उत्तर भारत के ऐतिहासिक स्रोत : पुरातात्त्विक और साहित्यिक
उत्तर भारत का राजनीतिक इतिहास (550 ई. से 1200 ई. तक) एक जटिल और गतिशील काल रहा है। इस अवधि में गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद अनेक क्षेत्रीय शक्तियों का उदय हुआ तथा राजनीतिक संघर्ष, विदेशी आक्रमण और सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन हुए। इस काल में प्रतिहार, पाल, चंदेल, सोलंकी, चौहान, परमार, गहड़वाल, राष्ट्रकूट तथा अन्य राजपूत वंशों ने विभिन्न क्षेत्रों में शासन किया। अरब और तुर्क आक्रमणों ने भी तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को प्रभावित किया।
इस काल के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए पुरातात्त्विक और साहित्यिक स्रोत अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। पुरातात्त्विक स्रोतों में अभिलेख, सिक्के, दुर्ग, मंदिर, बावड़ियाँ तथा अन्य पुरातात्त्विक अवशेष शामिल हैं, जबकि साहित्यिक स्रोतों में समकालीन ग्रंथ, काव्य एवं ऐतिहासिक रचनाएँ, अरबी और फारसी ग्रंथ, धार्मिक एवं विद्वत्तापूर्ण ग्रंथ तथा विदेशी यात्रियों के विवरण प्रमुख हैं। इन सभी स्रोतों के संयुक्त अध्ययन से इस काल की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को समझने में सहायता मिलती है।
पुरातात्त्विक स्रोत
उत्तर भारत के राजनीतिक इतिहास के अध्ययन के लिए पुरातात्त्विक स्रोत ठोस और प्रत्यक्ष साक्ष्य प्रदान करते हैं। इनसे शासकों की उपलब्धियों, प्रशासनिक व्यवस्था, सैन्य शक्ति, धार्मिक संरक्षण तथा सांस्कृतिक योगदान पर प्रकाश पड़ता है। पुरातात्त्विक स्रोतों के अंतर्गत अभिलेख, सिक्के, दुर्ग, मंदिर, बावड़ियाँ और अन्य पुरातात्त्विक अवशेष सम्मिलित हैं। ये स्रोत न केवल ऐतिहासिक तथ्यों को प्रमाणित करते हैं, बल्कि तत्कालीन सांस्कृतिक समृद्धि की भी जानकारी देते हैं।
अभिलेख
अभिलेख ताम्रपत्रों, पत्थरों, मंदिरों की दीवारों तथा स्तंभों पर उत्कीर्ण किए गए हैं। इनमें शासकों की वंशावलियों, विजयों, दान, धार्मिक संरक्षण और प्रशासनिक व्यवस्था का विवरण मिलता है। ये अभिलेख मुख्यतः संस्कृत, प्राकृत तथा कभी-कभी स्थानीय भाषाओं में लिखे गए हैं। इनमें शासकों की उपाधियों, युद्धों तथा धार्मिक कार्यों, जैसे मंदिर निर्माण और यज्ञ-संपादन, का उल्लेख मिलता है। कुछ अभिलेखों से प्रशासनिक आदेशों, भूमिदान और कर-व्यवस्था की भी जानकारी प्राप्त होती है।
बाँसखेड़ा ताम्रपत्र अभिलेख
बाँसखेड़ा ताम्रपत्र अभिलेख हर्षवर्धन के शासनकाल (लगभग 606–647 ई.) से संबंधित संस्कृत भाषा का महत्त्वपूर्ण ताम्रपत्र है, जो उत्तर प्रदेश के वर्तमान शाहजहाँपुर जिले के बाँसखेड़ा से प्राप्त हुआ था। यह वर्धन वंश के इतिहास का महत्त्वपूर्ण स्रोत है, क्योंकि इसमें हर्षवर्धन की वंशावली, प्रशासनिक व्यवस्था तथा राजकीय भूमि-अनुदान से संबंधित सूचनाएँ मिलती हैं। इस अभिलेख के अंत में हर्षवर्धन के हस्ताक्षर अथवा उनके द्वारा अंकित स्वहस्ताक्षर का उल्लेख मिलता है, जो इसकी विशिष्टता को बढ़ाता है।
मधुबन ताम्रपत्र अभिलेख
मधुबन ताम्रपत्र अभिलेख हर्षवर्धन के शासनकाल से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण अभिलेखीय स्रोत है। हर्ष संवत् 25 (लगभग 631 ई.) का यह ताम्रपत्र उत्तर प्रदेश के वर्तमान मऊ जिले के मधुबन क्षेत्र से प्राप्त हुआ था। यह संस्कृत भाषा में तथा गुप्तोत्तरकालीन ब्राह्मी की विकसित शैली की लिपि में उत्कीर्ण है। इसमें हर्षवर्धन की वंशावली, उसके पूर्वजों तथा प्रशासन से संबंधित महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ मिलती हैं। अभिलेख में हर्ष द्वारा सोमकुण्डक नामक ग्राम को ऋग्वेदी और सामवेदी ब्राह्मणों को दिए गए भूमि-अनुदान का उल्लेख है। यह अनुदान ‘कपित्थिका’ नामक जयस्कंधावार अर्थात् सैन्य शिविर से जारी किया गया था। इस प्रकार मधुबन ताम्रपत्र हर्षवर्धन के वंश, प्रशासन तथा ब्राह्मणों को दिए जाने वाले भूमि-अनुदानों के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
ऐहोल लेख
बादामी के चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय (लगभग 610–642 ई.) के दरबारी कवि रविकीर्ति द्वारा रचित ऐहोल लेख (634–635 ई.) कर्नाटक के बागलकोट जिले के ऐहोल में स्थित मेगुती जैन मंदिर की दीवार पर उत्कीर्ण संस्कृत प्रशस्ति है। इसमें पुलकेशिन द्वितीय की वंशावली, विभिन्न सैन्य अभियानों और विजयों का वर्णन मिलता है। इसका सबसे महत्त्वपूर्ण विवरण नर्मदा के तट पर पुलकेशिन द्वितीय और उत्तर भारत के सम्राट हर्षवर्धन के बीच हुए संघर्ष से संबंधित है। अभिलेख के अनुसार पुलकेशिन द्वितीय ने हर्ष की दक्षिण की ओर बढ़ती शक्ति को नर्मदा क्षेत्र में रोक दिया था। यह अभिलेख दक्षिण और उत्तर भारत की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के अध्ययन का प्रमुख स्रोत है।
घटियाला शिलालेख
लगभग 861 ईस्वी का घटियाला शिलालेख राजस्थान में जोधपुर के निकट घटियाला से प्राप्त हुआ है और प्रतिहार शासक कक्कुक से संबंधित है। इसमें धार्मिक प्रतिष्ठानों, विशेषकर मंदिरों तथा दान से संबंधित विवरण मिलता है। इससे प्रतिहारकालीन धार्मिक गतिविधियों, प्रशासनिक व्यवस्था तथा स्थानीय सामाजिक जीवन के अध्ययन में सहायता मिलती है।
जोधपुर अभिलेख
जोधपुर का प्रसिद्ध प्रतिहारकालीन अभिलेख कक्कुक से संबंधित है और इसका काल लगभग 837 ई.स्वी माना जाता है। इसमें प्रतिहार वंश की वंशावली तथा कक्कुक की उपलब्धियों का उल्लेख मिलता है। अभिलेख से प्रतिहारों की राजनीतिक स्थिति, उनके प्रशासन तथा तत्कालीन सामाजिक-धार्मिक परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त होती है। इसे मिहिरभोज या नागभट्ट द्वितीय की प्रशस्ति मानना उचित नहीं है।
ग्वालियर प्रशस्ति
गुर्जर-प्रतिहार शासक मिहिरभोज प्रथम की ग्वालियर प्रशस्ति प्रमुख ऐतिहासिक अभिलेखों में से एक है। यह मध्य प्रदेश के ग्वालियर क्षेत्र में स्थित चतुर्भुज मंदिर से संबंधित है और इसका काल लगभग 876–877 ईस्वी माना जाता है। इसमें काव्यात्मक एवं प्रशंसात्मक शैली में गुर्जर-प्रतिहार वंश की वंशावली तथा मिहिरभोज की उपलब्धियों का वर्णन मिलता है। मिहिरभोज को ‘आदिवराह’ कहा गया है, जो उनकी वैष्णव धार्मिक आस्था का संकेत देता है। यह अभिलेख प्रतिहारों की राजनीतिक शक्ति तथा समकालीन पाल और राष्ट्रकूट शक्तियों के साथ उनके संघर्षों के अध्ययन में उपयोगी है।
खजुराहो अभिलेख
चंदेलों के विक्रम संवत् 1011 (954 ई.) और विक्रम संवत् 1059 (1002 ई.) के खजुराहो अभिलेख चंदेल वंश के इतिहास के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इनमें चंदेलों की वंशावली, उनके प्रारंभिक शासकों तथा विशेष रूप से यशोवर्मन और धंग की उपलब्धियों का वर्णन मिलता है। इन अभिलेखों से चंदेलों की राजनीतिक शक्ति, धार्मिक संरक्षण तथा खजुराहो के मंदिरों के निर्माण और सांस्कृतिक विकास की जानकारी प्राप्त होती है।
नन्यौरा अभिलेख
विक्रम संवत् 1055 (998 ई.) का नन्यौरा अभिलेख उत्तर प्रदेश के हमीरपुर क्षेत्र के नन्यौरा से प्राप्त हुआ है। यह चंदेल शासक धंग के शासनकाल से संबंधित माना जाता है। इसमें चंदेल वंश तथा उसके शासकों से संबंधित जानकारी मिलती है। यह अभिलेख चंदेलों के राजनीतिक इतिहास और धार्मिक गतिविधियों के अध्ययन में उपयोगी है।
जूनागढ़ अभिलेख
गुजरात के जूनागढ़ क्षेत्र से प्राप्त सोलंकीकालीन अभिलेखों से गुजरात और सौराष्ट्र की राजनीतिक तथा धार्मिक परिस्थितियों की जानकारी मिलती है। सोलंकी शासक भीमदेव प्रथम के समय सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से संबंधित परंपरा और अभिलेखीय साक्ष्य सोलंकी शासकों की धार्मिक नीति तथा मंदिर संरक्षण पर प्रकाश डालते हैं। जूनागढ़ के अभिलेखों का उपयोग गुजरात के राजनीतिक इतिहास तथा सौराष्ट्र में सोलंकी प्रभाव के अध्ययन के लिए किया जाता है।
हरसोल अभिलेख
परमार शासक सीयक द्वितीय का हरसोल अभिलेख (लगभग 948 ई.) परमार इतिहास का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। यह गुजरात के हरसोल से प्राप्त हुआ है। इसमें परमार वंश की प्रारंभिक वंशावली तथा सीयक द्वितीय की राजनीतिक स्थिति का उल्लेख मिलता है। इससे परमारों के प्रारंभिक इतिहास, राष्ट्रकूटों के साथ उनके संबंध तथा मालवा में परमार शक्ति के उदय की जानकारी प्राप्त होती है।
उज्जैन अभिलेख
परमार शासक वाक्पति मुंज से संबंधित उज्जैन के अभिलेखों से उसके शासनकाल, सैन्य अभियानों तथा मालवा में परमार शक्ति की स्थिति की जानकारी प्राप्त होती है। इनसे परमारकालीन प्रशासन, धार्मिक गतिविधियों तथा सांस्कृतिक संरक्षण पर भी प्रकाश पड़ता है।
उदयपुर प्रशस्ति
परमार शासक उदयादित्य की उदयपुर प्रशस्ति मध्य प्रदेश के विदिशा के निकट उदयपुर स्थित नीलकंठेश्वर मंदिर से संबंधित है। इसमें परमार वंश की वंशावली, विभिन्न शासकों के नाम तथा उनकी उपलब्धियों का वर्णन मिलता है। इससे उदयादित्य के शासनकाल, मालवा की राजनीतिक स्थिति, धार्मिक नीति तथा मंदिर-निर्माण की परंपरा के अध्ययन में सहायता मिलती है।
खालिमपुर ताम्रपत्र अभिलेख
खालिमपुर ताम्रपत्र अभिलेख पाल शासक धर्मपाल ने अपने शासन के 32वें वर्ष में जारी किया था। इसमें पाल वंश की वंशावली, धर्मपाल की राजनीतिक उपलब्धियों तथा उसके साम्राज्य के विस्तार से संबंधित महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ मिलती हैं। अभिलेख में पाल वंश के संस्थापक गोपाल के पिता वप्पट और पितामह दायितविष्णु का उल्लेख मिलता है तथा बंगाल में व्याप्त मत्स्यन्याय की स्थिति का संकेत मिलता है। यह अभिलेख धर्मपाल के शासन, पाल साम्राज्य की राजनीतिक स्थिति तथा प्रारंभिक पाल इतिहास के पुनर्निर्माण का प्रमुख स्रोत है।
नालंदा अभिलेख
नालंदा से अनेक महत्त्वपूर्ण प्राचीन अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जिनमें नौवीं शताब्दी का देवपाल का नालंदा ताम्रपत्र विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण इस ताम्रपत्र में पाल शासक देवपाल के शासनकाल तथा नालंदा महाविहार से संबंधित सूचनाएँ मिलती हैं। इसमें जावा अथवा सुवर्णद्वीप के शैलेंद्र शासक बालपुत्रदेव द्वारा नालंदा के बौद्ध मठ के रखरखाव के लिए पाँच ग्रामों के दान का उल्लेख है। इससे नालंदा के अंतरराष्ट्रीय महत्त्व तथा भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच धार्मिक एवं सांस्कृतिक संबंधों की जानकारी प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त देवपाल के मुंगेर अभिलेख, नारायणपाल के बादल स्तंभलेख तथा महीपाल प्रथम के बानगढ़ और मुजफ्फरपुर अभिलेखों से पाल वंश की वंशावली, प्रशासन, धार्मिक नीति तथा राजनीतिक गतिविधियों की जानकारी प्राप्त होती है।
देवपारा शिलालेख
सेन वंश के शासक विजयसेन से संबंधित बारहवीं शताब्दी का देवपारा शिलालेख अथवा देवपारा प्रशस्ति कवि उमापतिधर की रचना है। यह वर्तमान बांग्लादेश के राजशाही क्षेत्र में देवपारा गाँव के निकट से प्राप्त हुआ था। इसमें विजयसेन की वंशावली, विजयों तथा राजनीतिक उपलब्धियों का वर्णन मिलता है। प्रशस्ति में विजयसेन द्वारा प्रद्युम्नेश्वर शिव मंदिर के निर्माण तथा उसके समीप तालाब के निर्माण का भी उल्लेख है। यह अभिलेख सेन वंश के राजनीतिक विस्तार, धार्मिक संरक्षण तथा तत्कालीन बंगाल के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
हर्ष प्रस्तर-अभिलेख
चौहान वंश से संबंधित अभिलेखों में विग्रहराज द्वितीय के समय का विक्रम संवत् 1030 (973 ई.) का हर्ष प्रस्तर-अभिलेख महत्त्वपूर्ण है। यह राजस्थान के सीकर जिले में हर्ष पर्वत स्थित हर्षनाथ शिव मंदिर से संबंधित है। अभिलेख में चौहान शासकों, विशेषकर सिंहराज और विग्रहराज, की उपलब्धियों तथा हर्षनाथ मंदिर के निर्माण और संरक्षण का उल्लेख मिलता है। इससे चौहान वंश की वंशावली, राजनीतिक इतिहास तथा शैव धार्मिक परंपरा के अध्ययन में सहायता मिलती है।
बिजोलिया प्रस्तर-अभिलेख
चौहान शासक सोमेश्वर से संबंधित विक्रम संवत् 1226 (1169 ई.) का बिजोलिया प्रस्तर-अभिलेख राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के बिजोलिया में पार्श्वनाथ मंदिर के निकट स्थित चट्टान पर उत्कीर्ण है। इसके रचयिता गुणभद्र और लेखक केशव कायस्थ थे। अभिलेख में शाकंभरी और अजमेर के चौहानों की वंशावली तथा वासुदेव से लेकर सोमेश्वर तक के शासकों का उल्लेख मिलता है। इसमें चौहानों की उत्पत्ति, शाकंभरी में उनके राज्य की स्थापना तथा सांभर झील से संबंधित परंपराओं का वर्णन है। अभिलेख में बिजोलिया का प्राचीन नाम विंध्यवल्ली तथा दिल्ली का प्राचीन नाम दिल्लीमिका भी मिलता है। यह चौहान वंश के इतिहास और उसकी वंशावली के अध्ययन का प्रमुख स्रोत है।
आसन शिलालेख
चित्तौड़गढ़ से संबंधित आसन शिलालेख चौहान इतिहास के अध्ययन में उपयोगी अभिलेखीय स्रोत है। इसमें चौहान शासक पृथ्वीराज तृतीय से संबंधित राजनीतिक और प्रशासनिक सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। अभिलेख से तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों तथा चौहान शासन की प्रकृति पर प्रकाश पड़ता है।
दिल्ली-शिवालिक स्तंभलेख
दिल्ली-शिवालिक स्तंभलेख, जिसे दिल्ली-टोपरा स्तंभ भी कहा जाता है, मूलतः मौर्य सम्राट अशोक का तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व का प्रसिद्ध स्तंभ है, जिस पर अशोक के सात प्रमुख धम्म स्तंभलेख उत्कीर्ण हैं। मूल रूप से यह स्तंभ हरियाणा के टोपरा कलाँ से संबंधित था, जिसे चौदहवीं शताब्दी में सुल्तान फिरोजशाह तुगलक दिल्ली ले आया और फिरोजशाह कोटला में स्थापित कराया। इस स्तंभ पर अशोक के लेखों के अतिरिक्त बाद के काल में चाहमान शासक विग्रहराज चतुर्थ द्वारा संस्कृत में एक लेख भी उत्कीर्ण कराया गया था। इससे विग्रहराज चतुर्थ की राजनीतिक उपलब्धियों तथा तत्कालीन सांस्कृतिक परिस्थितियों की जानकारी मिलती है। 1837 ईस्वी में जेम्स प्रिंसेप द्वारा ब्राह्मी लिपि को पढ़े जाने से अशोक के अभिलेखों के अध्ययन में निर्णायक प्रगति हुई।
गहड़वाल अभिलेख
गहड़वाल वंश ने ग्यारहवीं से बारहवीं शताब्दी तक मुख्यतः कन्नौज और वाराणसी क्षेत्र पर शासन किया। इस वंश से संबंधित प्रमुख अभिलेखों में चंद्रदेव का चंद्रावती दानपत्र, मदनचंद्र के राहन (1109 ई.) और बसही (1104 ई.) अभिलेख, गोविंदचंद्र का कमौली लेख, लार अभिलेख तथा उनकी रानी कुमारदेवी का सारनाथ अभिलेख उल्लेखनीय हैं। इनसे गहड़वाल शासकों की वंशावली, राजनीतिक उपलब्धियों, प्रशासनिक नीतियों तथा धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों की जानकारी प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त रतनपुर, पालि, ताराचंडी, मछलीशहर और बेलखरा से प्राप्त अभिलेख भी गहड़वाल इतिहास के पुनर्निर्माण में उपयोगी हैं।
चंदेल अभिलेख
चंदेलों के अभिलेख बुंदेलखंड अथवा जेजाकभुक्ति के इतिहास के प्रमुख प्राथमिक स्रोत हैं। ये मुख्यतः खजुराहो, अजयगढ़, महोबा और कलिंजर से प्राप्त हुए हैं। खजुराहो के 954 ईस्वी और 1002 ईस्वी के अभिलेखों में चंदेल वंश की वंशावली तथा उसके प्रारंभिक शासकों, विशेषकर नन्नुक, का उल्लेख मिलता है और चंदेलों को चंद्रवंशी परंपरा से जोड़ा गया है। अजयगढ़ के अभिलेखों से कीर्तिवर्मन सहित अन्य चंदेल शासकों की राजनीतिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों का ज्ञान होता है। महोबा और कलिंजर के अभिलेखों में यशोवर्मन, धंगदेव और विद्याधर जैसे प्रमुख शासकों की विजयों, धार्मिक संरक्षण, मंदिर-निर्माण, दान तथा प्रशासन से संबंधित सूचनाएँ मिलती हैं। इन अभिलेखों के आधार पर जेजाकभुक्ति में चंदेल सत्ता के विस्तार, राजनीतिक संबंधों, प्रशासनिक व्यवस्था तथा धार्मिक-सांस्कृतिक संरक्षण को समझने में सहायता मिलती है।
इस प्रकार अभिलेख मध्यकालीन उत्तर भारत के इतिहास के प्रमुख प्राथमिक स्रोत हैं। इनसे शासकों के कालक्रम, वंशावली, क्षेत्रीय विस्तार, युद्धों, राजनीतिक संबंधों और प्रशासनिक व्यवस्था की जानकारी प्राप्त होती है। ताम्रपत्रों से विशेष रूप से भूमि-अनुदान, राजस्व, ग्राम-व्यवस्था और स्थानीय प्रशासन का ज्ञान होता है, जबकि प्रशस्तियों से शासकों की राजनीतिक उपलब्धियों, धार्मिक नीतियों तथा सांस्कृतिक संरक्षण पर प्रकाश पड़ता है। चूंकि प्रशस्तियों में राजकीय प्रशंसा और काव्यात्मक अतिशयोक्ति का प्रभाव रहता है, इसलिए इनके विवरणों का मूल्यांकन सिक्कों, साहित्यिक ग्रंथों तथा अन्य पुरातात्त्विक स्रोतों के साथ तुलनात्मक रूप से करना आवश्यक है।
सिक्के
सिक्कों से शासकों की आर्थिक नीतियों, व्यापारिक समृद्धि, राजकीय प्रतीकों तथा धार्मिक प्राथमिकताओं की जानकारी मिलती है। इस काल में सोने, चाँदी और ताँबे के सिक्के प्रचलित थे। इन पर शासकों के नाम, उपाधियाँ तथा धार्मिक प्रतीक, जैसे त्रिशूल, कमल और अन्य चिह्न अंकित मिलते हैं। सिक्कों के आकार, धातु, गुणवत्ता और वितरण से व्यापारिक मार्गों तथा आर्थिक गतिविधियों को समझने में सहायता मिलती है।
हर्षवर्धन की मिट्टी की एक मुहर नालंदा से प्राप्त हुई है, जिससे उसके शासन और बौद्ध धर्म के प्रति उसके संरक्षण की जानकारी मिलती है। उसकी एक अन्य ताँबे की मुहर सोनीपत से प्राप्त हुई है, जिस पर हर्ष की वंशावली और उसकी रानियों के नाम अंकित हैं। इस मुहर पर हर्ष का पूरा नाम ‘हर्षवर्धन’ मिलता है।
प्रतिहार शासक मिहिरभोज के सिक्कों पर वैष्णव प्रतीक तथा संस्कृत लेख मिलते हैं। आठवीं से दसवीं शताब्दी के बंगाल के पाल शासकों धर्मपाल और देवपाल से संबंधित मुद्राओं से उनकी आर्थिक स्थिति और धार्मिक प्रभाव की जानकारी प्राप्त होती है। गुजरात के सोलंकी शासकों के चाँदी के सिक्कों से पश्चिमी भारत के व्यापार और आर्थिक समृद्धि की जानकारी मिलती है। परमार सिक्कों पर उत्कीर्ण देवी-देवताओं की आकृतियाँ और संस्कृत लेख उनकी धार्मिक तथा सांस्कृतिक प्राथमिकताओं को प्रदर्शित करते हैं। खजुराहो क्षेत्र से प्राप्त चंदेल सिक्कों पर हिंदू प्रतीक और शासकों के नाम अंकित हैं। चाहमान शासक अजयराज तथा सोमल्लादेवी के चाँदी और ताँबे के सिक्के भी चौहान इतिहास के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। गहड़वाल और कलचुरि शासकों द्वारा प्रचलित ‘बैठी हुई लक्ष्मी’ शैली के सोने, चाँदी, ताँबे तथा मिश्रित धातुओं के सिक्कों से दोनों राजवंशों के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों की जानकारी मिलती है।
इस प्रकार सिक्कों से शासकों के शासनकाल, क्षेत्रीय प्रभाव और आर्थिक नीतियों को समझने में सहायता मिलती है। इनसे व्यापारिक मार्गों, समुद्री व्यापार, मुद्रा-प्रणाली तथा तत्कालीन आर्थिक समृद्धि का भी ज्ञान होता है। सिक्कों पर अंकित धार्मिक प्रतीक शासकों की धार्मिक प्राथमिकताओं के परिचायक हैं।
दुर्ग और मंदिर
दुर्ग सैन्य शक्ति, रक्षा-रणनीति और सामंती व्यवस्था के प्रतीक हैं, जबकि मंदिर धार्मिक संरक्षण, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक समृद्धि के सूचक हैं। दुर्ग सामान्यतः सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थानों पर बनाए गए थे। इनके प्रवेश-द्वारों, दीवारों, बुर्जों और अन्य संरचनाओं से तत्कालीन स्थापत्य तथा अभियंत्रिकी के विकास की जानकारी प्राप्त होती है।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग (मेवाड़)
गंभीरी और बेड़च नदियों के संगम क्षेत्र में स्थित चित्तौड़गढ़ दुर्ग मेवाड़ का प्रमुख सैन्य केंद्र था। यह दुर्ग सामंती व्यवस्था, रक्षा-रणनीति और राजपूत वीरता का प्रतीक माना जाता है तथा जौहर और शाका जैसी ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा रहा है।
रणथम्भौर दुर्ग (सवाई माधोपुर)
राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में स्थित रणथम्भौर दुर्ग चौहान राजवंश का महत्त्वपूर्ण गढ़ था। इसका प्राचीन नाम रणस्तंभपुर माना जाता है। यह दुर्ग चौहान शासकों की सैन्य शक्ति और क्षेत्रीय प्रभुत्व का प्रमुख केंद्र था।
ग्वालियर दुर्ग (मध्य प्रदेश)
मध्य प्रदेश के ग्वालियर में स्थित यह दुर्ग मध्य भारत के प्रमुख ऐतिहासिक दुर्गों में से एक है। इसे प्रायः ‘भारत का जिब्राल्टर’ कहा जाता है। गोपाचल नामक पहाड़ी पर स्थित यह दुर्ग मध्यकालीन स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण है और इसमें हिंदू तथा जैन स्थापत्य-परंपराओं के अवशेष मिलते हैं।
खजुराहो के मंदिर (मध्य प्रदेश)
बुंदेलखंड के खजुराहो में हिंदू और जैन दोनों परंपराओं के मंदिर हैं, जिनका निर्माण मुख्यतः चंदेल शासकों के काल में नवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच हुआ। ये मंदिर नागर स्थापत्य शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इनमें गर्भगृह, मंडप और शिखर प्रमुख स्थापत्य अंग हैं। मंदिरों में उत्कीर्ण देवी-देवताओं और अन्य मूर्तियों से चंदेल शासकों की धार्मिक मान्यताओं, कला और स्थापत्य-कौशल की जानकारी मिलती है। इनमें कंदरिया महादेव मंदिर विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
दिलवाड़ा के जैन मंदिर (राजस्थान)
राजस्थान के सिरोही जिले में माउंट आबू स्थित दिलवाड़ा के जैन मंदिरों का निर्माण ग्यारहवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच हुआ। ये मंदिर सोलंकी कालीन स्थापत्य तथा जैन धार्मिक संरक्षण के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। संगमरमर पर की गई सूक्ष्म नक्काशी इन मंदिरों की प्रमुख विशेषता है।
सोमनाथ मंदिर (गुजरात)
गुजरात में स्थित सोमनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह प्राचीन व्यापारिक केंद्र वेरावल के निकट स्थित था। महमूद गजनवी के आक्रमण के बाद सोलंकी शासक भीमदेव प्रथम के काल में इसके पुनर्निर्माण का उल्लेख मिलता है। यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ राजनीतिक और आर्थिक महत्त्व का भी प्रतीक था।
लिंगराज मंदिर (उड़ीसा)
भुवनेश्वर में स्थित लिंगराज मंदिर सोमवंशी काल की कलिंग स्थापत्य शैली और शिवभक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसका निर्माण ग्यारहवीं शताब्दी में हुआ। इसके अतिरिक्त परमार कालीन भोजपुर का भोजेश्वर मंदिर और मांडू का दुर्ग परमारों की स्थापत्य कला तथा तकनीकी कौशल के प्रमाण हैं।
इस प्रकार दुर्ग शासकों की सैन्य रणनीति, सामंती संगठन और क्षेत्रीय नियंत्रण के प्रमाण हैं, जबकि मंदिर धार्मिक संरक्षण, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक समृद्धि के प्रतीक हैं। इनसे नक्काशी, मूर्तिकला और वास्तुशास्त्रीय परंपराओं का ज्ञान होता है। दुर्ग और मंदिर राजकीय वैभव, धार्मिक आस्था तथा सामुदायिक जीवन के महत्त्वपूर्ण केंद्र भी थे।
बावड़ियाँ और जलाशय
राजस्थान और गुजरात जैसे शुष्क क्षेत्रों में जल-प्रबंधन और सामाजिक कल्याण के लिए बावड़ियों तथा जलाशयों का निर्माण कराया गया। इनकी नक्काशी, सीढ़ीनुमा संरचना और धार्मिक प्रतीक ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। इनके स्थापत्य में स्थानीय और धार्मिक परंपराओं का समन्वय दिखाई देता है। इनसे जल-संरक्षण की तकनीकों के साथ-साथ सामुदायिक और धार्मिक गतिविधियों की भी जानकारी प्राप्त होती है।
रानी की वाव (पाटन, गुजरात)
गुजरात के पाटन में ग्यारहवीं शताब्दी में सोलंकी शासक भीमदेव प्रथम की रानी उदयमती द्वारा निर्मित रानी की वाव, जिसे ‘रानी की बावड़ी’ भी कहा जाता है, जल-प्रबंधन और स्थापत्य-कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें विष्णु के अवतारों, देवी-देवताओं तथा अप्सराओं की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। यह सोलंकी कालीन स्थापत्य-कौशल और लोककल्याण की परंपरा का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।
चाँद बावड़ी (आभानेरी, राजस्थान)
राजस्थान के आभानेरी गाँव में स्थित चाँद बावड़ी अपनी सीढ़ीनुमा संरचना और ज्यामितीय विन्यास के लिए प्रसिद्ध है। यह राजस्थान की प्राचीन जल-प्रबंधन परंपरा और स्थापत्य-कौशल का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
अडालज बावड़ी (गुजरात)
गुजरात में अहमदाबाद के निकट स्थित अडालज की बावड़ी, जिसे रुदाबाई बावड़ी भी कहा जाता है, जल-स्थापत्य का प्रसिद्ध उदाहरण है। इसकी स्थापत्य शैली में स्थानीय तथा बाद की इस्लामी स्थापत्य परंपराओं का प्रभाव दिखाई देता है।
सहस्रलिंग तालाब (पाटन)
गुजरात के पाटन में सरस्वती नदी के किनारे सोलंकी शासक जयसिंह सिद्धराज (1092–1142 ई.) के संरक्षण में निर्मित सहस्रलिंग तालाब जल-संरक्षण, सिंचाई और धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था। इसके किनारे अनेक शिवलिंग स्थापित किए गए थे।
इस प्रकार बावड़ियाँ और जलाशय शासकों की लोककल्याणकारी नीतियों तथा जल-प्रबंधन की उन्नत परंपरा को दर्शाते हैं। ये सामुदायिक और धार्मिक केंद्रों के रूप में भी कार्य करते थे। उनकी स्थापत्य शैली और नक्काशी से स्थानीय कारीगरों की दक्षता तथा तत्कालीन सांस्कृतिक प्राथमिकताओं की जानकारी मिलती है।
पुरातात्त्विक अवशेष
ऐतिहासिक नगरों, शिक्षा-केंद्रों और व्यापारिक स्थलों की खुदाई से प्राप्त मूर्तियों, बर्तनों, औजारों तथा स्थापत्य-अवशेषों से तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक जीवन पर प्रकाश पड़ता है। मूर्तियों और स्थापत्य-अवशेषों में धार्मिक तथा सांस्कृतिक प्रतीकों का अंकन मिलता है।
बिहार के नालंदा और विक्रमशिला से पाल शासकों द्वारा संरक्षित बौद्ध शिक्षा-केंद्रों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इनके मठों, पुस्तकालयों और मूर्तियों से शिक्षा तथा बौद्ध धर्म की समृद्धि का ज्ञान होता है। नालंदा के अवशेष इसके अंतरराष्ट्रीय शिक्षा-केंद्र के रूप में महत्त्व को प्रमाणित करते हैं। प्रतिहारों की राजधानी कन्नौज से प्राप्त मूर्तियाँ, मंदिरों के अवशेष और बर्तन न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से उपयोगी हैं, बल्कि कन्नौज की व्यापारिक और सांस्कृतिक समृद्धि का भी प्रमाण हैं। वर्धन वंश की राजधानी थानेश्वर से प्राप्त मूर्तियाँ और अन्य अवशेष तत्कालीन धार्मिक जीवन की जानकारी देते हैं। सारनाथ से प्राप्त बौद्ध स्तूपों, मठों और मूर्तियों के अवशेषों से बौद्ध धर्म के संरक्षण तथा कला के विकास की जानकारी मिलती है। पुरातात्त्विक अवशेषों से शिक्षा, व्यापार और धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ शहरीकरण, कारीगरी तथा सामाजिक संगठन के स्तर का भी पता चलता है। खुदाई से प्राप्त बर्तन और औजार आर्थिक गतिविधियों तथा व्यापारिक संपर्कों को समझने में सहायक हैं।
इस प्रकार उत्तर भारत के राजनीतिक इतिहास के अध्ययन में पुरातात्त्विक स्रोत अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। अभिलेखों से शासकों के कालक्रम, युद्ध और प्रशासनिक व्यवस्था का ज्ञान होता है; सिक्कों से आर्थिक नीतियों और व्यापारिक गतिविधियों की जानकारी मिलती है; दुर्गों से सैन्य रणनीति और सामंती संगठन का पता चलता है; जबकि मंदिरों और बावड़ियों से धार्मिक संरक्षण, स्थापत्य कला और सामुदायिक जीवन के विविध पक्षों का ज्ञान होता है। पुरातात्त्विक अवशेष शिक्षा, व्यापार, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक जीवन को समझने में भी सहायक हैं।
साहित्यिक स्रोत
पुरातात्त्विक स्रोतों की भाँति साहित्यिक स्रोत भी उत्तर भारत के राजनीतिक इतिहास के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद मौखरि, परवर्ती गुप्त, वर्धन, गुर्जर-प्रतिहार, पाल, चंदेल, सोलंकी तथा चाहमान जैसे अनेक राजवंशों का उदय हुआ। इनके संबंध में उपलब्ध साहित्यिक रचनाओं से शासकों, युद्धों, राजनीतिक संघर्षों, प्रशासनिक व्यवस्था, धार्मिक नीतियों तथा सांस्कृतिक गतिविधियों की जानकारी प्राप्त होती है। साहित्यिक स्रोतों को मुख्यतः समकालीन ग्रंथ एवं ऐतिहासिक रचनाएँ, वीर-काव्य एवं चरित साहित्य, धार्मिक एवं विद्वत्तापूर्ण ग्रंथ, अरबी-फारसी ग्रंथ तथा विदेशी यात्रियों के विवरण के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।
समकालीन ग्रंथ एवं ऐतिहासिक रचनाएँ
समकालीन ग्रंथ तत्कालीन शासकों, उनके प्रशासन, सैन्य अभियानों और सांस्कृतिक गतिविधियों के अध्ययन के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इनकी रचना दरबारी कवियों, विद्वानों, धार्मिक आचार्यों अथवा स्वयं शासकों द्वारा संस्कृत, प्राकृत, पालि और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में की गई। इनमें राजनीतिक घटनाओं के साथ-साथ समाज, धर्म, शिक्षा, कला और संस्कृति से संबंधित सामग्री भी मिलती है।

हर्षचरित (बाणभट्ट)
बाणभट्ट द्वारा रचित ‘हर्षचरित’ पुष्यभूति वंश के शासक हर्षवर्धन का जीवनचरित है। इसमें हर्ष के जीवन, कन्नौज की राजनीतिक स्थिति, उसके सैन्य अभियानों तथा सांस्कृतिक गतिविधियों का वर्णन मिलता है। यद्यपि इसमें राजकीय प्रशंसा और काव्यात्मक अलंकरण पर्याप्त हैं, फिर भी यह हर्षकालीन राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
गौड़वहो (वाक्पतिराज)
‘गौड़वहो’ अथवा ‘गौड़वध’ प्राकृत कवि वाक्पतिराज की रचना है, जो कन्नौज के शासक यशोवर्मन के दरबारी कवि थे। इसमें यशोवर्मन के जीवन, विजयों और राजनीतिक उपलब्धियों का वर्णन किया गया है। यह आठवीं शताब्दी के उत्तर भारत की राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के अध्ययन में उपयोगी है।
रामचरित (संध्याकरनंदी)
संध्याकरनंदी की ‘रामचरित’ में रामायण की कथा और पाल शासक रामपाल के जीवन का समानांतर वर्णन मिलता है। इसमें रामपाल के शासन तथा कैवर्त विद्रोह का उल्लेख है। इसलिए यह बंगाल के पाल इतिहास के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
नवसाहसांकचरित (पद्मगुप्त)
पद्मगुप्त ‘परिमल’ द्वारा रचित ‘नवसाहसांकचरित’ में परमार शासक सिंधुराज के व्यक्तित्व, सैन्य अभियानों और उपलब्धियों का वर्णन मिलता है। काव्यात्मक अतिशयोक्ति के बावजूद यह परमार दरबार तथा उसके सांस्कृतिक संरक्षण की जानकारी प्रदान करता है।
विक्रमांकदेवचरित (बिल्हण)
कश्मीरी कवि बिल्हण की ‘विक्रमांकदेवचरित’ में कल्याणी के चालुक्य शासक विक्रमादित्य षष्ठ (1076–1126 ई.) तथा उसके पूर्वजों का वर्णन है। यह कल्याणी के चालुक्यों के इतिहास और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के अध्ययन में उपयोगी है।
राजतरंगिणी (कल्हण)
कल्हण द्वारा रचित ‘राजतरंगिणी’ कश्मीर के इतिहास की प्रसिद्ध संस्कृत कृति है। इसका अर्थ ‘राजाओं की धारा’ है। इसमें आठ तरंगों में कश्मीर के राजाओं और उनके शासन का वर्णन किया गया है। कल्हण ने परंपराओं, अभिलेखों, पूर्ववर्ती रचनाओं और अन्य उपलब्ध स्रोतों का उपयोग करके इतिहास लिखने का प्रयास किया। इसलिए यह कश्मीर के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का प्रमुख स्रोत है। राजतरंगिणी की ऐतिहासिक परंपरा को बाद में जोनराज, श्रीवर और प्राज्ञभट्ट आदि लेखकों ने आगे बढ़ाया। मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में इसका फारसी अनुवाद भी कराया गया।
कुमारपालचरित एवं द्व्याश्रय (हेमचंद्र)
जैन आचार्य हेमचंद्र द्वारा रचित ‘द्व्याश्रय’ गुजरात के चालुक्य या चौलुक्य शासकों के इतिहास का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इसमें चालुक्य वंश की वंशावली तथा उसके प्रमुख शासकों का वर्णन मिलता है। हेमचंद्र को जयसिंह सिद्धराज और कुमारपाल का संरक्षण प्राप्त था। उनकी रचनाओं से कुमारपाल के शासन तथा गुजरात में जैन धर्म के प्रभाव की जानकारी मिलती है।
समरांगणसूत्रधार (भोज)
परमार शासक भोज से संबद्ध ‘समरांगणसूत्रधार’ वास्तुशास्त्र, स्थापत्य और कला का महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें मंदिर-निर्माण, नगर-योजना, भवन-निर्माण, मूर्तिकला तथा स्थापत्य संबंधी सिद्धांतों का वर्णन मिलता है। इससे तत्कालीन स्थापत्य-ज्ञान और कलात्मक परंपराओं की जानकारी प्राप्त होती है।
प्रबंधचिंतामणि (मेरुतुंग)
जैन लेखक मेरुतुंग की ‘प्रबंधचिंतामणि’ में परमारों तथा गुजरात के चौलुक्य शासकों से संबंधित अनेक कथाएँ और घटनाएँ मिलती हैं। इससे शासकों की उपलब्धियों, धार्मिक संरक्षण तथा तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन की जानकारी प्राप्त होती है।
प्रभावकचरित (प्रभाचंद्र)
श्वेतांबर जैन आचार्य प्रभाचंद्र की ‘प्रभावकचरित’ की रचना लगभग 1277–1278 ईस्वी में हुई। इसमें जैन आचार्यों और धार्मिक परंपराओं से संबंधित सामग्री मिलती है। यह तत्कालीन धार्मिक तथा सामाजिक इतिहास के अध्ययन में सहायक है।
वीर-काव्य एवं ऐतिहासिक चरित
वीर-काव्यों और ऐतिहासिक चरितों में राजपूत शासकों की वंशावलियों, युद्धों, वीरता, बलिदान और नैतिक आदर्शों का वर्णन मिलता है। इनमें भाट-चारण परंपरा का विशेष प्रभाव दिखाई देता है। इन रचनाओं का ऐतिहासिक उपयोग सावधानीपूर्वक करना आवश्यक है, क्योंकि इनमें काव्यात्मक अतिशयोक्ति, लोकपरंपराएँ तथा परवर्ती परिवर्धन पाए जाते हैं।
पृथ्वीराजविजयमहाकाव्य (जयानक)
चाहमान शासक पृथ्वीराज तृतीय के दरबारी कवि जयानक द्वारा रचित ‘पृथ्वीराजविजयमहाकाव्य’ संस्कृत की महत्त्वपूर्ण कृति है। इसमें चाहमान वंश और पृथ्वीराज के जीवन तथा तराइन के प्रथम युद्ध में उसकी विजय का वर्णन मिलता है। इसमें तराइन के दूसरे युद्ध और पृथ्वीराज की पराजय का विवरण नहीं मिलता। यह चाहमान वंश तथा पृथ्वीराज के इतिहास के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
पृथ्वीराजरासो (चंदबरदाई)
चंदबरदाई से संबद्ध ‘पृथ्वीराजरासो’ में पृथ्वीराज चौहान की वीरगाथा, तुर्कों के साथ संघर्ष तथा संयोगिता के प्रसंग का काव्यात्मक वर्णन मिलता है। इसकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता पर विद्वानों ने प्रश्न उठाए हैं और इसका वर्तमान स्वरूप परवर्ती माना जाता है। फिर भी यह हिंदी की वीरगाथा परंपरा तथा राजपूत आदर्शों को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है।
नैषधचरित (श्रीहर्ष)
श्रीहर्ष का ‘नैषधचरित’ नल-दमयंती की कथा पर आधारित संस्कृत महाकाव्य है। श्रीहर्ष का संबंध गहड़वाल शासक जयचंद्र के दरबार से माना जाता है। उनकी रचनाओं से तत्कालीन राजदरबार और बौद्धिक वातावरण की जानकारी प्राप्त होती है।
हम्मीर महाकाव्य (नयचंद्रसूरि)
नयचंद्रसूरि द्वारा रचित ‘हम्मीर महाकाव्य’ रणथम्भौर के चाहमान शासक हम्मीरदेव के जीवन पर आधारित है। इसमें हम्मीरदेव और अलाउद्दीन खिलजी के बीच 1301 ईस्वी के रणथम्भौर युद्ध तथा हम्मीरदेव के संघर्ष और बलिदान का वर्णन मिलता है। यह चाहमान इतिहास और राजपूत वीरता की परंपरा के अध्ययन में उपयोगी है।
हम्मीर रासो
हम्मीर रासो के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं और इसके रचयिता के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। एक परंपरा में इसके रचयिता शारंगधर माने जाते हैं, जबकि प्रचलित रूप से जोधराज को ‘हम्मीर रासो’ का प्रमुख रचयिता माना जाता है। इसके अतिरिक्त, महेश कवि के नाम से भी एक अन्य ‘हम्मीर रासो’ का उल्लेख मिलता है। इसकी कोई प्रामाणिक मूल प्रति उपलब्ध नहीं है। जोधराज कृत ‘हम्मीर रासो’ में रणथंभौर के चौहान शासक राव हम्मीरदेव के शौर्य, वीरता तथा अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध उनके संघर्ष का काव्यात्मक वर्णन किया गया है। यद्यपि इसमें ऐतिहासिक घटनाओं के साथ काव्यात्मक अतिशयोक्ति और किंवदंतियाँ भी मिश्रित हैं, फिर भी यह राजपूत शौर्य, युद्ध-परंपरा और शाका की परंपरा को समझने के लिए उपयोगी साहित्यिक स्रोत है।
खुमाण रासो
‘खुमाण रासो’ में मेवाड़ के शासकों, विशेषकर खुमाण, की वीरता और सैन्य उपलब्धियों का वर्णन मिलता है। यह मेवाड़ की वीरगाथा परंपरा तथा राजस्थानी सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन में उपयोगी है।
राठौड़ री वचनिका
‘राठौड़ री वचनिका’ राजस्थानी वचनिका साहित्य की रचना है, जिसमें राठौड़ शासकों की वीरता और वंशपरंपरा का वर्णन मिलता है। यह भाट-चारण परंपरा तथा मारवाड़ के सांस्कृतिक इतिहास को समझने में सहायक है।
धार्मिक एवं विद्वत्तापूर्ण ग्रंथ
पूर्व-मध्यकालीन भारत में बौद्ध, जैन और हिंदू विद्वानों द्वारा अनेक धार्मिक एवं विद्वत्तापूर्ण ग्रंथों की रचना की गई। इनमें धर्म, दर्शन, व्याकरण, विज्ञान, साहित्य, शिक्षा और सामाजिक जीवन से संबंधित सामग्री मिलती है। कुछ ग्रंथों से शासकों की धार्मिक नीतियों तथा विद्वानों और धार्मिक संस्थाओं को दिए गए संरक्षण की जानकारी भी प्राप्त होती है।
जैन ग्रंथ
सोलंकी शासकों के संरक्षण में जैन विद्वान हेमचंद्र ने अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। ‘त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित’ और ‘सिद्ध-हेम-शब्दानुशासन’ से जैन धर्म, दर्शन, इतिहास और व्याकरण के साथ-साथ गुजरात के बौद्धिक वातावरण की जानकारी प्राप्त होती है। इनसे सिद्धराज जयसिंह और कुमारपाल के धार्मिक एवं विद्वत्संरक्षण की भी जानकारी मिलती है।
बौद्ध ग्रंथ
पाल शासकों के संरक्षण में नालंदा और विक्रमशिला जैसे प्रमुख बौद्ध शिक्षा-केंद्र विकसित हुए। अतीश दीपंकर तथा अन्य बौद्ध विद्वानों की रचनाओं से बौद्ध दर्शन, शिक्षा और पालकालीन धार्मिक गतिविधियों की जानकारी मिलती है। इन स्रोतों से भारत के अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक एवं धार्मिक संबंधों पर भी प्रकाश पड़ता है।
वैदिक एवं पौराणिक ग्रंथ
पूर्व-मध्यकाल में ब्राह्मण विद्वानों द्वारा रचित वैदिक और पौराणिक ग्रंथों से धार्मिक अनुष्ठानों, कर्मकांडों, सामाजिक मान्यताओं और धार्मिक संस्थाओं की जानकारी प्राप्त होती है। इनका उपयोग तत्कालीन धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास के पुनर्निर्माण में किया जाता है।
काव्यशास्त्र एवं नीतिशास्त्र संबंधी ग्रंथ
परमार शासक भोज के संरक्षण और विद्वत्परंपरा से संबंधित ‘शृंगारप्रकाश’, ‘सरस्वतीकंठाभरण’ और ‘युक्तिकल्पतरु’ जैसी रचनाएँ साहित्य, भाषा, कला, नीति तथा शासन-संबंधी तत्कालीन ज्ञान पर प्रकाश डालती हैं। इनके माध्यम से पूर्व-मध्यकालीन बौद्धिक और सांस्कृतिक जीवन को समझने में सहायता मिलती है।
इसके अतिरिक्त चाहमान शासक विग्रहराज चतुर्थ से संबंधित सोमदेव की ‘ललितविग्रहराज’ तथा विग्रहराज की ‘हरिकेलि’ जैसी रचनाएँ चाहमान इतिहास के अध्ययन में उपयोगी हैं। ‘बल्लालचरित’, जयदेव का ‘गीतगोविंद’, ‘सुरजनचरित’, लक्ष्मीधर का ‘कृत्यकल्पतरु’, मेरुतुंग की ‘प्रबंधचिंतामणि’, राजशेखरसूरि का ‘प्रबंधकोश’, नयचंद्र की ‘रंभामंजरी’, विद्यापति की ‘पुरुषपरीक्षा’, कृष्णमिश्र का ‘प्रबोधचंद्रोदय’ तथा मंख की ‘श्रीकंठचरित’ जैसी रचनाएँ भी तत्कालीन समाज, संस्कृति, धर्म और राजनीतिक जीवन के विभिन्न पक्षों को समझने में सहायक हैं।
अरबी एवं फारसी ग्रंथ
भारतीय इतिहास के अध्ययन में अरबी और फारसी ग्रंथों का विशेष महत्त्व है। अरब और फारसी लेखकों ने भारत की राजनीतिक परिस्थितियों, विभिन्न राज्यों, व्यापारिक गतिविधियों, सामाजिक जीवन तथा धार्मिक परंपराओं का विवरण प्रस्तुत किया है। इन ग्रंथों में लेखकों के प्रत्यक्ष अनुभवों के साथ-साथ यात्रियों, व्यापारियों और अन्य विद्वानों से प्राप्त सूचनाओं का भी उपयोग किया गया है। इन स्रोतों से विशेष रूप से उत्तर भारत के राजनीतिक इतिहास, अरबों के साथ भारत के संपर्क, व्यापारिक मार्गों तथा सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त होती है।
चचनामा
‘चचनामा’, जिसे ‘फतहनामा-ए-सिंध’ भी कहा जाता है, में चच राजवंश, राजा दाहिर तथा 712 ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध विजय का विवरण मिलता है। परंपरा के अनुसार, अली बिन मुहम्मद अल-कूफी ने इसका फारसी रूपांतरण किया और इसे नासिरुद्दीन क़ुबाचा को समर्पित किया। यह सिंध की राजनीतिक स्थिति तथा अरब विजय के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
अल-कामिल फी अल-तारीख
अली इब्न अल-अथीर द्वारा रचित ‘अल-कामिल फी अल-तारीख’ मध्यकालीन इस्लामी विश्व के इतिहास का महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें भारत से संबंधित अनेक घटनाओं का उल्लेख मिलता है। चंदेल शासक विद्याधर और महमूद गजनवी के संघर्ष तथा उत्तर भारत पर तुर्क आक्रमणों के संदर्भ में इसकी सूचनाएँ उपयोगी हैं। इससे तत्कालीन राजपूत शक्तियों और तुर्क शासकों के बीच संघर्ष की जानकारी प्राप्त होती है।
ताज-उल-मासीर
हसन निजामी की ‘ताज-उल-मासीर’ मुहम्मद गोरी के भारत अभियानों तथा दिल्ली सल्तनत के प्रारंभिक इतिहास का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इसमें तुर्क आक्रमणों, विभिन्न युद्धों और राजनीतिक घटनाओं का वर्णन मिलता है। चंदावर के युद्ध में जयचंद्र की पराजय का उल्लेख भी इसमें मिलता है। इसकी सूचनाओं की तुलना मिनहाज-उस-सिराज की ‘तबकात-ए-नासिरी’ तथा अन्य समकालीन और परवर्ती स्रोतों से की जाती है।
विदेशी यात्रियों के विवरण
भारत आने वाले चीनी, अरब, फारसी और अन्य विदेशी यात्रियों ने भारतीय समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था, धर्म तथा संस्कृति का विवरण प्रस्तुत किया। उनके यात्रा-वृत्तांतों में शासकों की शक्ति, प्रशासन, धार्मिक केंद्रों, शिक्षा-संस्थानों, व्यापारिक मार्गों, बंदरगाहों, नगरों और सामाजिक प्रथाओं की जानकारी मिलती है। हालांकि इन विवरणों में लेखकों की व्यक्तिगत धारणाएँ और सीमाएँ भी दिखाई देती हैं, इसलिए उनका उपयोग अन्य स्रोतों के साथ तुलनात्मक रूप से किया जाना चाहिए।
ह्वेनसांग
चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनसांग सातवीं शताब्दी में भारत आया और हर्षवर्धन के शासनकाल में उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा की। उसने कन्नौज, प्रयाग, नालंदा तथा अनेक अन्य स्थानों का विस्तृत विवरण दिया। उसके वृत्तांत से हर्ष के साम्राज्य, प्रशासन, धर्म, शिक्षा, सामाजिक जीवन और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त होती है। ह्वेनसांग की यात्रा का विवरण चीनी भाषा में ‘सी-यू-की’ के नाम से प्रसिद्ध है। उसकी यात्रा का मुख्य उद्देश्य बौद्ध तीर्थों की यात्रा करना तथा बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन और संग्रह करना था, किंतु उसके विवरण से तत्कालीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों पर भी पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। उसके शिष्य ह्वीली ने ह्वेनसांग की जीवनी लिखी, जो उसके यात्रा-वृत्तांत की पूरक मानी जाती है।
इत्सिंग
चीनी बौद्ध यात्री इत्सिंग 671 ईस्वी में समुद्री मार्ग से भारत आया और लंबे समय तक यहाँ रहा। उसने नालंदा सहित प्रमुख बौद्ध शिक्षा-केंद्रों में अध्ययन किया तथा बौद्ध साहित्य का संग्रह और अनुवाद किया। उसके विवरण से भारत में बौद्ध धर्म, शिक्षा-पद्धति, मठों तथा बौद्ध विद्वानों की स्थिति की जानकारी मिलती है। उसके यात्रा-विवरण का प्रसिद्ध अंग्रेजी अनुवाद ‘ए रिकॉर्ड ऑफ द बुद्धिस्ट रिलिजन’ नाम से प्रकाशित हुआ।
सुलेमान सौदागर
सुलेमान, जिसे सुलेमान अल-ताजिर (व्यापारी) कहा जाता है, नौवीं शताब्दी का मुस्लिम व्यापारी और यात्री था। उसने लगभग 850 ईस्वी में भारत और चीन की यात्रा की तथा अपने अनुभवों का विवरण लिखा। उसके विवरण से तत्कालीन भारत की राजनीतिक स्थिति, समुद्री व्यापार और आर्थिक गतिविधियों की जानकारी मिलती है। सुलेमान के समय बंगाल में पाल वंश (750-1162 ई.) का शासन था। उसने पाल साम्राज्य की समृद्धि और सैन्य शक्ति का उल्लेख किया। उसने गुर्जर-प्रतिहार शासक मिहिरभोज को मुसलमानों का शक्तिशाली विरोधी बताया तथा उसकी सेना, विशेषकर घुड़सवार सेना, का उल्लेख किया। उसका विवरण नौवीं शताब्दी के भारत की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति के अध्ययन के लिए उपयोगी है।
इब्न खोरदादबेह
इब्न खोरदादबेह नौवीं शताब्दी का फारसी भूगोलवेत्ता और लेखक था। उसकी प्रसिद्ध रचना ‘किताब अल-मसालिक वा अल-ममालिक’ अर्थात् ‘सड़कों और राज्यों की पुस्तक’ है, जिसकी रचना लगभग 870 ई. के आसपास हुई। इसमें विभिन्न देशों के मार्गों, व्यापारिक संपर्कों तथा भारत के जल और स्थल व्यापारिक मार्गों का विवरण मिलता है। इब्न खोरदादबेह ने स्वयं भारत की यात्रा नहीं की थी। उसने प्रशासनिक सूचनाओं तथा व्यापारियों और यात्रियों से प्राप्त जानकारियों के आधार पर अपना विवरण तैयार किया। उसके विवरण से भारत के व्यापारिक मार्गों, भौगोलिक स्थिति तथा विभिन्न सामाजिक समूहों के संबंध में जानकारी प्राप्त होती है।
बुज़ुर्ग बिन शहरयार
बुज़ुर्ग बिन शहरयार एक समुद्री यात्री था। उसने भारत, चीन तथा हिंद महासागर के अन्य क्षेत्रों से संबंधित यात्राओं और समुद्री अनुभवों को ‘अजायबुल हिंद’ नामक अरबी ग्रंथ में संकलित किया। इसमें दक्षिण भारत और गुजरात से संबंधित अनेक घटनाओं, समुद्री व्यापार, व्यापारियों तथा समुद्री डाकुओं के संबंध में उपयोगी सूचनाएँ मिलती हैं। इससे तत्कालीन समुद्री व्यापार और हिंद महासागर के संपर्कों की जानकारी प्राप्त होती है।
अल-इस्तखरी
अल-इस्तखरी दसवीं शताब्दी का प्रसिद्ध इस्लामी भूगोलवेत्ता था। उसकी प्रमुख रचना ‘किताब अल-मसालिक वा अल-ममालिक’ थी। उसने सिंध, मुल्तान, मंसूरा, अलोर तथा सिंधु नदी सहित भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों का विवरण प्रस्तुत किया। उसके विवरण में व्यापारिक मार्गों, विभिन्न प्रदेशों तथा समुद्री क्षेत्रों की जानकारी मिलती है। उसने भौगोलिक मानचित्र भी तैयार किए थे, जिनमें सिंध का मानचित्र शामिल था। उसके विवरण से तत्कालीन भारत के भूगोल और व्यापारिक संपर्कों के अध्ययन में सहायता मिलती है।
अल-मसूदी
अल-मसूदी दसवीं शताब्दी का प्रसिद्ध अरब इतिहासकार और भूगोलवेत्ता था। उसने भारत के पश्चिमी तट तथा सिंध से संबंधित क्षेत्रों का विवरण प्रस्तुत किया। उसने सिंध और पंजाब में अरब प्रभाव तथा स्थानीय शासकों के साथ अरबों के संबंधों पर प्रकाश डाला। उसकी प्रमुख रचनाओं में ‘मुरूज अल-ज़हब’ तथा ‘किताब अल-तनबीह वल-इशराफ’ शामिल हैं। ‘मुरूज अल-ज़हब’ में भारत की भौगोलिक परिस्थितियों, विभिन्न क्षेत्रों और राजनीतिक शक्तियों से संबंधित सूचनाएँ मिलती हैं। उसने कश्मीर, गुर्जर-प्रतिहारों तथा पश्चिमी भारत के अनेक क्षेत्रों का उल्लेख किया। उसके विवरण से भारतीय राजाओं, विभिन्न भाषाओं, व्यापार और समुद्री मार्गों के संबंध में भी जानकारी प्राप्त होती है। व्यापक ऐतिहासिक दृष्टि के कारण अल-मसूदी को कभी-कभी ‘अरबों का हेरोडोटस’ कहा जाता है।
इब्न हौकल
इब्न हौकल दसवीं शताब्दी का अरब व्यापारी और भूगोलवेत्ता था। उसकी प्रसिद्ध रचना ‘किताब अल-सूरत अल-अर्द’ है, जिसका अर्थ ‘पृथ्वी का स्वरूप’ है। यह ग्रंथ मुख्यतः अल-इस्तखरी की भौगोलिक रचना के संशोधन और विस्तार पर आधारित था। इब्न हौकल ने सिंध और सिंधु नदी के भूगोल के साथ-साथ भारत की व्यापक भौगोलिक स्थिति का वर्णन करने का प्रयास किया। उसका विवरण पूरी तरह सटीक नहीं था, फिर भी भारत की भौगोलिक सीमाओं, प्रदेशों और व्यापारिक संपर्कों के अध्ययन में इसका महत्त्व है।
अल-मुकद्दसी
शम्सुद्दीन मुहम्मद बिन अहमद अल-मुकद्दसी दसवीं शताब्दी का प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता था। उसकी रचना ‘अहसन अल-तकासीम फी मारिफत अल-अकालीम’ है। वह भारत में सिंध से आगे नहीं गया था। उसकी पुस्तक के अंतिम भाग में सिंध से संबंधित विवरण मिलता है। मुकद्दसी ने प्रदेशों और नगरों का क्रमबद्ध विवरण प्रस्तुत किया तथा व्यापार, कृषि-उत्पादन, कारीगरी, धर्म और मुद्रा से संबंधित सूचनाएँ दीं। इस कारण उसका विवरण सिंध की आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक स्थिति के अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण है।
अल्बरूनी
अबू रैहान अल्बरूनी ग्यारहवीं शताब्दी का प्रसिद्ध विद्वान था, जो महमूद गजनवी के समय भारत आया। उसने पंजाब और उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों का अध्ययन किया तथा भारतीय धर्म, दर्शन, गणित, खगोल-विज्ञान, चिकित्सा और सामाजिक परंपराओं में गहरी रुचि ली। उसने संस्कृत सीखी और भारतीय ग्रंथों का अध्ययन किया। उसकी प्रसिद्ध रचना ‘किताब-उल-हिंद’ लगभग 80 अध्यायों में विभाजित अरबी ग्रंथ है। इसमें भारतीय धर्म, दर्शन, विज्ञान, गणित, खगोल-विज्ञान, रीति-रिवाज, सामाजिक जीवन, कानून और बौद्धिक परंपराओं का विस्तृत विवरण मिलता है। उसने भारतीय समाज की वर्ण-व्यवस्था, धार्मिक मान्यताओं और विभिन्न सामाजिक प्रथाओं का वर्णन किया तथा भारतीय विद्वानों की उपलब्धियों की प्रशंसा के साथ-साथ उनकी कुछ सीमाओं की आलोचना भी की।
अल्बरूनी का विवरण विशेष रूप से इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि उसने भारतीय ज्ञान-परंपरा को समझने के लिए संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन किया और भारतीय तथा इस्लामी विद्वत्ता के बीच संवाद स्थापित किया। उसकी ‘किताब-उल-हिंद’ भारतीय समाज और संस्कृति के अध्ययन का एक अद्वितीय स्रोत है।
चाऊ-जु-कुआ
चाऊ-जु-कुआ एक चीनी अधिकारी और लेखक था, जिसने लगभग 1225 ईस्वी में ‘चाऊ फान ची’ की रचना की। इसमें चीन, भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच होने वाले समुद्री व्यापार का विवरण मिलता है। उसने मालाबार के बंदरगाहों तथा चीन और अरब के साथ होने वाले व्यापार का उल्लेख किया। उसके अनुसार मालाबार से कपास और मसालों, विशेषकर काली मिर्च, का निर्यात होता था तथा बदले में रेशम और चीनी मिट्टी के सामान प्राप्त होते थे। उसके विवरण से मालाबार के व्यापार, बंदरगाहों, आर्थिक जीवन, स्थानीय उत्पादों और व्यापारिक संबंधों की जानकारी प्राप्त होती है।
मार्को पोलो
मार्को पोलो तेरहवीं शताब्दी का वेनिसी व्यापारी और यात्री था। उसने दक्षिण भारत की यात्रा की और पांड्य राज्य के कयाल बंदरगाह का उल्लेख किया। उसने पांड्य राज्य की समृद्धि, विदेशी व्यापार तथा प्रशासन का वर्णन किया। उसके अनुसार पांड्य क्षेत्र मोतियों के लिए प्रसिद्ध था। मार्को पोलो ने दक्षिण भारत के आर्थिक जीवन, व्यापारिक गतिविधियों, बंदरगाहों और विभिन्न सामाजिक प्रथाओं का विवरण दिया। उसने काकतीय शासिका रुद्रमादेवी का भी उल्लेख किया है। उसका यात्रा-विवरण तेरहवीं शताब्दी के दक्षिण भारत के राजनीतिक और आर्थिक इतिहास के अध्ययन में उपयोगी है।
इब्नबतूता
इब्नबतूता का जन्म 1304 ईस्वी में मोरक्को के तैंजियर में हुआ था। वह 1333 ईस्वी के आसपास भारत पहुँचा और मुहम्मद बिन तुगलक के दरबार में नियुक्त हुआ। उसने लगभग आठ वर्ष तक दिल्ली के क़ाज़ी के रूप में कार्य किया। बाद में वह सुल्तान के दूत के रूप में चीन की यात्रा पर गया। उसका प्रसिद्ध यात्रा-वृत्तांत ‘रेहला’ अरबी भाषा में लिखा गया है। इसमें मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल की राजनीतिक घटनाओं, प्रशासन, न्याय-व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, नगरों, बाजारों, डाक-व्यवस्था, सामाजिक जीवन, त्योहारों, भोजन, वस्त्र और जलवायु का विस्तृत विवरण मिलता है। इब्नबतूता ने दिल्ली की डाक-व्यवस्था और सुल्तान के दरबार की भव्यता का भी उल्लेख किया है। ‘रेहला’ चौदहवीं शताब्दी के भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
साहित्यिक स्रोतों का महत्त्व
समकालीन साहित्यिक ग्रंथ और विदेशी यात्रियों के विवरण शासकों के युद्धों, राजनीतिक संघर्षों, गठबंधनों तथा प्रशासनिक नीतियों की जानकारी प्रदान करते हैं। काव्य और ऐतिहासिक रचनाओं से सैन्य अभियानों, राजवंशों और सामंती संबंधों की जानकारी प्राप्त होती है। धार्मिक तथा दार्शनिक ग्रंथ तत्कालीन धार्मिक विचारों, सामाजिक मूल्यों, नैतिक मान्यताओं, शिक्षा और बौद्धिक गतिविधियों पर प्रकाश डालते हैं। विदेशी यात्रियों के विवरणों से सामाजिक संरचना, नगरों, व्यापारिक मार्गों, समुद्री व्यापार, धार्मिक केंद्रों और आर्थिक समृद्धि की जानकारी मिलती है।
यद्यपि साहित्यिक स्रोतों की सीमाओं को ध्यान में रखना आवश्यक है। ‘पृथ्वीराज रासो’ और ‘हम्मीर रासो’ जैसी कुछ रचनाओं में अतिशयोक्ति तथा परवर्ती सामग्री के कारण ऐतिहासिक विश्वसनीयता की समस्याएँ हैं। ‘राजतरंगिणी’ मुख्यतः कश्मीर के क्षेत्रीय इतिहास तक सीमित है। इसी प्रकार दरबारी लेखकों की रचनाओं में शासकों की प्रशंसा और उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति मिल सकती है। विदेशी यात्रियों के विवरण भी पूरी तरह निष्पक्ष नहीं माने जा सकते, क्योंकि उनकी जानकारी उनके उद्देश्य, व्यक्तिगत अनुभव और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से प्रभावित होती थी। इसलिए इन सभी स्रोतों की तुलना अभिलेखों, सिक्कों और पुरातात्त्विक साक्ष्यों से करना आवश्यक है।
इस प्रकार अभिलेखीय, पुरातात्त्विक, साहित्यिक तथा विदेशी विवरणों के संयुक्त अध्ययन से लगभग 550 ईस्वी से 1200 ईस्वी के उत्तर भारतीय इतिहास का व्यापक चित्र निर्मित किया जा सकता है। अभिलेख, सिक्के, दुर्ग, मंदिर, मूर्तियाँ और बावड़ियाँ ठोस ऐतिहासिक साक्ष्य प्रदान करते हैं, जबकि साहित्यिक ग्रंथ और विदेशी यात्रियों के विवरण राजनीतिक घटनाओं के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन के विभिन्न पक्षों को समझने में सहायता करते हैं। इन सभी स्रोतों का आलोचनात्मक और तुलनात्मक अध्ययन ही इस काल के इतिहास के अधिक संतुलित एवं विश्वसनीय पुनर्निर्माण का आधार है।


