भारत में पारसी समुदाय (Parsi Community in India)

भारत में पारसी समुदाय (Parsi Community in India)
भारत में पारसी समुदाय: प्रारंभिक इतिहास और विकास भारत आगमन और संजान की प्रारंभिक बसावट […]

भारत में पारसी समुदाय: प्रारंभिक इतिहास और विकास

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भारत आगमन और संजान की प्रारंभिक बसावट

आगमन की पृष्ठभूमि

भारत और ईरान के बीच व्यापारिक संबंध प्राचीन काल से रहे हैं; आकेमेनिड काल से ही ईरानी व्यापारी भारत के साथ व्यापार करते थे। भारत में पारसी समुदाय के स्थायी बसने का संबंध मुख्यतः मध्यकालीन इस्लामी ईरान में उत्पीड़न से बचकर आए जरथुस्त्री शरणार्थियों के प्रवास से माना जाता है।

पारसियों के भारत आगमन की निश्चित तिथि को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है- विभिन्न विद्वानों ने 716 ई., 775 ई., 780 के दशक, 785 ई. और 936 ई. जैसी अलग-अलग तिथियाँ प्रस्तुत की हैं। इस अंतर का प्रमुख कारण यह है कि आगमन का सबसे प्रसिद्ध स्रोत ‘किस्सा-ए-संजान’ निश्चित तिथियों के बजाय गोल/अनुमानित समय-सीमाओं का उल्लेख करता है, और इसमें वर्णित घटनाओं की ऐतिहासिक पहचान भी निश्चित रूप से नहीं की जा सकती। किस्सा-ए-संजान के अनुसार यह 1600 ई. में मौखिक परंपरा के आधार पर लिखा गया था, इसलिए इसे ऐतिहासिक स्रोत के रूप में सावधानी से प्रयोग करना आवश्यक है।

किस्सा-ए-संजान की कथा

यह ग्रंथ पारसियों के भारत आगमन की सामुदायिक स्मृति का सबसे महत्त्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत है। इसके अनुसार, ईरान में इस्लामी उत्पीड़न के समय कुछ धर्मनिष्ठ जरथुस्त्रियों ने पहाड़ों में शरण ली। लगभग सौ वर्ष बाद वे हॉर्मुज़ पहुँचे, पर वहाँ भी उत्पीड़न का भय बना रहा। एक बुद्धिमान दस्तूर (जो ज्योतिषी भी था) ने तारों का अध्ययन कर उन्हें भारत जाने की सलाह दी। वे समुद्री मार्ग से पश्चिमी भारत के दीव पहुँचे और लगभग उन्नीस वर्ष वहाँ रहे। बाद में ज्योतिषीय संकेतों के आधार पर दीव छोड़ा गया; भारत की ओर यात्रा में भीषण तूफान आया, जिसमें उन्होंने ईश्वर और विजयी बहराम अग्नि से प्रार्थना कर सुरक्षित पहुँचने पर बहराम अग्नि की स्थापना का संकल्प लिया। परंपरा के अनुसार प्रार्थना स्वीकार हुई, तूफान शांत हुआ, और वे सुरक्षित भारत पहुँचे।

जदी राणा की शर्तें और धार्मिक सामंजस्य

भारत पहुँचने पर पारसियों ने स्थानीय शासक जदी राणा से बसने की अनुमति माँगी। उसने उनकी धार्मिक परंपराओं की जानकारी लेकर कुछ शर्तें रखीं: स्थानीय भाषा अपनाना, पारसी महिलाओं द्वारा स्थानीय वेशभूषा अपनाना, हथियारों का त्याग, और विवाह समारोह केवल शाम को आयोजित करना। दस्तूर ने ये शर्तें स्वीकार कीं।

अपने धर्म की व्याख्या में पारसियों ने हिंदू परंपराओं से मिलती-जुलती विशेषताओं पर बल दिया- सूर्य-चंद्रमा, अग्नि-जल और गाय के प्रति सम्मान तथा महिलाओं द्वारा शुद्धता के नियमों का पालन। इसका सबसे प्रसिद्ध प्रतीक वह कथा है जिसमें पारसियों ने स्वयं को दूध से भरे पात्र में घुली चीनी के समान बताया- अर्थात् वे समाज में घुलकर मिठास बढ़ाएँगे पर स्वरूप नहीं बिगाड़ेंगे । एक अन्य परंपरा में दूध में सोने की अंगूठी डालने का उल्लेख मिलता है। इसके साथ सोलह कथनों/श्लोकों के माध्यम से भी धार्मिक पहचान स्पष्ट की गई, जिनमें हिंदू परंपरा से सामंजस्य रखने वाली विशेषताओं पर जोर था। हालाँकि इन सभी विवरणों की ऐतिहासिक पुष्टि नहीं होती। कुछ विद्वानों के अनुसार इनके माध्यम से बाद में विकसित पारसी प्रथाओं को ऐतिहासिक वैधता देने का प्रयास किया गया।

संजान बस्ती और ईरानशाह की स्थापना

संजान भारत में पारसियों की प्रमुख प्रारंभिक बस्ती बनी। यहाँ स्थानीय शासक से सबसे पवित्र स्तर की अग्नि (आतश बहराम) के लिए मंदिर बनाने की अनुमति ली गई, भूमि दी गई और पवित्र अग्नि स्थापित हुई, जिसे बाद में ईरानशाह कहा गया। पारसी परंपरा में इसे निर्वासन में स्थित “ईरान का राजा” माना गया और इसके इतिहास ने पारसी सामुदायिक पहचान को गहराई से प्रभावित किया।

संजान पर आक्रमण

किस्सा-ए-संजान के अनुसार लगभग तीन सौ वर्ष तक पारसी संजान में शांतिपूर्वक रहे। इसके बाद ग़ज़नवी शासक सुल्तान महमूद ने संजान पर आक्रमण किया; पारसियों ने स्थानीय हिंदुओं के साथ मिलकर प्रतिरोध किया। कथा में वीरतापूर्ण, महाकाव्यात्मक वर्णन है। पारसी नेता अरदशीर ने एक मुस्लिम योद्धा को पराजित किया पर स्वयं घायल होकर मारा गया। अंततः हिंदू-पारसी गठबंधन पराजित हुआ और क्षेत्र पर मुस्लिम शासन स्थापित हो गया। विद्वानों में इस घटना को किसी ज्ञात ऐतिहासिक घटना से जोड़ने पर सहमति नहीं है। कथा की शैली पर शाहनामा की वीरगाथात्मक परंपरा, विशेषकर रुस्तम जैसी छवि का स्पष्ट प्रभाव है।

ईरानशाह की सुरक्षा-यात्रा : संजान से उदवाड़ा तक

पारसी परंपरा में ईरानशाह की पवित्र अग्नि को अत्यंत महत्त्वपूर्ण धार्मिक धरोहर माना जाता है। संजान में पारसी समुदाय की स्थापना के बाद यह अग्नि वहाँ प्रतिष्ठित थी। जब राजनीतिक परिस्थितियाँ प्रतिकूल हुईं और आक्रमणों का खतरा बढ़ा, तब पारसी पुरोहितों ने ईरानशाह को सुरक्षित रखने के लिए इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किया। इस स्थानांतरण की विभिन्न तिथियों और क्रम को लेकर विद्वानों में कुछ मतभेद हैं, किंतु पारसी सामुदायिक परंपरा के अनुसार यह अग्नि संजान से बह्रोट, बांसदा, नवसारी, सूरत और बुलसार होते हुए अंततः उदवाड़ा पहुँची। इस दीर्घ यात्रा ने ईरानशाह को पारसी समुदाय की धार्मिक निरंतरता, संघर्ष और अस्तित्व का प्रतीक बना दिया।

बह्रोट पर्वत की गुफा

संजान पर संकट उत्पन्न होने के बाद पुरोहितों ने ईरानशाह को बह्रोट पर्वत की एक गुफा में सुरक्षित रखा। पारसी परंपरा के अनुसार पवित्र अग्नि लगभग बारह वर्षों तक इसी दुर्गम स्थान पर सुरक्षित रही। बह्रोट पर्वत का चयन संभवतः उसकी प्राकृतिक दुर्गमता और बाहरी आक्रमणकारियों से सुरक्षा के कारण किया गया था। इस अवधि में पुरोहितों ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद ईरानशाह की धार्मिक ज्योति को निरंतर बनाए रखा। बह्रोट का यह प्रसंग पारसी इतिहास में धार्मिक आस्था और संकट के समय समुदाय की दृढ़ता का महत्त्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।

बांसदा

बह्रोट पर्वत में रहने के बाद ईरानशाह को बांसदा ले जाया गया। इस स्थानांतरण की सटीक तिथि निश्चित नहीं है और विद्वानों में इस संबंध में मतभेद पाए जाते हैं। कुछ विद्वान इसे पंद्रहवीं शताब्दी के अंतिम चरण से जोड़ते हैं। बांसदा में भी पवित्र अग्नि को सुरक्षित रखने का उद्देश्य यही था कि उसे राजनीतिक अस्थिरता और संभावित आक्रमणों से बचाया जा सके। इस चरण से यह स्पष्ट होता है कि पारसी पुरोहितों के लिए ईरानशाह केवल एक धार्मिक अग्नि नहीं, बल्कि समुदाय की धार्मिक पहचान और ऐतिहासिक परंपरा का केंद्र था।

नवसारी

बाद में ईरानशाह को नवसारी लाया गया। बांसदा तक मानसून के दौरान पहुँचना कठिन होने के कारण पवित्र अग्नि को ऐसे स्थान पर रखना आवश्यक समझा गया जहाँ पारसी समुदाय की पहुँच अपेक्षाकृत सुगम हो और धार्मिक गतिविधियाँ नियमित रूप से संचालित की जा सकें। ईरानशाह के नवसारी पहुँचने का सटीक वर्ष निश्चित नहीं है, किंतु पारसी परंपरा के अनुसार पंद्रहवीं शताब्दी के अंत तक यह नवसारी पहुँच चुका था।

ईरानशाह का नवसारी में पहुँचना पारसी इतिहास की अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना मानी जाती है। नवसारी पहले से ही पारसी समुदाय का प्रमुख धार्मिक और पुरोहितीय केंद्र विकसित हो चुका था। यहाँ ईरानशाह की उपस्थिति ने नवसारी की धार्मिक प्रतिष्ठा को और बढ़ाया तथा इसे पारसी धार्मिक जीवन के प्रमुख केंद्रों में स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आगे चलकर नवसारी के पुरोहित परिवारों और धार्मिक संस्थाओं का पारसी समुदाय पर व्यापक प्रभाव रहा।

सूरत

18वीं शताब्दी में राजनीतिक परिस्थितियों में परिवर्तन के कारण ईरानशाह को एक बार फिर स्थानांतरित करना पड़ा। 1733 से 1736 ई. के बीच इसे सूरत ले जाया गया। इस स्थानांतरण का प्रमुख कारण मराठों तथा अन्य राजनीतिक शक्तियों के आक्रमणों से पवित्र अग्नि को सुरक्षित रखना था। उस समय सूरत पश्चिमी भारत का एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक नगर और पारसी समुदाय का प्रमुख केंद्र था। इसलिए संकट की स्थिति में यहाँ ईरानशाह को अपेक्षाकृत सुरक्षित रखने की संभावना अधिक थी।

सूरत में ईरानशाह के प्रवास से यह भी स्पष्ट होता है कि पारसी समुदाय राजनीतिक अस्थिरता के समय अपनी धार्मिक धरोहरों की सुरक्षा के लिए आवश्यकतानुसार उन्हें सुरक्षित और प्रभावशाली पारसी केंद्रों में स्थानांतरित करता था। इस प्रकार ईरानशाह का स्थानांतरण केवल धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप अपनाई गई सामुदायिक सुरक्षा-व्यवस्था भी था।

बुलसार

सूरत के बाद 1740 ई. में ईरानशाह को बुलसार (वर्तमान वलसाड) ले जाया गया। बुलसार में उस समय ईरानशाह के लिए कोई विशेष धार्मिक भवन उपलब्ध नहीं था। इसलिए पवित्र अग्नि को लगभग दो वर्षों तक एक पारसी पुरोहित के घर में सुरक्षित रखा गया। इससे उस समय की परिस्थितियों की कठिनाई का पता चलता है-पारसी समुदाय ने उपयुक्त धार्मिक भवन के अभाव में भी ईरानशाह की धार्मिक परंपरा को बनाए रखा।

1741 ई. में ईरानशाह को पुनः नवसारी ले जाने की माँग भी उठी, लेकिन यह माँग स्वीकार नहीं की गई। परिणामतः पवित्र अग्नि बुलसार में ही बनी रही और अंततः अगले चरण में इसे उदवाड़ा ले जाया गया। इस प्रसंग से यह भी स्पष्ट होता है कि ईरानशाह की स्थिति और उसके अधिकार-क्षेत्र को लेकर विभिन्न पारसी पुरोहितीय समूहों के बीच मतभेद और प्रतिस्पर्धा भी मौजूद थी।

उदवाड़ा

अंततः 1742 ई. में ईरानशाह को उदवाड़ा ले जाया गया। उदवाड़ा संजाना पंथक के अंतर्गत आता था। यहाँ ईरानशाह की देखरेख के लिए एक नई पुरोहितीय व्यवस्था विकसित की गई, जिसके माध्यम से पवित्र अग्नि की नियमित सेवा, धार्मिक अनुष्ठानों और संरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की गई। उदवाड़ा में ईरानशाह की स्थायी प्रतिष्ठा ने इस स्थान को धीरे-धीरे पारसी समुदाय के सबसे महत्त्वपूर्ण धार्मिक तीर्थस्थलों में बदल दिया।

उदवाड़ा में ईरानशाह की स्थापना के बाद यह स्थान केवल स्थानीय पारसी समुदाय का केंद्र नहीं रहा, बल्कि गुजरात और भारत के विभिन्न भागों से आने वाले पारसियों के लिए प्रमुख तीर्थस्थल बन गया। ईरानशाह के दर्शन और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने के लिए पारसी श्रद्धालु यहाँ आने लगे। इस प्रकार उदवाड़ा पारसी धार्मिक पहचान और सामुदायिक एकता का एक महत्त्वपूर्ण प्रतीक बन गया।

उदवाड़ा में ईरानशाह का विकास

समय के साथ ईरानशाह के लिए उदवाड़ा में अधिक व्यवस्थित धार्मिक सुविधाएँ विकसित की गईं। 1890 के दशक में ईरानशाह के लिए एक नया भवन निर्मित किया गया, जिससे पवित्र अग्नि की देखरेख और धार्मिक गतिविधियों के लिए बेहतर व्यवस्था उपलब्ध हुई। इसके बाद 1921 ई. में ईरानशाह की स्थापना की 1,200वीं वर्षगाँठ के अवसर पर विशेष धार्मिक समारोह आयोजित किया गया। इस आयोजन ने ईरानशाह के प्रति पारसी समुदाय की गहरी धार्मिक आस्था और उसके दीर्घ ऐतिहासिक महत्त्व को पुनः रेखांकित किया।

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में उदवाड़ा आने वाले तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए सड़क तथा धर्मशाला जैसी सुविधाएँ भी विकसित की गईं। इससे उदवाड़ा एक संगठित धार्मिक तीर्थस्थल के रूप में और अधिक विकसित हुआ। इस प्रकार संजान से आरंभ हुई ईरानशाह की दीर्घ यात्रा का अंतिम प्रमुख पड़ाव उदवाड़ा बना, जहाँ उसने स्थायी धार्मिक प्रतिष्ठा प्राप्त की और आज भी पारसी समुदाय की ऐतिहासिक स्मृति तथा धार्मिक आस्था के केंद्र के रूप में विशेष महत्त्व बनाए रखा।

चांगा आसा का योगदान

चांगा आसा को एक प्रभावशाली पारसी नागरिक नेता के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने नवसारी के पारसियों के लिए जज़िया (गैर-मुसलमानों पर कर) से राहत दिलाने में भूमिका निभाई। उनका महत्त्व केवल ईरानशाह के इतिहास से नहीं, बल्कि ईरान के जरथुस्त्री धार्मिक केंद्रों से भारत के पारसियों का संपर्क पुनर्जीवित करने के प्रयासों से भी जुड़ा है।

किस्सा-ए-संजान की साहित्यिक प्रकृति और महत्त्व

किस्सा-ए-संजान को केवल ऐतिहासिक दस्तावेज मानना उचित नहीं है। यह फारसी दोहों में रचित एक विशिष्ट काव्य-शैली का उदाहरण है, जिसमें धार्मिक व प्रलय-संबंधी तत्त्व भी हैं। इसकी शुरुआत में ईश्वर-स्तुति जैसी विशेषताएँ इस्लामी साहित्यिक परंपरा के प्रभाव का सूचक हैं। इसका मुख्य महत्त्व पारसी समुदाय की ऐतिहासिक स्मृति, सामुदायिक पहचान और धार्मिक चेतना को समझने में है।

गुजरात में पारसी बस्तियों का विस्तार

प्रारंभिक फैलाव और समुद्री व्यापार

किस्सा-ए-संजान गुजरात में पारसियों के प्रसार का उल्लेख करता है- सामान्यतः इसे संजान से उत्तर की ओर भरूच, नवसारी, अंकलेश्वर और खंभात की ओर प्रवास माना गया है। परंतु यह आवश्यक नहीं कि हर प्रवास संजान से ही हुआ हो। संभव है ईरान से अलग-अलग समय पर अनेक समूह सीधे आए हों। प्रारंभिक बस्तियाँ प्रायः समुद्री व्यापार से जुड़े स्थानों पर विकसित हुईं: खंभात और भरूच बड़े जहाजों के लिए उपयोगी बंदरगाह थे, जबकि नवसारी तटीय व्यापार से जुड़ा था। भारत के पश्चिमी तट और फारस की खाड़ी के बीच सदियों पुराने समुद्री व्यापार के कारण गुजरात ईरानी जरथुस्त्रियों के लिए पूर्णतः अपरिचित क्षेत्र नहीं था।

प्रारंभिक पारसी बसावट के ऐतिहासिक प्रमाण

भारत में पारसी समुदाय के प्रारंभिक इतिहास के प्रमाण किसी एक क्रमबद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ में उपलब्ध नहीं हैं। इनके संबंध में जानकारी मुस्लिम लेखकों के विवरणों, पुरानी हस्तलिखित पांडुलिपियों, अभिलेखों, धार्मिक इमारतों तथा सामुदायिक परंपराओं में बिखरी हुई मिलती है। इन विभिन्न स्रोतों को एक साथ देखने पर पश्चिमी भारत, विशेषकर गुजरात और उसके आसपास के क्षेत्रों में पारसी समुदाय की प्रारंभिक उपस्थिति तथा उसके क्रमिक विस्तार के संकेत प्राप्त होते हैं।

1009 ई. का कन्हेरी गुफा अभिलेख

प्रारंभिक पारसी उपस्थिति से संबंधित महत्त्वपूर्ण प्रमाणों में 1009 ई. का कन्हेरी गुफा अभिलेख उल्लेखनीय है। यह अभिलेख पारसी समुदाय के इतिहास के अध्ययन में इसलिए महत्त्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे पश्चिमी भारत में पारसियों की उपस्थिति के संबंध में संकेत प्राप्त होते हैं। कन्हेरी क्षेत्र तत्कालीन समुद्री और व्यापारिक मार्गों से जुड़ा हुआ था, इसलिए इस प्रकार के प्रमाण पारसियों के पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में आवागमन और बसावट को समझने में सहायक हैं।

ग्यारहवीं शताब्दी में खंभात में पारसी व्यापारी

ग्यारहवीं शताब्दी तक खंभात में पारसी व्यापारियों की उपस्थिति के संकेत मिलते हैं। खंभात उस समय पश्चिमी भारत का एक महत्त्वपूर्ण बंदरगाह और व्यापारिक केंद्र था, जिसका संपर्क अरब सागर के माध्यम से पश्चिम एशिया और अन्य समुद्री क्षेत्रों से था। व्यापारिक गतिविधियों में पारसियों की भागीदारी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वे केवल धार्मिक समुदाय के रूप में ही नहीं, बल्कि गुजरात के विकसित व्यापारिक नेटवर्क का भी हिस्सा बन चुके थे।

लगभग 1142 ई. से नवसारी में पारसी बस्ती

नवसारी के संबंध में लगभग 1142 ई. से पारसी बस्ती की परंपरा का उल्लेख मिलता है। आगे चलकर नवसारी पारसी समुदाय का अत्यंत महत्त्वपूर्ण धार्मिक और पुरोहितीय केंद्र बन गया। यहाँ अनेक प्रतिष्ठित पुरोहित परिवारों का विकास हुआ और पारसी धार्मिक परंपराओं के संरक्षण में नवसारी की विशेष भूमिका स्थापित हुई। इसलिए नवसारी की प्रारंभिक बस्ती का उल्लेख गुजरात में पारसी समुदाय के दीर्घकालीन विकास को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है।

1258 ई. में वेंदीदाद की प्रति

1258 ई. में अंकलेश्वर में पारसी धार्मिक ग्रंथ वेंदीदाद की एक प्रति तैयार किए जाने का उल्लेख मिलता है। यह प्रमाण विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि उस समय गुजरात में पारसी धार्मिक विद्या और ग्रंथ-लेखन की परंपरा सक्रिय थी। किसी धार्मिक ग्रंथ की प्रति तैयार किया जाना इस बात का संकेत है कि वहाँ धार्मिक शिक्षा, पुरोहित वर्ग और पारसी धार्मिक परंपराओं के संरक्षण के लिए आवश्यक संस्थागत आधार मौजूद था।

1309 ई. में भरूच के निकट नए दख्मा का निर्माण

1309 ई. में भरूच के निकट एक नए दख्मा के निर्माण का उल्लेख मिलता है। दख्मा पारसी अंतिम संस्कार परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल था, जहाँ मृत शरीरों को पारसी धार्मिक नियमों के अनुसार रखा जाता था। किसी क्षेत्र में नए दख्मा का निर्माण यह संकेत देता है कि वहाँ पर्याप्त संख्या में पारसी परिवार निवास कर रहे थे और समुदाय ने अपने धार्मिक जीवन के लिए स्थायी संस्थाएँ विकसित कर ली थीं। इस प्रकार यह प्रमाण गुजरात में पारसी बस्तियों के विस्तार और धार्मिक संस्थागत विकास की ओर संकेत करता है।

ग्यारहवीं शताब्दी में ठाणे क्षेत्र में पारसियों को भूमि मिलने के संकेत

ग्यारहवीं शताब्दी में ठाणे और उसके आसपास के क्षेत्रों में पारसियों को भूमि प्राप्त होने के संकेत भी मिलते हैं। भूमि प्राप्ति से यह पता चलता है कि पारसी समुदाय का कुछ हिस्सा केवल व्यापारिक गतिविधियों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने स्थानीय स्तर पर स्थायी बसावट भी विकसित की थी। कृषि और भूमि से जुड़े अधिकारों ने पारसी परिवारों को पश्चिमी भारत के विभिन्न क्षेत्रों में दीर्घकालीन सामाजिक आधार प्रदान करने में सहायता की।

बारहवीं शताब्दी में वरियाव के नरसंहार की सामुदायिक स्मृति

बारहवीं शताब्दी में वरियाव क्षेत्र में पारसियों के नरसंहार से संबंधित एक सामुदायिक स्मृति भी पारसी परंपरा में मिलती है। इस घटना का विवरण मुख्यतः सामुदायिक परंपराओं और बाद के स्रोतों के माध्यम से सामने आता है। ऐसे प्रसंगों का महत्त्व केवल घटना के ऐतिहासिक पुनर्निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि वे यह भी दर्शाते हैं कि पारसी समुदाय ने अपने प्रारंभिक इतिहास, संघर्षों और विस्थापन की घटनाओं को लंबे समय तक अपनी सामुदायिक स्मृति में सुरक्षित रखा।

इन सभी प्रमाणों के बावजूद प्रारंभिक पारसी इतिहास का क्रमबद्ध पुनर्निर्माण कठिन है। इसका प्रमुख कारण यह है कि उपलब्ध स्रोत अलग-अलग समय, स्थान और संदर्भों से संबंधित हैं तथा इनमें से अनेक स्रोत पूर्ण ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत नहीं करते। कुछ सूचनाएँ अभिलेखों और पांडुलिपियों से प्राप्त होती हैं, जबकि कुछ सामुदायिक परंपराओं या बाद के लेखकों के विवरणों पर आधारित हैं। इसलिए इन प्रमाणों को सावधानीपूर्वक परस्पर मिलान करके देखना आवश्यक है। फिर भी, इन बिखरे हुए साक्ष्यों से इतना स्पष्ट होता है कि मध्यकाल के प्रारंभिक चरणों में पारसी समुदाय पश्चिमी भारत के विभिन्न व्यापारिक और तटीय क्षेत्रों में उपस्थित था तथा समय के साथ उसने नवसारी, खंभात, अंकलेश्वर, भरूच, ठाणे और अन्य क्षेत्रों में अपनी धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक संस्थाएँ विकसित कीं।

पंथक व्यवस्था

समय के साथ पारसी समुदाय के विस्तार और धार्मिक आवश्यकताओं में वृद्धि के कारण धार्मिक प्रशासन को व्यवस्थित करने के लिए पंथक व्यवस्था का विकास हुआ। इस व्यवस्था के अंतर्गत पारसी आबादी वाले विभिन्न क्षेत्रों को अलग-अलग पंथकों में विभाजित किया गया और प्रत्येक पंथक में धार्मिक कार्यों तथा पुरोहिती व्यवस्था की देखरेख विशिष्ट पुरोहित वंशों द्वारा की जाने लगी। इस प्रकार पंथक व्यवस्था ने पारसी समुदाय के धार्मिक जीवन को स्थानीय स्तर पर संगठित करने और पुरोहितों के अधिकार-क्षेत्र को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1543 ई. के एक हस्तलिखित ग्रंथ में इन पंथकों का उल्लेख मिलता है, जिससे संकेत मिलता है कि सोलहवीं शताब्दी तक यह व्यवस्था पर्याप्त रूप से विकसित हो चुकी थी।

संजान पंथक

संजान पंथक का क्षेत्र पारडी से दहानू तक माना जाता था। संजान पारसी समुदाय के प्रारंभिक इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र था और गुजरात में पारसियों की प्रारंभिक बसावट से इसका विशेष संबंध रहा। इस पंथक के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में रहने वाले पारसियों के धार्मिक मामलों की देखरेख संबंधित पुरोहित वंशों द्वारा की जाती थी।

नवसारी पंथक

नवसारी पंथक का क्षेत्र पारडी से वरियाव तथा तापी नदी तक विस्तृत था। समय के साथ नवसारी पारसी समुदाय का एक प्रमुख धार्मिक एवं पुरोहितीय केंद्र बन गया। यहाँ स्थापित पुरोहित परिवारों ने पारसी धार्मिक परंपराओं के संरक्षण और धार्मिक अनुष्ठानों के संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आगे चलकर नवसारी की धार्मिक प्रतिष्ठा इतनी बढ़ी कि यह गुजरात के पारसी समुदाय के प्रमुख धार्मिक केंद्रों में गिना जाने लगा।

गोदावरा पंथक

गोदावरा पंथक का विस्तार वरियाव से नर्मदा नदी के निकट भरूच तक माना जाता था। इस क्षेत्र में रहने वाले पारसियों के धार्मिक मामलों का संचालन निर्धारित पुरोहित वंशों के अधिकार-क्षेत्र के अंतर्गत होता था। भरूच जैसे महत्त्वपूर्ण व्यापारिक नगर के निकट होने के कारण इस पंथक का सामाजिक और आर्थिक महत्त्व भी था। पारसी समुदाय के व्यापारिक गतिविधियों में विस्तार के साथ इस क्षेत्र में उनकी उपस्थिति भी अधिक संगठित हुई।

पहरुच पंथक

पहरूच पंथक का क्षेत्र अंकलेश्वर से खंभात तक फैला हुआ था। इस क्षेत्र में पारसी समुदाय की बस्तियों और धार्मिक गतिविधियों के बढ़ने के साथ पुरोहिती अधिकारों को व्यवस्थित करने की आवश्यकता उत्पन्न हुई। पंथक व्यवस्था के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों के धार्मिक अधिकारों और पुरोहितों के कार्यक्षेत्र को निर्धारित किया जाता था।

खंभात पंथक

खंभात पंथक पारसी समुदाय के उन क्षेत्रों में से एक था, जहाँ समय के साथ पारसी धार्मिक और सामाजिक गतिविधियाँ विकसित हुईं। खंभात एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक बंदरगाह होने के कारण यहाँ विभिन्न समुदायों के साथ पारसियों का भी संपर्क बढ़ा। धार्मिक प्रशासन की दृष्टि से इसे अलग पंथक के रूप में मान्यता मिलना पारसी समुदाय के क्षेत्रीय विस्तार और उसकी संगठित धार्मिक व्यवस्था का संकेत देता है।

पुरोहिती अधिकारों को लेकर विवाद

पारसी समुदाय के विभिन्न क्षेत्रों में फैलने और अलग-अलग पंथकों के विकसित होने के साथ पुरोहिती अधिकारों और धार्मिक सेवाओं पर नियंत्रण को लेकर विवाद भी उत्पन्न होने लगे। विभिन्न पुरोहित वंश अपने पारंपरिक अधिकार-क्षेत्र, धार्मिक सेवाओं और उससे जुड़े आर्थिक अधिकारों को सुरक्षित रखना चाहते थे। इन अधिकारों को लेकर उत्पन्न मतभेद कई बार केवल धार्मिक या प्रशासनिक विवाद तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने गंभीर और कभी-कभी हिंसक रूप भी धारण कर लिया। इसलिए पंथक व्यवस्था को केवल धार्मिक प्रशासन की प्रणाली के रूप में नहीं, बल्कि पारसी समुदाय के भीतर पुरोहितीय अधिकारों, क्षेत्रीय नियंत्रण और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ी एक महत्त्वपूर्ण संस्था के रूप में भी समझा जा सकता है।

भगारिया-संजाना धार्मिक विवाद (1686 ई.)

जब ईरानशाह बांसदा से नवसारी लाया गया, संजाना पुरोहितों के परिवार भी साथ आए। मूल व्यवस्था के अनुसार ईरानशाह की सेवा केवल संजाना पुरोहित करते, जबकि नवसारी के पारसियों के पारिवारिक धार्मिक संस्कार स्थानीय भगारिया पुरोहित करते। समस्या तब हुई जब नवसारी के लोग अपने संस्कारों के लिए संजाना पुरोहितों की सेवा लेने लगे। चूँकि पुरोहितों को नियमित वेतन नहीं मिलता था, इसमें आर्थिक हित भी जुड़े थे। सितंबर 1686 ई. में संघर्ष इतना गंभीर हुआ कि सात भगारिया गृहस्थों और दो संजाना मोबदों की हत्या कर दी गई। इसके बाद विवाद लंबे समय तक चला और मामला धर्मनिरपेक्ष न्यायालयों तक पहुँचा।

अन्य ईरानी जरथुस्त्री समूह

भारत आने वाले सभी जरथुस्त्रियों का उद्देश्य केवल धार्मिक उत्पीड़न से बचना नहीं था। कुछ विद्वान व रहस्यवादी आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में भी आए। उन्नीसवीं शताब्दी में पश्चिमी विद्वानों और पारसियों में दबिस्तान-ए-मज़ाहिब और दसातीर जैसे ग्रंथों को लेकर उत्सुकता पैदा हुई। प्रारंभ में इन्हें प्राचीन जरथुस्त्री रहस्यवादी ग्रंथ माना गया, पर बाद में विद्वानों ने इन्हें अपेक्षाकृत आधुनिक रचनाएँ माना, जिनमें सूफी, हिंदू और बौद्ध रहस्यवाद का प्रभाव है। दस्तूर आज़र कैवान अपने अनुयायियों सहित इस परंपरा से जुड़े थे; वे जीवन के अंतिम वर्षों में पटना में रहे और लगभग 1617–18 ई. में वहीं उनका निधन हो गया।

रिवायतों की परंपरा और ईरान-भारत धार्मिक संपर्क

नरीमान होशंग और रिवायतों की शुरुआत

चांगा आसा ने समुदाय में धार्मिक अनुष्ठानों व ज्ञान की कमी महसूस कर ईरान के जरथुस्त्री धार्मिक अधिकारियों से मार्गदर्शन माँगने का प्रयास किया। उन्होंने भरूच के गृहस्थ नरीमान होशंग को यज़्द और किरमान भेजा। फारसी न आने के कारण नरीमान ने यज़्द में लगभग एक वर्ष रहकर भाषा सीखी, इस दौरान खजूर व्यापार से जीवनयापन किया और 1478 ई. में ईरान से उत्तर लेकर लौटे। यह उत्तर चांगा आसा तथा विभिन्न बस्तियों के नेताओं को संबोधित था।

रिवायतों की सामग्री और महत्त्व

1478 से 1773 ई. के बीच कुल 26 रिवायतें लिखी गईं, जिनमें से 13 रिवायतें 1600 ई. से पहले की हैं। जिस काल के लिए अन्य स्रोत कम उपलब्ध हैं, उसके लिए ये विशेष महत्त्व रखती हैं। इनमें जरथुस्त्री धार्मिक मान्यताओं व अनुष्ठानों के साथ ईरान के जरथुस्त्रियों की कठिन परिस्थितियों की जानकारी मिलती है, तथा भारत में धार्मिक ज्ञान की कमी और ईरान से पुरोहितों व ग्रंथों के संपर्क की आवश्यकता पर बल दिया गया है। रिवायतों में नवसारी, सूरत, अंकलेश्वर, भरूच और खंभात जैसे केंद्रों का नियमित उल्लेख मिलता है। संजान का उल्लेख न होने से लगता है कि उस समय तक वहाँ का समुदाय काफी हद तक स्थानांतरित हो चुका था।

ईरान की परिस्थिति बनाम भारत के पारसियों की प्रगति

1511 ई. की एक रिवायत में आश्चर्य व्यक्त किया गया कि ईरान के जरथुस्त्रियों को भारत में सहधर्मियों की जानकारी पहले क्यों नहीं थी। इसके बाद ईरान से विभिन्न धार्मिक ग्रंथों की पांडुलिपियाँ भारत भेजी गईं; इन रिवायतों पर तोरकाबाद, शरीफाबाद, खुरासान, सिस्तान और किरमान जैसे क्षेत्रों के हस्ताक्षर मिलते हैं। एक प्रमुख विषय ईरान के जरथुस्त्रियों की कठिन परिस्थितियाँ थीं। वे अपने कष्टों को बुराई के अंतिम आक्रमण से जोड़ते और मानते कि इसके बाद उद्धारकर्ता आएगा तथा धार्मिक-नैतिक पुनर्स्थापना होगी। इसके विपरीत, भारत के पारसी धीरे-धीरे सामाजिक-प्रशासनिक रूप से महत्त्वपूर्ण पद, जैसे पटेल, देसाई जैसे ग्राम-प्रमुख व राजस्व पद प्राप्त कर रहे थे।

सत्तरहवीं शताब्दी : राजनीतिक संदर्भ और यूरोपीय विवरण

राजनीतिक व आर्थिक पृष्ठभूमि

सत्तरहवीं शताब्दी से पारसी इतिहास के स्रोत अधिक होने लगे, क्योंकि यूरोपीय शक्तियों के विस्तार के साथ यात्रियों-व्यापारियों ने विवरण देना शुरू किया और पारसियों ने भी अपने अभिलेख अधिक व्यवस्थित रूप से रखने शुरू किए। पश्चिमी भारत की राजनीति जटिल थी- उत्तर में मुस्लिम शक्तियाँ, दक्षिण में मराठा शक्तियाँ सक्रिय थीं, जिनके संघर्ष से क्षेत्रीय नियंत्रण बदलता रहता था। सूरत जैसे व्यापारिक नगर इससे प्रभावित हुए। 1558 ई. तक पुर्तगालियों ने उत्तर-पश्चिमी भारत में बड़े क्षेत्र पर प्रभाव स्थापित किया, जिनके शासन में पारसियों ने व्यापार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई; सत्तरहवीं शताब्दी में डच व ब्रिटिश भी सक्रिय हुए और सूरत प्रमुख अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक केंद्र बना।

 यूरोपीय यात्रियों के विवरण

भारत में पारसी समुदाय के इतिहास, धार्मिक परंपराओं, सामाजिक जीवन और आर्थिक गतिविधियों के अध्ययन के लिए यूरोपीय यात्रियों के विवरण अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। विशेष रूप से सोलहवीं और सत्तरहवीं शताब्दी में गुजरात की यात्रा करने वाले पुर्तगाली, अंग्रेज़ और डच यात्रियों ने नवसारी, सूरत, भरूच, खंभात, बड़ौदा और अहमदाबाद जैसे प्रमुख केंद्रों में रहने वाले पारसियों के संबंध में अनेक सूचनाएँ दर्ज कीं। इन यात्रियों के विवरणों से पारसियों की धार्मिक मान्यताओं, अग्नि-पूजा, सुद्रे-कुस्ती, अंतिम संस्कार की परंपराओं, पुरोहित वर्ग, व्यापार, कृषि, शिल्प तथा समुद्री गतिविधियों के बारे में जानकारी मिलती है। यद्यपि कुछ यात्रियों के विवरणों में बाहरी दृष्टिकोण, भाषायी कठिनाइयों और धार्मिक पूर्वाग्रहों के कारण त्रुटियाँ भी दिखाई देती हैं, फिर भी पारसी समुदाय के प्रारंभिक इतिहास के पुनर्निर्माण में इनका महत्त्व अत्यधिक है।

एंथनी मोन्सेराट

एंथनी मोन्सेराट एक पुर्तगाली जेसुइट मिशनरी और यात्री थे। लगभग 1580–1583 ई. के दौरान गुजरात की यात्रा करते समय उन्होंने नवसारी में रहने वाले पारसियों के बारे में महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं। उनके विवरण से पता चलता है कि उस समय तक नवसारी पारसी समुदाय का एक महत्त्वपूर्ण धार्मिक केंद्र बन चुका था। उन्होंने पारसियों के ईरानी मूल का उल्लेख करते हुए उनकी विशिष्ट धार्मिक पहचान की ओर भी ध्यान आकर्षित किया।

मोन्सेराट ने पारसियों द्वारा पहने जाने वाले सुद्रे और कुस्ती का उल्लेख किया। उन्होंने पारसी धार्मिक जीवन में अग्नि और सूर्य के महत्त्व को भी दर्ज किया तथा उनके धार्मिक अनुष्ठानों और त्योहारों के संबंध में जानकारी प्रदान की। इसी प्रकार, उन्होंने पारसियों की अंतिम संस्कार संबंधी परंपराओं का भी वर्णन किया। इस प्रकार मोन्सेराट का विवरण सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में गुजरात के पारसी समाज की धार्मिक प्रथाओं को समझने के लिए एक महत्त्वपूर्ण यूरोपीय स्रोत है।

जॉन जॉर्डेन

जॉन जॉर्डेन अंग्रेज़ यात्री और व्यापारी थे, जिन्होंने सत्तरहवीं शताब्दी के आरंभ में भारत की यात्रा की। 1609 ई. में उनका जहाज गांदेवी के निकट दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इसके बाद वे नवसारी से होते हुए सूरत पहुँचे। इस यात्रा के दौरान उन्होंने नवसारी में रहने वाले पारसी समुदाय के बारे में जानकारी प्राप्त की।

जॉर्डेन ने नवसारी में पारसियों की उपस्थिति तथा उनके धार्मिक संस्थानों का उल्लेख किया। विशेष रूप से उन्होंने आतश बहराम और अग्नि-पूजा से संबंधित परंपराओं की ओर ध्यान दिया। उनके विवरण से यह संकेत मिलता है कि सत्तरहवीं शताब्दी के आरंभ तक नवसारी पारसियों का एक महत्त्वपूर्ण धार्मिक केंद्र बन चुका था, जहाँ धार्मिक अग्नि और उससे संबंधित अनुष्ठानों को विशेष महत्त्व प्राप्त था। जॉर्डेन का विवरण इस दृष्टि से उपयोगी है कि यह गुजरात में पारसी धार्मिक संस्थाओं की तत्कालीन स्थिति की बाहरी पर्यवेक्षक द्वारा दी गई जानकारी प्रस्तुत करता है।

एडवर्ड टेरी

एडवर्ड टेरी अंग्रेज़ पादरी और यात्री थे, जो 1616 ई. में सर थॉमस रो के साथ भारत आए थे। भारत में अपने प्रवास के दौरान उन्होंने यहाँ के विभिन्न समुदायों और धार्मिक परंपराओं का अवलोकन किया। उन्होंने पारसियों के संबंध में भी विस्तृत टिप्पणियाँ कीं और 1625 ई. में पारसी समुदाय पर अपना विवरण लिखा, जिसे बाद में उन्होंने और विस्तार दिया।

टेरी के विवरण में पारसियों के धार्मिक विश्वासों, सामाजिक जीवन और रीति-रिवाजों की जानकारी मिलती है। उन्होंने पारसियों को भारत के अन्य धार्मिक समुदायों से अलग विशिष्ट धार्मिक परंपराओं वाले समुदाय के रूप में देखा। उनके लेखन से तत्कालीन पारसी समाज के दैनिक जीवन तथा धार्मिक आस्थाओं के बारे में उपयोगी जानकारी प्राप्त होती है। इसलिए उनका विवरण 17वीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में पारसी समाज के अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण यूरोपीय स्रोतों में गिना जाता है।

हेनरी लॉर्ड

हेनरी लॉर्ड सत्तरहवीं शताब्दी के प्रमुख यूरोपीय लेखकों में से एक थे, जिन्होंने पारसी धर्म और समाज का अपेक्षाकृत विस्तृत अध्ययन किया। वे 1625–1629 ई. के दौरान सूरत में पादरी के रूप में रहे। सूरत उस समय पश्चिमी भारत का एक प्रमुख व्यापारिक बंदरगाह था और यहाँ विभिन्न धार्मिक तथा व्यापारिक समुदायों के लोग रहते थे। इसी वातावरण में लॉर्ड को पारसी समुदाय के निकट संपर्क में आने का अवसर मिला। उन्होंने अपनी पुस्तक में सूरत के बनियों और “पर्सीज़” का विस्तृत वर्णन किया। पारसी धार्मिक परंपराओं को समझने के उद्देश्य से उन्होंने उनके धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया और एक पारसी पुरोहित से शिक्षा भी प्राप्त की। इस कारण उनके विवरण में पारसी धर्म के सिद्धांतों, धार्मिक अनुष्ठानों और पुरोहित वर्ग के संबंध में अपेक्षाकृत अधिक जानकारी मिलती है।

यद्यपि हेनरी लॉर्ड के कुछ विवरण तथ्यात्मक रूप से सही नहीं थे और उनमें बाहरी धार्मिक दृष्टिकोण का प्रभाव भी दिखाई देता है, फिर भी उनके लेखन का ऐतिहासिक महत्त्व कम नहीं होता। विशेष रूप से पारसी पुरोहित वर्ग, अग्नि-पूजा तथा अंतिम संस्कार की परंपराओं के संबंध में उनकी टिप्पणियाँ उपयोगी हैं। उनके विवरण से यह भी पता चलता है कि सत्तरहवीं शताब्दी में यूरोपीय विद्वानों और मिशनरियों की पारसी धर्म को समझने में रुचि बढ़ रही थी।

डब्ल्यू. गेलेन्सेन दे जोंघ

डब्ल्यू. गेलेन्सेन दे जोंघ एक डच अधिकारी थे, जिन्होंने 1625 ई. में भरूच स्थित डच फैक्टरी का कार्यभार संभाला। गुजरात में रहते हुए उन्हें यहाँ के विभिन्न नगरों और व्यापारिक समुदायों का प्रत्यक्ष अवलोकन करने का अवसर मिला। पारसियों के संबंध में उनका विवरण अन्य कई समकालीन यूरोपीय यात्रियों के विवरणों की तुलना में अधिक व्यापक और अपेक्षाकृत सटीक माना जाता है।

दे जोंघ ने भरूच, बड़ौदा, खंभात और अहमदाबाद जैसे क्षेत्रों में रहने वाले पारसियों का उल्लेख किया। उनके विवरण से स्पष्ट होता है कि पारसी समुदाय केवल धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं था, बल्कि गुजरात की आर्थिक व्यवस्था में भी सक्रिय भूमिका निभाता था। उन्होंने पारसियों को व्यापारी, दुकानदार, कारीगर और कृषक के रूप में वर्णित किया। विशेष रूप से उन्होंने ताड़ी के व्यापार से उनके संबंध का उल्लेख किया।

दे जोंघ ने पारसियों की समुद्री व्यापार में भूमिका पर भी बल दिया। इससे पता चलता है कि गुजरात के पारसी समुदाय ने स्थानीय व्यापार के साथ-साथ समुद्री व्यापारिक गतिविधियों में भी अपनी उपस्थिति स्थापित कर ली थी। उनका विवरण पारसियों के सामाजिक-आर्थिक इतिहास को समझने के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे धार्मिक जीवन के अतिरिक्त उनकी व्यावसायिक विविधता और आर्थिक योगदान का भी पता चलता है।

अन्य यूरोपीय यात्रियों के विवरण

पारसी समुदाय के संबंध में जानकारी देने वाले यूरोपीय यात्रियों और पर्यवेक्षकों में निकोलो मनुच्ची, जेराल्ड ऑंगियर, स्ट्रीनशम मास्टर, जॉन ओविंगटन और अलेक्जेंडर हैमिल्टन भी उल्लेखनीय हैं। इन यात्रियों के विवरणों में पारसी समुदाय के सामाजिक और आर्थिक जीवन से संबंधित विभिन्न प्रकार की सूचनाएँ मिलती हैं।

जॉन ओविंगटन ने पारसियों के सामाजिक जीवन तथा उनकी परोपकारी प्रवृत्ति और वस्त्र उत्पादन में उनकी भूमिका की ओर संकेत किया। उनके विवरण से पारसियों की सामाजिक उपयोगिता तथा आर्थिक गतिविधियों की जानकारी मिलती है। इसी प्रकार अलेक्जेंडर हैमिल्टन ने पारसियों से संबंधित अनेक आर्थिक और औद्योगिक गतिविधियों का उल्लेख किया। उनके विवरण में जहाज निर्माण, बुनाई, हाथीदाँत के काम, अगेट (गोमेद/अकीक) से संबंधित शिल्प, फर्नीचर निर्माण तथा ताड़ी उत्पादन जैसी गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। इससे पता चलता है कि पारसी समुदाय ने गुजरात और पश्चिमी भारत की विविध आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी की थी।

निकोलो मनुच्ची, जेराल्ड ऑंगियर और स्ट्रीनशम मास्टर के विवरण भी तत्कालीन पश्चिमी भारत के सामाजिक और व्यापारिक वातावरण को समझने में सहायक हैं। इन यात्रियों की टिप्पणियों को अन्य भारतीय, पारसी और यूरोपीय स्रोतों के साथ मिलाकर देखने पर यह स्पष्ट होता है कि सोलहवीं और सत्तरहवीं शताब्दी तक पारसी समुदाय गुजरात के सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक जीवन में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर चुका था।

यूरोपीय यात्रियों के विवरणों का ऐतिहासिक महत्त्व

यूरोपीय यात्रियों के विवरणों का सबसे बड़ा महत्त्व यह है कि वे पारसी समुदाय की धार्मिक और सामाजिक स्थिति के समकालीन बाहरी साक्ष्य उपलब्ध कराते हैं। इनसे नवसारी, सूरत, भरूच, खंभात और अन्य गुजरात-केंद्रित पारसी बस्तियों के विकास, धार्मिक संस्थाओं, अग्नि-पूजा, पुरोहित वर्ग, अंतिम संस्कार की परंपराओं तथा सामाजिक जीवन के बारे में जानकारी मिलती है। साथ ही, इन विवरणों से पारसियों की व्यापार, कृषि, शिल्प, जहाज निर्माण और अन्य आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी का भी पता चलता है।

यद्यपि इन स्रोतों का उपयोग करते समय सावधानी आवश्यक है, क्योंकि अनेक यात्री पारसी धर्म के बाहरी पर्यवेक्षक थे और उनके विवरणों में भाषायी सीमाएँ, अपूर्ण जानकारी तथा धार्मिक-सांस्कृतिक पूर्वाग्रह दिखाई दे सकते हैं। इसलिए इन विवरणों को पारसी धार्मिक ग्रंथों, अभिलेखों, स्थानीय परंपराओं और अन्य समकालीन स्रोतों के साथ मिलाकर पढ़ना अधिक उचित है। इसके बावजूद, गुजरात में पारसी समुदाय के प्रारंभिक विकास और उसके धार्मिक-सामाजिक जीवन के पुनर्निर्माण में यूरोपीय यात्रियों के वृत्तांत अत्यंत उपयोगी ऐतिहासिक स्रोत हैं।

वसारी : पारसियों का प्रमुख धार्मिक केंद्र

प्रारंभिक इतिहास

संजान के बाद नवसारी पारसी धार्मिक जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण केंद्र बना। यहाँ पहला मंदिर लगभग 1142 ई. में बनने की परंपरा है। लगभग 1300 ई. से अगली दो शताब्दियों तक दिल्ली के मुस्लिम शासकों के अधीन राजनीतिक दबाव-उत्पीड़न बना रहा। 1531 ई. में चांगा आसा के पुत्र मानेक चांगा ने नवसारी में दख्मा बनवाया। नवसारी के प्रमुख परिवारों में राणा जेसंग का महत्त्वपूर्ण स्थान था। वे पहले नवसारी आए पुरोहित कामदिन जरथोस्त के वंशज थे; उनके पुत्र मेहरजी राणा पारसी पुरोहित इतिहास की अत्यंत महत्त्वपूर्ण विभूति बने।

मेहरजी राणा और अकबर

1573 ई. में सम्राट अकबर ने सूरत पर अधिकार किया, जिससे नवसारी सहित गुजरात के तटीय क्षेत्र मुगल शासन में आए। विभिन्न धर्मों के विद्वानों को दरबार बुलाने की अकबर की नीति के तहत मेहरजी राणा को भी आमंत्रित किया गया; 1577–78 ई. के आसपास उन्होंने अकबर को जरथुस्त्र धर्म की जानकारी दी। परंपरा के अनुसार अकबर प्रभावित हुआ, उसने अग्नि को पवित्रता के प्रतीक के रूप में महत्त्व दिया और जरथुस्त्री कैलेंडर को दरबारी कैलेंडर के रूप में प्रयोग किया- कुछ पारसी विवरणों में अकबर के धर्म-परिवर्तन की बात है, पर इसे गंभीरता से मानने का पर्याप्त आधार नहीं है; अकबर मूलतः धार्मिक समन्वयवादी दृष्टिकोण वाला शासक था। अकबर ने मेहरजी राणा को नवसारी के निकट भूमि दी, जिनकी प्रतिष्ठा ने सोलहवीं शताब्दी में नवसारी को पारसियों का प्रमुख धार्मिक केंद्र बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विद्वत् परंपरा

सत्तरहवीं शताब्दी तक नवसारी पारसी धार्मिक अधिकार का प्रमुख केंद्र बन चुका था, जहाँ से विभिन्न बस्तियों के लिए पुरोहित भेजे जाते थे। यहाँ प्राचीन वाड़ी दर-ए-महर जैसे धार्मिक स्थल थे, जहाँ पांडुलिपियों की प्रतियाँ तैयार होकर गुजराती में अनूदित होतीं। 1627 ई. में ईरान से विष्टास्प यष्ट व विस्परद की प्रतियाँ नवसारी पहुँचीं। दस्तूर असदीन काका प्रारंभिक विद्वानों में से एक थे।

दस्तूर जमास्प आशा ने फारसी, संस्कृत, ज्योतिष का अध्ययन किया, फिर ज़ंद-पहलवी सीखने भरूच गए, जहाँ एक सहानुभूतिशील हिंदू व्यापारी ने उन्हें दुकान में अध्ययन करने दिया। वे साहित्य में प्रसिद्ध हुए, नवाब के लिए शाहनामा पाठ करते थे। नवसारी लौटकर उन्होंने धार्मिक ग्रंथों का गुजराती अनुवाद किया और धार्मिक शिक्षा को सामान्य पारसियों तक पहुँचाने का समर्थन किया। उन्होंने बड़ी संख्या में पांडुलिपियाँ एकत्र कीं, जिन्हें बाद में उनके तीन पुत्रों ने बाँट लिया। 1753 ई. में लगभग 60 वर्ष की आयु में निधन हुआ।

दस्तूर जमास्प के पुत्र जमशेदजी जमास्पजी भी विद्वान थे, धार्मिक अग्नि-स्थापना के प्रश्नों पर स्वतंत्र विचार रखते थे, गायकवाड़ दरबार में शाहनामा पाठ करते व बौद्धिक बहसों में भाग लेते थे। 1781 ई. में पैदल बंबई पहुँचे और वहाँ अग्नि-मंदिरों व दख्माओं की स्थापना में भूमिका निभाई। बाद में दस्तूर कुर्शेदजी जमशेदजी ने बंबई में इस परिवार की पुरोहित-परंपरा स्थापित की- ज़ंद, पहलवी, फारसी, अरबी व संस्कृत का अध्ययन कर 1801 ई. में बंबई पहुँचे और 1812 ई. में आधिकारिक रूप से दस्तूर घोषित हुए।

नवसारी में दूसरा आतश बहराम

1742 ई. में ईरानशाह के उदवाड़ा जाने के बाद नवसारी में भगारिया समुदाय से संबंधित नए आतश बहराम की स्थापना का प्रयास हुआ। परंपरा के अनुसार यह स्थापना 1765 ई. में लगभग सौ पुरोहितों की उपस्थिति में हुई, साथ में धार्मिक उत्सव व सामुदायिक समारोह आयोजित हुए; इसकी कथा बाद में गुजराती मौखिक परंपरा का हिस्सा बनी।

धार्मिक संस्थाएँ और शिक्षा

नवसारी में अनेक दख्मा व धार्मिक भवन बने। 1765 ई. का आतश बहराम 1810 ई. में नए भवन में स्थापित हुआ। 1856 ई. में युवा पुरोहितों की शिक्षा हेतु जरथुस्त्री विद्यालय खुला, जिसका उद्देश्य धार्मिक ज्ञान देना और ईसाई मिशनरियों की आलोचनाओं का सामना करने योग्य बनाना था। 1872 ई. में दस्तूर मेहरजी राणा पुस्तकालय स्थापित हुआ, जो धार्मिक पुस्तकों व पांडुलिपियों के संग्रह के लिए प्रसिद्ध है।

परोपकार

समृद्ध पारसियों ने नवसारी में विद्यालय, अस्पताल, प्रसूति गृह, औषधालय, अनाथालय, पशु-चिकित्सा केंद्र, सड़कें, धार्मिक भवन व पुस्तकालय स्थापित करने में सहायता दी। सर जमशेदजी जीजीभॉय ने धार्मिक भवनों, कुओं, सामुदायिक सभागार व विद्यालयों के निर्माण में योगदान दिया, गरीबों की आर्थिक सहायता की, और नवसारी के पारसियों को जज़िया से राहत दिलाने हेतु गायकवाड़ को बड़ी राशि दी। नौरोजी व टाटा परिवार भी नवसारी से जुड़े प्रमुख परिवार थे।

सामाजिक प्रतिष्ठा

उन्नीसवीं शताब्दी में पारसियों की सामाजिक प्रतिष्ठा व्यापक समाज में भी दिखी। 1861 ई. में बड़ौदा के महाराजा खंडेराव गायकवाड़ ने दस्तूर मेहरजी राणा के घर जाकर सम्मानित किया। 1874 ई. में महाराजा ने एन. आर. टाटा के घर जाकर भेंट की। 1878 ई. में बंबई के गवर्नर सर रिचर्ड टेंपल ने नवसारी आकर धार्मिक संस्थाओं का निरीक्षण किया। पारसियों ने सरकारी वकील, न्यायाधीश, नगरपालिका अधिकारी, सीमा-शुल्क अधिकारी जैसे प्रशासनिक पद भी प्राप्त किए।

1881 ई. की जनसंख्या

1881 ई. की जनगणना के अनुसार नवसारी में 8,118 पारसी थे- 4,447 महिलाएँ और 3,671 पुरुष। शिक्षा में लैंगिक अंतर था- 1,934 पुरुष शिक्षित थे बनाम 605 शिक्षित महिलाएँ। फिर भी नवसारी धार्मिक शिक्षा व पुरोहित परंपरा का महत्त्वपूर्ण केंद्र बना रहा।

सूरत : पारसियों का प्रमुख व्यापारिक केंद्र

सूरत सदियों से पश्चिमी तट के समुद्री व्यापार का महत्त्वपूर्ण केंद्र, हज यात्रियों का प्रमुख मार्ग, तथा लाल सागर, फारस की खाड़ी, हिंद महासागर व चीन तक व्यापार से जुड़ा था। सत्तरहवीं शताब्दी में सूरत भरूच को पीछे छोड़कर पारसियों का प्रमुख व्यापारिक केंद्र बना। 1616 ई. में सूरत में पारसी पुरोहितों की आवश्यकता का उल्लेख मिलता है और 1659 ई. में अतिरिक्त मोबदों को बुलाया गया।

रुस्तम मानेक सेठ और उत्तराधिकारी

सत्रहवीं शताब्दी के प्रमुख व्यापारियों में रुस्तम मानेक सेठ उल्लेखनीय हैं। उनके पिता पुर्तगालियों के दलाल थे, यह पद रुस्तम को विरासत में मिला। बाद में उन्होंने डच व ब्रिटिश शक्तियों के लिए भी काम किया। ईस्ट इंडिया कंपनी के पुराने-नए गुटों के संघर्ष में वे महत्त्वपूर्ण मध्यस्थ बने। 1702–03 ई. में सर विलियम नॉरिस के मुगल दरबार जाने पर वे साथ गए और औरंगज़ेब के साथ नॉरिस के खराब व्यवहार से रुस्तम को आर्थिक दंड झेलना पड़ा, फिर भी वे मुगल शासक की कृपा में बने रहे और उन्हें सूरत के आसपास बड़ी भूमि मिली। इन्हीं से फ्रामपुरा, नानपुरा और रुस्तमपुरा जैसे क्षेत्र विकसित हुए। उन्होंने अनेक पुल-कुएँ बनवाए, परोपकार किया और 1707 ई. में मराठा आक्रमण से बचकर आए नवसारी के पारसी बुनकरों को अपने बगीचे में बसाया। 1721 ई. में मृत्यु तक वे ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रभावशाली दलाल बने रहे।

रुस्तम मानेक सेठ के तीन पुत्रों ने उनकी स्थिति संभाली, पर व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता में फँसकर कैद कर लिए गए। इनमें से नौरोजी इंग्लैंड भागकर ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशकों से न्याय की माँग की, न्याय मिलने पर भारत लौटे और बंबई में प्रभावशाली पारसी नेता व परोपकारी बने। सूरत, बंबई व नवसारी में उनके परिवार ने अनेक सामाजिक-धार्मिक कार्यों में योगदान दिया।

भारत में पारसी सुधार आंदोलन (Parsi Reform Movement in India)
दादाभाई नौरोजी

दावर-मोदी परिवार

यह परिवार सत्तरहवीं शताब्दी से सूरत में सक्रिय था। ब्रिटिशों को आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध कराने के कारण उन्हें “मोदी” कहा गया; साथ ही वे सामुदायिक न्यायाधीश/मजिस्ट्रेट के रूप में भी पहचाने जाते थे, जिनके अधिकार को नवाब व ब्रिटिश दोनों स्वीकारते थे। उन्नीसवीं शताब्दी में इस परिवार के कुछ सदस्यों ने बंबई के पारसी नेतृत्व द्वारा किए जा रहे पारिवारिक कानून सुधारों का विरोध किया और यह प्रश्न उठाया कि क्या बंबई के नेता पूरे भारत के पारसियों की ओर से निर्णय लेने के अधिकारी हैं।

कैलेंडर विवाद (शहंशाही बनाम कदमी)

अठारहवीं शताब्दी में सूरत एक महत्त्वपूर्ण कैलेंडर विवाद का केंद्र बना। 1720 ई. में ईरान से आए मोबद जमास्प वेलायती ने पाया कि भारत व ईरान के पारसी कैलेंडर में लगभग एक महीने का अंतर है; उन्होंने कुछ प्रमुख पुरोहितों को ज़ंद-पहलवी की शिक्षा दी। 1736 ई. में ईरान से आए जमशेद नामक व्यक्ति ने यह अंतर समझाया। सूरत के दस्तूर मुर्ज़बान कौस फ्रेडून मुंज्जम ने विचार-विमर्श के बाद ईरानी पद्धति को सही माना, जिससे कदमी समूह का विकास हुआ, जबकि अधिकांश पारसी परंपरागत शहंशाही कैलेंडर का पालन करते रहे। इस विवाद ने समुदाय में लंबे समय तक धार्मिक मतभेद उत्पन्न किए।

अनकेतिल दुपेरों का अध्ययन

फ्रांसीसी विद्वान अब्राहम अनकेतिल दुपेरों ने 1757 से 1760 ई. तक सूरत में रहकर जरथुस्त्र धर्म व पारसी समुदाय का अध्ययन किया, विशेषकर अवेस्ता में उनकी रुचि थी। पारसी पुरोहितों से शिक्षा लेकर उन्होंने अवेस्ता व पहलवी पांडुलिपियों का अध्ययन किया, किस्सा-ए-संजान के आधार पर पारसी इतिहास का विवरण तैयार किया, और सूरत में रहते हुए पुरोहितों के बीच के धार्मिक व कैलेंडर विवाद भी प्रत्यक्ष देखे। उन्होंने 1771 ई. में अपने निष्कर्ष प्रकाशित किए।

मुल्ला फिरोज और कदमी समुदाय

सूरत में कौस जलाल और उनके पुत्र पेशोतन का महत्त्वपूर्ण स्थान था। 1768 ई. में कौस जलाल ने ईरान के धार्मिक अधिकारियों को कैलेंडर व अन्य विषयों पर 78 प्रश्न भेजे, फिर अपने दस वर्षीय पुत्र पेशोतन को लेकर ईरान गए, जहाँ यज़्द में शिक्षा प्राप्त कर पेशोतन ने पुरोहित पद प्राप्त किया, आगे चलकर वे मुल्ला फिरोज के नाम से जाने गए। 1780 ई. में पिता-पुत्र भारत लौटे, बाद में बंबई गए और कैलेंडर विवादों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। कौस जलाल के प्रभाव से बंबई में पहला कदमी आतश बहराम स्थापित हुआ।

आतश बहराम

सूरत पारसी इतिहास का पहला ऐसा केंद्र बना जहाँ एक से अधिक आतश बहराम स्थापित हुए।  1823 ई. में मोदी आतश बहराम की स्थापना पर लगभग 20,000 लोग एकत्र हुए और उसी वर्ष दिसंबर में वकील आतश की स्थापना भी हुई। इस स्वीकृति ने बाद में बंबई में कई आतश बहराम स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त किया।

इल्म-ए-ख़शनूम

सूरत एक नए धार्मिक आंदोलन इल्म-ए-ख़शनूम का जन्मस्थान भी रहा, जिसके संस्थापक बहरामशाह नौरोजी श्रोफ (1858–1927 ई.) यहीं जन्मे थे। ईरान यात्रा व आध्यात्मिक अनुभवों के बाद उन्होंने भारत के विभिन्न भागों की यात्रा की। 1891 से 1909 ई. तक सूरत में रहे, फिर शिक्षाओं का प्रचार करते हुए बंबई चले गए।

परोपकार, संकट और जनसंख्या

सूरत के अनेक पारसी नेताओं ने सार्वजनिक कल्याण में भी योगदान दिया। अरदशीर धुंजीशाह को कोतवाल के रूप में उनके कार्य तथा बाढ़-आग में लोगों को बचाने के लिए सम्मानित किया गया। पारसी नगरपालिका, न्यायपालिका, मुद्रा निर्माण, पुलिस व प्रशासन में महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे।

सूरत को सत्तरहवीं-अठारहवीं शताब्दियों में अनेक संकटों का सामना करना पड़ा। शिवाजी ने 1664 व 1667 ई. में आक्रमण किया, इसके अतिरिक्त महामारी, आग व बाढ़ ने भी शहर को प्रभावित किया। उन्नीसवीं शताब्दी में नदी में गाद जमने से सूरत का समुद्री महत्त्व घटने लगा, जिससे व्यापार का बड़ा हिस्सा बंबई की ओर स्थानांतरित हुआ और कई पारसी परिवार बंबई तथा कुछ हद तक कराची चले गए। 1881 ई. की जनगणना में सूरत में 12,593 पारसी दर्ज थे- बंबई के बाद पारसियों का सबसे बड़ा केंद्र।

भरूच और गुजरात के अन्य केंद्र

भरूच

भरूच प्रारंभिक पारसी इतिहास का अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र था। यह प्राचीन बंदरगाह यूनानी-रोमन स्रोतों में भी उल्लिखित है। कुछ विद्वानों के अनुसार यहाँ का समुदाय ईरान से आए प्रारंभिक व्यापारिक प्रवासी समूहों से विकसित हुआ हो सकता है। दसवीं शताब्दी के पारसी मंदिर के संकेत मिलते हैं, 1142 ई. में बसने का उल्लेख मिलता है और 1309 ई. में पुराना दख्मा जीर्ण होने पर नया दख्मा बनाया गया। उन्नीसवीं शताब्दी में भरूच के पारसियों में व्यापारी, प्रशासक, न्यायाधीश व विधिवेत्ता शामिल थे। 1881 ई. की जनगणना में यहाँ 3,042 पारसी दर्ज थे।

गुजरात के अन्य पारसी केंद्र

गुजरात में पारसी समुदाय के अन्य प्रमुख केंद्रों में अंकलेश्वर, खंभात, दमन और बुलसार शामिल थे। अंकलेश्वर में 1517 ई. में दख्मा (टॉवर ऑफ साइलेंस) का निर्माण हुआ। खंभात में 1534 ई. में दख्मा बनाया गया और लगभग इसी समय दर-ए-महर की भी स्थापना हुई। दमन में 1697 ई. में दख्मा का निर्माण हुआ। बुलसार (वर्तमान वलसाड) में 1631 ई. में प्रथम पुरोहित के आगमन का उल्लेख मिलता है और 1645 ई. में दख्मा बनाया गया। 1731 ई. में यहाँ के पारसियों को धार्मिक कर से राहत मिली तथा लगभग 1732 ई. के आसपास ईरानशाह की पवित्र अग्नि लगभग दो वर्षों तक यहाँ रही। इसके अतिरिक्त, ठाणे में 1774 ई. से पारसी बसावट के संकेत मिलते हैं और 1781 ई. में वहाँ दख्मा का निर्माण किया गया।

धार्मिक भवनों का विस्तार (1770–1895 ई.)

इस अवधि में लगभग 120 दख्मा स्थापित हुए (अधिकांश गुजरात में) और 24 कब्रिस्तान खरीदे गए, जिनमें से अधिकांश बंबई प्रेसीडेंसी के बाहर थे। इसी दौरान लगभग 150 अग्नि-मंदिर बने और अगले पंद्रह वर्षों में 19 अन्य धार्मिक भवन बने। इससे समुदाय की आर्थिक समृद्धि व विभिन्न क्षेत्रों में प्रवास का अनुमान लगाया जा सकता है। सामान्यतः किसी नए केंद्र में पहले अंतिम संस्कार की व्यवस्था होती, फिर अग्नि-मंदिर, फिर धर्मशाला बनाई जाती थी।

रेलवे और धर्मशालाएँ

1850 व 1853 ई. में रेलवे विकास तथा 1866 ई. में बंबई-बरौदा रेलवे विस्तार से यात्रा-व्यापार बढ़ा, जिसके साथ अनेक पारसी धर्मशालाओं का निर्माण हुआ। बंबई, बांद्रा, दहिसर, पारडी, उदवाड़ा, बुलसार, सूरत, सायन व भरूच में। इससे पारसी यात्रियों-व्यापारियों के साथ अन्य समुदायों को भी लाभ मिला।

पूना में पारसी समुदाय

प्रारंभिक उपस्थिति और व्यापार

पूना में पारसियों की कुछ प्रारंभिक उपस्थिति के संकेत मिलते हैं, पर संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि 1818 ई. के बाद हुई, जब ब्रिटिशों ने पेशवाओं से नियंत्रण लिया। शुरू में पारसी ब्रिटिश सेना के लिए आपूर्तिकर्ता थे, बाद में दुकानदार, व्यापारी, वकील, डॉक्टर व अन्य पेशेवर बने। खुरशेदजी जमशेदजी मोदी ने ब्रिटिश रेजीडेंसी में उच्च प्रशासनिक पद प्राप्त किया।

धार्मिक संस्थाएँ

पहला ज्ञात दख्मा 1825 ई. में और दूसरा बड़ा दख्मा 1835 ई. में बना। 1835 ई. के बाद पूना को बंबई प्रेसीडेंसी की “मानसून राजधानी” कहा जाने लगा। धर्मशालाओं व अग्नि-मंदिरों की स्थापना हुई- 1843 ई. में पटेल दर-ए-महर और 1844 ई. में जमशेदजी जीजीभॉय का दर-ए-महर खुला।

व्यापार और उद्योग

जमशेदजी दोराबजी नायगुमवाला ने पूना तक रेलवे निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। पेस्टनजी सोराबजी ने डाक परिवहन का ठेका लेकर पूना-बंबई, औरंगाबाद व नागपुर तक डाक व्यवस्था चलाई; उनके पुत्रों ने पेपर मिल व कपड़ा कारखाना स्थापित किया, जिनमें से दोराबजी ने बैंक व बर्फ कारखाना भी बनाया तथा पूना नगरपालिका के पहले निर्वाचित अध्यक्ष बने।

शिक्षा और परोपकार

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पारसी परोपकारियों ने डेक्कन कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, विज्ञान कॉलेज, चिकित्सा विद्यालय आदि को आर्थिक सहायता दी। 1893 में पारसी लड़कियों की शिक्षा हेतु सरदार दस्तूर नौरोजी स्कूल स्थापित हुआ। बीसवीं शताब्दी में टाटा परिवार व अन्य परोपकारियों ने शोध संस्थानों, कृषि अर्थशास्त्र, वाणिज्य व रसायन विज्ञान की शिक्षा के लिए बड़ी राशि दी।

सामाजिक जीवन

उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से पूना बंबई के धनी वर्गों का सामाजिक केंद्र भी बना; अनेक भव्य निवास पारसी परिवारों के थे। समुदाय ने शिक्षा के साथ स्वास्थ्य, कुओं, सैनिटोरियम व पशु कल्याण में भी योगदान दिया, जिसका लाभ व्यापक समाज को मिला।

पुरोहित और ईरानी जरथुस्त्री

पूना का दस्तूरी पद नवसारी जितनी वरिष्ठता का नहीं था, फिर भी महत्त्वपूर्ण था। दस्तूर एन. जे. जमास्पआसा को सामाजिक कार्यों के लिए सरकारी सम्मान मिला; उन्होंने 1867 ई. में हिंदू, मुस्लिम व पारसियों हेतु तीन कुएँ खुदवाए। उनके उत्तराधिकारी डॉ. होशंग जमास्प ने पुलिस विभाग में कार्य किया, मऊ में दस्तूर रहे, बाद में डेक्कन कॉलेज में प्राच्य भाषाओं के प्रोफेसर बने और 1884 ई. में दक्कन के उच्च पुरोहित बने।

पूना में ईरान से आए जरथुस्त्री शरणार्थी भी थे, जिनमें कई छोटे व्यापार, चाय की दुकानों व रेस्तराँ से जुड़े थे। असपंदियार एन. खैराबादी लंबे जीवन के लिए प्रसिद्ध हुए और अंतिम संस्कार स्थल पर काम करते थे। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में पूना में लगभग 1,900 पारसी थे।

कराची में पारसी समुदाय

प्रारंभिक धार्मिक संस्थाएँ

कराची में पहला दख्मा 1848 ई. में और बड़ी अंजुमन दख्मा 1875 ई. में स्थापित हुई; पहला मंदिर 1849 ई. में और दूसरा 1869 ई. में खुला। अरदशीर सी. वाडिया प्रारंभिक प्रमुख व्यक्तियों में थे, जो बंबई डॉकयार्ड के मुख्य अभियंता रहने के बाद 1861 ई. में कराची में इंडस फ्लोटिला कंपनी के मुख्य निवासी अभियंता नियुक्त हुए।

1849 से 1911 ई. के बीच कराची में स्थापित हुए: दो दख्मा, दो मंदिर, दो विद्यालय, चार आवासीय परियोजनाएँ, दो धर्मार्थ औषधालय, एक धर्मशाला, एक सामाजिक-खेल केंद्र, एक प्रसूति अस्पताल और एक युवा जरथुस्त्री संगठन। 1911 ई. तक कराची के पारसियों की संख्या 2,411 थी।

व्यापार और शिक्षा

प्रारंभ में कराची के पारसी ब्रिटिश सेनाओं के आपूर्तिकर्ता थे, बाद में विभिन्न व्यापारों- ट्रामवे, चैंबर ऑफ कॉमर्स व बड़े प्रतिष्ठानों के विकास में भूमिका निभाई। एडुलजी दिनशॉ एंड सन उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी की बड़ी व्यापारिक फर्मों में से एक थी। 1888 ई. में ईरानी जरथुस्त्री शरणार्थियों की सहायता हेतु एक कोष बना।

शिक्षा कराची के पारसी जीवन का प्रमुख क्षेत्र था। 1880 के दशक तक लड़कों-लड़कियों की विद्यालयी शिक्षा में लगभग समान भागीदारी थी। 1885 ई. में सिंध आर्ट्स कॉलेज की स्थापना में पारसी नेताओं ने योगदान दिया; बाद में दिनशॉ इंजीनियरिंग कॉलेज जैसी संस्थाओं को भी सहायता मिली। दस्तूर एम. एन. धल्ला ने धार्मिक शिक्षा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया और जरथुस्त्र धर्म के व्यापक अध्ययन-अभ्यास को प्रोत्साहित किया।

परोपकार

कराची के परोपकारियों ने समुदाय के साथ व्यापक समाज की भी सहायता की। एडुलजी दिनशॉ ने चिकित्सा क्षेत्र में विशेष योगदान दिया, 1891 ई. में महिलाओं के अस्पताल की स्थापना में सहायता की और लेडी डफरिन अस्पताल की स्थापना में प्रमुख आर्थिक योगदान दिया।

बीसवीं शताब्दी : औद्योगिक परिवर्तन और शहरीकरण

बंबई की ओर केंद्रीकरण

उन्नीसवीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति का प्रभाव गुजरात व पारसी समाज पर भी पड़ा। भरूच जैसे क्षेत्रों में कपास जिनिंग फैक्ट्रियाँ स्थापित हुईं, पर सबसे बड़े आर्थिक-औद्योगिक परिवर्तन बंबई में हुए। धीरे-धीरे पारसी समुदाय का बड़ा हिस्सा बंबई में केंद्रित होने लगा, यद्यपि बीसवीं शताब्दी के आरंभ में भी अधिकांश पारसी बंबई से बाहर रहते थे। 1858 ई. में भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रिटिश क्राउन को हस्तांतरित होने पर राजनीतिक-आर्थिक प्रभाव का स्वरूप बदला- कानूनी व पश्चिमी शिक्षा का महत्त्व बढ़ा और बंबई जैसे नगरों की भूमिका मजबूत हुई, जिससे पारसियों सहित कई समुदायों का शहरी केंद्रों की ओर प्रवास बढ़ा।

स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण संकट

स्वतंत्रता के बाद बंबई की ओर प्रवास और तेज हुआ। युवा-सक्रिय पुरुषों के शहर जाने से गुजरात की ग्रामीण बस्तियों में वृद्ध-कमजोर लोगों का अनुपात बढ़ता गया। कुछ सरकारी नीतियों ने भी ग्रामीण समुदाय को प्रभावित किया। ताड़ी उत्पादन, जो आय का महत्त्वपूर्ण साधन था, निषेध नीति से प्रभावित हुआ, जिससे अनेक बेरोजगार हुए; भूमि नीतियों व सार्वजनिक परिवहन के राष्ट्रीयकरण का भी असर पड़ा। परिणामस्वरूप 1950 के दशक के उत्तरार्ध से ग्रामीण समुदाय की आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी।

टाटा और गोदरेज परिवारों का योगदान

संख्या में छोटे होने के बावजूद बंबई से जुड़े कुछ पारसी परिवारों ने भारत के औद्योगिक विकास पर गहरा प्रभाव डाला। टाटा परिवार ने इस्पात उद्योग में अग्रणी भूमिका निभाई, विमानन क्षेत्र में योगदान दिया और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए बड़े पैमाने पर धन दिया। गोदरेज परिवार ने भी औद्योगिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

शिक्षा, परोपकार और सार्वजनिक जीवन

उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में पारसी परोपकारियों ने विद्यालयों, कॉलेजों, अस्पतालों, शोध संस्थानों, धर्मशालाओं, अनाथालयों व अन्य सार्वजनिक संस्थाओं को आर्थिक सहायता दी, जो पारसी समुदाय तक सीमित नहीं थी। अनेक संस्थाएँ हिंदू, मुस्लिम व अन्य समुदायों के लिए भी खुलीं। इसके साथ ही अनेक पारसी ब्रिटिश संसद, स्थानीय प्रशासन व रियासतों में महत्त्वपूर्ण पदों पर पहुँचे। दादाभाई नौरोजी बड़ौदा के दीवान रहे और बाद में ब्रिटिश संसद सदस्य बने; मुंचेरजी भावनगरी ने भावनगर के लिए नया संविधान तैयार करने में भूमिका निभाई। पारसी नेताओं ने गुजरात के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा कर सामाजिक-आर्थिक सहायता भी दी।

बीसवीं शताब्दी की चुनौतियाँ और आधुनिक संस्थाएँ

इतिहास-बोध और संगठन

बीसवीं शताब्दी में पारसियों में अपने इतिहास व विरासत के प्रति रुचि बढ़ी। 1917 ई. में बंबई पारसी पंचायती ने संजान में पारसियों के भारत आगमन की स्मृति में स्मारक स्तंभ बनाने का निर्णय लिया, जिसका उद्घाटन 1920 ई. में हुआ।

पारसियाना पत्रिका 1960 के दशक में शुरू हुई और 1970 के दशक में अधिक व्यवस्थित-पेशेवर रूप में प्रकाशित होने लगी, जिसमें धार्मिक व सामाजिक दोनों विषयों पर सामग्री छपती रही। ज़ोरोएस्ट्रियन स्टडीज़ की स्थापना 1970 के दशक में खोजेस्ते पी. मिस्त्री ने युवाओं-वयस्कों को जरथुस्त्र धर्म की शिक्षा देने के लिए की, जिसने ईरान की धार्मिक यात्राओं व प्रवासी समुदायों से संपर्क को भी प्रोत्साहित किया।

1972 ई. में फेडरेशन ऑफ पारसी अंजुमन्स ऑफ इंडिया की स्थापना हुई, जिसका उद्देश्य भारत के विभिन्न अंजुमनों-पंचायतों को संगठनात्मक मंच से जोड़ना था, विशेषकर छोटे संगठनों को सामाजिक मामलों व संपत्ति रखरखाव में सहायता देना। धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप से बचा गया ताकि मतभेद न बढ़ें- यह संस्था निर्णायक अधिकारों वाली न होकर मुख्यतः विचार-विमर्श व समन्वय का मंच रही।

जनसांख्यिकीय संकट

बीसवीं शताब्दी में पारसी समुदाय की सबसे गंभीर चुनौतियाँ जनसंख्या में कमी और वृद्धावस्था रहीं। उच्च शिक्षा व पेशेवर सफलता के कारण अनेक पुरुष-महिलाएँ विवाह टालने लगे या अविवाहित रहकर करियर पर ध्यान देने लगे, जिससे जन्मदर घटी और समुदाय की औसत आयु बढ़ी। वृद्धों की देखभाल भी एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक समस्या बनी।

अंतरविवाह का प्रश्न

पारसी समाज के सबसे विवादास्पद विषयों में एक अंतरविवाह रहा है। एक पक्ष का मत है कि अंतरविवाह करने वालों, उनके जीवनसाथियों व बच्चों को समुदाय में स्वीकार न करने पर संख्या लगातार घटती जाएगी और अस्तित्व संकट में पड़ सकता है। दूसरा पक्ष मानता है कि अंतरविवाह की व्यापक स्वीकृति से पारसियों की विशिष्ट धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान कमजोर हो सकती है। इस प्रश्न ने समुदाय के भीतर लंबे समय तक तीखे मतभेद उत्पन्न किए हैं।

अंतिम संस्कार की समस्या

पारसी परंपरा में मृत शरीर को दख्मा में रखने की प्रथा महत्त्वपूर्ण रही है; जहाँ दख्मा उपलब्ध नहीं, वहाँ दफन या दाह-संस्कार को विकल्प माना गया। बंबई में 1990 के दशक में एक वायरस के कारण गिद्धों की संख्या में भारी कमी आई, जिससे पारंपरिक अंतिम संस्कार व्यवस्था पर गंभीर संकट आया। गिद्ध-संरक्षण हेतु बड़े पक्षीगृह बनाने का प्रयास हुआ, पर वह महँगा व व्यावहारिक रूप से कठिन साबित हुआ; शरीर के विघटन में तेजी लाने हेतु सौर पैनलों का प्रयोग भी किया गया। इस प्रकार भारत में पारंपरिक व्यवस्था आधुनिक पर्यावरणीय-जनसांख्यिकीय परिस्थितियों से चुनौती का सामना कर रही है।

कैलेंडर विवाद की आधुनिक स्थिति

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में फसली कैलेंडर को लेकर भी विवाद उठे, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ ऋतुओं का सामंजस्य स्थापित करता था। भारत में इन कैलेंडर-विवादों की तीव्रता बाद में कम हो गई और यह विषय अंतरविवाह या अंतिम संस्कार जैसे प्रश्नों जितना विवादास्पद नहीं रहा।

वैश्विक प्रवासी समुदाय से संबंध

बीसवीं शताब्दी में भारत के पारसियों और विदेशों में बसे जरथुस्त्री समुदायों के बीच संपर्क तेजी से बढ़ा, साथ ही प्रवासी समुदायों की संख्या, आर्थिक क्षमता व प्रभाव भी बढ़ा। भारतीय नेता विदेशी समुदायों से संपर्क बनाए रहे; विदेशों से मिली आर्थिक सहायता का उपयोग नवसारी की आवासीय योजनाओं और बंबई के पारसी जनरल अस्पताल जैसी परियोजनाओं में हुआ। इस प्रकार पारसी धार्मिक-सामाजिक जीवन अब केवल भारत तक सीमित न रहकर भारत व वैश्विक प्रवासी समुदायों के बीच निरंतर संपर्क का हिस्सा बन गया

इस प्रकार भारत में पारसी समुदाय का इतिहास प्रवास, धार्मिक संरक्षण, व्यापार, शिक्षा, परोपकार और आधुनिकता के साथ सामंजस्य की एक दीर्घकालीन प्रक्रिया है। ईरान से आए जरथुस्त्रियों ने पश्चिमी भारत, विशेषकर गुजरात में अपनी प्रारंभिक बस्तियाँ स्थापित कीं- संजान, नवसारी, भरूच और सूरत उनके प्रमुख प्रारंभिक केंद्र बने। समय के साथ नवसारी धार्मिक अधिकार व विद्वता का प्रमुख केंद्र बना, जबकि सूरत व्यापार व आर्थिक गतिविधियों का महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गया; भरूच, बुलसार, अंकलेश्वर, खंभात व अन्य स्थानों पर भी समुदाय का विकास हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी में पूना व कराची जैसे नए केंद्रों में पारसियों ने शिक्षा, व्यापार, उद्योग व सार्वजनिक जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पारसी समुदाय ने भारत के औद्योगिक, शैक्षिक, वैज्ञानिक व सामाजिक विकास में अपनी संख्या के अनुपात से कहीं अधिक योगदान दिया। टाटा, गोदरेज, जीजीभॉय, वाडिया व अन्य परिवारों की औद्योगिक-परोपकारी गतिविधियों ने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। बीसवीं शताब्दी में बंबई की ओर बढ़ते शहरीकरण-प्रवास के साथ ग्रामीण समुदायों का क्षरण हुआ, और घटती जनसंख्या, वृद्धावस्था, विवाह में देरी, अंतरविवाह व पारंपरिक अंतिम संस्कार व्यवस्था जैसी चुनौतियाँ सामने आईं। फिर भी इतिहास व धार्मिक विरासत के प्रति बढ़ती जागरूकता, संस्थागत प्रयासों और वैश्विक पारसी प्रवासी समुदाय से बढ़ते संपर्क ने पारसी पहचान को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

भारत में पारसी समुदाय से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. भारत में पारसी कौन हैं?

पारसी भारत में निवास करने वाला एक प्रमुख धार्मिक समुदाय है, जो मुख्यतः जरथुस्त्र धर्म (ज़ोरास्ट्रियनिज़्म) का पालन करता है। इनके पूर्वज प्राचीन ईरान से भारत आए थे।

2. पारसी समुदाय भारत में कब आया?

पारसी समुदाय के भारत आगमन की सटीक तिथि निश्चित नहीं है। पारसी परंपरा के अनुसार वे ईरान में राजनीतिक और धार्मिक परिस्थितियों में परिवर्तन के बाद पश्चिमी भारत के तट पर आए और संजान सहित गुजरात के विभिन्न क्षेत्रों में बस गए।

3. पारसी धर्म के संस्थापक कौन थे?

पारसी धर्म के संस्थापक जरथुस्त्र (ज़ोरोस्टर) माने जाते हैं। इस धर्म की प्रमुख शिक्षाएँ सत्य, सद्विचार, सद्वचन और सत्कर्म के सिद्धांतों पर आधारित हैं।

4. भारत में पारसियों का प्रमुख धार्मिक केंद्र कौन-सा है?

गुजरात का उदवाड़ा पारसी समुदाय के सबसे महत्त्वपूर्ण धार्मिक केंद्रों में से एक है। यहाँ ईरानशाह आतश बेहराम स्थित है, जिसे पारसी समुदाय अत्यंत पवित्र मानता है।

5. भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था में पारसियों का क्या योगदान रहा है?

पारसी समुदाय ने भारत के व्यापार, उद्योग, शिक्षा, विज्ञान, समाज-सुधार, परोपकार और राष्ट्रनिर्माण के क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी जनसंख्या अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद आधुनिक भारत के आर्थिक और सामाजिक विकास में उनकी भूमिका अत्यंत उल्लेखनीय रही है।
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