महोदयपुरम का चेर पेरुमल वंश (Chera Perumal Dynasty of Mahodayapuram) (Chera Perumal Dynasty of Mahodayapuram)

महोदयपुरम का चेर पेरुमल वंश (Chera Perumal Dynasty of Mahodayapuram)
महोदयपुरम का चेर पेरुमल वंश परिचय : केरल के इतिहास में एक नए युग का […]

महोदयपुरम का चेर पेरुमल वंश

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परिचय : केरल के इतिहास में एक नए युग का आरंभ

केरल के इतिहास में नौवीं शताब्दी ईस्वी एक निर्णायक बिंदु है क्योंकि इसी काल में द्वितीय चेर साम्राज्य का उदय हुआ और पेरुमल शासकों की सत्ता स्थापित हुई, जिसने पहली बार केरल को एक विशिष्ट राजनीतिक और सांस्कृतिक इकाई के रूप में स्पष्ट पहचान दी। इस राजवंश के शासकों को सामान्यतः “पेरुमल” कहा जाता था, और कुछ परंपराओं में इन्हें “कुलशेखर” के नाम से भी जाना जाता है। परंपरागत रूप से इस राजवंश का शासनकाल लगभग 800 से 1124 ईस्वी तक माना जाता है, यद्यपि इसकी तिथियों और शासकों के क्रम को लेकर इतिहासकारों में गंभीर मतभेद है। अधिकांश विद्वान इस वंश के प्रामाणिक शासनकाल को नौवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच अर्थात् मोटे तौर पर 844 ई. से 1124 ई. तक मानते हैं, जिस दौरान इसका शासन वर्तमान केरल तथा उसके सन्निकट दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों पर रहा। इस राजवंश की राजधानी महोदयपुरम थी, जिसकी पहचान आज के कोडुंगल्लूर (त्रिशूर, केरल) से की जाती है। पेरियार नदी के मुहाने पर बसा यह नगर प्राचीन काल से ही एक बड़ा व्यापारिक, धार्मिक तथा राजनीतिक केंद्र रहा था।

चेर पेरुमल काल को केरल का “स्वर्ण युग” कहा जाता है, क्योंकि इसी दौर में केरल एक पृथक राजनीतिक-सांस्कृतिक पहचान वाले क्षेत्र के रूप में उभरा। इस काल में मलयालम भाषा और वट्टेलुत्तु लिपि को राजकीय अभिलेखों में स्थान मिला, केरल-द्रविड़ शैली की मंदिर स्थापत्य कला विकसित हुई, हिंद महासागर के मसाला व्यापार में केरल के बंदरगाहों ने केंद्रीय भूमिका निभाई तथा ईसाई, यहूदी और मुस्लिम व्यापारिक समुदायों को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ। यही वह काल है जिसकी विरासत आज भी केरल की भाषा, संस्कृति और सामाजिक संरचना में जीवंत रूप से दिखाई देती है।

वंश के विभिन्न नाम और उनकी सार्थकता

इतिहास-लेखन में इस राजवंश को कई नामों से पुकारा गया है। इसे “चेर पेरुमल वंश” कहा गया क्योंकि इसके शासकों ने “पेरुमल” की राजकीय उपाधि धारण की थी, और “महोदयपुरम के पेरुमल” राजधानी के नाम पर दिया गया नाम है। महोदयपुरम का ही स्थानीय-तमिल रूप “मकोताई” होने के कारण इसे “मकोताई के चेर पेरुमल” भी कहा गया, जबकि “कुलशेखर” उपाधि के आधार पर इसे परंपरागत रूप से “कुलशेखर वंश” का नाम मिला। पुरानी इतिहास-लेखन परंपरा में इसे “द्वितीय चेर साम्राज्य” या “उत्तरवर्ती चेरा” भी कहा जाता था, यद्यपि यह नामकरण विवादास्पद है। आधुनिक इतिहासकारों को इनमें से दो नामों पर आपत्तियाँ हैं। पहली, “कुलशेखर वंश” नाम पूर्णतया उचित नहीं है, क्योंकि इस वंश के सभी शासकों ने यह उपाधि धारण नहीं की थी। उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार केवल स्थाणु रवि कुलशेखर और राम कुलशेखर ने ही स्पष्ट रूप से इस उपाधि को अपनाया था। दूसरी, “द्वितीय चेर साम्राज्य” नाम इसलिए आपत्तिजनक है क्योंकि यह कोई विशाल केंद्रीकृत साम्राज्य नहीं था। यही कारण है कि इस वंश को “महोदयपुरम के चेर पेरुमल” कहा जाता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : चेर सत्ता का पुनरुत्थान

प्राचीन चेर वंश का उल्लेख तमिल संगम साहित्य में मिलता है, जहाँ चेर, चोल और पांड्य इन तीन राजवंशों को “मूवेंदर” यानी तीन प्रमुख तमिल राजवंशों की प्रतिष्ठा प्राप्त थी। संगम युग के पश्चात दक्षिण भारत में कलभ्रों (कालभ्र) के उदय के साथ राजनीतिक अस्थिरता का एक लंबा दौर आया, जिसे इतिहास में प्रायः “अंधकार युग” भी कहा जाता है। लगभग पाँच शताब्दियों तक चेर शासकों के स्पष्ट और सुनिश्चित प्रमाणों का अभाव रहा, किंतु आठवीं-नौवीं शताब्दी के आसपास स्थिति में परिवर्तन आया। ऐतिहासिक अनुमान के अनुसार वर्तमान मध्य केरल इस काल में विशाल कोंगु चेर (कोंगु केरल) राज्य से अलग होकर एक स्वतंत्र इकाई के रूप में उभरा और इसी प्रक्रिया से महोदयपुरम-कोडुंगल्लूर केंद्रित चेर पेरुमल राज्य की स्थापना हुई। केरल की परंपरागत ऐतिहासिक गाथा “केरलोल्पत्ति” के अनुसार इस काल से पहले मध्य केरल पर किसी न किसी रूप में एक क्षेत्रीय अथवा प्रांतीय वायसरॉय-शासन व्यवस्था कार्यरत रही होगी और नौवीं शताब्दी में इस नए राजवंश ने महोदयपुरम को अपनी राजधानी बनाकर सत्ता स्थापित की। किंतु केरलोल्पत्ति एक परंपरागत गाथा है, जिसमें ऐतिहासिक तथ्य और लोक-स्मृति का सम्मिश्रण है, इसलिए इसको प्रामाणिक इतिहास नहीं माना जा सकता है।

वंश-परंपरा का दावा : सूर्यवंश और इक्ष्वाकु वंश से जुड़ाव

मध्यकालीन चेर शासक स्वयं को प्राचीन संगम-युगीन चेर वंश का प्रत्यक्ष वंशज मानता था और यह दावा केवल भावनात्मक नहीं बल्कि राजनीतिक रूप से भी सुविचारित था। “चेर” नाम धारण करने से शासक को संगम साहित्य की उस उच्च प्रतिष्ठा से जुड़ने का अवसर मिलता था, जो प्राचीन चेर, चोल और पांड्य राजवंशों को प्राप्त थी, जिससे अपने अधीन आए प्रदेशों पर उसकी राजनीतिक वैधता भी मज़बूत होती थी। चेर पेरुमल शासक को प्रायः सूर्यवंश से संबद्ध बताया गया है और कुरुमात्तूर शिलालेख के अनुसार यह वंश स्वयं को भगवान श्रीराम के इक्ष्वाकु वंश से जोड़ता था। चूँकि इसका संबंध विल्लवर योद्धा वंश-परंपरा से भी था, इसलिए इसे “विल्लवर कोन” यानी “विल्लवरों का राजा” की उपाधि भी प्राप्त थी।

राजनीतिक यथार्थ

चेर पेरुमल की सत्ता पूरे केरल पर एक समान केंद्रीकृत शासन के रूप में कभी स्थापित नहीं हुई। उत्तर में मूषिक (एझिमला) वंश और दक्षिण में आय वंश जैसे स्थानीय राजवंश तथा अनेक क्षेत्रीय प्रमुख अपने-अपने क्षेत्रों में स्वतंत्र सत्ता रखते थे। चेर शासक के इनके साथ संबंध समय के अनुसार बदलते रहे- कभी अधीनता के, कभी सहयोग के और कभी प्रत्यक्ष टकराव के।

इतिहास जानने के प्रमुख स्रोत

चेर पेरुमल इतिहास का पुनर्निर्माण मुख्यतः चार प्रकार के स्रोतों से होता है- अभिलेख और ताम्रपत्र, साहित्यिक ग्रंथ, पुरातात्त्विक साक्ष्य तथा विदेशी यात्रियों के विवरण। इनमें सबसे विश्वसनीय आधार अभिलेखीय स्रोत हैं।

अभिलेखीय और ताम्रपत्र स्रोत

महोदयपुरम के पेरुमलों ने अपने शासनकाल में कई ताँबे की पट्टिकाओं (कॉपर प्लेट्स) और पत्थरों पर अभिलेख खुदवाए, जिनमें से अधिकांश प्राचीन मलयालम भाषा में वट्टेलुत्तु लिपि में हैं और कुछ संस्कृत में ग्रंथ लिपि में भी मिलते हैं। इनमें केरल के चंगनास्सेरी के निकट वाझापल्ली महाशिव मंदिर से प्राप्त वाझापल्ली ताम्रपत्र राजा राजशेखर के काल का है, जिसे केरल का सबसे प्राचीन ऐसा प्रामाणिक अभिलेख माना जाता है और जिसमें आधिकारिक रूप से क्षेत्रीय भाषा तथा वट्टेलुत्तु लिपि का प्रयोग हुआ है। इससे मंदिर प्रशासन और स्थानीय संस्थाओं की भी महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। मलप्पुरम क्षेत्र के कुरुमात्तूर (एरियाकोड) से प्राप्त संस्कृत कुरुमात्तूर शिलालेख में राजशेखर का स्पष्ट उल्लेख है और इसमें चेर वंश का संबंध इक्ष्वाकु वंश से बताया गया है। स्थाणु रवि कुलशेखर के शासनकाल के पाँचवें वर्ष अर्थात् लगभग 849 ई. का तरिसापल्ली ताम्रपत्र कोल्लम (क्विलोन) के सीरियाई ईसाई समुदाय को भूमि, सेवक तथा विशेष व्यापारिक-प्रशासनिक अधिकार दिए जाने का उल्लेख करता है और भारत में ईसाई समुदाय के इतिहास का सबसे प्राचीन तथा प्रामाणिक स्रोत है। त्रिशूर जिले के कुडलमानिक्यम मंदिर से प्राप्त इरिंजालकुडा अभिलेख (लगभग 855 ई.), जो स्थाणु रवि के शासन के लगभग ग्यारहवें वर्ष का है, इसमें मंदिर समिति द्वारा भूमि-संबंधी निर्णय का उल्लेख मिलता है। तिरुवात्रुवाय (तिरुवल्ला) अभिलेख (लगभग 861 ई.) में मंदिर सभा द्वारा “अवणी ओणम” के आयोजन की व्यवस्था का वर्णन है, जो केरल में ओणम उत्सव के प्रारंभिक अभिलेखीय संदर्भों में से एक है। तमिल क्षेत्र के थिल्लैस्थानम् अभिलेख (लगभग 885 ई.) में “चेरमान तणु रवि” का उल्लेख मिलता है, जिससे चोल-चेर सैन्य सहयोग पर प्रकाश पड़ता है। वडक्कनचेरी के नेडुम्पुरम थाळि अभिलेख में गोद रवि के सत्रहवें शासन-वर्ष का यह भूमि-दान अभिलेख विशेष महत्त्व रखता है, क्योंकि इसमें शासन-वर्ष के साथ-साथ कलि संवत् का भी उल्लेख है। इंदु कोता वर्मन के शासनकाल का त्रिक्काकारा अभिलेख (लगभग 953 ई.) उसके काल-निर्धारण का प्रमुख आधार है, जबकि गोद रवि के शासन के पंद्रहवें वर्ष का चोक्कुर शिलालेख उसके शासनकाल की पुष्टि करता है। राजा भास्कर रवि मनुकुलादित्य द्वारा लगभग 1000 ईस्वी के आसपास जारी कोच्चि के यहूदी ताम्रपत्र कोडुंगल्लूर के यहूदी नेता जोसेफ रब्बान को शाही विशेषाधिकार, कर-छूट और व्यापारिक अधिकार सौंपे जाने का प्रमाण देते हैं। पलक्कड़ जिले के तिरुमित्ताकोड मंदिर के मुख्य द्वार पर मिले वट्टेलुत्तु और ग्रंथ लिपि के अभिलेख (लगभग 1028 ई.) में रवि गोद के आठवें शासन-वर्ष का उल्लेख है, साथ ही एक चोल अधिकारी द्वारा मंदिर को स्वर्ण-दान दिए जाने का विवरण भी मिलता है। कोझिकोड के निकट से प्राप्त तिरुवन्नूर शिलालेख राजराज के शासन के चौथे वर्ष का है, जिसमें जैन धर्म को दिए गए संरक्षण का उल्लेख है। राम कुलशेखर के शासनकाल का पेरुण्णा अभिलेख (1099 ई.) वंश के अंतिम चरण को समझने में सहायक है। इनके अतिरिक्त तिरुनेल्ली, त्रिक्कोडीथानम, तिरुनंतिकरै तथा कासरगोड के कोडवलम वामन मंदिर जैसे अनेक स्थानों से प्राप्त अभिलेख भी इस काल के इतिहास-निर्माण के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।

अधिकांश ज्ञात चेर पेरुमल अभिलेखों की पहली व्यवस्थित सूची इतिहासकार एम.जी.एस. नारायणन ने अपनी केरल विश्वविद्यालय की पीएच.डी. थीसिस “पेरुमल्स ऑफ केरला” (1972 ई.) के परिशिष्ट “इंडेक्स टू चेर इंस्क्रिप्शन्स” में तैयार की थी, जिसे 2013 में सार्वजनिक किया गया। इसके अतिरिक्त कुछ नए खोजे गए अभिलेख और हाल ही में पुरालेखशास्त्री एम.आर. राघव वारियर द्वारा संपादित तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा 2021 ई. में प्रकाशित “साउथ इंडियन इंस्क्रिप्शन्स” (खंड 43) से भी कई पूर्व-अप्रकाशित अभिलेख सामने आए हैं।

साहित्यिक स्रोत

इस काल में धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष दोनों प्रकार के साहित्य की रचना हुई। इस वंश की परंपरागत स्थापना से जुड़ा कुलशेखर आलवार स्वयं एक प्रसिद्ध वैष्णव भक्त-संत माना जाता है, जिसकी संस्कृत रचना “मुकुंदमाला” तथा “नालायिर दिव्य प्रबंधम्” का अंग मानी जाने वाली तमिल रचना “पेरुमाळ तिरुमोलि” तत्कालीन धार्मिक इतिहास के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। चेरमान पेरुमल नायनार की रचनाएँ-“पोन्वण्णत्तांदादि”, “तिरुवारूर मुम्मणिक्कोवै” और “आदियुला” यानी तिरुक्कैलायज्ञान उला इस काल के धार्मिक जीवन को समझने में सहायक हैं। स्थाणु रवि के समकालीन खगोलशास्त्री शंकरनारायण ने 869 ई. में “लघुभास्करीयविवरण” नामक विस्तृत टीका लिखी, जो गणित और खगोलशास्त्र के इतिहास के साथ-साथ चेर शासकों के काल-निर्धारण के लिए भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। नाटककार कुलशेखर के रूप में जाने जाने वाले कुलशेखर वर्मन द्वारा रचित “तपतीसंवरणम्” और “सुभद्राधनंजयम्” इस काल की उन्नत साहित्यिक और नाट्य-परंपरा के परिचायक हैं,और इन नाटकों की प्रस्तुति-परंपरा से केरल की कूडियाट्टम नाट्य-शैली का गहरा संबंध रहा है। राजशेखर के दरबार से जुड़े कवि वसुभट्ट कृत “त्रिपुरदहन” राजकीय संरक्षण में साहित्य-सृजन का एक अच्छा उदाहरण है। केरल की सबसे प्राचीन परंपरागत गाथाओं में से एक “केरलोल्पत्ति” में पेरुमलों की वंशावली और महोदयपुरम पर उनके शासन का वर्णन है, यद्यपि इस ग्रंथ में ऐतिहासिक तथ्य और परंपरागत स्मृति का मिश्रण है। चौदहवीं शताब्दी का महाकाव्य “रामचरितम्” उस काल के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश को जीवंत ढंग से प्रस्तुत करता है, जबकि चेक्किलार द्वारा रचित बारहवीं शताब्दी का तमिल हागियोग्राफिक ग्रंथ “पेरियपुराणम्” चेरमान पेरुमल नायनार का जीवन-वृत्तांत प्रस्तुत करता है।

पुरातात्त्विक साक्ष्य

कोडुंगल्लूर (प्राचीन महोदयपुरम) तथा उसके निकटवर्ती क्षेत्रों, विशेषकर पत्तनम/मुज़िरिस की खुदाई से महल के अवशेष, प्राचीन मंदिर और व्यापारिक बस्तियों के प्रमाण मिले हैं। केरल काउंसिल फॉर हिस्टॉरिकल रिसर्च द्वारा 2007 ई. से 2015 ई. के बीच पुरातत्वविद् पी.जे. चेरियन के नेतृत्व में किए गए पत्तनम उत्खनन ने इस क्षेत्र को प्राचीन बंदरगाह मुज़िरिस से जोड़ने के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत किए, यद्यपि पत्तनम की मुज़िरिस के रूप में पूर्ण पहचान को लेकर विद्वानों में अभी भी बहस जारी है। चेरामन परम्बू से प्राप्त चीनी मिट्टी के बर्तन (सेलाडॉन पॉटरी), रोमन सिक्के और धातु के उपकरण यह प्रमाणित करते हैं कि यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार-संपर्कों का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था, और इसकी व्यापारिक परंपरा चेर पेरुमल काल से भी बहुत पहले से चली आ रही थी।

विदेशी विवरण

महोदयपुरम एक तटीय और समृद्ध व्यापारिक राज्य था और इसका उल्लेख विदेशी यात्रियों तथा भूगोलवेत्ताओं के विवरणों में भी मिलता है। सुलेमान अल-ताजिर (नौवीं शताब्दी), अल-मसऊदी और इब्न खुरदादबेह जैसे अरब यात्रियों और भूगोलवेत्ताओं ने मालाबार तट के राजाओं और यहाँ के समृद्ध काली मिर्च व्यापार का विस्तृत वर्णन किया है, जबकि सोंग राजवंश के चीनी अभिलेखों में भी केरल के तटों से होने वाले व्यापार और वहाँ से भेजे गए दूतों का उल्लेख मिलता है।

महोदयपुरम : राजधानी और उसका स्वरूप

महोदयपुरम, जिसे अभिलेखों में “मकोताई” भी कहा गया है, चेर पेरुमल की प्रमुख राजधानी थी और इसकी पहचान वर्तमान कोडुंगल्लूर तथा उससे सटे तिरुवंचिकुलम क्षेत्र से की जाती है। पेरियार नदी के मुहाने पर स्थित होने के कारण यह नगर समुद्री व्यापार के लिए आदर्श स्थान पर था, और प्राचीन बंदरगाह मुज़िरिस के निकट स्थित था। विभिन्न स्रोतों में इस नगर के अलग-अलग नाम मिलते हैं- संस्कृत ग्रंथों में इसे महोदयपुरम या मकोताई, यात्रियों के विवरणों में मुज़िरी तथा कुछ शिलालेखों में मुयिरिकोड कहा गया है। महोदयपुरम का विकास तिरुवंचिकुलम के शिव मंदिर के आसपास हुआ, जो केरल में शैव परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था और इस प्रकार यह नगर केवल राजनीतिक राजधानी ही नहीं, बल्कि धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र बन गया। महोदयपुरम एक साथ चार भूमिकाएँ निभाता था- यह पेरुमल के दरबार, नालु थाळि की मंत्रि-परिषद और राजकीय सेना का राजनीतिक केंद्र था; तिरुवंचिक्कुलम शिव मंदिर, त्रिक्कुलशेखरपुरम मंदिर और कोडुंगल्लूर भगवती मंदिर जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों का धार्मिक केंद्र था; पश्चिम एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन से जुड़े व्यापारिक मार्गों का प्रमुख व्यापारिक पड़ाव था; और एक वेधशाला तथा पांडुलिपि-संग्रह परंपरा के उल्लेख के साथ ज्ञान-विज्ञान का भी केंद्र था। पेरुमल शासकों ने प्राचीन चेरों की राजनीतिक प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया, इसी कारण इस शासन को चेर राजनीतिक परंपरा की पुनर्स्थापना कहा जाता है। इस राजवंश को कुलशेखर वंश कहने की परंपरा भी इसीलिए प्रचलित है, क्योंकि प्रारंभिक शासकों में कुलशेखर नाम प्रमुख रूप से मिलता है, यद्यपि आधुनिक इतिहासकार इस बात पर एकमत नहीं हैं कि “कुलशेखर” किसी विशिष्ट राजा का नाम था अथवा एक वंशानुगत उपाधि। चेर शासक ने प्रशासनिक और धार्मिक गतिविधियों के लिए मंदिरों तथा स्थानीय संस्थाओं को निरंतर संरक्षण दिया और इस काल के अभिलेखों से भूमि-अनुदान, मंदिर प्रशासन, व्यापारिक समुदायों तथा स्थानीय सभाओं के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

चेर पेरुमल शासकों की कालानुक्रमिक सूची

पेरुमल या उत्तरवर्ती चेरा शासकों का कालक्रम इतिहासकारों के लिए अभी भी एक जटिल समस्या बना हुआ है। परंपरा में इस राज्य के तेरह शासकों का उल्लेख मिलता है, लेकिन उनके शासनकाल और क्रम को लेकर विद्वानों में गंभीर मतभेद हैं। वी.के.आर. मेनन, गोपीनाथ राव और के.ए. नीलकंठ शास्त्री जैसे विद्वानों ने स्थाणु रवि को चोल शासक आदित्य चोल का समकालीन माना है, जबकि पुरालेखविद् रामनाथ अय्यर ने चेरा काल के लिए अलग काल-सीमा प्रस्तावित की थी। एलामकुलम कुंजन् पिल्लै का मत था कि “कुलशेखर” एक वंशानुगत उपाधि थी और प्रारंभिक शासक का नाम भी कुलशेखर रहा होगा, जबकि एम.जी.एस. नारायणन ने प्रथम शासक के रूप में किसी पृथक “कुलशेखर” को स्वीकार न करते हुए पेरुमल काल के लिए लगभग 800–1122 ईस्वी की काल-सीमा प्रस्तावित की। चेरा कालक्रम के निर्धारण में स्थाणु रवि का शासनकाल विशेष महत्त्व रखता है, क्योंकि उसके शासन के पाँचवें वर्ष से संबंधित लगभग 849 ईस्वी का तरिसापल्ली ताम्रपत्र इस पूरे कालक्रम के पुनर्निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण आधार माना जाता है। नीचे दी गई सूची एम.जी.एस. नारायणन (1972 ई.) द्वारा एलमकुलम पी.एन. कुंजन पिल्लई (1963 ई.) के शोध के आधार पर संशोधित और आगे चलकर मनु वी. देवदेवन (2014 ई.) तथा केशवन वेलुथाट के संपादन में 2020 ई. में पुनः परिष्कृत वंशावली पर आधारित है।

परंपरागत संस्थापक और वैष्णव आलवार संत कुलशेखर वर्मन अथवा कुलशेखर आलवार का शासनकाल लगभग 800–820 ई. माना जाता है। इसके बाद पहला प्रामाणिक रूप से अभिलिखित शासक स्थाणु रवि कुलशेखर लगभग 844/845 से 870/871 ई. तक सत्तासीन रहा। संभवतः चेरमान पेरुमल नायनार के रूप में पहचाने जाने वाले राम राजशेखर ने लगभग 870/871 से 883/884 ई. तक शासन किया, जिसके बाद चोल-चेर वैवाहिक संबंधों के लिए प्रसिद्ध विजयराग लगभग 883/884 से 895 ई. तक सत्तारूढ़ रहा। “केरल केसरी” उपाधि धारण करने वाले गोद गोद (कोता कोता) का शासनकाल लगभग 895 से 905 ई. तक माना जाता है, जबकि परांतक प्रथम से घनिष्ठ संबंधों के लिए जाना जाने वाला गोद रवि लगभग 905/906 से 943/944 ई. तक शासक रहा। त्रिक्काकारा अभिलेख (953 ई.) के लिए प्रसिद्ध इंदु कोता वर्मन (इंदेश्वरन गोद) का शासनकाल लगभग 943 से 962 ई. तक फैला हुआ है। यहूदी ताम्रपत्र के लिए विख्यात और चेर-चोल युद्ध के आरंभ से जुड़ा भास्कर रवि वर्मन प्रथम (मनुकुलादित्य) लगभग 962 से 1019/1021 ई. तक शासक रहा, जिसके पश्चात अल्पकालीन शासक भास्कर रवि वर्मन द्वितीय लगभग 1019–1021 ई. तक और सीमित अभिलेखीय उल्लेख वाला वीर केरल लगभग 1021 ई. के आसपास सत्तासीन रहे। तिरुमित्ताकोड अभिलेख (1028 ई.) के लिए जाना जाने वाला रवि गोद (राजसिंह) लगभग 1021 से 1036 ई. तक शासक रहा, और तिरुवन्नूर शिलालेख तथा जैन संरक्षण के लिए प्रसिद्ध राजराज (भास्कर रवि वर्मन तृतीय से संबद्ध) ने लगभग 1036 से 1089 ई. तक शासन किया। वंश का अंतिम ज्ञात शासक राम कुलशेखर (रवि राम वर्मन) लगभग 1089/1090 से 1122/1124 ई. तक सत्तासीन रहा।

इस सूची की प्रत्येक तिथि निश्चित और सर्वमान्य नहीं है। विशेष रूप से प्रारंभिक शासकों की पहचान, उनके शासनकाल तथा कुलशेखर आलवार और कुलशेखर वर्मन के पारस्परिक संबंध को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है और अंतिम चरण के वीर केरल, राजसिंह तथा भास्कर रवि तृतीय जैसे शासकों के क्रम और पहचान पर भी विवाद है। इसीलिए चेर पेरुमल इतिहास के पुनर्निर्माण में अभिलेख, ताम्रपत्र, समकालीन साहित्यिक स्रोत तथा विदेशी विवरण ही अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय आधार माने जाते हैं।

कुलशेखर वर्मन/कुलशेखर आलवार (लगभग 800–820 ई.)

परंपरागत मान्यता के अनुसार इस वंश का संस्थापक राजा कुलशेखर वर्मन था, जिसे कुलशेखर आलवार भी कहा जाता है। वह दक्षिण भारत की वैष्णव भक्ति परंपरा के बारह प्रमुख आलवार संतों में से एक माना जाता है और इस परंपरा में उसे सातवें आलवार का स्थान प्राप्त है। कुलशेखर आलवार को परंपरागत रूप से द्वितीय चेरा साम्राज्य का प्रारंभिक शासक माना जाता है और पेरुमल शासन की शुरुआत की सटीक तिथि तथा उसके संस्थापक की पहचान आज भी इतिहासकारों के बीच विवाद का विषय बनी हुई है। कुलशेखर के संबंध में पांड्य अभिलेखों में “चेरामनार” का उल्लेख मिलता है, और इसे कोल्ली, कुदल, कोझी तथा कोंगु क्षेत्रों से संबंधित शासक के रूप में भी परंपराओं में वर्णित किया गया है, साथ ही महोदयपुरम के स्वामी के रूप में भी इसकी प्रतिष्ठा का उल्लेख मिलता है।

श्रीवैष्णव परंपरा के अनुसार कुलशेखर के पिता दृढ़व्रत महाराज लंबे समय तक संतानहीन रहे और पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से उन्होंने भगवान अनंत-पद्मनाभ स्वामी की आराधना की, जिसके फलस्वरूप उन्हें पुत्र-रत्न प्राप्त हुआ। कुछ धार्मिक कथाओं में कुलशेखर को भगवान कृष्ण के कौस्तुभमणि से उत्पन्न दिव्य अंश बताया गया है, और उसका अवतरण कलियुग के आरंभ के सत्ताईसवें वर्ष अर्थात् लगभग 3075 ईसा पूर्व में होना बताया जाता है, किंतु यह तिथि पूर्णतः धार्मिक-परंपरागत मान्यता पर आधारित है और इसे प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐतिहासिक दृष्टि से कुलशेखर को लगभग आठवीं-नौवीं शताब्दी ईस्वी के वैष्णव भक्ति-परिवेश में रखना ही सबसे उचित माना जाता है। परंपरा के अनुसार बालक कुलशेखर ने युद्धकला के साथ-साथ शास्त्रों और अन्य विद्याओं का प्रशिक्षण प्राप्त किया, और आगे चलकर एक साहसी तथा कुशल योद्धा बना। समय आने पर उसके पिता ने राज्य की बागडोर उसे सौंपकर स्वयं शास्त्रीय परंपरा के अनुसार वानप्रस्थ ग्रहण कर लिया।

राजगद्दी संभालने के बाद कुलशेखर वर्मन एक शक्तिशाली और न्यायप्रिय शासक के रूप में स्थापित हुआ। परंपरा के अनुसार इसने चेर प्रदेश के अतिरिक्त पड़ोसी चोल और पांड्य क्षेत्रों में भी सैन्य अभियान चलाए और कोल्ली, कूडल तथा कोंगु जैसे क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित किया। कूडल की पहचान आज के मदुरै से और कोल्ली की पहचान उरैयूर क्षेत्र से की जाती है। इसके शासनकाल को शांतिपूर्ण, समृद्ध और सुव्यवस्थित बताया गया है, किंतु इन विजयों का विवरण मुख्यतः परंपरागत स्रोतों पर आधारित है, और स्वतंत्र समकालीन अभिलेखों से इनकी पूर्ण पुष्टि नहीं हुई है।

परंपरा के अनुसार कुलशेखर का मन राजपाट से अधिक भगवान विष्णु, विशेषकर श्रीराम और श्रीकृष्ण की भक्ति में रमता था। कुछ कथाओं में इस परिवर्तन को वैष्णव संतों के उपदेश का परिणाम बताया गया है, तो कुछ में इसे सीधे ईश्वर-कृपा से जोड़ा गया है। बाद में इसने राज्य अपने पुत्र को सौंपकर संन्यास ग्रहण कर लिया, और वैष्णव भक्ति के प्रचार को अपना जीवन-उद्देश्य बना लिया। “आलवार” शब्द का अर्थ है भगवान के गुणों और भक्ति में डूबा हुआ व्यक्ति। पोयगै, भूतत्त, पेय, तिरुमलिशै, तोंडरडिप्पोडि, मधुरकवि, पेरियालवार, आंडाल, कुलशेखर, नम्मालवार, तिरुप्पाण और तिरुमंगै इन बारह आलवार संतों ने लगभग पाँचवीं से नौवीं शताब्दी के बीच दक्षिण भारत में वैष्णव भक्ति के प्रसार में केंद्रीय भूमिका निभाई। इन संतों की तमिल भक्ति-कविताओं को बाद में लगभग चार हज़ार पदों वाले “नालायिर दिव्य प्रबंधम्” में संकलित किया गया और इसी परंपरा में 108 प्रमुख विष्णु-तीर्थों को “दिव्य देशम्” के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।

“पेरुमाल तिरुमोलि” कुलशेखर से जुड़ी प्रमुख तमिल रचना है, जो “नालायिर दिव्य प्रबंधम्” का हिस्सा है और जिसमें राम तथा कृष्ण के प्रति गहन भक्तिभाव व्यक्त हुआ है। यह रचना दक्षिण भारत में तमिल भाषा में विकसित हो रही भक्ति-चेतना और मंदिर-केंद्रित संस्कृति के अध्ययन के लिए भी महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। “मुकुंदमाला” नामक संस्कृत रचना भी परंपरागत रूप से कुलशेखर से संबद्ध है, जिसमें संसार-बंधन में जकड़ी आत्मा की स्थिति और भगवान विष्णु को मुक्ति के साधन के रूप में वर्णित किया गया है, यद्यपि इसके लेखकत्व को लेकर विद्वानों में मतभेद है—कुछ इसे कुलशेखर आलवार की ही रचना मानते हैं, तो कुछ इसे “कुलशेखर” नामधारी किसी अन्य राजकीय व्यक्ति से जोड़ते हैं, इसलिए इसे “परंपरागत रूप से संबद्ध” कहना ही अधिक उपयुक्त है। कुलशेखर को तपती-संवरणम्, सुभद्रा-धनंजयम् और विच्छिन्नाभिषेकम् जैसे संस्कृत नाटकों का रचयिता भी माना जाता है, तथा इसके नाम से “आश्चर्य-मंजरी” नामक गद्य रचना का भी उल्लेख मिलता है।

दक्षिण भारतीय इतिहास में “कुलशेखर” नाम अनेक राजाओं और धार्मिक व्यक्तियों से जुड़ा रहा है, इसलिए केवल नाम-साम्य के आधार पर सभी कुलशेखरों को एक व्यक्ति मान लेना उचित नहीं है। इस विषय पर मुख्यतः तीन मत प्रचलित हैं- कुछ विद्वान कुलशेखर आलवार को महोदयपुरम के चेर शासक कुलशेखर वर्मन से जोड़ते हुए इसे लगभग नौवीं शताब्दी में रखते हैं; एक अन्य प्रभावशाली मत के अनुसार चेर राजवंश का आरंभिक प्रामाणिक शासक स्थाणु रवि कुलशेखर ही कुलशेखर आलवार हो सकता है; जबकि तीसरे मत के अनुसार आलवार संत कुलशेखर और चेर राजा कुलशेखर दो अलग व्यक्ति थे और बाद की परंपरा ने दोनों को मिला दिया। एक प्रचलित दावा यह भी है कि कुलशेखर ने राजनीतिक शक्ति के बल पर केरल से बौद्ध धर्म को समाप्त कर दिया, किंतु उपलब्ध प्रमाणों से यह दावा सिद्ध नहीं होता है, क्योंकि केरल में इसके बाद भी बौद्ध और जैन परंपराओं की उपस्थिति के प्रमाण मिलते हैं, और ब्राह्मणीय मंदिर-संस्थाओं का प्रभाव समय के साथ धीरे-धीरे ही बढ़ा। इसी प्रकार केरल की विशिष्ट भाषाई-सांस्कृतिक पहचान को केवल एक शासक का परिणाम बताना भी सरलीकरण होगा, क्योंकि यह एक दीर्घकालिक सामाजिक, आर्थिक और भाषाई प्रक्रिया थी जिसमें कई शताब्दियाँ लगीं।

परंपरा के अनुसार अंतिम वर्षों में कुलशेखर वर्मन तिरुनेलवेली के निकट तिरुनगरी स्थित नम्मालवार के तीर्थस्थल गया,और फिर मन्नारकोविल पहुँचा, जहाँ उसने राजगोपाल स्वामी की सेवा-आराधना में समय बिताया। परंपरा के अनुसार इसी स्थान पर लगभग सड़सठ वर्ष की आयु में इसकी मृत्यु हुई, यद्यपि कुछ परंपराओं में इसके श्रीरंगम मंदिर में रहने का भी उल्लेख मिलता है। इसकी स्मृति में तिरुवंचिकुलम् के निकट त्रिशूर जिले में एक मंदिर आज भी मौजूद है। संक्षेप में, कुलशेखर आलवार दक्षिण भारत के प्रमुख वैष्णव संतों में से एक और महोदयपुरम के चेर राजवंश से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण राजा-संत व्यक्तित्व था, जिसकी “पेरुमाल तिरुमोलि” तथा परंपरागत रूप से जुड़ी “मुकुंदमाला” दक्षिण भारतीय वैष्णव साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं, किंतु इसके जन्म से जुड़ी चमत्कारिक कथाएँ धार्मिक हागियोग्राफी का हिस्सा हैं, प्रमाणित इतिहास नहीं है।

स्थाणु रवि कुलशेखर (लगभग 844/845–870/871 ई.)

सबसे पहला प्रामाणिक रूप से अभिलिखित चेर पेरुमल शासक स्थाणु रवि कुलशेखर है, जिसे स्थाणु रवि वर्मा के नाम से भी जाना जाता है। इसका अर्थ यह है कि इससे पहले के किसी चेर पेरुमल शासक के विषय में ठोस अभिलेखीय प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। स्थाणु रवि वर्मन को उत्तरवर्ती चेरा शासकों में सबसे महत्त्वपूर्ण शासक माना जाता है और इसके शासनकाल का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रमाण तरिसापल्ली ताम्रपत्र है, जो इसके शासन के पाँचवें वर्ष का है और सामान्यतः लगभग 849 ईस्वी से संबंधित माना जाता है। विद्वानों के अनुसार इसका राज्याभिषेक लगभग 844/845 ई. में हुआ और शासनकाल लगभग 870/871 ई. तक चला, यद्यपि कुछ इतिहासकार कोंगु युद्ध में इसकी संभावित भूमिका के आधार पर इसके शासनकाल को 885 ई. तक विस्तारित मानते हैं। इसके समय के अभिलेखों में इसके नाम के विभिन्न रूप मिलते हैं, विशेष रूप से “तणु रवि” अथवा “को तणु इरवि” जैसे नामरूप उल्लेखनीय हैं, और इसकी राजधानी महोदयपुरम थी।

स्थाणु रवि के शासनकाल में चेर और चोल राजवंशों के बीच मैत्रीपूर्ण एवं सहयोगात्मक संबंध स्थापित हुए, जिसका लाभ दोनों राज्यों के बीच व्यापार को भी मिला, और वैवाहिक संबंधों ने भी दोनों राज्यों के राजनीतिक संबंधों को मजबूत किया। अभिलेखीय प्रमाणों से संकेत मिलता है कि इसने कोंगु देश में चोल शासक के नेतृत्व में चलाए गए सैन्य अभियान में सहयोग किया था, जो चोलों तथा पांड्यों के बीच संघर्ष का महत्त्वपूर्ण क्षेत्र था। इस अभियान में चोल शासक की पहचान को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है- पहले मत के अनुसार अभिलेख में उल्लिखित “राजकेसरी वर्मा” की पहचान आदित्य प्रथम चोल (लगभग 871–907 ई.) से की जाती है, और इस मत के अनुसार स्थाणु रवि ने लगभग 885 ई. के आसपास आदित्य प्रथम को पांड्यों से कोंगु देश छीनने में सहायता दी, जिसके कारण एलमकुलम कुंजन पिल्लई जैसे इतिहासकार मानते हैं कि इसका शासन वास्तव में 885 ई. तक चला होगा; दूसरे मत के अनुसार एम.जी.एस. नारायणन जैसे विद्वान “राजकेसरी वर्मा” की पहचान श्रीकंठ चोल (लगभग 817–845 ई.) से करते हैं और संयुक्त अभियान को लगभग 844/845 ई. के आसपास मानते हैं। आधुनिक शोध में आदित्य प्रथम वाली व्याख्या को अपेक्षाकृत अधिक समर्थन मिला है। इस अभियान से यह स्पष्ट होता है कि स्थाणु रवि का शासन केवल केरल तक सीमित नहीं था, बल्कि तमिल क्षेत्र की समकालीन राजनीतिक शक्तियों से भी संबद्ध था।

स्थाणु रवि के शासनकाल का सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ तरिसापल्ली ताम्रपत्र (कोल्लम सीरियाई ताम्रपत्र) है, जो इसके शासनकाल के पाँचवें वर्ष अर्थात् लगभग 849 ई. का है। इसके माध्यम से इसके अधीनस्थ स्थानीय अधिकारी अय्यन अडिगल तिरुवडि ने कोल्लम (क्विलोन) के सीरियाई ईसाई समुदाय द्वारा निर्मित तरिसापल्ली (गिरजाघर) को भूमि, सेवक तथा विशेष व्यापारिक अधिकार प्रदान किए। ताम्रपत्र में ईसाई व्यापारी मार सपिर ईसो का उल्लेख मिलता है, जिनसे इस चर्च की स्थापना जुड़ी है और इसका रखरखाव स्थानीय वणिक संघों- अंजुवण्णम तथा मणिग्रामम को सौंपा गया। अभिलेख में “कोयिल अधिकारिकल विजयराग” की उपस्थिति का भी उल्लेख मिलता है, जिससे राजपरिवार और स्थानीय प्रशासन के बीच संबंधों की जानकारी मिलती है। यह अभिलेख केरल के आर्थिक इतिहास, विशेषकर पश्चिम एशिया से समुद्री व्यापार और धार्मिक बहुलता दोनों दृष्टियों से एक मील का पत्थर माना जाता है।

इरिंजालकुडा अभिलेख (855 ई.) में मंदिर समिति द्वारा भूमि से संबंधित निर्णय का उल्लेख मिलता है, जिससे पता चलता है कि मंदिरों से संबंधित भूमि और आर्थिक संसाधनों के प्रबंधन में स्थानीय परिषदों या समितियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। मंदिर केवल धार्मिक संस्थाएँ नहीं थे, बल्कि वे स्थानीय आर्थिक और सामाजिक जीवन के भी केंद्र थे। स्थाणु रवि के शासनकाल से संबंधित 861 ई. के तिरुवात्रुवाय अभिलेख का विशेष सांस्कृतिक महत्त्व है, क्योंकि इसमें मंदिर सभा द्वारा “अवणी ओणम” के आयोजन से संबंधित व्यवस्था का उल्लेख मिलता है, जो केरल में ओणम उत्सव के प्रारंभिक अभिलेखीय संदर्भों में से एक है और यह संकेत देता है कि नौवीं शताब्दी तक ओणम से जुड़ी उत्सवी परंपराएँ सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं के जीवन का हिस्सा बन चुकी थीं। लगभग 885 ई. का थिल्लैस्थानम् अभिलेख “चेरमान” के रूप में “तणु रवि” का उल्लेख करता है और चोल तथा चेर शासक के बीच राजनीतिक-सैन्य संबंधों पर प्रकाश डालता है। इस अभिलेख में विक्की अण्णन तथा उसकी पत्नी कदंब महादेवी का भी उल्लेख है। विक्की अण्णन को सैन्य सम्मान प्राप्त था और कदंब महादेवी द्वारा मंदिर में स्थायी दीप के लिए दान दिए जाने की जानकारी मिलती है, जिससे यह अभिलेख तत्कालीन राजकीय सम्मान, सामंती संबंधों और मंदिर-आधारित दान-व्यवस्था तीनों की जानकारी देता है। तिरुनंतिकरै अभिलेख में “कुलशेखर देव” और “विजयराग देव” का उल्लेख भी स्थाणु रवि को “कुलशेखर” नाम से जोड़ता है, जिसमें चेर राजकुमारी रवि नीली किझन अडिगल द्वारा मंदिर को दान दिए जाने की जानकारी प्राप्त होती है। अभिलेख के अनुसार वह कुलशेखर देव की पुत्री और विजयराग देव की पत्नी थी और इसने मंदिर में स्थायी दीप के लिए स्वर्ण दान दिया, जिससे यह अभिलेख चेर राजपरिवार की महिलाओं की धार्मिक दान-परंपरा में सक्रिय भागीदारी पर भी प्रकाश डालता है।

स्थाणु रवि का शासनकाल विज्ञान, विशेष रूप से खगोलशास्त्र के संरक्षण के लिए भी उल्लेखनीय है। इसके राजदरबार में प्रसिद्ध गणितज्ञ-खगोलशास्त्री शंकरनारायण (लगभग 840–900 ई.) कार्यरत था, जिसने भास्कर प्रथम के ग्रंथ “लघुभास्करीय” पर 869 ई. में “लघुभास्करीयविवरण” नामक विस्तृत टीका लिखी। यह ग्रंथ गणित और खगोलशास्त्र के इतिहास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसमें खगोलीय गणनाओं तथा राशिचक्र और यंत्रवलय जैसे विभिन्न खगोलीय उपकरणों से संबंधित सामग्री मिलती है। शंकरनारायण को महोदयपुरम में स्थापित एक वेधशाला के संचालन का श्रेय भी दिया जाता है, जहाँ आकाशीय पिंडों की स्थिति मापने के लिए आर्मिलरी स्फीयर का प्रयोग होता था और उपलब्ध विवरण के अनुसार प्रत्येक चौंतीस मिनट (एक कडिगै) पर नगर के विभिन्न केंद्रों पर घंटा बजाकर समय की घोषणा की जाती थी। “लघुभास्करीयव्याख्या” स्थाणु रवि के राज्यारोहण की तिथि निर्धारित करने में भी सहायक है, क्योंकि ग्रंथ में 866 ई. और 870 ई. से संबंधित खगोलीय तिथियों का उल्लेख मिलता है और इसके शासन के पच्चीसवें वर्ष का संबंध लगभग 869/870 ई. से है, जिससे इसका राज्यारोहण लगभग 844/845 ई. निर्धारित होता है। ग्रंथ में बृहस्पति और शनि की स्थिति से संबंधित एक खगोलीय घटना का भी उल्लेख है। नौवीं शताब्दी में इन दोनों ग्रहों के धनु राशि में एक साथ आने की घटना को लगभग 869 ई. से जोड़ा गया है, जिससे स्थाणु रवि के काल-निर्धारण को अतिरिक्त और स्वतंत्र आधार मिलता है।

अनेक इतिहासकारों और श्रीवैष्णव परंपराओं का मानना है कि स्थाणु रवि ही वह शासक था जिसे आगे चलकर वैष्णव संत कुलशेखर आलवार के रूप में पूजा गया। इस पहचान के पक्ष में सबसे महत्त्वपूर्ण प्रमाण शंकरनारायण की “लघुभास्करीयव्याख्या” से प्राप्त होता है, क्योंकि शंकरनारायण स्वयं महोदयपुरम के “रवि” नामक राजा का उल्लेख करता है, जिसने “कुलशेखर” की उपाधि धारण की थी। ग्रंथ के प्रारंभिक श्लोक में “स्थाणु” शब्द का प्रयोग इस काव्यात्मक ढंग से किया गया है कि उसका अर्थ भगवान शिव और तत्कालीन राजा दोनों पर लागू हो सके, जो उस समय की राजकीय और धार्मिक परंपराओं के परस्पर संबंध को भी दर्शाता है। फिर भी यह ध्यान रखना चाहिए कि यह पहचान मुख्यतः उपाधियों और शैली-साम्य पर आधारित एक अनुमान है, निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य नहीं। स्थाणु रवि कुलशेखर का शासनकाल व्यापार, कूटनीति, विज्ञान और धर्म इन चारों के संगम के रूप में देखा जाता है और इसके समय के अभिलेखों से चेर पेरुमल सत्ता, मंदिर प्रशासन, भूमि-दान, व्यापारिक संगठन, ईसाई समुदाय, राजपरिवार तथा चोल-चेर संबंधों के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है, इसीलिए इसे केरल के मध्यकालीन इतिहास के आरंभ का शासक माना जाता है।

राम राजशेखर (लगभग 870/871–883/884 ई.)

राजशेखर वर्मन को द्वितीय चेरा साम्राज्य का एक प्रमुख प्रारंभिक शासक माना जाता है। राम राजशेखर स्थाणु रवि कुलशेखर का उत्तराधिकारी था। इसका शासन भी महोदयपुरम से संचालित होता था और यह शैव धर्म का अनुयायी था। इसके शासनकाल की पुष्टि मुख्यतः दो अभिलेखों से होती है- वाझापल्ली ताम्रपत्र, जो केरल के सबसे प्राचीन प्रामाणिक अभिलेखों में गिना जाता है और जिसमें राजा राजशेखर वर्मन (चेरमान पेरुमल) का उल्लेख मिलता है तथा जिसके काल में वाझापल्ली मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य हुआ माना जाता है। कुरुमात्तूर शिलालेख, जिसमें राजा राजशेखर का स्पष्ट उल्लेख है और इसके श्लोकों के अनुसार चेर राजवंश स्वयं को भगवान श्रीराम के इक्ष्वाकु वंश से जोड़ता था।

कुछ विवरणों में राजशेखर वर्मन को कोल्लम संवत् (मलयालम संवत्) के प्रारंभ से जोड़ा जाता है, जिसका आरंभ 825 ई. से माना जाता है। इसके आरंभ से संबंधित कई अलग-अलग ऐतिहासिक व्याख्याएँ हैं- कुछ इसे कोल्लम नगर की स्थापना से, कुछ इसे किसी धार्मिक सभा से और कुछ इसे किसी राजनीतिक घटना से जोड़ती हैं। यह संवत् आगे चलकर केरल के इतिहास में तिथि-निर्धारण का प्रमुख आधार बना, इसलिए इसे किसी एक शासक की उपलब्धि मान लेना उचित नहीं है।

अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार राजा राम राजशेखर ही प्रसिद्ध शैव (नयनार) भक्त, कवि और संगीतकार चेरमान पेरुमल नायनार है, यद्यपि यह पहचान निर्विवाद नहीं है। चेरमान पेरुमल नयनार की कथा मुख्यतः तमिल शैव भक्ति साहित्य, विशेषकर पेरियापुराणम्, में मिलती है। परंपरा के अनुसार इसने शासनकाल के अंतिम दौर में राजगद्दी त्याग दी और शैव संत के रूप में जीवन बिताया तथा दक्षिण भारत में शैव भक्ति आंदोलन को बढ़ावा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। परंपरा के अनुसार इसका संबंध कोडुंगल्लूर और तिरुवंचिकुलम से था। वह दक्षिण भारत के अनेक तीर्थस्थलों की यात्रा पर गया, जहाँ प्रसिद्ध शैव संत सुंदरमूर्ति नयनार से इसकी भेंट हुई और दोनों के बीच घनिष्ठ मित्रता स्थापित हुई, जो भक्ति-साहित्य में विशेष रूप से वर्णित है। परंपरा में इसकी चिदंबरम्, तिरुवारूर और मदुरै आदि तीर्थों की यात्राओं का भी उल्लेख मिलता है। तीर्थयात्रा के पश्चात इसके कोडुंगल्लूर लौटने और तिरुवंचिकुलम मंदिर के पुनर्निर्माण से संबंधित परंपराएँ भी मिलती हैं। यह कथा आगे चलकर केरल की धार्मिक परंपराओं और चेरा राज्य से संबंधित अनेक किंवदंतियों का आधार बनी। इसका जीवन-वृत्तांत बारहवीं शताब्दी के हागियोग्राफिक ग्रंथ “पेरियपुराणम्” (चेक्किलार रचित) में मिलता है और इसकी प्रमुख रचनाएँ “पोन्वण्णत्तांदादि”, “तिरुवारूर मुम्मणिक्कोवै” तथा “आदियुला” मानी जाती हैं। “उला” विधा की यह अंतिम रचना तमिल साहित्य में इस शैली की प्रारंभिक कृतियों में एक है। इस प्रकार इस राजवंश के आरंभिक दो शासक परवर्ती भक्ति-परंपरा में क्रमशः वैष्णव और शैव संतों से संबंधित थे- स्थाणु रवि को कुलशेखर आलवार से, और राम राजशेखर को चेरमान पेरुमल नायनार से, जो उस काल में शैव और वैष्णव दोनों परंपराओं को मिल रहे राजकीय संरक्षण का प्रमाण है।

राजा राम राजशेखर के शासनकाल में कवियों और विद्वानों को व्यापक संरक्षण मिला। यह स्वयं कवि था और इसके काल में “त्रिपुरदहन” के रचयिता कवि वसुभट्ट को राजाश्रय प्राप्त था। विद्यारण्य कृत “शंकरविजय” में केरल के एक राजा “राजशेखर” का उल्लेख आदि शंकराचार्य के समकालीन के रूप में मिलता है। इसी प्रकार शंकराचार्य से संबद्ध “शिवानंदलहरी” में भी केरल-नरेश राजशेखर का परोक्ष संदर्भ आता है, किंतु शंकराचार्य के काल-निर्धारण को लेकर स्वयं विद्वानों में मतभेद है।

विजयराग (लगभग 883/884–895 ई.)

पहले विजयराग को राजा “गोद रवि” (905–943 ई.) मान लिया गया था, किंतु आधुनिक खोजों और शोध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विजयराग एक स्वतंत्र और अलग शासक था, जिसका कार्यकाल नौवीं शताब्दी के अंत में था। इसने भी महोदयपुरम को अपनी राजधानी बनाकर शासन किया, और यह पूर्ववर्ती चेर राजा स्थाणु रवि कुलशेखर के शासनकाल में ही एक शाही राजकुमार के रूप में सक्रिय था। तरिसापल्ली ताम्रपत्र (849 ई.) में “कोयिल अधिकारिकल विजयराग” के रूप में इसका उल्लेख इसका प्रमाण है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार इसका विवाह स्थाणु रवि की पुत्री रवि नीली उर्फ किझन अडिगल से हुआ था और कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि यह राजा का भांजा भी था, जो केरल में मरुमक्कत्तायम (मातृवंशीय) उत्तराधिकार परंपरा का एक प्रारंभिक संकेत माना जा सकता है।

विजयराग की पुत्री का विवाह प्रसिद्ध चोल राजा परांतक प्रथम से हुआ था, जिस वैवाहिक संबंध ने चेर और चोल राजवंशों के बीच राजनयिक तथा राजनीतिक रिश्तों को मज़बूत किया। इसकी पत्नी और पुत्री का उल्लेख करने वाले तिरुवोत्तियूर शिलालेख (936 ई.) जैसे कई प्राचीन अभिलेख इस कालक्रम और संबंधों की प्रामाणिकता की पुष्टि करते हैं। इसके शासनकाल के दौरान मध्यकालीन चेर राज्य का प्रभाव पड़ोसी क्षेत्रों- दक्षिण में आय देश और उत्तर में एझिमला (मूषिक) देश तक फैल गया था, जिससे चेर सत्ता के क्रमिक विस्तार का संकेत मिलता है।

पूर्व में गोद रवि की पहचान विजयराग के साथ की जाती थी, जिसके पीछे दो आधार थे- एक तो यह धारणा कि विजयराग का व्यक्तिगत नाम “रवि” था, क्योंकि इसकी पुत्री का नाम “रवि नीली” था। दूसरे, क्विलोन सीरियाई ताम्रपत्रों की पूर्व-स्वीकृत तिथि, जिसके आधार पर दोनों शासनकालों को जोड़ने का प्रयास किया गया था। बाद में यह पहचान अस्वीकार कर दी गई और मनु वी. देवदेवन ने 2020 ई. में प्रकाशित अपने अध्ययन में गोद रवि के राज्यारोहण की पूर्व-स्वीकृत तिथि को स्वीकार न करते हुए विजयराग तथा गोद रवि को अलग-अलग शासक माना है।

गोद गोद/कोता कोता (लगभग 895–905 ई.)

गोद गोद को इतिहास में “कोता कोता” तथा “केरल केसरी” के नाम से भी जाना जाता है- “केरल का सिंह” के अर्थ वाली यह उपाधि इसके पराक्रम और सैन्य नेतृत्व का सूचक है। महोदयपुरम के इस चेर शासक का शासनकाल लगभग 895 ई. से 905 ई. तक माना जाता है। इसके काल में कला, संस्कृति और व्यापार को प्रोत्साहन मिला, तथा पड़ोसी राज्यों, विशेषकर चोल राजवंश के साथ चेर संबंध अपेक्षाकृत स्थिर रहे, जिसके पश्चात गोद रवि सिंहासन पर बैठा। इस कालखंड के व्यापक भारतीय संदर्भ में देखें तो उस समय बंगाल में पाल वंश का शासन था, जिसका क्षेत्र इतिहास में “गौड़” देश भी कहलाता था; उत्तर भारत में गुर्जर-प्रतिहार राजा महेंद्रपाल प्रथम (885–910 ई.) सत्तारूढ़ था। दक्कन में राष्ट्रकूट शक्ति अपने चरम पर थी और तमिल क्षेत्र में चोल वंश का पुनरुत्थान आदित्य प्रथम तथा परांतक प्रथम के नेतृत्व में तेज़ी से हो रहा था।

गोद रवि/गोद रवि वर्मन (लगभग 905/906–943/944 ई.)

गोद रवि महोदयपुरम के चेर पेरुमल शासकों में एक महत्त्वपूर्ण नाम है। इसका शासन दसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध से संबंधित है और यह चेर काल के सबसे लंबे शासनकालों में से एक है। गोद रवि के नाम वाले मंदिर अभिलेख मध्य तथा उत्तर-मध्य केरल से बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं, जिनमें चेर राजपरिवार के सदस्यों, स्थानीय प्रमुखों, भूमि-अनुदानों और मंदिर संस्थाओं से संबंधित विस्तृत विवरण मिलते हैं। इसके शासन के पंद्रहवें वर्ष का चोक्कुर शिलालेख भी इसी श्रेणी में आता है। इन अभिलेखों में “कोयिल” या “आल-कोयिल” उपाधि धारण करने वाले राजकुमारों तथा “चेरामन महादेवी” और “रवि पिराट्टि” नाम से उल्लिखित रानियों अथवा राजकुमारियों का उल्लेख मिलता है, साथ ही वेम्बनाडु (वर्तमान अलप्पुझा क्षेत्र) और वल्लुवनाडु के स्थानीय प्रमुखों का भी उल्लेख है, जहाँ वल्लुवनाडु के प्रमुख “रायिरा रावर” की उपाधि धारण करते थे। अभिलेखों में प्रसिद्ध मुज़हिकुलम समझौते (मुज़हिक्कुलम कच्चम) का भी उल्लेख मिलता है, जो मंदिर प्रशासन और ब्राह्मण बस्तियों के आचार-नियमों से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण व्यवस्था थी।

गोद रवि के शासनकाल और राज्यारोहण की तिथि निर्धारित करने में वडक्कनचेरी के नेडुम्पुरम थाळि मंदिर से प्राप्त भूमि-दान अभिलेख सबसे महत्त्वपूर्ण है, जो चेर पेरुमल काल के उन दुर्लभ अभिलेखों में से एक है, जिसमें शासक का शासन-वर्ष तथा कलि संवत् दोनों का एक साथ उल्लेख किया गया है। अभिलेख के आरंभ में गोद रवि का सत्रहवाँ शासन-वर्ष दिया गया है और साथ ही बताया गया है कि उस समय बृहस्पति मिथुन राशि में स्थित था, जबकि अभिलेख के अंत में कलि वर्ष 4030 का उल्लेख मिलता है। इन दोनों तिथियों को एक ही घटना की तिथि मानना ग़लत है। संभवतः मंदिर समिति ने गोद रवि के सत्रहवें शासन-वर्ष में भूमि-दान पर विचार कर उसे स्वीकृति प्रदान की थी, जब बृहस्पति मिथुन राशि में था, जबकि वर्तमान में उपलब्ध अभिलेख बाद में उत्कीर्ण कराया गया था और उसका संबंध कलि वर्ष 4030 से है। इसी अभिलेखीय साक्ष्य के आधार पर गोद रवि का राज्यारोहण लगभग 905–906 ई. के आसपास और इसके शासन का अंत लगभग 943–944 ई. माना जाता है।

गोद रवि के शासनकाल में चेरों और चोलों के संबंध और अधिक मज़बूत हुए और इसका चोल सम्राट परांतक प्रथम के साथ घनिष्ठ गठबंधन था। इस समय केरल के अनेक सैनिकों ने तमिल क्षेत्र में चोल राजकुमार राजादित्य के अधीन सैन्य सेवा की और उसके अभियानों में भाग लिया, जो चेर-चोल सैन्य सहयोग की सबसे स्पष्ट मिसालों में से एक है। लगभग 920 ई. के आसपास पदच्युत पांड्य शासक राजसिंह द्वितीय ने चेरों के यहाँ शरण ली थी, जो उस समय दक्षिण भारत की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों तथा चेर-पांड्य संबंधों को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना है। इससे पता चलता है कि चोलों से मैत्री के बावजूद चेर शासक की विदेश नीति एकतरफ़ा नहीं थी। गोद रवि की पहचान पांड्य शासक जटावर्मन कुलशेखर देव प्रथम के बहनोई के रूप में करने का प्रारंभिक मत भी पुनर्विचार का विषय है और दोनों को एक ही व्यक्ति मानना उचित नहीं है।

इंदु कोता वर्मन/इंदेश्वरन गोद (लगभग 943–962 ई.)

इंदु कोता वर्मन, जिसे इंदेश्वरन गोद या इंदु गोद भी कहा जाता है, गोद रवि के उत्तराधिकारी के रूप में चेर सिंहासन पर बैठा और इसके बाद भास्कर रवि मनुकुलादित्य अगला शासक बना। इसके शासनकाल की पुष्टि केरल के त्रिक्काकारा और तिरुवंदूर से प्राप्त शिलालेखों से होती है और त्रिक्काकारा का प्रसिद्ध शिलालेख (953 ई.) इसके काल-निर्धारण का सबसे स्पष्ट आधार है। एम.जी.एस. नारायणन के “इंडेक्स टू चेर इंस्क्रिप्शन्स” के अनुसार इसके समय के कई शिलालेख मध्य और उत्तर-मध्य केरल से प्राप्त हुए हैं, जो प्राचीन मलयालम में वट्टेलुत्तु लिपि में लिखे गए हैं और इनमें मुख्य रूप से मंदिरों के प्रबंधन, भूमि-अनुदान और मंदिर समितियों द्वारा पारित प्रस्तावों का विवरण मिलता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस काल तक मंदिर-आधारित स्थानीय प्रशासन एक सुव्यवस्थित रूप ले चुका था।

इंदु कोता के शासनकाल में चेर-चोल संबंधों में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ आया, जब चोल सम्राट परांतक प्रथम ने कोंगुनाडु क्षेत्र पर आक्रमण कर उसे अपने साम्राज्य में मिला लिया। इस क्षेत्र पर चेर राजवंश के ही संबंधी “कोंगु चेर” शासन करते थे। चोलों के इस बढ़ते प्रभाव का मुक़ाबला करने के लिए इंदु कोता ने रणनीति बदली और पांड्य राजवंश के साथ हाथ मिलाया तथा चोलों के विरुद्ध युद्ध में पांड्यों की सहायता के लिए चेर सेना भेजी। यह एक निर्णायक बदलाव था, क्योंकि इससे पहले तक चेर-चोल संबंध मुख्यतः मैत्रीपूर्ण और वैवाहिक थे। इस काल से चेर और चोल धीरे-धीरे प्रतिद्वंद्वी बनने लगे और यही प्रतिद्वंद्विता आगे चलकर ग्यारहवीं शताब्दी के भीषण “सौ वर्षीय युद्ध” में बदल गई, जिसने अंततः चेर सत्ता को कमज़ोर कर दिया।

भास्कर रवि वर्मन प्रथम/मनुकुलादित्य (लगभग 962–1019/1021 ई.)

भास्कर रवि मनुकुलादित्य, जिसे मुख्य रूप से भास्कर रवि वर्मन प्रथम के नाम से जाना जाता है, चेर पेरुमल वंश का सबसे प्रतापी और संभवतः सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला सम्राट था। इसका शासनकाल लगभग 962 ई. से 1019/1021 ई. तक यानी लगभग छह दशकों तक फैला हुआ माना जाता है और इसकी राजधानी महोदयपुरम थी। इसके शासनकाल का सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक दस्तावेज़ कोच्चि के यहूदी ताम्रपत्र हैं, जिन्हें सामान्यतः लगभग 1000 ई. के आसपास का माना जाता है। इस शाही फ़रमान के तहत इसने कोडुंगल्लूर के यहूदी नेता जोसेफ रब्बान को विशेष व्यापारिक अधिकार, जागीर, कर-छूट और अनेक सामाजिक-शाही विशेषाधिकार प्रदान किए। यह ताम्रपत्र भारत में यहूदी समुदाय के प्राचीन इतिहास का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है और साथ ही यह केरल की धार्मिक सहिष्णुता तथा व्यापार-केंद्रित उदार नीति का भी बड़ा उदाहरण है। तरिसापल्ली ताम्रपत्र (849 ई.) में ईसाई समुदाय को,और यहूदी ताम्रपत्र (लगभग 1000 ई.) में यहूदी समुदाय को अधिकार दिए गए- यानी डेढ़ सौ वर्षों में चेर शासकों ने लगातार विदेशी व्यापारिक समुदायों को संरक्षण देने की नीति बनाए रखी, जिसका मूल कारण आर्थिक था, क्योंकि ये समुदाय हिंद महासागर व्यापार की रीढ़ थे।

इसके काल के कई महत्त्वपूर्ण शिलालेख वट्टेलुत्तु लिपि में प्राप्त हुए हैं, जिनमें तिरुनेल्ली (वायनाड), त्रिक्कोडीथानम और कासरगोड के कोडवलम वामन मंदिर के अभिलेख प्रमुख हैं। ये अभिलेख उस समय की प्रशासनिक व्यवस्था, भूमि-संबंधों, मंदिर-प्रबंधन और सामाजिक स्थिति पर प्रकाश डालते हैं और इनका भौगोलिक फैलाव उत्तर में कासरगोड से लेकर मध्य केरल तक था।

पेरुमल काल के उत्तरार्ध में चेर और चोल शक्तियों के बीच लंबे समय तक संघर्ष हुआ, जिसका केरल के राजनीतिक इतिहास पर व्यापक प्रभाव पड़ा। इतिहासकार एलामकुलम और कुछ अन्य विद्वानों ने इस लंबे संघर्ष को कभी-कभी “नूट्रांडु युद्धम्” अर्थात् सौ वर्षीय युद्ध कहा है, जिसे दक्षिण भारतीय राजनीति में प्रभुत्व के लिए चलने वाली दीर्घकालीन प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में समझा जा सकता है। प्रारंभिक चरण में दोनों शक्तियों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध और वैवाहिक गठबंधन दिखाई देते हैं, किंतु बाद में व्यापारिक मार्गों, बंदरगाहों, उपजाऊ क्षेत्रों और दक्षिण भारत में राजनीतिक प्रभुत्व को लेकर हितों के टकराव ने दोनों राज्यों को संघर्ष की ओर धकेल दिया। इसके शासनकाल के उत्तरार्ध में चोल सम्राट राजराज चोल प्रथम और उसके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम के साथ चेर राज्य का लंबा और विनाशकारी संघर्ष छिड़ गया, जिसे इतिहास में “चेर-चोल युद्ध” या “सौ वर्षीय युद्ध” कहा जाता है। चोल सेनाओं ने चेर राजधानी महोदयपुरम और चेर नौसैनिक बेड़े पर आक्रमण किया और राजराज प्रथम के शासनकाल में केरल का चेर राज्य चोलों के अधीन आ गया, यद्यपि चोलों का पूर्ण और सुदृढ़ नियंत्रण राजेंद्र प्रथम के काल में ही स्थापित हो सका।

इस संघर्ष ने चेरा साम्राज्य की राजनीतिक शक्ति को कमजोर किया और अंततः पेरुमल राज्य के विघटन के साथ केरल में वेणाड, कोलत्तुनाड, कोझिकोड और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के उभार का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस प्रकार पेरुमल युग के अंत को केरल के इतिहास में एक केंद्रीकृत चेरा सत्ता से क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियों की ओर संक्रमण के रूप में देखा जा सकता है। इस संघर्ष के बावजूद इस काल में केरल के बंदरगाहों से विदेशी व्यापार बढ़ता रहा और अरब व्यापारियों तथा पश्चिम एशिया के व्यापारिक समुदायों के साथ सघन संपर्क के प्रमाण मिलते हैं। तरिसापल्ली और यहूदी ताम्रपत्र जैसे अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि चेर पेरुमल काल में केरल अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार का एक अनिवार्य केंद्र था।

भास्कर रवि वर्मन द्वितीय और वीर केरल (लगभग 1019–1021 ई.)

भास्कर रवि वर्मन प्रथम के बाद भास्कर रवि वर्मन द्वितीय का अल्पकालीन शासन माना जाता है, जो लगभग 1021 ई. तक चला। इसी संक्रमण काल में “वीर केरल” नामक शासक का भी उल्लेख मिलता है। इन दोनों शासकों के विषय में अभिलेखीय सामग्री अत्यंत सीमित है और इनके क्रम तथा शासनकाल को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वान इन्हें स्वतंत्र शासक मानते हैं, तो कुछ इन्हें अन्य शासकों का ही दूसरा नाम मानते हैं। यह अवधि चोल आक्रमणों के दबाव और आंतरिक अस्थिरता की अवधि थी, जिसके कारण अभिलेखों की संख्या भी अपेक्षाकृत कम है।

रवि गोद/राजसिंह (लगभग 1021–1036 ई.)

रवि गोद, जिसे रवि गोदा भी कहा जाता है, प्रसिद्ध चोल सम्राट राजेंद्र चोल प्रथम (1012–1044 ई.) का समकालीन था। केरल के पलक्कड़ जिले में स्थित तिरुमित्ताकोड मंदिर के मुख्य द्वार पर मिले एक अभिलेख (लगभग 1028 ई.) में राजा रवि गोद के शासनकाल के आठवें वर्ष का उल्लेख मिलता है और यह अभिलेख वट्टेलुत्तु तथा ग्रंथ दोनों लिपियों में है। इस शिलालेख का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें एक चोल अधिकारी द्वारा मंदिर को स्वर्ण दान दिए जाने का विवरण दर्ज है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस समय तक केरल क्षेत्र पर चोल शासक राजेंद्र प्रथम का प्रभाव या नियंत्रण स्थापित हो चुका था- यानी चेर पेरुमल अब पूर्णतः स्वतंत्र संप्रभु नहीं रह गया था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार रवि गोद को ही कुछ अभिलेखों में “राजसिंह” के नाम से भी संबोधित किया गया है और इस “राजसिंह” को चोल सम्राट राजेंद्र तथा पांड्य शासक जटावर्मन सुंदर चोल-पांड्य का समकालीन बताया जाता है, यद्यपि यह पहचान विवादास्पद है।

राजराज (लगभग 1036–1089 ई.)

चेर पेरुमल राजवंश में “राजराज” एक महत्त्वपूर्ण मध्यकालीन शासक था, जिसका शासनकाल लगभग 1036 ई. से 1089 ई. तक यानी पाँच दशकों से भी अधिक था। केरल के ऐतिहासिक स्रोतों में इसे “चेर राजा” और तमिल क्षेत्रों के संदर्भों में “अधिगामान” जैसी उपाधियों से भी संबोधित किया गया है और इसके नियंत्रण अथवा प्रभाव वाला क्षेत्र वर्तमान केरल के साथ-साथ तमिलनाडु के तिरुनेलवेली, कोयंबटूर और सलेम जैसे कुछ हिस्सों तक फैला हुआ था। राजराज का काल चोल और चेर राजाओं के बीच चले लंबे संघर्ष का हिस्सा था। चोल अभिलेखों के अनुसार यह समकालीन चोल वायसरॉय, जैसे जटावर्मन सुंदर चोल-पांड्य का समकालीन था और कुछ क्षेत्रों में चोलों के सामंत के रूप में भी जुड़ा रहा, जो चेर सत्ता की बदली हुई प्रतिष्ठा का सूचक है। अब यह स्वतंत्र संप्रभु नहीं, बल्कि आंशिक रूप से चोलों की अधीनता स्वीकार करने वाला शासक था।

कोझिकोड के पास से मिला राजा राजराज का प्रसिद्ध तिरुवन्नूर शिलालेख, जो इसके शासन के चौथे वर्ष का है, से पता चलता है कि यह जैन धार्मिक संस्थाओं का संरक्षक था। इस शिलालेख में जैन मंदिरों और धार्मिक गतिविधियों को दिए गए संरक्षण का उल्लेख है, जिससे पता चलता है कि ग्यारहवीं शताब्दी तक केरल में जैन परंपरा जीवित थी और उसे राजकीय संरक्षण भी मिल रहा था। इससे उस प्रचलित धारणा को भी चुनौती मिलती है कि प्रारंभिक चेर काल में ही केरल से जैन-बौद्ध परंपराएँ पूरी तरह समाप्त हो गई थीं। इसके शासनकाल के दौरान मन्नारकोविल और उसके आसपास के क्षेत्रों में कई महत्त्वपूर्ण मंदिरों का निर्माण और विस्तार किया गया, जो उस काल में मंदिर-स्थापत्य की सक्रियता का संकेत देता है। 1089 ई. चेर राजवंश के लिए एक निर्णायक समय था, क्योंकि इसी वर्ष राजराज का शासन समाप्त हुआ, और इस वंश के अंतिम ज्ञात शासक का राज्याभिषेक हुआ।

राम कुलशेखर (लगभग 1089/1090–1122/1124 ई.) : अंतिम पेरुमल

राम कुलशेखर, जिसे राम वर्मा कुलशेखर भी कहा जाता है, महोदयपुरम के चेर पेरुमल राजवंश का अंतिम ज्ञात शासक था। इसका पूरा नाम “राजा श्री राम वर्मा कुलशेखर पेरुमल” (रामर तिरुवडि) बताया जाता है और यह इस वंश के उन दो शासकों में से दूसरा है जिसने स्पष्ट रूप से “कुलशेखर” उपाधि धारण की। पहला था स्थाणु रवि कुलशेखर। इस प्रकार यह वंश जिस उपाधि से आरंभ हुआ माना जाता है और उसी उपाधि पर समाप्त भी हुआ।

रामवर्मा को साहित्य का संरक्षक माना जाता है और इसके समय में अरब यात्री मसूदी के केरल आने का उल्लेख मिलता है। यह शक्तिशाली चोल सम्राटों कुलोत्तुंग प्रथम (1070–1120 ई.) और विक्रम चोल (1118–1135 ई.) का समकालीन था। इसके शासनकाल का एक महत्त्वपूर्ण प्रमाण 1099 ई. का पेरुण्णा मंदिर अभिलेख है, जो इस वंश के अंतिम चरण को समझने में सहायक है, और इसके शासन की तिथियों की पुष्टि करता है।

राम कुलशेखर का पूरा शासनकाल गंभीर राजनीतिक संकट और अस्थिरता से भरा रहा। चोल सम्राट कुलोत्तुंग प्रथम के साथ इसके लंबे और विनाशकारी युद्ध हुए और चोल आक्रमणों के कारण चेर सत्ता लगातार कमज़ोर होती गई। इन्हीं आक्रमणों के कारण चेर राज्य की मूल राजधानी महोदयपुरम (कोडुंगल्लूर) बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई, जिसके कारण राम कुलशेखर को अपनी राजधानी दक्षिण में कोल्लम (क्विलोन) स्थानांतरित करनी पड़ी। राम कुलशेखर ने चोल नियंत्रण से कोल्लम-त्रिवेंद्रम-नागरकोइल क्षेत्र को थोड़े समय के लिए लगभग 1100–1102 ई. में फिर से मुक्त करा लिया, जो इसकी सैन्य क्षमता का प्रमाण है, किंतु यह सफलता स्थायी नहीं रह सकी।

बाहरी आक्रमणों के साथ-साथ आंतरिक कारण भी चेर सत्ता के पतन में निर्णायक रहे। स्थानीय ब्राह्मण समुदायों और शक्तिशाली सामंतों के साथ बढ़ते मतभेद, भूमि-संबंधों में हो रहा क्रमिक परिवर्तन, तथा राजकीय राजस्व-व्यवस्था का कमज़ोर पड़ना, इन सबने मिलकर केंद्रीय सत्ता को खोखला कर दिया। अंततः राम कुलशेखर अपने राज्य को बिखरने से नहीं बचा सका और इसके बाद महोदयपुरम केंद्रित केंद्रीय चेर पेरुमल सत्ता का अंत हो गया तथा यह क्षेत्र वेणाडु, कोलत्तुनाडु जैसे कई छोटे स्वतंत्र राज्यों में विभाजित हो गया। कोल्लम में जो सत्ता बची, वही आगे चलकर वेणाडु चेर राजवंश की नींव बनी और उसी से आगे त्रावणकोर राज्य के उदय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तैयार हुई। इस प्रकार महोदयपुरम के चेर पेरुमलों का पतन केरल के इतिहास में केवल एक वंश का अंत नहीं था, बल्कि क्षेत्रीय राज्यों के उदय की एक नई प्रक्रिया का आरंभ था।

राज्य की प्रकृति : केंद्रीकृत साम्राज्य या ढीला परिसंघ

चेर पेरुमल राज्य वास्तव में किस स्वरूप का था- यह प्रश्न केरल के इतिहासकारों के बीच दशकों तक बहस का विषय रहा है और इस पर मुख्यतः तीन दृष्टिकोण सामने आए हैं। केरल के परंपरागत इतिहास-लेखन में पुरानी मान्यता यह थी कि मध्यकालीन चेर राज्य एक अत्यंत केंद्रीकृत साम्राज्यिक राजतंत्र था, जिसे “एकल अथवा साम्राज्यिक राज्य मॉडल” पर आधारित माना जाता था और इसी सोच के चलते इसे “द्वितीय अथवा परवर्ती चेर साम्राज्य” अथवा “कुलशेखर साम्राज्य” जैसे नाम दिए गए। इस दृष्टिकोण के समर्थक तर्क देते हैं कि पेरुमल के पास एक विस्तृत क्षेत्र पर नियंत्रण, एक संगठित सेना, नियमित कर-व्यवस्था, विशाल अंतरराष्ट्रीय व्यापार और व्यापक सांस्कृतिक संरक्षण, जो सामान्यतः साम्राज्यों से जुड़ी होती हैं।

1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक के आरंभ में हुए विश्लेषणात्मक शोध ने इस पुरानी धारणा को महत्त्वपूर्ण रूप से संशोधित किया। एम.जी.एस. नारायणन (1972 ई.) सहित कई विद्वानों का तर्क है कि प्रारंभिक केरल इतिहासकारों ने तमिल क्षेत्र के शक्तिशाली चोल साम्राज्य की तुलना में केरल को गौरवान्वित दिखाने के उद्देश्य से एक काल्पनिक “द्वितीय चेर साम्राज्य” गढ़ा था। इन विद्वानों ने साम्राज्य के सिद्धांत को खारिज करते हुए यह प्रस्तावित किया कि केरल में वास्तव में एक सामान्य मध्यकालीन राजतंत्र विद्यमान था, न कि कोई विशाल साम्राज्य। इसी शोध में यह भी पाया गया कि सभी चेर शासकों ने “कुलशेखर” राजतिलक-नाम धारण नहीं किया था, केवल स्थाणु रवि कुलशेखर और राम कुलशेखर ने ही यह उपाधि स्पष्ट रूप से धारण की, इसलिए इस वंश को “कुलशेखर वंश” कहना भी पूरी तरह सही नहीं है।

2000 के दशक के आरंभ में नारायणन (2002 ई.) ने एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार महोदयपुरम का चेर राजा केवल “धार्मिक-कर्मकांडीय संप्रभुता” (रिचुअल सॉवरनिटी) रखता था, जबकि वास्तविक राजनीतिक सत्ता एक प्रभावशाली ब्राह्मण अल्पतंत्र (ऑलिगार्की) तथा स्थानीय सरदारों के हाथों में बँटी हुई थी। इस दृष्टिकोण के अनुसार यह राज्य वास्तव में स्थानीय सरदारों के एक ढीले संघ जैसा था, जो पेरुमल के नाममात्र नेतृत्व में संगठित था। इतिहासकार डोनाल्ड आर. डेविस जूनियर ने भी इसी विचार का समर्थन किया और बताया कि चेर राज्य किसी भी दृष्टि से एक सुदृढ़ और निरंकुश राजतंत्र नहीं था, बल्कि पेरुमल के प्रतीकात्मक नेतृत्व में सामंतों और शक्तिशाली ब्राह्मण समुदायों का एक ढीला परिसंघ था। इस मत के अनुसार चेर शासक की वास्तविक संप्रभु सत्ता मुख्यतः राजधानी महोदयपुरम-कोडुंगल्लूर तक सीमित थी, जबकि केरल के दूरस्थ उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्रों में “उदयवर” कहे जाने वाले स्थानीय सरदारों के पास वास्तविक राजनीतिक और सैन्य शक्ति केंद्रित थी और साथ ही केरल भर में फैले नंबूदिरी ब्राह्मणों का सामाजिक तथा धार्मिक विषयों में गहरा प्रभाव था।

चेर पेरुमल राज्य न तो पूर्णतः केंद्रीकृत साम्राज्य था और न ही केवल एक नाममात्र का प्रतीकात्मक पद। वास्तविकता इन दोनों छोरों के बीच कहीं थी- राजधानी और उसके आसपास के क्षेत्र पर पेरुमल का प्रत्यक्ष नियंत्रण था, दूरस्थ क्षेत्रों में स्थानीय सरदारों के माध्यम से अप्रत्यक्ष नियंत्रण था और पूरे क्षेत्र में पेरुमल की धार्मिक-प्रतीकात्मक प्रतिष्ठा मान्य थी। इसीलिए चेर-पश्चात काल को अचानक आया “राजनीतिक विकेंद्रीकरण का काल” मानना और चेर काल को “अत्यधिक केंद्रीकृत” मान लेना दोनों ही भ्रामक हो सकते हैं।

भौगोलिक विस्तार

प्रारंभ में इस राजवंश का प्रभाव-क्षेत्र मध्य केरल के कोल्लम (क्विलोन) और कोइलांडी के बीच के क्षेत्र तक ही सीमित था। कालांतर में इसका विस्तार उत्तर में चंद्रगिरि नदी (वर्तमान कासरगोड क्षेत्र) से लेकर दक्षिण में नागरकोइल तक हो गया। चेर पेरुमल का प्रत्यक्ष अधिकार पालक्काड दर्रे से लेकर वेम्बनाड झील तक के क्षेत्र पर था, जिसमें पेरियार घाटी में स्थित महोदयपुरम-कोडुंगल्लूर बंदरगाह भी शामिल था, जबकि इसके बाहर के क्षेत्रों में इसका प्रभाव स्थानीय सरदारों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से काम करता था। उत्तरी केरल का कोलत्तुनाडु ग्यारहवीं शताब्दी में ही चेर पेरुमल के प्रभाव में आया, जबकि दक्षिणी केरल का वेणाडु संभवतः नौवीं शताब्दी के आरंभ में ही इसके प्रभाव-क्षेत्र में विकसित हो गया था।

प्रशासनिक व्यवस्था

केरल के मध्यकालीन चेर राज्य की प्रशासनिक संरचना में कई विशिष्ट संस्थाएँ शामिल थीं। “कोयिल अधिकारिकल” अथवा “अल/आल कोयिल” एक चेर राजकुमार होता था, जिसे किसी विशेष सामंती क्षेत्र में नियुक्त किया जाता था और जिसका मुख्य कार्य महोदयपुरम स्थित चेर पेरुमल की ओर से अत्तैक्कोल और अरंताई जैसे नियमित कर वसूल करना था। इस पद पर राजपरिवार के सदस्य ही नियुक्त होते थे, जिससे केंद्र और क्षेत्र के बीच संबंध बना रहता था। होदयपुरम-कोडुंगल्लूर के आसपास स्थित चार प्रमुख नंबूदिरी ब्राह्मण मंदिरों के प्रबंधकों को सामूहिक रूप से “नालु थालि” (चार थालि) कहा जाता था। संभवतः ये चेर पेरुमल की स्थायी मंत्रिपरिषद् के रूप में कार्य करते थे। इनमें नेडिय-थालि, जो चेरमान पेरुमल नायनार से संबद्ध तिरुवंचिक्कुलम शिव मंदिर की परंपरा से जुड़ी थी; मेल-थालि, जिसे परंपरा के अनुसार कुलशेखर आलवार द्वारा स्थापित त्रिक्कुलशेखरपुरम मंदिर से संबद्ध माना जाता है; किल-थालि मंदिर तथा चिंगपुरम अथवा श्रृंगपुरम थालि सम्मिलित थे। इस व्यवस्था से संकेत मिलता है कि चेर राज्य में धार्मिक संस्थाएँ राजनीतिक सत्ता और प्रशासनिक व्यवस्था से गहराई से जुड़ी हुई थीं।

चेर राज्य की संरचना में कई स्थानीय सामंती क्षेत्र शामिल थे, जिन्हें “नाडु” कहा जाता था। मध्यकालीन केरल के अभिलेखों के विश्लेषण से विद्वानों ने उत्तर से दक्षिण की ओर कोल्ल-देशम (कोलत्तुनाडु) अथवा मूषिक देश, पुरक्किल-नाडु, कुरुम्पोरै-नाडु, एराल-नाडु, वल्लुव-नाडु, किलमलै-नाडु (पूर्वी पर्वतीय क्षेत्र), वेम्पल-नाडु, मुंजि-नाडु, नन्रुळै-नाडु तथा वेणाडु अथवा कुपक देश, जिसे इसके प्रमुख बंदरगाह कोल्लम के नाम से भी जाना जाता था, जैसे नाडुओं की पहचान की है। इन नाडुओं का गठन मुख्यतः सैन्य और राजस्व इकाइयों के रूप में किया गया था और इनके प्रमुखों को “उदयवर”, “नाडु-उदयवर” या “नाडु-वाळुमवर” कहा जाता था तथा बाद की शब्दावली में “नाडुवाझी” भी। इन पदों पर चेर राजा की सेवा करने वाले योद्धा परिवारों में से लोगों को चुना जाता था और केरल के इन “नाडु” की तुलना राष्ट्रकूटों के “राष्ट्र” तथा चोलों के “पाडि”/”वलनाडु” जैसी प्रशासनिक इकाइयों से की जा सकती है। ये सरदार अपने-अपने क्षेत्र में, यहाँ तक कि वहाँ स्थित नंबूदिरी ब्राह्मण मंदिरों और बस्तियों पर भी, काफ़ी हद तक सैन्य प्रभुत्व रखते थे, इसके बावजूद वे युद्धों में, विशेषकर चोलों के विरुद्ध चेर पेरुमल की सेवा करने के लिए बाध्य थे।

चेर राज्य के सैन्य संगठन में “अय्यिरम” यानी एक हज़ार योद्धाओं का दल चेर पेरुमल के व्यक्तिगत रक्षक-दल के रूप में कार्य करता था, जो राजा के “सम्मानित साथी” कहलाते थे और साथ ही कोडुंगल्लूर स्थित भगवती मंदिर के प्रबंधन तथा सुरक्षा का उत्तरदायित्व भी संभालते थे। “पडै-नायकर” (नायकन/पडै-नायर) संपूर्ण चेर राज्य अथवा किसी विशेष सामंती क्षेत्र की सशस्त्र सेना का सेनापति होता था, जबकि प्रत्येक सामंती क्षेत्र की अपनी स्थानीय सेना “नूट्रुवर” कहलाती थी, जिसका आकार सामान्यतः उस नाडु के उन परिवारों की संख्या से निर्धारित होता था जो सैनिक उपलब्ध करा सकते थे। “निलल” यानी “छाया” उदयवर सरदारों का व्यक्तिगत सुरक्षा-दल था, जो उनके प्रति निष्ठावान “सम्मानित साथियों” के रूप में सेवा करता था। नाम से ही स्पष्ट है कि ये सरदार की छाया की तरह उसके साथ रहते थे। इसके अतिरिक्त “प्रकृति” नामक निकाय में ग़ैर-ब्राह्मण गणमान्य व्यक्ति शामिल होते थे और यह प्रशासन में सहयोग देता था, “अधिकारार” मंदिर अथवा राजकीय कर्मचारी होते थे जो कर-वसूली और विवाद-निपटान सहित स्थानीय प्रशासन का उत्तरदायित्व संभालते थे, तथा “ऊर” और “सभा” जैसी स्थानीय ग्राम संस्थाएँ और मंदिर सभाएँ भूमि-प्रबंधन, दान-व्यवस्था तथा स्थानीय आर्थिक गतिविधियों का संचालन करती थीं, जिनके प्रस्तावों और निर्णयों का अभिलेखों में बार-बार उल्लेख मिलता है। इस पूरी व्यवस्था को देखकर यह स्पष्ट होता है कि चेर प्रशासन पूर्णतः केंद्रीकृत नहीं था, बल्कि यह केंद्र, क्षेत्रीय सरदारों, ब्राह्मण संस्थाओं और स्थानीय सभाओं के बीच शक्ति के बँटवारे पर आधारित एक जटिल व्यवस्था थी।

आर्थिक आधार : हिंद महासागर का समुद्री व्यापार

चेर पेरुमल राज्य को अपनी अधिकांश आय पश्चिम एशिया के साथ होने वाले समुद्री व्यापार, विशेषकर हिंद महासागर के मसाला व्यापार से प्राप्त होती थी। काली मिर्च, इलायची, दालचीनी और अदरक जैसी उपज केरल की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति थी। राज्य के अंतर्गत स्थित कोल्लम (क्विलोन) बंदरगाह पश्चिम एशिया तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ होने वाले भारतीय समुद्री व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था और महोदयपुरम-कोडुंगल्लूर स्वयं भी एक बड़ा बंदरगाह था। चेरा साम्राज्य के पुनरुत्थान और पेरुमल शासन का संबंध केरल में कृषि-प्रधान समाज के विस्तार से भी जोड़ा जाता है, क्योंकि इस काल में विभिन्न क्षेत्रों में ब्राह्मण बस्तियों का विस्तार हुआ, जिन्हें स्थानीय नडुवाझियों अर्थात् क्षेत्रीय सरदारों का समर्थन प्राप्त था। ब्राह्मण बस्तियों के विस्तार के साथ भूमि, धार्मिक अधिकार और राजनीतिक सत्ता से संबंधित नए सामाजिक संबंध विकसित हुए और इन बस्तियों के आपसी संबंधों तथा उनके आर्थिक-सामाजिक प्रभाव ने पुरानी स्थानीय एवं जनजातीय व्यवस्थाओं के ऊपर एक नई सामाजिक-राजनीतिक संरचना को जन्म दिया।

भूमि पर अधिकार रखने वाले नए वर्गों और स्थानीय सरदारों के बीच संबंधों को व्यवस्थित करने के लिए एक सुदृढ़ राजनीतिक सत्ता की आवश्यकता हुई और पेरुमल शासकों की भूमिका इसी संदर्भ में महत्त्वपूर्ण थी। इनके शासन में ब्राह्मणों को भूमि-अधिकार तथा धार्मिक-आनुष्ठानिक प्रतिष्ठा प्राप्त हुई, और स्थानीय भूस्वामी वर्ग को राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत संगठित किया गया। इस प्रकार पेरुमल राज्य का विकास भूमि-अनुदान, ब्राह्मण बस्तियों, कृषि विस्तार और स्थानीय राजनीतिक शक्तियों के पुनर्गठन से समबंधित था। व्यापार के अतिरिक्त, कृषि की दृष्टि से समृद्ध आर्द्रभूमि क्षेत्रों में स्थापित नंबूदिरी ब्राह्मण बस्तियाँ भी राज्य के लिए आय का एक अन्य महत्त्वपूर्ण स्रोत थीं और इसी काल में केरल में ब्राह्मण बस्तियों तथा कृषि-आधारित समाज का तेज़ी से विस्तार हुआ, जिसने राजनीतिक व्यवस्था को भी स्थिरता दी।

यही कारण था कि केरल के चेर शासकों पर क्षेत्रीय विजय के लिए विशेष आर्थिक दबाव नहीं था। यह क्षेत्र स्वाभाविक रूप से समृद्ध था और समुद्री व्यापार से पर्याप्त राजस्व स्वतः प्राप्त हो जाता था। यह चेर राज्य की तुलना चोल राज्य से करने पर एक बुनियादी अंतर के रूप में दिखाई देता है। चोलों की अर्थव्यवस्था विजय और कृषि-राजस्व पर अधिक निर्भर थी, जबकि चेरों की व्यापार पर। “मणिग्रामम” और “अंजुवण्णम” जैसे प्रसिद्ध व्यापारिक संघ इस राज्य में सक्रिय थे, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार को संगठित रूप देने का काम करते थे। ये संघ केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि अर्ध-प्रशासनिक संस्थाएँ भी थीं। तरिसापल्ली ताम्रपत्र से पता चलता है कि उन्हें चर्च की सुरक्षा और रखरखाव जैसे उत्तरदायित्व भी सौंपे जाते थे।

मध्यकालीन चेर राज्य में साझा व्यापारिक हितों पर आधारित एक बहुसांस्कृतिक और जीवंत समाज फला-फूला। चेर पेरुमल के ताम्रपत्र अभिलेखों में पश्चिम एशिया से आए ईसाई और यहूदी व्यापारियों को दिए गए विशेष अनुदानों का उल्लेख मिलता है, और पश्चिम एशिया के मुस्लिम व्यापारी भी इस काल तक इस क्षेत्र में स्थापित हो चुके थे। लोक-परंपरा में केरल के प्राचीनतम मस्जिदों में से एक कोडुंगल्लूर स्थित चेरामन जुमा मस्जिद के निर्माण को भी इसी दौर की धार्मिक बहुलता से जोड़ा जाता है, यद्यपि इससे जुड़ी कथाएँ लोक-परंपरा और इतिहास का मिश्रण मानी जाती हैं। यह धार्मिक बहुलता केवल उदारता का परिणाम नहीं थी, बल्कि एक व्यावहारिक आर्थिक नीति भी थी। विदेशी व्यापारिक समुदायों को सुरक्षा और सुविधा देकर चेर शासक अपने बंदरगाहों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए आकर्षक बनाए रखते थे।

भाषा, लिपि और साहित्य

महोदयपुरम के चेर राजाओं के शासनकाल का भाषाई दृष्टि से अत्यंत महत्त्व है। इस वंश के शासकों ने अपने आधिकारिक अभिलेखों में मलयालम भाषा के प्रारंभिक स्वरूप और वट्टेलुत्तु लिपि का प्रयोग आरंभ किया, जिसे भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में किसी क्षेत्रीय भाषा को राजकीय अभिलेखों में स्थान दिए जाने के सबसे प्रारंभिक उदाहरणों में से एक माना जाता है। मलयालम भाषा का सबसे प्रारंभिक अभिलेखीय प्रमाण भी इसी काल या उसके तुरंत बाद का माना जाता है। प्रारंभिक मलयालम के विकास में तमिल, संस्कृत और स्थानीय भाषाई परंपराओं तीनों का योगदान रहा और अभिलेखों तथा साहित्यिक स्रोतों से इस भाषाई परिवर्तन की क्रमिक प्रक्रिया की जानकारी मिलती है। यह परिवर्तन रातोंरात नहीं हुआ, बल्कि कई शताब्दियों तक चलता रहा। आरंभ में यह तमिल की एक क्षेत्रीय बोली जैसा था, जो धीरे-धीरे एक स्वतंत्र भाषा के रूप में विकसित हुआ।

कला, स्थापत्य और सांस्कृतिक योगदान

इसी दौर में मंदिर वास्तुकला की विशिष्ट “केरल-द्रविड़” शैली विकसित हुई, जो ग्यारहवीं शताब्दी से स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगती है। ढलवाँ छत, गोलाकार या वर्गाकार गर्भगृह, काष्ठ-शिल्प का व्यापक प्रयोग और प्रांगण-आधारित योजना इस शैली की पहचान हैं, और केरल की भारी वर्षा वाली जलवायु ने इस शैली को आकार देने में बड़ी भूमिका निभाई। इस काल में केरल में कूथू और कूडियाट्टम जैसी पारंपरिक नृत्य-नाट्य कलाओं का भी विकास हुआ। कूडियाट्टम को आज विश्व की सबसे प्राचीन जीवित संस्कृत नाट्य-परंपराओं में गिना जाता है और यूनेस्को ने इसे मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता दी है। कुलशेखर वर्मन के नाटकों “तपतीसंवरणम्” और “सुभद्राधनंजयम्” की प्रस्तुति-परंपरा का इस कला-रूप के विकास से गहरा संबंध माना जाता है।

पेरुमल के संरक्षण में तिरुवंचिक्कुलम मंदिर और महोदयपुरम के पांडुलिपि-संग्रह जैसे शिक्षा और सांस्कृतिक केंद्र विकसित हुए और शंकरनारायण जैसे खगोलशास्त्री का राजदरबार से संबंध इस बात का प्रमाण है कि चेर पेरुमल दरबार में गणित और खगोलशास्त्र जैसे विषयों को गंभीर संरक्षण प्राप्त था। अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक आदि शंकराचार्य को परंपरागत रूप से आठवीं शताब्दी के केरल (कालडी) से जोड़ा जाता है, और यद्यपि इसके सटीक काल-निर्धारण पर विद्वानों में मतभेद है, फिर भी यह संबंध इस क्षेत्र की समृद्ध दार्शनिक परंपरा का संकेत देता है।

चेर पेरुमल काल में हिंदू धार्मिक परंपराओं, विशेष रूप से शैव और वैष्णव भक्ति का व्यापक विकास हुआ। मंदिर केवल धार्मिक केंद्र नहीं थे, बल्कि वे भूमि-प्रबंधन, कृषि, शिक्षा, सामाजिक संगठन और स्थानीय प्रशासन से जुड़े बहुआयामी संस्थान थे। साथ ही जैन तथा बौद्ध परंपराओं की उपस्थिति भी इस काल में बनी रही, जिसका प्रमाण राजराज के तिरुवन्नूर शिलालेख जैसे साक्ष्यों से मिलता है। ओणम जैसे केरल के प्रमुख त्योहार की परंपरा भी लंबे ऐतिहासिक विकास का परिणाम है। 861 ई. का तिरुवात्रुवाय अभिलेख बताता है कि नौवीं शताब्दी तक यह उत्सव संस्थागत रूप ले चुका था।

चोल साम्राज्य से संबंध : मित्रता से शत्रुता तक

चेर-चोल संबंधों की कहानी तीन चरणों में बँटी हुई है और इसी में चेर राज्य के उत्थान और पतन का पूरा सार छिपा है। पहले चरण यानी नौवीं शताब्दी में सैन्य सहयोग देखने को मिला, जब सबसे पहले अभिलिखित चेर शासक स्थाणु रवि ने चोल शासक आदित्य प्रथम को पश्चिमी तमिल क्षेत्र (कोंगु) पर विजय प्राप्त करने में सहायता की। यह दोनों राज्यों के बीच सैन्य गठबंधन का आरंभ था। दूसरे चरण में, नौवीं-दसवीं शताब्दी के दौरान वैवाहिक संबंधों का दौर आया, जब विजयराग ने अपनी पुत्री का विवाह चोल शासक परांतक प्रथम से करवाया, गोद रवि का परांतक प्रथम के साथ घनिष्ठ गठबंधन रहा और केरल के सैनिकों ने चोल राजकुमार राजादित्य के अधीन सेवा की। यह दीर्घकालिक मैत्रीपूर्ण संबंधों का दौर था। तीसरे चरण में टकराव और विजय का दौर आया, जब इंदु कोता के काल में परांतक प्रथम द्वारा कोंगुनाडु पर अधिकार के साथ ही संबंधों में खटास आनी शुरू हुई और चेर शासक ने पांड्यों का पक्ष लेना आरंभ किया। इसके बाद ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में स्थिति पूरी तरह बदल गई।

चोलों ने चेर राज्य पर आक्रमण कर उसे अपने अधीन कर लिया और इसका मुख्य उद्देश्य संभवतः पश्चिम एशिया के साथ होने वाले हिंद महासागर के मसाला व्यापार पर चेरों के लगभग एकाधिकार को समाप्त करना था। चोल साम्राज्य के इस सामरिक अभियान के अंतर्गत मालदीव द्वीपसमूह, मालाबार तट और उत्तरी श्रीलंका पर भी विजय प्राप्त की गई। ये सभी क्षेत्र दक्षिण-पूर्व एशिया, अरब और पूर्वी अफ़्रीका के साथ होने वाले व्यापार पर नियंत्रण के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण थे, क्योंकि यही क्षेत्र यूरोप को ऊँचे दामों पर बेचे जाने वाले मूल्यवान मसालों के व्यापार-मार्ग में अरब व्यापारियों तथा दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन जाने वाले जहाज़ों के महत्त्वपूर्ण पड़ाव-स्थल थे। यानी चेर-चोल युद्ध केवल क्षेत्रीय महत्त्वाकांक्षा का मामला नहीं था, बल्कि यह हिंद महासागर के व्यापार-मार्गों पर नियंत्रण की एक बड़ी आर्थिक लड़ाई थी। चोल सम्राट राजराज प्रथम के शासनकाल में केरल का चेर राज्य उसके अधीन आ गया, परंतु चोलों का पूर्ण और सुदृढ़ नियंत्रण राजेंद्र प्रथम के काल में ही स्थापित हो सका। इसके बाद केरल को चोल साम्राज्य के केंद्रीय ढाँचे से अलग रखा गया, जिससे प्रत्यक्ष प्रशासनिक नियंत्रण सीमित रहा और कुछ समय के लिए यह क्षेत्र चोल वंश के कनिष्ठ सदस्यों को जागीर के रूप में सौंप दिया गया। यह जागीर-व्यवस्था अधिक समय तक नहीं टिक सकी और चोल सम्राट कुलोत्तुंग के शासनकाल में इसे समाप्त कर दिया गया।

चेर राज्य का पतन

बारहवीं शताब्दी तक आते-आते महोदयपुरम का यह केंद्रीय राज्य कई स्थानीय शक्तियों में विभाजित हो गया और इसके पीछे एक नहीं बल्कि कई कारण थे। चोलों के साथ लगभग एक शताब्दी तक चले युद्धों ने चेर राज्य के संसाधन, सेना और राजधानी तीनों को नष्ट कर दिया। महोदयपुरम के क्षतिग्रस्त होने और राजधानी के कोल्लम स्थानांतरित होने से वंश की प्रतीकात्मक और प्रशासनिक धुरी टूट गई। समय के साथ चेर राज्य भूमि-स्वामित्व और भूमि-लेन-देन के प्रमुख नियामक के रूप में अपनी भूमिका खोता चला गया और भूमि पर वास्तविक नियंत्रण मंदिर संस्थाओं, ब्राह्मण समुदायों और स्थानीय सरदारों के हाथ में चला गया। उदयवर सरदार पहले से ही सैन्य शक्ति रखते थे और केंद्र के कमज़ोर होते ही उन्होंने स्वतंत्र व्यवहार करना शुरू कर दिया। राम कुलशेखर के काल में स्थानीय ब्राह्मण समुदायों के साथ बढ़ते मतभेदों ने केंद्रीय सत्ता के लिए आवश्यक सामाजिक समर्थन को कमज़ोर कर दिया, और चोलों द्वारा समुद्री मार्गों पर नियंत्रण करने से चेर राज्य की मुख्य आय, यानी समुद्री व्यापार से मिलने वाला राजस्व, गंभीर रूप से प्रभावित हुआ।

चेर वंश के उत्तराधिकारी राज्य

चेर पेरुमल राज्य के विघटन के बाद केरल में कई स्थानीय सत्ताएँ उभरीं, जिन्होंने स्वयं को इसी वंश का उत्तराधिकारी माना और यह दावा उनके लिए राजनीतिक वैधता का आधार था। दक्षिणी केरल में कोल्लम बंदरगाह-केंद्रित वेणाडु राज्य के शासक स्वयं को चेर वंशज मानते हुए कभी “चेर” तो कभी “कुलशेखर वंश” के नाम से जाने गए और आगे चलकर इसी वेणाडु से त्रावणकोर राज्य का उदय हुआ। केरल के उत्तरी भाग में कोलत्तुनाडु के सरदार भी चेर पेरुमल के उत्तराधिकारी के रूप में उभरे, और यह क्षेत्र प्राचीन मूषिक देश से जुड़ा हुआ था। कोझिकोड (कालीकट) के भावी शासक, जिन्हें ज़मोरिन (सामूतिरि) कहा गया, भी चेर पेरुमल परंपरा से जुड़े थे और आगे चलकर यही राज्य मध्यकालीन केरल का सबसे शक्तिशाली व्यापारिक राज्य बना। ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार कोच्चि (कोचीन) राजपरिवार भी इसी राजवंश का वंशज था।

इन सभी राज्यों ने आगे चलकर केरल के मध्यकालीन और औपनिवेशिक इतिहास को आकार दिया, और यही वे शक्तियाँ थीं जिनसे पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में पुर्तगाली, डच और अंग्रेज़ व्यापारियों का सामना हुआ। वास्को द गामा 1498 ई. में कालीकट के तट पर उतरा था, जो यूरोपीय शक्तियों के भारत आगमन की शुरुआत है। यह घटना चेर पेरुमल राज्य के पतन के लगभग साढ़े तीन सौ वर्ष बाद हुई और इससे पता चलता है कि पेरुमल काल में जो व्यापारिक संबंध स्थापित हुआ था, वह सदियों बाद भी केरल को विश्व-व्यापार के मानचित्र पर महत्त्वपूर्ण बनाए रखने में सहायक रहा।

इतिहासकारों का योगदान और इतिहास-लेखन की परंपरा

इस राजवंश के इतिहास को समझने में कई विद्वानों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। एलमकुलम पी.एन. कुंजन पिल्लई ने अपनी कृतियों में पेरुमलों और उनकी वंश-परंपरा का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया। उनका तर्क था कि महोदयपुरम के पेरुमल की शासन-प्रशासन की एक विशिष्ट व्यवस्था थी, जिसने राज्य के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को गहराई से प्रभावित किया। वे पेरुमल की सैन्य उपलब्धियों और पड़ोसी राज्यों के विरुद्ध किए गए अभियानों को विशेष रूप से रेखांकित करते हैं और उनकी वंशावली (1963 ई.) आगे के सभी शोधों का प्रारंभ-बिंदु बनी। एम.जी.एस. नारायणन ने अपनी कृति “पेरुमल्स ऑफ केरला” (1972 ई. में पीएच.डी. थीसिस के रूप में प्रस्तुत) में महोदयपुरम के पेरुमल का सबसे विस्तृत और गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने पेरुमल को एक प्रभावशाली शासक बताया, जो विस्तृत क्षेत्रों पर नियंत्रण रखता था और अपनी प्रजा की निष्ठा प्राप्त करता था, साथ ही यह भी बल दिया कि पेरुमल केवल शासक ही नहीं, बल्कि कला, संस्कृति और स्थापत्य का संरक्षक भी था। उनका “इंडेक्स टू चेर इंस्क्रिप्शन्स” आज भी इस क्षेत्र के अध्ययन का अनिवार्य आधार है. उल्लेखनीय है कि नारायणन ने स्वयं अपने बाद के लेखन (2002 ई.) में अपनी पूर्व स्थिति को संशोधित करते हुए “कर्मकांडीय संप्रभुता” का सिद्धांत प्रस्तुत किया।

मनु वी. देवदेवन (2014, 2020 ई.) और केशवन वेलुथाट (2020 ई. में संपादित पुनरीक्षित संस्करण) ने वंशावली और कालक्रम को और अधिक परिष्कृत किया, और इन्हीं के शोध से विजयराग तथा गोद रवि की पहचान अलग-अलग की गई, साथ ही कई तिथियों का पुनर्निर्धारण भी हुआ। पुरालेखशास्त्री एम.आर. राघव वारियर के संपादन में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा 2021 ई. में प्रकाशित “साउथ इंडियन इंस्क्रिप्शन्स” (खंड 43) ने कई पूर्व-अप्रकाशित अभिलेखों को सार्वजनिक कर इस क्षेत्र के शोध को नई दिशा दी। इतिहासकार डोनाल्ड आर. डेविस जूनियर ने मध्यकालीन केरल के धर्मशास्त्रीय और विधिक स्रोतों के अध्ययन के माध्यम से यह तर्क दिया कि चेर राज्य एक निरंकुश राजतंत्र नहीं, बल्कि सामंतों और ब्राह्मण समुदायों का एक ढीला परिसंघ था। हाल के अध्ययनों में पन्नियंकरा मंदिर से प्राप्त अभिलेखों की पुनः जाँच से नई जानकारी सामने आई है और भास्कर रवि वर्मन तथा रवि कोत राजसिंह से संबंधित अभिलेखों ने चेर पेरुमल शासकों की क्रमावली समझने में विशेष सहायता की है। इन सभी विद्वानों के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों के बावजूद, सामूहिक रूप से उनका कार्य महोदयपुरम के पेरुमल के शासन और उसके प्रभाव की एक समग्र समझ प्रदान करता है।

ऐतिहासिक महत्त्व और विरासत

महोदयपुरम का चेर (कुलशेखर) वंश केरल के मध्यकालीन इतिहास की वह कड़ी है, जिसने केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि भाषाई, धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से भी केरल की पहचान को आकार दिया। इस काल में मलयालम भाषा और वट्टेलुत्तु लिपि को राजकीय मान्यता मिली, जो किसी क्षेत्रीय भाषा के राजकीय प्रयोग का भारत में सबसे प्रारंभिक उदाहरण है, केरल-द्रविड़ मंदिर स्थापत्य शैली का विकास हुआ और हिंद महासागर व्यापार में केरल की केंद्रीय भूमिका स्थापित हुई। ईसाई, यहूदी और मुस्लिम व्यापारिक समुदायों को दिए गए राजकीय संरक्षण ने केरल की बहुसांस्कृतिक परंपरा की नींव रखी, महोदयपुरम में खगोलशास्त्र और गणित को गंभीर संरक्षण मिला तथा शैव और वैष्णव दोनों भक्ति धाराओं को समान संरक्षण मिला, जिसके परिणामस्वरूप इस वंश के दो शासक स्वयं परवर्ती भक्ति-परंपरा में संत के रूप में प्रतिष्ठित हुए। नाडु, ऊर, सभा और मंदिर-आधारित स्थानीय संस्थाओं की वह व्यवस्था भी इसी दौर में विकसित हुई, जो आगे कई शताब्दियों तक केरल के सामाजिक संगठन का आधार बनी रही।

महोदयपुरम के चेर वंश से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

प्रश्न 1 : महोदयपुरम के चेर वंश ने कब से कब तक शासन किया?

महोदयपुरम के चेर वंश ने लगभग 844 ई. से 1124 ई. तक, यानी नौवीं शताब्दी के मध्य से बारहवीं शताब्दी के आरंभ तक शासन किया।

प्रश्न 2 : महोदयपुरम कहाँ है?

महोदयपुरम की पहचान वर्तमान कोडुंगल्लूर (त्रिशूर, केरल) और उससे सटे तिरुवंचिकुलम क्षेत्र से की जाती है।

प्रश्न 3 : चेर पेरुमल वंश का पहला प्रामाणिक शासक कौन था?

चेर पेरुमल वंश का पहला प्रामाणिक शासक स्थाणु रवि कुलशेखर (लगभग 844/845–870/871 ई.) था, क्योंकि उससे पहले के शासकों के विषय में ठोस अभिलेखीय प्रमाण नहीं हैं।

प्रश्न 4 : इस वंश का अंतिम शासक कौन था?

इस वंश का अंतिम शासक राम कुलशेखर (लगभग 1089/1090–1122/1124 ई.) था।

प्रश्न 5 : तरिसापल्ली ताम्रपत्र क्यों महत्त्वपूर्ण है?

 तरिसापल्ली ताम्रपत्र लगभग 849 ई. का है, और इसमें कोल्लम के सीरियाई ईसाई समुदाय को भूमि तथा व्यापारिक अधिकार दिए जाने का उल्लेख है, जो भारत में ईसाई समुदाय के इतिहास और केरल के समुद्री व्यापार  दोनों का प्राचीनतम प्रामाणिक स्रोत है।

प्रश्न 6 : यहूदी ताम्रपत्र किस शासक ने जारी किया?

यहूदी ताम्रपत्र भास्कर रवि वर्मन प्रथम (मनुकुलादित्य) ने लगभग 1000 ईस्वी के आसपास यहूदी नेता जोसेफ रब्बान को जारी किया था।

प्रश्न 7 : क्या “कुलशेखर वंश” नाम सही है?

पूरी तरह नहीं। इस वंश के केवल दो शासकों ने स्पष्ट रूप से “कुलशेखर” उपाधि धारण की थी, इसलिए इसे “महोदयपुरम के चेर पेरुमल” कहना अधिक उपयुक्त है।

प्रश्न 8 : चेर वंश का पतन क्यों हुआ?

मुख्य कारण थे- चोलों के साथ लंबा युद्ध, राजधानी महोदयपुरम का विनाश, भूमि-संबंधों में परिवर्तन, सामंतों की बढ़ती स्वायत्तता, ब्राह्मण समुदायों से मतभेद और समुद्री व्यापार पर नियंत्रण का ह्रास।

प्रश्न 9 : ओणम का सबसे प्राचीन अभिलेखीय उल्लेख कहाँ मिलता है?

ओणम का सबसे प्राचीन अभिलेखीय उल्लेख 861 ई. के तिरुवात्रुवाय (तिरुवल्ला) अभिलेख में मिलता है, जिसमें मंदिर सभा द्वारा “अवणी ओणम” के आयोजन की व्यवस्था का उल्लेख है।

प्रश्न 10 : चेर काल में मलयालम भाषा का क्या महत्त्व है?

इसी काल में मलयालम (प्रारंभिक रूप) और वट्टेलुत्तु लिपि को राजकीय अभिलेखों में स्थान मिला, जो भारत में किसी क्षेत्रीय भाषा के राजकीय प्रयोग के सबसे प्रारंभिक उदाहरणों में से एक है।
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