खुदाई खिदमतगार आंदोलन (Khudai Khidmatgar Movement)

खुदाई खिदमतगार आंदोलन (Khudai Khidmatgar Movement)
खुदाई खिदमतगार आंदोलन मुख्य लेख : मुस्लिम सुधार आंदोलन परिचय खुदाई खिदमतगार आंदोलन ब्रिटिश भारत […]

खुदाई खिदमतगार आंदोलन

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मुख्य लेख : मुस्लिम सुधार आंदोलन

परिचय

खुदाई खिदमतगार आंदोलन ब्रिटिश भारत के उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में विकसित हुआ एक महत्त्वपूर्ण अहिंसक जनआंदोलन था, जो वर्तमान में पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र का हिस्सा है। ‘खुदाई खिदमतगार’ का शाब्दिक अर्थ है- ‘ईश्वर के सेवक’ या ‘खुदा के सेवक’। यह आंदोलन मुख्यतः पख्तून समाज का अहिंसक प्रतिरोध आंदोलन था, जिसका नेतृत्व खान अब्दुल गफ्फार खान ने किया। उन्हें ‘बाचा खान’, ‘बादशाह खान’ और ‘सीमांत गांधी’ के नाम से भी जाना जाता था। आंदोलन का संगठित स्वरूप 1920 के दशक के उत्तरार्ध में विकसित हुआ और 1929 ई. तक यह एक प्रभावशाली राजनीतिक संगठन के रूप में सामने आ गया।

प्रारंभ में इसका मुख्य स्वरूप सामाजिक सुधार का था। पश्तून समाज में शिक्षा का प्रसार, सामाजिक सुधार, आपसी एकता, नैतिक अनुशासन और पारंपरिक रक्त-प्रतिशोध की प्रथा को समाप्त करना इसके आरंभिक उद्देश्य थे। इस प्रारंभिक सामाजिक संगठन को ‘अंजुमन-ए-इस्लाह-ए-अफगानिया’ कहा जाता था, जिसका अर्थ है- अफगान या पश्तून समाज के सुधार के लिए संगठन।

बाद में ब्रिटिश सरकार के दमन और राजनीतिक परिस्थितियों के कारण यह आंदोलन औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध व्यापक अहिंसक संघर्ष का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन गया। इसके स्वयंसेवक अपनी विशिष्ट लाल कमीजों के कारण ‘सुर्ख पोश’ अथवा ‘रेड शर्ट्स’ के नाम से प्रसिद्ध हुए, इसीलिए इसे ‘लाल कुर्ती आंदोलन’ भी कहा जाता है। पश्तूनों को परंपरागत रूप से योद्धा समुदाय के रूप में देखा जाता था, किंतु गफ्फार खान ने उन्हें हथियारबंद संघर्ष के स्थान पर अहिंसा, अनुशासन और सविनय अवज्ञा का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार यह आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अहिंसक प्रतिरोध का एक विशिष्ट उदाहरण बन गया।

खान अब्दुल गफ्फार खान : आंदोलन के संस्थापक

खान अब्दुल गफ्फार खान (6 फरवरी 1890 – 20 जनवरी 1988 ई.) बीसवीं शताब्दी में पश्तूनों के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक थे। वे ब्रिटिश भारत के उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में सामाजिक सुधार, शिक्षा और राजनीतिक जागरण के प्रमुख प्रवर्तक थे। महात्मा गांधी के विचारों और अहिंसक संघर्ष-पद्धति से प्रभावित होने के कारण उन्हें लोकप्रिय रूप से ‘सीमांत गांधी’ कहा गया। यह उपाधि उन्हें महात्मा गांधी के एक मित्र ने दी थी। वे बाचा खान और बादशाह खान के नामों से भी प्रसिद्ध थे।

अपने 98 वर्ष के जीवनकाल में वे कुल 35 वर्ष जेल में रहे। वे एक राजनीतिक और आध्यात्मिक नेता थे और उनका मुख्य उद्देश्य पश्तून समाज में शिक्षा, सामाजिक सुधार, आत्मसम्मान और राजनीतिक चेतना का विकास करना था। उनका मानना था कि अशिक्षा, सामाजिक पिछड़ापन और आंतरिक विभाजन के कारण पश्तून समाज अपनी राजनीतिक शक्ति का प्रभावी उपयोग नहीं कर पा रहा था। इसलिए उन्होंने पहले सामाजिक सुधार को प्राथमिकता दी और बाद में उसे स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा।

गफ्फार खान का यह भी मानना था कि केवल हथियारों के बल पर ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती देना कठिन है, क्योंकि ब्रिटिश सरकार हिंसक विद्रोहों को अपनी सैन्य शक्ति से दबा देती थी। इसलिए उन्होंने अनुशासन, संगठन, सामाजिक सेवा और अहिंसक प्रतिरोध को स्वतंत्रता संघर्ष का प्रमुख माध्यम बनाया। उन्होंने सदैव मुस्लिम लीग द्वारा की जाने वाली देश के विभाजन की मांग का विरोध किया। जब अंत में कांग्रेस ने विभाजन को स्वीकार कर लिया, तो उन्होंने गहरी निराशा व्यक्त करते हुए कहा था: “आप लोगों ने हमें भेड़ियों के सामने फेंक दिया।”

विभाजन के बाद उन्होंने पाकिस्तान में रहने का निर्णय लिया और पाकिस्तान के भीतर ही ‘पख्तूनिस्तान’ नामक एक स्वायत्त प्रशासनिक इकाई की माँग की। पाकिस्तान सरकार ने उन पर संदेह करते हुए उन्हें नज़रबंद रखा और पेशावर स्थित उनके घर में नज़रबंद रहते हुए 20 जनवरी 1988 ई. को उनका निधन हो गया। 1987 ई. में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया। वे यह सम्मान पाने वाले पहले गैर-भारतीय व्यक्ति थे।

उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत की राजनीतिक पृष्ठभूमि

ब्रिटिश भारत का उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। खैबर दर्रे के कारण यह क्षेत्र मध्य एशिया और अफगानिस्तान की दिशा से भारत में प्रवेश का प्रमुख मार्ग माना जाता था। इसी कारण ब्रिटिश शासन इस क्षेत्र पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए विशेष रूप से कठोर नीति अपनाता था। पश्तून समाज में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रतिरोध की एक लंबी परंपरा थी और ब्रिटिश प्रशासन ने क्षेत्र में अनेक सैन्य अभियानों और दमनकारी कार्रवाइयों का सहारा लिया था, जिससे दोनों के बीच तनाव लगातार बना रहा। इसी राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि में खुदाई खिदमतगार आंदोलन का उदय हुआ।

गफ्फार खान का प्रारंभिक राजनीतिक जीवन (1919–1928 ई.)

खान अब्दुल गफ्फार खान ने 1919 ई. में रॉलेट एक्ट के विरोध के दौरान सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। रॉलेट एक्ट के तहत ब्रिटिश सरकार को बिना नियमित न्यायिक प्रक्रिया के राजनीतिक विरोधियों को गिरफ्तार और नज़रबंद करने जैसी व्यापक शक्तियाँ प्राप्त हो गई थीं। इसी दौर में उनका संपर्क भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और महात्मा गांधी के विचारों से बढ़ा।

1920 ई. में वे खिलाफत आंदोलन से जुड़े और 1921 ई. में अपने क्षेत्र की जिला खिलाफत समिति के अध्यक्ष चुने गए। इस राजनीतिक सक्रियता ने उन्हें उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में लोकप्रिय जननेता के रूप में स्थापित करने में सहायता की।

इसी काल में उन्होंने पश्तून समाज में सामाजिक सुधार हेतु 1921 ई. में ‘अंजुमन-ए-इस्लाह-उल-अफगानिया’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य पश्तून समाज में शिक्षा, सामाजिक सुधार और एकता को बढ़ावा देना था। इसके बाद उन्होंने किसानों और युवाओं को संगठित करने के लिए अन्य संस्थाएँ भी बनाईं। गाँवों की सफाई, विद्यालयों की स्थापना, सामाजिक सेवा और सामुदायिक विकास जैसे कार्यों के माध्यम से लोगों में संगठन और अनुशासन की भावना विकसित की गई। 1928 ई. में उन्होंने ‘पख्तून’ नामक पत्रिका प्रारंभ की, जिसमें सामाजिक समस्याओं, स्वच्छता, शिक्षा और धार्मिक विषयों पर लेख प्रकाशित होते थे। इसका उद्देश्य पश्तून समाज में बौद्धिक, सामाजिक और राजनीतिक चेतना फैलाना था। इन सभी प्रारंभिक प्रयासों ने आगे चलकर खुदाई खिदमतगार आंदोलन के निर्माण की आधारभूमि तैयार की।

खुदाई खिदमतगार आंदोलन की स्थापना (1929 ई.)

1920 के दशक के उत्तरार्ध में गफ्फार खान ने पश्तून समाज को संगठित करने के प्रयासों को अधिक व्यापक रूप दिया और 1929 ई. तक ‘खुदाई खिदमतगार’ आंदोलन एक संगठित अहिंसक राजनीतिक आंदोलन के रूप में सामने आया। आंदोलन के सदस्य एक प्रतिज्ञा लेते थे, जिसमें हिंसा और प्रतिशोध का त्याग, अत्याचार का सामना धैर्यपूर्वक करना और मानवता की सेवा करना शामिल था। उनका विश्वास था कि ईश्वर की सच्ची सेवा मानवता की सेवा के माध्यम से की जाती है। स्वयंसेवकों को प्रतिदिन सामाजिक कार्य के लिए समय देने के लिए भी प्रेरित किया जाता था।

संगठन का स्वरूप अत्यंत अनुशासित था। स्वयंसेवकों को समूहों में संगठित किया जाता था और उन्हें सामाजिक सेवा, अनुशासन तथा अहिंसक प्रतिरोध का प्रशिक्षण दिया जाता था। यद्यपि इसकी संरचना में सैन्य अनुशासन जैसी व्यवस्था दिखती थी, किंतु इसका मूल सिद्धांत पूर्णतः अहिंसा था।

पुरुष स्वयंसेवक गहरे लाल रंग की कमीज़ वर्दी के रूप में पहनते थे, जबकि महिला सदस्य काले रंग के वस्त्र धारण करती थीं। इसी कारण आंदोलन ‘सुर्ख पोश’, ‘रेड शर्ट्स’ और ‘लाल कुर्ती आंदोलन’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। लाल वर्दी संगठन की एकता, अनुशासन, त्याग और संघर्ष की भावना का प्रतीक बन गई।

1929 ई. में खान अब्दुल गफ्फार खान और अन्य नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन ने अखिल भारतीय मुस्लिम लीग से समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया, किंतु अपेक्षित समर्थन न मिलने के बाद यह औपचारिक रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गया।

खुदाई खिदमतगार आंदोलन के उदय के कारण

खुदाई खिदमतगार आंदोलन का उदय किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक दमन, आर्थिक पिछड़ापन, सामाजिक समस्याएँ, शिक्षा का अभाव, पश्तून समाज में व्याप्त आंतरिक संघर्ष तथा राष्ट्रीय आंदोलन की वैचारिक प्रेरणा जैसे अनेक कारणों का योगदान था। खान अब्दुल गफ्फार खान ने इन समस्याओं को केवल राजनीतिक दृष्टि से नहीं देखा, बल्कि सामाजिक सुधार और जनजागरण को भी अपने आंदोलन का आधार बनाया। धीरे-धीरे यही सामाजिक सुधार का अभियान ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक व्यापक अहिंसक राजनीतिक आंदोलन में परिवर्तित हो गया।

ब्रिटिश शासन का कठोर नियंत्रण

खुदाई खिदमतगार आंदोलन के विकास का प्रमुख कारण उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का कठोर नियंत्रण था। यह क्षेत्र सामरिक रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था और यहाँ प्रशासन ने सुरक्षा तथा राजनीतिक नियंत्रण के नाम पर कठोर नीतियाँ अपनाई थीं। स्थानीय जनता को व्यापक राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे और प्रशासनिक व्यवस्था में उनकी भागीदारी सीमित थी। ब्रिटिश अधिकारियों की नीतियों और हस्तक्षेप ने स्थानीय समाज में असंतोष को बढ़ाया, जिससे गफ्फार खान के नेतृत्व में राजनीतिक जागरण के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनीं।

राजनीतिक अधिकारों का अभाव

उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में स्थानीय जनता को लंबे समय तक पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त नहीं थे। खान अब्दुल गफ्फार खान ने अनुभव किया कि केवल सामाजिक सुधार से समस्याओं का स्थायी समाधान संभव नहीं है, इसलिए उनका सामाजिक सुधार अभियान धीरे-धीरे राजनीतिक जागरण और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गया।

आर्थिक पिछड़ापन और गरीबी

क्षेत्र के अनेक ग्रामीण और पश्तून बहुल इलाकों में गरीबी, सीमित आर्थिक अवसर और विकास की कमी जैसी समस्याएँ मौजूद थीं। गफ्फार खान के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता और सामाजिक-आर्थिक सुधार एक-दूसरे से जुड़े प्रश्न थे, इसलिए उन्होंने शिक्षा और सामाजिक संगठन को आर्थिक तथा राजनीतिक उन्नति का आधार माना।

अशिक्षा और शिक्षा का अभाव

पश्तून समाज के बड़े हिस्से में आधुनिक शिक्षा का पर्याप्त प्रसार नहीं हुआ था, जिससे लोग प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक अधिकारों से परिचित नहीं हो पाते थे। गफ्फार खान ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम माना, इसलिए आंदोलन के कार्यक्रम में शिक्षा और जनजागरण को विशेष स्थान मिला।

जनजातीय विभाजन और आपसी वैमनस्य

पश्तून समाज विभिन्न जनजातीय और स्थानीय समूहों में विभाजित था, जिनके बीच संघर्ष उत्पन्न होते रहते थे। गफ्फार खान ने समझा कि आंतरिक विभाजनों से ऊपर उठे बिना समाज औपनिवेशिक शासन का प्रभावी सामना नहीं कर सकता, इसलिए आंदोलन ने जनजातीय सीमाओं से ऊपर उठकर सामुदायिक एकता और भाईचारे पर बल दिया।

रक्त-प्रतिशोध और हिंसक संघर्ष की परंपरा

पश्तून समाज के कुछ हिस्सों में रक्त-प्रतिशोध जैसी प्रथाएँ पीढ़ियों तक चलने वाले वैमनस्य में बदल जाती थीं, जिससे समाज की ऊर्जा आंतरिक विवादों में खर्च होती थी। गफ्फार खान ने इन परंपराओं को प्रगति में बाधक मानते हुए लोगों को क्षमा, आत्मसंयम और अहिंसा अपनाने के लिए प्रेरित किया।

सामाजिक सुधार की आवश्यकता

आंदोलन का प्रारंभिक स्वरूप मुख्यतः सामाजिक सुधार का था और इसका उद्देश्य केवल ब्रिटिश शासन का विरोध करना नहीं, बल्कि पश्तून समाज की आंतरिक समस्याओं का समाधान भी था। इस दृष्टिकोण ने आंदोलन को केवल राजनीतिक संगठन नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्जागरण का प्रयास भी बना दिया।

खान अब्दुल गफ्फार खान का नेतृत्व

आंदोलन के विकास में गफ्फार खान के व्यक्तित्व और नेतृत्व की निर्णायक भूमिका थी। उनका मानना था कि सामाजिक परिवर्तन केवल बाहरी राजनीतिक सत्ता-परिवर्तन से नहीं, बल्कि समाज के भीतर शिक्षा, आत्मानुशासन, सेवा और एकता के विकास से आएगा।

गांधीवादी विचारों का प्रभाव

महात्मा गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा के विचारों का आंदोलन के राजनीतिक स्वरूप पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। गफ्फार खान ने अहिंसा को केवल राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि आत्मसंयम, सेवा और नैतिक अनुशासन से जोड़ा, जिससे आंदोलन गांधीवादी संघर्ष से गहराई से जुड़ गया।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव

रॉलेट एक्ट के विरोध, खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन जैसी घटनाओं ने गफ्फार खान सहित अनेक स्थानीय नेताओं को सक्रिय राजनीति की ओर प्रेरित किया, जिससे स्थानीय सामाजिक सुधार की गतिविधियाँ धीरे-धीरे व्यापक औपनिवेशिक-विरोधी आंदोलन से जुड़ने लगीं।

ब्रिटिश दमन और गिरफ्तारियाँ

जैसे-जैसे खुदाई खिदमतगारों की गतिविधियाँ बढ़ीं, ब्रिटिश प्रशासन ने निगरानी, गिरफ्तारियों और अन्य दमनात्मक उपायों का सहारा लिया। विडंबना यह रही कि इस दमन ने आंदोलन को कमजोर करने के बजाय कई स्थानों पर लोगों को उससे अधिक मजबूती से जोड़ दिया।

सामाजिक आंदोलन से राजनीतिक संघर्ष की ओर परिवर्तन

इन सभी परिस्थितियों के संयुक्त प्रभाव से खुदाई खिदमतगार आंदोलन धीरे-धीरे सामाजिक सुधार से राजनीतिक प्रतिरोध की ओर बढ़ा। 1920 के दशक के उत्तरार्ध तक संगठन अधिक व्यवस्थित और राजनीतिक रूप से सक्रिय हो चुका था, और 1929 ई. में इसका संगठित स्वरूप स्पष्ट रूप से सामने आया।

इस प्रकार खुदाई खिदमतगार आंदोलन का विकास राजनीतिक दमन, आर्थिक पिछड़ेपन, अशिक्षा, सामाजिक विभाजन, रक्त-प्रतिशोध की परंपरा, सामाजिक सुधार की आवश्यकता, गांधीवादी विचारधारा और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रभाव के संयुक्त परिणाम के रूप में हुआ। गफ्फार खान ने पहले शिक्षा और सामाजिक सुधार के माध्यम से समाज को संगठित किया और फिर उसी संगठन को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अहिंसक राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बनाया, यही बात खुदाई खिदमतगार आंदोलन को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अन्य आंदोलनों से अलग और विशिष्ट बनाती है।

आंदोलन के प्रमुख उद्देश्य और विचारधारा

आंदोलन के प्रमुख उद्देश्य थे- पश्तून समाज में शिक्षा और सामाजिक जागरूकता का प्रसार, अशिक्षा और सामाजिक कुरीतियों को दूर करना, आत्मानुशासन और सेवा-भावना विकसित करना, पश्तूनों के बीच आपसी संघर्ष और रक्त-प्रतिशोध की परंपरा को समाप्त करना तथा विभिन्न जनजातीय समूहों में एकता स्थापित करना। राजनीतिक स्तर पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की दमनकारी नीतियों का अहिंसक विरोध और भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष में योगदान देना भी इसके प्रमुख लक्ष्य थे।

आंदोलन की विचारधारा में अहिंसा, सामाजिक सुधार, शिक्षा, पश्तून एकता, आत्मानुशासन और औपनिवेशिक शासन का विरोध प्रमुख थे। गफ्फार खान ने गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा को पश्तून समाज की परिस्थितियों के अनुरूप अपनाया। आंदोलन का मूल विश्वास था कि सामाजिक परिवर्तन और राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए जनता का नैतिक और मानसिक विकास आवश्यक है।

आंदोलन की रणनीति और अहिंसक संघर्ष

खुदाई खिदमतगार आंदोलन ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का विरोध करने के लिए मुख्यतः अहिंसक जनसंगठन, सत्याग्रह, सार्वजनिक प्रदर्शन, असहयोग, बहिष्कार, सामाजिक सेवा और वैकल्पिक संस्थाओं का सहारा लिया। खान अब्दुल गफ्फार खान का विश्वास था कि पश्तून समाज को संगठित, अनुशासित और शिक्षित करके बिना हथियार उठाए भी औपनिवेशिक शासन को चुनौती दी जा सकती है। इसलिए आंदोलन की रणनीति राजनीतिक विरोध के साथ-साथ सामाजिक पुनर्गठन पर भी आधारित थी।

सार्वजनिक सभाएँ और जन-प्रदर्शन

खुदाई खिदमतगारों ने जनता को संगठित करने के लिए सार्वजनिक सभाओं, जुलूसों, शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और राजनीतिक बैठकों का व्यापक उपयोग किया। ब्रिटिश प्रशासन द्वारा रोकने, गिरफ्तार करने या दमन करने के प्रयासों के बावजूद कार्यकर्ताओं को हिंसा से दूर रहने और शांतिपूर्ण प्रतिरोध जारी रखने के लिए प्रशिक्षित किया जाता था।

भाषण, कविता, गीत और सांस्कृतिक माध्यम

भाषणों, कविताओं, गीतों और स्थानीय सांस्कृतिक माध्यमों का उपयोग शिक्षा, सामाजिक सुधार, एकता, आत्मसम्मान और औपनिवेशिक शासन के विरोध का संदेश आम जनता तक पहुँचाने के लिए किया गया। स्थानीय भाषा और परंपराओं के उपयोग से आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त करने में सहायता मिली।

असहयोग और बहिष्कार

ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार तथा स्वदेशी वस्तुओं, घरेलू वस्त्रों और खादी के उपयोग को प्रोत्साहित किया गया, ताकि जनता को औपनिवेशिक आर्थिक व्यवस्था पर अत्यधिक निर्भरता से दूर कर स्वावलंबन की भावना विकसित की जा सके।

सरकारी संस्थाओं से असहयोग

यह प्रदर्शित करने के लिए कि जनता अन्यायपूर्ण औपनिवेशिक व्यवस्था को स्वीकृति नहीं देती, न्यायिक मामलों में पश्तून जिरगा जैसी पारंपरिक सामुदायिक संस्थाओं को महत्त्व दिया गया, जिससे स्थानीय सामुदायिक स्वायत्तता की भावना मजबूत हुई।

कर और लगान संबंधी असहयोग

कुछ क्षेत्रों में करों और लगान के भुगतान से असहयोग भी देखा गया, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश प्रशासन पर आर्थिक-राजनीतिक दबाव डालना था। यद्यपि यह सभी क्षेत्रों और समयों में एक-समान रणनीति नहीं थी, अनुकूल परिस्थितियों में इसका प्रयोग किया गया।

वैकल्पिक विद्यालय और शिक्षा का प्रसार

गफ्फार खान का मानना था कि अशिक्षित समाज को लंबे समय तक संगठित रखना कठिन है, इसलिए सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर निर्भरता के बजाय स्थानीय विद्यालयों और शैक्षिक संस्थाओं के विकास को प्रोत्साहित किया गया, जिनमें पढ़ना-लिखना ही नहीं, सामाजिक व राजनीतिक चेतना भी सिखाई जाती थी।

ग्रामीण विकास और सामुदायिक सेवा

‘खुदाई खिदमतगार’ नाम ही आंदोलन के सेवा-आधारित चरित्र का सूचक था। स्वयंसेवक ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक सहयोग, स्वच्छता, सामाजिक सुधार और स्थानीय विकास से जुड़े कार्य करते थे, जिससे संगठन और आम जनता के बीच संबंध मजबूत हुए।

‘पख्तून’ पत्रिका और जनसंचार

1928 ई. में शुरू हुई ‘पख्तून’ पत्रिका के माध्यम से पश्तून समाज के सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक प्रश्नों पर विचार प्रस्तुत किए गए, जिसने शिक्षा, सामाजिक सुधार, पश्तून एकता और राजनीतिक जागरूकता को बढ़ावा दिया।

 महिला भागीदारी को प्रोत्साहन

गफ्फार खान के सामाजिक सुधार कार्यक्रम में महिलाओं की शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में भूमिका को महत्त्वपूर्ण माना गया, जिससे पश्तून समाज में पारंपरिक सामाजिक सीमाओं के भीतर परिवर्तन की प्रक्रिया को गति मिली।

स्वयंसेवकों का संगठन और अनुशासन

खुदाई खिदमतगारों को अनुशासित सामाजिक कार्यकर्ता और अहिंसक संघर्ष के स्वयंसेवक के रूप में तैयार किया जाता था। ब्रिटिश पुलिस या सैनिकों की कार्रवाई के सामने भी प्रतिशोधात्मक हिंसा न करना आंदोलन के अनुशासन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा था।

सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा

खुदाई खिदमतगारों ने विशेष रूप से 1930 ई. के सविनय अवज्ञा आंदोलन में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध शांतिपूर्ण प्रतिरोध किया। गिरफ्तारी, लाठीचार्ज और गोलीबारी के बावजूद उन्होंने हिंसक प्रतिक्रिया से बचने का प्रयास किया, किस्सा ख्वानी बाजार की घटना इस अहिंसक अनुशासन का प्रमुख उदाहरण है।

दमन के सामने अहिंसक दृढ़ता

गिरफ्तारियों, प्रतिबंधों और निर्वासन जैसे दमनात्मक उपायों के बावजूद खुदाई खिदमतगारों ने संघर्ष को हिंसक दिशा में जाने से रोका, क्योंकि गफ्फार खान का मानना था कि हिंसा ब्रिटिश शासन को दमन का अतिरिक्त आधार देगी, जबकि संगठित अहिंसक प्रतिरोध शासन की नैतिक वैधता को चुनौती देगा।

इस प्रकार आंदोलन की रणनीति केवल विरोध-प्रदर्शन तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें जनसभाएँ, सत्याग्रह, असहयोग, बहिष्कार, शिक्षा, जनसंचार, सामाजिक सेवा, सामुदायिक संगठन, महिला भागीदारी और स्थानीय संस्थाओं को मजबूत करना शामिल था, जिसका साझा उद्देश्य पश्तून समाज को सामाजिक रूप से जागरूक, राजनीतिक रूप से संगठित और आत्मनिर्भर बनाना था।

खुदाई खिदमतगार आंदोलन (Khudai Khidmatgar Movement)
गफ्फार खान और गांधीजी

सविनय अवज्ञा आंदोलन में भागीदारी और किस्सा ख्वानी बाजार हत्याकांड (1930 ई.)

1930 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ होने पर खुदाई खिदमतगारों ने उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में जुलूस, प्रदर्शन, धरने और शांतिपूर्ण प्रतिरोध के माध्यम से व्यापक जनजागरण किया। 23 अप्रैल 1930 ई. को गफ्फार खान और खुदाई खिदमतगार के अन्य नेताओं को उटमानज़ई में एक सभा में भाषण देने के कारण ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। उनकी गिरफ्तारी के विरोध में पेशावर सहित पड़ोसी शहरों में प्रदर्शन शुरू हो गए। उसी दिन पेशावर के किस्सा ख्वानी बाज़ार में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन चल रहा था। ब्रिटिश सैनिक भीड़ को हटाने के लिए वाहनों सहित भीड़ में घुस गए, जिसमें अनेक प्रदर्शनकारी कुचल दिए गए। इसके बाद सैनिकों ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की, जिसमें बड़ी संख्या में बेगुनाह लोग मारे गए और घायल हुए। यह घटना ‘किस्सा ख्वानी बाजार हत्याकांड’ के नाम से भारतीय इतिहास में दर्ज है।

इसके बाद हजारों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया और उन्हें कारावास व कठोर दमन का सामना करना पड़ा। इस भीषण हिंसा के बावजूद खुदाई खिदमतगार स्वयंसेवकों ने बड़े पैमाने पर अहिंसा का मार्ग बनाए रखा। इस दृढ़ता ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक ध्यान आकर्षित किया और ब्रिटिश शासन के दमनकारी स्वरूप को उजागर किया।

ब्रिटिश दमन और आंदोलन की प्रतिक्रिया (1930–1934 ई.)

ब्रिटिश सरकार ने खुदाई खिदमतगारों को कमजोर करने के लिए व्यापक दमनात्मक उपाय अपनाए। गफ्फार खान और आंदोलन के अनेक कार्यकर्ताओं को जेल भेजा गया। कार्यकर्ताओं को गोलीबारी, यातना, सार्वजनिक अपमान और संपत्ति के विनाश जैसी कठोर कार्रवाइयों का सामना करना पड़ा। ब्रिटिश सरकार ने अगस्त 1930 ई. से जनवरी 1931 ई. तक उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में मार्शल लॉ लागू रखा।

किंतु दमन का एक विरोधाभासी परिणाम यह हुआ कि आंदोलन के प्रति जनता की सहानुभूति बढ़ी और बड़ी संख्या में लोग इससे जुड़ने लगे। दमन आंदोलन को समाप्त करने के बजाय कई अवसरों पर उसके विस्तार का कारण बना। अंततः व्यापक राजनीतिक दबाव के परिणामस्वरूप गफ्फार खान को रिहा किया गया और आंदोलन पर लगाए गए कुछ प्रतिबंध हटाए गए।

दिसंबर 1934 ई. में एक कथित भड़काऊ भाषण के आरोप में गफ्फार खान को गिरफ्तार करके दो वर्ष के कारावास की सजा दी गई। उनकी इस गिरफ्तारी के बावजूद आंदोलन की मजबूत संगठनात्मक संरचना और स्थानीय नेतृत्व के कारण खुदाई खिदमतगार अपनी गतिविधियाँ जारी रखने में सफल रहे।

भारत शासन अधिनियम 1935 और 1937 के प्रांतीय चुनाव

भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में सीमित मताधिकार की व्यवस्था की गई और प्रांतों को सीमित स्वायत्तता प्रदान की गई। इससे खुदाई खिदमतगारों और कांग्रेस को प्रांतीय राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेने का अवसर मिला।

1937 ई. के प्रांतीय चुनावों में खुदाई खिदमतगारों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त की। इसके परिणामस्वरूप गफ्फार खान के भाई खान अब्दुल जब्बार खान, जिन्हें डॉ. खान साहिब के नाम से जाना जाता था, प्रांत के मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस समर्थित इस प्रांतीय सरकार ने राजनीतिक बंदियों की रिहाई, भूमि सुधार, शिक्षा का विस्तार और पश्तो भाषा को शिक्षा में अधिक महत्त्व देने जैसे सुधारात्मक कदम उठाए।

यह सफलता खुदाई खिदमतगार आंदोलन के राजनीतिक प्रभाव का महत्त्वपूर्ण प्रमाण थी। अब आंदोलन केवल ब्रिटिश-विरोधी जनसंगठन नहीं रहा, बल्कि प्रांतीय शासन में भी उसकी प्रभावशाली भूमिका स्थापित हो गई।

सुभाष चंद्र बोस के पलायन में सहायता (1941 ई.)

खुदाई खिदमतगार आंदोलन से जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं ने सुभाष चंद्र बोस के भारत से बाहर निकलने में सहायता की। 1941 ई. में बोस ब्रिटिश निगरानी से बचते हुए उत्तर-पश्चिमी सीमा क्षेत्र पहुँचे। इस दौरान स्थानीय राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं और सहयोगियों ने उनकी यात्रा में सहायता की। पेशावर से आगे अफगानिस्तान पहुँचने के बाद बोस ने यूरोप की ओर अपनी यात्रा जारी रखी। इस घटना से स्पष्ट है कि स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न संगठनों के बीच कई स्तरों पर सहयोग विद्यमान था।

द्वितीय विश्वयुद्ध और बाद का दमन (1939–1945 ई.)

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस्तीफे के बाद उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में खुदाई खिदमतगार आंदोलन के विरोधियों को अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिला। इस दौरान प्रांत में मुस्लिम लीग का राजनीतिक प्रभाव भी बढ़ने लगा, जिसके कारण खुदाई खिदमतगारों और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक संघर्ष तीव्र हुआ। इसके बावजूद आंदोलन ने कांग्रेस के साथ अपना सहयोग जारी रखा और ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता की मांग का समर्थन किया। ब्रिटिश प्रशासन ने इस काल में खुदाई खिदमतगार कार्यकर्ताओं पर पुनः दमनात्मक कार्रवाई की और नेताओं को गिरफ्तार किया।

1946 ई. के प्रांतीय चुनाव और पुनः सफलता

1946 ई. के प्रांतीय चुनावों में भी कांग्रेस और खुदाई खिदमतगारों के गठबंधन को उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में महत्त्वपूर्ण सफलता मिली। डॉ. खान साहिब पुनः मुख्यमंत्री बने। इस चुनावी सफलता से स्पष्ट हुआ कि विभाजन से ठीक पहले तक प्रांत में खुदाई खिदमतगार और कांग्रेस का महत्त्वपूर्ण जनाधार बना हुआ था। किंतु इसी समय मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग को व्यापक राजनीतिक समर्थन मिलने लगा और दोनों के बीच राजनीतिक संघर्ष तेज हो गया।

भारत विभाजन का विरोध और बन्नू प्रस्ताव (1947 ई.)

खान अब्दुल गफ्फार खान और खुदाई खिदमतगार आंदोलन भारत के धार्मिक आधार पर विभाजन के प्रबल विरोधी थे। वे संयुक्त और बहुधार्मिक भारत की अवधारणा के समर्थक थे तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं अखिल भारतीय आजाद मुस्लिम सम्मेलन के साथ रहे।

जून 1947 ई. में खुदाई खिदमतगार नेताओं ने ‘बन्नू प्रस्ताव’ प्रस्तुत किया। इसमें उन्होंने माँग की कि पश्तूनों को केवल भारत या पाकिस्तान में शामिल होने के विकल्प तक सीमित न रखा जाए, बल्कि एक स्वतंत्र पश्तूनिस्तान की स्थापना का भी विकल्प दिया जाए। ब्रिटिश सरकार ने इस माँग को स्वीकार नहीं किया।

इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के भविष्य का निर्णय करने के लिए जनमत संग्रह आयोजित किया, जिसमें केवल भारत या पाकिस्तान में शामिल होने के विकल्प थे। खुदाई खिदमतगार आंदोलन ने इस जनमत संग्रह का बहिष्कार किया, क्योंकि इसमें पश्तूनिस्तान अथवा स्वतंत्र राजनीतिक व्यवस्था का विकल्प शामिल नहीं था। अंततः जनमत संग्रह के परिणामस्वरूप उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत पाकिस्तान का हिस्सा बन गया। यह निर्णय खुदाई खिदमतगार आंदोलन के लिए एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक पराजय साबित हुआ।

जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पर्याप्त परामर्श किए बिना विभाजन की योजना को स्वीकार कर लिया, तो गफ्फार खान ने गहरी निराशा व्यक्त की। उन्होंने कहा: “आपने हमें भेड़ियों के हवाले कर दिया है।”

पाकिस्तान की स्थापना के बाद दमन और बाबर्रा हत्याकांड (1947–1948 ई.)

अगस्त 1947 ई. में पाकिस्तान की स्थापना के साथ खुदाई खिदमतगार आंदोलन के सामने नई और कठिन राजनीतिक परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं। उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में कांग्रेस-समर्थित प्रांतीय सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और मुस्लिम लीग-समर्थित नई सरकार स्थापित हुई। सितंबर 1947 ई. में आंदोलन के नेताओं ने यह घोषणा की कि वे पाकिस्तान के हितों और सुरक्षा के लिए कार्य करने को तैयार हैं, किंतु पाकिस्तान सरकार ने आंदोलन के प्रति कठोर नीति बनाए रखी।

वर्ष 1948 में खुदाई खिदमतगार आंदोलन पर प्रतिबंध लगा दिया गया और व्यापक गिरफ्तारियाँ की गईं। इसी वर्ष 12 अगस्त 1948 ई. को ‘बाबर्रा हत्याकांड’ हुआ, जो खुदाई खिदमतगारों के विरुद्ध दमन की सबसे गंभीर घटनाओं में से एक है। चारसद्दा क्षेत्र में आंदोलन के समर्थक नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में एकत्र हुए थे। सरकारी कार्रवाई के दौरान प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की गई, जिसमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए और अनेक घायल हुए। इस घटना ने पाकिस्तान में खुदाई खिदमतगार आंदोलन के विरुद्ध सरकारी दमन की तीव्रता को उजागर किया।

गफ्फार खान ने विभाजन के बाद पाकिस्तान में रहते हुए पश्तूनिस्तान अथवा पश्तून क्षेत्रों के लिए स्वायत्त राजनीतिक व्यवस्था की माँग का समर्थन जारी रखा। पाकिस्तान सरकार ने इस माँग को संदेह की दृष्टि से देखा और उन्हें राजनीतिक दबाव, गिरफ्तारियों तथा अंततः नज़रबंदी का सामना करना पड़ा।

आंदोलन का पतन और विचारधारा की निरंतरता

भारत विभाजन के बाद बदलती राजनीतिक परिस्थितियाँ, सरकारी दमन, गिरफ्तारियाँ और संगठन पर प्रतिबंध खुदाई खिदमतगार आंदोलन के प्रभाव में गिरावट के प्रमुख कारण बने। जिस क्षेत्र में आंदोलन ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक जनसमर्थन प्राप्त किया था, स्वतंत्र पाकिस्तान में उसे राजनीतिक विरोध और दमन का सामना करना पड़ा। संगठनात्मक रूप में इसका प्रभाव कम होता गया।

फिर भी आंदोलन की विचारधारा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। गफ्फार खान जीवन के अंतिम वर्षों तक अहिंसा, शांति, सामाजिक सुधार और राजनीतिक अधिकारों के पक्ष में सक्रिय रहे। 2011 ई. में दिल्ली में फैसल खान ने खुदाई खिदमतगार नाम से एक नई संगठनात्मक पहल को पुनर्जीवित किया, जिसका मुख्य जोर सांप्रदायिक सद्भाव, शांति और आपदा राहत जैसे सामाजिक कार्यों पर रहा है।

आंदोलन का सामाजिक और ऐतिहासिक महत्त्व

खुदाई खिदमतगार आंदोलन ने पश्तून समाज में शिक्षा, सामाजिक सुधार, सामुदायिक एकता और जनसेवा की भावना को मजबूत किया। इसने पारंपरिक जनजातीय विभाजनों और आपसी संघर्षों से ऊपर उठकर व्यापक सामुदायिक पहचान विकसित करने का प्रयास किया। महिलाओं की सामाजिक भागीदारी, शिक्षा और समानता के विचारों को भी इसने प्रोत्साहित किया।

राजनीतिक दृष्टि से इस आंदोलन ने उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में ब्रिटिश शासन को महत्त्वपूर्ण चुनौती दी और क्षेत्र को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से जोड़ा। यह इतिहास के सबसे बड़े संगठित अहिंसक आंदोलनों में से एक माना जाता है, जिसकी सदस्यता लगभग एक लाख या उससे अधिक बताई जाती है।

इस आंदोलन का सबसे बड़ा ऐतिहासिक महत्त्व यह है कि उसने पश्तून समाज में, जिसकी पहचान लंबे समय से योद्धा परंपराओं से जुड़ी रही थी, अहिंसा और अनुशासित जन-संगठन को एक प्रभावी राजनीतिक साधन के रूप में स्थापित किया। इसने इस्लामी परंपरा, मानव सेवा और अहिंसक संघर्ष को एक-दूसरे से जोड़ा। आंदोलन का यह संदेश था कि साहस का अर्थ केवल हथियार उठाना नहीं है, अन्याय के सामने बिना हिंसा का सहारा लिए दृढ़ता से खड़े रहना भी साहस और शक्ति का प्रतीक है।

गफ्फार खान ने पश्तून समाज की धार्मिक और सामाजिक परंपराओं को गांधीवादी अहिंसा के साथ जोड़ा। इस कारण खुदाई खिदमतगार आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में इस्लामी नैतिक मूल्यों, सामाजिक सेवा और गांधीवादी अहिंसा के विशिष्ट समन्वय का उदाहरण बन गया। खान अब्दुल गफ्फार खान का जीवन और उनका आंदोलन आज भी आधुनिक दक्षिण एशियाई इतिहास में अहिंसा, मानव सेवा, शिक्षा और सामाजिक सुधार की एक स्थायी और प्रेरणादायक विरासत के रूप में स्मरण किया जाता है।

खुदाई खिदमतगार आंदोलन से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. खुदाई खिदमतगार आंदोलन क्या था?

खुदाई खिदमतगार आंदोलन ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में चलाया गया एक प्रमुख स्वतंत्रता आंदोलन था। यह आंदोलन अहिंसा, सामाजिक सुधार और स्वतंत्रता के सिद्धांतों पर आधारित था।

2. खुदाई खिदमतगार आंदोलन की स्थापना किसने की?

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दाई खिदमतगार आंदोलन की स्थापना खान अब्दुल गफ्फार खान ने वर्ष 1929 ई. में की थी। वे सीमांत गांधी और बादशाह खान के नाम से भी प्रसिद्ध थे।

3. खुदाई खिदमतगारों को ‘लाल कुर्ती’ या ‘रेड शर्ट्स’ क्यों कहा जाता था?

इस आंदोलन के स्वयंसेवक लाल रंग की वर्दी पहनते थे। इसी कारण उन्हें लाल कुर्ती दल कहा जाने लगा और आंदोलन को रेड शर्ट आंदोलन के नाम से भी जाना गया।

4. लाल कुर्ती आंदोलन के प्रमुख उद्देश्य क्या थे?

इस आंदोलन का उद्देश्य ब्रिटिश शासन का विरोध करना, पठान समाज में शिक्षा और सामाजिक सुधार को बढ़ावा देना, सांप्रदायिक सद्भाव स्थापित करना तथा अहिंसा के माध्यम से भारत की स्वतंत्रता प्राप्त करना था।

5. खान अब्दुल गफ्फार खान कौन थे?

खान अब्दुल गफ्फार खान एक महान स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और अहिंसा के समर्थक थे। वे महात्मा गांधी के निकट सहयोगी थे और उन्हें ‘सीमांत गांधी’ तथा ‘बादशाह खान’ के नाम से जाना जाता है।

6. खुदाई खिदमतगार आंदोलन का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से क्या संबंध था?

खुदाई खिदमतगार आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ घनिष्ठ राजनीतिक सहयोग स्थापित किया। खान अब्दुल गफ्फार खान महात्मा गांधी और कांग्रेस के प्रमुख नेताओं के निकट सहयोगी थे।

7. खुदाई खिदमतगार आंदोलन ने ब्रिटिश शासन का विरोध कैसे किया?

आंदोलन ने अहिंसक सत्याग्रह, जनसभाओं, जुलूसों, बहिष्कार और सामाजिक सेवा के माध्यम से ब्रिटिश शासन का विरोध किया। इसके कार्यकर्ताओं ने कठोर दमन और हिंसा के बावजूद अहिंसा का मार्ग अपनाया।

8. ब्रिटिश सरकार ने खुदाई खिदमतगार आंदोलन के प्रति कैसी प्रतिक्रिया दी?

ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को कठोर दमन का सामना कराया। अनेक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया, जेलों में डाला गया और आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस तथा सेना का प्रयोग किया गया।

9. भारत के विभाजन पर खुदाई खिदमतगार आंदोलन की क्या प्रतिक्रिया थी?

खान अब्दुल गफ्फार खान और खुदाई खिदमतगार आंदोलन भारत के विभाजन के विरोधी थे। वे एक संयुक्त भारत के समर्थक थे और विभाजन के बाद उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के पाकिस्तान में शामिल होने से वे अत्यंत निराश हुए।

10. भारतीय इतिहास में खुदाई खिदमतगार आंदोलन का क्या महत्त्व है?

खुदाई खिदमतगार आंदोलन का विशेष महत्त्व इसलिए है क्योंकि इसने पठान समाज में अहिंसा, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय आंदोलन की भावना को मजबूत किया। यह आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी के अहिंसक संघर्ष के सबसे महत्त्वपूर्ण सहयोगी आंदोलनों में से एक था।
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