर्गीकरण के अनुसार छह आम हित के मुद्दे शामिल थे, जैसे- सैन्य-खर्च और सिविल सेवाओं के वेतनमानों में कमी, पूर्ण नशाबंदी, उन राजनीतिक कैदियों की रिहाई जिन्हें हत्या का दंड नहीं मिला है, सी.आई.डी. में सुधार और उस पर जन-नियंत्रण तथा हथियार कानून में परिवर्तन; तीन विशिष्ट पूँजीवादी माँगें, जैसे- रुपया और स्टर्लिंग की विनिमय दर को घटाकर 1 शिलिंग 4 पेंस तक लाना, विदेशी कपड़ों पर संरक्षणमूलक शुल्क और तटीय जहाजरानी का भारतीय जहाजरानी कंपनियों के लिए आरक्षण और दो बुनियादी तौर पर किसानों के विषय, जैसे- मालगुजारी में 50 प्रतिशत की कमी और उस पर विधायिका का नियंत्रण तथा नमक कर का और नमक पर सरकार के एकाधिकार का उन्मूलन। यह राजनीतिक जनमत की एक व्यापक श्रेणी को आकर्षित करने और भारतवासियों को फिर से एक राजनीतिक नेतृत्व की छत्रछाया में एकजुट करने के लिए एक मिला-जुला पैकेज था, जिसे गांधी ने स्वतंत्रता की अमूर्त धारणा को कुछ विशेष शिकायतों से जोड़ दिया था। इन मांगों को स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए 31 जनवरी 1930 ईस्वी तक का समय दिया गया था।

सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement)
लाहौर अधिवेशन और प्रथम स्वतंत्रता दिवस

ब्रिटिश सरकार ने गांधीजी के इस माँग-पत्र पर कोई विचार नहीं किया, इसलिए 14 फरवरी 1930 ईस्वी को साबरमती में कांग्रेस कार्यसमिति की एक बैठक में गांधीजी के नेतृत्व में नागरिक अवज्ञा आंदोलन को चलाने का फैसला किया गया। इस आंदोलन का उद्देश्य कुछ विशिष्ट प्रकार के सामूहिक रूप से गैर-कानूनी कार्य करके ब्रिटिश सरकार को झुकाना था। यह निर्णय गांधी पर छोड़ दिया गया कि नागरिक अवज्ञा आंदोलन किस मुद्दे को लेकर, कब और कहाँ से शुरू किया जाए।

आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा: नमक

फरवरी 1930 ईस्वी के अंत में गांधीजी ने नमक पर एकाधिकार के मुद्दे को नागरिक अवज्ञा आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा बनाने का फैसला किया, जो उनकी कुशल समझदारी और दूरदर्शिता का एक उत्कृष्ट उदाहरण था। नमक पर राज्य का एकाधिपत्य बहुत अलोकप्रिय था। प्रत्येक भारतीय के घर में नमक का प्रयोग अपरिहार्य रूप से होता था, किंतु उन्हें घरेलू प्रयोग के लिए भी नमक बनाने से रोक दिया गया था और इस तरह उन्हें दुकानों से ऊँचे दाम पर नमक खरीदने के लिए बाध्य होना पड़ रहा था। गांधीजी ने कहा : “पानी से पृथक नमक नाम की कोई चीज़ नहीं है, जिस पर ‘कर’ लगाकर सरकार करोड़ों लोगों को भूखा मार सकती है तथा असहाय, बीमार और विकलांगों को पीड़ित कर सकती है। इसलिए यह कर अत्यंत अविवेकपूर्ण एवं अमानवीय है।” वस्तुतः नमक कर वाली शिकायत अनेक कारणों से बहुत महत्त्वपूर्ण थी। वह जनता के सभी वर्गों को प्रभावित करती थी और इसका कोई विभाजक निहितार्थ नहीं था। वह सरकार के खजाने या किसी निहित स्वार्थ के लिए कोई खतरा नहीं थी, इसलिए यह न तो गैर-कांग्रेसी राजनीतिक तत्त्वों को नाराज करती थी और न ही सरकारी दमन को न्योता देती थी। आखिरी बात यह कि इसे बेहद भावनात्मक बनाया जा सकता था और इसका भारी प्रचार मूल्य था। इस प्रकार नमक को मुद्दा बनाते हुए गांधीजी ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ व्यापक असंतोष को संगठित करने की योजना बनाई। अधिकांश भारतीयों को गांधीजी की इस चुनौती का महत्त्व समझ में आ गया था, किंतु ब्रिटिश सरकार इसके महत्त्व को समझने में चूक गई।

दांडी मार्च

सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने के पूर्व 2 मार्च 1930 ईस्वी को गांधीजी ने वायसरॉय को एक पत्र लिखा कि यदि सरकार उनकी मांगों को पूरा करने का कोई प्रयास नहीं करेगी, तो 12 मार्च को वे नमक-कानून का उल्लंघन करेंगे। इरविन कोई समझौता करने के पक्ष में नहीं थे, इसलिए गांधीजी ने नागरिक (सविनय) अवज्ञा आंदोलन आरंभ करने के लिए 12 मार्च 1930 ईस्वी को ऐतिहासिक दांडी मार्च की शुरुआत की। उस दिन गांधीजी चुने हुए अपने 78 समर्थकों को साथ लेकर साबरमती आश्रम से चले और लगभग 385 किलोमीटर दूर गुजरात के समुद्रतट पर स्थित दांडी गाँव पहुँचे। यह यात्रा 24 दिनों तक चली और प्रतिदिन औसतन 15-16 किलोमीटर की दूरी तय की जाती थी। उनकी यात्रा, उनके भाषणों तथा जनता पर उनके प्रभाव की खबरें प्रतिदिन समाचार-पत्रों में छपती रहीं। पुलिस अधिकारियों द्वारा भेजी गई गोपनीय रिपोर्टों से पता चलता है कि रास्ते में पड़ने वाले गाँवों के सैकड़ों अधिकारियों ने गांधीजी के आह्वान पर अपने पदों से त्यागपत्र दे दिया था। रास्ते में ‘वसना’ गाँव में गांधीजी ने ऊँची जाति वालों को संबोधित करते हुए कहा था : “यदि आप स्वराज्य के हक में आवाज उठाते हैं, तो आपको अछूतों की सेवा करनी पड़ेगी। सिर्फ नमक-कर या अन्य करों के खत्म हो जाने से आपको स्वराज्य नहीं मिल जाएगा। स्वराज्य के लिए आपको अपनी उन गलतियों का प्रायश्चित करना होगा, जो आपने अछूतों के साथ की हैं। स्वराज्य के लिए हिंदू, मुसलमान, पारसी और सिख, सबको एकजुट होना पड़ेगा। यही स्वराज्य की सीढ़ियाँ हैं।” पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि गांधी की सभाओं में तमाम जातियों के पुरुष-महिलाएँ शामिल हो रहे हैं। हजारों वॉलंटियर राष्ट्रवादी उद्देश्य के लिए सामने आ रहे हैं। उनमें से बहुत सारे ऐसे सरकारी अधिकारी थे जो औपनिवेशिक शासन में अपने पदों से इस्तीफा दे चुके थे। जिला पुलिस अधीक्षक ने भी लिखा था कि श्री गांधी शांत और निश्चिंत दिखाई दिए। वे जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे हैं, उनकी ताकत बढ़ती जा रही है।

नमक-यात्रा की प्रगति को एक और तरीके से भी समझा जा सकता है। अमेरिकी समाचार पत्रिका ‘टाइम’ को गांधी की कद-काठी पर हँसी आई थी। पत्रिका ने उनके तकुए जैसे शरीर और मकड़ी जैसे पैरों का खूब मज़ाक उड़ाया था। अपनी पहली रिपोर्ट में ही ‘टाइम’ ने नमक यात्रा के मंजिल तक पहुँचने पर अपनी गहरी शंका व्यक्त कर दी थी। उसने दावा किया कि दूसरे दिन पैदल चलने के बाद गांधी जमीन पर पसर गए थे। पत्रिका को इस बात पर विश्वास नहीं था कि इस मरियल साधु के शरीर में आगे जाने की ताकत बची है, किंतु एक रात में ही पत्रिका की सोच बदल गई। ‘टाइम’ ने लिखा कि इस यात्रा को जो भारी जन-समर्थन मिल रहा है, उसने अंग्रेज शासकों को बेचैन कर दिया है। अब वे भी गांधी को ऐसा साधु और जननेता कहकर सलामी देने लगे हैं जो ईसाई धर्मावलंबियों के खिलाफ ईसाई तरीकों का ही हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।

नागरिक अवज्ञा आंदोलन का शुभारंभ

गांधीजी 6 अप्रैल को दांडी पहुँचे, वहाँ उन्होंने समुद्रतट से मुट्ठीभर नमक उठाया और नमक-कानून को तोड़कर नागरिक अवज्ञा आंदोलन का शुभारंभ किया। यह इस बात का प्रतीक था कि भारतीय जनता अब ब्रिटिश कानूनों और ब्रिटिश शासन के अंतर्गत जीने के लिए तैयार नहीं है। सुभाषचंद्र बोस ने गांधी के दांडी मार्च की तुलना एल्बा द्वीप से लौटने पर नेपोलियन के पेरिस मार्च और राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के लिए मुसोलिनी के रोम मार्च से की है। नमक-कानून को तोड़ने के अवसर पर गांधीजी ने घोषणा की : “ब्रिटिश शासन ने इस देश को नैतिक, भौतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विनाश के कगार पर पहुँचा दिया है। मैं इस शासन को एक अभिशाप मानता हूँ। मैं इस शासन प्रणाली को नष्ट करने पर आमादा हूँ……अब राजद्रोह मेरा धर्म बन चुका है। हमारा संघर्ष एक अहिंसक युद्ध है। हम किसी की हत्या नहीं करेंगे, मगर इस शासनरूपी अभिशाप को नष्ट होते देखना हमारा धर्म है।”

सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement)
सविनय अवज्ञा आंदोलन का आरंभ

9 अप्रैल को गांधीजी ने एक निर्देश जारी किया और जनता से अपील की कि जहाँ कहीं भी संभव हो, नमक-कानून तोड़कर नमक तैयार किया जाए और शराब, विदेशी कपड़ों की दुकानों तथा अफीम के ठेकों के सामने धरने दिए जाएँ। यदि संभव हो, तो करों की अदायगी भी रोकी जाए, न्यायालयों का बहिष्कार किया जाए, सरकारी पदों से इस्तीफा दे दिया जाए और चरखा चलाकर सूत बनाया जाए। छात्र सरकारी स्कूलों और कॉलेजों का बहिष्कार करें, स्थानीय नेता अहिंसा बनाए रखने में सहयोग करें। इन सभी कार्यक्रमों में सत्य और अहिंसा को सर्वोपरि रखा जाए, तभी हमें पूर्ण स्वराज्य की प्राप्ति हो सकती है।

नमक सत्याग्रह का विस्तार

एक बार जब गांधीजी ने दांडी में नमक-कानून तोड़कर इसकी शुरुआत कर दी, तो पूरे देश में नमक-कानून तोड़ने का सत्याग्रह प्रारंभ हो गया। भारतीय जनता ने नमक-कानून के उल्लंघन को ब्रिटिश कानूनों के विरोध और साम्राज्यवाद की समाप्ति के प्रयासों के प्रतीक के रूप में देखा। देश के अनेक भागों में समानांतर नमक-यात्राएँ आयोजित की गईं और नमक-कानून तोड़े गए। सी. राजगोपालाचारी ने त्रिचनापल्ली से वेदारण्यम तक की यात्रा की। मलाबार में वायकोम सत्याग्रह के नायकों के. केलप्पन और टी.के. माधवन ने नमक कानून तोड़ने के लिए कालीकट से पयन्नूर तक की यात्रा की। असम में लोगों ने नमक बनाने के लिए सिलहट से बंगाल के नोआखली समुद्रतट तक की यात्रा की। आंध्र प्रदेश के विभिन्न जिलों में नमक सत्याग्रह के मुख्यालय के रूप में ‘शिविरम’ स्थापित किए गए। नमक कानून भंग करने पर सरकार गांधीजी को गिरफ्तार करने में असफल रही। स्थानीय नेताओं ने इसे अपने पक्ष में इस्तेमाल किया और लोगों को समझाया : “हम लोगों से सरकार भयभीत हो गई है।” 14 अप्रैल को जवाहरलाल नेहरू गिरफ्तार कर लिए गए। इसके प्रतिरोध में कलकत्ता, मद्रास और कराची जैसे नगरों में उग्र प्रदर्शन हुए और प्रदर्शनकारियों की विशाल भीड़ और पुलिस के बीच टकराव हुए।

वायसरॉय के आदेश पर 4 मई 1930 ईस्वी को गांधीजी भी गिरफ्तार कर लिए गए, क्योंकि उन्होंने ऐलान किया था कि वे धरासना नमक कारखाने पर अभियान जारी रखेंगे। किंतु इसका परिणाम उल्टा हुआ और आंदोलन ने भयंकर विद्रोह का रूप धारण कर लिया। गांधीजी की गिरफ्तारी के विरोध में बंबई में लाखों की भीड़ सड़कों और गलियों में निकल आई। इसमें रेलवे और सूती मिलों में काम करने वाले मजदूर हजारों की संख्या में थे। कपड़ा व्यापारियों ने छह दिन की हड़ताल रखी। दिल्ली और कलकत्ता में पुलिस के साथ टकराव हुए और गोली भी चली। किंतु महाराष्ट्र के शोलापुर में इसकी प्रतिक्रिया सबसे उग्र थी। 7 मई को हजारों मिल-मजदूर काम छोड़कर प्रदर्शनकारियों से मिल गए और घूम-घूमकर शहर की सरकारी इमारतों और अन्य सरकारी ठिकानों में तोड़फोड़ की। 8 मई को पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच भीषण संघर्ष हुआ, जिसमें अनेक लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए। मजदूरों ने शहर पर कब्जा कर लिया और लगभग एक समानांतर सरकार कायम कर ली, जो 16 मई को मार्शल लॉ लागू होने तक बनी रही।

गिरफ्तारी से पूर्व गांधीजी ने जोरदार तरीके से विदेशी वस्त्रों और शराब के बहिष्कार का आह्वान किया था। उन्होंने महिलाओं से विशेष रूप से इसमें अग्रणी भूमिका निभाने की अपील की थी। 1930 ईस्वी में भारत की महिलाओं ने यह दिखा दिया कि वे शक्ति और सामर्थ्य में किसी से कम नहीं हैं। जो महिलाएँ कभी घर की चहारदीवारी से बाहर नहीं निकलती थीं, वे सुबह से शाम तक शराब की दुकानों और विदेशी कपड़ों की दुकानों में धरना देती नजर आईं। विदेशी कपड़ों और शराब के बहिष्कार में छात्रों और नौजवानों की भूमिका भी बहुत महत्त्वपूर्ण थी। बहिष्कार को क्रियान्वित करने में व्यापारी स्वयं काफी सक्रिय थे। कई मिल मालिकों ने विदेशी घागे का इस्तेमाल बंद कर दिया और शपथ ली कि वे ऐसा कोई मोटा कपड़ा नहीं बनाएंगे, जिसकी स्पर्धा खादी से हो। इसका उल्लंघन करने वालों पर संघ या संगठन की ओर से दंड लगाए गए और उनका सामाजिक बहिष्कार किया गया। कांग्रेस ने उन्हें काली सूची में रखा और उनकी दुकानों के सामने धरने दिए। शराब के बहिष्कार के कारण आबकारी शुल्क कम हो गया, जिससे सरकारी राजस्व का भारी नुकसान हुआ।

धरासना सत्याग्रह

नमक सत्याग्रह की सबसे तीव्र प्रतिक्रिया धरासना नमक सत्याग्रह के दौरान हुई। 21 मई 1930 ईस्वी को सरोजिनी नायडू, इमाम साहब और गांधीजी के पुत्र मणिलाल ने दो हजार आंदोलनकारियों के साथ धरासना नमक कारखाने पर धावा बोला। यद्यपि आंदोलनकारियों ने पूर्ण शांति के साथ विरोध-प्रदर्शन किया, किंतु पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज किया, जिसमें दो लोग मारे गए और 320 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। धरासना के दमन का उल्लेख करते हुए अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने लिखा है : “संवाददाता के रूप में पिछले 18 वर्षों में असंख्य नागरिक विद्रोह देखे हैं, दंगे, गलियों-कूचों में मारकाट और विद्रोह देखे हैं, लेकिन धरासना जैसा भयानक दृश्य मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा।”

सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement)
धरासना सत्याग्रह

नमक सत्याग्रह बड़ी तेजी से जनांदोलन में परिवर्तित हो गया। जून 1930 ईस्वी को 15,000 लोगों की एक भीड़ पुलिस का घेरा तोड़कर बंबई के वडाला नमक कारखाने से नमक ले जाने में सफल रही। कर्नाटक में 10,000 लोगों ने सैनीकट्टा नमक कारखाने पर धावा बोला और लाठियाँ तथा गोलियाँ खाईं। मद्रास में नमक-कानून तोड़ने के कारण जनता और पुलिस में टकराव हुए। आंध्र प्रदेश में महिलाओं ने मीलों चलकर नमक-कानून को चुनौती दी। बंगाल, विशेषकर मिदनापुर में नमक सत्याग्रह काफी समय तक चला। उड़ीसा में बालासोर, पुरी और कटक गैर-कानूनी तौर पर नमक-निर्माण के प्रमुख केंद्र बन गए।

पूर्वी भारत

गांधीजी के आह्वान पर पूर्वी भारत में ग्रामीण जनता ने ‘चौकीदारी कर न देने’ का आंदोलन चलाया। चौकीदार गाँव के रक्षक होते थे और पुलिस बल की एक इकाई के रूप में काम करते थे। इन चौकीदारों से लोग बड़ी घृणा करते थे क्योंकि वे खुफिया गतिविधियाँ भी करते थे और जमींदारों के पालतू होते थे। बिहार के सारन, मुंगेर और भागलपुर के जिलों में जनता ने ‘चौकीदारी कर’ देने से इनकार कर दिया और चौकीदारों को त्यागपत्र देने के लिए प्रेरित किया। जहाँ आम जनता अपनी इच्छा से इन कार्रवाइयों में शामिल नहीं हुई, वहाँ गाँव के स्तर पर जोशीले कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने अपने बहिष्कार कार्यक्रम को मनवाने के लिए सीमित हिंसा का और सामाजिक बलप्रयोग के अन्य सूक्ष्म रूपों का सहारा लिया। भागलपुर जिले के ‘बिहपुर’ गाँव का कांग्रेसी आश्रम राष्ट्रवादी गतिविधियों का केंद्र था। 31 मई को पुलिस ने इस आश्रम पर कब्जा कर लिया। आंदोलनकारियों के उत्साहवर्धन के लिए पटना से राजेंद्र प्रसाद और अब्दुल बारी ने वहाँ जाकर एक विशाल रैली को संबोधित किया। रैली को तोड़ने के लिए पुलिस ने लाठियों का प्रयोग किया, जिसमें राजेंद्र प्रसाद को भी चोटें आईं। अन्य जगहों की तरह यहाँ भी दमन के कारण राष्ट्रवादी गतिविधियों की शक्ति और बढ़ गई और स्थिति ऐसी हो गई कि देहाती इलाकों में पुलिस का घुसना असंभव हो गया। मुंगेर के ‘बहरी’ नामक स्थान पर भी सरकार का राज समाप्त-सा हो गया।

बंगाल

बंगाल में मानसून शुरू होने से नमक बनाने में दिक्कत आई, इसलिए आंदोलन नमक से हटकर चौकीदारी और यूनियन बोर्ड-विरोधी आंदोलन में बदल गया। यहाँ भी लोगों को भयंकर दमन का सामना करना पड़ा। हजारों की संपत्ति जब्त की गई या नष्ट की गई। पुलिस से बचने के लिए लोगों को भागकर जंगलों में भी छिपना पड़ा।

गुजरात

गुजरात में खेड़ा, बारदोली और भड़ौच जिले के जंबूसर में ‘कर न अदा करने’ का एक सशक्त आंदोलन तेजी से चलाया जा रहा था। हजारों की संख्या में लोग अपने परिवार और मवेशियों के साथ ब्रिटिश नियंत्रण वाले भारत से निकलकर बड़ौदा जैसे रजवाड़ों के क्षेत्रों में चले गए। सरकार ने आंदोलनकारियों को बुरी तरह प्रताड़ित किया। उनके घरों को तोड़कर और उनमें घुसकर घर की चीजें नष्ट कर दी गईं। पुलिस ने सरदार वल्लभभाई पटेल की 80 वर्षीय माँ को भी नहीं छोड़ा, जो करमसाड़ के अपने घर में बैठी खाना पका रही थीं।

मध्य प्रांत, महाराष्ट्र और कर्नाटक

मध्य प्रांत, महाराष्ट्र और कर्नाटक में कड़े वन-नियमों के विरुद्ध वन-सत्याग्रह चलाए गए और दमनकारी औपनिवेशिक जंगल-कानून तोड़े गए। छोटानागपुर के आदिवासी क्षेत्रों में यह आंदोलन बहुत सक्रिय था। यहाँ सरकार ने वनों को प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित कर वहाँ पशुओं को चराने, लकड़ी काटने और वनोत्पादों को एकत्रित करने पर प्रतिबंध लगा दिया था। कुछ जगहों पर वन-नियमों को तोड़ने वाली भीड़ की संख्या 70,000 से अधिक हो जाती थी। इसी आंदोलन के दौरान बैतूल में गोंड जनजाति के गंजन कोरकू जैसे नेताओं का उदय हुआ।

असम

असम में कुख्यात ‘कनिंघम सर्कुलर’ के विरोध में छात्रों ने एक शक्तिशाली आंदोलन चलाया। कनिंघम सर्कुलर में छात्रों और अभिभावकों से सद्व्यवहार का प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था। आंदोलन के दौरान इस सर्कुलर का उल्लंघन किया गया और इसके विरुद्ध प्रदर्शन किए गए।

संयुक्त प्रांत

संयुक्त प्रांत में आंदोलन कुछ भिन्न किस्म का था। यहाँ पर ‘कर न दो, लगान न दो’ का आंदोलन चलाया गया। ‘कर न देने’ का आह्वान जमींदारों के लिए था और उनसे निवेदन किया गया था कि वे सरकार को राजस्व न दें। ‘लगान न देने’ की अपील किसानों से की गई थी, ताकि वे जमींदारों को लगान न दें। चूंकि अधिकांश जमींदार ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार थे, इसलिए किसानों का लगान-विरोधी आंदोलन ही विरोध-प्रदर्शन का प्रमुख मुद्दा रहा। यद्यपि प्रारंभिक महीनों में आंदोलन काफी शक्तिशाली था, किंतु सरकारी दमन के कारण यह धीरे-धीरे कमजोर पड़ता गया। अक्टूबर 1930 ईस्वी से इसमें पुनः तेजी आई और आगरा और रायबरेली में इसने सफलता हासिल की।

मणिपुर और नागा क्षेत्र

नागरिक अवज्ञा आंदोलन की गूँज देश के पूर्वी कोनों में भी सुनाई पड़ी। इस आंदोलन में मणिपुरी और नागा जनता ने बहादुरी के साथ भागीदारी की। मणिपुर के नागा क्षेत्र की एक किशोरी वीरांगना रानी गैदिन्ल्यू ने कांग्रेस और गांधीजी के आह्वान से प्रेरित होकर विदेशी शासन के विरुद्ध विद्रोह का झंडा बुलंद किया। 1932 ईस्वी में महज सोलह वर्ष की आयु में इस युवा रानी को पकड़ लिया गया और उसे आजीवन कारावास की सजा मिली। रानी के बारे में 1937 ईस्वी में जवाहरलाल नेहरू ने लिखा : “एक दिन वह आएगा, जब भारत स्नेहपूर्वक उसका स्मरण और उसका सम्मान करेगा।” रानी के जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा असम के विभिन्न जेलों की काल-कोठरियों में बीता और वह 1947 ईस्वी में स्वतंत्र भारत की सरकार द्वारा ही मुक्त हो सकी।

उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत

उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत में जनाक्रोश की अभिव्यक्ति कई रूपों में देखने को मिली, जहाँ कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारी को लेकर जनता ने अभूतपूर्व प्रदर्शन किया। पेशावर में शेरदिल पठानों ने अपने करिश्माई नेता ‘सीमांत गांधी’ खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में ‘खुदाई खिदमतगार’ (ईश्वर के सेवक) नामक संगठन बनाया, जो जनता के बीच ‘लाल कुर्ती वाले’ कहलाते थे। इन्होंने पश्तो भाषा में ‘पख्तून’ नामक एक पत्रिका निकाली, जो बाद में ‘देशरोजा’ नाम से प्रकाशित हुई। ये लोग अहिंसा और स्वाधीनता संघर्ष को समर्पित थे। यहाँ आंदोलन की शुरुआत तब हुई, जब 23 अप्रैल 1930 ईस्वी को पुलिस ने स्थानीय कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के विरोध में जनता ने हिंसक प्रदर्शन किया। इसी समय पेशावर में गढ़वाली सिपाहियों की दो प्लाटूनों ने चंद्रसिंह गढ़वाली के नेतृत्व में अहिंसक प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया। इस घटना से स्पष्ट हो गया कि राष्ट्रवाद की भावना भारतीय सेना तक में फैलने लगी थी, जो ब्रिटिश शासन का प्रमुख आधार थी।

जनता ने संभवतः नेहरू के संदेश को दिल में धारण कर लिया था। दिसंबर 1929 ईस्वी में लाहौर में जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय झंडे को कभी न झुकने देने का संदेश दिया था : “एक बार फिर आपको याद रखना है कि अब यह झंडा फहरा दिया गया है, जब तक एक भी हिंदुस्तानी पुरुष, महिला या बच्चा जिंदा है, इसे झुकना नहीं चाहिए।” आंदोलन के दौरान भयंकर और निर्मम दमन के सामने राष्ट्रीय झंडे के सम्मान की रक्षा का प्रयास विचित्र प्रकार की बहादुरी का रूप धारण कर लेता था। आंध्र प्रदेश के तटीय इलाके गुंटूर में टोटा नरसैया नायडू पुलिस की मार खाते-खाते बेहोश हो गए, किंतु राष्ट्रीय झंडा नहीं छोड़ा। सूरत में छोटे-छोटे बच्चों ने पुलिस द्वारा बार-बार झंडा छीन लिए जाने से तंग आकर तिरंगे की ही ड्रेस सिलवा ली। उस ड्रेस को पहनकर जीवित झंडे शान से गलियों और सड़कों पर घूमते रहे और पुलिस को चुनौती देते रहे।

सत्याग्रह के माध्यम

इस सत्याग्रह को जन-आंदोलन के रूप में लोकप्रिय बनाने के लिए आंदोलनकारियों ने विभिन्न माध्यमों का सहारा लिया। गाँवों और कस्बों में प्रभातफेरियाँ निकाली जाती थीं। गाँवों तक राष्ट्रीय संदेश पहुँचाने के लिए जादुई लालटेनें काम में लाई जाती थीं। गैर-कानूनी पत्र-पत्रिकाओं ने भी आंदोलन को लोकप्रिय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके साथ ही नेताओं के लगातार दौरे, बैठकें और छोटी-बड़ी जनसभाएँ इस आंदोलन का केंद्रीय आधार थीं। बच्चों की वानर सेना संगठित की गई और लड़कियों ने मंजरी सेना बनाने की भी माँग की।

सविनय अवज्ञा आंदोलन (नमक सत्याग्रह) की विशेषताएँ

नमक सत्याग्रह की कुछ उल्लेखनीय विशेषताएँ थीं। एक, दांडी मार्च को यूरोप और अमेरिकी प्रेस ने व्यापक महत्त्व दिया और इस घटना के कारण गांधीजी दुनिया की नजर में आ गए। दूसरे, बड़ी संख्या में महिलाओं ने सविनय (नागरिक) अवज्ञा आंदोलन में भागीदारी की। सामाजिक कार्यकर्ता कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने गांधीजी को सलाह दी थी कि वे अपने आंदोलनों को पुरुषों तक ही सीमित न रखें। हजारों महिलाओं ने घरों से बाहर निकलकर विदेशी कपड़ों और शराब की दुकानों पर धरने दिए और अनेक स्थानों पर एक-दो हजार महिलाओं की भागीदारी वाले जुलूसों ने पूरे देश को आश्चर्य में डाल दिया और अधिकारियों को भौंचक्का कर दिया। कमलादेवी खुद उन असंख्य महिलाओं में से एक थीं, जिन्होंने नमक या शराब-कानूनों का उल्लंघन करते हुए सामूहिक गिरफ्तारी दी थी। तीसरे, शहरी क्षेत्रों की तरह ग्रामीण क्षेत्रों में भी, जैसे बंगाल में गांधीवादी आंदोलन में भागीदारी को किसान महिलाएँ एक धार्मिक कृत्य समझती थीं और वे अधिकतर ऊपर की ओर गतिशील किसान जातियों की महिलाएँ थीं। चौथे, औद्योगिक घरानों का विशाल समर्थन सविनय अवज्ञा आंदोलन की एक नई विशेषता थी। कम से कम आरंभिक काल में उन्होंने आंदोलन के लिए धन दिया और बहिष्कार आंदोलन का समर्थन किया, खासकर विदेशी कपड़ों के बहिष्कार का। परिणामतः आयातित कपड़ों का दाम 1929 ईस्वी के 2.6 करोड़ पाउंड से घटकर 1930 ईस्वी में 1.37 करोड़ पाउंड रह गया। पाँचवाँ और संभवतः सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि नमक सत्याग्रह के कारण अंग्रेजों को यह लगने लगा कि अब उनका निरंकुश शासन बहुत दिन तक नहीं चल सकेगा और उन्हें भारतीयों को सत्ता में भागीदारी देनी ही पड़ेगी।

सरकार की प्रतिक्रिया

सविनय अवज्ञा आंदोलन की अप्रत्याशित सफलता से ब्रिटिश सरकार ‘दिग्भ्रमित और भौंचक्की’ रह गई। पहले उसने सोचा था कि यदि आंदोलन में हस्तक्षेप न किया जाए, तो आंदोलन अपने आप असफल हो जाएगा। किंतु आंदोलन की तीव्रता और व्यापकता से झल्लाई सरकार ने बाद में नागरिक अवज्ञा आंदोलन के साथ भी पहले जैसा ही व्यवहार किया। निर्मम दमन, निहत्थे स्त्री-पुरुषों पर लाठी और गोली की बौछार आदि के द्वारा इसे कुचलने के प्रयास किए गए। गांधीजी और अन्य कांग्रेसी नेताओं समेत लगभग 90,000 से अधिक सत्याग्रही गिरफ्तार किए गए। कांग्रेस को गैर-कानूनी संगठन घोषित कर दिया गया। समाचार-पत्रों पर कड़ा सेंसर लगाकर प्रेस का मुँह बंद कर दिया गया। सरकारी आँकड़ों के अनुसार पुलिस की गोलीबारी में 110 से अधिक लोग मारे गए और 300 से अधिक घायल हुए। गैर-सरकारी आँकड़ों के अनुसार मृतकों की संख्या इससे बहुत अधिक थी। दक्षिण भारत में दमन का भयानक रूप देखने को मिला। पुलिस प्रायः लोगों को खादी या गांधी टोपी पहने देखकर ही पीट देती थी। आंध्र प्रदेश के एलूरा नामक स्थान पर भी पुलिस की गोलियों से अनेक लोग मारे गए। सरकारी दमन-चक्र का सबसे भयानक रूप बंबई में देखने को मिला।

इस बीच 27 मई 1930 ईस्वी को साइमन कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई। इसमें भारत को डोमिनियन स्टेट्स के अधिकार दिए जाने की चर्चा तक नहीं की गई थी। इससे सरकार अलग-थलग पड़ गई, यहाँ तक कि गरमदलीय विचार के राजनेता भी नाराज हो गए। सरकार को लगा कि भारतीयों की संवैधानिक मांगों की अब अधिक समय तक उपेक्षा करना ठीक नहीं है। वायसरॉय इरविन ने 9 जुलाई 1930 ईस्वी को एक समझौतावादी घोषणा की कि डोमिनियन स्टेट्स की माँग पर विचार करने के लिए ब्रिटिश भारत और देसी रियासतों के प्रतिनिधियों का लंदन में एक गोलमेज सम्मेलन बुलाया जाएगा। इस घोषणा का महत्त्व इस बात में है कि ब्रिटिश सरकार ने पहली बार एक सम्मेलन द्वारा भारत के संवैधानिक विकास के बारे में सोचने और निर्णय करने का कार्यक्रम बनाया। वायसरॉय के कहने पर तेजबहादुर सप्रू और एम.आर. जयकर ने कांग्रेस और सरकार के बीच शांति-स्थापना की संभावनाएँ तलाशीं, किंतु बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला।

प्रथम गोलमेज सम्मेलन (नवंबर 1930-जनवरी 1931 ई.)

लंदन (सेंट जेम्स पैलेस) में आयोजित पहले गोलमेज सम्मेलन की अध्यक्षता ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने की। महामहिम जॉर्ज पंचम ने 12 नवंबर 1930 ईस्वी को लंदन में रॉयल गैलरी, हाउस ऑफ लॉर्ड्स में आधिकारिक तौर पर इसका उद्घाटन किया था। इस प्रथम गोलमेज सम्मेलन में मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा, उदारपंथियों, दलित वर्ग और भारतीय राजे-रजवाड़ों ने भाग लिया। ब्रिटिश शासकों और भारतीयों को बराबर की हैसियत देकर की जाने वाली यह पहली बैठक थी, किंतु ‘कांग्रेस’ के बिना सम्मेलन ‘बिन दूल्हे की बारात’ हो गया। सम्मेलन के प्रायः सभी प्रतिनिधियों ने इस बात को रेखांकित किया कि संवैधानिक विचार-विमर्श की कोई भी कार्यवाही बिना कांग्रेस को शामिल किए कोई महत्त्व नहीं रखती। फलतः 19 जनवरी 1931 ईस्वी को यह सम्मेलन बिना किसी वास्तविक उपलब्धि के समाप्त हो गया। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने उम्मीद जताई कि अगले विचार-विमर्श में कांग्रेस अवश्य भाग लेगी।

गांधी-इरविन समझौता (5 मार्च 1931 ई.)

25 जनवरी 1931 ईस्वी को गांधीजी के साथ-साथ कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्यों को बिना शर्त रिहा कर दिया गया, ताकि किसी सहमति पर पहुँचने के लिए कांग्रेस को राजी किया जा सके। भारतीय नेताओं और समाज के सभी वर्गों के नुमाइंदों से बातचीत करके कांग्रेस कार्यकारिणी ने गांधीजी को वायसरॉय से बातचीत करने के लिए अधिकृत किया। 15 दिन के लंबे विचार-विमर्श के बाद 5 मार्च 1931 ईस्वी को गांधी-इरविन समझौते के रूप में एक दस्तावेज सामने आया, जिसे कुछ लोगों ने ‘शांति-समझौता’ और कुछ ने ‘अस्थायी करार’ का नाम दिया। लेकिन इस समझौते से कांग्रेस की स्थिति सरकार के बराबर हो गई।

गांधी-इरविन समझौते पर कांग्रेस की ओर से गांधीजी ने और सरकार की ओर से लॉर्ड इरविन ने हस्ताक्षर किए। समझौते की शर्तों के मुताबिक ब्रिटिश सरकार हिंसा के दोषी लोगों को छोड़कर, आंदोलन में भाग लेने वाले सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर तैयार हो गई। इस समय जो दंड (जुर्माने) लगाए गए थे और जिन्हें वसूल नहीं किया गया था, उन्हें माफ करने और जब्त की गई उन जमीनों को, जो तीसरे पक्ष को बेची नहीं गई थीं, वापस किया जाना तय हुआ। जिन सरकारी कर्मचारियों ने त्यागपत्र दे दिया था, उनके साथ नरमी का व्यवहार किया जाना था। सरकार ने तटीय इलाकों में घरेलू उपयोग के लिए नमक-उत्पादन की अनुमति दे दी और अफीम, शराब तथा विदेशी वस्त्रों की दुकानों पर शांतिपूर्ण तरीके से धरना देने के अधिकार को भी मान लिया। वायसरॉय ने गांधीजी की दो माँगों — पहली, पुलिस ज्यादतियों की जाँच कराने और दूसरी, भगतसिंह और उनके साथियों की फाँसी की सजा कम करने  को स्वीकार नहीं किया। कांग्रेस की ओर से गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन समाप्त करने की शर्त मान ली। समझौते में यह भी निहित था कि कांग्रेस दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेगी।

गांधी-इरविन समझौता, 1931
गांधी-इरविन समझौता, 1931 ईस्वी

गांधी-इरविन समझौते को लेकर काफी मतभेद और विवाद रहा है। अनेक तत्कालीन कांग्रेसी नेता, विशेषकर वामपंथी युवा, गांधी-इरविन शांति समझौते से असंतुष्ट थे, क्योंकि सरकार ने एक भी प्रमुख राष्ट्रवादी माँग स्वीकार नहीं की थी। जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस का आरोप था कि गांधीजी ने पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता के लक्ष्य को ध्यान में रखे बिना ही समझौता कर लिया। युवा कांग्रेसी इस समझौते से इसलिए अधिक असंतुष्ट थे, क्योंकि गांधीजी तीनों क्रांतिकारियों- भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी की सजा को आजीवन कारावास में नहीं बदलवा सके और 23 मार्च 1931 ईस्वी को उन्हें फाँसी पर लटका दिया गया।

कुछ लोगों के अनुसार यह समझौता किसानों के साथ धोखा था, क्योंकि किसानों की जिन जमीनों को जब्त कर तीसरे पक्ष को बेच दिया गया था, उन्हें वापस दिलाने की शर्त समझौते में नहीं थी। इससे गुजरात के पाटीदार किसान विशेष रूप से प्रभावित थे।

कुछ इतिहासकार मानते हैं कि गांधी-इरविन समझौता भारतीय पूँजीपतियों के ढुलमुल स्वभाव और उनके दबाव में आकर गांधीजी के काम करने का प्रमाण था। तर्क दिया गया कि मंदी, बहिष्कार, हड़तालों और सामाजिक अस्थिरताओं के कारण उद्योगपतियों का उत्साह ठंडा पड़ गया था और पूँजीपति चाहते थे कि या तो सविनय अवज्ञा आंदोलन समाप्त कर दिया जाए या कांग्रेस और सरकार के बीच शांति-समझौता हो जाए। गांधीजी और पूँजीपति दोनों ही अनियंत्रित जन-आंदोलनों से भयभीत थे, इसीलिए गांधीजी पर संवैधानिक राजनीति की ओर वापस आने का दबाव था।

यह सही है कि इस समझौते से नौजवान काफी निराश हुए थे, क्योंकि वे रोने-बिलखने की तुलना में मर-मिटने को वरीयता देते थे। यह भी सही है कि गुजरात के किसान भी समझौते से खुश नहीं थे क्योंकि उनकी कुछ जमीनें उन्हें तत्काल वापस नहीं मिल सकी थीं, किंतु विशाल जन-समुदाय का अधिकांश हिस्सा इस बात से प्रभावित था कि शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य और उसकी सरकार को उनके आंदोलन को महत्त्व देना पड़ा, उनके नेताओं के साथ बराबरी का सलूक करना पड़ा और उनके साथ समझौता भी करना पड़ा। इस समझौते के कारण जो हजारों लोग जेल से बाहर निकले, उन्हें विजयी सिपाहियों जैसा सम्मान दिया गया। यही नहीं, उड़ीसा के किसानों ने इस समझौते को गांधीजी की विजय मानकर जश्न मनाया और उनमें करों की अदायगी रोकने तथा नमक बनाने का उत्साह और बढ़ गया।

जहाँ तक औद्योगिक वर्ग द्वारा गांधीजी पर आंदोलन वापस लेने के लिए दबाव डालने का प्रश्न है, यह सही है कि औद्योगिक समुदायों ने आंदोलन का समर्थन किया और उसकी आरंभिक सफलता के लिए वे श्रेय के एक अंश का दावा भी कर सकते थे, फिर भी वे कभी इस स्थिति में नहीं रहे कि गांधीजी पर आंदोलन वापस लेने का दबाव डाल सकें। वैसे भी, गांधीजी की कांग्रेस स्वयं को एक ऐसे संगठन के रूप में पेश करती आ रही थी, जिसमें सभी वर्ग और समुदाय के लोग शामिल थे। इसलिए इसकी संभावना बहुत कम है कि एक विशेष वर्ग के हितों को पूरा करने के लिए गांधीजी ने इतना महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया होगा।

गांधीजी ने इस समझौते को बहुत महत्त्व दिया था, क्योंकि उनका विश्वास था कि लॉर्ड इरविन और ब्रिटिश सरकार भारतीय माँगों पर बातचीत को लेकर गंभीर थे। सत्याग्रह के संबंध में गांधीजी की धारणा थी कि प्रतिपक्षी को हृदय-परिवर्तन प्रदर्शित करने का अवसर दिया जाना चाहिए। उनका यह भी मानना था कि किसी भी जनांदोलन की आयु बहुत लंबी नहीं होती, उसे बहुत दिनों तक जारी नहीं रखा जा सकता। सक्रिय राजनीतिज्ञों की तरह आम जनता की बलिदान की क्षमता भी अनंत नहीं होती। इसके अलावा, गांधीजी ने बराबरी के आधार पर बातचीत की थी, जिसने कांग्रेस की प्रतिष्ठा को सरकार की प्रतिष्ठा के बराबर ला दिया था। शायद यही कारण है कि वे कांग्रेस के कराची अधिवेशन में इस समझौते का अनुमोदन कराने में सफल रहे।

वास्तव में, स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी के कारण सितंबर 1930 ईस्वी के बाद ही आंदोलन में थकान के लक्षण आने लगे थे। कस्बों में नौजवानों और छात्रों में तो ऊर्जा अभी बनी हुई थी, किंतु सौदागरों और दुकानदारों के लिए लंबे समय तक नुकसान उठाना मुश्किल हो रहा था, जबकि बहिष्कार की सफलता के लिए इस वर्ग का सहयोग आवश्यक था। मध्यम वर्ग आरंभ से ही उत्साह-रहित था और अब शिक्षित युवा भी क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की ओर अधिक खिंचने लगे थे। दूसरी ओर मजदूर वर्ग का समर्थन गायब रहा और उसके हाल के उग्र झुकाव को देखते हुए गांधीजी उन्हें आंदोलन में खींचने के विषय में शंकित थे। एक अपवाद नागपुर था, जहाँ मजदूर वर्ग की अच्छी भागीदारी रही। गाँवों में गुजरात के पाटीदारों या संयुक्त प्रांत के जाटों जैसे अधिक धनी किसानों का उत्साह संपत्ति की जब्ती और बिक्री के कारण ठंडा पड़ गया था। दूसरी ओर खेतिहर पैदावारों के दामों में भारी गिरावट के कारण किसान आंदोलनों में उग्र प्रवृत्तियाँ पैदा हुईं। इन विकासक्रमों के कारण समाज पर निश्चित ही वैसा गंभीर विभाजक प्रभाव पड़ सकता था, जिससे गांधीजी बचना चाहते थे।

सविनय अवज्ञा आंदोलन का निष्क्रिय चरण

गांधी-इरविन समझौते के बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन के निष्क्रिय चरण का आरंभ हुआ। समझौते को मंजूरी देने के लिए 29 मार्च 1931 ईस्वी को कराची में बैठक हुई। इससे छह दिन पहले ही भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी दी गई थी। यद्यपि गांधीजी ने उन्हें बचाने की कोशिश की थी, फिर भी युवा वर्ग नाराज था और उन्हें कराची-यात्रा के दौरान रास्ते में कड़े विरोध का सामना करना पड़ा; उनके खिलाफ प्रदर्शन किए गए और काले झंडे तक दिखाए गए। कराची अधिवेशन में कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित कर इन क्रांतिकारियों की वीरता और बलिदान की प्रशंसा तो की, किंतु किसी भी तरह की राजनीतिक हिंसा का समर्थन न करने की बात भी दोहराई। कांग्रेस ने ‘दिल्ली समझौते’ को मंजूरी दी और ‘पूर्ण स्वराज्य’ के अपने लक्ष्य को दोहराया।

यद्यपि कांग्रेस अपने जन्म से ही जनता के आर्थिक हितों, नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकारों के लिए लड़ती आ रही थी, किंतु यह पहला अवसर था जब कांग्रेस ने मौलिक अधिकारों और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रमों से संबंधित प्रस्ताव भी पास किया, ‘पूर्ण स्वराज्य’ को परिभाषित किया और जनता को स्वराज्य का अर्थ बताया। कांग्रेस ने यह घोषणा की कि जनता के शोषण को समाप्त करने के लिए राजनीतिक आजादी के साथ-साथ आर्थिक आजादी भी जरूरी है। प्रस्ताव में अभिव्यक्ति की आजादी, प्रेस की आजादी, संगठन बनाने की आजादी, जाति, लिंग, धर्म आदि से परे कानून के समक्ष समानता का अधिकार, सभी धर्मों के प्रति राज्य के तटस्थ भाव, सार्वभौम वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव, तथा स्वतंत्र और अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा की गारंटी दी गई थी। प्रस्ताव में लगान और मालगुजारी में उचित कटौती, अलाभकर जोतों को लगान से मुक्ति, किसानों को कर्ज से राहत देने और सूदखोरी पर नियंत्रण, मजदूरों के लिए बेहतर सेवा शर्तें, काम के नियमित घंटे और महिला मजदूरों की सुरक्षा, मजदूरों और किसानों को अपनी यूनियन बनाने की आजादी, तथा प्रमुख उद्योगों, खदानों और परिवहन को सरकारी स्वामित्व में रखने का वादा किया गया था। इसमें अल्पसंख्यकों और विभिन्न भाषाई क्षेत्रों की संस्कृति, भाषा और लिपि की सुरक्षा का भी आश्वासन दिया गया था। इस प्रकार कराची प्रस्ताव वास्तव में कांग्रेस की मूलभूत राजनीतिक और आर्थिक नीतियों का दस्तावेज था, जो आगे के वर्षों में भी बना रहा।

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (7 सितंबर 1931 – 1 दिसंबर 1931 ई.)

दिल्ली समझौते के प्रावधान के अंतर्गत कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में गांधीजी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए 29 अगस्त 1931 ईस्वी को एस.एस. राजपूताना नामक जलपोत से लंदन रवाना हुए। नए वायसरॉय विलिंगडन ने रैम्जे मैकडोनाल्ड को सूचित किया: “यह नाटा शैतान बहुत तेज है, जो सदैव फायदे का सौदा करता है। मैंने इसकी प्रत्येक गतिविधि में ‘महात्मा’ पर ‘बनिया’ को भारी पड़ते देखा है।” ब्रिटिश सरकार ने चुन-चुनकर राजाओं, नवाबों, मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा तथा अन्य अल्पसंख्यकों, जैसे ईसाइयों, अछूतों और सिखों के प्रतिनिधियों को बुलाया था, जो भारत का प्रतिनिधित्व तो नहीं करते थे, लेकिन अंग्रेजों के प्रबल समर्थक थे।

गांधीजी को द्वितीय गोलमेज सम्मेलन से कुछ विशेष मिलने की उम्मीद नहीं थी। अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर शीघ्र ही सम्मेलन में गतिरोध पैदा हो गया। मुसलमानों, ईसाइयों, आंग्ल-भारतीयों और अछूतों ने संगठित होकर अलग निर्वाचकमंडलों की माँग कर दी, जिसे गांधीजी न मानने की कसम खा चुके थे। अंततः ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों की स्वतंत्रता की मूल माँग पर विचार करने से ही इनकार कर दिया और गांधीजी असंतुष्ट होकर भारत लौट आए।

गांधीजी के इंग्लैंड-प्रवास के दौरान विभिन्न राष्ट्रवादी गतिविधियों ने भारतीयों में साम्राज्यवादी शासन के विरुद्ध संघर्ष की भावना को जीवित रखा था। संयुक्त प्रांत में कांग्रेस लगान में कमी, बकाया लगान माफ करने और बँटाईदारों की बेदखली रोकने की माँग को लेकर आंदोलन का नेतृत्व कर रही थी। दिसंबर के प्रथम सप्ताह के आरंभ होते-होते कांग्रेस ने पाँच जिलों में ‘लगान नहीं तो राजस्व भी नहीं’ के सिद्धांत पर आंदोलन छेड़ दिया। उधर 26 दिसंबर को सरकार ने जवाहरलाल नेहरू को गिरफ्तार कर लिया; वे गांधीजी से मिलने बंबई जा रहे थे। पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में सरकार की मालगुजारी-संबंधी नीति के खिलाफ खुदाई-खिदमतगार किसान आंदोलन चला रहे थे। 24 दिसंबर को उनके नेता खान अब्दुल गफ्फार खान भी बंदि बना लिए गए। भारत वापस आने पर गांधीजी के सामने सविनय अवज्ञा आंदोलन को दोबारा आरंभ करने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा।

सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement)
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (7 सितंबर 1931-1 दिसंबर 1931)

सरकार के प्रमुख नए वायसरॉय लॉर्ड विलिंगडन का मत था कि कांग्रेस के साथ समझौता करना बहुत बड़ी भूल थी। उसकी सरकार कांग्रेस को कुचलने के लिए पूरी तरह तैयार थी। सच तो यह है कि नौकरशाही तो कभी नरम पड़ी ही नहीं थी। गांधी-इरविन समझौते पर हस्ताक्षर के तुरंत बाद आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले में पुलिस की गोली से चार लोग मारे गए थे, वह भी मात्र इसलिए कि उन्होंने गांधीजी का चित्र लगाया था। राष्ट्रीय झंडे को जलाने, महिला कांग्रेस कार्यकर्ताओं के अपमान और सार्वजनिक सभाओं को भंग करने जैसी अनेक घटनाएँ हुई थीं। बंगाल में सरकार भेदभावपूर्ण अध्यादेशों के बल पर शासन चला रही थी और आतंकवाद से निबटने के नाम पर हजारों लोगों को जेल में डाल दिया गया था। सितंबर 1931 ईस्वी में हिजली जेल में भी राजनीतिक बंदियों पर गोली चलाई गई, जिसमें दो लोग मारे गए थे।

सविनय अवज्ञा आंदोलन की पुनरावृत्ति

28 दिसंबर को गांधीजी बंबई आए। उन्होंने स्वागत के लिए आई हुई भीड़ को संबोधित करते हुए कहा : “मैं खाली हाथ लौटा हूँ, किंतु देश की इज्जत को मैंने बट्टा नहीं लगने दिया।” अगले दिन कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक हुई और सविनय अवज्ञा आंदोलन को पुनः शुरू करने का निर्णय लिया गया। 31 दिसंबर को गांधीजी ने वायसरॉय से बातचीत के लिए समय माँगा, किंतु वायसरॉय ने मिलने से इनकार कर दिया। परिणामतः गांधीजी ने 3 जनवरी 1932 ईस्वी को सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः शुरू कर दिया।

जनता में आक्रोश की लहर फैल गई। कांग्रेस को जबरदस्त और अप्रत्याशित समर्थन मिला। हजारों सत्याग्रही जेल जाने लगे। पहले चार महीनों के दौरान लगभग 80,000 सत्याग्रही, जिनमें ज्यादातर गाँवों और शहरों के गरीब थे, जेल गए। लाखों लोगों ने शराब और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरना दिए। अवैध सभाओं, राष्ट्रीय दिवसों के आयोजन, राष्ट्रीय झंडे के प्रतीकात्मक रोहण, चौकीदारी कर की गैर-अदायगी और वन-कानूनों के उल्लंघन जैसे माध्यमों से अध्यादेशों की अवहेलना की जाने लगी।

पूरी तरह दमन पर उतारू सरकार ने 4 जनवरी 1932 ईस्वी को राष्ट्रीय आंदोलन पर हमला बोल दिया। गांधीजी गिरफ्तार कर लिए गए, सामान्य कानून निलंबित कर दिए गए और प्रशासन विशेष अध्यादेशों के सहारे चलने लगा। सभी स्तरों पर कांग्रेस के संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया गया और उसके कार्यालयों तथा कोषों पर सरकार ने कब्जा कर लिया। पुलिस के आतंक का नंगा नाच शुरू हो गया और शांतिपूर्ण धरना देने वाले सत्याग्रहियों तथा प्रदर्शनकारियों पर लाठियाँ बरसाई गईं। एक हफ्ते के भीतर ही देश के प्रायः सभी वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं को जेल में डाल दिया गया। ग्रामीण क्षेत्रों में कर-अदायगी न करने वालों पर बेतहाशा जुल्म ढाए गए, उनकी जमीनों, पशुओं, मकानों और अन्य संपत्तियों को कुर्क कर लिया गया। गुजरात के एक गाँव ‘रास’ में कर न देने वाले किसानों को सबके सामने नंगा करके कोड़े लगाए गए और बिजली के झटके दिए गए। जेल में पुरुषों के साथ महिला कैदियों पर भी तरह-तरह के कठोर जुल्म किए गए। प्रेस पर भी पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया; अब वे आंदोलन की खबर या किसी सत्याग्रही की फोटो नहीं छाप सकते थे। 1932 ईस्वी की पहली छमाही के दौरान ही 198 पत्रकारों और 98 प्रिंटिंग प्रेसों के खिलाफ कार्रवाई की गई। राष्ट्रवादी साहित्य पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया।

यद्यपि आंदोलन जोरदार ढंग से शुरू हुआ था, लेकिन गांधीजी और अन्य नेताओं को इसे गति प्रदान करने का समय नहीं मिला। विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी भी बहुत उत्साहजनक नहीं रही। तटीय आंध्र, गुजरात या उत्तर प्रदेश जैसे अनेक स्थानों में धनी किसान समूह शांत रहे, क्योंकि गांधीवादी सामाजिक कार्यक्रम के कुछ पहलू, जैसे छुआछूत के विरुद्ध उनका जेहाद, उन्हें पसंद नहीं थे। दूसरी ओर गांधीजी की हरिजनोद्धार मुहिम स्वयं हरिजनों को प्रभावित करने में असफल रही। मराठी-भाषी नागपुर और बरार में, जो आंबेडकर की दलित राजनीति के गढ़ थे, अछूतों ने अपनी वफादारी कांग्रेस की ओर मोड़ने से इनकार कर दिया। इस उदासीनता और विरोध के साथ-साथ किसानों के कुछ अन्य हिस्सों और कुछ निचले वर्गों में उग्रवाद और हिंसा का उदय हुआ, और इन्होंने स्थानीय कांग्रेसी नेताओं के नियंत्रण में रहने से मना कर दिया। शहरी क्षेत्रों में औद्योगिक समुदाय दुविधा में पड़े रहे। मजदूर उदासीन ही रहे और मुसलमान अकसर शत्रुता के भाव से ग्रस्त रहे। शिक्षित नगरवासी भी गांधीजी के रास्ते पर चलने के प्रति कम उत्सुक थे। दुकानों पर दिए जाने वाले धरने अकसर बमों के उपयोग से त्रस्त होते रहे, जिसकी गांधीजी ने निंदा की, किंतु वे इसे रोक नहीं सके। अंततः सरकार ने हजारों कांग्रेसी स्वयंसेवकों को सलाखों के पीछे धकेलकर इस नेतृत्वहीन और थके हुए जनांदोलन को कुछ ही महीनों के भीतर कुचल दिया।

तीसरा गोलमेज सम्मेलन (नवंबर–दिसंबर 1932 ई.)

जब कांग्रेस संघर्ष के मझधार में थी, 17 नवंबर से 24 दिसंबर 1932 ईस्वी के बीच लंदन में एक बार फिर कांग्रेस के बिना तीसरे गोलमेज सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें केवल 46 प्रतिनिधि शामिल हुए। आगा खान ने ब्रिटिश भारतीयों का प्रतिनिधित्व किया, लेकिन ब्रिटेन के मजदूर दल (लेबर पार्टी) ने भी इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया। इस सम्मेलन में भारतीय प्रांतों की स्वायत्तता की आवश्यकता पर बल दिया गया और अल्पसंख्यक समुदायों के लिए अलग निर्वाचक मंडल पर चर्चा की गई। किंतु पहले दो गोलमेज सम्मेलनों की तरह तीसरा गोलमेज सम्मेलन भी किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सका। इस सम्मेलन का महत्त्व इस बात में है कि श्वेत पत्र (व्हाइट पेपर) और लॉर्ड लिनलिथगो समिति की संस्तुति पर भारत सरकार अधिनियम 1935 पारित किया गया। तीनों सम्मेलनों के दौरान इंग्लैंड के प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड और भारत सचिव सैमुअल होर थे।

1933 ईस्वी तक कमजोर हो रही अर्थव्यवस्था और बढ़ती हिंसा ने गांधीजी के सबसे कट्टर समर्थकों- गुजराती और मारवाड़ी व्यापारियों तक के उत्साह को ठंडा कर दिया। सांप्रदायिकता और अन्य प्रश्नों पर भारतीय नेताओं में मतभेद के कारण सविनय अवज्ञा आंदोलन धीरे-धीरे बिखर गया। कांग्रेस ने आधिकारिक रूप से मई 1933 ईस्वी में इसे स्थगित कर दिया और 7 अप्रैल 1934 में इसे वापस ले लिया। गांधीजी एक बार फिर सक्रिय राजनीति से अलग हो गए। राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच एक बार फिर निराशा छा गई।

सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement)
तीसरा गोलमेज सम्मेलन (नवंबर-दिसंबर 1932)

सुभाषचंद्र बोस जैसे नेताओं ने गांधीजी के इस कृत्य की आलोचना की: “गांधीजी ने पिछले तेरह वर्षों की मेहनत और कुर्बानियों पर पानी फेर दिया।” सुभाषचंद्र बोस और विट्ठलभाई पटेल ने बहुत पहले 1933 ईस्वी में ही घोषणा कर दी थी : “एक राजनीतिक नेता के रूप में महात्माजी असफल रहे हैं।” वायसरॉय विलिंगडन ने भी कहा : “कांग्रेस 1930 ईस्वी की तुलना में निश्चित ही कम अच्छी स्थिति में है और जनता पर उसका प्रभाव घटा है।” लेकिन विलिंगडन और उसके सहयोगी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के चरित्र और उसकी रणनीति को समझ नहीं सके। सरकारी दमन के कारण कांग्रेस और गांधीजी में भारतवासियों की आस्था और मजबूत हो गई।

सविनय अवज्ञा आंदोलन का मूल्यांकन

सविनय अवज्ञा आंदोलन भारत के राष्ट्रीय आंदोलन का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अध्याय है। यद्यपि यह आंदोलन स्वाधीनता लाने में असफल रहा, लेकिन जनता का राजनीतिकरण करने तथा स्वाधीनता संघर्ष के सामाजिक आधारों को और मजबूत बनाने में सफल रहा। एक ओर जहाँ तमिलनाडु के शहरी व्यवसायी वर्ग और छात्रों को अधिक सक्रिय बना दिया गया, वहीं गुजरात, संयुक्त प्रांत, बंगाल, बिहार और आंध्र प्रदेश के किसान अगली पंक्तियों में आकर खड़े हो गए, और मध्य भारत, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा बंगाल की जनजातियाँ भी किसी से पीछे नहीं रहीं। मजदूरों ने भी कलकत्ता, बंबई और मद्रास के कई सामूहिक प्रदर्शनों में हिस्सा लिया, जिसमें शोलापुर के मजदूर सबसे आगे थे। इस आंदोलन में जेल जाने वालों की अनुमानित संख्या 90,000 के आसपास थी, जो 1920-21 ईस्वी के असहयोग आंदोलन में भाग लेने वालों से तीन गुनी से भी अधिक थी। महिलाओं के लिए यह आंदोलन अब तक के आंदोलनों में सबसे अधिक मुक्तिदायक सिद्ध हुआ। इस आंदोलन के कारण ब्रिटेन से आयातित कपड़ों की मात्रा गिरकर एक तिहाई रह गई। अन्य आयातित वस्तुओं, जैसे सिगरेट, के साथ भी वही हश्र हुआ। शराब और भू-राजस्व से होने वाली सरकारी आमदनी बुरी तरह प्रभावित हुई। विधानसभाओं का बहिष्कार भी अत्यंत प्रभावी तरीके से किया गया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन में मुसलमानों की भागीदारी निश्चित रूप से 1920-22 ईस्वी के असहयोग आंदोलन की अपेक्षा नगण्य थी, किंतु ऐसा सरकार की सांप्रदायिक नीतियों और सांप्रदायिक नेताओं की सांप्रदायिक अपीलों के कारण हुआ, ताकि राष्ट्रवादी आंदोलन को कमजोर किया जा सके। इसके बावजूद पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में मुसलमानों ने जबरदस्त भागीदारी की। बंगाल में सेनहट्टा (सिलहट), त्रिपुरा, गैबंधा, बागुड़ा और नोआखली में मध्यम वर्गीय मुसलमानों की भागीदारी महत्त्वपूर्ण थी। ढाका में मुसलमान नेताओं, विद्यार्थियों, दुकानदारों और यहाँ तक कि निम्न वर्ग की साधारण जनता ने भी आंदोलन को अपना समर्थन दिया। उच्च वर्गीय और मध्यम वर्गीय मुस्लिम महिलाएँ भी सक्रिय थीं।

इस आंदोलन को जो समर्थन शहरों और गाँवों की गरीब और निरक्षर जनता से मिला, वह अभूतपूर्व था। बंगाल के पुलिस महानिरीक्षक (इंस्पेक्टर जनरल) ने कहा था : “मुझे इस बात का कतई अनुमान नहीं था कि कांग्रेस को इस प्रकार के अनपढ़ और ग्रामीण लोगों का भी सहयोग प्राप्त होगा।” ब्रिटिश पत्रकार एच.एन. ब्रेल्सफोर्ड ने संघर्ष का विश्लेषण करते हुए लिखा: भारतीय मानस अब मुक्त हो गया है- लोगों ने अपने दिलों में आजादी हासिल कर ली है। सविनय अवज्ञा आंदोलन के वास्तविक परिणाम और वास्तविक प्रभाव का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जब राजनीतिक बंदी 1934 ईस्वी में रिहा हुए, तो जनता ने उनका वीरों के रूप में स्वागत किया। इस तरह कांग्रेस के लिए सविनय अवज्ञा आंदोलन किसी भी तरह असफल नहीं था। अब तक वह भारी राजनीतिक समर्थन जुटा चुकी थी और एक नैतिक सत्ता प्राप्त कर चुकी थी, जो 1937 ईस्वी के प्रांतीय चुनावों में उसकी भारी विजय के रूप में व्यक्त हुई।

सविनय अवज्ञा आंदोलन से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. सविनय अवज्ञा आंदोलन कब शुरू हुआ था?

सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत 12 मार्च 1930 ईस्वी को महात्मा गांधी के नेतृत्व में दांडी मार्च के साथ हुई। गांधीजी ने नमक कानून को तोड़कर आंदोलन का औपचारिक आरंभ किया।

2. सविनय अवज्ञा आंदोलन का तत्काल कारण क्या था?

इस आंदोलन का तत्काल कारण ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीयों पर लगाए गए अन्यायपूर्ण कानूनों और करों का विरोध था। नमक कानून को आंदोलन का प्रमुख प्रतीक बनाया गया।

3. दांडी मार्च क्या था?

दांडी मार्च महात्मा गांधी के नेतृत्व में साबरमती आश्रम से दांडी तक की लगभग 385 किलोमीटर की पैदल यात्रा थी। 6 अप्रैल 1930 ईस्वी को दांडी पहुँचकर गांधीजी ने नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा।

4. सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रमुख कार्यक्रम क्या थे?

इसके प्रमुख कार्यक्रमों में नमक कानून तोड़ना, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, शराब की दुकानों पर धरना, करों का विरोध, वन कानूनों का उल्लंघन तथा स्वदेशी और खादी का प्रचार शामिल था।

5. सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की क्या भूमिका थी?

महिलाओं ने आंदोलन में व्यापक रूप से भाग लिया। उन्होंने नमक कानून तोड़ा, विदेशी वस्तुओं और शराब की दुकानों के विरुद्ध धरने दिए तथा जुलूसों और जनसभाओं में सक्रिय भूमिका निभाई। सरोजिनी नायडू जैसी महिला नेताओं ने आंदोलन का नेतृत्व किया।

6. सविनय अवज्ञा आंदोलन में किसानों की क्या भूमिका थी?

कई क्षेत्रों में किसानों ने लगान और अन्य करों के विरोध में आंदोलन में भाग लिया। गुजरात, संयुक्त प्रांत और अन्य क्षेत्रों में किसानों की भागीदारी ने आंदोलन को व्यापक जनाधार प्रदान किया।

7. गांधी-इरविन समझौते का सविनय अवज्ञा आंदोलन पर क्या प्रभाव पड़ा?

5 मार्च 1931 ईस्वी को गांधी-इरविन समझौता हुआ। इसके बाद गांधीजी ने आंदोलन को अस्थायी रूप से स्थगित किया और वे द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन गए।

8. सविनय अवज्ञा आंदोलन दोबारा कब शुरू हुआ?

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन से लौटने के बाद गांधीजी ने जनवरी 1932 ईस्वी में सविनय अवज्ञा आंदोलन को पुनः शुरू किया। ब्रिटिश सरकार ने इसका कठोर दमन किया और अनेक नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया।

9. सविनय अवज्ञा आंदोलन का अंत कब हुआ?

सविनय अवज्ञा आंदोलन को 1934 ईस्वी में गांधीजी ने वापस ले लिया। इसके बाद कांग्रेस ने संवैधानिक और राजनीतिक गतिविधियों के अन्य माध्यमों पर ध्यान केंद्रित किया।

10. सविनय अवज्ञा आंदोलन का ऐतिहासिक महत्त्व क्या था?

इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की वैधता को चुनौती दी और स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक जनाधार प्रदान किया। महिलाओं, किसानों, मजदूरों और विभिन्न सामाजिक वर्गों की भागीदारी बढ़ी तथा भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में अहिंसक जनप्रतिरोध की शक्ति और अधिक स्पष्ट हुई।
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