आठवीं शताब्दी में अरबों की सिंध विजय (712 ई.) के बाद सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटना तीन शक्तिशाली राज्यों का उदय और कन्नौज पर अधिकार करने के लिए उनके बीच चलने वाला त्रिपक्षीय संघर्ष था। भारत के पूर्वी भाग में बंगाल पर शक्तिशाली पाल वंश का शासन था, जबकि पश्चिमी भारत के अवंति-जालौर क्षेत्र में गुर्जर-प्रतिहार और दक्कन क्षेत्र में महाराष्ट्र में राष्ट्रकूट शासन कर रहे थे। आठवीं सदी के अंत में इन तीनों नवोदित शक्तियों ने कन्नौज पर अधिकार करने के लिए परस्पर संघर्ष किया, जो इतिहास में ‘त्रिपक्षीय संघर्ष’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह संघर्ष आठवीं सदी के अंतिम समय से आरंभ होकर दसवीं सदी के अंत तक लगभग 200 वर्षों तक चला।
ऐतिहासिक स्रोत
त्रिपक्षीय संघर्ष के संबंध में मुख्यतः संघर्ष में सम्मिलित होने वाले शासकों और उनके राजवंशों के अभिलेखों तथा साहित्यिक स्रोतों से जानकारी मिलती है। अभिलेखीय स्रोतों में प्रतिहार शासक मिहिरभोज का ग्वालियर अभिलेख, पाल नरेश धर्मपाल का भागलपुर ताम्रपत्र अभिलेख, राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष प्रथम का संजन ताम्रपत्र लेख, बड़ोदा अभिलेख, वणि डिंडोरी एवं राधनपुर के अभिलेख, बादल स्तंभलेख, दौकुंड अभिलेख आदि महत्त्वपूर्ण हैं।
साहित्यिक स्रोतों में ग्यारहवीं शती के गुजराती कवि सोड्ढल द्वारा रचित कथात्मक गद्यकाव्य ‘उदयसुंदरी कथा’, बंगाली संस्कृत कवि संध्याकरनंदी द्वारा रचित ‘रामचरितम्’ और बारहवीं शताब्दी के कश्मीरी पंडित जयानकभट्ट का संस्कृत ग्रंथ ‘पृथ्वीराजविजय’ उपयोगी हैं। इसके अलावा, विदेशी यात्रियों में अरब यात्री सुलेमान सौदागर के विवरण से भी इस त्रिपक्षीय संघर्ष पर कुछ प्रकाश पड़ता है।
कन्नौज की स्थिति
सम्राट हर्षवर्धन के समय से ही कन्नौज राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बन गया था। उस समय कन्नौज को वही गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त था, जो गुप्तकाल तक मगध का था। हर्ष के बाद यशोवर्मन ने कन्नौज को साम्राज्यिक सत्ता का प्रतीक बना दिया था। किंतु यशोवर्मन के अयोग्य उत्तराधिकारियों के बाद लगभग 770 ई. में कन्नौज पर आयुध वंश के वज्रायुध का अधिकार हो गया। वज्रायुध की मृत्यु के पश्चात् 783-784 ई. में उसका पुत्र इंद्रायुध कन्नौज का राजा हुआ, किंतु उसके भाई चक्रायुध ने उसके राज्याधिकार का विरोध किया। आठवीं सदी के अंत में आयुधवंशीय शासकों की आंतरिक दुर्बलता का लाभ उठाने और कन्नौज पर अधिकार करने के लिए भारत की तीन नवोदित शक्तियों—राजस्थान के गुर्जर-प्रतिहारों, बंगाल के पालों और दक्षिण भारत के राष्ट्रकूटों के बीच संघर्ष आरंभ हो गया, जो ‘त्रिपक्षीय संघर्ष’ के नाम से जाना जाता है।
त्रिपक्षीय संघर्ष के कारण
हर्षवर्धन के काल में कन्नौज के गौरव में आशातीत वृद्धि हुई और उसे वही सम्मान और महत्त्व मिला, जो गुप्तकाल तक पाटलिपुत्र और उज्जयिनी को प्राप्त था। कन्नौज अब राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं, धार्मिक, आर्थिक और सामरिक दृष्टि से भी उत्तर भारत का महत्त्वपूर्ण केंद्र हो गया था। इस समय चक्रवर्ती शासक बनने के लिए कन्नौज पर नियंत्रण करना आवश्यक माना जाने लगा था। यही कारण है कि गुर्जर-प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूट राजवंशों के शासक अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा के वशीभूत होकर कन्नौज पर अधिकार करने के लिए संघर्षरत हो गए।
गंगा-यमुना दोआब की उपजाऊ भूमि और जीवनोपयोगी जलवायु नव-स्थापित राजवंशों के आकर्षण का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण थी। कन्नौज पर अधिकार करने से गंगाघाटी में कृषि-संबंधी उपलब्ध संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकता था। इसलिए इस विशाल उपजाऊ भू-भाग पर अधिकार करने के लिए शासकों का प्रयत्न करना स्वाभाविक था। कन्नौज सहित गंगा-यमुना दोआब की आर्थिक समृद्धि की प्रशंसा अरब लेखकों ने भी की है।
व्यापार और वाणिज्य की दृष्टि से भी कन्नौज महत्त्वपूर्ण कड़ी था, क्योंकि यहां से विभिन्न दिशाओं के व्यापारिक मार्ग गुजरते थे। एक मार्ग कन्नौज से प्रयाग तथा फिर पूर्वी तट तक होते हुए दक्षिण में काँची तक जाता था। दूसरा मार्ग वाराणसी तथा गंगा के मुहाने तक जाता था। तीसरा मार्ग पूर्व में कामरूप और उत्तर से नेपाल तथा तिब्बत तक के लिए था। चौथा मार्ग कन्नौज से दक्षिण की ओर बनवासी तक जाता था। पांचवां मार्ग कन्नौज से गुजरात के भरूच तक पहुँचता था। वास्तव में, जिस प्रकार गुप्तकाल तक मगध उत्तरापथ के व्यापारिक मार्गों को नियंत्रित करता था, उसी प्रकार की स्थिति इस समय कन्नौज की थी। इस प्रकार राजनैतिक, आर्थिक और व्यापारिक लाभ के लिए दक्षिण और उत्तर भारत की शक्तियां कन्नौज पर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहती थीं।
पूर्वमध्यकालीन भारत की प्रायः सभी क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियां साम्राज्यवाद में विश्वास करती थीं। उनके महत्त्वाकांक्षी शासकों की यह सामान्य प्रवृत्ति थी कि वे एक बृहत्तर साम्राज्य के स्वामी बनना चाहते थे। यही कारण कि दक्षिणापथ के राष्ट्रकूटों ने उत्तर भारत में गुर्जर-प्रतिहारों और पालों के बीच चलने वाले संघर्ष में हस्तक्षेप किया। किंतु त्रिपक्षीय संघर्ष की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इस पूरे संघर्ष के दौरान कभी तीनों शक्तियों का एक साथ आमना-सामना नहीं हुआ।
त्रिपक्षीय संघर्ष में सम्मिलित प्रमुख शासक
| गुर्जर-प्रतिहार वंश | राष्ट्रकूट वंश | पाल वंश |
| वत्सराज (775-800 ई.) | ध्रुव धारावर्ष (780-793 ई.) | धर्मपाल (770-810 ई.) |
| नागभट्ट द्वितीय (800-833 ई.) | गोविंद तृतीय (793-814 ई.) | देवपाल (810-850 ई.) |
| रामभद्र (833-836 ई.) | अमोघवर्ष (814-880 ई.) | विग्रहपाल (850-854 ई.) |
| मिहिरभोज (836-885 ई.) | कृष्ण द्वितीय (878-914 ई.) | नारायणपाल (854-915 ई.) |
त्रिपक्षीय संघर्ष की पृष्ठभूमि और प्रारंभ (783-786 ई.)
आठवीं शताब्दी के अंत में कन्नौज पर आयुध वंश के इंद्रायुध का शासन था, लेकिन उसकी आंतरिक दुर्बलता के कारण गुर्जर-प्रतिहार शासक वत्सराज (775-800 ई.) ने 783 ई. के बाद कन्नौज पर आक्रमण किया। मिहिरभोज की ग्वालियर प्रशस्ति के अनुसार वत्सराज ने इंद्रायुध को पराजित कर उसे अपने सामंत के रूप में कन्नौज का शासक नियुक्त कर दिया। यह त्रिपक्षीय संघर्ष की पहली बड़ी घटना थी, जिसने पाल शासक धर्मपाल (770-810 ई.) को चुनौती दी।

चरण 1: वत्सराज द्वारा धर्मपाल की पराजय (784-786 ई.)
वत्सराज की सफलता से क्रुद्ध होकर पाल नरेश धर्मपाल ने कन्नौज पर आक्रमण किया, किंतु गंगा-यमुना दोआब में वत्सराज ने उसे पराजित कर दिया। राष्ट्रकूट गोविंद तृतीय के राधनपुर लेख से ज्ञात होता है कि वत्सराज ने गौड़राज की लक्ष्मी हस्तगत कर उसके दो राजछत्र छीन लिए। राष्ट्रकूट गोविंद तृतीय के राधनपुर लेख से पता चलता है कि ‘मदांध वत्सराज ने गौड़राज की लक्ष्मी को आसानी से हस्तगत कर उसके दो राजछत्रों को छीन लिया’—
हेलास्वीकृत गौड़राज्य कमलामत्तं प्रवेश्याचिरात्,
दुर्मार्गं मरुमध्यम् प्रतिवलर्यो वत्सराजं बलैः।
गौडीय शरदिन्दुपादधवलं छत्रद्वयं केवलं,
तस्मान्नाहृत तद्यशोपि कुकुभां प्रान्ते स्थितं तत्क्षणात्॥ राधनपुर लेख
वणि डिंडोरी लेख से भी पता चलता है कि गौड़ नरेश को पराजित कर वत्सराज दर्पयुक्त हो गया था। इस संदर्भ में पृथ्वीराजविजय में एक उल्लेख मिलता है कि चाहमान नरेश दुर्लभराज ने गौड़ देश को जीतकर अपनी तलवार को गंगासागर के जल से नहलाया था। संभवतः दुर्लभराज वत्सराज का सामंत था और उसने उसकी ओर से गौड़ नरेश के विरुद्ध युद्ध में भाग लिया था। अपनी पराजय के बाद धर्मपाल ने शक्ति जुटाकर वत्सराज से पुनः युद्ध करने का निश्चय किया और अपनी सेना का एक भाग गंगा-यमुना के दोआब में तैनात कर दिया।
ध्रुव का उत्तर भारत अभियान और वत्सराज-धर्मपाल की पराजय (786-790 ई.)
अभी प्रतिहार शासक वत्सराज और पाल शासक धर्मपाल का संघर्ष समाप्त ही हुआ था कि दक्षिण के राष्ट्रकूट शासक ध्रुव धारावर्ष (780-793 ई.) ने उत्तर भारत की राजनीति में हस्तक्षेप किया। ध्रुव ने 786 ई. के आसपास विंध्य पर्वत को पार कर प्रतिहार राज्य पर आक्रमण किया और युद्ध में प्रतिहार शासक वत्सराज को बुरी तरह पराजित कर राजपूताने के रेगिस्तान की ओर भागकर शरण लेने पर विवश कर दिया। वणि डिंडोरी और राधनपुर लेख से पता चलता है कि इस युद्ध में ध्रुव ने वत्सराज के यश के साथ-साथ उन दोनों राजछत्रों को भी छीन लिया, जिन्हें उसने गौड़ नरेश से छीना था—
गौडीयं शरदिन्दु-पादधवलं छत्रद्वयं केवलं।
तस्मान्नाहृत तद्यशोपि ककुभं प्रान्ते स्थितं तत्क्षणात्॥ राधनपुर लेख
वत्सराज को पराजित करने के बाद ध्रुव ने गंगा-यमुना के दोआब में ही बंगाल के पाल शासक धर्मपाल को भी पराजित किया। इस विजय की पुष्टि अमोघवर्ष के संजन लेख से होती है, जिसके अनुसार उसने गंगा-यमुना के बीच भागते हुए गौड़राज की लक्ष्मी के लीलारविंदों तथा श्वेतछत्रों को छीन लिया था—
गंगायमुनयोर्मध्ये राज्ञो गौडस्य नश्यतः।
लक्ष्मीलीलारविन्दानि श्वेतच्छत्राणि योऽहरेत्॥ संजन लेख
संजन लेख का समर्थन कर्क सुवर्ण के सूरत दानपत्र से भी होता है, जिसमें ध्रुव के लिए कहा गया है कि ‘गंगा की जलधारा को अवरुद्ध करने के कारण उनकी कीर्ति बढ़ गई थी’ (गांगोधसंतति निरोधविवृद्ध कीर्तिः)। कर्क के ही बड़ौदा ताम्रपत्र में भी वर्णित है कि ‘गंगा-यमुना के सुभग तरंगों को ग्रहण करने से ध्रुव ने उत्तम पद (ईश्वरता) को प्राप्त किया’। अल्तेकर का सुझाव है कि गंगा-यमुना तक अधिकार करने के कारण ध्रुव धारावर्ष को स्वर्गीय आनंद की अनुभूति हुई थी। ध्रुव को वत्सराज और धर्मपाल के विरुद्ध यह सफलता संभवतः 787-790 ई. के बीच मिली थी।
ध्रुव के उत्तर भारत के विरुद्ध अभियान के कारणों के संबंध में विवाद है। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि वत्सराज के मालवा पर आक्रमण के प्रत्युत्तर में ध्रुव ने अपने सामंत लाट के शासक कर्क द्वितीय की सहायता के लिए वत्सराज पर आक्रमण किया था। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि ध्रुव ने धर्मपाल के निमंत्रण पर वत्सराज के विरुद्ध अभियान किया था क्योंकि धर्मपाल का विवाह किसी राष्ट्रकूट सामंत परबल की पुत्री रट्टादेवी के साथ हुआ था। किंतु धर्मपाल द्वारा ध्रुव को आमंत्रित करने का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है और संजन लेख से स्पष्ट है कि बाद में ध्रुव ने धर्मपाल को भी पराजित किया था।
इतिहासकारों का विचार है कि ध्रुव ने गंगाघाटी की आर्थिक समृद्धि और कन्नौज की राजनीतिक प्रतिष्ठा से आकर्षित होकर उत्तरी भारत में सैनिक अभियान किया था। सच तो यह है कि प्रतिहार वत्सराज ने ध्रुव के विरुद्ध उसके भाई गोविंद की सहायता की थी, इसलिए संभवतः ध्रुव के उत्तरी अभियान का मुख्य उद्देश्य वJoystickराज को दंडित करना और उत्तर भारत से धन-संपत्ति प्राप्त करना था।
इस प्रकार ध्रुव ने वत्सराज एवं धर्मपाल को पराजित कर पाल-प्रतिहार आकांक्षाओं पर तुषारापात कर दिया। किंतु उसका उद्देश्य कन्नौज पर अधिकार करना अथवा उत्तर भारत में अपनी सत्ता का विस्तार करना नहीं था। फलतः कुछ समय तक गंगा एवं यमुना नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में ठहरने के बाद वह 790 ई. के लगभग अतुल संपत्ति और राजकीय चिह्नों के साथ दक्षिण भारत वापस लौट गया, जहाँ 793 ई. के लगभग उसकी मृत्यु हो गई।
चरण 2: धर्मपाल द्वारा चक्रायुध की स्थापना और उत्तरापथ स्वामित्व (790-800 ई.)
ध्रुव के लौटते ही धर्मपाल ने कन्नौज पर आक्रमण कर इंद्रायुध को हटाकर उसके भाई चक्रायुध को गद्दी पर बैठाया। भागलपुर एवं खालिमपुर अभिलेखों से ज्ञात होता है कि धर्मपाल ने कन्नौज में भव्य दरबार आयोजित किया, जिसमें भोज, मत्स्य, मद्र, कुरु आदि क्षेत्रों के शासकों ने उसकी अधिसत्ता स्वीकार की। सोड्ढल की उदयसुंदरीकथा में धर्मपाल को ‘उत्तरापथस्वामी’ कहा गया।
नागभट्ट द्वितीय द्वारा चक्रायुध-धर्मपाल की पराजय (800-810 ई.)
ध्रुव के अपनी राजधानी लौटते ही कन्नौज में इंद्रायुध और चक्रायुध के बीच सत्ता-संघर्ष पुनः शुरू हो गया। दरअसल, कन्नौज के दोनों आयुध भाई उत्तर भारत की साम्राज्यिक शक्तियों के संघर्ष की कठपुतली मात्र थे। राष्ट्रकूट ध्रुव द्वारा वत्सराज की पराजय का धर्मपाल ने लाभ उठाया और कन्नौज पर आक्रमण कर वहां के शासक इंद्रायुध को हटाकर चक्रायुध को स्थापित कर दिया। पाल वंश के भागलपुर तथा खालिमपुर अभिलेखों से पता चलता है कि धर्मपाल ने कन्नौज में एक भव्य दरबार का आयोजन किया, जिसमें भोज (बरार क्षेत्र), मत्स्य, मद्र (पूर्वी पंजाब), कुरु, यदु, यवन, अवंति, गंधार और कीर (कांगड़ा घाटी) आदि क्षेत्रों के शासक सम्मिलित हुए और इन शासकों ने धर्मपाल के दरबार में काँपते हुए मुकुट से सम्मानपूर्वक सिर झुकाकर उसकी अधिसत्ता स्वीकार की। इस प्रकार धर्मपाल समस्त उत्तरापथ का स्वामी बन गया। यही कारण है कि ग्यारहवीं सदी के गुजरात के कवि सोड्ढल ने उदयसुंदरीकथा में धर्मपाल को ‘उत्तरापथस्वामी’ की उपाधि से विभूषित किया है। किंतु शीघ्र ही धर्मपाल को एक और चुनौती का सामना करना पड़ा।
गुर्जर-प्रतिहार शासक वत्सराज की मृत्यु (800 ई. के लगभग) के बाद उसका पुत्र नागभट्ट द्वितीय (800-833 ई.) गुर्जर-प्रतिहार वंश का उत्तराधिकारी बना। कन्नौज की राजगद्दी पर चक्रायुध की स्थापना प्रतिहार नरेश नागभट्ट द्वितीय के लिए एक चुनौती थी। अतः उसने कन्नौज पर आक्रमण कर चक्रायुध को पराजित करके भगा दिया और अपनी ओर से इंद्रायुध को कन्नौज का राजा बना दिया। मिहिरभोज की ग्वालियर प्रशस्ति में कहा गया है कि चक्रायुध की नीचता इसी बात से सिद्ध थी कि वह ‘दूसरों’ के ऊपर निर्भर रहता था। स्पष्टतः यहां दूसरों से आशय धर्मपाल से है, जो चक्रायुध का संरक्षक और संभवतः संबंधी भी था।
नागभट्ट ने आगे बढ़कर चक्रायुध के सहयोगी पाल नरेश धर्मपाल को मुंगेर के समीप एक युद्ध में पराजित किया। ग्वालियर लेख में काव्यात्मक रूप में कहा गया है कि ‘बंग नरेश अपने हाथियों, घोड़ों और रथों के साथ घने बादलों के अंधकार की भांति आगे बढ़कर उपस्थित हुआ, किंतु त्रिलोकों को प्रसन्न करने वाले नागभट्ट ने उदीयमान सूर्य की भांति उस अंधकार को काट डाला।’ इस विवरण से स्पष्ट है कि युद्ध में धर्मपाल की पराजय हुई थी। चक्रायुध और धर्मपाल को पराजित कर नागभट्ट द्वितीय ने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया।
गोविंद तृतीय का उत्तर अभियान और नागभट्ट-धर्मपाल का आत्मसमर्पण (810-814 ई.)
इस समय राष्ट्रकूट वंश की बागडोर शक्तिशाली गोविंद तृतीय (793-814 ई.) के हाथ में थी। अभी नागभट्ट द्वितीय उत्तर भारत में अपनी विजय-पताका फहरा रहा था, तभी उसे वही झटका लगा जो उसके पिता वत्सराज को लगा था। संजन लेख से पता चलता है कि राष्ट्रकूट गोविंद तृतीय ने बड़े सुनियोजित ढंग से 810 ई. के आसपास गुर्जर-प्रतिहार राज्य पर आक्रमण किया। गोविंद से बुरी तरह पराजित होकर नागभट्ट द्वितीय राजपूताने में भाग गया। 811-12 ई. के बड़ौदा ताम्रपत्रों में कहा गया है कि ‘इंद्र ने अकेले ही गुर्जर-प्रतिहारों को पराजित कर दिया था’। संजन तथा राधनपुर लेखों में कहा गया है कि ‘जिस प्रकार शरद ऋतु के आते ही आकाश से बादल गायब हो जाते हैं, उसी प्रकार गोविंद के आते ही गुर्जर सम्राट नागभट्ट द्वितीय किसी अज्ञात स्थान में छिप गया। वह इतना अधिक भयाक्रांत था कि स्वप्न में भी यदि किसी युद्ध का दृश्य देखता, तो डर से काँपने लगता था।’
इस प्रकार स्पष्ट है कि गोविंद से पराजित होकर नागभट्ट द्वितीय को भी अपने पिता वत्सराज की भांति राजस्थान की मरुभूमि में शरण लेनी पड़ी थी। अल्तेकर के अनुसार दोनों सेनाओं की मुठभेड़ मध्य प्रदेश में झांसी तथा ग्वालियर के बीच किसी स्थान पर हुई होगी।
गोविंद तृतीय की विजयों से भयभीत होकर कन्नौज के शासक चक्रायुध और उसके संरक्षक धर्मपाल ने बिना युद्ध किए ही आत्मसमर्पण कर दिया और गोविंद तृतीय की अधीनता स्वीकार कर ली। वास्तव में, नागभट्ट द्वितीय से पराजित होने के बाद धर्मपाल संभवतः गोविंद तृतीय से युद्ध करने की स्थिति में नहीं था। अतः उसने गोविंद तृतीय के समक्ष आत्मसमर्पण करना ही श्रेयस्कर समझा।
गोविंद तृतीय के उत्तर भारतीय अभियान का कारण स्पष्ट नहीं है। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि धर्मपाल ने अपनी पराजय का बदला लेने के लिए गोविंद तृतीय को नागभट्ट पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया था। संभवतः नागभट्ट ने मालवा तथा गुजरात की ओर अपने साम्राज्य का विस्तार करने का प्रयास किया था, जबकि इन प्रदेशों पर राष्ट्रकूटों का प्रभुत्व था। इसलिए गोविंद तृतीय के लिए नागभट्ट द्वितीय की महत्त्वाकांक्षा पर अंकुश लगाना आवश्यक था। कारण जो भी रहा हो, गोविंद तृतीय का उत्तर भारतीय अभियान पूर्णतः सफल रहा और राष्ट्रकूट सेना ने दूसरी बार भी उत्तरी भारत के मैदानों में अपनी विजय का झंडा गाड़ दिया। राष्ट्रकूटों के राजकवियों के अनुसार दक्कन की रणभेरियों से हिमालय की कंदराएं गुंजायमान हो गईं। अमोघवर्ष प्रथम के संजन लेख में कहा गया है कि ‘गोविंद तृतीय के घोड़े हिमालय की धाराओं के बर्फीले पानी पीते थे और उसके हाथियों ने गंगा-यमुना के पवित्र जल में स्नान किया’। यद्यपि गोविंद के हिमालय तक जाने का विवरण अतिरंजित है, किंतु संभवतः उसने प्रयाग, वाराणसी एवं गया जैसे तीर्थ-स्थानों की यात्रा की थी। किंतु गोविंद के उत्तरी अभियान से प्रतिहारों तथा पालों को कोई क्षेत्रीय नुकसान नहीं हुआ। लगता है कि गोविंद तृतीय की उत्तर भारत की दिग्विजय का प्रमुख उद्देश्य क्षेत्रीय लाभ की महत्त्वाकांक्षा नहीं, बल्कि अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना मात्र था।
गोविंद तृतीय भी ध्रुव की भांति उत्तर भारत में अधिक समय तक नहीं रह सका। राष्ट्रकूट राजधानी में उसकी अनुपस्थिति का लाभ उठाकर दक्षिण के राजाओं ने उसके विरुद्ध एक संघ बना लिया था। अतः गोविंद तृतीय को दक्षिण लौट जाना पड़ा। गोविंद तृतीय से पराजित होने के बाद भी प्रतिहार नरेश नागभट्ट द्वितीय की शक्ति में कोई विशेष कमी नहीं हुई थी। संभवतः राष्ट्रकूट शासक के वापस लौटने के बाद उसने कन्नौज पर पुनः अधिकार कर लिया।
चरण 3: देवपाल का उदय और रामभद्र-अमोघवर्ष की पराजय (810-836 ई.)
नागभट्ट द्वितीय के बाद गुर्जर-प्रतिहार वंश का उत्तराधिकारी रामभद्र (833-836 ई.) हुआ, जो एक कमजोर शासक था। उधर गोविंद तृतीय का उत्तराधिकारी अमोघवर्ष (814-880 ई.) भी अल्पायु होने के साथ-साथ आंतरिक और बाह्य कठिनाइयों से घिरा था। किंतु बंगाल के पाल वंश के शासक धर्मपाल का उत्तराधिकारी देवपाल (810-850 ई.) एक शक्तिशाली शासक था। संभवतः प्रतिहार रामभद्र और राष्ट्रकूट अमोघवर्ष दोनों को पालों के हाथों पराजित होना पड़ा था क्योंकि नारायणपाल के बादल लेख के अनुसार देवपाल ने द्रविड़ों और गुर्जर राजाओं के घमंड को चूर-चूर कर दिया था। यहां गुर्जर और द्रविड़ राजाओं से आशय गुर्जर-प्रतिहार नरेश रामभद्र और राष्ट्रकूट नरेश अमोघवर्ष से ही है। इस प्रकार देवपाल के समय में पाल वंश की कीर्ति चरमोत्कर्ष पर थी। अरब यात्री सुलेमान ने भी देवपाल को प्रतिहार तथा राष्ट्रकूट शासकों से अधिक शक्तिशाली बताया है।
रामभद्र की मृत्यु के बाद उसका पुत्र मिहिरभोज (836-885 ई.) गुर्जर-प्रतिहार वंश की गद्दी पर बैठा, जिसे दौलतपुर लेख में ‘प्रभास’ और ग्वालियर चतुर्भुज लेख में ‘आदिवराह’ भी कहा गया है। मिहिरभोज के समय में भी प्रतिहारों की पालों तथा राष्ट्रकूटों के साथ प्रतिद्वंद्विता चलती रही।
मिहिरभोज दो पाल राजाओं—देवपाल (810-850 ई.) और विग्रहपाल (850-854 ई.) का समकालीन था। एक ओर जहाँ पाल लेख प्रतिहारों पर विजय का विवरण देते हैं, वहीं दूसरी ओर प्रतिहार लेख पालों पर विजय का दावा प्रस्तुत करते हैं। पालकालीन बादल लेख में कहा गया है कि देवपाल ने गुर्जर नरेश को पराजित किया। इसके विपरीत, ग्वालियर लेख में वर्णित है कि ‘जिस लक्ष्मी ने धर्म (पाल) के पुत्र का वरण किया था, उसी ने बाद में भोज को दूसरे पति के रूप में चुना।’ लगता है कि प्रारंभिक युद्ध में देवपाल को मिहिरभोज के विरुद्ध सफलता प्राप्त हुई थी, किंतु उसकी मृत्यु के उपरांत उसके उत्तराधिकारी विग्रहपाल (850-854 ई.) के समय में अथवा देवपाल के शासन के अंतिम दिनों में ही मिहिरभोज ने अपनी पराजय का बदला ले लिया और पाल साम्राज्य के पश्चिमी भागों पर अधिकार कर लिया। चाट्सु लेख में भी वर्णित है कि उसने गौड़नरेश को पराजित किया तथा पूर्वी भारत के शासकों से ‘कर’ प्राप्त किया था।
मिहिरभोज (836-885 ई.) दो राष्ट्रकूट राजाओं—अमोघवर्ष और कृष्ण द्वितीय का भी समकालीन था। मिहिरभोज ने राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष की दुर्बलता का लाभ उठाकर पश्चिमी भारत में काठियावाड़ तक अपने राज्य का विस्तार किया और कन्नौज को अपने राज्य में मिला लिया।
इंद्र तृतीय द्वारा कन्नौज पर आक्रमण (914-916 ई.)
अमोघवर्ष के पुत्र कृष्ण द्वितीय (878-914 ई.) के समय में भी प्रतिहारों और राष्ट्रकूटों के बीच संघर्ष चलता रहा। विद्वानों का मत है कि इस समय राष्ट्रकूटों और पालों के बीच छोटे-मोटे संघर्ष हुए, किंतु कोई निर्णायक युद्ध नहीं हुआ क्योंकि पाल शासक नारायणपाल (854-908 ई.) के अधीन पालों की शक्ति दुर्बल पड़ गई थी। इस प्रकार इस चरण में गुर्जर-प्रतिहार वंश उत्तर भारत में सर्वाधिक शक्तिशाली हो गया। मिहिरभोज के बाद उसके पुत्र महेंद्रपाल प्रथम (885-910 ई.) ने भी प्रतिहार साम्राज्य को शक्तिशाली बनाए रखा।
किंतु राष्ट्रकूटों ने प्रतिहारों को शांतिपूर्वक शासन नहीं करने दिया और कन्नौज के प्रतिहार वंश की राजलक्ष्मी विचलित होने लगी। महेंद्रपाल प्रथम की मृत्यु के बाद भोज द्वितीय और महीपाल के बीच उत्तराधिकार का युद्ध आरंभ हो गया। पहले चेदि शासक कोक्कल की सहायता से भोज द्वितीय (910-912 ई.) ने कुछ समय के लिए गद्दी प्राप्त कर ली, किंतु बाद में चंदेल शासक हर्ष की सहायता से महीपाल प्रथम (913-944 ई.) ने भोज को अपदस्थ कर राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया।
खंभात (कम्बे) दानपत्रों से पता चलता है कि राष्ट्रकूट इंद्र तृतीय (914-922 ई.) ने 916 ई. लगभग उत्तर भारत में गंगा-यमुना के दोआब क्षेत्र पर आक्रमण किया और यमुना नदी को पार कर कुशस्थल नामक प्रसिद्ध महोदयनगर (कन्नौज) को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया—
यन्माद्यद्विपदन्तघातविषमं कालप्रिय प्रांगणम्।
तीर्णा यत्तुरगैरगाधयमुना सिंधुप्रतिस्पर्धिनी।
येनेदं हि महोदयारिनगरं निर्मूलमुन्मीलितम्।
नाम्नाद्यापि जनैः कुशस्थलमिति ख्याति परां नीयते॥
इसकी पुष्टि कवि पंप (941 ई.) के विवरण से भी होती है, जिसमें कहा गया है कि इंद्र तृतीय के चालुक्य सामंत नरसिंह ने प्रतिहार राजा की राजलक्ष्मी का अपहरण कर लिया, उसका पीछा करते हुए उसने अपने घोड़ों को गंगा के संगम में स्नान कराया और अपने यश की स्थापना की। इस विवरण से स्पष्ट है कि राष्ट्रकूटों ने कुछ समय के लिए कन्नौज पर अधिकार कर लिया और महीपाल को अपनी जान बचाकर महोबा भागना पड़ा।
कन्नौज पर अधिकार करना इंद्र की महानतम सैनिक उपलब्धि थी। यद्यपि उसके पहले ध्रुव और गोविंद ने भी प्रतिहार शासकों को पराजित किया था, किंतु वे कन्नौज पर अपना झंडा नहीं फहरा सके थे। किंतु इंद्र तृतीय का उत्तर भारतीय अभियान आश्चर्यजनक होते हुए भी एक धावा मात्र सिद्ध हुआ और वह 916 ई. में दक्षिण लौट गया।
चरण 4 : प्रतिहारों द्वारा कन्नौज की पुनःप्राप्ति और संघर्ष का अंत (917 ई. के बाद)
संभवतः इंद्र तृतीय के प्रत्यावर्तन के बाद महीपाल ने अपने सामंतों की सहायता से कन्नौज पर पुनः अधिकार कर लिया। खजुराहो से प्राप्त एक लेख में कहा गया है कि सम्राट हर्ष (चंदेल) ने क्षितिपाल (महेंद्रपाल) को कन्नौज के सिंहासन पर आसीन किया था। महीपाल के समय में 915-16 ई. में भारत की यात्रा करने वाले अलमसूदी ने प्रतिहार शासक की शक्ति एवं समृद्धि की बड़ी प्रशंसा की है। इससे लगता है कि 917 ई. तक महीपाल कन्नौज पर पूरी तरह प्रतिष्ठित हो चुका था। इस प्रकार अंततः प्रतिहारों को कन्नौज पर अधिकार करने में सफलता मिली। इसके बाद तीनों राजवंशों का धीरे-धीरे पतन हो गया और इसके साथ ही लगभग दो शताब्दियों से चले आ रहे त्रिपक्षीय संघर्ष का भी अंत हो गया।
त्रिपक्षीय संघर्ष के परिणाम
कन्नौज के लिए चले त्रिपक्षीय संघर्ष में तीनों शक्तियों—प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूट की स्थिति कमजोर हुई, जिसके कारण उनमें से कोई भी विशाल साम्राज्य की स्थापना नहीं कर सका। दसवीं शताब्दी के आरंभ से ही इस संघर्ष में सम्मिलित तीनों शक्तियों के क्षीण होने की प्रक्रिया शुरू हो गई। वास्तव में, तीनों शक्तियों की शक्ति लगभग समान थी, जो मुख्यतः विशाल संगठित सेनाओं पर आधारित थी, किंतु कन्नौज के लिए होने वाले संघर्ष में उनकी व्यस्तता का लाभ उठाकर उनके सामंतों ने धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी, जिससे रही-सही एकता भी नष्ट हो गई। प्रतिहार राज्य छोटे राज्यों में विभक्त हो गया। राष्ट्रकूटों के भू-भाग पर चालुक्यों ने अधिकार कर लिया और बंगाल में पाल वंश का स्थान सेन वंश ने ले लिया।




