सैंधव सभ्यता का सामाजिक जीवन (Social Life of the Indus Valley Civilization)  

सैंधव सभ्यता का सामाजिक जीवन (Social Life of the Indus Valley Civilization)  
सैंधव सभ्यता का सामाजिक जीवन मुख्य लेख : सिंधु-सरस्वती सभ्यता सैंधव सभ्यता की पृष्ठभूमि भारत में […]

सैंधव सभ्यता का सामाजिक जीवन

Table of Contents

मुख्य लेख : सिंधु-सरस्वती सभ्यता

सैंधव सभ्यता की पृष्ठभूमि

भारत में मानव सभ्यता की जड़ें अत्यंत प्राचीन हैं। भारतीय शास्त्रों और पुराणों में इस बारे में जो उल्लेख मिलते थे, उन्हें लंबे समय तक विदेशी विद्वान ही नहीं, स्वयं भारतीय भी अतिरंजित मानते रहे। किंतु 1957 ईस्वी में डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर, जिन्हें भारत में “पाषाण कला का पितामह” कहा जाता है, ने मध्य प्रदेश में भीमबेटका (भीमबैठका) के शैलाश्रयों की खोज की। इस पुरास्थल से प्रागैतिहासिक मानव-निवास के प्रमाण मिले, और वहाँ से प्राप्त औजारों तथा वस्तुओं के काल-निर्धारण से यह सिद्ध हुआ कि ईसा से लगभग एक लाख वर्ष पूर्व भी मानव मध्य प्रदेश के इस क्षेत्र में निवास करता था।

इस क्रम में सिंधु घाटी की सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता) का महत्त्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि इसने यह प्रमाणित किया कि भारतीय स्त्री-पुरुषों ने बहुत सुनियोजित ढंग से नगरों में रहना आरंभ कर दिया था। ग्रामों के साथ-साथ विशाल नगर स्थापित हो चुके थे और भौतिक साधनों की प्रचुरता के कारण मानव-जीवन आनंद तथा उल्लास से परिपूर्ण था। 1921 ईस्वी से पहले जब यह सभ्यता अतीत के खंडहरों में दबी हुई थी, तब यह धारणा प्रचलित थी कि भारतीय मानव विश्व की अन्य सभ्यताओं की तुलना में बहुत बाद में सभ्य हुआ। भारतीयों के पास प्राचीनतम सभ्यता के रूप में केवल ऋग्वैदिक संस्कृति का ही ज्ञान था, जो सुमेरियन, बेबीलोनियन तथा नील घाटी की मिस्री सभ्यता से बहुत परवर्ती मानी जाती थी। 1921 ईस्वी में पुरातत्त्वविद् दयाराम साहनी द्वारा पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में रावी नदी के किनारे स्थित हड़प्पा और 1922 ईस्वी में राखालदास बनर्जी द्वारा सिंध प्रांत में सिंधु नदी के तट पर मोहनजोदड़ो के प्राचीन अवशेषों की खोज ने इस पूर्व-स्थापित धारणा को बदल दिया और सिद्ध किया कि भारत अपने उषाकाल में ही यौवन को प्राप्त कर चुका था।

नवपाषाणकालीन संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता थी गैर-धात्विक उपकरणों के साथ कृषि-ज्ञान पर आधारित ग्रामीण जीवन का विकास। माना जाता है कि मनुष्य ने सबसे पहले जिस धातु का प्रयोग औजार बनाने में किया, वह ताँबा था और इसका प्रयोग लगभग पाँचवीं सहस्राब्दी ईसा पूर्व में आरंभ हुआ। जिस काल में मनुष्य ने पत्थर और ताँबे के औजारों का साथ-साथ प्रयोग किया, उसे “ताम्र-पाषाणिक काल” कहा जाता है। भारत की ताम्रपाषाणिक संस्कृतियाँ मूलतः गैर-नगरीय एवं गैर-हड़प्पाई थीं, जिनका उदय दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में हुआ और अंततः इन्हें लौह-प्रयोक्ता संस्कृतियों ने विस्थापित कर दिया। इनमें कुछ बस्तियाँ प्राक्-हड़प्पाई थीं, कुछ हड़प्पा-संस्कृति की समकालीन और कुछ उसके बाद की। राजस्थान का कालीबंगा तथा हरियाणा का बनावली दोनों स्पष्टतः ताम्र-पाषाणिक अवस्था के प्राक्-हड़प्पाकालीन स्थल हैं। चूँकि कृषि-ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद मानव उन्हीं स्थानों पर बसना पसंद करता था जहाँ भूमि उर्वर हो और सिंचाई की समुचित व्यवस्था हो, इसीलिए अधिकांश प्राचीन सभ्यताओं का विकास नदी-घाटियों और उनके निकटवर्ती प्रदेशों में हुआ- सिंधु सभ्यता इसका सुस्पष्ट उदाहरण है।

मेहरगढ़ की पूर्ववर्ती संस्कृति

सिंधु सभ्यता के उदय की दृष्टि से बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में स्थित मेहरगढ़ नामक स्थल अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, जहाँ के उत्खनन से लगभग सातवीं सहस्राब्दी ईसा पूर्व तक के निरंतर सांस्कृतिक विकास-क्रम के साक्ष्य मिले हैं। मेहरगढ़ में क्रमिक रूप से नवपाषाणकालीन कृषि-जीवन से लेकर ताम्र-प्रयोग तथा अंततः परिपक्व हड़प्पाई नगरीय जीवन-शैली तक का विकास स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है, जिससे यह प्रमाणित होता है कि सिंधु सभ्यता किसी बाह्य प्रभाव से अकस्मात् उत्पन्न नहीं हुई थी, अपितु यह भारतीय उपमहाद्वीप की ही एक स्वदेशी तथा क्रमिक सांस्कृतिक विकास-प्रक्रिया का परिणाम थी।

सामाजिक संरचना एवं वर्ग-विभाजन

सिंधु लिपि आज तक पढ़ी नहीं जा सकी है, इसलिए इस सभ्यता के सामाजिक जीवन के बारे में निश्चयात्मक रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है। तथापि विभिन्न पुरास्थलों से प्राप्त पुरावशेषों के आधार पर कुछ ठोस अनुमान लगाए जा सकते हैं।

सैंधव समाज में स्पष्ट सामाजिक स्तरीकरण विद्यमान था। विद्वान, पुरोहित, योद्धा, व्यापारी और श्रमिक, जिन्हें आगे चलकर विकसित होने वाली वर्ण-व्यवस्था का प्रारंभिक रूप माना जा सकता है। भवनों के आकार-प्रकार तथा आर्थिक विषमता से यह प्रतीत होता है कि विश्व की अन्य समकालीन सभ्यताओं की भाँति हड़प्पाई समाज भी वर्ग-विभेद पर आधारित था। रक्षा-प्राचीरों से घिरे दुर्ग (गढ़ी क्षेत्र) में संपन्न वर्ग- पुरोहित तथा शासक-वर्ग निवास करता था, जबकि निचले नगर में व्यापारी, अधिकारी, शिल्पी और सैनिक रहते थे। कृषक, कुम्हार, बढ़ई, जुलाहे, शिल्पी तथा श्रमिक संभवतः समाज के अन्य वर्ग थे और मोहनजोदड़ो से प्राप्त कुछ कक्षों को कुम्हारों की बस्ती माना गया है।

व्यापारी-वर्ग के अस्तित्व की पुष्टि बनावली से प्राप्त व्यापारी एवं आभूषण-निर्माता के मकान, लोथल से मिली बाजारनुमा गली तथा नौशारो से प्राप्त मुहरों से होती है। वस्त्राभूषणों में भी वर्ग-भेद स्पष्ट था। उच्च वर्ग के लोग मूल्यवान धातुओं व रत्नों के आभूषण पहनते थे, जबकि निम्न वर्ग मिट्टी, सीप और घोंघे के आभूषण प्रयोग करता था। विशाल भवनों के निकट पाए गए छोटे आवास भी समाज में वर्ग-विभाजन की पुष्टि करते हैं। इस प्रकार पुरातात्त्विक साक्ष्यों से शासक-वर्ग, कुलीन-वर्ग, विद्वान, व्यापारी-शिल्पकार, कृषक और श्रमिक जैसे विभिन्न वर्गों के अस्तित्व की सूचना मिलती है।

दुर्ग के निकट मिली श्रमिकों की झोपड़ियों के आधार पर मार्टिमर व्हीलर ने समाज में दास-प्रथा के अस्तित्व का अनुमान लगाया है। डी. एच. गार्डेन के अनुसार कुछ मूर्तियों में पुरुष-स्त्रियों को घुटनों को बाँहों से घेरकर सिर पर गोल टोपी पहने बैठे दिखाया गया है, जिन्हें गुलामों की मूर्तियाँ माना जाता है, यद्यपि कुछ पुरातत्त्वविद् इससे सहमत नहीं हैं। कुल मिलाकर इस सभ्यता के लोग युद्धप्रिय कम, शांतिप्रिय अधिक प्रतीत होते हैं। नगर-नियोजन और अस्त्रों की सीमित उपलब्धता भी इसी ओर संकेत करती है।

शासन-प्रणाली संबंधी अनुमान

चूँकि सिंधु सभ्यता के किसी भी नगर से किसी राजमहल, मंदिर अथवा राजा की स्पष्ट प्रतिमा के प्रमाण नहीं मिले हैं, इस कारण अनेक विद्वानों ने यह अनुमान लगाया है कि यहाँ किसी एकल सम्राट के स्थान पर वणिक-वर्ग अथवा पुरोहित-वर्ग द्वारा संचालित एक कुलीनतंत्रात्मक (ओलिगार्किक) अथवा गणतंत्रात्मक शासन-प्रणाली रही होगी। नगर-नियोजन की अत्यधिक एकरूपता, जैसे ईंटों का निश्चित अनुपात (4:2:1), सड़कों की समकोणीय बनावट तथा मानकीकृत बाट पूरे सिंधु क्षेत्र में एक समान पाई जाती है, जिससे यह भी अनुमान लगाया जाता है कि किसी केंद्रीय प्रशासनिक प्राधिकरण द्वारा इन मानकों को लागू किया जाता रहा होगा, भले ही इसका स्वरूप किसी एकल सम्राट-आधारित राज्य की अपेक्षा अधिक विकेंद्रीकृत रहा हो।

परिवार-व्यवस्था

संभवतः परिवार ही समाज की मूल इकाई था। उत्खनन में मिले विशाल भवनों के आधार पर अनुमान है कि बड़े संयुक्त परिवारों में अनेक सदस्य साथ रहते होंगे। खुदाई में प्राप्त बहुसंख्यक नारी-मूर्तियों से यह संकेत मिलता है कि प्राक्-आर्य संस्कृतियों की भाँति सैंधव समाज भी मातृसत्तात्मक रहा होगा। परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई थी, जिसमें पति-पत्नी और उनके बच्चे सम्मिलित होते थे और परिवार की देखभाल तथा भरण-पोषण की व्यवस्था करना पति का कर्तव्य माना जाता था।

स्त्री-मूर्तियाँ सिंधु समाज की दो विशेषताओं को उजागर करती हैं- पहली, स्त्री को भोग की वस्तु भी माना जाता था तथा दूसरी, स्त्रियाँ विभिन्न प्रकार के कार्यों में सक्रिय भागीदार थीं और पुरुषों का सहयोग करती थीं। संभवतः वे सूत कातने, कपड़ा बुनने जैसे रचनात्मक कार्यों में संलग्न रहती थीं।

मातृदेवी की उपासना और प्रजनन-पूजा

बहुसंख्यक नारी-मूर्तियों, जिन्हें अक्सर ‘मातृदेवी’ की मूर्तियाँ कहा जाता है, की व्यापक उपलब्धता के आधार पर अनेक विद्वानों का मत है कि सिंधु सभ्यता में प्रजनन-शक्ति तथा उर्वरता से जुड़ी एक मातृदेवी की उपासना प्रचलित थी, जो कृषि-आधारित समाज में भूमि की उर्वरता तथा फसल-समृद्धि से भी संबद्ध थी। यह उपासना-परंपरा आगे चलकर हिंदू धर्म की शक्ति-उपासना (देवी-पूजा) की प्राचीनतम पूर्ववर्ती परंपरा के रूप में भी देखी जाती है, यद्यपि यह संबंध केवल अनुमानात्मक है, क्योंकि सिंधु लिपि के अपठित होने के कारण इसका निश्चयात्मक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

खान-पान

सैंधव सभ्यता के लोग सामिष और निरामिष दोनों प्रकार का भोजन करते थे। उनके अनाज एवं अन्य खाद्य पदार्थों में गेहूँ, जौ, शहद, बाजरा, मटर, चावल तथा खजूर सम्मिलित थे। माँसाहार में भेड़, सुअर तथा मछली का माँस सम्मिलित था और चान्हुदड़ो के उत्खनन से मिला मछली पकड़ने का काँटा इस बात की पुष्टि करता है कि मछली भोजन का हिस्सा थी।

भोजन-पात्र मिट्टी तथा धातु (मुख्यतः ताँबे) के बनाए जाते थे, जिनमें कलश, थाली, कटोरे, तश्तरी, गिलास और चम्मच का प्रयोग होता था। सैंधव लोगों को लगभग नौ फसलों का ज्ञान था और सिंचाई के साधनों में वर्षा-जल, जलाशय तथा कुओं के जल का प्रयोग किया जाता था। भोजन चूल्हे पर पकाया जाता था और ईंधन के रूप में लकड़ी का प्रयोग किया जाता था।

खाद्य-प्रसंस्करण

पुरातात्त्विक अध्ययनों से यह भी ज्ञात होता है कि सैंधव लोग दूध तथा दुग्ध-उत्पादों से भी परिचित थे, क्योंकि गाय, भैंस तथा बकरी जैसे दुधारू पशुओं का पालन बड़े पैमाने पर किया जाता था। कुछ मृद्भांडों में वसा के अवशेषों के रासायनिक विश्लेषण से यह संकेत मिलता है कि इनका उपयोग घी अथवा मक्खन के भंडारण के लिए किया जाता होगा। इसके अतिरिक्त तिल तथा सरसों जैसे तिलहनों से तेल निकालने की तकनीक का भी उन्हें ज्ञान था, जिसका उपयोग भोजन पकाने तथा दीपक जलाने, दोनों ही प्रयोजनों के लिए किया जाता रहा होगा।

वस्त्र एवं परिधान

हड़प्पावासी सूती एवं ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्रों का प्रयोग करते थे। पुरुष ऊपरी वस्त्र को चादर की भाँति ओढ़ते थे और उच्च वर्ग रंगीन एवं कलात्मक वस्त्र पहनता था। मोहनजोदड़ो से प्राप्त प्रसिद्ध “योगी” (पुरोहित-राजा) की मूर्ति तिपतिया (तीन पहलू वाली) चादर ओढ़े हुए है। वस्त्रों की सिलाई भी की जाती थी और स्त्रियाँ कमर में घाघरे (स्कर्ट) जैसा वस्त्र पहनती थीं तथा सिर पर एक विशेष प्रकार का वस्त्र धारण करती थीं जो पंख की भाँति ऊपर उठा होता था।

वस्त्रों के प्रत्यक्ष प्रमाण मोहनजोदड़ो से चाँदी के एक जार पर लिपटे कपड़े के साक्ष्य तथा हड़प्पा से फेयंस-पात्रों के भीतर सूती वस्त्र के अवशेषों के रूप में मिलते हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि सैंधव कारीगर वस्त्र-निर्माण में अत्यंत निपुण थे। अधिकांश उपलब्ध मूर्तियाँ नग्न अवस्था में हैं, किंतु इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं कि उस काल के लोग वस्त्र धारण नहीं करते थे। वास्तव में ये नग्न मूर्तियाँ संभवतः शारीरिक सौंदर्य प्रदर्शित करने हेतु बनाई गई थीं।

सौंदर्य-प्रसाधन एवं आभूषण

सिंधु सभ्यता के स्त्री और पुरुष दोनों आभूषण-प्रिय थे और पुरुष-वर्ग दाढ़ी और मूँछों का शौकीन था। खुदाई में मिले प्रसाधन-उपकरणों में ताँबे के दर्पण, हाथीदाँत की कंघी, उस्तरे, अंजन (काजल), शलाकाएँ और शृंगारदान सम्मिलित हैं। स्त्रियाँ आँखों में काजल लगाती थीं, होंठों तथा नाखूनों को रंगती थीं और लिपस्टिक जैसे प्रसाधन से परिचित थीं; बालों में पिन भी लगाती थीं। चान्हुदड़ो से रंजन-शलाका (लिपस्टिक), काजल तथा पाउडर के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

आभूषण भी वर्ग-भेद दर्शाते थे, जैसे निम्न वर्ग मिट्टी, घोंघे, हड्डी या काँसे के आभूषण पहनता था, जबकि उच्च वर्ग सोना, चाँदी, हाथीदाँत तथा बहुमूल्य रत्नों से बने आभूषण धारण करता था। प्राप्त आभूषणों के प्रकारों में कंठहार, भुजबंध, कर्णफूल, छल्ले, चूड़ियाँ (कालीबंगा से प्राप्त), करधनी, पायजेब तथा बालियाँ सम्मिलित हैं, जिन्हें स्त्री-पुरुष दोनों धारण करते थे।

आमोद-प्रमोद

सैंधव सभ्यता के निवासी जीवन में मनोरंजन को भी विशेष महत्त्व देते थे। समाज में शांति व्याप्त थी और देश आर्थिक दृष्टि से संपन्न था, इसलिए स्वाभाविक है कि इस सभ्यता के लोग आमोद-प्रिय रहे होंगे। मनोरंजन के साधनों में मछली पकड़ना, शिकार करना, पशु-पक्षियों को आपस में लड़ाना, तथा चौपड़ एवं पासा खेलना सम्मिलित था। मोहनजोदड़ो से प्राप्त चाँदी की एक मुहर पर यूनीकॉर्न (एकश्रृंगी पशु) तथा एक व्यक्ति को दो बाघों से लड़ते हुए दिखाया गया है। एक अन्य मुहर पर दो जंगली मुर्गों के लड़ने का चित्रण मिलता है। भाला, तलवार, चाकू, बरछा आदि अस्त्रों की प्राप्ति से प्रमाणित होता है कि इनका प्रयोग युद्ध के अतिरिक्त गैंडा, हिरन, चीता जैसे पशुओं के शिकार के लिए भी किया जाता था।

काँसे की प्रसिद्ध नर्तकी की मूर्ति तथा मुहरों पर अंकित विभिन्न वाद्य-यंत्रों से स्पष्ट होता है कि सैंधव लोग नृत्य एवं संगीत में गहरी रुचि रखते थे। हड़प्पा से प्राप्त एक मुहर पर ढोलवादक स्त्री-पुरुष का अंकन इसी संगीत-प्रियता का द्योतक है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से प्राप्त पासों से लगता है कि चौपड़ और शतरंज जैसे खेल पर्याप्त लोकप्रिय थे। ये पासे चतुष्कोणीय आकार में मिट्टी और पत्थर के बनते थे तथा उनके विभिन्न पार्श्वों पर संख्याएँ अंकित होती थीं। कुछ पासे हाथीदाँत के भी मिले हैं, जिन्हें संभवतः धनिक वर्ग प्रयोग करता था। लोथल से शतरंज की गोटियाँ तथा खेलने के दो बोर्डों के साक्ष्य मिले हैं।

मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा से टेराकोटा के मुखौटे और कठपुतलियाँ मिली हैं। बच्चों के मनोरंजन हेतु मिट्टी की खिलौना-गाड़ियाँ, सीटियाँ, झुनझुने आदि बड़ी संख्या में उत्खनन में प्राप्त हुए हैं। कुछ मिट्टी की गाड़ियाँ बैलों द्वारा खींची जाती दिखाई गई हैं। नौशारो से ऐसी खिलौना-गाड़ियों के पहिए बड़ी संख्या में मिले हैं, जिनसे स्पष्ट है कि बच्चे बैलगाड़ी के खिलौनों से खेलते रहे होंगे। पहियों पर टिकी हुई अनेक पशु-मूर्तियाँ भी प्राप्त हुई हैं और कुछ स्थलों से स्टेडियम-सदृश संरचनाओं के प्रमाण भी मिले हैं।

टेराकोटा ‘बैलगाड़ी’ और ‘बंदर’ खिलौने

सिंधु सभ्यता के उत्खनन-स्थलों से प्राप्त खिलौनों में एक विशेष रूप से उल्लेखनीय खिलौना ऐसी टेराकोटा-आकृति है, जिसमें एक बंदर की डोरी से बँधी हुई आकृति डंडे पर ऊपर-नीचे फिसलती है। यह खिलौना आधुनिक ‘यो-यो’ अथवा फिसलने वाले खिलौनों के सिद्धांत का एक प्राचीनतम उदाहरण है। इसी प्रकार सीटी बजाने वाले पक्षी-आकार के मिट्टी के खिलौने भी प्राप्त हुए हैं, जिनमें फूँक मारने पर पक्षी की आवाज़ जैसी ध्वनि उत्पन्न होती थी। इन खिलौनों की तकनीकी जटिलता तथा सौंदर्यबोध से स्पष्ट है कि सिंधु सभ्यता में बाल-मनोविज्ञान तथा बालकों के शिक्षाप्रद मनोरंजन को भी पर्याप्त महत्त्व दिया जाता था।

अंत्येष्टि संस्कार (शवाधान प्रणाली)

अंत्येष्टि संस्कार से किसी भी समाज के धार्मिक एवं सामाजिक विश्वासों की झलक मिलती है। सिंधु सभ्यता में सामान्यतः कब्रिस्तान बस्ती से बाहर स्थापित किए जाते थे, यद्यपि भगवानपुरा में मिली समाधि इसका अपवाद है, जो बस्ती के भीतर स्थित है। उत्खननों से पता चलता है कि हड़प्पाई लोग अपने मृतकों को या तो भूमि में गाड़ते थे या जलाते थे। इस सभ्यता में तीन प्रकार से अंत्येष्टि-संस्कार किए जाने के प्रमाण मिलते हैं।

पूर्ण समाधिकरण की प्रथा में संपूर्ण शव को भूमि में दफनाया जाता था, साथ ही मृतक की प्रिय वस्तुएँ भी रखी जाती थीं। यह प्रथा प्राचीन मिस्र के पिरामिडों में भी दिखाई देती है और इसका सर्वोत्तम उदाहरण हड़प्पा का “आर-37” कब्रिस्तान है।

आंशिक समाधिकरण की प्रथा में शव को किसी खुले स्थान पर रख दिया जाता था और पशु-पक्षियों द्वारा खाए जाने के बाद बचे अवशेषों को भूमि में गाड़ दिया जाता था। बहावलपुर से इसी प्रकार का साक्ष्य मिला है।

दाह-संस्कार की प्रथा में शव को जलाने के बाद भस्मावशेषों को किसी पात्र में रखकर नदी में प्रवाहित कर दिया जाता था या कभी-कभी राख को भूमि में ही गाड़ दिया जाता था। संभवतः कुछ लोग मृतकों को सीधे जल में प्रवाहित भी करते रहे होंगे।

कालीबंगा से तीनों प्रकार के शवाधानों के प्रमाण मिले हैं, जिनमें दो प्रकार के शवाधानों में कंकाल प्राप्त हुए हैं, किंतु तीसरे प्रकार में कब्र-सामग्री तो मिली है, पर कोई कंकाल नहीं है,  इसीलिए इसे “प्रतीकात्मक कब्र” कहा गया है। कालीबंगा में एक वृत्ताकार गड्ढ़ा भी मिला है, जिसमें काँस्य-दर्पण, मृद्भांड आदि अंत्येष्टि-सामग्री गाड़ी गई थी। हड़प्पा के दुर्ग के दक्षिण-पश्चिम में स्थित कब्रिस्तान को “एच कब्रिस्तान” नाम दिया गया है, जहाँ स्त्री के साथ बच्चे को दफनाए जाने का भी साक्ष्य मिला है। लोथल में प्राप्त एक कब्र में शव का सिर पूर्व-पश्चिम दिशा में करवट लिए हुए लिटाया गया है। एक अन्य कब्र में दो शव आपस में लिपटे हुए पाए गए हैं। सुरकोतदा से अंडाकार शवाधान के अवशेष प्राप्त हुए हैं। रूपनगर (रोपड़) की एक कब्र में मनुष्य के साथ कुत्ते का भी अवशेष मिला है, जो मानव-पशु सहचर्य का प्रमाण है। मोहनजोदड़ो के अंतिम स्तर से प्राप्त कुछ सामूहिक नर-कंकालों तथा एक कुएँ की सीढ़ियों पर पड़े स्त्री के बालों के आधार पर मार्टिमर व्हीलर ने अनुमान लगाया कि ये कंकाल किसी बाहरी आक्रमण के शिकार हुए व्यक्तियों के हो सकते हैं।

व्हीलर का आक्रमण-सिद्धांत की आलोचना

यद्यपि मार्टिमर व्हीलर ने मोहनजोदड़ो के इन कंकालों को आर्य-आक्रमण का प्रमाण मानते हुए यह प्रसिद्ध सिद्धांत प्रस्तुत किया था कि आर्यों के आक्रमण से ही सिंधु सभ्यता का पतन हुआ, किंतु परवर्ती शोधों ने इस मत को गंभीर चुनौती दी है। जॉर्ज एफ. डेल्स जैसे विद्वानों के अनुसार ये  कंकाल अलग-अलग स्तरों तथा अलग-अलग कालखंडों से प्राप्त हुए हैं, जो किसी सामूहिक हत्याकांड के प्रमाण नहीं हैं और इन पर हथियारों के घाव के कोई स्पष्ट चिह्न भी नहीं मिलते हैं। अधिकांश विद्वान सिंधु सभ्यता के पतन का कारण किसी बाह्य आक्रमण के बजाय जलवायु-परिवर्तन, नदियों के मार्ग-परिवर्तन, विशेषतः घग्गर-हकरा/सरस्वती नदी के  सूखने तथा पारिस्थितिक असंतुलन जैसे आंतरिक कारकों को मानते हैं, जिसने धीरे-धीरे नगरीय जीवन को असंभव बना दिया। इससे लगता है कि इस सभ्यता का क्रमिक ह्रास हुआ, न कि आकस्मिक विनाश।

इस प्रकार सैंधव सभ्यता का सामाजिक जीवन विविधतापूर्ण, संगठित और अपेक्षाकृत समृद्ध था। वर्ग-आधारित सामाजिक संरचना, संभवतः मातृसत्तात्मक पारिवारिक व्यवस्था, संतुलित एवं विविध आहार, वस्त्र-निर्माण में दक्षता, सौंदर्य-प्रसाधन तथा आभूषणों के प्रति रुचि, नृत्य-संगीत व खेलों जैसे मनोरंजन के साधन, तथा विविधतापूर्ण अंत्येष्टि-प्रथाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता न केवल तकनीकी और नगर-नियोजन की दृष्टि से उन्नत थी, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से भी एक परिपक्व और सुव्यवस्थित समाज थी। मेहरगढ़ जैसी पूर्ववर्ती स्वदेशी परंपरा से उद्भूत होकर इस सभ्यता का सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन यद्यपि लिपि अपठित होने के कारण अनुमानपरक ही हैं, फिर भी पुरातात्त्विक साक्ष्यों से इस प्राचीन सभ्यता के जनजीवन की एक समृद्ध झलक मिलती है।

सैंधव सभ्यता के सामाजिक जीवन से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. सैंधव सभ्यता का सामाजिक जीवन कैसा था?

सैंधव समाज व्यवस्थित, नगरीय और अनुशासित था। समाज में विभिन्न वर्गों के लोग रहते थे और नगरों में आवासीय तथा सार्वजनिक क्षेत्रों का सुव्यवस्थित विभाजन था।

2. सैंधव समाज में परिवार की क्या स्थिति थी?

सैंधव समाज में परिवार सामाजिक जीवन की प्रमुख इकाई था। पुरातात्त्विक साक्ष्यों से परिवार, गृहस्थ जीवन और सामुदायिक जीवन के महत्त्व का पता चलता है।

3. सैंधव सभ्यता में स्त्रियों की स्थिति कैसी थी?

स्त्रियों के जीवन से संबंधित जानकारी मुख्यतः मातृदेवी की मूर्तियों, आभूषणों तथा अन्य पुरातात्त्विक साक्ष्यों से मिलती है। इससे सामाजिक और धार्मिक जीवन में स्त्रियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका का संकेत मिलता है।

4. सैंधव सभ्यता के लोग कौन-कौन से आभूषण पहनते थे?

सैंधव लोग सोना, चाँदी, ताँबा, शंख, हाथीदाँत, मणियों और मिट्टी से बने आभूषणों का प्रयोग करते थे। हार, कंगन, अंगूठियाँ, कुंडल और मनके प्रमुख आभूषण थे।

5. सैंधव सभ्यता के लोगों के मनोरंजन के साधन क्या थे?

सैंधव लोगों के मनोरंजन में खेल, खिलौने, नृत्य और संगीत जैसी गतिविधियाँ शामिल थीं। मिट्टी की गाड़ियाँ, पशु-पक्षियों की आकृतियाँ तथा पासे जैसे अवशेष उनके मनोरंजन और खेलों के प्रमाण हैं।
error: Content is protected !!
Scroll to Top
Enable Notifications OK No thanks