सिंधु सभ्यता में आर्थिक जीवन (Economic Life in the Indus Valley Civilization)

सिंधु सभ्यता में आर्थिक जीवन (Economic Life in the Indus Valley Civilization)
सिंधु सभ्यता में आर्थिक जीवन मुख्य लेख : सिंधु-सरस्वती सभ्यता ‘भारत’ की ऐतिहासिकता और सिंधु […]

सिंधु सभ्यता में आर्थिक जीवन

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मुख्य लेख : सिंधु-सरस्वती सभ्यता

‘भारत’ की ऐतिहासिकता और सिंधु सभ्यता की पृष्ठभूमि

प्राचीन भारतवर्ष वर्तमान भारत से बहुत बड़ा था। उसकी सीमा में वर्तमान पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश सम्मिलित थे। वैदिक साहित्य में देश के रूप में भारत का उल्लेख नहीं मिलता और इसका उल्लेख सर्वप्रथम पुराणों में मिलता है-

“उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।

वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।।” (विष्णु पुराण)

इस नाम का सबसे पहला आभिलेखिक उल्लेख खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख में मिलता है, जैसे “दसमे च वसे दंड संधी सा (ममयो) भरदवस पठानं।” अशोक के अभिलेखों में इसे जंबूद्वीप कहा गया है।

सिंधु सभ्यता की भौगोलिक स्थिति एवं उन्नत आर्थिक अवस्थाओं के पीछे उन क्षेत्रों की तत्कालीन पारिस्थितिकी, उनका समुन्नत तकनीकी ज्ञान, शीघ्रगमन के लिए पहियों वाली गाड़ियों का प्रयोग और प्राकृतिक शक्ति से पूर्ण संसाधनों के विकास ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उत्खननों से प्राप्त पुरा-सामग्रियों के तिथि-निर्धारण के फलस्वरूप भारतीय सांस्कृतिक और आर्थिक इतिहास के विकास के अध्ययन को एक तैथिक आधार प्राप्त हुआ।

मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा की विशालता एवं इनकी समृद्धि इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि सिंधु सभ्यता के लोगों की आर्थिक स्थिति संतोषजनक थी। सैंधव सभ्यता के समृद्ध आर्थिक जीवन में कृषि, पशुपालन, विभिन्न प्रकार के उद्योग-धंधों तथा व्यापार-वाणिज्य का प्रमुख योगदान था। कृषकों के अतिरिक्त उत्पादन और व्यापार-वाणिज्य के विकास के कारण ही इस नगरीय सभ्यता का विकास हुआ था। कृषि पर आधारित अनाज-उत्पादन की समुन्नत तकनीकों और विशेष शिल्पों का जब बहुत अधिक प्रयोग प्रारंभ होता है, तब किसान इतना अधिक अन्न उत्पन्न करने लगता है कि वह उससे केवल अपना ही भरण-पोषण नहीं करता, अपितु शासक, पुरोहित, सैनिक तथा वहाँ के निवासी, व्यापारी एवं शिल्पी भी उसके उत्पाद से ही अपनी-अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं।

कृषि

भौगोलिक अनुकूलता और बाढ़-आधारित कृषि-पद्धति

प्राचीन भारत की भौगोलिक बनावट ही कृषि और कृषिपरक क्रियाकलापों के विकास और विस्तार के लिए इतनी अनुकूल थी कि यहाँ अत्यंत प्रारंभ में ही इसका श्रीगणेश न हो जाता तो यह आश्चर्य की बात होती। आज की अपेक्षा सिंधु प्रदेश की भूमि पहले बहुत उपजाऊ थी। ईसा पूर्व चौथी सदी में सिकंदर के एक इतिहासकार ने कहा था कि सिंधु की गणना इस देश के उपजाऊ क्षेत्रों में की जाती थी। पूर्व काल में प्राकृतिक वनस्पतियाँ बहुत अधिक थीं, जिसके कारण यहाँ अच्छी वर्षा होती थी। पकी ईंटों की सुरक्षा-प्राचीरों से संकेत मिलता है कि नदियों में बाढ़ प्रतिवर्ष आती थी। सिंधु तथा उसकी सहायक नदियों द्वारा प्रतिवर्ष लाई गई उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी इस क्षेत्र की उर्वरता को बहुत बढ़ा देती थी, जो कृषि के लिए महत्त्वपूर्ण थी। यहाँ के लोग बाढ़ के उतर जाने के बाद नवंबर के महीने में बाढ़ वाले मैदानों में बुआई कर देते थे और अगली बाढ़ के आने से पहले अप्रैल के महीने में गेहूँ तथा जौ की फसल काट लेते थे।

उगाई जाने वाली फसलें

सिंधु नदी घाटी के उपजाऊ मैदानों में मुख्यतः गेहूँ और जौ का उत्पादन किया जाता था। अभी तक नौ फसलों की पहचान की गई है। गेहूँ बहुतायत में उगाया जाता था; जौ की दो और गेहूँ की तीन किस्में उपजाई जाती थीं। गेहूँ के बीज की दो किस्में- स्परोकोकम तथा कम्पेस्टस उत्खनन में प्राप्त हुई हैं। बनावली में मिला जौ उन्नत किस्म का है। चावल की खेती केवल गुजरात (लोथल) और संभवतः राजस्थान में की जाती थी। लोथल से धान तथा बाजरे की खेती के अवशेष मिले हैं। इसके अलावा राई, खजूर, सरसों, तिल एवं कपास की भी खेती होती थी। संभवतः सबसे पहले कपास यहीं पैदा की गई, इसीलिए यूनानी इस प्रदेश को ‘सिंडन’ कहते थे। यही नहीं, वे अनेक प्रकार के फल व सब्जियाँ भी उपजाते थे। हड़प्पाई पुरास्थलों के उत्खनन में पीपल, खजूर, नीम, नींबू, अनार एवं केला आदि के प्रमाण मिले हैं।

कृषि-उपकरण

इस समय खेती के कार्यों में प्रस्तर एवं काँसे के बने औजार प्रयुक्त होते थे। यहाँ कोई फावड़ा या हल का फाल तो नहीं मिला है, किंतु कालीबंगा की प्राक्-हड़प्पा सभ्यता के स्तर से जो कूट (हलरेखा) मिले हैं, उनसे स्पष्ट है कि राजस्थान में इस काल में हलों द्वारा खेतों की जुताई की जाती थी। धातु के हल के अवशेष अभी तक नहीं मिले हैं, परंतु इसकी उच्चकोटि की जुताई में संदेह नहीं है। बनावली में मिट्टी का बना हुआ हल-जैसा एक खिलौना मिला है। डी. डी. कोसाम्बी का मत है कि सैंधव लोगों को भारी हल का ज्ञान नहीं था। किंतु बहावलपुर एवं बनावली से मिट्टी के बने हल की प्राप्ति तथा कालीबंगा से जुते हुए खेत के प्रमाण के आधार पर इस मत को स्वीकार करना कठिन है। इसके अतिरिक्त, बिना हल के गहरी जुताई संभव ही नहीं है और यदि गहरी जुताई न हो तो न तो अधिशेष उत्पादन संभव होगा और न ही नगरीकरण हो सकेगा, जबकि यह स्पष्ट है कि सैंधव सभ्यता एक नगरीय सभ्यता थी।” मेहरगढ़ (पाकिस्तान) से कृषि के प्रमाण- गेहूँ, जौ, अंगूर एवं कपास मिले हैं। संभवतः सिंचाई के लिए नदियों के जल का प्रयोग किया जाता था, किंतु जलाशयों एवं कुओं से भी सिंचाई की जाती रही होगी।

फसल-कटाई, भंडारण और प्रसंस्करण

फसलों की कटाई के लिए संभवतः पत्थर या काँसे की हँसिया का प्रयोग किया जाता था क्योंकि मेहरगढ़ से हँसिया का साक्ष्य मिला है। अनाज रखने की टोकरियों के भी साक्ष्य मिले हैं। अतिरिक्त उत्पादन को राज्य द्वारा नियंत्रित भंडारगृहों (कोठारों या अन्नागारों) में रखा जाता था।  मोहनजोदड़ो से प्राप्त विशाल अन्नागार इसका प्रमाण है। अनाज को चूहों से बचाने के लिए मिट्टी की चूहेदानियों का प्रयोग किया जाता था। अनाज कूटने के लिए ओखली और मूसल का प्रयोग होता था। लोथल से आटा पीसने की पत्थर की चक्की (जाँता) के दो पाट मिले हैं। लोथल और रंगपुर से मिट्टी के कुछ बर्तनों में धान की भूसी मिली है।

मोहनजोदड़ो का विशाल अन्नागार और स्नानागार

मोहनजोदड़ो का विशाल अन्नागार, जो नगर के दुर्ग-टीले पर स्थित था, लगभग 45.71 मीटर लंबा तथा 15.23 मीटर चौड़ा था और इसमें अनाज के भंडारण हेतु वायु-संचार की विशेष व्यवस्था के लिए हवादार गलियारे बनाए गए थे। इसी दुर्ग-टीले पर स्थित प्रसिद्ध ‘विशाल स्नानागार’ (ग्रेट बाथ), जो लगभग 11.88 मीटर लंबा, 7.01 मीटर चौड़ा तथा 2.43 मीटर गहरा है, को भी अनेक विद्वान धार्मिक-सामाजिक अनुष्ठानों से संबद्ध मानते हैं। यद्यपि यह प्रत्यक्षतः आर्थिक संरचना नहीं है, तथापि इसकी जल-रोधी ईंट-निर्माण तकनीक और डामर जैसे पदार्थ का प्रयोग सिंधु सभ्यता की उन्नत अभियांत्रिकी क्षमता का परिचायक है, जो अप्रत्यक्ष रूप से इस सभ्यता की समृद्ध आर्थिक तथा तकनीकी संपन्नता का भी प्रमाण है।

पशुपालन

सैंधव सभ्यता में कृषि के साथ-साथ पशुपालन का भी महत्त्वपूर्ण स्थान था। पशु कृषि एवं यातायात के साधन थे। मृद्भांडों तथा मुहरों पर बने चित्रों एवं अस्थि-अवशेषों से लगता है कि मुख्य पालतू पशुओं में डीलदार एवं बिना डील वाले बैल, भैंस, गाय, भेड़-बकरी, कुत्ते, गधे, खच्चर और सुअर आदि थे। हड़प्पाई लोग संभवतः बाघ, हाथी तथा गैंडे से भी परिचित थे, किंतु हाथी व घोड़ा पालने के साक्ष्य प्रमाणित नहीं हो सके हैं। हड़प्पा से गधे की हड्डी प्राप्त हुई है। एस. आर. राव को लोथल एवं रंगपुर से गाय एवं घोड़े के पुरातात्त्विक प्रमाण मिले हैं। सुरकोटदा से सैंधवकालीन घोड़े का अस्थिपंजर मिला है। गुजरात के शिकारपुर से प्राप्त पालतू पशुओं के साक्ष्य में भैंस, अश्व एवं कुत्ते प्रमुख थे। बंदर, खरगोश, हिरन, मुर्गा, मोर, तोता, उल्लू जैसे कुछ पशु-पक्षियों के अवशेष खिलौनों और मूर्तियों के रूप में मिले हैं।

शिल्प एवं उद्योग-धंधे

विभिन्न प्रकार के शिल्प एवं उद्योग-धंधे सिंधु सभ्यता के निवासियों के विकसित नागरिक जीवन के मूलाधार थे। इस समय मुद्रा एवं मूर्ति-निर्माण, वस्त्र-उद्योग, मृद्भांड-निर्माण, मनका-उद्योग जैसे अनेक शिल्प और उद्योग पर्याप्त विकसित थे। सूत की कताई, बुनाई एवं कढ़ाई प्रचलित थी।

मुद्रा एवं मूर्ति-निर्माण

हड़प्पा सभ्यता में मुहरों (मुद्राओं) का विशिष्ट स्थान था। अब तक विभिन्न स्थानों से लगभग 2,000 से अधिक मुहरें प्राप्त की जा चुकी हैं, जिनमें लगभग 1,398 अकेले मोहनजोदड़ो से मिली हैं। मुहरों का निर्माण अधिकतर सेलखड़ी से हुआ है, परंतु कुछ मुहरें काँचली मिट्टी, गोमेद, चर्ट और मिट्टी की बनी हुई भी प्राप्त हुई हैं। ये मुहरें आयताकार, वर्गाकार, गोल, घनाकार, वृत्ताकार एवं कुछ बेलनाकार भी हैं। मुहरों पर ठप्पे द्वारा विभिन्न चित्र उत्कीर्ण किए जाते थे। अधिकांश मुहरों पर संक्षिप्त लेख, एकश्रृंगी साँड, भैंस, बाघ, गैंडा, हिरन, बकरी एवं हाथी के चित्र उकेरे गए हैं, जिनमें सर्वाधिक आकृतियाँ एकश्रृंगी साँड़ की हैं। लोथल और देसलपुर से ताँबे की मुहरें मिली हैं। मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, लोथल, कालीबंगा आदि स्थानों से पत्थर, धातु और पकी मिट्टी की स्त्रियों, पुरुषों एवं पशु-पक्षियों की तमाम मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, जिससे पता चलता है कि इस सभ्यता में बड़े पैमाने पर मूर्तियों का निर्माण भी होता था।

सिंधु लिपि और आर्थिक प्रयोजन

सिंधु मुहरों पर उत्कीर्ण लिपि आज तक पूर्णतः पठनीय (डिसाइफर्ड) नहीं हो सकी है, किंतु अधिकांश विद्वानों का मानना है कि इन मुहरों का प्रमुख प्रयोजन आर्थिक तथा प्रशासनिक ही रहा होगा और व्यापारिक माल पर स्वामित्व अथवा उत्पत्ति-स्थान अंकित करने, संपत्ति के स्वामित्व को चिह्नित करने अथवा कर-संग्रहण के अभिलेखन हेतु इनका प्रयोग किया जाता था। मुहरों की यह भूमिका इस बात का प्रमाण है कि सिंधु सभ्यता में एक सुव्यवस्थित एवं केंद्रीकृत आर्थिक-प्रशासनिक तंत्र विद्यमान था, जो व्यापार तथा उत्पादन दोनों को नियमित करता था।

वस्त्र-उद्योग

सैंधव क्षेत्र में कपास की खेती बड़े पैमाने पर की जाती थी, जिससे वस्त्र-उद्योग को प्रोत्साहन मिला। यहाँ सूती एवं ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्र तैयार किए जाते थे। आलमगीरपुर से प्राप्त मिट्टी की एक नाँद पर बुने हुए वस्त्र के निशान मिले हैं। मोहनजोदड़ो से मजीठा से लाल रंग में रंगे हुए कपड़े के अवशेष चाँदी के बर्तन में पाए गए थे। ताँबे के दो उपकरणों में लिपटा हुआ सूती कपड़ा एवं सूती धागा भी मोहनजोदड़ो से मिला है। मोहनजोदड़ो, लोथल, रंगपुर एवं कालीबंगा से सूती कपड़े की छाप मिली है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त पुरोहित की प्रस्तर मूर्ति तिपतिया अलंकरणयुक्त शाल ओढ़े हुए है। इससे लगता है कि इस समय वस्त्र एवं कताई-बुनाई उद्योग विकसित अवस्था में था। कताई-बुनाई में प्रयुक्त होने वाली तकलियों एवं चरखियों के भी प्रमाण मिले हैं।

धातु-उद्योग

यद्यपि सैंधव सभ्यता के लोग पत्थरों के औजारों एवं उपकरणों का प्रयोग करते थे, किंतु वे धातुकर्म से भी भली-भाँति परिचित थे। वे धातु को गलाना, ढालना तथा साँचे के द्वारा निर्माण करना जानते थे। टिन और ताँबे के मिश्रण से काँसे को तैयार किया जाता था। उन्हें ताँबा राजस्थान के खेतड़ी की खानों से और टिन अफगानिस्तान से मिलता था, क्योंकि इन दोनों में से कोई भी खनिज यहाँ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं था। संभवतः कसेरों (काँस्य-शिल्पियों) का समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान था। खुदाई में ताँबे व काँसे के उपकरण अधिक मात्रा में मिले हैं, इनमें काँसे की बनी सुराही, कटोरा, तवा, लंबी एवं छोटी कुल्हाड़ियाँ, आरा, मछली पकड़ने का काँटा और ताँबे की बनी तलवारें व छूरे प्रमुख हैं।

कसेरों के अतिरिक्त हड़प्पाई समाज में राजगीरों एवं आभूषण-निर्माताओं (सुनारों) के समुदाय भी विद्यमान थे। आभूषणों के लिए सोना-चाँदी संभवतः अफगानिस्तान से एवं रत्न दक्षिण भारत से मँगाया जाता था। लोथल से प्राप्त एक कंठहार, जो अनेक स्वर्ण-मनकों से बना है, कारीगरी का अनूठा नमूना है। धातु की बनी कुछ मूर्तियाँ भी मिली हैं, जिनमें मोहनजोदड़ो से प्राप्त काँसे की नर्तकी की मूर्ति सर्वाधिक प्रसिद्ध है। लोथल से प्राप्त ताँबे का कुत्ता कला की दृष्टि से बेजोड़ है। इसके अलावा हड़प्पा से मिली ताँबे की इक्कागाड़ी तथा चांहूदड़ो से मिली ताँबे की दो गाड़ियों की अनुकृतियाँ भी महत्त्वपूर्ण हैं। हड़प्पाई लोग सीसे से भी परिचित थे।

मृद्भांड-उद्योग

हड़प्पा सभ्यता में कुम्हारी कला भी पर्याप्त विकसित थी। इस सभ्यता के कुम्हार भवनों के लिए ईंट तो बनाते ही थे, मिट्टी के बर्तन, खिलौनों और आभूषणों का भी निर्माण करते थे। इस समय चाक से निर्मित मृद्भांड काफी प्रचलित थे, यद्यपि हस्तनिर्मित मृद्भांड भी पाए गए हैं। हड़प्पाई बर्तनों में घड़े, प्याले, सुराहियाँ और नाँद प्रमुख थे, जो विधिवत् पके हुए हैं और चित्रकारीयुक्त हैं। मिट्टी की बनी कुछ खानेदार थालियाँ और चूहेदानियाँ भी खुदाई में मिली हैं। पशु-पक्षियों की आकृति वाले मिट्टी के खिलौने, खिलौना गाड़ियाँ एवं मिट्टी की बनी मूर्तियाँ भी बड़ी संख्या में प्राप्त हुई हैं।

मनका-उद्योग

काँस्ययुगीन सभ्यता होने के बावजूद हड़प्पाई शिल्पी पत्थर एवं धातु के मनके, मूर्तियाँ, आभूषण आदि बनाते थे। चांहूदड़ो तथा लोथल में मनका बनाने का कारखाना प्रकाश में आया है। सेलखड़ी, सीप, हाथीदाँत, घोंघा एवं मिट्टी आदि से बने मनकों का उपयोग खिलौनों और आभूषणों के रूप में होता था। इस सभ्यता के स्थलों से पत्थर के बाट-बटखरे बड़ी संख्या में मिले हैं। चांहूदड़ों में सेलखड़ी की मुहर और चर्ट के बाट भी बनाए जाते थे। बालाकोट तथा लोथल में सीप-उद्योग विकसित अवस्था में था। हाथीदाँत से भी अनेक उपकरण और प्रसाधन-सामग्री का निर्माण किया जाता था। मोहनजोदड़ो की मुहर पर नाव के चित्र तथा लोथल से प्राप्त गोदीवाड़ा से लगता है कि यहाँ नाव और जलयान-निर्माण भी प्रमुख उद्योग था। इसके अलावा चिकित्सकों, राजगीरों एवं मछुआरों का व्यवसाय भी विकसित अवस्था में था।

कच्चे माल की आपूर्ति

उद्योगधंधों एवं शिल्पकार्यों के लिए कच्चा माल गुजरात, सिंधु, राजस्थान, दक्षिणी भारत, बलूचिस्तान आदि क्षेत्रों से मँगाया जाता था। इसके अतिरिक्त अफगानिस्तान, सोवियत, तुर्कमानिया तथा मेसोपोटामिया (सुमेर) आदि से भी कच्चा माल आयात किया जाता था। मनके बनाने के लिए गोमेद गुजरात से आता था। प्लिंट तथा चर्ट के प्रस्तर-खंड पाकिस्तान के सिंधु क्षेत्र में स्थित रोड़ी तथा सुक्कुर की खदानों से आते थे। ताँबा राजस्थान के झुंझुनूं जिले में स्थित खेतड़ी (खेत्री) की खानों से मँगाया जाता था। सोना संभवतः कर्नाटक के कोलार की खानों से मिलता था।

धोलावीरा की मनका-निर्माण विशेषज्ञता

गुजरात के धोलावीरा स्थल से भी बड़े पैमाने पर मनका-निर्माण से संबंधित उपकरण तथा अर्ध-निर्मित मनके प्राप्त हुए हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि चांहूदड़ो और लोथल के अतिरिक्त धोलावीरा भी एक महत्त्वपूर्ण शिल्प-उत्पादन केंद्र था। इसके साथ ही धोलावीरा से प्राप्त एक विशाल शिलालेख से, जिसमें दस बड़े सिंधु-लिपि चिह्न उत्कीर्ण हैं और जिसे ‘धोलावीरा साइनबोर्ड’ कहा जाता है, यह संकेत मिलता है कि संभवतः नगर के मुख्य द्वार पर प्रशासनिक अथवा व्यापारिक सूचनाओं से संबंधित सार्वजनिक सूचना-पट्ट प्रदर्शित करने की भी परंपरा थी।

व्यापार एवं वाणिज्य

उत्पादन-केंद्र और विपणन-केंद्र

सैंधव सभ्यता की आर्थिक समृद्धि का एक प्रमुख आधार विकसित व्यापार-वाणिज्य था। उनका आंतरिक एवं बाह्य व्यापार पर्याप्त उन्नत था। व्यापारिक गतिविधियों से संबंधित नगर मुख्यतः दो प्रकार के थे- मोहनजोदड़ो, चांहूदड़ो, हड़प्पा, कोटदीजी जैसे नगर उत्पादन से जुड़े हुए थे, जबकि लोथल, धोलावीरा, सुरकोटदा और बालासोर जैसे नगर विपणन से संबद्ध थे। हड़प्पाई लोग सिंधु सभ्यता के क्षेत्र के भीतर पत्थर, धातु, सिल्क आदि का व्यापार करते थे, किंतु वे जो वस्तुएँ बनाते थे, उसके लिए अपेक्षित कच्चा माल उनके नगरों में उपलब्ध नहीं था। इसलिए उन्हें बाह्य देशों से व्यापारिक संपर्क स्थापित करना पड़ता था। उन्होंने उत्तरी अफगानिस्तान में एक वाणिज्यिक उपनिवेश (शोर्तुगई) स्थापित किया, जिससे उन्हें व्यापारिक गतिविधियों में सहायता मिलती थी। संभवतः तैयार माल को खपाने की आवश्यकता ने व्यापारिक संबंधों को प्रगाढ़ बनाया था।

विदेशी व्यापार

इस सभ्यता के लोगों का मेसोपोटामिया, मिस्र, बहरीन, क्रीट आदि देशों से घनिष्ठ व्यापारिक संबंध था। मेसोपोटामिया में प्रवेश के लिए ‘उर’ एक महत्त्वपूर्ण बंदरगाह था। मेसोपोटामिया के अभिलेखों में ‘मेलुहा’ के साथ व्यापार के प्रमाण मिले हैं, साथ ही दो मध्यवर्ती व्यापार-केंद्रों- ‘दिल्मुन’ और ‘मकन’ का भी उल्लेख मिलता है। मेलुहा सिंध क्षेत्र का ही प्राचीन नाम है। यहाँ से उर के व्यापारी सोना, चाँदी, लाल पत्थर, लाजवर्द मणि, हाथीदाँत की वस्तुएँ, खजूर, विविध प्रकार की लकड़ियाँ, खासकर काली लकड़ी (आबनूस), मोर पक्षी आदि प्राप्त करते थे। दिल्मुन की पहचान फारस की खाड़ी के बहरीन द्वीप से और मकन (मगन) की पहचान बलूचिस्तान के मकरान तट से की गई है। गुजरात के लोथल से फारस की मुहरें प्राप्त हुई हैं, जिससे लगता है कि लोथल बंदरगाह से समुद्री मार्ग द्वारा विभिन्न देशों के साथ व्यापार होता था। गोरिल्ला और ममी की आकृति से मिलते-जुलते कुछ पुरातात्त्विक प्रमाण एस. आर. राव को प्राप्त हुए हैं, जो मिस्र के साथ व्यापारिक संबंधों के द्योतक हैं। इसी प्रकार क्रीट से प्राप्त मुद्राओं पर मातृदेवी, सिंह-मानव-युद्ध आदि के चित्रांकन से व्यापारिक संबंधों का अनुमान किया जाता है।

मेसोपोटामियाई अभिलेखों में मेलुहा का उल्लेख

अक्कद के शासक सारगोन प्रथम (लगभग 2334-2279 ई.पू.) के एक मेसोपोटामियाई अभिलेख में यह उल्लेख मिलता है कि मेलुहा, मकन तथा दिल्मुन के जलयान उसकी राजधानी अक्कद के बंदरगाह पर लंगर डालते थे। यह अभिलेख सिंधु सभ्यता तथा मेसोपोटामिया के मध्य समुद्री व्यापार का सबसे प्रत्यक्ष तथा प्रामाणिक ऐतिहासिक साक्ष्य है। इसके अतिरिक्त कुछ मेसोपोटामियाई अभिलेखों में मेलुहा के दुभाषियों (अनुवादकों) का भी उल्लेख मिलता है, जिससे पता चलता है कि व्यापार इतना नियमित तथा सुव्यवस्थित था कि इसके लिए भाषा-अनुवाद जैसी विशेष व्यवस्था की भी आवश्यकता पड़ती थी।

आयात-निर्यात की वस्तुएँ

सैंधव सभ्यता के लोगों का व्यापारिक संबंध राजस्थान, अफगानिस्तान, ईरान एवं मध्य एशिया के साथ था। लाजवर्द एवं चाँदी अफगानिस्तान से आयात की जाती थी। ईरान से फिरोजा, टिन एवं चाँदी आयात की जाती थी। सोना दक्षिण भारत (मैसूर) से, ताँबा राजस्थान, बलूचिस्तान तथा अरब देश से, टिन अफगानिस्तान, ईरान तथा राजस्थान से, बहुमूल्य पत्थर जैसे लाजवर्द, गोमेद, पन्ना, मूँगा इत्यादि अफगानिस्तान, ईरान, महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, राजस्थान और कश्मीर से मँगाए जाते थे।

सिंधु से मेसोपोटामिया को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में सूती वस्त्र, इमारती लकड़ी, मसाले, हाथीदाँत, ताँबा, सोना, चाँदी एवं पशु-पक्षी थे। उर के उत्खनन में हड़प्पा-निर्मित ताँबे का शृंगारदान मिला है। मेसोपोटामिया से हड़प्पावासी मनके, धातुएँ, औषधियाँ एवं विलासिता की वस्तुएँ मँगाते थे। अभिलेखीय साक्ष्यों से पता चलता है कि दिल्मुन (बहरीन) से सोना, चाँदी, लाजवर्द, माणिक्य के मनके, हाथीदाँत की कंघी, पशु-पक्षी तथा आभूषण आदि आयात किए जाते थे। सुमेर, उर, किश, लगश, निप्पुर, टेल अस्मर, टेपे गावरा, उम्मा, असुर आदि मेसोपोटामियाई नगरों से हड़प्पा सभ्यता की लगभग एक दर्जन मुहरें मिली हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि संभवतः मेसोपोटामिया में सैंधव व्यापारियों की कोई बस्ती थी।

विनिमय-प्रणाली और परिवहन-साधन

हड़प्पा सभ्यता के लोग व्यापार में धातु के सिक्कों का प्रयोग नहीं करते थे, बल्कि उनका व्यापार वस्तु-विनिमय प्रणाली पर ही आधारित था। व्यापारिक वस्तुओं की गाँठों पर शिल्पियों एवं व्यापारियों द्वारा एक ओर अपनी मुहर (मुद्रा) की छाप डाली जाती थी और दूसरी ओर भेजे जाने वाली वस्तु का निशान अंकित किया जाता था। व्यापार मुख्यतः जलीय मार्गों से होता था, किंतु थल-मार्ग का भी उपयोग किया जाता था। इस सभ्यता के लोग पहिये से परिचित थे और यातायात के रूप में दो पहियों एवं चार पहियों वाली बैलगाड़ी अथवा भैंसागाड़ी का उपयोग करते थे, जिनमें प्रयुक्त पहिये ठोस आकार के होते थे। मोहनजोदड़ो की एक मुहर पर नाव का चित्र तथा लोथल से मिट्टी का नाव-जैसा खिलौना मिला है, जिससे लगता है कि इस सभ्यता के लोग आंतरिक एवं बाह्य व्यापार में मस्तूलवाली नावों का उपयोग करते थे।

लोथल की गोदी (डॉकयार्ड)

लोथल से प्राप्त गोदीवाड़ा (डॉकयार्ड) को विश्व के प्राचीनतम ज्ञात कृत्रिम गोदी-निर्माणों में से एक माना जाता है, जिसका निर्माण संभवतः ज्वारीय प्रवाह के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए किया गया था अर्थात् उच्च ज्वार के समय जलयान गोदी में प्रवेश कर सकते थे और निम्न ज्वार के समय भी जल का एक निश्चित स्तर गोदी में बनाए रखा जा सकता था, ताकि जलयानों की सुरक्षित नौकायन-व्यवस्था बनी रहे। यह संरचना सिंधु सभ्यता की समुद्री-अभियांत्रिकी तथा सामुद्रिक व्यापार-कौशल की प्रवीणता का प्रमाण है और इस बात की भी पुष्टि करती है कि लोथल एक सुनियोजित बंदरगाह-नगर के रूप में विकसित किया गया था।

माप-तौल की व्यवस्था

व्यापार में नाप-तौल के लिए बाट-माप का प्रयोग किया जाता था। उत्खनन में नाप-तौल से संबंधित विभिन्न प्रकार के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि इस सभ्यता में व्यापार के लिए भार-मापन हेतु विभिन्न प्रकार के बाटों का प्रयोग किया जाता था। बाट पत्थर के बने होते थे तथा इन्हें एक निश्चित आकार में बनाया गया था। सबसे छोटा बाट 13.64 ग्राम का था। मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, लोथल एवं कालीबंगा से बाट-जैसी वस्तुएँ बड़ी संख्या में प्राप्त हुई हैं। बाट घनाकार, वर्तुलाकार, बेलनाकार, शंक्वाकार एवं ढोलाकार होते थे, जो पहले द्विगुण क्रम (द्विचर प्रणाली) में हैं, किंतु बाद में 16 के गुणन में, जैसे 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64, 160, 320, 1600 तथा 3200 इकाइयों के बाट प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार माप-तौल में 16 या उसके आवर्तकों का प्रयोग होता था। अभी कुछ समय पहले तक भारत में एक रुपया 16 आने का होता था। सबसे बड़ी तौल 10,900 ग्राम की और सबसे छोटी तौल 0.8565 ग्राम की है। मोहनजोदड़ो से सीप तथा लोथल से हाथीदाँत का एक-एक पैमाना भी प्राप्त हुआ है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि सिंधु सभ्यता का आर्थिक जीवन कृषि, पशुपालन, बहुविध शिल्प-उद्योगों तथा सुव्यवस्थित आंतरिक एवं अंतरराष्ट्रीय व्यापार-व्यवस्था के सुदृढ़ समन्वय पर आधारित था। नदी-आधारित उपजाऊ मिट्टी से समृद्ध कृषि, मुहरों तथा मानकीकृत बाटों द्वारा नियमित व्यापार-प्रणाली, मेसोपोटामिया-मिस्र-बहरीन-क्रीट जैसे दूरस्थ देशों तक फैला विदेशी व्यापार, तथा लोथल और धोलावीरा जैसे विशेष रूप से नियोजित बंदरगाह-नगरों का विकास इस बात का प्रमाण हैं कि सिंधु सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक उन्नत, सुसंगठित तथा समृद्ध आर्थिक व्यवस्था वाली सभ्यता थी, जिसकी तकनीकी तथा वाणिज्यिक उपलब्धियाँ आज भी पुरातत्त्वविदों तथा इतिहासकारों के लिए शोध का महत्त्वपूर्ण विषय हैं।

सिंधु सभ्यता में आर्थिक जीवन से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

प्रश्न 1: सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार क्या था?

कृषि, पशुपालन, विभिन्न शिल्प-उद्योग, जैसे मुद्रा-मूर्ति, वस्त्र, धातु, मृद्भांड, मनका तथा व्यापार-वाणिज्य इसके मुख्य आधार थे। कृषि से उत्पन्न अधिशेष अन्न से ही मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे नगरों का विकास संभव हुआ।

प्रश्न 2: सिंधु सभ्यता के लोग कौन-कौन सी फसलें उगाते थे?

मुख्यतः गेहूँ और जौ की खेती होती थी। इसके अतिरिक्त चावल (केवल लोथल-गुजरात), बाजरा, खजूर, सरसों, तिल तथा कपास भी उगाए जाते थे। कपास की खेती संभवतः विश्व में सबसे पहले यहीं आरंभ हुई, इसीलिए यूनानी इस प्रदेश को ‘सिंडन’ कहते थे।

प्रश्न 3: सिंधु सभ्यता में हल के प्रयोग को लेकर क्या विवाद है?

धातु के हल न मिलने से डी. डी. कोसाम्बी का मत था कि सैंधव लोगों को भारी हल का ज्ञान नहीं था। किंतु बहावलपुर-बनावली के मिट्टी के हल तथा कालीबंगा के जुते खेत के आधार पर इस मत को स्वीकार करना कठिन है, क्योंकि बिना हल गहरी जुताई और नगरीकरण संभव ही नहीं था।

प्रश्न 4: सिंधु सभ्यता में मुहरों (मुद्राओं) का क्या महत्त्व था?

लगभग 2,000 से अधिक मुहरें मिली हैं, मुख्यतः सेलखड़ी से बनी, जिन पर एकश्रृंगी साँड़ जैसे पशु-चित्र और संक्षिप्त लिपि उत्कीर्ण मिलती है। ये संभवतः व्यापारिक माल पर स्वामित्व अंकित करने हेतु प्रयुक्त होती थीं।

प्रश्न 5: सिंधु सभ्यता के लोगों का विदेशों से क्या व्यापारिक संबंध था?

मेसोपोटामिया, मिस्र, बहरीन (दिल्मुन) तथा क्रीट से घनिष्ठ व्यापार था। मेसोपोटामियाई अभिलेखों में सिंधु क्षेत्र को ‘मेलुहा’ कहा गया, और सारगोन प्रथम के अभिलेख में मेलुहा के जलयानों का उल्लेख इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। लोथल-धोलावीरा प्रमुख बंदरगाह-केंद्र थे।

प्रश्न 6: व्यापार में विनिमय और माप-तौल की क्या व्यवस्था थी?

सिक्कों के बजाय वस्तु-विनिमय प्रणाली प्रचलित थी, जिसमें मुहरों की छाप से माल चिह्नित होता था। माप-तौल हेतु पत्थर के बाट प्रयुक्त होते थे, जो 16 के गुणन (16, 32, 64…) में बनते थे, इसी कारण हाल तक भारतीय रुपया 16 आने का होता था।
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